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”तानाशाह शी” और ”लोकतांत्रिक भारत” के समक्ष विकल्प in Punjab Kesari

चीनी संसद ने 17 मार्च को एकमत से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने के प्रस्ताव को पारित कर दिया। शी के साथ ही उनके निकटतम सहयोगी और कट्टर राष्ट्रवादी वांग कीशान को उपराष्ट्रपति बनाने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया गया। जाहिर है इसकी तैयारी लंबे अर्से से चल रही थी। इन खबरों के मद्दे नजर भारत में चीन के प्रति रवैये में निश्चित ही बदलाव नजर आया। भारत सरकार ने दलाई लामा के प्रति अपने अति उदारवादी रवैये को थोड़ा नियंत्रित किया और साथ ही दोनो देशों के संबंधों का दूरगामी विश्लेषण भी आरंभ किया। चीन की वैश्विक भूमिका को लेकर शी की महत्वाकांक्षी योजनाओं और अमेरिका के साथ ट्रेड वाॅर के बढ़ते खतरे के आलोक में समयानुसार भारत के लिए नीतिगत समायोजन (एडजस्टमेंट) आवश्यक भी है।
शी को आजीवन राष्ट्रपति पद सौंपने का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मकसद क्या है? इसका भारत के लिए क्या अर्थ है और उसके समक्ष क्या विकल्प हैं? इसे समझना आवश्यक है। भारत में कम्युनिस्ट, राष्ट्रवाद और देशप्रेम को गाली मानते हैं, लेकिन चीन में शी इन्हीं विशेषताओं के कारण आजीवन राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमा कर बैठ गए हैं। उन्होंने चीन के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य विकास के लिए नया समाजवादी विचार प्रस्तुत किया है जो कट्टरवादी साम्यवाद से बहुत अलग है और राजनीतिक विचारधारा में चीन के इतिहास तथा वर्तमान विशेषताओं और आवश्यकताओं के समायोजन में विश्वास रखता है। संक्षेप में कहें तो इसका मकसद साम्यवाद का विकास नहीं, चीन का विकास है। पिछले साल 18 से 24 अक्तूबर के बीच हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं नेशनल कांग्रेस में पार्टी के संविधान में शी की इस नई मार्गदर्शक विचारधारा को शामिल किया गया। इसे ”नए युग के लिए समाजवाद का चीनी अभिलक्षणों वाला शी जिनपिंग विचार“ कहा गया। माओ के बाद यह पहली बार था जब किसी जीवित नेता के विचारों को उसके नाम के साथ पार्टी के संविधान में शामिल किया गया।
कांग्रेस के पहले दिन यानी 18 अक्तूबर को अपने उद्घाटन भाषण में शी ने चीन को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का खाका पेश किया। चीनी सेना को विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बनाने के बारे में उन्होंने कहा, ”हम अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि 2020 तक सेना का मेकेनाइजेशन पूरा हो जाए…हम हर तरह से अपनी सेना को आधुनिक बनाएंगे, चाहें वो सैद्धांतिक स्तर पर हो, सांगठनिक ढांचा हो, सैनिक हों या हथियार। हम एक मिशन के तौर पर ये सुनिश्चित करेंगे कि 2035 तक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना का आधुनिकीकरण पूर्ण हो जाए और 21वीं सदी के मध्य तक हमारी सेना विश्व स्तरीय सेना में बदल जाए।“
शी ने अपने भाषण में साफ तौर से तो नहीं कहा मगर उनका इरादा साफ था कि वो चीन को अमेरिका की टक्कर की आर्थिक और सैन्य शक्ति या कहें सुपर पावर बनाना चाहते हैं। शी की अब तक की उपलब्धियों को देखते हुए पार्टी को लगता है कि वो इसे हासिल भी कर सकते हैं। संभवतः यही कारण है कि पार्टी ने उन्हें आजीवन राष्ट्रपति पद पर बिठाने का निर्णय लिया ताकि देश निर्विघ्न चहुंमुखी विकास की दिशा में आगे बढे़ और हर दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली होने का लक्ष्य हासिल करे। पश्चिमी देश भले ही चीन की वैश्विक आकांक्षाओं को मान्यता देने में आनाकानी करें, लेकिन चीन ने महाशक्ति के तौर पर खुद को जताना अवश्य आरंभ कर दिया है। चाहे दुनिया भर में अपना व्यावसायिक और सामरिक वर्चस्व कायम करने की वन बेल्ट वन रोड परियोजना हो या साउथ चाइना सी में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की धज्जियां उड़ाना या दुनिया के अनेक गरीब देशों को अपनी दौलत के बल पर गुलाम बनाना, चीन ने बहुत व्यवस्थित और सोचे समझे तरीके से अपनी दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है।
ऐसे में अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का ही नहीं, भारत में सुरक्षा और विदेशनीति के कर्णधारों और विशेषज्ञों का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। हाल ही में विदेश सचिव विजय गोखले ने संसद की विदेशी मामलों की स्थायी समिति के सामने चीन के बारे मे अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन विदेशों में अपने हितों की रक्षा के लिए अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है। ये जिबूती समेत कई देशों में सैन्य अड्डे बनाने और एशिया के लगभग हर देश में परियोजनाएं स्थापित करने से स्पष्ट है। ऐसे में भारत के लिए भी आवश्यक है कि वो भी अपने डिलीवरी मैकेनिज्म की गति बढ़ाए।
