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“अपने गुनाहों की माफी मांगेगी कांग्रेस?” in Punjab Kesari

अप्रैल 13 को देश ने जलियांवाला बाग कांड की सौवीं बरसी मनाई। इस अवसर पर काफी चर्चा रही कि ब्रिटिश सरकार को भारत से माफी मांगनी चाहिए। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री तेरेसा मे ने इस घटना पर अफसोस जाहिर किया। भारत में उनके उच्चायुक्त डोमिनिक एसक्विथ इस अवसर पर जलियांवाला बाग गए और उन्हांेने इस नरसंहार को ब्रिटिश इतिहास की शर्मनाक घटना बताया।

हम भारत पर ब्रिटिश अत्याचारों पर तो काफी मुखर रहते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं कि वो हमसे माफी मांगे। लेकिन क्या आजादी के बाद भारत पर सबसे लंबे अर्से तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी से हमें ऐसी कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए? क्या लोकतंत्र के नाम पर उसके सब कुकृत्यों पर पर्दा डाल देना चाहिए और उसे माफ कर देना चाहिए। अब आप कहेंगे कि कांग्रेस ने आखिर ऐसा क्या कर दिया जिसकी वजह से उससे ऐसी मांग की जाए। कांग्रेस की जनता, देश विरोधी नापाक करतूतों और घोटालों की सूची बहुत लंबी है। हम यहां कुुछ का ही उल्लेख करेंगे। उसके बाद आप स्वयं तय करें कि कांग्रेस को आप से माफी मांगनी चाहिए या नहीं।

कांग्रेस ने आजादी की कथित लड़ाई के दौरान मुसलमानों का साथ लेने के लिए इस्लामिक सांप्रदायिकता को खतरनाक तरीके से बढ़ावा दिया। इसका सबसे बड़ा सबूत है खिलाफत आंदोलन को समर्थन। ये कुछ ऐसा ही जैसे आज आईएसआईएस को समर्थन देना। कांग्रेस लगातार अखंड भारत की आजादी की बात करती रही और गांधी ने तो ये तक कहा कि बंटवारा मेरी लाश पर होगा। लेकिन अंत में कांग्रेस ने सांप्रदायिक आधार पर बंटवारा स्वीकार कर लिया। गांधी तो पाकिस्तान को उसका बकाया चुकाने के लिए अनशन पर बैठ गए जबकि सरदार पटेल ने उन्हें आगाह भी किया कि पाकिस्तान यही पैसा भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए इस्तेमाल करेगा। आजादी के बाद देश का संविधान बना पर मुसलमानों के पर्सनल लाॅ को हाथ तक नहीं लगाया गया। एक लोकतांत्रिक देश में उन्हें अलग कानून चलाने की अनुमति दे दी गई। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उनकी हिंदू विरोधी भावनाओं और कट्टरवाद को भड़काया गया, ध्रुवीकरण किया गया और मुसलमानों को अलग तंग, बदहाल काॅल्नियों में रहने के लिए मजबूर किया गया। इससे न देश का भला हुआ न मुसलमानों का।

इतना भी होता तो गनीमत होती। जवाहर लाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के मसले को हमेशा-हमेशा के लिए उलझा दिया। वो बिना मंत्रिमंडल की अनुमति के ही इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। वहां इस विषय में जो करार हुए उन पर भी उन्होंने मंत्रिमंडल और संसद से स्वीकृति नहीं ली। धूर्त तरीके से जम्मू-कश्मीर मंे अनुच्छेद 370 लागू कर दिया गया और उसे विशेष राज्य का दर्जा दे दिया गया जबकि इस रियासत की विलय की शर्तें भी वहीं थीं जो दूसरे राज्यों की थीं। यही नहीं, बिना संसद की सहमति के अनुच्छेद 35ए संविधान में घुसेड़ दिया दिया जिसके तहत वहां के नागरिकों को विशेषाधिकार दिए गए। वहां कांग्रेसियों और उनके सहयोगियों ने हालात को कैसे बद से बदतर किया इसका इतिहास लंबा है। हम सीधे आज के हालात पर ही आते हैं। कांग्रेस के सहयोगी फारूक अब्दुल्ला और उनके साहेबजादे उमर अब्दुल्ला भारत के खिलाफ जो जहर उगल रहे हैं क्या उसके लिए उन्हें देशद्रोह के आरोप में फांसी पर नहीं लटकाना चाहिए? क्या उनके बयानांे पर कांग्रेस को शर्म नहीं आती? क्या ऐसे लोगों को बचाने के लिए ही कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देशद्रोह संबंधी कानून को समाप्त करने का वादा किया है?

नेहरू खुद को काला अंग्रेज समझते थे। सरदार पटेल को दरकिनार कर गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री ही इसलिए बनवाया था कि वो उन्हें कांग्रेस में सबसे बड़ा अंग्रेज मानते थे। इतिहास गवाह है कि नेहरू ने इस अंग्रेजियत को पूरा निभाया भी। अंग्रेजों ने भारत पर लाख जुल्म किए पर मजाल है कि नेहरू ने कभी उनके साथ अपने संबंधों पर शर्मिंदगी महसूस की हो। इसके विपरीत नेहरू देश को माक्र्सवाद पढ़ाते रहे और उनके चेले-चपाटे अंग्रेजों की जगह हिटलर को गालियां देते रहे जिसने सपने में भी भारत को नहीं लूटा। असली अंग्रेज की तरह ने नेहरू ने मैकाले की शिक्षापद्धति ही नहीं, अंग्रेजों की नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था को भी जारी रखा। हिंदी और भारतीय भाषाओं को बर्फ में लगा दिया गया। नेहरू ने पहले तो हिंदी को राजभाषा बनाने का पूरा विरोध किया, लेकिन उनके विरोध के बावजूद जब हिंदी राजभाषा बन गई तो नेहरू ने उसे ये कहते हुए 15 साल तक लागू करने से इनकार कर दिया कि वो अविकसित भाषा है। इस पर मशहूर लेखिका महादेवी वर्मा ने उनसे कहा था कि आप हिंदी को 15 साल के लिए फांसी पर लटका रहे हैं। 15 साल बाद जब इसे फांसी से उतारेंगे तो कहेंगे कि ये तो खत्म हो गई। इतिहास गवाह है कि जब 15 साल बाद हिंदी को लागू करने की बात आई तो दक्षिण भारत में इसके विरोध में दंगे भड़काए गए।

नेहरू दुनिया भर में घूम-घूम कर अंग्रेजी में तकरीरें झाड़ कर नोबेल शांति पुरस्कार पाना चाहते थे। इस चक्कर में उन्होंने हमेशा सेना को हिकारत की निगाह से देखा। अपनी मूर्खता का अहसास उन्हें 1962 में चीनी आक्रमण के बाद हुआ, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। आज हमारे देश का बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में है। कांग्रेस ने इसे वापस लेने के लिए क्या उपाय किए ये रहस्य ही हंै। नेहरू ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव ठुकरा दिया और उसे चीन को देने की सिफारिश कर दी। आज चीन इसी के बल पर इतरा रहा है और आतंकी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव को बार-बार वीटो कर रहा है। सरदार पटेल ने तिब्बत के मसले पर नेहरू को आगाह किया था। लेकिन नेहरू चीन के प्रेम में ऐसे अंधे हो गए कि उन्होंने तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे को भी मान्यता दे दी।

