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“भारत से रिश्तों की कीमत चुकानी होगी इमरान को” in Punjab Kesari

इमरान खान ने अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ भी नहीं ली थी कि भारत में उनकी विदेश नीति के बारे में कयास लगने शुरू हो गए थे। चुनावी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी का यार और गद्दार तथा मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताने वाले इमरान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले ही संबोधन में भारत के साथ व्यापार की इच्छा जता दी। ऐसा उन्होंने शायद इसलिए किया कि दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को अपना वजूद बनाए रखने के लिए भारत से व्यापार करना बेहद जरूरी है।

इसपर पाकिस्तान में बवाल मच गया है। नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज ने सवाल उठाया है कि जब नवाज भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों की बात की तो उन्हें कौम का गद्दार करार दे दिया गया, आज अगर वही बात इमरान कह रहे हैं तो वो देशभक्त कैसे हो गए? आपको याद दिला दें कि नवाज पाकिस्तानी सेना की राय के खिलाफ मोदी के शपथग्रहण समारोह में आए थे। ये सेना को बहुत नागवार गुजरा था। इसके बाद मोदी जब उनके जन्मदिन पर अचानक उनके घर पहुंच गए तो उसके बाद तो उनके खिलाफ सेना के मीडिया नेटवर्क ने धुंआधार दुष्प्रचार ही शुरू कर दिया। उन्हें मोदी का यार और देश का गद्दार साबित करने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि बहुत से पूर्व जनरल टीवी बहसों में अब खुलेआम ये मानने लगे हैं कि ये निहित स्वार्थों द्वारा चलाया गया प्रायोजित दुष्प्रचार था जिसमें कोई तथ्य नहीं था।

बहरहाल ये बात ध्यान में रखनी होगी कि पाकिस्तान की भारत नीति का निर्धारण इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय में होता है। भारत में हम भले ही इमरान खान को लेकर कितनी ही चर्चा करें, लेकिन असलियत यही है कि जब तक पाकिस्तानी सेना नहीं चाहेगी, पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ इस संबंध में भारत की भी शर्तें होंगी ही। देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देगा या अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग उपलब्ध करवाएगा?

वैसे तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कई बार भारत के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जता चुके हैं और जब वो इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू से मिले तो उन्होंने एक बार फिर रिश्तों में बेहतरी की इच्छा जताई। लेकिन मोदी सरकार के लिए बाजवा की ‘इच्छा’ का कोई मतलब नहीं है। सरकार तो यह जानना चाहती है कि बाजवा की सेना ने भारत के खिलाफ जो मोर्चे खोले हुए हैं, उनमें जमीनी स्तर पर कितनों को बंद किया गया है, या कटौती की गई है।

सिद्धू, बाजवा की बातों से इतने भावविभोर हो गए कि उनके गले लग गए। लेकिन क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि वो उसी पंजाब में खालिस्तान और आतंकवाद की आग क्यों भड़का रहे हैं, जिसमें वो मंत्री हैं? क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने पाकी सेना को कश्मीर में रिहायशी ठिकानों पर हमला करने और निर्दोष नागरिकोें को मारने का आदेश क्यों दिया? जब बाजवा चिकनी चुपड़ी-बाते कर रहे थे तब क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पूरे भारत में जो जाल बिछा रखा है और वो जिस तरह यहां अलगाववाद की आग भड़का रही है, उसे कब बंद किया जाएगा?

सिद्धू को लगा कि करतारपुर लंगा खोलने की बात कह कर बाजवा ने सिखों पर बड़ा उपकार कर दिया। क्या उन्हें पलट कर बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि पाकिस्तानी गुरूद्वारों के दर्शन के लिए जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को आईएसआई के गुर्गे कब खालिस्तान के लिए भड़काना बंद करेंगे? कब बाजवा ‘रेफरेंडम 2020’ का राग बंद करेंगे और कब कनाडा, इंग्लैंड आदि में सिखों के गुरूद्वारों में दुष्प्रचार बंद करेंगे? हम एक बार को मान भी लें कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन खालिस्तान का क्या? नक्सलियों, इस्लामिक अलगाववादी संस्थाओं को दी जा रही सहायता का क्या?

इमरान के प्रति सिद्धू का लगाव और भारत में सिद्धू का विरोध होने पर इमरान का उनके बचाव में सामने आना समझा जा सकता है, लेकिन सवाल सिर्फ उनकी सदाशयता और नेकनीयति का नहीं है। इमरान को समझना होगा कि सिद्धू का विरोध करने वाले पाकिस्तान से दोस्ती के विरोधी नहीं हैं। वो दोस्ती के नाम पर भावविभोर हो अंधे हो जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि असली सवाल तो पाकिस्तानी सेना के रवैये में बदलाव का है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक समझती है और जिसका लक्ष्य है – ‘गजवा ए हिंद’ यानी हिंदुस्तान पर जीत। बेनजीर भुट्टो ने एक बार हिम्मत करके कहा था कि वो कश्मीर को भारत-पाक रिश्तों के बीच नहीं आने देंगी, लेकिन उनका क्या हश्र हुआ? उन्हें मरवा दिया गया। जब उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार थी, तब भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर फैसला भी हो गया था, लेकिन वो कौन लोग थे जिन्होंने अंतिम क्षण में इसे रूकवा दिया? नवाज शरीफ ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर समझौता किया ताकि आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सके, उसका भी क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। नवाज ने तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत में आतंकी भेजने पर भी सवाल उठाया, लेकिन सब जानते हैं, उन्हें गद्दार करार दिया गया।

