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‘चुनाव परिणाम और राहुल के ‘बाहुबलित्व’ का सच’ In Punjab Kesari

जब से बाहुबली फिल्म हिट हुई है, लोग हर जगह बिना सोचे समझे बाहुबली शब्द का प्रयोग करने लगे हैं। यू ट्यूब पर एक न्यूज चैनल खुद को ‘खबरों का बाहुबली’ बताने लगा है तो कोई तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘राजनीति का बाहुबली’ बताने लगा है। पहले बाहुबली शब्द का इस्तेमाल उन नेताओं के लिए किया जाता था जो बाहुबल और धनबल के बूते जनता को धमका कर चुनाव जीतने का माद्दा रखते थे। वैसे राहुल गांधी ने ये तो दिखा दिया है कि वो नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों जैसी देशद्रोही ताकतों से सांठगांठ कर तथा जातिवाद और संप्रदायवाद को हवा देकर येन केन प्रकारेण चुनाव जीतने में तो ‘बाहुबली’ हो ही गए हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों और राफेल के बारे में जैसे मिथ्या प्रचार किया, उससे ये भी साबित हो गया कि वो झूठ बोलने में भी ‘बाहुबली’ हो गए हैं।

ये भारतीय राजनीति का अभिशाप है कि यहां नेताओं को कुछ भी बोलने की आजादी है। आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं पर जरूर मानहानि के मुकदमे दर्ज किए गए जिसके फलस्वरूप उन्होंने माफी भी मांगी, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता के झूठ बोलने पर किसी भारतीय जनता पार्टी के नेता ने मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया हो, ऐसा याद नहीं आता। हां! कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक नेता ने अवश्य राहुल गांधी को अदालत में ये चुनौती दी थी कि वो या तो संघ को महात्मा गांधी का हत्यारा साबित करें या ऐसे बेसिरपैर के झूठे बयानों के लिए माफी मांगे। इस मामले में सुनवाई जारी है।

बहरहाल ‘बाहुबली की इस बहस’ के बीच ये समझना जरूरी हो जाता है कि क्या राहुल गांधी तीन राज्यों में जीत हासिल करने के बाद अचानक ‘बाहुबली’ हो गए या नई दिल्ली में बैठे उनके चमचे उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं। दिसंबर में पांच राज्यों में चुनाव हुए – तेलंगाना, मिजोरम, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़। तेलंगाना की 119 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 19 सीटें जीत पाई। मिजोरम में कांग्रेस का शासन था, लेकिन वहां वो 40 में से महज 5 सीटें ही जीत पाई। इसके साथ ही समूचे पूर्वोŸार में कांग्रेस का सफाया हो गया।

अब देखते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तथाकथित जीत कितनी विश्वसनीय है। यहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की बीच कांटे की टक्कर रही। असल में भाजपा को कांग्रेस से दशमलव एक प्रतिशत मत अधिक मिले। यानी कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत तो भाजपा को 41 प्रतिशत मत मिले। लेकिन अधिक मत पा कर भी भाजपा आखिर क्यों हारी? इसकी वजह है नोटा वोट। राज्य की 22 सीटों में नोटा मतों की संख्या जीत के अंतर से भी अधिक थी। इस वजह से भाजपा के चार दिग्गज मंत्री बहुत कम अंतर से हार गए। ग्वालियर दक्षिण में गृह राज्य मंत्री नारायण सिंह कुशवाहा सिर्फ 121 मतों से हारे जबकि यहां नोटा वोटों की संख्या 1,550 थी। दमोह में विŸा मंत्री जयंत मालवीय केवल 799 मतों से हारे जबकि यहां नोटा मतों की तादाद 1,299 थी। जबलपुर उŸार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री शरद जैन 578 मतों से पीछे रहे। यहां नोटा मतों की संख्या 1,209 रही। इस प्रकार भाजपा को 22 में से 12 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा नोटा वोट बुंदेलखंड (9 सीट) और मालवा (8 सीट) क्षेत्र में पड़े। नोटा वोटों की दो बड़ी वजह सामने आईं – 1. अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव से कुछ सवर्ण नाराज थे। इसलिए उन्होंने भाजपा या किसी अन्य दल को मत देने की जगह नोटा का बटन दबाया, 2. आदिवासी क्षेत्रों में लोगों ने अज्ञानवश या नक्सलियों के बहकावे में आकर नोटा को चुना। जो भी हो इस से भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।