आजादी के बाद गांधी कांग्रेस को समाप्त करना चाहते थे। लेकिन ऐसा न हो सका। नेहरू ने तो अपने जीवित रहते ही तब वंशवाद की नींव रख दी जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। इंदिरा के बाद कैसे देश ने वंशवाद का दंश झेला और कैसे इस परिवार की अंधी लूट-खसोट सही, ये किसी से छुपा नहीं है। इनके घोटालों की सूची इतनी लंबी है कि पूरा अखबार भी कम पड़ जाएगा। लेकिन समस्या सिर्फ वंशवाद, भ्रष्टाचार और अंधी लूट-खसोट की ही नहीं है। इस परिवार ने जैसे अपना शासन कायम रखने के लिए देशविरोधी तत्वों को समर्थन और बढ़ावा दिया है, वो खौफनाक है।

कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान तो ये खतरनाक स्तर तक बढ़ गया। कांग्रेस ने इस्लामिक आतंक को सही ठहराने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का नया षडयंत्र रच दिया और निर्दोष लोगों को पकड़ कर इसे साबित करने की कोशिश भी की। मुंबई हमले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साजिश करार दिया गया। समझौता ब्लास्ट मामले में पाकिस्तानियों को छोड़ कर निर्दोष हिंदुओं को गिरफ्तार किया गया। गोधरा में निर्दोष रामभक्तों की रेल बोगी का आग लगाने वाले मुस्लिम आरोपी का फरार करवा दिया गया और गुजरात में दंगे भड़काए गए। अगर आप 2002 के गुजरात दंगों का गहराई से अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि उनमें बड़ी तादाद में कांग्रेसी भी शामिल थे। गुजरात का दंगा तो सिर्फ एक नजीर भर है कांगे्रसी राज में हुए दंगों की सूची इतनी लंबी है कि ये पूरा पृष्ठ भी कम पड़ जाएगा।

ये आज अजीब लगे लेकिन सच है कि यूपीए राज में दुर्दांत नक्सली और कश्मीरी आतंकी नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन करते थे और जब राष्ट्रवादी उनका विरोध करते थे तो उनकी लाठियों से पिटाई की जाती थी। कांग्रेसी राज में नेताओं और परिवार शिरोमणि की तिजोरी तो लगातार भरती रही, लेकिन देश की जनता गरीब से और गरीब होती गई। न तो कांग्रेस का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा काम आया और न ही ‘समाजवादी निजाम’, देश लगातार रसातल में जाता रहा। राजीव गांधी का मशहूर बयान तो आपको याद ही होगा कि हम केंद्र से एक रूपया भेजते हैं, लेकिन गांव में सिर्फ 15 पैसे पहुंचते हैं।

कांग्रेस और इसके परिवार शिरोमणि की असफलताओं की सूची बहुत लंबी है। चाहे बात देश के स्वाभिमान या सुरक्षा की हो, आर्थिक विकास की या सामाजिक समरसता और लैंगिक समानता की, कांग्रेस हर जगह असफल रही है। क्या इसके लिए नेहरू-गांधी परिवार को जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए जिन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्क्ष रूप से देश पर लगभग 60 साल शासन किया है। क्या इस परिवार को अपने षडयंत्रों और करतूतों के लिए देश से माफी नहीं मांगनी चाहिए। अगर हम जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए अंग्रेजों से माफी की अपेक्षा करते हैं तो कांग्रेसी राज में हुए असंख्य दंगों के लिए गांधी परिवार से माफी की उम्मीद क्यों न की जाए? क्यांे न इस परिवार की करतूतों की जांच के लिए कमीशन बनाया जाए और इसे राजनीति से बाहर किया जाए?

“चुनाव घोषणापत्रः कांग्रेस का ‘हाथ’ देशद्रोहियों के साथ” in Punjab Kesari

कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र – 2019 को लेकर काफी हंगामा बरपा है। कांग्रेस का कहना है कि विपक्षी दलों का काम है मीनमेख निकालना सो वो अपना काम कर रहे हैं। असल में घोषणापत्र में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर आपत्ति की जाए। लेकिन क्या कांग्रेस की राय को आंख मूंद कर मान लेना चाहिए? हमारा मानना है कि इसका बारीकी से विश्लेषण होना चाहिए क्योंकि सारे अधोपतन के बावजूद वो अब भी देश की दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है। कांग्रेस ने पिछले पांच साल के दौरान जैसी राजनीति की है, उसके कारण भी उसके घोषणापत्र के विश्लेषण की जरूरत बनती है। तो आइए एक पैनी निगाह डालते हैं कांग्रेस के घोषणापत्र के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर।

चाहे जवाहरलाल नेहरू और अन्य कई विश्वविद्यालयों में देशविरोधी नारे लगाने का मामला हो या भीमाकोरेगांव हिंसा का। पिछले पांच साल में कांग्रेस ने बेझिझक देशविरोधी तत्वों का साथ दिया है। विभिन्न कांग्रेसी नेताओं के नक्सलियों के साथ संबंधों के खुलासे हुए हैं। जिग्नेश मेवानी अब भी कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहा है। यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में अर्बन नक्सलियों का मुकदमा भी लड़ रहे हैं। इसके बावजूद ‘आंतरिक सुरक्षा’ के शीर्षक के तहत घोषणापत्र कहता है – “आंतरिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा 1. आतंकवाद, 2. आतंकवादियों की घुसपैठ, 3. माओवादी नक्सलवाद, 4. जातीय, साम्प्रदायिक संघर्ष से है। कांग्रेस इन सभी खतरों से अलग-अलग तरीके सेनिपटेगी। हम आतंकवाद और आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ कठोरतम उपाय करेंगे। माओवादीनक्सलवाद: माओवाद और नक्सलवाद से निपटने के लिए कांग्रेस दोहरी रणनीति अपनाएगी। हिसंक गतिविधियों को रोकने के लिए जहां एक तरफ कठोर कार्यवाही की जायेगी, वहीं दूसरी तरफ नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य किये जायेंगे, जिससे कि प्रभावित क्षेत्र की जनता के साथ-साथ माओवादी कार्यकर्ताओं का दिल जीत कर उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके।“

ध्यान दीजिए, पार्टी माओवादी आतंकियों को ‘कार्यकर्ता’ बता रही है और उनका दिल जीतने की बात कर रही है। सवाल ये है कि क्या पार्टी का नक्सली आतंकियों के खिलाफ वही रवैया होगा जो उसकी छत्तीसगढ़ सरकार का है या यूपीए सरकार का था? अगर ऐसा हुआ तो देश में नक्सलवाद के विस्तार का खतरा फिर से पैदा हो जाएगा। हम कैसे भूल सकते हैं कि एक तरफ तो मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते थे तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की भरमार थी। हम कैसे भूल सकते हैं कि यूपीए के जमाने में कैसे कुख्यात अरूंधती राॅय और कश्मीरी आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी खुलेआम संवाददाता सम्मेलन करते थे। आज भी नक्सलियों के अनेक संदिग्ध सहयोगीछत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के बड़े पदों पर पहुंच चुके हैं। भीमाकोरेगांव मामले की चार्जशीट में कांग्रेस और नक्सलियों के संबंधों का विस्तार से विवरण दिया गया है। जाहिर है नक्सलियों के प्रति कांग्रेस का ढुलमुल रवैया अनेक चिंताओं को जन्म देता है।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक के अंतर्गत घोषणापत्र कुछ विस्फोटक बातंे करता है। ये कहता है कि भारतीय आपराधिक संहिता की धारा 499 को हटा कर मानहानि को एक दिवानी अपराध बनाया जाएगा। क्या इसका अर्थ ये नहीं कि कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार बिना सबूत प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाए हैं, वो उससे बचने के लिए सुरक्षा कवच तैयार कर रहे हंै। ध्यान रहे उद्योगपति अनिल अंबानी पहले ही राहुल गांधी पर बेसिरपैर के आरोप लगाने के लिए 5,000 करोड़ रूपए का मानहानि का मुकदमा ठोक चुके हैं। यही नहीं संघ को महात्मा गांधी का हत्यारा बताने पर भी उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा चल रहा है। क्या राहुल चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पूरी अराजकता फैल जाए और जिसके मुंह में जो आए वो बके और उसे सजा भी न मिले?

