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‘मी टू’ और रिवर्स तालीबनाइजेशन का खतरा in Punjab Kesari

‘मी टू’ के कारण समाज में जैसे भूचाल आ गया है। ऐसे मौके पर हिंदी फिल्म दाग के गाने का मुखड़ा याद आता है – जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। कब कहां किसका असली चेहरा बेनकाब होगा, किसका मुखौटा नोच फेंका जाएगा, हर ओर भय मिश्रित आशंका है। लोग अपने नजदीकी रिश्तेदारों को भी संदेह की नजर से देखने लगे हैं। अधिसंख्य लोग इसे आधुनिक भारतीय नारी के साहस और संघर्ष का प्रतीक मान रहे हैं। जब अमेरिका में ‘मी टू’ का बवंडर उठा था तो यहां लोगों ने सोचा था कि भारत में ऐसा कुछ होना असंभव है क्योंकि भारतीय नारी भले ही कितनी आधुनिक क्यों न हो वो ऐसे विषय सार्वजनिक रूप से नहीं उठाएगी क्योंकि इससे कहीं न कहीं उसकी खुद की छवि भी धूमिल होगी।

लेकिन अंततः हमने देखा कि भारत भी ‘मी टू’ तूफान से अछूता नहीं रहा। टेलीविजन और फिल्मों से शुरू हुआ ये अभियान आखिरकार विश्वविद्यालयों, मीडिया से होता हुआ राजनीति तक भी पहुंचा और इस चक्कर में विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर और एनएसयूआई अध्यक्ष फिरोज खान को अपनी गद्दी भी गंवानी पड़ी। कांग्रेस ने अगर अकबर का मामला उठाया तो भारतीय जनता पार्टी ने राहुल पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली सुकन्या देवी, सेक्स सीडी कांड में फंसे अभिषेक मनु सिंघवी और संदिग्ध हालात में मारी गई शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का मामला जोर-शोर से उठाया। इस बीच महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सभी राजनीतिक दलों को सुझाव दे डाला कि वो महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों की जांच के लिए प्रकोष्ठ बनाएं ताकि काॅरपोरेट सेक्टर जैसे उनके यहां भी ऐसे मामलों की सुनवाई हो सके और पीड़िताओं को न्याय मिल सके।

आधुनिकता का सारा दर्शन, राजनीति, सुझाव और सुझाव देने वाली समिति का विचार एक तरफ, ये पूरा प्रकरण कई अन्य गंभीर सवाल भी उठाता है। कुछ लोग इसे पुरूषवादी सोच कह सकते हैं लेकिन चाहे एससी-एसटी एक्ट का मामला हो या दहेज कानून के सख्त प्रावधानों का, स्वयं सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि बिना पर्याप्त आधार के, महज शिकायत की बिना पर किसी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहां तो हम देखते हैं कि कथित आरोपियों का पूरा का पूरा मीडिया ट्रायल चल रहा है। कानून का एक नियम है – जब तक व्यक्ति दोषी न साबित हो, वो निर्दोष है। यहां तो पुलिस में एफआईआर भी दर्ज नहीं होती और महज एक सोशल मीडिया पोस्ट के बूते पर व्यक्ति का मानमर्दन आरंभ हो जाता है, सुर्खियां बन जाती हैं, लोग चटखारे ले-ले कर चर्चा शुरू कर देते हैं।

ऐसे में सहज ही ये विचार आता है कि इस पूरी कार्यवाही का उद्देश्य आखिर क्या है – भड़ास निकालना, समाज को सतर्क करना, न्याय पाना, किसी को लांछित करना, बदला लेना या सिर्फ विवाद खड़ा करना? गंभीरता से सोचें तो ‘मी टू’ से किसी को शीघ्रता से न्याय मिलने की अपेक्षा करना तो उचित नहीं होगा, हां इससे बदला अवश्य लिया जा सकता है, किसी को बदनाम अवश्य किया जा सकता है, अगर कोई सोचता है कि विवाद खड़ा करके और सुर्खियां बटोर कर न्याय हासिल किया जा सकता है, तो ये व्यर्थ ही होगा। न्याय तो फिर भी स्थायी संतोष दे सकता है, सुर्खियों का क्या? आज हैं, कल नहीं।