अब आते हैं राजस्थान में। यहां कांग्रेस को 39.3 प्रतिशत तो भाजपा को 38.8 प्रतिशत मत मिले। यानी भाजपा सिफ दशमलव 5 प्रतिशत से पिछड़ी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां नोटा मतों की संख्या 1.5 प्रतिशत रही। ये बात सही है कि इस बार भाजपा का मत प्रतिशत गिरा है, लेकिन उतना भी नहीं जितना एक्जिट पोल बता रहे थे। कुछ एक्जिट पोल तो भाजपा को 20-22 सीटें दे रहे थे, लेकिन भाजपा ने यहां फिर भी 230 में से 109 सीटें हासिल कीं।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपने मायाजाल और झूठ के दम पर जीती। कांग्रेस के सरकार बनाने से पहले ही छत्तीसगढ़ को-ओपरेटिव डिपार्टमेंट का एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसमें राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों, भारतीय स्टेट बैंक और अन्य क्षेत्रीय बैंकों से ये कहा गया था कि वो किसानों के कर्जों का ब्यौरा 30 नवंबर तक जमा करा दें। पत्र कहता है कि क्योंकि कांग्रेस ने वादा किया है कि वो सत्ता में आने के 10 दिन के भीतर ही किसानों के कर्ज माफ कर देगी, इसलिए पहले से तैयारी जरूरी है। राज्य के मुख्य सचिव अजय सिंह कहते हैं कि उन्होंने कर्ज माफी समेत विभिन्न मुद्दों की वित्तीय जटिलताओं के मद्दे नजर डेटा मांगा था। लेकिन सवाल ये है कि ये पत्र सोशल मीडिया तक कैसे पहुंच गया? मुख्य सचिव को कैसे इलहाम हो गया कि कांग्रेस आने वाली है? बहरहाल इसका असर ये हुआ कि किसानों ने पहले से ही किस्तें भरनी बंद कर दीं और कांग्रेस ने तो इसका जो इस्तेमाल करना था वो किया ही। कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने न सिर्फ रमन सिंह सरकार के एक मंत्री की फर्जी सीडी बनाई बल्कि उनके विकास कार्यों के बारे में भी झूठा प्रचार किया और भ्रामक फिल्में बनाईं।

आंकड़ों के आलोक में देखें तो भाजपा की हालत वास्तव में इतनी दयनीय नहीं है जितनी कांग्रेसी चाटूकार दिखा रहे हैं। लेकिन अतंतः ये भी सच है कि जीतता तो वही है जो अधिक सीटें हासिल करता है। इन चुनावों के बाद बारी लोक सभा चुनावों की है जिसमें चंद राज्यों की नहीं पूरे देश की किस्मत का फैसला होगा। इसे ध्यान में रखते हुए भाजपा में पहले ही अपनी हार पर मंथन आरंभ हो गया है। मोदी समर्थक कुछ लोग ये सोच कर खुश हो सकते हैं कि शिवराज सिंह चैहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह जैसे भारी-भरकम क्षत्रपों के हारने के बाद भाजपा में मोदी का कद और उनपर निर्भरता बढ़ गई है, लेकिन ऐसे लोगों को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं क्षत्रपों ने 2014 में मोदी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसलिए भाजपा को सबसे पहले अपने घर में एकजुटता कायम करनी होगी। कहीं ऐसा न हो जाए कि बंदरबांट के फेर में बिल्ली रोटी ले जाए।