इसी शीर्षक के तहत कांग्रेस आगे कहती है – “भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (जो की देशद्रोह के अपराध को परिभाषित करती है) जिसका कि दुरूपयोग हुआ, और बाद में नए कानून बन जाने से उसकी महत्ता भी समाप्त हो गई है, उसे खत्म किया जाएगा।“ देशद्रोह कानून समाप्त करना क्या देशविरोधियों को खुलीछूट देना नहीं है। हम देख चुके हैं कि कैसे यूपीए सरकार कश्मीरी आतंकियों और नक्सलियों को खुली छूट देती थी। सवाल ये है कि इसे देश तोड़ने की दिशा में पहला कदम क्यों न माना जाए? मजे की बात तो ये है कि जो कांग्रेस पार्टी देशद्रोह कानून समाप्त करने की बात करती है, उसी ने इसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग किया लेकिन वास्तविक देशद्रोहियों के नहीं, बल्कि अपने विरोधियों के खिलाफ। तमिलनाडु में जब नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने जब कुंडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट का विरोध किया तो यूपीए सरकार ने 55,795 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, 23,000 को गिरफ्तार किया और करीब 9,000 के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया। उनपर आरोप था कि वो देश की सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ रहे थे। अन्ना आंदोलन के दौरान कार्टुनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला भी अभी यादों में ताजा है। यूपीए सरकार ने उनके एक कार्टून से चिढ़कर उनपर देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया था।

यूपीए सरकार ने वास्तव में देशद्रोह करने वाले नक्सलियों या कश्मीरी आतंकियों के खिलाफ देशद्रोह का कोई मुकदमा नहीं ठोका। उन्हें तो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया। अपनी पुरानी नीति को कायम रखते हुए कांग्रेस के कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम जैसे बड़े नेता जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाने वालों को बचा रहे हैं और देशद्रोह कानून को ही समाप्त करने की बात कर रहे हैं। जाहिर है भारत में जैसे हालात हैं उनमें जरूरी ये है कि इस कानून का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जाए जो वास्तव में देश तोड़ने की बात करते हैं, न कि सरकार से किसी विषय पर अपनी असहमति जताते हैं।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक में ही पार्टी मानवाधिकारों की बात करती है – “उन कानूनों को संशोधित करेंगे जो बिना सुनवाई के व्यक्ति को गिरफ्तार करते हैं और जेल में डालकर संविधान की आत्मा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों का भी उल्लघंन करते है।“ पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून – 1989 के ऐसे ही प्रावधानों को गलत ठहरा दिया था। यह कानून कांग्रेस के ही एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी लाए थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके प्रावधानों पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर तो कांग्रेस ने काफी हल्ला मचाया। लेकिन आज पार्टी कह रही है कि वो ऐसे कानूनों को समाप्त करेगी जो बिना सुनवाई के लोगों को गिरफ्तार करने की अनुमति देते हैं। क्या कांग्रेस अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून के ऐसे प्रावधानों को समाप्त करेगी? हिंदुओं का मुंह बंद करने के लिए यूपीए सरकार ‘कम्युनल वाॅयलेंस बिल’ लाई थी। इसमें हिंदुओं को भी बिना सुनवाई के गिरफ्तार करने का प्रावधान था। क्या कांग्रेस पार्टी ये वादा कर सकती है कि यदि वो सŸाा में आई तो हिंदुओं के खिलाफ कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगी?

पार्टी घोषणापत्र आगे कहता है – “हिरासत और पूछताछ के दौरान थर्ड-डिग्री तरीकों का उपयोग करने और अत्याचार, क्रूरता या आम पुलिस ज्यादतियों के मामलों को

रोकने के लिए अत्याचार निरोधक कानून बनायेंगे। आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट 1958 को संशोधित किया जाएगा ताकि सुरक्षा बलों के अधिकारों और नागरिकों के मानवाधिकारों में संतुलन बनाया जा सके और जबरदस्ती लोगों को गायब करने, यौन हिंसा और प्रताड़ना के मामलों में सुरक्षा बलों की इम्युनिटी (प्रतिरक्षा) समाप्त की जा सके।“

आफस्पा मामले में कांग्रेसी घोषणाओं का विŸा मंत्री अरूण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कड़ा विरोध किया है। निर्मला सीतारमण कहती हैं कि ये सेना और सुरक्षा बलों के मनोबल को कम करने का षडयंत्र है। अगर कांग्रेसी घोषणाएं लागू कर दी जाएं तो कोई भी आतंकी यौन हिंसा, प्रताड़ना आदि मामलों में सुरक्षा बलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा सकेगा और वो आतंकियों से लड़ने की जगह अदालतों के चक्कर काटते फिरेंगे। वो आगे कहती हैं कि केंद्र और राज्य दोनों आपसी सहमति से ही ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टब्र्ड एरिया’ घोषित कर सकते हैं। अकेले केंद्र सरकार इस विषय में निर्णय नहीं ले सकती।

उधर विŸा मंत्री अरूण जेटली कहते हैं कि ऐसा लगता है कि कांग्रेस का घोषणापत्र किसी नक्सली ने बनाया है। ये कहता है कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और संबंधित कानूनों को संशोधित किया जाए ताकि ये सिद्धांत सुनिश्चित किया जा सके कि ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’। जेटली कहते हैं कि इसके चलते तो किसी भी देशद्रोही से निपटना, उसकी जांच-पड़ताल करना मुश्किल हो जाएगा।

मानवाधिकारों के प्रति कांग्रेस का दुराग्रह कई आशंकाएं पैदा करता है। ये ठीक है कि सुरक्षा बलों या पुलिस को किसी पर अत्याचार करने की छूट नहीं दी सकती, लेकिन क्या ये उनके विवेक पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए कि वो किसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं? क्या तथाकथित ‘अत्याचार विरोधी’ कानून लाना सुरक्षा बलों के हाथ बांधने जैसा नहीं है? क्या इससे दुर्दांत नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों को ही सुरक्षा नहीं मिलेगी? अगर पुलिस के हाथ बंधे होंगे तो वो ऐसे देशद्रोही तत्वों से सच कैसे उगलवाएगी?

वैसे कांग्रेस के घोषणापत्र की ऐसी सोच आश्चर्यचकित नहीं करतीं। पंजाब में आतंक की पृष्ठभूमि में राजीव गांधी ने देश का पहला आतंकविरोधी कानून ‘टैररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट’ (टाडा) बनाया था जिसे कांग्रेस के ही एक अन्य प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 1995 में समाप्त कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने देश में हो रहे आतंकी हमलों को देखते हुए 2001 में एक अन्य आतंकविरोधी कानून प्रिवंेशन आॅफ टैररिज्म एक्ट (पोटा) बनाया, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे निरस्त कर दिया। टाडा और पोटा को निरस्त करते समय कांग्रेस ने बहाना तो मानवाधिकारों का बनाया लेकिन असल मकसद था इस्लामिक और नक्सली आतंकियों का संरक्षण। कथित पुलिस अत्याचारों को रोकने के बहाने क्या अब कांग्रेस पुलिस के रहे-सहे अधिकारों को भी खत्म करने का षडयंत्र तो नहीं कर रही। हम देख चुके हैं कि कैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने अफजल गुरू को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष किया और कैसे राहुल गांधी जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ जा कर खड़े हो गए। वायनाड में पर्चा भरने के दौरान राहुल गांधी ने जैस खुलेआम देश तोड़ने वाली मुस्लिम लीग का समर्थन लिया, क्या वो स्पष्ट नहीं करता कि आखिर कांग्रेस को मानवाधिकारों की इतनी चिंता क्यंू है?

