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“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

“बलूचिस्तान की आजादी का खुल कर समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

पाकिस्तान की नई नई इस्लामिक कट्टरवादी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक य रसूल अल्लाह द्वारा ईशनिंदा पर मचाए गए हंगामे के कारण लगता है दुनिया की निगाह बलूचिस्तान में सेना के जुल्मो सितम से हट गई है। जिस समय तहरीक के इस्लामिक कट्टरवादी कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भिड़ रहे थे, लगभग उसी समय 25 नवंबर को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में फ्रंटीयर कोर के काफिले पर आत्मघाती हमले में पांच लोग मारे गए। ध्यान रहे पाकिस्तानी सेना और फ्रंटीयर कोर आजकल वहां रद्द-उल-फसाद नाम का आॅपरेशन चला रहे हैं जिसका मकसद वहां कथित आतंकवादियों (बलोच स्वतंत्रता सेनानियों) का जड़ से सफाया करना है। रद्द-उल-फसाद के नाम पर निर्दोष बलोचों पर लगातार अत्याचार किए जा रहे हैं जिसका स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी विरोध भी कर रहे हैं। खबर है कि सेना और फ्रंटीयर कोर से त्रस्त बलोचों ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) बना ली है। इसके नेता खैर बक्श मरी हैं और ये पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान और सीमा पार बलोच बहुल अफगान इलाकों में भी सक्रिय है।
कहना न होगा बलूचिस्तान में सैनिक, अर्धसैनिक बलों और पुलिस तथा स्वतंत्रता सेनानियों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, सुरक्षा बल उसके लिए बीएलए को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, हालांकि इसका सत्यापन आसान नहीं होता। नवंबर 21 को यहां के तुरबत इलाके में पाकिस्तानी सैनिकों और बलोच स्वतंत्रता सेनानियों की मुठभेड़ में एक सैनिक मारा गया। नवंबर 15 को इसी इलाके में 15 शव मिले थे। इसी दिन क्वेटा में पुलिस अधीक्षक मुहम्मद इलयास और उसके तीन परिवार वालों की सरेआम हत्या कर दी गई। कुछ दिन बाद इसी इलाके से पांच और लोगों के शव मिले। अधिकारियों के अनुसार ये सभी शव पंजाब प्रांत में रहने वालों के थे। सुरक्षा बलों के अनुसार तुरबत में 15 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी बीएलए ने ली। इससे पहले अक्तूबर 18 को पुलिस दल को ले जा रहे एक ट्रक में धमाके में आठ लोग मारे गए। इनमें से 7 पुलिस वाले थे। इस धमाके में 24 लोग घायल हुए। अगस्त 13 को सेना के एक ट्रक पर आत्मघाती दस्ते के हमले में आठ सैनिकों समेत 15 लोग मारे गए।

ये तो कुछ हालिया घटनाएं हैं, लेकिन बलूचिस्तान में हिंसक घटनाओं का सिलसिला लंबे अर्से से चला आ रहा है। जाहिर है पाकिस्तानी मीडिया वो खबरें तो प्रमुखता से देता है जिनमें पुलिस या सुरक्षा बलों को निशाना बनाया जाता है, लेकिन ये बलोचों पर सेना के पैशाचिक अत्याचारों और मानवाधिकार हनन की घटनाओं को दबा जाता है। बलूचिस्तान में सेना द्वारा नागरिकों की हत्या, अपहरण या प्रताड़ना की खबरें या तो प्रकाशित ही नहीं की जातीं और अगर की भी जाती हैं तो अंदरूनी पन्नों पर सिंगल काॅलम में। ऐसी खबरों को प्रकाशित करने के कारण इतने पत्रकार अपनी जान से हाथ धो चुके हैं कि अखबार मालिक ऐसी घटनाओं को कवर करने में भी डरने लगे हैं।

बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी सैकड़ों बार चिंता जता चुकी है, इसकी आलोचना कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाॅच (एचआरडब्लू) के अनुसार बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन महामारी का रूप ले चुका है और पाकिस्तानी सरकार ने सेना की ज्यादतियों का विरोध करने वाले बलोचों की प्रताड़ना, अपहरण और गैरकानूनी हत्या रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी प्रकार यूरोपीय संसद के आसियान प्रतिनिधि मार्क टाराबेला कहते हैं कि बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन की रिपोर्टें डरावनी हैं। वहां सैनिक और अर्धसैनिक बल व्यवस्थित तरीके से लोगों को निशाना बना रहे हैं और सरकार आंखें मूंदे बैठी है।

इंटरनेशनल वाॅयस फाॅर बलोच मिसिंग पर्संस के मुताबिक जनवरी 2014 तक बलूचिस्तान में 18,000 लोग गुमशुदा थे। इनमें से 2001 से 2013 के बीच 2,000 लोग मारे गए। 463 लोगों का जबरदस्ती अपहरण किया गया। इनमें से 157 को इतना प्रताड़ित किया गया कि वो जान से हाथ धो बैठे। मारे गए कुछ प्रसिद्ध बलोच स्वतंत्रता सेनानी हैं – मुनीर मेंगल, इमाद बलोच, अल्लाह नजर बलोच, जाकिर मजीद बलोच, गुलाम मोहम्मद बलोच ओर जाहिद बलोच।
पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बल अपहृत लोगों के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं इसका विवरण इन लोगों के परिवार वालों के बयानों से चलता है। इनके मुताबिक आततायी जिंदा लोगों पर तो जुल्म करते ही हैं, उनके मरने पर दिल, गुर्दे, फेफड़े, आंते तक निकाल लेते हैं। ऐसा परिवार वालों, संबंधियों और आस पास के लोगों को डराने के लिए किया जाता है ताकि वो अपना मुंह बंद रखें।

पाकिस्तान आजकल चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना के तहत वहां ग्वादर पोर्ट बना रहा है। इसके चलते बलोचों पर अत्याचार और बढ़ गए हैं। कहने को तो पाकिस्तान दावा करता है कि इससे बलोचों को रोजगार मिल रहा है और वहां आर्थिक समृद्धि आ रही है, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। ग्वादर में काम करने वाले मजदूर तक चीन से लाए गए हैं। चीन इस पूरे क्षेत्र में अपनी करंसी चलाना चाहता है और जो लोग इस परियोजना में काम करना चाहते हैं, उन्हें अपनी भाषा सीखने पर मजबूर कर रहा है। ऐसे में बलोचों को इस परियोजना से कोई फायदा नहीं मिल रहा है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उनका सफाया ही किया जा रहा है। उन्हें अब डर सता रहा है कि कहीं पाकिस्तान के बाद वो चीन के उपनिवेश न बन कर रह जाएं। मौजूदा हालात को देखते हुए ये डर जायज भी है।

पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान में अपनी एजेंसियों की करतूतों पर तो पर्दा डाल देती है पर जब संघर्ष में इनके अपने लोग मरते हैं तो ये भारत पर इल्जाम लगाते हैं। पाकिस्तानियों को लगता है कि जो खेल वो कश्मीर में खेल रहे हैं, वहीं भारत बलूचिस्तान में खेल रहा है। अपने भारत विरोधी नेरेटिव को सही साबित करने के लिए इन्होंने कुलभूषण जाधव को राॅ के एजेंट के रूप में दुनिया के सामने पेश किया, लेकिन अफसोस कि दुनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया। अब ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस में चल रहा है।

लेकिन बलूचिस्तान का मसला इतना सरल नहीं है जितना पाकिस्तान दिखाने की कोशिश करता है। और न ही बलूचिस्तान उसका हिस्सा है जैसा वो दावा करता है। बलूचिस्तान का इतिहास असल में पाकिस्तान की बदनीयति और धोखाधड़ी का इतिहास है जिसे खुद पाकिस्तान के कायदे आजम मौहम्मद अली जिन्ना ने लिखा जिन्हें कलात के खान मीर अहमदयार खान अपना सबसे करीबी और विश्वासपात्र समझते थे। असल में विभाजन से पहले बलूचिस्तान में चार शाही रियासतें शामिल थीं – कलात, लसबेला, खारन और मकरान। मकरान, कलात का एक जिला था परंतु लसबेला और खारन का प्रशासन अंग्रेजों ने कलात के खान का सौंपा हुआ था।