गोखले आगे कहते हैं, “चीन का उदय हमारे सामने अवसर और चुनौतियां दोनो पेश करता है, खासतौर से तब जब चीन का अंतरराष्ट्रीय पाॅस्चर अधिक आत्मविश्वासी और हठी हो गया है। ज्यादातर प्रमुख विश्व शक्तियां कनेक्टीविटी से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। जहां हम एशिया-अफ्रीका ग्रोथ काॅरीडोर और चाबहार पोर्ट के विकास पर काम कर रहे हैं, वहीं चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना और चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर पर काम की गति बढ़ा दी है। यहां चीन गंभीर खिलाड़ी है। वह पूंजी, तकनीक और आंतरिक ढांचे का बड़ा निर्यातक है।”
एक ओर जहां विदेश सचिव चीन की नीतियों को गंभीरता से लेते हैं और उनका तोड़ तलाशने की बात करते हैं, वहीं सेना के उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद चीन के बरक्स भारत की सैन्य तैयारियों पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं। संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए वो कहते हैं, “दो मोर्चों पर युद्ध की आशंका वास्तविक है। चीन और पाकिस्तान अपनी सेना का तेज गति से आधुनिकीकरण कर रहे हैं। भारत को भी अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए। लेकिन मौजूदा बजट इस आवश्यकता को पूरी करने के लिए अपर्याप्त है। सेना के बजट में की गई मामूली बढ़ोतरी मुद्रास्फीति की ही भरपाई बामुश्किल कर पाएगी, इससे तो कर चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद आगे कहते हैं, ”सेना को 10 दिन के सघन युद्ध के लिए हथियारों का जखीरा निर्मित करने के वास्ते जितना धन चाहिए उसमें 6,380 करोड़ रूपयों की कमी है। सरकार ने हथियारों की कमी पूरी करने के लिए जून 2018 का लक्ष्य रखा है, ये कमी पूरी करना सेना की लंबे युद्ध की तैयारी के लिए आवश्यक है। यह जरूरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने और आधुनिकीकरण की ओर ध्यान लगाएं। आज, इस बात की पहले से कहीं अधिक आवश्यता है कि हमारा देश अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करे और दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में जाना जाए।“ रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्टों के अनुसार सेना के आधुनिकीकरण के लिए 21,338 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह मौजूदा 125 परियोजनाओं के 29,033 करोड़ के बजट से भी काफी कम है।
रक्षा मामलों की स्थायी समिति के प्रमुख मेजर जनरल बीसी खंडूरी, सेवानिवृत्त अपनी रिपोर्ट में कहते हैं, ”हम इस निराशाजनक स्थिति से दुखी हैं। सेना के प्रतिनिधि स्वयं सेना की तैयारियों के लिए अपर्याप्त धन आवंटन के नकारात्मक प्रभाव के बारे में खुल कर बता रहे हैं, ऐसे में इस समस्या का जल्द से जल्द निराकरण होना आवश्यक है।”
जाहिर है मोदी सरकार, चीन को लेकर सजग ही नहीं चिंतित भी है। पिछले 70 वर्षोंं में चीन के संबंध में सुरक्षा के जो उपास किए जाने चाहिए थे, वो नहीं किए गए। आजादी के शुरूआती दौर में नेहरू सरकार ने कुछ भयंकर कूटनीतिक गलतियां भी कीं जिनका परिणाम देश अब तक भुगत रहा है। बहरहाल, मौजूदा सरकार नौसेना की बेहतरी से लेकर सीमा पर आंतरिक ढांचा विकसित करने तक अनेक प्रयास कर रही है। लेकिन कमजोरियों के बावजूद भारत घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं है। ये हम डोकलाम विवाद में देख चुके हैं। कूटनीति के क्षेत्र में भी भारत, अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस आदि के साथ रणनीतिक संबंध बना रहा है। भारत ने आसियान देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ किए हैं और मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक अपने पांव पसारे हैं। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक महाशक्ति बनने की इच्छा रखता है और अमेरिका, जापान, फ्रांस, रूस जैसे देश इसके लिए पूरा सहयोग करने के लिए तैयार भी हैं, लेकिन भारत को अपनी आकांक्षाओं और संसाधनों में संतुलन बिठाना होगा। बहुत से देश अपने हितों के लिए भारत को आगे तो बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं देना चाहते। पर्याप्त संसाधनों के आभाव में ये कैसे संभव होगा? इस पर विचार करना होगा।
भारत को अगर चीन के बरक्स खड़ा होना है तो उसे अपनी आंतरिक स्थिति भी सुधारनी होगी। चीन से सबक लेते हुुए देश को जोंक की तरह चूस रहे आंतरिक दुश्मनों से भी सख्ती से निपटना होगा। एक तरफ चीन ‘तानाशाही व्यवस्था’ के तहत दुनिया में महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा है तो वहीं भारत में उसके पिट्ठु हमारी सेना पर ही निशाना साध रहे हैं और विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं। एक ओर चीन जहां अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए हर खतरे को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करके बैठा है, वहीं हमारे यहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में भारत आक्रामक शी जिनपिंग का मुकाबला कैसे करेगा? क्या हम फिर से चीन से पंगा न लेने और देश में उसके पिट्ठुओं को खुली छूट देने की मनमोहन सरकार की नीति की ओर लौट जाएंगे या सख्ती से ऐसे तत्वों का समूल नाश करेंगे? हमें सुनिश्चित करना होगा कि चीन हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली का दुरूपयोग हमारे ही खिलाफ न कर पाए। चीन पर भारत में अलगाववादियों और नक्सलियों की मदद करने और उन्हें हथियार देने का भी आरोप है। चीन से इस विषय में भी दो टूक बात करनी होगी।