आपातकाल के दौरान प्रेस संेसरशिप लागू करने वाली कांग्रेस ने घोषणापत्र में मीडिया के प्रति भी आपत्तिजनक टिप्पणी की है। यह कहता है – “हाल के दिनों में मीडिया के कुछ हिस्से ने या तो अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया है या आत्मसमपर्ण। आत्मनियंत्रण/ स्वनियंत्रण मीडिया की स्वतंत्रता के दुरूपयोग को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है, कांग्रेस प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया एक्ट-1978 में उल्लेखित स्वनियमन की प्रणाली को मजबूत करने, पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा करने, संपादकीय स्वतंत्रता को बनाये रखने और सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ रक्षा करने का वायदा करती है।“ सवाल ये है कि कांग्रेस को सिर्फ वहीं मीडिया क्यों पसंद है जो सिर्फ उसके गुणगान करे या उसके प्राॅपागैंडा को आगे बढ़ाए? मीडिया पर कांग्रेस की टिप्पणी खतरे की घंटी है। इससे पत्रकारों को सावधान रहना होगा।

कांग्रेस घोषणापत्र महिलाओं के सशक्तीकरण के लंबे-चैड़े वादे करता है और कहता है कि कांग्रेस विवाह के पंजीकरण को आवश्यक बनाने के लिए कानून बनाएगी और बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी। लेकिन ये बड़ी सफाई से मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण तथा तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला जैसे मुद्दों को दरकिनार कर जाता है। क्या कांग्रेस मुस्लिम जोड़ों के लिए भी विवाह पंजीकरण अनिवार्य करेगी। मुसलमानों में पर्सनल लाॅ की आड़ लेकिर छोटी बच्चियों की शादी की जाती है। क्या कांग्रेस उनपर भी बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी?

कांग्रेस ने घोषणापत्र में अपनी महत्वाकांक्षी ‘न्यूनतम आय योजना,’ (न्याय) को काफी जगह दी है। इसका प्रचार भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। पर पार्टी ने ये कहीं नहीं बताया कि इसे लागू करने के लिए तीन लाख करोड़ रूपए कहां से आएंगे? हाल ही में राहुल के सलाहकार सैम पित्रोदा ने कहा कि गरीबों को ‘न्याय’ दिलवाने के लिए मध्य आय वर्ग को बलिदान के लिए तथा अधिक कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। अमेरिका निवासी पित्रोदा के बयान से सोशल मीडिया पर तूफान आ गया है। क्या कांग्रेस अब न्याय के लिए मध्य आय वर्ग की जेब काटेगी जो पहले ही करों के बोझ से दबा हुआ है?

स्थान का आभाव है, वर्ना घोषणापत्र में और भी कई ऐसे विषय हैं जिनपर विस्तार से गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन चलते-चलते एक अहम बात – घोषणापत्र का हिंदी संस्करण बहुत खराब है। उसमें अक्सर समझ ही नहीं आता कि पार्टी कहना क्या चाहती है। लगता है अपने अंग्रेजी संस्कारों के चलते कांग्रेस ने पहले अंग्रेजी का घोषणापत्र बनवाया होगा और फिर उसका हिंदी में अनुवाद करवाया होगा। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सरकार चलाने वाली कांग्रेस को हिंदी के प्रति और सजग तथा संवेदनशील होना पड़ेगा।

“न्याय योजना“ से नहीं पार लगेगी राहुल की नैया in Punjab Kesari

राहुल गांधी द्वारा न्याय योजना (न्यूनतम आय योजना) की घोषणा के बाद कांग्रेसी पालतू मीडिया ओवरड्राइव पर है। वो चारों तरफ ऐसा हाइप बना रहे हैं जैसे अब तो कांग्रेस जीती ही जीती और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने।

न्याय योजना के विषय में जनता के विचार जानने से पहले एक नजर डालते हैं अर्थशास्त्रियों की राय पर। जहां कांग्रेस के पालतू अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि इसे लागू करना संभव है और इसकी लागत देश के सकल घरेलू उत्पाद की करीब दो प्रतिशत होगी। वहीं नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना में झोल ही झोल हैं। ये भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है, ये जनता को आलसी और अनुत्पादक बनने के रास्ते पर ले जाने वाली है। इसे लागू करने के लिए नियम बनाना और इसे निष्पक्ष तरीके से लागू करना लगभग असंभव है।

पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना के मुताबिक देश के पांच करोड़ परिवारों को हर माह छह हजार रूपए दिए जाएंगे और हर परिवार को प्रतिमाह 12,000 रूपए की आमदनी की गारंटी दी जाएगी। वो कहते हैं कि अगर एक परिवार 4,000 कमाता है और दूसरा 8,000 तो क्या सरकार पहले परिवार को 8,000 और दूसरे को 4,000 रूपए देगी? अगर सब परिवारों को 12,000 रूपए प्रतिमाह की आमदनी घर बैठे मिलेगी तो कोई काम ही क्यों करेगा? पनगढ़िया आगे कहते हैं कि ये योजना संबंधित परिवार को हर माह 6,000 रूपए देने की बात करती है, ऐसे में हर माह 6,000 से कम कमाने वाले को 12,000 रूपए प्रतिमाह कैसे दिए जाएंगे?

जाने-माने आर्थिक पत्रकार स्वामीनाथन एस अंकलेश्वर अय्यर इस योजना को ‘घातकरूप से दोषपूर्ण’ बताते हैं। वो कहते हैं भारत में आय आधारित सर्वेक्षण नहीं होते ऐसे में वास्तविक लाभार्थी तय करना लगभग असंभव है। जैसे कांग्रेस की ‘गरीबी हटाओ’ योजना असफल हो गई वैसे ही ये इस योजना का फुस्स होना निश्चित है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस पर करीब 3,60,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे। इतनी महंगी योजना के नाकाम रहने से जो भ्रष्टाचार और नुकसान होगा, वो बेहद खतरनाक होगा।

जाहिर है योजना में किंत- परंतु बहुत हैं। पर एक बड़ा सवाल ये भी है कि राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए करदाताओं के खरबों रूपए क्यंू कर अनुत्पादक योजनाओं में बहाए जाएं? यहां सवाल ये भी उठता है कि आखिर एन चुनावों से पहले ही राहुल ने ये शिगुफा क्यों छेड़ा? इसका जवाब ये है कि कांग्रेस पहले भी ऐसे लोकलुभावन नारों के दम पर चुनाव जीतती रही है। कभी उसने ‘समाजवाद’ का नारा दिया तो कभी ‘गरीबी हटाओ’ का, कभी बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनावी मुद्दा बनाया तो कभी किसानों की कर्ज माफी को।

अर्थशास्त्री अगर आंकड़ों के अनुसार बात करते हैं तो आम जनता अपने अनुभव के आधार पर। जनता से बात करो तो वो कहती है कि अन्य जुमलों की तरह ये भी राहुल गांधी का एक चुनावी जुमला है। वो चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके वादों से सरकार को कितना आर्थिक नुकसान होगा। उन्हें तो सिर्फ सŸाा से मतलब है। कुछ समय पूर्व हुए विधान सभा चुनावों में उन्होंने किसानों की कर्ज माफी का वादा कर दिया। लेकिन ये वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। कर्ज माफी के लिए राज्य सरकारों ने इतनी शर्तें लगा दी हैं कि 99 प्रतिशत किसान तो उन्हें पूरा ही नहीं कर पा रहे। विधानसभा चुनावों के बाद तो राहुल ने पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ करने का ही एलान कर दिया था।