भारतीय इतिहास में ‘नो मी नाॅट’ के असंख्य प्रसंग हैं जब हमारी बहादुर नारियांे ने अत्याचारियों का जमकर प्रतिकार किया और जरूरत पड़ी तो मौत को भी गले लगाया। चाहें रामायण हो या महाभारत, भारत के इन दोनों प्रमुख महाग्रंथों के मूल में नारी ही है। रामायण में रावण के आतंक के बावजूद सीता हार नहीं मानतीं, वहीं महाभारत में दुर्योधन के दंभ और लिप्सा के कारण चीरहरण का शिकार होने वाली द्रौपदी आखिरकार बदला लेकर ही रहती हैं। सवाल ये उठता है और ये निःसंदेह बड़ा सवाल है कि आज ‘मी टू’ के तहत सामने आने वाली महिलाएं तब क्यों नहीं बोलीं जब उनके साथ कथित तौर पर ज्यादती की जा रही थी? अगर वो तब आवाज उठातीं, तो संभव है वो कुछ और महिलाओं को भी कथित खलनायक का शिकार होने से बचा पातीं? जिस समय इनके साथ कथित ज्यादती हुई, तब ज्यादातर महिलाएं व्यस्क थीं, पढ़ी-लिखी थीं, पूरे होशो-हवास में थीं कि ज्यादती का तुरंत विरोध करतीं। अगर इन्हें वास्तव में ‘ज्यादती’ इतनी बुरी लग रही थी तो इन्होंने उसी समय तुरंत उस व्यक्ति का झापड़ क्यों नहीं रसीद किया या थाने जा कर रिपोर्ट नहीं लिखवाई? हम ये नहीं कहते कि ये महिलाएं खुद्दार नहीं हैं, लेकिन क्या किसी खुद्दार महिला को तुरंत प्रतिकार नहीं करना चाहिए? उसे बीस साल तक क्यों इंतजार करना चाहिए?

अगर कोई नासमझ बच्ची अपने साथ हुई ज्यादती का व्यस्क होने पर खुलासा करे तो समझ में आता है कि जब उसके साथ गलत हरकत हुई, तब शायद उसे उसका अर्थ भी नहीं मालूम था, लेकिन पूर्णतः शिक्षित, व्यस्क, खुद के आधुनिक होने का दावा करने वाली महिलाएं बीस साल बाद नींद से जागें तो थोड़ा अजीब लगता है। इन महिलाओं की मंशा पर भी संदेह पैदा होता है।

इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो के फिल्मी किस्सों से लेकर आधुनिक फिल्मी पत्रिकाओं तक, ऐसे बेशुमार किस्से हमारे आपके सामने से गुजरे होंगे। कभी इसे ‘फेवर’ बोला गया तो कभी ‘कास्टिंग काउच’। जब तक निभे तब तक ‘लिव इन’, जब बिगड़े तो ‘बलात्कार’। आधुनिक भारत में स्त्री-पुरूष संबंधों में ‘नई सोच’ और ‘आक्रामक महिला समर्थक’ कानूनों ने नए आयाम जोड़े हैं। सेक्स से जुड़ी नैतिकता की पुरातनपंथी मान्याताएं लगभग हवा हो चुकी हैं। पहले जहां पुरूष बादशाह होता था वो अब ‘रिसीविंग एंड’ पर आ गया है।

