Posts

“रूमानियत और कागजी आदर्शवाद नहीं, अपने हितों को ध्यान में रखकर ही आरसेप में शामिल हो भारत” in Punjab Kesari

भारत और आसियान (एसोसिएशन आॅफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) के संबंधों की रजत जयंती के अवसर पर मोदी सरकार ने आसियान के सभी दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को गणतंत्र दिवस के अवसर पर आमंत्रित किया। इन राष्ट्राध्यक्षों ने 26 जनवरी की परेड में तो भाग लिया ही, राजनयिक और व्यापारिक संबंधों के बारे में विस्तृत बातचीत भी की।

अन्य आसियान नेताओं के अलावा इंडोनशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो और सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली हसेन लूंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ये सुनिश्चित करने के लिए खासतौर से आग्रह किया कि आरसेप (रीजनल काॅम्प्रीहेंसिव इकाॅनाॅमिक पार्टनरशिप) को लेकर चल रही वार्ता इस वर्ष अवश्य पूरी हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन भारत को इसके कई पहलुओं पर गंभीर आपत्तियां भी हैं।
इस विषय में आगे बात करने से पहले आइए जान लेते हैं कि आखिर आरसेप है क्या। असल में ये आसियान के दस देशों और छह अन्य देशों (भारत, चीन, जापान, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजी लैंड, और दक्षिण कोरिया) का एक प्रस्तावित आर्थिक समूह है जो आपस में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट चाहता है। इस समूह के बारे में सबसे पहले वर्ष 2011 में सुगबुगाहट शुरू हुई। हालांकि इस पर पहली औपचारिक बैठक वर्ष 2012 में कंबोडिया में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। इस पर अब तक 17 बैठकें हो चुकी हैं। इसका पहला शिखर सम्मेलन पिछले वर्ष नवंबर में फिलीपींस की राजधानी मनीला में हुआ। आरसेप को अमेरिका नीत ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) का जवाब माना जा रहा है जिसमें अनेक अमेरिकी और एशियाई देश शामिल हैं पर भारत और चीन को इसमें जगह नहीं मिली है।

उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष सिंगापुर में होने वाले आसियान शिखर सम्मेलन के साथ ही आरसेप का शिखर सम्मेलन भी होगा जिसमें अंततः इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे।

आरसेप पर सिर्फ संबंधित देशों की ही निगाह नहीं है, दुनिया भर के देश इस पर नजर जमाए बैठे हैं क्योंकि ये अपनी तरह का अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक गठबंधन होगा। 2017 के आंकड़ों के हिसाब से अगर इसकी आर्थिक और डेमोग्राफिक क्षमताओं का आकलन करें तो पता चलेगा कि अगर ये बना तो इसमें 3.4 अरब लोग शामिल होंगे। इसके सदस्य देशों का सकल घरेलू उत्पाद (ग्राॅस डोमेस्टिक प्राॅडक्ट, जीडीपी) 45.9 ट्रिलियन डाॅलर होगा जो कि विश्व की कुल जीडीपी का 39 प्रतिशत होगा। ये दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेडिंग ब्लाॅक होगा जिसमें दुनिया की आधी अर्थव्यवस्था शामिल होगी। एक अनुमान के अनुसार 2050 तक इसकी जीडीपी 250 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच जाएगी। और भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं को मिलाकर ये दुनिया की तीन चैथाई अर्थव्यवस्था पर काबिज होगा।

आरसेप के बारे में जैसा विचार किया जा रहा है, अगर सचमुच वैसा हो गया तो 21वीं सदी वास्तव मंे एशिया की ही होगी। दुनिया का अर्थ संतुलन पश्चिम से खिसक कर पूर्व में आ जाएगा। जाहिर है इसे लेकर आसियान देश ही नहीं, चीन भी काफी उत्सुक है। संभवतः यही कारण है कि उसने डावोस में वल्र्ड इकाॅनाॅमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के तुरंत बाद उसका स्वागत किया। डावोस में मोदी ने अपने भाषण में विकसित देशों के बढ़ते हुए इकाॅनाॅमिक प्रोटेक्शिनिस्म (आर्थिक संरक्षणवाद) पर चिंता जताई थी और इसे दुनिया के सामने मौजूद सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बताया था।
मोदी के भाषण पर चीन की उत्साही प्रतिक्रिया का विशेष कारण भी है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद संभालने और ‘अमेरिका फस्र्ट’ नीति लागू होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती चीन के सामने ही खड़ी हुई है जिस पर अमेरिका अवैध डंपिंग और एकपक्षीय आर्थिक नीतियों का आरोप लगाता रहा है। वर्ष 1985 के बाद अमेरिका ने पहली बार पिछले वर्ष नवंबर में चीन के खिलाफ एल्यूमिनियम शीट्स की डंपिंग के मामले में जांच शुरू की। इसी वर्ष 23 जनवरी को अमेरिका ने चीन की वाशिंग मशीनों और सोलर पेनल्स पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। उसने चीन पर आरोप लगाया कि वो इनके उत्पादन पर सबसिडी देता है और फिर सस्ते माल को उसके यहां डंप करता है।

भारत आरसेप का प्रबल समर्थक है और इस संबंध में एक बैठक तो भारत में भी हो चुकी है, लेकिन अमेरिका की तरह भारत को भी चीन की आर्थिक नीतियों पर सख्त एतराज है। चीन की डंपिंग नीतियों का असर भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर व्यापक रूप से पड़ा है। भारत में अशिक्षित या अल्पशिक्षित बेरोजगार युवाओं की बड़ी तादाद है और ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत मोदी सरकार इन्हें मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में रोजगार देना चाहती है क्योंकि इन्हें उच्चस्तरीय कौशल वाले सर्विस सेक्टर में काम देना लगभग असंभव है। अगर भारत अपने हितों को सुनिश्चित किए बिना आरसेप में शामिल होता है और आयात शुल्क घटा देता है तो उसका मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तबाह होने की कगार पर पहुचं जाएगा।