लोग कहते हैं कि कांग्रेस अगर गरीबी हटाने के बारे में वास्तव में इतनी गंभीर है तो उसने अपने 60 साल के प्रत्यक्ष-अप्रत्क्ष शासन में गरीबी क्यों नहीं हटा दी। गरीबों को दान देकर उनकी गरीबी नहीं हटाई जा सकती। आवश्यक है उन्हें सक्षम बनाना, न कि सरकारी दान पर आश्रित बनाना। लोग राहुल को यूपीए के दस साल का शासन याद दिलाते हैं जब देश ने सबसे बड़े घोटाले देखे जिनमें स्वयं वो और उनका समस्त परिवार भी आकंठ डूबा है।

अर्थशास्त्रियों और जनता की राय निःसंदेह महत्पवूर्ण है, लेकिन उतना ही मायने रखता है चुनावी गणित। अब तक जो हालात बन रहे हैं वो राहुल गांधी और कांग्रेस के पूरी तरह खिलाफ हैं। दिल्ली में बैठे पालतू कांग्रेसी पत्रकार भले ही कितनी हवाबाजी कर लें, लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक चुकी है। हालात ये हैं कि राहुल को अमेठी में ही अपनी हार नजर आ रही है और वो अब केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं। अमेठी में राजीव गांधी और सोनिया गांधी के प्रस्तावक रहे हाजी सुल्तान खान के बेटे हाजी हारून रशीद ने ही उनके खिलाफ बगावत कर दी है। रशीद कहते हैं कि राहुल ने अमेठी में लगातार मुसलमानों और उनके विकास की उपेक्षा की है। यहां 6.5 लाख मुसलमान हैं और अबकी बार सब राहुल के खिलाफ वोट देंगे। स्मृति ईरानी तो राहुल को हराने के लिए जी जान से कोशिश कर ही रहीं हैं।

आखिर राहुल को वायनाड सीट ही क्यों भा रही है? वहां ईसाई और मुस्लिम जनसंख्या बहुमत में है। राहुल को लगता है कि यदि अमेठी की जनता उन्हेें नकार देती है तो वायनाड के ईसाई और मुस्लिम उनकी इज्जत अवश्य बचा लेंगे। दसियों मंदिरों के लगातार दर्शन करने के बावजूद राहुल गांधी का हिंदुओं के प्रति ये अविश्वास बड़े सवाल खड़े करता है। ये कांग्रेस के सांप्रदायिक राजनीतिक दर्शन को भी रेखांकित करता है। यहां आपको बताते चलें कि वायनाड सीट पर राहुल इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) से भी समर्थन लेने के लिए तैयार हैं जिसे कई राज्यों में प्रतिबंधित किया जा चुका है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार पीएफआई और कुछ नहीं, आतंकी संगठन सिमी का ही नया नाम है जिसे स्वयं यूपीए सरकार ने प्रतिबंधित किया था। वायनाड के चर्चों ने भी राहुल की ईसाई पृष्ठभूमि के कारण उन्हें पूरा समर्थन देने का एलान किया है।

पिछले पांच साल के दौरान राहुल ने दलितों, मुस्लिमों, ईसाईयों, जनजातियों का संयुक्त वोट बैंक बनाने की हरसू कोशिश की और इस चक्कर में देशद्रोही नक्सलियों और टुकड़े-टुकड़े गैंग तक को समर्थन दिया। लेकिन आज न तो मुस्लिम उनके साथ हैं और न ही दलित। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन मुस्लिम-दलित वोटों पर दावा ठोक रहा है तो बिहार में राष्ट्रीय जनता दल। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी खुद को मुसलमानों को खैरख्वाह मानती हैं और किसी भी कीमत पर कांग्रेस से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने तो 50 साल के राहुल को ‘बच्चा’ तक बता दिया है। यही हाल अन्य राज्यों में भी है। दलित वोटों के आस में राहुल ने बाबा साहब भीम राव अंबेदकर के पौत्र प्रकाश अंबेदकर से भी पींगें बढ़ाईं थीं, लेकिन वहां भी उनकी दाल नहीं गली। सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों में मनमुटाव हो गया। राहुल को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा के साथ गठबंधन हो जाएगा जिसका लाभ उन्हें दूसरे राज्यों में भी मिलेगा। बसपा के वोटर उन्हें वोट देंगे। लेकिन मायावती ने उनका पत्ता ही काट दिया। वो तो अब अमेठी और रायबरेली में भी अपना उम्मीदवार उतारने की धमकी दे रहीं हैं। जाहिर है चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने से पहले विपक्षी एकता के बड़े-बड़े दावे हवा हो गए हैं। पहले जहां राहुल प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे, वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अब उन्हें उनकी औकात बता दी है। हार थक कर राहुल ने तुरूप के पŸो के तौर पर अपनी बहन प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारा है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका भी कोई असर नजर नहीं आ रहा। अब तक कांग्रेसियों को लगता था कि प्रियंका के आने से उनके सब दुख दूर हो जाएंगे, इस बार उनका ये मुगालता भी दूर हो जाएगा।

न्याय योजना के तौर पर राहुल ने अपना ब्रह्मास्त्र चल दिया है। लेकिन हालात बता रहे हैं कि इसका फुस्स होना तय है। आज चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों और डिजीटल मीडिया का जमाना है। पब्लिक नेताओं की एक-एक हरकत पर निगाह रखती है। वो सिर्फ जुमलों से संतुष्ट नहीं होती। उसे जमीनी स्तर पर विकास चाहिए। सड़कें, बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार चाहिए। उसे एक ऐसा नेता चाहिए जो देश की छवि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमका सके और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे न कि उनके साथ अंडरहैंड डीलिंग करे। जाहिर है मोदी ने अपनी उपलब्धियों से चुनावों का रूपरंग बदल दिया है, लोगों की अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं। राहुल के लिए उनका मुकाबला करना नामुमकिन है।

हाशिमपुरा नरसंहार और कांग्रेसी ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ in Punjab Kesari

करीब 31 साल बाद 31 अक्तूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाशिमपुरा नरसंहार मामले में 16 पीएसी जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इससे पहले निचली अदालत ने इन्हें बरी कर दिया था। क्रूरता की पराकाष्ठा माने जाने वाले इस कांड में 42 मुस्लिम मारे गए थे। एक साक्ष्य के अनुसार मेरठ दंगों के समय पीएसी ने हाशिमपुरा से एक ट्रक में 40 – 45 लोगों को अगवा किया गया था और इनमें से 42 को गोलियां मारकर मुरादनगर गंगनहर में फेंक दिया गया था।

इस मामले का लगभग हर विवरण अखबारों में छप चुका है। लेकिन जो बात नहीं छपी वो ये कि जब ये कांड हुआ तब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और खुद को स्वतंत्रता सेनानी बताने वाले वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे। आश्चर्य की बात है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को पानी पी पी कर दिन रात कोसने वाली कांग्रेस हाशिमपुरा पर खामोश रही। न तो सोनिया गांधी और न ही राहुल गांधी ने इसके लिए देर से ही सही, माफी मांगी और न ही अफसोस जताया। अखलाक की मौत पर टसुए बहाने वाली मोमबत्ती ब्रिगेड भी नदारद रही। लगता है जैसे सबको सांप सूंघ गया।