पाकिस्तान बनने के तीन महीने पहले ही जिन्ना ने कलात के खान अहमदयार खान के नेतृत्व में बलूचिस्तान की आजादी के बारे में ब्रिटिश सरकार से बातचीत की। इसके बाद वायसराय, अहमदयार खान और जिन्ना के बीच कई बैठकें भी हुईं। इनके परिणामस्वरूप् 11 अगस्त 1947 को एक विज्ञप्ति जारी हुई जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान कलात को स्वतंत्र सार्वभौमिक राज्य के रूप में मान्यता देता है। इसमें ये भी कहा गया कि भविष्य में पाकिस्तान और बलूचिस्तान के संबंधों के बारे में कोई भी फैसला होने तक दोनों पक्ष ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (यथास्थिति समझौता) करेंगे। लेकिन अक्तूबर आते आते जिन्ना का मन बदल गया। उसे लगा कि पाकिस्तान में शामिल हुई अन्य रियासतों की तरह बलूचिस्तान को भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए। जिन्ना के दबाव में अहमदयार खान रक्षा, विदेश संबंध और संचार पाकिस्तान को देने के लिए तैयार हो गए पर उन्होंने तब तक किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया जब तक पाकिस्तान उसके साथ सम्मानजनक शर्तों पर संधि नहीं करता। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने राज्य की विधायिकाओं दार-उल-अवाम और दार-उल-उमरा की बैठकें भी बुलाई हैं। आगे की कार्रवाई उनकी सहमति से ही होगी। फरवरी 21, 1948 को दार-उल-अवाम की बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान के साथ विलय के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। लेकिन इसके एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि कलात, भविष्य में पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के लिए संधि पर वार्ता करे।

लेकिन मार्च 18, 1948 को पाकिस्तान ने खारन, लसबेला और मकरान को जबरदस्ती अपना हिस्सा घोषित कर दिया। कलात के खान ने इसका विरोध किया। उन्होंने इसे ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ का उल्लंघन बताया। लेकिन इससे पाकिस्तान के कान पर जूं नहीं रेंगी। मार्च 26, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस गई। एक ही दिन बाद मार्च 27 को कराची में घोषणा की गई कि अहमदयार खान ने घुटने टेक दिए हैं और वो अपनी रियासत के पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार हो गए हैं। इसके साथ ही बलूचिस्तान की 227 दिन चली आजादी भी समाप्त हो गई। स्पष्ट है, जिन्ना ने बंदूक के बल पर अहमदयार खान को विलय के लिए मजबूर किया। ध्यान रहे इस से पहले ही दार-उल-अवाम पाकिस्तान के साथ विलय का विरोध कर चुकी थी। इसलिए भले ही अहमदयार खान ने बंदूक के बल पर विलय की बात मान ली हो पर उसे कलात की विधायिका ने मंजूरी नहीं दी। यही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य ने भी कभी इस फैसले को मान्यता नहीं दी जिसने बलूचिस्तान का शासन अहमदयार खान को सौंपा था।

ये सही है कि पाकिस्तान ने बंदूक के बल पर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि अहमदयार खान ने बलूचिस्तान की आजादी के लिए काफी कोशिश की। उन्होंने ईरान और अफगानिस्तान के साथ भी समझौते की कोशिश की। वो लंदन के साथ कुछ वैसा ही समझौता भी चाहते थे जैसा उसने ओमान के साथ किया। उन्होंने आजाद बलूचिस्तान के लिए समर्थन जुटाने के वास्ते मार्च 1946 में एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भी भेजा था। ये प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से मिला। लेकिन आजाद ने बलूचिस्तान की आजादी को समर्थन से इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटेन का बगलबच्चा बन कर रह जाएगा जो भारतीय उपमहाद्वीप की आजादी के लिए अच्छा नहीं होगा।

