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हाशिमपुरा नरसंहार और कांग्रेसी ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ in Punjab Kesari

करीब 31 साल बाद 31 अक्तूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाशिमपुरा नरसंहार मामले में 16 पीएसी जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इससे पहले निचली अदालत ने इन्हें बरी कर दिया था। क्रूरता की पराकाष्ठा माने जाने वाले इस कांड में 42 मुस्लिम मारे गए थे। एक साक्ष्य के अनुसार मेरठ दंगों के समय पीएसी ने हाशिमपुरा से एक ट्रक में 40 – 45 लोगों को अगवा किया गया था और इनमें से 42 को गोलियां मारकर मुरादनगर गंगनहर में फेंक दिया गया था।

इस मामले का लगभग हर विवरण अखबारों में छप चुका है। लेकिन जो बात नहीं छपी वो ये कि जब ये कांड हुआ तब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और खुद को स्वतंत्रता सेनानी बताने वाले वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे। आश्चर्य की बात है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को पानी पी पी कर दिन रात कोसने वाली कांग्रेस हाशिमपुरा पर खामोश रही। न तो सोनिया गांधी और न ही राहुल गांधी ने इसके लिए देर से ही सही, माफी मांगी और न ही अफसोस जताया। अखलाक की मौत पर टसुए बहाने वाली मोमबत्ती ब्रिगेड भी नदारद रही। लगता है जैसे सबको सांप सूंघ गया।

दंगों के प्रति कांग्रेस, उसकी मोमबत्ती ब्रिगेड और ‘असहिष्णुता गैंग’ का नजरिया हमेशा से दोगला रहा है। जहां कांग्रेसी या उनके सहयोगी फंसते नजर आते हैं, वहां ये मुंह फेर लेते हैं और मुंह में सोंठ डाल कर बैठ जाते हैं, लेकिन मोदी सरकार को ये उन घटनाओं के लिए भी बदनाम करते हैं और घेरने के लिए तैयार हो जाते हैं, जहां उसका दोष तक नहीं होता। इस गैंग ने भारत में मुसलमानों की माॅब लिंचिंग के चुनींदा मामलों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत जोर-शोर से उछाला और इसका आरोप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी सरकार पर लगाया हालांकि ये एक भी मामले में इनका हाथ साबित नहीं कर पाए। वैसे भी ये कानून-व्यवस्था के मामले हैं जो केंद्र सरकार नहीं, राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

ये संयोग ही था कि जिस दिन हाशिमपुरा मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया, ठीक उसी दिन इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी थी। ये दिन भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जन्मजयंती का भी था। इस दिन एक ओर तो प्रधानमंत्री मोदी सरदार पटेल की मूर्ति का लोकार्पण कर रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस इंदिरा गांधी को शहीद बताते हुए उन्हें याद न करने के लिए मोदी को कोस रही थी। इंदिरा को शहीद मानना य न मानना, कांग्रेस की अपनी मर्जी है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो सीमा पर लड़ते हुए शहीद हुईं थीं? नहीं। असल में वो अपने ही बुने हुए उस राजनीतिक जाल में फंस गईं थीं जो उन्होंने पंजाब में अकालियों को घेरने के लिए बुना था। उन्होंने अपनी विभाजनकारी राजनीति की कीमत चुकाई थी। उन्होंने ऐसा ही खेल श्रीलंका में भी खेला था जिसका खामीयाजा अंत में उनके पुत्र राजीव गांधी को जान दे कर चुकाना पड़ा। वैसे कांग्रेसियों से ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि यदि इंदिरा ‘शहीद’ थीं तो उन हजारों सिखों का क्या जो उनकी हत्या के बाद फैले दंगों में मारे गए और जिनके परिजनों को आज तक न्याय नसीब नहीं हुआ।

खुद को ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ और ‘भारत की बहुलता’ का संरक्षक बताने वाली कांग्रेस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को ‘अल्पसंख्यक विरोधी’, ‘विभाजनकारी’ और ‘सांप्रदायिक’ आदि बताती है, लेकिन कभी अगर उसने आइना देखा होता या अपने गिरेबान में झांक कर देखा होता तो उसे अपनी असलियत बखूबी पता होती। आज वो ‘अल्पसंख्यकों के संरक्षण’ के नाम पर पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी संगठन से सहयोग कर रही है और ‘देश की बहुलता’ के नाम पर राष्ट्रविरोधी नक्सलियों से हाथ मिला रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राज बब्बर तो नक्सली आतंकियों को क्रांतिकारी और उनके खूनी खेल को ‘हक की लड़ाई’ बताते हैं। वहीं उसके एक अन्य नेता अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में दुर्दांत नक्सलियों का मुकदमा लड़ रहे हैं।

वैसे इस्लामिक आतंकियों को तुष्ट करने की कांग्रेसी नीति भी आश्चर्यजनक नहीं है। आजादी के बाद जब सरदार पटेल ने भारत में रह गए मुसलमानों से भारत के प्रति वफादार होने की बात कही तो जवाहरलाल नेहरू ने उनकी शिकायत महात्मा गांधी से कर दी। नेहरू नहीं चाहते थे कि किसी मुसलमान से भारत के प्रति वफादार होने की उम्मीद की जाए। आगे चलकर हम देखते हैं कि कांग्रेस ने न तो मुस्लिम पर्सनल लाॅ को ही हाथ लगाया और न ही कभी उनसे ये उम्मीद की या उन्हें कहा कि वो भारत और इसके संविधान के प्रति आस्था रखें। क्या ‘उदारवाद’ और ‘बहुलता का सम्मान‘ करने का अर्थ ये होना चाहिए कि मुसलमानों से देश और उसके संविधान के प्रति निष्ठा की अपेक्षा भी न की जाए और उनमें पनप रहे अतिवादी और आतंकवादी तत्वों को नजरअंदाज किया जाए? इसे अंधा तुष्टिकरण न कहा जाए तो और क्या कहा जाए?