दंगों के प्रति कांग्रेस, उसकी मोमबत्ती ब्रिगेड और ‘असहिष्णुता गैंग’ का नजरिया हमेशा से दोगला रहा है। जहां कांग्रेसी या उनके सहयोगी फंसते नजर आते हैं, वहां ये मुंह फेर लेते हैं और मुंह में सोंठ डाल कर बैठ जाते हैं, लेकिन मोदी सरकार को ये उन घटनाओं के लिए भी बदनाम करते हैं और घेरने के लिए तैयार हो जाते हैं, जहां उसका दोष तक नहीं होता। इस गैंग ने भारत में मुसलमानों की माॅब लिंचिंग के चुनींदा मामलों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत जोर-शोर से उछाला और इसका आरोप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी सरकार पर लगाया हालांकि ये एक भी मामले में इनका हाथ साबित नहीं कर पाए। वैसे भी ये कानून-व्यवस्था के मामले हैं जो केंद्र सरकार नहीं, राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

ये संयोग ही था कि जिस दिन हाशिमपुरा मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया, ठीक उसी दिन इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी थी। ये दिन भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जन्मजयंती का भी था। इस दिन एक ओर तो प्रधानमंत्री मोदी सरदार पटेल की मूर्ति का लोकार्पण कर रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस इंदिरा गांधी को शहीद बताते हुए उन्हें याद न करने के लिए मोदी को कोस रही थी। इंदिरा को शहीद मानना य न मानना, कांग्रेस की अपनी मर्जी है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो सीमा पर लड़ते हुए शहीद हुईं थीं? नहीं। असल में वो अपने ही बुने हुए उस राजनीतिक जाल में फंस गईं थीं जो उन्होंने पंजाब में अकालियों को घेरने के लिए बुना था। उन्होंने अपनी विभाजनकारी राजनीति की कीमत चुकाई थी। उन्होंने ऐसा ही खेल श्रीलंका में भी खेला था जिसका खामीयाजा अंत में उनके पुत्र राजीव गांधी को जान दे कर चुकाना पड़ा। वैसे कांग्रेसियों से ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि यदि इंदिरा ‘शहीद’ थीं तो उन हजारों सिखों का क्या जो उनकी हत्या के बाद फैले दंगों में मारे गए और जिनके परिजनों को आज तक न्याय नसीब नहीं हुआ।

खुद को ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ और ‘भारत की बहुलता’ का संरक्षक बताने वाली कांग्रेस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को ‘अल्पसंख्यक विरोधी’, ‘विभाजनकारी’ और ‘सांप्रदायिक’ आदि बताती है, लेकिन कभी अगर उसने आइना देखा होता या अपने गिरेबान में झांक कर देखा होता तो उसे अपनी असलियत बखूबी पता होती। आज वो ‘अल्पसंख्यकों के संरक्षण’ के नाम पर पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी संगठन से सहयोग कर रही है और ‘देश की बहुलता’ के नाम पर राष्ट्रविरोधी नक्सलियों से हाथ मिला रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राज बब्बर तो नक्सली आतंकियों को क्रांतिकारी और उनके खूनी खेल को ‘हक की लड़ाई’ बताते हैं। वहीं उसके एक अन्य नेता अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में दुर्दांत नक्सलियों का मुकदमा लड़ रहे हैं।

वैसे इस्लामिक आतंकियों को तुष्ट करने की कांग्रेसी नीति भी आश्चर्यजनक नहीं है। आजादी के बाद जब सरदार पटेल ने भारत में रह गए मुसलमानों से भारत के प्रति वफादार होने की बात कही तो जवाहरलाल नेहरू ने उनकी शिकायत महात्मा गांधी से कर दी। नेहरू नहीं चाहते थे कि किसी मुसलमान से भारत के प्रति वफादार होने की उम्मीद की जाए। आगे चलकर हम देखते हैं कि कांग्रेस ने न तो मुस्लिम पर्सनल लाॅ को ही हाथ लगाया और न ही कभी उनसे ये उम्मीद की या उन्हें कहा कि वो भारत और इसके संविधान के प्रति आस्था रखें। क्या ‘उदारवाद’ और ‘बहुलता का सम्मान‘ करने का अर्थ ये होना चाहिए कि मुसलमानों से देश और उसके संविधान के प्रति निष्ठा की अपेक्षा भी न की जाए और उनमें पनप रहे अतिवादी और आतंकवादी तत्वों को नजरअंदाज किया जाए? इसे अंधा तुष्टिकरण न कहा जाए तो और क्या कहा जाए?

एक परिवार के आसरे पलने वाली कांग्रेस को आजकल बड़ी परेशानी है कि भाजपा सरदार पटेल को क्यों बढ़ावा दे रही है। क्या उसे ये याद दिलाना होगा कि सरदार ने भारत को एकजुट किया जबकि नेहरू ने सत्ता की हवस में देश के विभाजन को बढ़ावा दिया। यही नहीं उन्होंने देश को कश्मीर की समस्या दी। हाथ में आई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट चीन को भेंट कर दी और तिब्बत पर चीन का वर्चस्व खुशी-खुशी स्वीकार किया। नेहरू एक तरफ तो खुद को जनवादी वामपंथी बताते थे तो दूसरी तरफ उन्होंने देश पर अंग्रेजी थोप दी जिसे एक प्रतिशत लोग भी नहीं समझते थे। नेहरू के वामपंथी रूझानों ने देश के विकास को इस मूर्खतापूर्ण विचारधारा का बंधक बना दिया और निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों को खलनायक जिसने अंततः उद्यमिता को ही कुंठित किया। सेना के प्रति नेहरू की नफरत की कीमत भी भारत ने 1962 में चुकाई जब चीन ने देश के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया।

कांग्रेस ने लंबे अर्से तक देश में शासन किया और बच्चों को वहीं इतिहास पढ़ाया जिसमें नेहरू और उसके वंशजों को महिमामंडित किया गया। लेकिन आज के वाई-फाई युग के युवा और बच्चे उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वो पूछते हैं कि इस्लामिक आतंकियो और नक्सलियों से सहयोग करने वाले राहुल गांधी ‘राष्ट्रवादी’ कैसे और क्यों हो सकते हैं? वो जानना चाहते हैं कि अपनी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सोनिया गांधी ने नक्सलियोें को क्यों जगह दी? वो पूछते हैं कि अगर नेहरू धर्मनिरपेक्ष थे तो उन्होंने धर्म के आधार पर बंटवारा क्यों स्वीकार कर लिया?

वो जब इंटरनेट पर भारत में दंगों का इतिहास खंगालते हैं तो पता लगता है कि सबसे बड़ी विभानकारी दंगा पार्टी तो कांग्रेस ही है। अगर नेहरू सत्ता की भूख पर काबू रखते तो शायद विभाजन टल सकता था और साथ ही टल सकती थी मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी जिसमें बीस लाख लोग मारे गए और करोड़ों विस्थापित हुए। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता संभाली और साथ ही दंगों की सरपरस्ती भी।

कांग्रेस के शासन में हुए कुछ दंगों की बानगी देखिए – रांची दंगे (वर्ष – 1967, मृतक – 184), गुजरात दंगे (वर्ष – 1969, मृतक – 512), मुरादाबाद दंगे (वर्ष – 1980, मृतक – 400), नेल्ली, असम दंगे (वर्ष – 1983, मृतक – 2191, गैरसरकारी अनुमान – 10,000), भिवंडी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 278), सिख विरोधी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 2,800, गैरसरकारी अनुमान – 5,000), अहमदाबाद दंगे (वर्ष – 1985, मृतक – 275), मेरठ दंगे (वर्ष – 1987, मृतक – 346), भागलपुर दंगे (वर्ष – 1977, मृतक – 1,000)। ये तो सिर्फ बानगी है, केंद्र और विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों की सूची बहुत लंबी और वीभत्स है। अगर हम हरेक दंगे के कारणों का विश्लेषण करने बैठें तो आपको ऐसी-ऐसी बातें पता चलेंगी की आपको देश की इस सबसे पुरानी दंगा पार्टी से नफरत हो जाएगी और आप आगे से इसे वोट देने से पहले कई मर्तबा सोचेंगे।