समझा जाता है कि रजत जयंती समारोह के दौरान होने वाली चर्चाओं में भारत पर आयात शुल्क घटाने का दबाव भी डाला गया। लेकिन भारत आनन-फानन में कोई फैसला लेने के लिए तैयार नहीं है। पहले ही व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है, भारत चीन को और माल डंप करने की अनुमति देने का जोखिम नहीं उठा सकता।

आरसेप को लेकर भारत की दूसरी बड़ी आपत्ति सर्विस सेक्टर में आसियान देशों के कड़े नियमों को लेकर है। भारत चाहता है कि आरसेप पर हस्ताक्षर से पहले ये देश अपने नियमों को सरल और उदार बनाएं ताकि ज्यादा तादाद में भारतीय भी वहां काम कर सकें। भारत चाहता है कि आरसेप में फ्री-ट्रेड से जुड़े जो भी समझौते हों वो न्यायसंगत हों। जाहिर है सिर्फ कागजी आदर्शवाद और रूमानियत से काम नहीं चलता। भारत जो भी समझौता करेगा, वह दीर्घकालिक हितों के बारे में सोच कर ही होगा। वैसे भी भारत के प्रति चीन का जो रवैया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शीत युद्ध के बाद अमेरिकी एकाधिकारवाद और दादागिरी को रोकने के लिए चीन, भारत और रूस ने रिक (रशिया-इंडिया-चाइना गठबंधन) और एससीओ (शंघाई काॅओपरेशन आॅर्गनाइजेशन) जैसे अनेक गठबंधनों की परिकल्पना की। लेकिन अब हालात ये हैं कि दुनिया अमेरिकी दादागिरी से ज्यादा विस्तारवादी चीनी दादागिरी से चिंतित है। चीन अब दुनिया का बेताज बादशाह बनना चाहता है और इसके लिए सही, गलत हर पैंतरा आजमाने के लिए तैयार है। उसके बाद विदेशी मुद्रा के बड़े भंडार हैं जिनके बल पर वो गरीब देशों को बंधक बनाना चाहता है। उसकी तानाशाही शासन व्यवस्था में मजदूरों से मध्ययुग से भी बदतर हालात में कम से कम मजदूरी पर काम करवाया जाता है। इनके दम पर वो बहुत कम कीमत पर सामान तैयार करवाता है और दुनिया भर में डंप करता है और विदेशी मुद्रा कमाता है। चीन के साथ एक और परेशानी ये है कि वो अपने हितों के आगे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून या समझौते का पालन नहीं करता। पाक अधिकृत कश्मीर में चाइना-इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर की परियोजनाएं और साउथ चाइना सी के कृत्रिम द्वीप इसके ताजा उदाहारण हंै। चीन के इसे रवैये के कारण भारत को अब जापान, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मिल कर क्वाड्रीलेटरल (चार भुजाओं वाला) बनाना पड़ रहा है।

अभी जो हालात है, अगर उनमें आरसेप बनेगा तो निःसंदेह भारत की अपेक्षा आसियान देशों को ज्यादा लाभ मिलेगा। इसके अनेक कारण हैं। उनकी अर्थव्यवस्थाएं भारत से कहीं पहले ग्लोबलाइसेशन और लिबरलाइसेशन (वैश्वीकारण और उदारवाद) की राह पर चल पड़ी थीं। उनका क्षेत्रफल और आबादी कम हैं और अर्थव्यवस्थाएं अधिकतर निर्यात आधारित हैं। भारत में उन्हें बड़ा बाजार मिलेगा, लेकिन इस पूरी कवायद में भारत को क्या मिलेगा?

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय नरसिम्हा राव ने ‘लुक ईस्ट’ नीति की नींव रखी, प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘एक्ट ईस्ट’ कर दिया और इसके साथ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को जोड़ दिया। अगर भारत न्यायसंगत, तार्किक, दूरगामी नीतियों के साथ आरसेप से जुड़े तो पड़ोसी म्यांमार से लेकर जापान तक, भारत के लिए भी असंख्य संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं, लेकिन बहुत कुछ निर्भर करेगा हमारे वार्ताकारों के कौशल और बुद्धिमत्ता पर। वो आखिरकार किन शर्तों के साथ इसमें शामिल होते हैं। कहना न होगा नए नए आर्थिक गुटों की सदस्यता के साथ ही भारत को आंतरिक अर्थव्यवस्था पर भी पहले से कहीं अधिक ध्यान देना होगा।
आखिर में सिर्फ एक बात – भारत अपने हितों के खिलाफ आरसेप में शामिल न हो। सदाशयता के आभाव में क्षेत्रीय गठबंधनों का क्या हश्र होता है ये हम सार्क (साउथ एशियन एसोसिएशन फाॅर रीजनल काॅओपरेशन) में देख चुके हैं जिसे पाकिस्तान की हठधर्मी और शत्रुता ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया।

“सावधान! आकार लेना शुरू कर दिया है चीनी घेराबंदी ने” in Punjab Kesari

राजनयिकों के आरामदेह कक्षों और थिंक टैंकों के वातानुकूलित सेमीनारों से बाहर निकल, चीन की रणनीतिक घेराबंदी धीरे-धीरे जमीन पर आकार लेने लगी है। जिसकी आशंका थी, चीन जो चाहता था, वो हो रहा है। चीन की वजह से भारत के पड़ोसी देशों में जो परिवर्तन हो रहे हैं और घटनाक्रम जैसे करवट बदल रहा है, उसमें आवश्यक है कि हम कुछ देर रूक कर, सोच विचार कर, चीन और इन देशों के प्रति अपनी नीतियां बदलें या संशोधित करें।