समाज आज शायद ये समझ नहीं पा रहा, कि पहले आक्रामक महिला समर्थक कानूनों और अब ‘मी टू’ जैसे अभियानों के कारण आम महिलाओं की मुश्किलें कितनी बढ़ गईं हैं। कभी आपने गौर किया कि अचानक ऐसी संस्थाओं की संख्या कितनी बढ़ गई है जिसमें सिर्फ पुरूषों को काम दिया जाता है और महिलाओं के लिए दरवाजे सदा के लिए बंद कर दिए गए हैं। ये एक किस्म का ‘रिवर्स तालिबनाइजेशन’ हो रहा है। पुरूषों और महिलाओं के बीच सहजता तेजी से खत्म होती जा रही है। महिलाओं के लिए अवश्य ही सुरक्षित माहौल होना चाहिए, लेकिन पुरूषों का क्या? एक शिकायत के बाद उन्हें जेल भेज देना चाहिए या एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनके जीवन भर के यश को मिट्टी में मिला देना चाहिए? सेक्स एक स्वाभाविक-प्राकृतिक भावना है। कभी किसी ने सोचा कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो स्त्री और पुरूष कैसे अपनी भावना की अभिव्यक्ति कर पाएंगे? ऐसे बंद समाज के क्या दीर्घकालिक परिणाम होंगे?

न तो हम महिलाओं पर ज्यादतियों का समर्थन करते हैं और न ही उनकी न्याय की आकांक्षा का, लेकिन हम कानूनों का दुरूपयोग रोकने के पक्ष में अवश्य हैं। भारत के लगभग हर सरकारी विभाग और काॅरपोरेट में ऐसे प्रकोष्ठ बनाए गए हैं जहां महिलाएं ज्यादतियों की शिकायत कर सकती हैं, लेकिन आश्यर्य है कि दुनिया को जागरूक बनाने का दावा करने वाले मीडिया में ऐसे प्रकोष्ठ देखने को नहीं मिलते। यही हाल फिल्म और टीवी जगत का भी है। बेहतर होगा कि वहां भी परिस्थितियों के अनुसार ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं। महिलाओं को सुरक्षा तो मिले ही, लेकिन मिथ्या आरोप लगाने वाली महिलाओं को सजा और पुरूषों को हर्जाना भी मिले।

“#MeToo: Keeping silent v/s staying woke” in TOI Blogs

Legend it that the fate of truth and lie was irrevocably met with, on one fine day.

The lie says to the truth, “It’s a marvellous day today!”

Truth looks up to the skies and sighs, for the day was really beautiful.

They spend a lot of time together, ultimately arriving beside a well.

The lie tells the truth: “The water is very nice let’s take a bath together!”

The truth tests the water and discovers that it indeed is very nice.

They undress and start bathing. Suddenly the Lie comes out of the water, puts on the clothes of truth and runs away. The furious truth comes out of the water and runs everywhere to find the lie and get her clothes back.

The world, seeing the truth naked; turns its gaze away, with contempt and rage. The poor truth returns to the well and disappears forever, hiding therein, its shame.

Since then the lie travels the world dressed as truth, satisfying the needs of the society, because the World in any case, harbours no wish at all to meet the naked truth. (excerpt taken from The Speaking Tree)

In the light of the #MeToo movement that has taken the nation by storm, truth and lie have become the two most talked of participants. Anyone who has seen Akira Kurosawa’s Rashomon would understand how truth is a VIBGYOR and each colour has a story to tell. The allegations seem to be just about as complex. However, just the fear of false allegations should not hold us back, from instilling the fear of crime abetted. The crime of violating consent, misconduct, gangrapes are the most heinous and deserve to be brought to book at all costs.

Karl Marx and his sympathisers relegated women to the second or the lesser sphere and believed that in the scheme of things, women must become forbearers of this lesser sphere. They were to do their duty diligently and produce a score of children (read men) who would then go on to build an indestructible workforce or at least a Reserve Army. However convenient the explanation seemed for years gone by, women’s role in the society has transcended the sphere of being a child making factory. The new age workforce is a slap on the face of misogynistic societies. A transition is actively shaping up and therefore causing inconvenience to years of imbalanced power rhetoric. Women have come to occupy important roles in a plethora of professional spheres and are comfortably outdoing the age-old stereotypes.