हाशिमपुरा दंगों पर आए फैसले के बहाने हमने कांग्रेस की सोच और उसके शासनकाल में हुए दंगों पर एक नजर डाली। अब आप ही सोचिए कि जब दंगे हुए होंगे तो हर धर्म के लोग मारे गए होंगे। इन दंगों को हवा देने वाली पार्टी न तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ हो सकती है और न ही ‘राष्ट्रवादी’, उसका तो सिर्फ एक ही लक्ष्य है – भले ही भारतीयों की लाशें बिछानी पड़ें पर सत्ता मिलनी चाहिए। इसलिए हम इसे सिर्फ ‘सत्तावादी’ पार्टी कहेंगे।

“हिंदुओं को ‘आतंकवादियों’ के रूप में बदनाम करने की साजिश से धीरे धीरे हट रहा है पर्दा” in Punjab Kesari

हाल ही में गुजरात से आईएस के दो आतंकी – मौहम्मद कासिम स्टिंबरवाला और ओबेद अहमद मिरजा गिरफ्तार किए गए। पता लगा कि मौहम्मद कासिम कुछ दिन पहले तक अंकलेश्वर के एक अस्पताल में काम करता था जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के निकट सहयोगियों का है। पटेल कुछ समय पहले तक इस अस्पताल की प्रबंध समिति में भी थे। इस मामले पर जब हंगामा मचा और भारतीय जनता पार्टी ने पटेल को घेरा तो कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति बता कर टरकाने की कोशिश की। पर वास्तव में क्या ये मामला इतना हलका है? क्या इससे पटेल का कोई लेना-देना नहीं है? जांच जारी है। असलियत क्या है, इस आतंकी को पटेल से जुड़े अस्पताल में किसने नौकरी दी, ठीक चुनाव से पहले इसने नौकरी क्यों छोड़ी, कौन कौन से धार्मिक स्थल इसके और इसके सहयोगी के निशाने पर थे, ये जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।

गुजरात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने लंबे अर्से तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति की है। यही नहीं इस्लामिक आतंकियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का भी कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसे देखते हुए भाजपा का इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जायज बनता है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार ने बहुत ही सोचे समझे तरीके से हिंदुओं को आतंकवादियों के रूप में बदनाम करने की साजिश की, इसे कोई कैसे भूल सकता है। इस षडयंत्र की परतें भी अब धीरे धीरे खुलती जा रही हैं और साथ ही इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं कि इसमें कौन कौन शामिल थे। अब ये भी समझ में आने लगा है कि इस दुष्प्रचार का कारण सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक ही नहीं था, इसके पीछे संभवतः कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की मजबूरियां भी थीं। संकेत ये भी मिल रहे हैं कि ये मामला सिर्फ हिंदूवादी नेताओं को फंसाने का ही नहीं था, ये किसी बाहरी ताकत के इशारे पर इस्लामिक आतंकवाद के बरक्स ‘हिंदू आतंकवाद’ का नेरेटिव खड़ा करने का भी था। बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पूरी साजिश सोनिया और उनके सलाहकार अहमद पटेल की सहमति और शिरकत के बिना संभव थी?

इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बात सुधाकर चतुर्वेदी की। 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में नौ साल सलाखों के पीछे रहने के बाद वो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं। वो बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया। उन्हें देवलाली (नाशिक) में उनके घर से जबरदस्ती उठाया गया और मुंबई ले जाया गया। मुंबई में उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर दिया गया। एटीएस अफसरों ने उनके घर की चाबी छीन कर उनके घर में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स रखा। उन्हें अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया, प्रताड़ित किया गया, फंसाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए, उनके पास से पिस्तौल की बरामदगी दिखाई गई और फिर माटुंगा पुलिस स्टेशन में फर्जी मामला दर्ज करवाया गया जिसमें कहा गया कि उन्हें हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया।
चतुर्वेदी के खिलाफ कितने फर्जी पर मजबूत मामले बनाए गए और साजिश कितनी गहरी थी, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें जमानत मिलने में ही नौ साल लग गए। ध्यान रहे इसी मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई और लोगों को भी फंसाया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कर्नल पुरोहित की पत्नी को तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

सुधाकर चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्हें और अन्य लोगों को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया कि महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करना चाहती थी। हिरासत के दौरान एटीएस वाले उनसे लगातार योगी आदित्यनाथ, हिंदू युवा वाहिनी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के बारे में पूछताछ कर रहे थे। सुधाकर कहते हैं कि वो मुझसे जिस तरह सवाल कर रहे थे, उससे साफ था कि अनेक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता उनके निशाने पर थे और वो किसी भी हालत में उन्हें फंसाना चाहते थे।

ध्यान रहे तब केंद्र में पी चिदंबरम और महाराष्ट्र में आर आर पाटिल गृहमंत्री थे। मालेगांव मामले में हिंदुओं का पकड़ने और उनके खिलाफ षडयंत्र रचने वाले हेमंत करकरे को 2008 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (कांग्रेस) और आरआर पाटिल (एनसीपी) ने ही एटीएस प्रमुख बनाया था।

‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली का सबसे पहले प्रयोग एक वामपंथी पत्रिका ने 2002 में किया। ध्यान रहे 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। कांग्रेसियों ने इनके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को तो बहुत बदनाम किया पर गोधरा कांड को भुला दिया जिसके कारण दंगे शुरू हुए। गोधरा में मुस्लिम षडयंत्रकारियों ने बहुत सोचे समझे तरीके से अयोध्या से आ रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाई जिसमें 59 लोग जिंदा जल गए। इसकी जांच से पता चला कि इसके मास्टरमाइंड कराची में बैठे थे और इसे कश्मीरी आतंकवादियों की मदद से अंजाम दिया गया। गुजरात दंगों में पाकिस्तानी हाथ को कांग्रेस ने बहुत आसानी से अनदेखा कर दिया।

गुजरात में ही एक अन्य घटना में 2004 में इशरत जहां अपने तीन सहयोगियों (दो पाकिस्तानी – जीशान जौहर और अमजद अली अकबर अली राणा तथा एक भारतीय जावेद शेख) के साथ मारी गई। केंद्र सरकार की सूचना के बाद उनका एनकाउंटर हुआ। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसे भी हिंदू नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम अबला इश्रत की हत्या का मामला बना दिया। जबकि बाद में सीआईए और आईएसआई के डबल एजेंट जेम्स हेडली ने खुलासा किया कि वो लश्कर ए तौएबा की सदस्य थी। उसकी हत्या के बाद खुद लश्कर ने उसे अपनी वेबसाइट में शहीद बताया था। कांग्रेसियों ने इशरत की बात तो बहुत उछाली पर उन पाकिस्तानियों को भूल गए जो उसके साथ मारे गए।

इन घटनाओं के सहारे कांग्रेसियों ने मोदी को ‘हिंदू खलनायक’ के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी बदनाम किया। उनके खिलाफ अमेरिका में ऐसी लाॅबिंग की गई कि उन्हें वीसा दिए जाने पर ही रोक लग गई।

‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली पहली बार भले ही 2002 में प्रयोग की गई, लेकिन इसे प्रचारित किया यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जिन्होंने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के संदर्भ में अगस्त 2010 में हिंदु या भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला। इस पर काफी बवाल मचा जिसके बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके बाद 2013 में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कैंपों में ‘हिंदू आतंकवाद’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां आपको विकीलीक्स के उस खुलासे की भी याद दिला दें जिसमें राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा देसी हिंदू आतंकवाद से है। रोमर जुलाई 2009 से अप्रैल 2011 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे।