सबसे पहले बात चीन की ही करते हैं। 11 दिसंबर को दिल्ली में हुई त्रिपक्षीय गठबंधन रिक (रशिया, इंडिया, चाइना) की बैठक के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने विदेश मंत्री वांग यी और सुषमा स्वराज की बातचीत के बारे में अपनी तरफ से विवरण दिया। इसके मुताबिक वांग ने सुषमा से कहा कि डोकलाम में “चीनी सीमा” में भारतीय सैनिकों के ”अवैध रूप“ से प्रवेश के बाद पैदा हुए विवाद से दोनों देशों के रिश्तों पर काफी दबाव पड़ा। हालांकि विवाद को राजनयिक जरिए से हल कर लिया गया लेकिन इससे सबक सीखना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। वांग ने कहा कि भारत-चीन संबंध महत्वपूर्ण काल में हैं और दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है आपसी विश्वास बढ़ाना।

वांग ने आगे कहा कि दोनों देशों ने ये विचार साझा किया कि चीन और भारत को एक दूसरे के विकास को अवसर के रूप में देखना चाहिए न कि चुनौती के रूप में और दोनों देश प्रतिद्वंद्वि कम और साझेदार अधिक हैं। इसलिए दोनों पक्षों को दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई सहमति को क्रियान्वित करना चाहिए।

ध्यान रहे वांग के भारत आने से पहले चीन ने डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। यह पहली बार है जब सर्दियों में भी डोकलाम में चीनी सैनिक मौजूद हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय के बयान के कुछ निहितार्थ हैं जिन्हें समझना आवश्यक है। एक – चीन ने साझा घोषणापत्र से अलग वांग और सुषमा की बातचीत को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह डोकलाम पर पर भारत के रूख से न केवल असहमत है, बल्कि नाराज भी है और इस नाराजगी को वह भारत की जनता को भी बताना चाहता है। दो – चीन ने अपनी तरफ से एक तरह से भारत को चेतावनी दी है। तीन – चीन के मुताबिक दोनों देशों के बीच पर्याप्त विश्वास नहीं है। चार – चीन चाहता है कि भारत, दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों में उसकी महत्वकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड की परियोजनाओं और विकास के नाम पर हो रही घेराबंदी को चुपचाप स्वीकार करे।

यहां तीन बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए, एक – रिक बैठक से पहले चीनी राजदूत ने कहा था कि भारत को वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए और अगर भारत चाहेगा तो चीन पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाली चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना का नाम बदल देगा। चीन ने इसे आर्थिक विकास की परियोजना बताते हुए कहा कि इसका भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे सीमा विवाद से कोई लेना देना नहीं है। तीन – रिक की बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री सरगेई लेवरोव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत को इस योजना में शामिल होना चाहिए और डरना नहीं चाहिए क्यांेकि किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए भारत के पास अच्छी प्रोफेशनल टीम है।

सुषमा और वांग की वार्ता के चीनी विदेश मंत्रालय के खुलासे और बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री द्वारा वन बेल्ट, वन रोड का मुद्दा उठाना ये दिखाता है कि रिक बैठक में इस विषय में बातचीत हुई, रूस ने इसमें चीन का साथ दिया, लेकिन भारत तैयार नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुछ दिन बाद ये अवश्य स्पष्ट किया कि अगर कोई सुझाव है और उसमें भारत की संवेदनशीलताओं और चिंताओं का ध्यान रखा जाता है, तो भारत उस पर अवश्य विचार करेगा।

जाहिर है चीन और भारत के संबंध, रूस और चीन के संबंधों से अलग हैं और भारत चीन की इस परियोजना को उसके रणनीतिक विस्तार के औजार के रूप में देखता है। चीन समूचे एशिया पर अपना वर्चस्व चाहता है जिसे भारत स्वीकार नहीं करता। भारत और पाकिस्तान में कोई समानता न होने के बावजूद, चीन अपने हित साधने और भारत को नीचा दिखाने के लिए हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों की बराबरी का दावा करता है। ये भी भारत को पसंद नहीं है।

ये संयोग नहीं कि वांग का बयान आने के चंद घंटों के भीतर ही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंग्रेजी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में एक लेख छपा जिसका शीर्षक था – ”भारत क्षेत्रीय विकास से अधिक भूराजनीतिक समीकरणों को महत्व देता है“। इसमें कहा गया – ”श्रीलंका ने पिछले सप्ताह हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्षीय लीज पर देने की औपचारिकता समाप्त की। श्रीलंका सरकार ने इसका स्वागत किया, लेकिन भारत में इससे खतरे की घंटी बजने लगी। कोलंबो ने बार-बार भारत को भरोसा दिलाया कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल शुद्ध रूप से नागरिक उद्देश्य के लिए होगा, ये बंदरगाह चीन को हिंद महासागर में समुद्री रास्ते उपलब्ध करवाएगा, लेकिन भारतीय मीडिया बता रहा है कि इस अधिग्रहण के जरिए चीन इस क्षेत्र में अधिकाधिक रणनीतिक और आर्थिक वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि चीन के वन बेल्ट, वन रोड से घिरने से डरा भारत हंबनटोटा में हवाईअड्डा बनाने पर विचार कर रहा है। नई दिल्ली की पुरानी रणनीतिक सोच इस क्षेत्र के अन्य देशों और चीन के बीच बढ़ रहे सहयोग को कम नहीं कर सकती। मालदीव ने हाल ही में चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थायित्व के बावजूद चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पर ईमानदारी से काम हो रहा है। इस क्षेत्र में चीन और अन्य देश विकास के लिए संयुक्त प्रयास कर रहे है। नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और अन्य देशों में चीनी निवेश ने अर्थव्यवस्था में सुधार किया है और लोगों को रोजगार दिया है।”

लेख में आगे कहा गया है कि ”श्रीलंका की अंदरूनी राजनीति मंे घुसने और नई दिल्ली को घेरने का चीन का कोई इरादा नहीं है। ये नई दिल्ली की संकीर्ण सोच होगी अगर वह चीन की सहयोगात्मक गतिविधियों को उसे घेरने और दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने की शोषणकारी रणनीतियों के तौर पर देखेगी। अगर भारत उनकी विकास की जरूरतंें पूरी कर सके तो श्रीलंका, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय देश भारत के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए तैयार हैं।“