इमरान ने अभी तक सेना की किसी भी नीति के खिलाफ चूं तक नहीं की है। उन्होंने तोे कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को सरेआम ‘आजादी की लड़ाई’ करार दिया है। मतलब साफ है, पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी भेजता रहेगा। इमरान खान की दूसरी बड़ी परेशानी ये है कि सेना के पूरे समर्थन के बावजूद उन्हें अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। उन्हें दूसरी छोटी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में वो चाहंे भी तो भारत-पाक संबंधों पर नवाज शरीफ जैसे खुल कर कोई राय नहीं जाहिर कर सकते। वैसे भी उनसे ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो सेना की कभी मुखालफत करेंगे क्योंकि उनकी पूरी पृष्ठभूमि ही सेना की है। उनका संबंध उस जनरल नियाजी से है जिसने बांग्लादेश में समर्पण किया था। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, सूचना मंत्री फवाद चैधरी, पेट्रोलियम मंत्री गुलाम सरवर खान जनरल परवेज मुशरर्फ के जमाने में मंत्री रह चुके हैं। उनके वित्त मंत्री असद उमर के पिता सेना के सेवानिवृत्त अफसर हैं। इमरान की कैबिनेट में मुशरर्फ के जमाने के इतने मंत्री हैं कि लोग पूछने लगे हैं कि जब ये लोग मुशरर्फ को कामयाब नहीं कर सके तो उन्हें क्या करेंगे।

मुंबई में हमलों के समय इमरान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी मुंबई में ही थे। उन्हें पाकिस्तानी सेना की हरकतें, देश की आर्थिक स्थिति, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंध, अमेरिकी दबाव, भारत के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और ईरान के साथ तल्ख संबंध, चीन की पैंतरेबाजी, सबका अहसास है। उन्हें पता है कि भले ही इमरान, मोदी जैसे विदेशी ताकतों से बराबरी के आधार पर संबंधों की बात करें, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि दुनिया की ताकते उन्हें वो इज्जत बख्शें जिसकी वो ख्वाहिश कर रहे हैं। वो इमरान को प्रधानमंत्री मोदी के पत्र का हवाला देते हुए भारत के साथ ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ की बात करते हैं। वो कहते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सामने बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बार तो उन्होंने ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ का गलत अर्थ निकाल लिया था और एलान कर दिया था कि भारत ने बातचीत का न्यौता भेजा है। लेकिन जल्द ही भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इसका मतलब ‘काॅम्प्रिहेंसिव डायलाॅग’ नहीं। वो नई सरकार की नीतियों और जमीन पर हालात का गंभीरता से जायजा ले रहा है और उसके बाद ही इस संबंध में कोई फैसला हो सकता है। हां, भारत, पाकिस्तान से संबंध पूरी तरह तोड़ेगा नहीं, दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री सर्विसेस, सुरक्षा सलाहकार आदि बातचीत करते रहेंगे, लेकिन भारत पाकिस्तानी घुसपैठ का जवाब पहले जैसे देता रहेगा।

कुरैशी से जब ये पूछा गया कि क्या वो सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भेंट करेंगे तो वो इसका उत्तर टाल गए। जाहिर है, अभी ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है, बाद में होगा, तो देखा जाएगा। छह सितंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मेटिस भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 वार्ता करेंगे। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है। देखना दिलचस्प होगा कि वो इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा से क्या बात करते हैं। कुरैशी अमेरिका के साथ ‘गलतफहमियों’ को बराबरी की सतह पर बात कर दूर करना चाहते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख रह चुके पाॅम्पिओ को इमरान और बाजवा कितना आश्वस्त कर पाते हैं, इस पर सबकी निगाह रहेगी। पर पाॅम्पिओ और इमरान की टेलीफोन पर हुई बातचीत में आतंकवाद पर चर्चा को लेकर जो झड़प हुई है और जैसे अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से अफगानिस्तान में आतंकवाद को लेकर तकाजे कर रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अमेरिका इमरान को मनमांगी मुराद नहीं देगा।

कुल मिलाकर अभी जो हालात हैं, उनमें कहा जा सकता है कि जब तक पाकी सेना भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती, भारत को इमरान से बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, भले ही वो इसके लिए कितना ही जोर दे। इमरान को समझना होगा कि अब भारत में मोदी सरकार है, मनमोहन सरकार नहीं जिसके राज में आतंक और झप्पियां एक साथ चला करते थे। उन्हें अगर भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने हैं तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।