“सावधान! आकार लेना शुरू कर दिया है चीनी घेराबंदी ने” in Punjab Kesari

राजनयिकों के आरामदेह कक्षों और थिंक टैंकों के वातानुकूलित सेमीनारों से बाहर निकल, चीन की रणनीतिक घेराबंदी धीरे-धीरे जमीन पर आकार लेने लगी है। जिसकी आशंका थी, चीन जो चाहता था, वो हो रहा है। चीन की वजह से भारत के पड़ोसी देशों में जो परिवर्तन हो रहे हैं और घटनाक्रम जैसे करवट बदल रहा है, उसमें आवश्यक है कि हम कुछ देर रूक कर, सोच विचार कर, चीन और इन देशों के प्रति अपनी नीतियां बदलें या संशोधित करें।

सबसे पहले बात चीन की ही करते हैं। 11 दिसंबर को दिल्ली में हुई त्रिपक्षीय गठबंधन रिक (रशिया, इंडिया, चाइना) की बैठक के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने विदेश मंत्री वांग यी और सुषमा स्वराज की बातचीत के बारे में अपनी तरफ से विवरण दिया। इसके मुताबिक वांग ने सुषमा से कहा कि डोकलाम में “चीनी सीमा” में भारतीय सैनिकों के ”अवैध रूप“ से प्रवेश के बाद पैदा हुए विवाद से दोनों देशों के रिश्तों पर काफी दबाव पड़ा। हालांकि विवाद को राजनयिक जरिए से हल कर लिया गया लेकिन इससे सबक सीखना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। वांग ने कहा कि भारत-चीन संबंध महत्वपूर्ण काल में हैं और दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है आपसी विश्वास बढ़ाना।

वांग ने आगे कहा कि दोनों देशों ने ये विचार साझा किया कि चीन और भारत को एक दूसरे के विकास को अवसर के रूप में देखना चाहिए न कि चुनौती के रूप में और दोनों देश प्रतिद्वंद्वि कम और साझेदार अधिक हैं। इसलिए दोनों पक्षों को दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई सहमति को क्रियान्वित करना चाहिए।

ध्यान रहे वांग के भारत आने से पहले चीन ने डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। यह पहली बार है जब सर्दियों में भी डोकलाम में चीनी सैनिक मौजूद हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय के बयान के कुछ निहितार्थ हैं जिन्हें समझना आवश्यक है। एक – चीन ने साझा घोषणापत्र से अलग वांग और सुषमा की बातचीत को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह डोकलाम पर पर भारत के रूख से न केवल असहमत है, बल्कि नाराज भी है और इस नाराजगी को वह भारत की जनता को भी बताना चाहता है। दो – चीन ने अपनी तरफ से एक तरह से भारत को चेतावनी दी है। तीन – चीन के मुताबिक दोनों देशों के बीच पर्याप्त विश्वास नहीं है। चार – चीन चाहता है कि भारत, दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों में उसकी महत्वकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड की परियोजनाओं और विकास के नाम पर हो रही घेराबंदी को चुपचाप स्वीकार करे।

यहां तीन बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए, एक – रिक बैठक से पहले चीनी राजदूत ने कहा था कि भारत को वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए और अगर भारत चाहेगा तो चीन पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाली चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना का नाम बदल देगा। चीन ने इसे आर्थिक विकास की परियोजना बताते हुए कहा कि इसका भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे सीमा विवाद से कोई लेना देना नहीं है। तीन – रिक की बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री सरगेई लेवरोव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत को इस योजना में शामिल होना चाहिए और डरना नहीं चाहिए क्यांेकि किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए भारत के पास अच्छी प्रोफेशनल टीम है।