भारत पर संकीर्ण सोच का आरोप लगाने वाला यह लेख बहुत ही चतुराई से अनेक तथ्यों को छुपा जाता है। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग मानता है। इससे निकलने वाले सीपेक को भारत कैसे मान्यता दे सकता है? क्या चीन ने वहां निर्माण कार्य आरंभ करने से पहले भारत की अनुमति ली थी या भारत को किसी भी तरह विश्वास में लिया था? अगर चीन भारत के साथ सहयोग का इतना ही इच्छुक है तो वो मसूद अजहर और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप जैसे मसलों पर भारत का साथ क्यांे नहीं देता? चीन पाकिस्तान को पूरी तरह त्याग कर भारत के साथ क्यों नहीं आता? सारी दुनिया ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग देखना आरंभ कर दिया है, लेकिन चीन क्यों अब भी शीतयुद्ध की तरह भारत और पाकिस्तान की तुलना करना चाहता है? वो क्यों भारत को पाकी चश्मे से देखना चाहता है?

जहां तक सीपेक का सवाल है, उसके बारे में खबर ये है कि चीन ने पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते उसकी अनेक परियोजनाओं को रोक दिया है। खबरें ये आ रही हैं कि चीन अब ये परियोजनाएं पाकी सेना की सरपरस्ती में पूरा करना चाहता है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानती है।

ग्लोबल टाइम्स का लेख कहता है कि हंबनटोटा के चीनी अधिग्रहण का श्रीलंका ने स्वागत किया। लेकिन हकीकत यह है कि उसने चीन से ऊंची दरांे पर ऋण लिया था। जब वो उसे वापस नहीं कर सका तो चीन ने उसे मजबूर किया कि वो उसे अपना प्रमुख बंदरगाह हंबनटोटा 99 साल की लीज पर दे। अगर चीन का मकसद सिर्फ व्यापार था तो उसे हंबनटोटा को 99 साल की लीज पर लेने की क्या जरूरत थी? क्या चीन भारत ही नहीं विश्व को भी यह लिखित में देने के लिए तैयार है कि वो श्रीलंका में हंबनटोटा और सीपेक के तहत पाकिस्तान में बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट को नौसैनिक अड्डों के रूप में कभी इस्तेमाल नहीं करेगा? वैसे भी साउथ चाइना सी प्रकरण के बाद दुनिया का चीन से भरोसा उठ गया है। चीन ने वहां न केवल अनधिकृत और अवैध नौसैनिक अड्डे बनाए, बल्कि इस विषय में अंतरराष्ट्रीय अदालत के निर्णय को भी कूड़े की टोकरी में फेंक दिया क्योंकि वो उसके पक्ष में नहीं था।

एक महत्वपूर्ण मसला नेपाल का भी है। वहां हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल ने एक अन्य दल सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के साथ बहुमत हासिल किया है। कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल के नेता और जल्द ही नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले के पी शर्मा ओली चीन के बेहद करीब समझे जाते हैं। पिछली बार जब वो प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने चीन के साथ अनेक ऐसे समझौते किए जिन पर भारत को सख्त आपत्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल में विशेष दिलचस्पी दिखाई है। 1997 से 2014 तके कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री वहां नहीं गया। मोदी नेपाल के दो दौरे कर चुके हैं जबकि सुषमा स्वराज वहां पांच बार जा चुकी हैं। मोदी सरकार ने नेपाल में 900 मेगावाट की बिजली परियोजना के लिए समझौता किया, उसे 1.3 अरब डाॅलर का ऋण दिया। जब नेपाल में भयंकर भूकंप आया तो भारत ने अधिकतम सहायता की। लेकिन चीन के प्रेम में अंधे ओली पर मोदी सरकार के सकारात्मक कदमों का कितना असर पड़ेगा ये देखना दिलचस्प होगा।

एक तरफ भारत को चीन की कूटनीतिक धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ नेपाल में चीन समर्थक ओली का सत्ता संभालना, पाकिस्तान में सेना के साथ चीन का गठबंधन, श्रीलंका में बंदरगाह पर कब्जा, मालदीव के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, म्यांमार और बांग्लादेश में सड़क और समुद्री परियोजनाएं, चीन भले ही भारत को कितना भी संकीर्ण कहे, लेकिन भारत उसकी छुपी मंशा को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

ऐसे में भारत के सामने क्या विकल्प हैं? इसके लिए ठंडे दिमाग से लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी। चीन के पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है जिसके जरिए वो देशों को खरीद रहा है और भारत को चुनौती दे रहा है कि तुम्हारी हिम्मत हो तो तुम भी खरीद लो। जाहिर है भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार, चीन से मुकाबला नहीं कर सकता, वैसे भी भारत लोकतांत्रिक देश है, यहां कम्युनिस्टों जैसे तानाशाही से काम नहीं लिया जा सकता। भारत सरकार भले ही चीनी सरकार की तरह तानाशाही से न काम कर सके, लेकिन उसे भी फैसले लेने की रफ्तार और क्षमता तो बढ़ानी ही होगी।

चीनी धमकियों और रणनीतिक घेराबंदी के मद्दे नजर भारत को सीमा पर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। भारत को संबंधित देशों को बिना लाग लपेट अपनी चिंताओं से अवगत भी करवाना होगा। लेकिन लगातार तनाव और युद्ध विकल्प नहीं हैं। आज दुनिया उसी के कसीदे पढ़ती है जिसके पास पैसा हो। भारत को अपनी आर्थिक ताकत को तेजी से बढ़ाना होगा, इसके लिए जरूरी हो तो चीन का इस्तेमाल भी करना होगा। पैसा कमाने के लिए चीन ने हर नियम-कानून को ताक पर रख दिया है। भारत को भी आदर्शवाद छोड़ व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा।

“The power of a mother: from Manushi Chillar to Majid Khan” in TOI Blog

India is a nation whose people value their mother with reverence, from the portrayal of deities in powerful and caregiving roles to men folding their hands in obeisance to ‘lakshmi’. A country which terms its nation as ‘Bharat Mata’ is a rare find in this technologically advancing world. The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.