बाद में खबरें आईं कि खान ने भारत के साथ विलय की कोशिश भी की, लेकिन इसे भी नकार दिया गया। जब पाकिस्तान, बलूचिस्तान की आजादी का बलात्कार कर रहा था, अंग्रेज ही नहीं, कांग्रेस के बड़े नेता भी खामोशी से देख रहे थे। बहरहाल दुनिया भर की उपेक्षा के बावजूद बलोचियों ने अपनी आजादी की ख्वाइश नहीं छोड़ी। उनका संघर्ष लगातार जारी रहा। खान को जिन्ना ने जो धोखा दिया, वो उसे कभी नहीं भूले। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि कांग्रेस ने खान के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया होता तो आज क्या हालात होते।

पाकिस्तान ने बलोचों की धरती पर तो कब्जा कर लिया पर उनका दिल जीतने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और उसके करीब आधे भूभाग पर फैला है पर इसकी आबादी पाकिस्तान की कुल आबादी की महज दशमलव पांच प्रतिशत है। ह्यूमन डिवेलपमेंट इंडेक्स के हिसाब से ये पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है। पाकिस्तानियों ने उनकी जमीनों, खनिजों और प्राकृतिक गैस का भरपूर इस्तेमाल तो किया पर उसका फायदा उन्हें नहीं दिया। जिन्ना के धोखे और इस अंधे शोषण ने बलोचों को गुस्से से भर दिया जिसका नतीजा समय समय पर विद्रोह के रूप में सामने आया। बलूचिस्तान में सबसे बड़ा विद्रोह 2006 में हुआ जब सेना ने बलूचों के सर्वमान्य नेता सरदार अकबर बुगती और उनके 26 साथियों को धोखे से मार डाला।

कभी पंजाब में तो कभी कश्मीर मे, पाकिस्तान आजादी के बाद से लगातार भारत से पंगा लेता रहा है। 90 के दशक से कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत में उसकी प्राॅक्सी वाॅर जारी है। इंदिरा गांधी ने मजबूर होकर बांग्लादेश के संघर्ष में हस्तक्षेप किया था, परंतु उसके बाद भारत ने पाकिस्तान में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई। बलूचिस्तान में लोगों पर अकथनीय अत्याचार हुआ, लेकिन भारत ने कभी वहां फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। भारत सरकार पाकिस्तान की असली सरकार यानी सेना को छोड़, वहां की कठपुतली चुनी हुई सरकारों से गलबहियां करती रही और सेना भारत में मनमानी करती रही। पाकी सेना एक तरफ तो कश्मीर में आतंकवाद फैलाती रही तो दूसरी तरफ बलोच अशांति के लिए भारतीय खुफिया ऐजेंसी राॅ को जिम्मेदार ठहराती रही। भारत हमेशा इन आरोपों से इनकार करता रहा। पर 2009 में तबके प्रधानमंत्रियों युसुफ रजा गिलानी और मनमोहन सिंह ने शर्मअल शेख में एक संयुक्त घोषणपत्र जारी किया जिसमें पहली बार बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ। हालांकि इसमें बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत को सीधे तौर पर तो जिम्मेदार नहीं ठहराया गया पर ये अवश्य कहा गया – “प्रधानमंत्री गिलानी ने उल्लेख किया कि बलूचिस्तान और अन्य इलाकों में आतंक के बारे में पाकिस्तान के पास कुछ सूचना है”। कुछ लोगों ने इस घोषणापत्र को मनमोहन की नरमी का प्रतीक बताया तो कुछ ने आरोप लगाया कि वो सांप्रदायिक विदेशनीति अपना रहे हैं| और पाकी खुफिया एजेंसी के हाथ में खेल रहे हैं। बहरहाल काफी फजीहत के बाद मनमोहन सरकार ने इस घोषणापत्र से पल्ला झाड़ लिया।