मोदी सरकार ने किसानों की बेहतरी के लिए निःसंदेह बड़े काम किए हैं, लेकिन या तो ये जमीनी स्तर पर नहीं पहुंचे या अपेक्षानुसार असरकारक नहीं रहे, इसकी समीक्षा करनी होगी। लोक सभा चुनावों को अभी चार महीने बाकी हैं। इस दौरान भाजपा को किसानों के बीच अपनी पैठ और बढ़ानी होगी। मोदी सरकार ने कुछ बड़े वित्तीय फैसले ये सोच कर किए कि उनसे व्यापारियों और उद्योगपतियों का एक बड़ा वर्ग प्रभावित अवश्य होगा, लेकिन जमीनी स्तर पर इससे सुधार होगा और ये देश में आर्थिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त करेगा। इस संबंध भी सरकार की अपेक्षाएं कितनी पूरी हुईं, इसकी समीक्षा करनी होगी। सरकार को चाहिए कि व्यापार और उद्योगजगत की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान दे, क्योंकि यही लोग आम जनता को रोजगार उपलब्ध करवाते हैं।

वर्ष 2014 में राहुल के युवा होने के बावजूद लोगों ने मोदी को वोट दिया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वो परिवर्तन लाएंगे। इसमें संदेह नहीं कि मोदी सरकार ने हर क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं, लेकिन उन्हें जनता के संज्ञान में लाना और लोगों को उनके फायदों की जानकारी देना भी जरूरी है। योजनाओं के विज्ञापन से लोगों को ये तो पता लग जाता है कि हां कोई योजना है, लेकिन उसका लाभ कौन, कैसे, कहां, कब ले सकता है, ये स्पष्ट नहीं होता। अगले चार महीनों में भाजपा के सांसदों, विधायकों, पार्षदों, कार्यकर्ताओं आदि को घर-घर जा कर लोगों की इनकी जानकारी देनी होगी। संक्षेप में कहें तो समाजसेवी की भूमिका निभानी होगी।

भाजपा को अपनी मीडिया रणनीति में भी सुधार करना होगा। मुसलमानों, दलितों, रक्षा सौदों के बारे में जैसे कांग्रेस ने झूठ फैलाया, उसका समुचित जवाब भाजपा नहीं दे सकी। राजनीति में सोशल मीडिया के प्रभावी इस्तेमाल की नीति मोदी ने ही शुरू की थी, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा सोशल मीडिया में मनवांछित परिणाम नहीं हासिल कर सकी। हमने ऊपर छत्तीसगढ़ का उदाहरण दिया। नोटा वोटों के लिए विपक्षी दलों ने कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, ये भी भाजपा को समझना होगा और उसकी काट निकालनी होगी।

पिछले साढ़े चार साल में भाजपा के अनेक सहयोगी दल उसे छोड़ कर चले गए। भाजपा को सहयोगियों की समस्याओं और अपेक्षाओं को गहराई से समझना होगा और बिछुड़े लोगों को मनाना भी होगा। भाजपा नेतृत्व को अपनी शैली में भी बदलाव करना होगा। पिछले पांच साल में पार्टी का बहुत विकास हुआ है। समय की मांग है कि अब विकेंद्रीकरण के बारे में सोचा जाए। शिवराज सिंह चैहान, रमन सिंह आदि जैसे अनेक कद्दावर नेता सरकार से बाहर हैं, इन्हें उचित जिम्मेदारियां देनी होंगी ताकि नाराज और बिछड़े नेताओं को मनाया जा सके।

भाजपा नेतृत्व को लगता है कि अंत समय में धुंआधार प्रचार कर लोगों का मन बदला जा सकता है, उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। ये किसी हद तक सही भी है। लेकिन अंत समय के प्रचार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है छवि या लोगों की अवधारणा। ये चंद दिन में नहीं बदल सकती। इसके लिए सतत कार्य करना होगा। विपक्षी दलों के मिथ्या प्रचार का समुचित जवाब देना होगा और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाना होगा।

अंत में एक महत्वपूर्ण बात लोगों ने भाजपा को इसलिए भी वोट दिया क्योंकि वो कांग्रेस द्वारा हिंदुओं को आतंकी साबित करने के षडयंत्र से नाराज थे। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे राष्ट्रीय अस्मिता के सवालों पर निर्णायक कदम उठाएगी। खेद है कि पार्टी ने इन्हें अदालत के भरोसे छोड़ दिया। इस बीच राहुल गांधी भी खुद को हिंदू साबित करने में लग गए। अब भी समय है, भाजपा को चाहिए कि इस विषय में ठोस कदम उठाए।