After a 17 year drought, India’s Manushi Chhillar won the coveted Miss World 2017 title in China. The previous winner was Priyanka Chopra, in her winning answer, Priyanka stated that her idol is Mother Theresa. Manushi, after 17 years, also gave a response based on the value of mother’s which received a huge applause from the audience. The question asked was, “Which profession deserves the highest salary and why?” The 20-year-old said, “A mother deserves the highest respect. It’s just not about cash but also the love and respect that you give to someone. My mother has been a huge inspiration. it is the mother’s job that deserves the biggest salary.”

This reply has awoken the people of India to embrace their cultural values and put their beloved mother’s on the pedestal they deserve yet are rarely acknowledged for.

It has been the argument of feminists that housewives are the largest unpaid workers globally, resulting in work done worth billions of dollars yet not recognised in our economy. The Organisation for Economic Cooperation and Development revealed that an average woman in India spends five hours a day in unpaid work, Indian men spent under 51.8 minutes a day. If the same woman has children from the age range of 1 to 6 years of age, the workload hours increase. Yet the term ‘housewife’ is frowned upon, a mother’s work is thought to be trivial, and her life imagined to be a ‘waste’.

Even if the work of a mother is thought to be a backbreaking task the entire process is imagined to have no economic value whatsoever, even though motherhood helps prepare kids for the national and international labour market. Yet all the efforts that a mother puts into the household, giving her love to her child are not disregarded. On one hand, where a mother’s love brought the coveted Miss World title back to India, a mother’s love also brought back a son from the brink of self and national destruction.

The effect of the love of a mother on her child is profound. Footballer Majid Khan who joined Lashkar-e-Taiba returned home after seeing a video of his mother crying for his return. Majid was seen at the funeral of Muzamil Manzoor, a militant killed during a gunfight in Kund. A week after he announced on Facebook that he was joining the militant ranks he returned. J&K chief minister Mehbooba Mufti welcomed Majid’s decision to return home.

‘’A mother’s love prevailed. Her impassioned appeal helped in getting Majid, an aspiring footballer, back home. Every time a youngster resorts to violence, it is his family which suffers the most,’’ she tweeted. Shortly after the return of Majid Khan, a 16-year-old boy heeded to his parents’ call and returned home in Chimmer village.
Seeing the positive effect that has been created by these videos of mothers telling their sons to come back home, many other mothers of terrorist sons have started doing the same.

In response, there are sons who are returning back home and aren’t being arrested. The government of J&K has declared that there will be no penalty for first-time offenders of any crime. In this manner, we can see that the role of a caregiver isn’t limited to our conventional belief of mother, but is also by the government. This different approach to rehabilitation of the youth, the belief that there is still hope, and the understanding that there is a gap in approach between the Indian government and Kashmiri youth has brought about a new approach.

The question still arises that with the hullabaloo surrounding Manushi Chillar’s response, to the return of children from terrorist groups, are we truly deserving to be called a nation who respects their mother in the 21st century? Compared to Western countries where children tend to live in nuclear families and leave their residence at the tender age of 18 years old, the attachment to parents isn’t as strong as in India.

Or yet that was the case until at least a decade ago, the new age trend is for Indian children to be educated outside of India and continue to live there, Indian children are leaving their parents alone. To achieve the dream of being successful in life, where success is measured in terms of international standards of income, the primary caregiver falls behind. Perhaps it is time to follow what we preach, not just say that we love our mothers but be there to care for our caregivers at a time that matters the most.

“ट्रंप की अफगान-दक्षिण एशिया नीति में पलीता? सजा की जगह ‘मौका’ मिलेगा आतंकी पाकिस्तान को” in Punjab Kesari

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 21 अगस्त को बहुत जोर शोर से दक्षिण एशिया-अफगानिस्तान नीति की घोषणा की और अफगानिस्तान में चल रहे युद्ध के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। ट्रंप ने बिना लागलपेट पाकिस्तान को अपना रवैया सुधारने और आतंकवादियों के गढ़ समाप्त करने की चेतावनी दी। परंतु अब लगता है ट्रंप का यह प्रलाप महज गीदड़ भभकी ही था, इसके पीछे तुरंत कुछ करने की नीयत नहीं थी। ऐसा क्यों लगता है, इसके पीछे कुछ बहुत स्पष्ट कारण हैं।

दरअसल तीन अक्तूबर को सेनेट आम्र्ड सर्विस कमेटी की बैठक हुई जिसमें सेनेटरों (अमेरिकी सांसद) ने अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस और चेयरमेन, जाॅइंट चीफ आॅफ स्टाफ मेजर जनरल जोसेफ डनफोर्ड से दक्षिण एशिया क्षेत्र में उनकी नीतियों और कार्ययोजना के बारे में तीखे सवाल जवाब किए। इस अवसर पर अमेरिका के इन दो शीर्ष रक्षा पदाधिकारियों ने जो बातें कहीं उनसे स्पष्ट हुआ कि ट्रंप की घोषणा के बाद जो उम्मीदें बंधीं थीं, उन्हें फौरी तौर पर अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिका के पास न तो कोई योजना है और न ही ऐसी योजना बनाने की उसकी कोई मंशा है।