सुषमा और वांग की वार्ता के चीनी विदेश मंत्रालय के खुलासे और बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री द्वारा वन बेल्ट, वन रोड का मुद्दा उठाना ये दिखाता है कि रिक बैठक में इस विषय में बातचीत हुई, रूस ने इसमें चीन का साथ दिया, लेकिन भारत तैयार नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुछ दिन बाद ये अवश्य स्पष्ट किया कि अगर कोई सुझाव है और उसमें भारत की संवेदनशीलताओं और चिंताओं का ध्यान रखा जाता है, तो भारत उस पर अवश्य विचार करेगा।

जाहिर है चीन और भारत के संबंध, रूस और चीन के संबंधों से अलग हैं और भारत चीन की इस परियोजना को उसके रणनीतिक विस्तार के औजार के रूप में देखता है। चीन समूचे एशिया पर अपना वर्चस्व चाहता है जिसे भारत स्वीकार नहीं करता। भारत और पाकिस्तान में कोई समानता न होने के बावजूद, चीन अपने हित साधने और भारत को नीचा दिखाने के लिए हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों की बराबरी का दावा करता है। ये भी भारत को पसंद नहीं है।

ये संयोग नहीं कि वांग का बयान आने के चंद घंटों के भीतर ही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंग्रेजी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में एक लेख छपा जिसका शीर्षक था – ”भारत क्षेत्रीय विकास से अधिक भूराजनीतिक समीकरणों को महत्व देता है“। इसमें कहा गया – ”श्रीलंका ने पिछले सप्ताह हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्षीय लीज पर देने की औपचारिकता समाप्त की। श्रीलंका सरकार ने इसका स्वागत किया, लेकिन भारत में इससे खतरे की घंटी बजने लगी। कोलंबो ने बार-बार भारत को भरोसा दिलाया कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल शुद्ध रूप से नागरिक उद्देश्य के लिए होगा, ये बंदरगाह चीन को हिंद महासागर में समुद्री रास्ते उपलब्ध करवाएगा, लेकिन भारतीय मीडिया बता रहा है कि इस अधिग्रहण के जरिए चीन इस क्षेत्र में अधिकाधिक रणनीतिक और आर्थिक वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि चीन के वन बेल्ट, वन रोड से घिरने से डरा भारत हंबनटोटा में हवाईअड्डा बनाने पर विचार कर रहा है। नई दिल्ली की पुरानी रणनीतिक सोच इस क्षेत्र के अन्य देशों और चीन के बीच बढ़ रहे सहयोग को कम नहीं कर सकती। मालदीव ने हाल ही में चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थायित्व के बावजूद चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पर ईमानदारी से काम हो रहा है। इस क्षेत्र में चीन और अन्य देश विकास के लिए संयुक्त प्रयास कर रहे है। नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और अन्य देशों में चीनी निवेश ने अर्थव्यवस्था में सुधार किया है और लोगों को रोजगार दिया है।”

लेख में आगे कहा गया है कि ”श्रीलंका की अंदरूनी राजनीति मंे घुसने और नई दिल्ली को घेरने का चीन का कोई इरादा नहीं है। ये नई दिल्ली की संकीर्ण सोच होगी अगर वह चीन की सहयोगात्मक गतिविधियों को उसे घेरने और दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने की शोषणकारी रणनीतियों के तौर पर देखेगी। अगर भारत उनकी विकास की जरूरतंें पूरी कर सके तो श्रीलंका, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय देश भारत के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए तैयार हैं।“

भारत पर संकीर्ण सोच का आरोप लगाने वाला यह लेख बहुत ही चतुराई से अनेक तथ्यों को छुपा जाता है। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग मानता है। इससे निकलने वाले सीपेक को भारत कैसे मान्यता दे सकता है? क्या चीन ने वहां निर्माण कार्य आरंभ करने से पहले भारत की अनुमति ली थी या भारत को किसी भी तरह विश्वास में लिया था? अगर चीन भारत के साथ सहयोग का इतना ही इच्छुक है तो वो मसूद अजहर और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप जैसे मसलों पर भारत का साथ क्यांे नहीं देता? चीन पाकिस्तान को पूरी तरह त्याग कर भारत के साथ क्यों नहीं आता? सारी दुनिया ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग देखना आरंभ कर दिया है, लेकिन चीन क्यों अब भी शीतयुद्ध की तरह भारत और पाकिस्तान की तुलना करना चाहता है? वो क्यों भारत को पाकी चश्मे से देखना चाहता है?