The #MeToo movement is rather revolutionary as it hits the bull’s eye. For the first time in so long, more and more women are using the social media as a platform to unveil years of hidden trauma and hopelessness. We have lived in a society where the rich got away with most of the crimes, that the others had to inevitably bear the consequences of. It is ironical that it isn’t the justice system that is making people come forth and unleash their complaints, but rather social media, that has mostly been an inconvenient mirror to the society. This movement is making the society and its hierarchy of power and gender politics stand on their head.

Some men have apologised, some resigned, some are defiant and in turn have called it a reversed witch-hunt. A lot of men seem to sympathise with the alleged, calling women, sympathy seekers, drama queens and the sorts. Truth be told, these are the kind of reactions which strengthen our resolute in the fight against sexual assaults. Victim shaming has been the most played out card in history; unfortunately, it is no longer going to stub voices. The #MeToo movement has indeed given voice to the voiceless; power to the powerless.

Why is now the right time, you ask.

When an ambulance with an all-powerful siren, streams through the roads unhindered and yet reaches the hospital late, it comes under scanners. Not just the ambulance driver, traffic police, people’s civic sense, road structure, you name it and an avalanche of probabilistic reasons ascend.

Why then do we show apathy to justice delayed and often denied, when it comes to women survivors of rape and misconduct. After all, isn’t the physical, mental, and psychological health of women just as important, if not more?

Instead of questioning why women are opening up now and that too to social media, a gracious society would thank them for coming forth. However, media trials are only a channel for those who had their hands tied. Media trials do not constitute as a legal course of action.

It would be laughable to assume that these women coming out on social media are unaware of the same. It is taught in 8th standard school textbooks, that an FIR must be filed and in case it is not registered by the police, then one can approach the Magistrate. However robust our legal justice system is, as evident, it is inadequate in registering cases thus filed. The culture of inherent male chauvinism, victim shaming, abuse of power has made filing FIRs a lot more cumbersome. A responsible society must come forth to nip the issue in the bud. It begins with accepting that there is a web of entrenched issues to deal with.

The government of India has made it mandatory for every employer to constitute an Internal Complaints Committee (ICC). Ministry of women and child development dedicated a portal of ‘She-Box’ where women can submit complaints. These proactive measures are certain outlets apart from filing an FIR.

It becomes all the more relevant now, to question whether it is indeed time for gender sensitisation courses to start at school level. For one, it is the role of the stakeholders to look into the crux of the problem. And we are all stakeholders in this society, parents, school teachers, social media influencers, advertisements, movies, government, corporate houses, professional office spaces, are each to follow a role set that makes them responsible citizens of the society.

Let us stop normalising errant behaviour, let us stop casually airing “Men will be Men” across TV and in everyday conversations. It is rightly said, “Spare the rod, and spoil the child” If parents and teachers do not step up and mould children right from their youth, it is likely that they would become deviant from the norms of the society. They often inculcate vices, growing up; transitioning from unchecked youth to belligerent adults.

This is a war against apathy, misogyny, chauvinism; it is not a war between men and women, it is not about Bollywood v/s Hollywood. The sooner we understand this, the sooner we become ‘Woke’. Let us all aim for ‘Justice sans Frontiers’.

“प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उत्तर भारतीयों को भड़काने की साजिश” in Punjab Kesari

गुजरात में कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस का वीभत्स दंगाई चेहरा एक बार फिर उजागर हुआ है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सांप्रदायिक दंगे नहीं करवाए, उसने गुजरात में 14 माह की मासूम बच्ची के घृणित बलात्कार का बहाना बना उससे भी घृणित काम किया – वहां दूसरे राज्यों, विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार 1⁄4ध्यान रहे दोनों राज्यों में एनडीए की सरकार है1⁄2 से आए मजदूरों-कामगारों पर हमला बोल दिया और उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया। इस पूरे षडयंत्र के पीछे अगर कोई है तो वो है राहुल गांधी का खास आदमी अल्पेश ठाकोर। बच्ची क्योंकि ठाकोर समुदाय की थी, तो इस वहशी को अपनी दरिंदगी दिखाने का और भी मौका मिल गया और इसकी ‘ठाकोर सेना’ 1⁄4पालतू गुंडों 1⁄2 ने बाहर से आए मजदूरों पर कहर बरपा कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं, कांग्रेस के अनेक विधायकों और कार्यकर्ताओं ने भी इस जघन्य कांड में अल्पेश का साथ दिया।