इस मौके पर अनेक सेनेटरों ने ट्रंप की अफगान-पाकिस्तान नीति की बखिया भी उधेड़ी। सेनेटर एलिजबेथ वारेन ने पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय) की अगस्त की उस पे्रस विज्ञप्ति की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि हम अफगान सुरक्षा बलों की ताकत इस सीमा तक बढ़ा देंगे कि तालिबान समझ जाए कि वो जीत नहीं सकता और वार्ता के लिए मजबूर हो जाए। उन्होंने रक्षा सचिव जिम मैटिस से पूछा कि ऐसा कैसे और कब तक होगा जबकि पिछले 16 साल का इतिहास कुछ और ही गवाही दे रहा है। इसके जवाब में मैटिस ने कहा कि इस समय 16 साल में पहली बार अफगान सेना की सभी 6 कोर एक साथ काम कर रही हैं और बहुत कोशिशों के बावजूद तालिबान नए इलाकों पर कब्जा नहीं कर पा रहा है। इस पर वारेन ने उन्हें याद दिलाया कि अफगानिस्तान में अब तक 2,386 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं, 20,000 से ज्यादा घायल हो चुके हैं, एक लाख से ज्यादा अफगानी मारे जा चुके हैं, ट्रिलियन डाॅलर (एक ट्रिलियन = 1,000 बिलियन, एक बिलियन मतलब एक अरब) खर्च किए जा चुके हैं, इसके बावजूद अफगान सुरक्षा बल अब भी अपने पाॅव पर नहीं खड़े हो पाए हैं, सरकार का 60 प्रतिशत हिस्से पर भी कब्जा नहीं है जिसमें लगभग एक तिहाई आबादी रहती है, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल अफीम का उत्पादन बढ़ा है, भष्टाचार घटने का नाम नहीं ले रहा, 50 प्रतिशत से भी कम लोग अफगान सरकार का समर्थन करते हैं। कुल जमा पिछली और नई नीति में अंतर सिर्फ यही है कि इस नीति में कोई समय सीमा नहीं है।

दिन भर चली इस बैठक में अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बारे में नई अमेरिकी नीति की जो रूपरेखा उभर कर आई उससे स्पष्ट हुआ कि अमेरिका इस क्षेत्र में लंबे समय तक टिकने का मन बना चुका है। अफगानिस्तान के विषय में अमेरिका की नई नीति मुख्यतः समस्या के हल में क्षेत्रीय ताकतों को शामिल करने, अधिक सुरक्षाबल तैनात करने, सुलह-सफाई के लिए वार्ता करने और हालात को स्थिर बनाए रखने की है। इस रणनीति में जिन वृहत्तर क्षेत्रीय ताकतों को शामिल करने की बात है उनमें पाकिस्तान के साथ भारत, चीन और रूस शामिल हैं। फिलहाल अफगानिस्तान में करीब 11,000 अमेरिकी और अफगान और अमेरिका के सहयोगी देशों के करीब 3,20,000 सैनिक हैं। नई नीति के तहत एक अरब डाॅलर सालाना की लागत से 3,000 और सैनिक तथा सुरक्षा सलाहकार अफगानिस्तान भेजे जाएंगे और ये सुनिश्चित किया जाएगा कि जो भी योजनाएं बनें वो टिकाऊ हों।

इस बैठक में मेजर जनरल डनफोर्ड से जब पूछा गया कि वो अफगानिस्तान में अपनी जीत को कैसे देखते हैं तो उन्होंने इसके चार आयाम गिनवाए। एक – अमेरिका चाहता है कि दक्षिण एशिया में सक्रिय अल कायदा, आईएस ओर 18 अन्य आतंकवादी समूहों को हराया जाए जो अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमला करते हैं। दो – अफगान सुरक्षाबल न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय सहयोग से अपने देश को सुरक्षा प्रदान कर सकें। तीन – अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के इस लक्ष्य को हासिल किया जाए कि वहां की 80 प्रतिशत आबादी को अगले चार साल में देश के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों तक लाया जाए। राष्ट्रपति ने इसके लिए योजना भी बनाई है। चार – अफगान नेतृत्व वाली सुलह-सफाई और शांति प्रक्रिया को समर्थन दिया जाए ताकि अभी युद्ध में उलझे सभी पक्ष बातचीत से समस्याएं हल कर सकें। इस शांति प्रक्रिया में अफगान सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ रहा तालीबान भी होगा। लेकिन इसमें काफी समय लगेगा, तब तक प्रतीक्षा करनी होगी जब तक अफगान सुरक्षा बल खुद अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं होते।

अब बात अफगानिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की नई पाकिस्तान नीति की जो इस बैठक से उभर कर सामने आई। बैठक में डनफोर्ड ने साफ तौर से माना कि पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकवादियों से रिश्ते हैं और वो अपनी अलग विदेश नीति चलाती है। जब उनसे पूछा गया कि आप आतंकवादियों के प्रति पाकिस्तान के रवैये में बदलाव कैसे ला सकते हैं तो उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुपक्षीय नीति अपनाई जानी चाहिए जिसमें एक तरफ 39 देशों का गठबंधन हो जो अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में पहले से सक्रिय है और दूसरी तरफ चीन भारत और रूस जैसे पड़ोसी देश हों जिनके इस क्षेत्र से राष्ट्रीय हित जुड़े हैं। ये सब देश अगर पाकिस्तान पर अपना राजनयिक और आर्थिक प्रभाव इस्तेमाल करें तो पाकिस्तान के रवैये में बदलाव लाया जा सकता है लेकिन फिलहाल मुझे ये मुश्किल ही लगता है। बहरहाल उन्होंने पाकिस्तान में बैठे अफगान तालीबान के आकाओं को संदेश दे दिया कि अमेरिका उन्हें फिर अफगानिस्तान में जड़ जमाने की अनुमति नहीं देगा।

डनफोर्ड ने आगे कहा कि अफगानिस्तान में आतंकवाद रोकने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बेहतर सीमा प्रबंधन होना चाहिए जो अभी नहीं है, लेकिन वो कुछ दिन पहले हुई पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा की अफगानिस्तान यात्रा से उत्साहित हैं जिसमें उन्होंने वहां के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से बातचीत की। इस बातचीत में अमेरिकी भी शामिल थे। जाहिर है जनरल बाजवा की अफगानिस्तान यात्रा कहीं न कहीं इस बात का संकेत भी है कि अमेरिकी चेतावनी के बाद पाकी सेना दबाव कम करने के लिए फौरी तौर पर कुछ कदम उठा सकती है।