एक परिवार के आसरे पलने वाली कांग्रेस को आजकल बड़ी परेशानी है कि भाजपा सरदार पटेल को क्यों बढ़ावा दे रही है। क्या उसे ये याद दिलाना होगा कि सरदार ने भारत को एकजुट किया जबकि नेहरू ने सत्ता की हवस में देश के विभाजन को बढ़ावा दिया। यही नहीं उन्होंने देश को कश्मीर की समस्या दी। हाथ में आई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट चीन को भेंट कर दी और तिब्बत पर चीन का वर्चस्व खुशी-खुशी स्वीकार किया। नेहरू एक तरफ तो खुद को जनवादी वामपंथी बताते थे तो दूसरी तरफ उन्होंने देश पर अंग्रेजी थोप दी जिसे एक प्रतिशत लोग भी नहीं समझते थे। नेहरू के वामपंथी रूझानों ने देश के विकास को इस मूर्खतापूर्ण विचारधारा का बंधक बना दिया और निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों को खलनायक जिसने अंततः उद्यमिता को ही कुंठित किया। सेना के प्रति नेहरू की नफरत की कीमत भी भारत ने 1962 में चुकाई जब चीन ने देश के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया।

कांग्रेस ने लंबे अर्से तक देश में शासन किया और बच्चों को वहीं इतिहास पढ़ाया जिसमें नेहरू और उसके वंशजों को महिमामंडित किया गया। लेकिन आज के वाई-फाई युग के युवा और बच्चे उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वो पूछते हैं कि इस्लामिक आतंकियो और नक्सलियों से सहयोग करने वाले राहुल गांधी ‘राष्ट्रवादी’ कैसे और क्यों हो सकते हैं? वो जानना चाहते हैं कि अपनी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सोनिया गांधी ने नक्सलियोें को क्यों जगह दी? वो पूछते हैं कि अगर नेहरू धर्मनिरपेक्ष थे तो उन्होंने धर्म के आधार पर बंटवारा क्यों स्वीकार कर लिया?

वो जब इंटरनेट पर भारत में दंगों का इतिहास खंगालते हैं तो पता लगता है कि सबसे बड़ी विभानकारी दंगा पार्टी तो कांग्रेस ही है। अगर नेहरू सत्ता की भूख पर काबू रखते तो शायद विभाजन टल सकता था और साथ ही टल सकती थी मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी जिसमें बीस लाख लोग मारे गए और करोड़ों विस्थापित हुए। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता संभाली और साथ ही दंगों की सरपरस्ती भी।

कांग्रेस के शासन में हुए कुछ दंगों की बानगी देखिए – रांची दंगे (वर्ष – 1967, मृतक – 184), गुजरात दंगे (वर्ष – 1969, मृतक – 512), मुरादाबाद दंगे (वर्ष – 1980, मृतक – 400), नेल्ली, असम दंगे (वर्ष – 1983, मृतक – 2191, गैरसरकारी अनुमान – 10,000), भिवंडी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 278), सिख विरोधी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 2,800, गैरसरकारी अनुमान – 5,000), अहमदाबाद दंगे (वर्ष – 1985, मृतक – 275), मेरठ दंगे (वर्ष – 1987, मृतक – 346), भागलपुर दंगे (वर्ष – 1977, मृतक – 1,000)। ये तो सिर्फ बानगी है, केंद्र और विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों की सूची बहुत लंबी और वीभत्स है। अगर हम हरेक दंगे के कारणों का विश्लेषण करने बैठें तो आपको ऐसी-ऐसी बातें पता चलेंगी की आपको देश की इस सबसे पुरानी दंगा पार्टी से नफरत हो जाएगी और आप आगे से इसे वोट देने से पहले कई मर्तबा सोचेंगे।

हाशिमपुरा दंगों पर आए फैसले के बहाने हमने कांग्रेस की सोच और उसके शासनकाल में हुए दंगों पर एक नजर डाली। अब आप ही सोचिए कि जब दंगे हुए होंगे तो हर धर्म के लोग मारे गए होंगे। इन दंगों को हवा देने वाली पार्टी न तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ हो सकती है और न ही ‘राष्ट्रवादी’, उसका तो सिर्फ एक ही लक्ष्य है – भले ही भारतीयों की लाशें बिछानी पड़ें पर सत्ता मिलनी चाहिए। इसलिए हम इसे सिर्फ ‘सत्तावादी’ पार्टी कहेंगे।