जहां तक सीपेक का सवाल है, उसके बारे में खबर ये है कि चीन ने पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते उसकी अनेक परियोजनाओं को रोक दिया है। खबरें ये आ रही हैं कि चीन अब ये परियोजनाएं पाकी सेना की सरपरस्ती में पूरा करना चाहता है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानती है।

ग्लोबल टाइम्स का लेख कहता है कि हंबनटोटा के चीनी अधिग्रहण का श्रीलंका ने स्वागत किया। लेकिन हकीकत यह है कि उसने चीन से ऊंची दरांे पर ऋण लिया था। जब वो उसे वापस नहीं कर सका तो चीन ने उसे मजबूर किया कि वो उसे अपना प्रमुख बंदरगाह हंबनटोटा 99 साल की लीज पर दे। अगर चीन का मकसद सिर्फ व्यापार था तो उसे हंबनटोटा को 99 साल की लीज पर लेने की क्या जरूरत थी? क्या चीन भारत ही नहीं विश्व को भी यह लिखित में देने के लिए तैयार है कि वो श्रीलंका में हंबनटोटा और सीपेक के तहत पाकिस्तान में बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट को नौसैनिक अड्डों के रूप में कभी इस्तेमाल नहीं करेगा? वैसे भी साउथ चाइना सी प्रकरण के बाद दुनिया का चीन से भरोसा उठ गया है। चीन ने वहां न केवल अनधिकृत और अवैध नौसैनिक अड्डे बनाए, बल्कि इस विषय में अंतरराष्ट्रीय अदालत के निर्णय को भी कूड़े की टोकरी में फेंक दिया क्योंकि वो उसके पक्ष में नहीं था।

एक महत्वपूर्ण मसला नेपाल का भी है। वहां हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल ने एक अन्य दल सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के साथ बहुमत हासिल किया है। कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल के नेता और जल्द ही नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले के पी शर्मा ओली चीन के बेहद करीब समझे जाते हैं। पिछली बार जब वो प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने चीन के साथ अनेक ऐसे समझौते किए जिन पर भारत को सख्त आपत्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल में विशेष दिलचस्पी दिखाई है। 1997 से 2014 तके कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री वहां नहीं गया। मोदी नेपाल के दो दौरे कर चुके हैं जबकि सुषमा स्वराज वहां पांच बार जा चुकी हैं। मोदी सरकार ने नेपाल में 900 मेगावाट की बिजली परियोजना के लिए समझौता किया, उसे 1.3 अरब डाॅलर का ऋण दिया। जब नेपाल में भयंकर भूकंप आया तो भारत ने अधिकतम सहायता की। लेकिन चीन के प्रेम में अंधे ओली पर मोदी सरकार के सकारात्मक कदमों का कितना असर पड़ेगा ये देखना दिलचस्प होगा।

एक तरफ भारत को चीन की कूटनीतिक धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ नेपाल में चीन समर्थक ओली का सत्ता संभालना, पाकिस्तान में सेना के साथ चीन का गठबंधन, श्रीलंका में बंदरगाह पर कब्जा, मालदीव के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, म्यांमार और बांग्लादेश में सड़क और समुद्री परियोजनाएं, चीन भले ही भारत को कितना भी संकीर्ण कहे, लेकिन भारत उसकी छुपी मंशा को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

ऐसे में भारत के सामने क्या विकल्प हैं? इसके लिए ठंडे दिमाग से लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी। चीन के पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है जिसके जरिए वो देशों को खरीद रहा है और भारत को चुनौती दे रहा है कि तुम्हारी हिम्मत हो तो तुम भी खरीद लो। जाहिर है भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार, चीन से मुकाबला नहीं कर सकता, वैसे भी भारत लोकतांत्रिक देश है, यहां कम्युनिस्टों जैसे तानाशाही से काम नहीं लिया जा सकता। भारत सरकार भले ही चीनी सरकार की तरह तानाशाही से न काम कर सके, लेकिन उसे भी फैसले लेने की रफ्तार और क्षमता तो बढ़ानी ही होगी।

चीनी धमकियों और रणनीतिक घेराबंदी के मद्दे नजर भारत को सीमा पर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। भारत को संबंधित देशों को बिना लाग लपेट अपनी चिंताओं से अवगत भी करवाना होगा। लेकिन लगातार तनाव और युद्ध विकल्प नहीं हैं। आज दुनिया उसी के कसीदे पढ़ती है जिसके पास पैसा हो। भारत को अपनी आर्थिक ताकत को तेजी से बढ़ाना होगा, इसके लिए जरूरी हो तो चीन का इस्तेमाल भी करना होगा। पैसा कमाने के लिए चीन ने हर नियम-कानून को ताक पर रख दिया है। भारत को भी आदर्शवाद छोड़ व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा।

“चीन पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है क्वाड्रीलेटरल, अपनी शर्तों पर इसका समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