जब एक सेनेटर ने जिम मैटिस से पूछा कि राष्ट्रपति टंªप ने कहा था कि वो अफगानिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान में नए दबाव डालेंगे तो इसका क्या अर्थ है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हम इसके लिए अंतराष्ट्रीय बिरादरी के साथ काम करेंगे जिसमें अफगानिस्तान में पहले से कार्यरत 39 देशों के साथ ही दक्षिण एशिया के देश, चीन और रूस आदि होंगे। ये बदलाव की रूपरेखा तय करेंगे। इसके बाद ऐसे राजनयिक और आर्थिक उपाय किए जाएंगे जिनका उपयोगी परिणाम निकले और पाकिस्तान को समझाया जा सके कि वो कैसे मौजूदा हालात से बाहर आ सकता हैं।

इस बैठक में मैटिस ने पाकिस्तान को एक और मौका देने की बात भी कही। जब सेनेटरों ने उनसे पूछा कि अगर इसका भी कोई असर नहीं हुआ तो फिर राष्ट्रपति ट्रंप क्या करेंगे? इसके उत्तर में उन्होंने गोलमाल जवाब दिया कि वो आतंकवाद समाप्त करने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। मैटिस ने ये भी स्पष्ट नहीं किया कि इस ‘मौके’ की समयसीमा क्या होगी? कहीं ये टंªंप का कार्यकाल खत्म होने तक तो चलता नहीं रहेगा?

इस बैठक में जो खास बातें उभर कर आईं उन्हें संक्षेप में इस प्रकार रखा जा सकता हैः एक – अमेरिका अफगान समस्या हल करना चाहता है, लेकिन इसकी जड़ में बैठे पाकिस्तान पर अभी कोई सीधी कार्रवाई के मूड में नहीं है, दो – कोई निर्णायक कदम उठाने से पहले वो पाकिस्तान को एक और अवसर देना चाहता है, इसकी समयसीमा भी तय नहीं है, तीन – अमेरिका को पता है कि आईएसआई के आतंकवादियों से रिश्ते हैं और वो अलग विदेशनीति चलाती है, चार – अमेरिका अभी अफगानिस्तान में तालीबान पर हमले की योजना नहीं बना रहा, वो अफगान सेना को मजबूत करना चाहता है ताकि वो खुद तालीबान से निपटे। अगर कोई आपातकाल हुआ तो बात अलग है, पांच – अमेरिका अफगानिस्तान में करीब 3,000 और सैनिक भेजेगा ताकि अफगान सुरक्षाबलों को अधिक सहयोग और प्रशिक्षण दिया जा सके, छह – अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ भारत, चीन समेत सभी क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट करना करना चाहता है ताकि पाकिस्तान पर राजनयिक और आर्थिक दबाव डाला जा सके, सात – अमेरिका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में बड़ी भूमिका निभाए और इसमें वो पाकिस्तान की इस आपत्ति को सही नहीं मानता कि भारत अफगानिस्तान में दखलअंदाजी कर रहा है। मूलतः अमेरिका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान के स्थायित्व में भूमिका निभाए। आठ – अमेरिका दक्षिण एशिया में आतंकवादी जमातों को समाप्त तो करना चाहता है लेकिन तालीबान से बातचीत में उसे कोई परहेज नहीं है बशर्ते वो अमेरिकी और अफगान शर्तों पर हो, नौ – तालीबान से क्या बात होगी, उसे सरकार और प्रशासन में हिस्सेदारी दी जाएगी या नहीं, ये अभी स्पष्ट नहीं है।

जाहिर है अमेरिका की पुरानी और नई अफगान-पाकिस्तान नीति में ज्यादा अंतर नहीं है, सिवाए इसके कि अब वो पाकिस्तान की हरकतों को लेकर ज्यादा आक्रामक और मुखर हो गया है और इस मसले में अन्य संबंधित देशों को भी शामिल करना चाहता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये शाब्दिक आक्रामकता कोई गुल खिलाएगी। फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता। 21 अगस्त को अपनी दक्षिण एशिया और अफगानिस्तान नीति की घोषणा करते समय ट्रंप ने जो तेवर दिखाए थे वो तीन अक्तूबर तक आते आते निःसंदेह ठंडे हो चुके हैं। इसके पीछे पाकिस्तान की दौड़-भाग का हाथ भी साफ नजर आता है। ट्रंप की नई नीति की घोषणा के साथ ही पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय हरकत में आ गया। उसके विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ताबड़तोड़ चीन, सउदी अरब, तुर्की आदि की यात्रा की। अमेरिका में तो उन्होंने बाकायदा हफ्तों तक अभियान चलाया और छोटे-बड़े थिंक टैंकों के अलावा विदेश सचिव रेक्स टिलरसन से भी मुलाकात की। ये बात अलग है कि टिलरसन ने उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया और दक्षिण एशिया में शांति लाने के लिए उपाय करने की सलाह दी। विशेष बात ये कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने आसिफ को भारत के साथ व्यापार करने के फायदे भी गिनवाए।