प्रवासियों को घरों में घुस कर धमकाया गया, ईंट, पत्थर, सरिया, तलवार, जो हाथ आया, उसका इस्तेमाल किया गया। आदमियों को तो छोड़िए, महिलाओं और छोट-छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। मजबूरन हजारों की तादाद में लोगों ने पलायन किया। जब अल्पेश ठाकोर से लोगों ने इस विषय में पूछा तो वो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए घड़ियाली आंसू बहाने लगा और राजनीति छोड़ने के दावे करने लगा। अन्य राज्यों के लोगों को लग सकता है कि बाहरी लोगों के प्रति अल्पेश और उसकी सेना की हिंसा बच्ची के बलात्कार का नतीजा थी, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। अल्पेश के अनेक पुराने वीडियो सामने आए हैं जिनमें वो स्थानीय लोगों को बाहरी मजदूरों के खिलाफ भड़का रहा है और हिंसा की न केवल धमकी दे रहा है, बल्कि लोगोें को उसके लिए उकसा भी रहा है।

राज्य पुलिस ने कथित बलात्कारी को जल्द ही पकड़ लिया, लेकिन अल्पेश और उसके गुंडों ने फिर भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच शुरू कर दिया। स्पष्ट है कि इसके पीछे कोई ‘आक्रोश’ काम नहीं कर रहा था। यह सोची-समझी साजिश थी जिसका असल मकसद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पशोपेश में डालना था जो स्वयं गुजराती हैं, लेकिन काशी से चुनाव लड़ कर लोकसभा पहुंचे हैं। इसका दूसरा और खास मकसद था उत्तर भारत के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काना। जाहिर है, इस कांड के शुरू होते ही काशी में प्रधानमंत्री को धमकी देने वाले पोस्टर लगने शुरू हो गए जिसमें उन्हें चेताया गया था कि आखिर तो उन्हें चुनाव लड़ने यहीं आना पड़ेगा।

अल्पेश के आका राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री को उलाहना देना शुरू कर दिया कि पहले तो वो खुद लोगों को रोजगार नहीं दे पा रहे, और जब युवा अपना घर-बार छोड़ कर दूसरे राज्यों में रोजीरोटी ढूंढने जा रहे हैं तो उनकी रक्षा भी नहीं कर पा रहे। कहना न होगा, आलाकमान का आदेश मिलते ही, कांग्रेसी गिद्धों की पूरी टोली ने इस मसले पर डिजीटल मीडिया में मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। ये तो उसी कहावत को चरितार्थ करने जैसा है – उलटा चोर कोतवाल को डांटे। स्पष्ट है कांग्रेसियों ने इस साजिश को पूरी मेहनत और तैयारी से लागू किया। गुजरात में अल्पेश और उसके गुंडों से लेकर दिल्ली में आलाकमान और मीडिया में कांग्रेसी पिट्ठुओं तक सबने अपना फर्ज बखूबी निभाया और पूरे देश में विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश की गई। महाराष्टं में मोदी के खिलाफ नफरत फैलाने की कमान संभाली मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम ने जो खुद मूलतः बिहार से हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार की समाजवादी पार्टी 1⁄4सपा1⁄2, बहुजन समाज पार्टी 1⁄4बसपा1⁄2, राष्ट्रीय जनता दल 1⁄4राजद1⁄2 जैसी सीआईसी पार्टियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने शुरू कर दिए। आग लगाने वाले अल्पेश ठाकोर के खिलाफ तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटा, वो सीधे मोदी पर गोले दागने लगे – मोदी और उनकी पार्टी की राज्य सरकार बाहरी लोगों की रक्षा में असफल रही है…मोदी अब उत्तर प्रदेश और बिहार में किस मुंह से जाएंगे जहां के लोगों को सबसे ज्यादा शिकार बनाया गया है। इस पूरे खेल में