वक्त की नई करवट के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय में नए समीकरणों की आहट भी सुनाई देने लगी है। सोवियत रूस के धराशायी होने के बाद माना जाने लगा कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर है और दुनिया में उसका सिक्का चलता है। लेकिन रूस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। अमेरिका के आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को सीमित करने और दुनिया को बहुध्रुवीय बनाए रखने के लिए शीत युद्ध से उबर रहे रूस ने दो महत्वपूर्ण संगठनों की परिकल्पना की। वर्ष 1993 में रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने रिक (रशिया, इंडिया, चाइना ट्राइलेटरल) का खाका पेश किया। हालांकि इसका पहला शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में ही हो पाया। वर्ष 1996 में पांच देशों – चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रशिया और तजाकिस्तान ने शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन की स्थापना की। इसका मूल उद्देश्य था शंघाई के सीमांत इलाके में सैन्य विश्वास विकसित करना और सीमा विवादों को शांति से हल करना। इन देशों ने सीमांत इलाकों में सैन्य बल कम करने के लिए 24 अप्रैल 1997 को एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। इसी साल 20 मई को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और चीनी प्रधानमंत्री जियांग जेमिन ने ‘मल्टीपोलर वल्र्ड’ (बहुध्रुवीय विश्व) के समझौते पर हस्ताक्षर किए। वर्ष 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसके पूणकालिक सदस्य बन गए।

लंबे अर्से तक अमेरिकी ये सोचते रहे कि सोवियत रूस जैसे चीन भी धीरे-धीरे ध्वस्त हो जाएगा। वर्ष 2002 में वहां एक किताब भी आई जिसका शीर्षक था – चाइना कोलेप्स थ्योरी (चीन के पतन का सिद्धांत)। लेकिन ये थ्योरी फेल हो गई। अगले आठ साल में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यही नहीं 2002 से 2017 के बीच चीन का सकल घरेलू उत्पाद तिगुना हो गया।

तेजी से उभरते चीन ने दुनिया का महानतम देश बनने का लक्ष्य रखा है। इसे ध्यान में रखते हुए चीन ने दुनिया की सुपर पावर अमेरिका के साथ वर्चस्व साझा करने, परस्पर सहयोग बढ़ाने और अपने लक्ष्य को धीरे-धीरे अमली जामा पहनाने के लिए कई प्रस्ताव किए जिन्हें अमेरिका ने निरस्त कर दिया। चीन ने जो प्रस्ताव किए उनमें संभवतः सबसे पहला था वन बेल्ट, वन रोड इनीशिएटिव। इस परियोजना के बारे में पिछले पांच साल से सुगबुगाहट चल रही है। हालांकि इसका पहला महासम्मेलन इसी वर्ष बीजिंग में हुआ, अमेरिका ने इसमें अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा लेकिन इसमें भागीदारी का कोई वादा नहीं किया। इसकी खास वजह रही परियोजना की अस्पष्टता और चीन का अंधा स्वार्थीपन। चीन ने इसके लिए विवादास्पद क्षेत्रों में जाने से भी परहेज नहीं किया। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है, लेकिन चीन ने वहां भी चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर बना डाला जो वन बेल्ट वन रोड का ही एक हिस्सा है। श्रीलंका और ग्रीस में चीन के व्यवहार से भी अमेरिका नाराज हुआ। चीन ने श्रीलंका और चीन को ऊंची दरों पर ऋण दिया और जब वो इसे अदा नहीं कर पाए तो उनके महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया। चीन ने तो ग्रीस पर यहा तक दबाव डाला कि वो उससे संबंधित यूरापियन यूनियन के मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों को बाधित करे।

चीन का दूसरा प्रस्ताव रहा – ‘न्यू माॅडल आॅफ ग्रेट पाॅवर रिलेशंस’ (शक्ति के महान संबंधों का नया माॅडल)। शी जिनपिंग के इस व्यक्तिगत प्रस्ताव पर अमेरिका के कुछ राजनयिकों ने विचार का प्रस्ताव किया, लेकिन ‘माॅडल’ की अस्पष्टता के कारण ये भी ठंडे बस्ते में चला गया। इसके निरस्त होने का एक बड़ा कारण चीन की अजीबो-गरीब अपेक्षा भी थी कि यदि चीन किसी अमेरिकी सहयोगी पर हमला करता है तो अमेरिका उसके बचाव में नहीं आएगा। ये एक तरह से चीन का वर्चस्व स्वीकार करने जैसा था। एशिया में अपना कब्जा बनाने के लिए चीन का एक अन्य प्रस्ताव था – ‘एशिया फाॅर एशियंस’ (एशिया एशियाई लोगों के लिए)। अमेरिका ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘कम्युनिटी आॅफ काॅमन डेस्टिनी’ (साझा नियति का समुदाय) नाम से प्रस्ताव दिया। लेकिन इसमें न तो ये स्पष्ट था कि ‘कम्युनिटी’ में कौन से देश शामिल होंगे और न ही ‘डेस्टिनी’ का अर्थ। लेकिन अमेरिका को लगा कि इसके तहत चीन अपने नेतृत्व में विश्व की ‘नियति’ निर्धारित करना चाहता है। इसलिए ये प्रस्ताव भी सिरे नहीं चढ़ पाया।