अमेरिका की नई नीति खुद उसके लिए और भारत के लिए कितनी कारगर होगी इसके लिए उसे हमें कई कसौटियों पर कसना होगा।
पहली कसौटी तो ये कि क्या अमेरिका आतंकवादियों और विशेषकर भारत के खिलाफ लड़ने वाले आतंकवादियों के खिलाफ सीधे कार्रवाई के लिए तैयार है? इसका उत्तर है नहीं। ये सही है कि अमेरिका अब आतंकवादी पनाहगाहों को लेकर पाकिस्तानी तर्क मानने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन ये भी सच है कि अगस्त में ट्रंप की घोषणाओं ने पाकिस्तान और आतंकवादी कैंपों में जो खौफ पैदा किया था उसका असर अब खत्म कर चुका है। अमेरिका मानता है कि पाकिस्तान में आतंकियों की पनाहगाहें हैं, लेकिन उनके खिलाफ उसका कोई सैन्य एक्शन प्लान नहीं है। वो अपने सहयोगियों और क्षेत्रीय ताकतों को साथ लेकर पाकिस्तान पर राजनयिक और आर्थिक दबाव डालने की बात करता है। इन क्षेत्रीय ताकतों में भारत के अलावा रूस और चीन भी हैं जिनसे फिलहाल पाकिस्तान के खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। भारत में आतंक फैलाने वाली आतंकी तंजीमों का अमेरिका उल्लेख तो करता है और उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाहियों में भारत का सहयोग भी करता है, लेकिन इसका पाकिस्तान पर कोई खास असर नहीं होता दिखता। अब तो हालात ये हो गए हैं कि पाकिस्तानी सेना इन तंजीमों को राजनीतिक दलों में बदल कर इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलवाने का षडयंत्र करने लगी है। हाल ही में पाकिस्तान में डायरेक्टर जनरल, आईएसपीआर (इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस), मेजर जनरल आसिफ गफूर से जब हाफिज सईद द्वारा राजनीतिक दल बनाए जाने के बारे में सवाल पूछा गया तो उसने दो टूक जवाब दिया कि पाकिस्तान में हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने की आजादी है। उसने खुलेआम ये भी माना है कि आईएसआई के आतंकी गुटों से संपर्क हैं।

दूसरी कसौटी ये है कि क्या अमेरिका अभी या निकट भविष्य में उस अफगान तालीबान के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए तैयार है जिसने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है और जिसके आका पाकिस्तान में रहते हैं और आईएसआई से निर्देश लेते हैं? इसका उत्तर भी है नहीं। इसके विपरीत अमेरिका पाकिस्तान के उस तर्क से सहानुभूति रखता नजर आता है कि खुद पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है। वो तो पाकिस्तान को एक और मौका भी देना चाहता है। पाकिस्तान दुनिया भर में ये कहता फिरता है कि उसने अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जबकि सच तो ये है कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में जो लड़ाई लड़ी, उसका असली मकसद अमेरिका का समर्थन करना या उसके हाथ मजबूत करना नहीं बल्कि अफगानिस्तान में अपनी मनपंसंद की कठपुतली सरकार स्थापित करना था। जब अफगानिस्तान में रूसी सेना घुसी तो पाकिस्तान ने उसे बाहर करने में बढ़ चढ़ कर अमेरिका का साथ दिया और इसमें उसका साथ दिया तालीबान ने। ध्यान रहे, रूसी सेना के पलायन के बाद अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार बनी जिसे सबसे पहले पाकिस्तान ने ही मान्यता दी।

आज भारत में बहुत कम लोगों को तालीबान का इतिहास याद होगा और उन्हें शायद ही स्मरण होगा कि स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो को ‘तालीबान की मां’ के रूप में जाना जाता है। पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार अहमद राशिद की किताब ‘द तालिबानः आॅयल एंड द न्यू ग्रेट गेम इन संेट्रल एशिया’ में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।

डोनाल्ड ट्रंप की नई दक्षिण एशिया – अफगान नीति के बारे में अंततः यही कहा जा सकता है कि उनकी मंशा तो सही है और वो इसके लिए सालाना एक अरब डाॅलर अतिरिक्त खर्च करने के लिए भी तैयार हैं लेकिन वो आखिरकार अमेरिकी आॅक्टोपस (अमेरिका में सैन्य और औद्योगिक गठबंधन को आॅक्टोपस कहा जाता है), सउदी अरब और पाकिस्तान के पुराने त्रिकोण में फंस कर रह गए हैं जिसमें अब चीन भी जुड़ गया है। अगर ट्रंप वास्तव में पाकिस्तान से आतंकी पनाहगाहों को हटाने को लेकर गंभीर होते तो अपने सभी वरिष्ठ सहयोगियों की राय के खिलाफ ईरान समझौते को तोड़ने की आत नहीं करते। बल्कि इसकी जगह भारत की मदद से चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान के लिए नए सप्लाई रूट ढूंढ रहे होते। दुनिया में और विशेषकर पाकिस्तान में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए सउदी अरब ने सबसे ज्यादा धन लगाया है। लेकिन उस पर उंगली उठाने की जगह वो उसे अरबों डाॅलर के हथियार बेच रहे हैं और ईरान को आंखें दिखा रहे हैं। ये अजीब बात है कि जो पाकिस्तान 200 से ज्यादा परमाणु बम और घातक मिसाइलों बना चुका है, उसे तो ट्रंप प्रशासन एक और ‘मौका’ देने की बात कर रहा है और जिस ईराने ने अभी एक बम भी नहीं बनाया, उसे तबाह करने की धमकी दी जा रही है। लश्कर ए तौएबा, जैश ए मौहम्मद और हिजबुल मुजाहीदीन जैसी भारत विरोधी आतंकी तंजीमों के खिलाफ भी उनका रवैया जबानी जमाखर्च से ज्यादा नहीं है। जाहिर है भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। भारत को भी ट्रंप को अफगानिस्तान में मुफ्त समर्थन नहीं देना चाहिए, अपनी शर्तें साफ कर देनी चाहिए।

ट्रंप द्वारा नई नीति की घोषणा के बाद पाकिस्तान ने इस नीति की शिल्पकार मानी जाने वाली एलिस वेल्स की यात्रा रद्द कर दी थी। वो अमेरिकी विदेश विभाग में अफगानिस्तान और पाकिस्तान क्षेत्र के लिए विशष प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत हैं। अक्तूबर के अंत तक अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और फिर रक्षा मंत्री जिम मैटिस पाकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे। कहा जा रहा है कि वो पाकिस्तान को ‘सख्त संदेश’ देंगे। लेकिन अब तक के हालात से तो ऐसा नहीं लगता। दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद फैलाने वाले जिस पाकिस्तान को तुरंत सजा दी जानी चाहिए थी, उसे जिम मैटिस एक और ‘मौका’ देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान फिर बच जाएगा? क्या अमेरिका सिर्फ गाल बजा कर रह जाएगा?