सीआईसी मीडिया की जितनी निंदा की जाए वो कम है। अल्पेश ठाकोर और उसके गुंडों की हरकतें वीडियो में कैद हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन ये लोग बजाए कांग्रेस की ओछी हरकतें दिखाने के, बड़ी फरमाबरदारी से राहुल गांधी के अजीबो-गरीब बयान दिखाने में लगे रहे। इनमें से एक ने भी राहुल से अल्पेश के बारे में सवाल नहीं पूछा उलटे राज्य में हिंसा के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया।

इस कांड से एक बात साफ हो गई है कि राहुल गांधी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले गुजरात विधानसभा में चुनाव में हमने देखा कि कैसे उन्होंने अल्पेश ठाकोर के साथ ही हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे लोगों से हाथ मिलाया। अल्पेश के साथ ही हार्दिक और जिग्नेश का इतिहास भी संदिग्ध और विवादास्पद है। हार्दिक ने 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में पटेल आरक्षण की मांग पर रैली की। रैली के बाद जब वो उपवास पर बैठने लगे तो पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश। इस पर उनके समर्थकांे ने हिंसा और तोडफोड़ शुरू कर दी। हिंसा इतनी अधिक बढ़ गई की सरकार को कफ्र्यु लगा कर सेना बुलानी पड़ी। जिग्नेश मेवानी की नक्सल पृष्ठभूमि भी जगजाहिर है। गुजरात चुनाव और बाद में भीमा कोरेगांव आदि में उसके भड़काऊ भाषण किसी से छुपे नहीं हैं। अर्बन नक्सल रोना विल्सन के लैपटाॅप से महाराष्टं पुलिस को जो दस्तावेज मिले उनसे स्पष्ट है कि उसने कांग्रेस नेतृत्व और नक्सलियों के बीच संपर्कसूत्र की भूमिका भी निभाई। इन्हीं दस्तावेजों से ये भी पता चला था कि कांग्रेस दंगा फैलाने और समाज को तोड़ने के लिए नक्सलियों को आर्थिक और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। इसका सबूत हमें तब मिला जब वरवर राव, गौतम नवलखा, वरनन गोंजालविस, अरूण फरेरा और सुधा भारद्वाज जैसे दुर्दांत नक्सलियों की पैरवी करने कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी स्वयं सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और उनके समर्थन में लेख लिखते पाए गए। यहां चलते-चलते एक बात और बता दें, गुजरात चुनाव में इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया 1⁄4एसडीपीआई1⁄2 ने कांग्रेस और जिग्नेश की पूरी मदद की। यही नहीं कर्नाटक चुनाव में भी एसडीपीआई ने कांग्रेस का पूरा साथ दिया।

गुजरात सरकार को अल्पेश ठाकोर द्वारा प्रायोजित दंगों को चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। भले ही कांग्रेसियों को गुजरात में सिर्फ वर्ष 2002 के दंगे याद रहते हों जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे, लेकिन राज्य में कांग्रेसी हिंसा का बहुत लंबा और क्रूर इतिहास रहा है। आपको जानकर आश्यर्च होगा कि 2002 के दंगों में अनेक कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेसी शासन में साठ के दशक से नब्बे के दशक तक सैकड़ों दंगे हुए। वर्ष 1969 1⁄4हितेंद्रभाई देसाई, कांग्रेस1⁄2, 1985 1⁄4माधवसिंह सोलंकी, कांग्रेस1⁄2, 1987 1⁄4अमरसिंह चैधरी, कांग्रेस1⁄2, 1990 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 और 1992 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 में राज्य में बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। हफ्ता दर हफ्ता चलने वाले ये दंगे इतने बड़े और विकराल थे कि 2002 के दंगे तो इनके सामने कुछ भी नहीं थे। भले ही मोदी ने लंबे अर्से तक राज्य में दंगों पर लगाम लगाई, लेकिन ताजा हिंसा बताती है कि राज्य में कांग्रेस की दंगा मशीनरी पूरी तरह चाक-चैबंद है। अगर सरकार सचेत नहीं रही, तो लोक सभा चुनावों से पहले ऐसी घटनाएं फिर हो सकती हैं।