लेकिन अब तक अमेरिका को चीनी प्रस्ताव और उनके निहितार्थ अच्छी तरह समझ आने लगे थे। साथ ही यह भी समझ आ गया था कि चीन का उदय काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक है। अमेरिका ने अब न केवल चीन के अभ्युदय में सहायक बनीं पक्षपाती आर्थिक-व्यापारिक नीतियों का विश्लेषण और विरोध शुरू किया, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जगह भारतीय-प्रशांत क्षेत्र शब्दावली का प्रयोग शुरू किया। इसका सीधा सा उद्देश्य चीन को ये संकेत देना था कि अमेरिका एशिया में चीन के एकछत्र प्रभुत्व को मान्यता नहीं देता। अगर वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कब्जा जमाने की कोशिश करेगा तो भारत की मदद से उसका सामना किया जाएगा। इसी सिलसिले में बराक ओबामा ने भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी घोषित किया जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने और मजबूती से दोहराया। ट्रंप ने तो अपनी नयी दक्षिण एशिया नीति में चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान पर भी नकेल कसी और अफगानिस्तान में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार किया।

अपनी पहली एशिया यात्रा में, जिसमें चीन के साथ जापान, साउथ कोरिया, वियतनाम और फिलीपींस भी शामिल थे, ट्रंप ने अपने इरादे स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन जैसे भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है, वैसे ही अमेरिका को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का। ट्रंप ने उसके दुःसाहस के लिए भी सीधे चीन को जिम्मेदार ठहराया और उस पर लगाम लगाने की मांग की।

अब समय का पहिया लगभग पूरा घूम चुका है। पहले जहां रूस और चीन अमेरिका पर लगाम लगाने के लिए संधियां कर रहे थे वहीं अब अमेरिका, एशिया में चीन पर लगाम लगाने के लिए नए गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है। इस श्रंखला में जो सबसे महत्वपूर्ण गठबंधन उभर कर सामने आ रहा है वो है आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत और अमेरिका का क्वाड्रिलेटरल या संक्षेप में क्वाड। क्वाड्रिलेटरल का अर्थ होता है चार भुजाओं वाला। उम्मीद की जा रही है कि क्वाड चीन की महत्वकांक्षी ओबीओआर परियोजना को तो चुनौती देगा ही, भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और सैन्य विस्तारवाद पर भी रोक लगाएगा और उसपर निगाह रखेगा।

अमेरिका क्वाड के लिए भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया को हर तरह की मदद देने के लिए तैयार है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अमेरिका की हथियार बेचने की चाल है। लेकिन ओबीओआर के नाम पर चीन की अब तक की हरकतों को देखते हुए लगता है कि हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा जा सकता और इसका मजबूत अंतरराष्ट्रीय विकल्प तैयार करना जरूरी है ताकि क्वाड के सिर्फ चार देश ही नही,ं जापान से अमेरिका तक पूरी दुनिया में कानून सम्मत, न्यायपूर्ण तरीके से व्यापार किया जा सके। ओबीओआर के नाम पर जहां चीन जहां समुद्री मार्गों पर मनमाने तरीके से कब्जा करने की कोशिश कर रहा है वहीं म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल आदि में विवादास्पद क्षेत्रों में घुस रहा है। ये व्यापार संवर्धन के नाम पर गरीब देशों को ऊंची दरों पर ़ऋण दे रहा है और जब ये देश ऋण चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं तो उनकी जमीनों पर मनमानी शर्तों पर कब्जा कर रहा है। कुल जमा ये कि चीन अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर आर्थिक उपनिवेशवाद को नए सिरे से बढ़ावा दे रहा है।

मोटे तौर पर क्वाड का लक्ष्य तो स्पष्ट है, पर इसकी बारीकियों का सामने आना अभी बाकी है। काफी समय तक तो क्वाड सिर्फ राजनयिक बातचीत और जुमलेबाजी तक सीमित रहा। इसे चीन का प्रभाव ही कहा जाएगा कि भारत जैसे देश इसकी आवश्यकता को महसूस करते हुए भी इससे जुड़ने से बचते रहे। इस वर्ष फिलीपींस में ईस्ट एशिया समिट के दौरान 12 नवंबर को चारों देश जापान की अध्यक्षता में इस विषय पर विचार करने बैठे। इसके बाद चारों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए लेकिन किसी ने भी अपने बयान में चीन का उल्लेख नहीं किया। बयानों से पता लगा कि बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कानून सम्मत व्यवस्था, कनेक्टीविटी (संयोजकता), समुद्री सुरक्षा, नाॅर्थ कोरिया और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन अलग-अलग बयानों से साफ है कि चारों देशों को एक साझी कार्यसूची पर पहुंचना अभी बाकी है। बहरहाल भारत ने स्पष्ट किया कि वो अपनी एक्ट ईस्ट पाॅलिसी को भारतीय-प्रशांत क्षेत्र मंे अपनी नीति का मूल आधार बनाना चाहता है। भारत चाहता है कि इस क्षेत्र में आसियान देशों की केंद्रीय भूमिका बनी रहे। यहां दो बातें बताना चाहेंगे। एक – जब फिलीपींस में क्वाड पर बातचीत हो रही थी तब चारों देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी वहां मौजूद थे। दो – भारत ने 26 जनवरी की परेड में आसियान देशों के प्रमुखों को निमंत्रित किया है और उन्होंने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है।