मोदी सरकार ने भी पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से संबंध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर प्रयास पर पाकी सेना ने आतंकी हमलों के जरिए पानी फेर दिया। यही नहीं कश्मीर में भी हालात को और बदतर बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले भाइयों को याद किया। अब तक पाकी लाइन को चला रहे भारतीय मीडिया ने इसके बाद पहली बार खुल कर बलोचिस्तान में चल रहे दमन की खबरें प्रकाशित करना शुरू किया। भारत में भी विस्थापित बलोच नागरिकों के सम्मेलन हुए। यही नहीं सरदार अकबर बुगती के पोते बरहमदाग खान बुगती ने भारत में शरण के लिए आवेदन भी किया जो आजकल स्विटजरलैंड में रह रहे हैं। हाल ही में स्विटजरलैंड ने उनके राजनीतिक शरण के आवेदन को ठुकरा दिया क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया हुआ है। याद रहे ये वही पाकिस्तान है जिसने हाल ही में मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी और लश्कर-ए-तौएबा के प्रमुख को सारे अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद रिहा कर दिया था।

प्रधानमंत्री की पहल के बाद भारत ने ये मसला संयुक्त राष्ट्र समेत लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। खुद बलोच विस्थापितों ने ये मसला आॅफिस आॅफ यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशनर फाॅर रिफ्यूजीस (यूएनएचसीआर) में जोरशोर से उठाया। अमेरिका सहित दुनिया भर में इस मसले पर सेमीनार और विचार गोष्ठियां आयोजित की गईं। अमेरिका के दो सेनेटरों ने तो बलूचिस्तान की आजादी के लिए प्रस्ताव भी रखा। इससे पहले 2012 में अमेरिकी कांग्रेसमेन डाना रोहराबाचर और लूई गाहमर्ट ने हाउस आॅफ रेप्रेसेंटेटिव में बलूचिस्तान के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देने के लिए बिल पेश किया था।

पाकिस्तान ने जिस तरह हाफिज सईद को बेशर्मी से रिहा किया है और जैसे उसके आतंकी संगठन जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) को राजनीतिक संगठन (मिल्ली मुस्लिम लीग) के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है और जैसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुली धमकियों के बावजूद पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों के बारे में दोगली नीति अपना रहा है, उससे ये साफ हो गया है कि भारत को अब ये लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ेगी।

अब मोदी सरकार को बलूचिस्तान के बारे में जबानी जमाखर्च बंद कर कुछ मजबूत कदम उठाने हांेगे। सबसे पहले तो बरहमदाग बुगती को राजनीतिक शरण देनी होगी और साफ तौर से एलान करना होगा कि जैसे पाकिस्तान कश्मीर के आतंकवादियों को ‘नैतिक और राजनयिक’ समर्थन देता है, वैसे ही भारत भी अब खुले आम बलोच स्वतंत्रता सेनानियों को समर्थन देगा। भारत बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता और बलोच लोगों की इच्छा के अनुसार उसे अलग देश का दर्जा मिलना ही चाहिए। भारत को अमेरिका को भी स्पष्ट करना होगा कि यदि वो अफगानिस्तान के स्थायित्व में भारत का समर्थन चाहता है तो उसे बलोच आजादी का समर्थन करना होगा। बलोच लोगों के नरसंहार पर अब उसे अपनी जबान खोलनी ही होगी।

पाकी सेना की शह पर सीपेक के नाम पर चीन विवादास्पद पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में घुस गया है। जाहिर तौर पर चीन इसे ‘विकासपरक आर्थिक गतिविधि’ बता रहा है, लेकिन इसके सैन्य और रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि अमेरिकी ने सीपेक की वैधता पर उंगली उठाई है पर ग्वादर पोर्ट के बारे में कभी कोई वक्तव्य नहीं दिया है। अब अमेरिका को मजूबर किया जाना चाहिए कि वो इस विषय में अपनी राय स्पष्ट करे।
भारत के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा है। ये सिर्फ हाफिज सईद और उसके बारे में अमेरिकी बयानों तक सीमित नहीं है। ट्रंप की सभी धमकियों के बावजूद पाकी सेना भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए तैयार नहीं है। अब भारत को इसका हल खुद निकालना होगा और इसका रास्ता बलूचिस्तान से होते हुए जाता है।