राहुल गांधी आज बेशर्मी से प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा मांग रहे हैं, लेकिन वो अपनी गिरेबान में झांक कर देखने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर उन्हें थोड़ी सी भी शर्म होती तो क्या वो अल्पेश ठाकोर को पार्टी से बाहर नहीं करते? लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि कांग्रेस की नीति ही अब देश को जाति और धर्म के नाम पर तोड़ने तथा हिंसा और अराजकता फैलाने की है। मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के जवाब में उनका एक ही नारा है – ‘सबका विनाश, सबका सत्यानाश’।

“Adultery: Is the sanctity of marriage being sacrificed at the altar of equality?” in TOI Blogs

The elephant in the room is being tickled. With an influx of coming of the age issues, there is a heap of unwashed cases, piling up helplessly in a corner. The Supreme Court is doing well to chase archaic laws out of the country, but in some cases, the chase seems to be rather hasty. The repeal of Anti Adultery law is one such contention. Section 497 of the IPC is an imported concept and it so words adultery as though speaking of women as material possession and emphasising on the passivity of female sexuality, both as a matter of mere male importance and their agency alone. While the SC moves ahead to scrap the Anti Adultery law, removing it from the lenses of law itself, is a hard stance.

We welcome the nuanced analysis that seeks to undo gender inequality across all laws and especially the Anti-Adultery law. Former Chief Justice of India, Deepak Misra, is in the right to say “Husband is not the master of a woman”. The subordination of a married woman to her husband and of women to men, in general, has outlived its time. The structuring of such archaic laws are no doubt problematic, but that calls for all the more reason to amend them according to the age we live in.

Today’s society is fast progressing towards diverse avenues, hitherto untouched. What we are essentially seeing is a poor concoction of the East with the West. In Indian society since time immemorial, the way of being has been ‘collective’ as opposed to the West where the focus is on ‘individualistic’ societies.  This becomes particularly important to the various institutions that work in tandem with the basic fibre of the society.

Marriages in India are viewed as the sacred union of not just man and wife, but of their respective families. It is a rather collectivist affair and rightly affects the families involved, thereby the society as a whole. Indians are keen on preserving their culture and the unique traditions that make up their identity. Equality and faithfulness are not contradictory; they are rather complimentary in a marriage. Equality and dedication in marriage are the ingredients that give stability to the basic unit of society. The bone of contention arises when we speak of eliminating dedication from this equation. It cannot be sacrificed and shouldn’t be, and that’s why it’s called a ‘Holy Alliance’.

With marriage, present-day advances have introduced us to ‘Dating’, ‘Live-In relationships’, ‘Divorce’, and now repealing the ‘Anti Adultery law’. While most imported concepts tend to get comfortably merged, some may have far-fetched ramifications.

Marital infidelity is a delicate issue and requires much more careful examination on the part of the State. Women have been flogged and beaten to death when found to be adulterous. For men, it has been accepted in certain cases and gone unnoticed in others. These instances reflect the public view on the subject, and it must not be turned a blind eye to. While Justice Chandrachud contends that people must be free to choose their sexual choices even within marriage and that the country must be liberal and accepting of the same, there arises a moral contention herewith. In India, marriages are not viewed as mere civil contracts but rather a sacred union whose sanctity is not to be fiddled with, even in the name of liberalism. The Anti Adultery law touches on the principles of sexual autonomy, practices of the private realm, societal moral fabric and constitutional overreach. For this reason, it is a subtle link between the private and the public; the covert and the overt.