राहुल, चिदंबरम और शिंदे कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में से हैं। यूपीए शासन में इनके शब्द पत्थर की लकीर समझे जाते थे। जाहिर है सरकारी महकमे और कांग्रेस नीत राज्य सरकारें इनकी सोच के हिसाब से ही काम करते थे और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश करते थे। क्या ये लोग सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सहमति के बिना ‘हिंदू विरोधी’ राजनीति कर सकते थे? क्या इनकी सहमति के बिना विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए इस्लामिक संदिग्धों को छोड़ा जा सकता था? मालेगांव में 2008 से पहले सितंबर 2006 में भी धमाके हुए। एटीएस ने पहले तो इन धमाकों के लिए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के नौ लोगों को गिरफ्तार किया पर 2013 में चार्जशीट दाखिल करते समय हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया।
इसके बाद 29 सितंबर 2008 को गुजरात के मोडासा और महाराष्ट्र के मालेगांव में एक साथ धमाके हुए। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सितंबर धमाकों से पहले इसी वर्ष जयपुर, बेंगलूरू, फरीदाबाद और अहमदाबाद में भी धमाके हुए। तत्कालीन सरकार ने बाकी के धमाकों की जांच को तो दरकिनार कर दिया पर मालेगांव धमाकों के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण सिंह कलसांगरा, और भंवरलाल साहू आदि को गिरफ्तार किया और इसे जोर शोर से ‘हिंदू आतंकवादी’ घटना के रूप में प्रचारित किया गया। सुधाकर चतुर्वेदी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।

इस से पहले फरवरी 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाके हुए। एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने इसके लिए पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर ए तौएबा के सदस्य आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराया और उसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी भी घोषित किया। धमाकों के बाद एक संदिग्ध पाकिस्तानी को गिरफ्तार भी किया गया परंतु उसे 14 दिन के भीतर उसे छोड़ दिया गया। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए एक बार फिर इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ कर अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहराया और कर्नल पुरोहित का नाम भी उछाला गया जबकि चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं था।
जांच एजेंसियों ने इस मामले में सिमी नेता सफदर नागौरी, कमरूद्दीन नागौरी और आमिल परवेज पर नारको टेस्ट भी किए। इसमें एक शख्स अब्दुल रज्जाक का हाथ होने की बात सामने आई और ये भी साफ हुआ कि उसने इस विषय में सफदर नागौरी को बताया भी था। लेकिन सिमी और उनके पाकिस्तानी हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की जगह कांगे्रस सरकार ने अपने ही देश के लोगों को ही इसके लिए बदनाम किया।

बात अगर इन धमाकों तक ही रह जाती तब भी गनीमत थी। राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने तो नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के लिए भी आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। एक पत्रकार अजीज बर्नी ने ‘26/11 – आरएसएस की साजिश’ नाम से किताब तक लिख डाली जिसका 6 दिसंबर 2010 को खुद दिग्विजय सिंह ने विमोचन किया। इस अवसर पर अन्य इस्लामिक कट्टरवादियों के साथ फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी मौजूद थे। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमले से दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन करके कहा कि उन्हें मालेगांव मामले में जांच से खफा ‘हिंदू अतिवादियों’ से जान का खतरा है। ज्ञात हो कि इस हमले में करकरे मारा गया था। ये बात अलग है कि बाद में करकरे की पत्नी ने कहा कि दिग्विजय उसके पति की लाश पर राजनीति कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि मुंबई हमले सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से हुए। सभी हमलावरों ने हिंदू नामों के पहचान पत्र लिए हुए थे और मौली पहनी हुई थी। अगर कसाब जिंदा न पकड़ा जाता तो बड़ी आसानी से इसके लिए ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। बहरहाल ये वहीं दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी भी सम्मानीय नजर आते हैं। ये ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहते हैं।

देश में अनेक आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सिमी पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन ये अब भी दक्षिण भारतीय राज्यों में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के नाम से चल रही है। इस पर भारतीय मुस्लिम युवकों का बे्रनवाश कर आईएस भेजने के आरोप हैं। पर कांग्रेस इस मसले में चुप है। पीएफआई पर हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप है लेकिन कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ऐसे मामलों में अदालत में पीएफआई की वकालत कर रहे हैं। धर्म के नाम पर घृणा फैलाने वाले जाकिर नायक को भी कांग्रेस सरकार ने पूरा बढ़ावा दिया जबकि अनेक देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो उसे शांतिदूत करार दिया और उसकी हर तरह से मदद की। हाल हीे में एनआईए ने जाकिर नायक के खिलाफ चार्जशीट दायर की जिसमें उसके सारे आतंकी संपर्कों का कच्चा चिट्ठा दिया गया है। जब सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है तो उसे समर्थन और बढ़ावा देने वाले नेताओं को क्यों बख्शा जा रहा है?

कश्मीर से केरल तक पाकिस्तानी आतंकियों और इस्टैबलिशमेंट के प्रति कांग्रेस की नरमी की यूं तो अनेक कहानियां हैं। लेकिन हाल ही में इस संबंध में कुछ और तथ्य सामने आए हैं जो वास्तव में सनसनीखेज हैं। एक न्यूज चैनल ने अपने खुलासे में बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने बदनाम पाकिस्तानी बैंक – बैंक आॅफ क्रेडिट एंड काॅमर्स इंटरनेशनल (बीसीसीआई) के जरिए बोफोर्स सौदे के घूस की रकम को ठिकाने लगाया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में जब इस बैंक की मुंबई ब्रांच को ताला लगाया गया तो इसके प्रमुख ने घूस देकर इसे फिर खुलवा लिया। देश-विेदेश में बदनामी के बाद इसे 1991 में बंद कर दिया गया। यहां समझने की बात ये है कि एक तरफ तो भारत और पाकिस्तान की कथित दुश्मनी थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रमुख नेता इस बैंक के जरिए घूस के पैसे को ठिकाने लगा रहे थे। क्या ये संवेदनशील जानकारियां इस बैंक के अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं दी हांगी?
एक अन्य मामला हवाला व्यापारी मोइन कुरैशी का है। इसके पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते अनेक पाकिस्तानियों से हैं। भारत में ये प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की नाक का बाल समझा जाता है। यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों में इसका दबदबा चलता था। ये मोटी रकम की एवज में मामले ‘रफा-दफा’ कराने का काम भी करता था। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि कुरैशी देश की महत्वपूर्ण जानकारियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं देता होगा?

मामला चाहे आतंकवादी गतिविधियों का हो या मुस्लिम तुष्टिकरण का या संवेदनशील आर्थिक जानकारियों का, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस की गतिविधियों में पाकिस्तान का हाथ दिखाई देता है। ऐसे में बहुत संभव है भारत में हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में बदनाम करने के पीछे भी पड़ोसी देश की कोई सोची समझी रणनीति हो जिसे कांग्रेस चाहे-अनचाहे अंजाम दे रही हो। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पी चिदंबरम पर कश्मीर मामले में पाकिस्तानी जुबान बोलने का आरोप लगाया। कोई तो कारण होगा जो उन्होंने इतना गंभीर आरोप लगाया। बहरहाल बहुत से मामले अभी अदालत में हैं और बहुत से फाइलों में दबे हैं। माले गांव से लेकर मोइन कुरैशी तक के उदाहरण बताते हैं कि जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। लेकिन हम सत्य का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं। आप भी स्वतंत्र हैं इस विषय में अपनी राय बनाने के लिए।