यदि चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए क्वाड बन गया तो इसका स्वरूप क्या होगा, इसका अधिकार क्षेत्र क्या होगा, जापान से अफ्रीका और अमेरिका तक विभिन्न देश इससे कैसे जुड़ेंगे, ये चीन के आर्थिक उपनिवेशवाद का कैसे जवाब देगा, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर मंथन जारी है। ध्यान रहे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस वर्ष सितंबर में भारत आए थे। उनकी यात्रा के दौरान भारत और जापान ने जो संयुक्त घोषणापत्र जारी किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि दोनों देश भारतीय-प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और उदार बनाने के लिए एक ऐसी मूल्य आधारित साझेदारी के प्रति समर्पित हैं जिसमें संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान किया जाता हो, विवादों को बातचीत से सुलझाया जाता हो, जहां छोटे और बड़े सभी देशों को बेरोकटोक समुद्री और हवाई यात्रा की छूट हो और वे टिकाऊ विकास और निद्र्वंंद्व, खुले, निष्पक्ष व्यापार और निवेश व्यवस्था का लाभ उठा सकें। भारत-जापान संयुक्त घोषणापत्र में जापान और अफ्रीका के बीच व्यापार मार्ग ढूंढने के प्रयासों का भी स्वागत किया गया।

ध्यान रहे कुछ दिनों बाद यानी 12 नवंबर को भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया त्रिपक्षीय समूह की बैठक भी हो रही है। इस समूह की पिछली तीन बैठकों में संयुक्त समुद्र व्यापार परियोजनाओं, सहयोग, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि पर बातचीत हुई। आगामी बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा वातावरण की समीक्षा तो होगी ही, साथ ही नाॅर्थ कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के मद्दे नजर परमाणु विस्तार, समुद्र के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद और इस क्षेत्र में समुद्री सीमा विवाद आदि पर भी चर्चा होगी।

भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया की वार्ता से ठीक एक दिन पहले रिक (रूस, इंडिया, चीन) की मंत्री स्तरीय बैठक भी होगी। यह बैठक इस वर्ष के आरंभ में ही होनी थी, लेकिन दलाई लामा के अरूणाचल यात्रा के विरोध में चीन ने इसे टाल दिया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की दोनों बैठकों पर निगाह रहेगी। नई परिस्थितियों में भारत को भी संतुलन बनाकर चलना होगा। भारत का चीन के साथ लगभग सौ अरब डाॅलर का व्यापार है, पर ये भी हकीकत है कि पड़ोसी और विशाल बाजार होने के नाते चीन से सबसे ज्यादा खतरा भी भारत को ही है। भारत ने चाइना-पाकिस्तान काॅरीडोर के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर आपत्ति जताई है। आगामी रिक बैठक को देखते हुए चीन ने कहा है कि यदि भारत इसमें शामिल होता है तो वो इसका नाम बदल सकता है। भारत को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है क्योंकि चीन नाम बदलने के लिए भले तैयार दिखता हो, पर पाक अधिकृत कश्मीर से हटने के लिए नहीं।

जवाहरलाल नेहरू ने ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए गुटनिरपेक्षता की अवधारणा पर चलने का फैसला किया। लेकिन आज टकराव वैचारिक नहीं बल्कि व्यापारिक और सामरिक है। चीन आज अपनी विचारधारा के बल पर नहीं, पैसे के बल पर दुनिया का शोषण करना चाहता है। अच्छी बात है कि ऐसे समय में नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंनेे विदेशनीति को अधिक व्यावहारिक, सुदृढ़, धारदार, निर्णयात्मक और किन्हीं अर्थों में अधिक उदात्त, निर्भीक और स्पष्टवादी तथा पूरी तरह राष्ट्रसापेक्ष बना दिया है। अब विदेशनीति का आधार व्यक्तिगत सनक, राजनीतिक विचारधारा या किसी समुदाय का तुष्टिकरण नहीं बल्कि राष्ट्रहित है। अब विदेशनीति देश के आर्थिक, सामरिक विकास का औजार है। यह औजार है भारत के अंतरराष्ट्रीय अभ्युदय की बुनियाद तैयार करने का। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वो क्वाड्रीलेटरल में अवश्य शामिल हों लेकिन अपनी शर्तों पर।