In his work titled ‘Policing families’ Jacques Danzelot makes an interesting observation, he offers an account of how public interference shaped the private realm since the 18th Century. The emphasis is on families and how they are seen as social linkages between the public and the private realm and is applicable to our cause. Head of the family have a discretionary power and act as a fulcrum for its existence, and in turn, they are dialectically responsible for the protection of the members. Therefore the state uses these important dynamics to translate into the private realm, what is essentially public in nature. This is done to ensure public order.

Two solutions emerge from his work, one is how the public and private realm converge without weaving panic across the society and secondly how the private sphere can become an active agent in not only transforming itself but also the society. When we speak of adultery, it is seen as belonging to the private realm, but if it were left to be so, ensuing chaos could spill out to the society. Repealing the law, only makes the act more conspicuous because no avenues are offered where the wrongs can be corrected, for those who so desire.

Indians are not so forgiving when the question of adultery arises, right from Panchayat diktats to the city’s moral impulse, it is considered a crime. If there is no law to condemn the same, mob rulings will become more fervent, as has already been happening in the crevices where the law could scarcely enter. The state must ensure that the sanctity of marriage is maintained with the aid of laws and provide its citizens with an outlet for their anguish. By repealing the anti-adultery law, the SC believes it is moving out of the private sphere and thereby leaving the matters of individual families up to their discretion, but that can lead to a mass hysteria as each set their own moral compass and justify their chosen way of reprimanding. Through its verdict, the SC is further confusing a lot that is getting drained in a quagmire of cultures.

The Indian culture has taken pride in its monogamous marriage setting and has been organic in its acceptance of the option of divorce for cases where fall outs are inevitable. However, let us not forget that society is built on a set of cultural practices that are revered. Stability of marriage is one of the ways in which our society learns to stand on its own feet and keep moving forward, collectively. It is therefore of utmost importance that the nuances surrounding holy matrimony are dealt with, rather than letting them blow to the wind.

Supreme court must have undergone a careful consideration of the ramifications of repealing the Anti Adultery law, for ours is a society that is emotionally charged about the moral bedrock and has taken to mob violence in areas where the law has failed to provide them with a solution.

‘Urban Naxals is not just a phrase, it’s a real threat to India’ in The Sunday Guardian

Entrepreneur Lalita Nijhawan exposes the Maoist modus operandi in urban areas to garner ideological support from intellectuals and academicians.

 

Lalita Nijhawan, a multifaceted woman entrepreneur, has been extensively supporting the academic debates on the issue of “Urban Naxalism”. She leads a travel conglomerate and owns Nijhawan Group of Companies which has diverse business modules across the country. Nijhawan tells The Sunday Guardian how “vulture politics” around caste, secessionism and nationalism drove her to form the Group of Intellectuals and Academics (GIA), a women’s forum working towards creating a nationalist intellectual space in the country. Excerpts:

Q: GIA has been organising seminars and debates on the Urban Naxal issue. According to you, how big is this Naxal problem for the country?

A: GIA is a forum of professional and expressive women that took shape in 2015, to question the hypocritical and exclusionary intellectual space claimed by a certain group. It came into being amidst a rhetoric and hysteric atmosphere created by anti-national campaigns in the country. The GIA team includes a Presidential awardee, pro-vice chancellors, noted mountaineers, dancers of international fame, senior advocates, university teachers, journalists and entrepreneurs. We conduct monthly seminars on vital current issues, publications, press conferences, marches and public signature campaigns to draw the attention of the society towards the vulture politics around caste, secessionism and nationalism.

We take these issues to concerned authorities and, on the basis of our fact-finding reports, we try to convince the governments to make changes in their policies. The GIA takes up different issues which ails the country. Urban Naxalism is just one of them but there are other issues too which the GIA has worked on. These issues include Jisha case, Triple Talaq, Kathua case, nationalism, women empowerment, exposing the anti-national hate-monger brigade, etc.

Q: Do you think “Urban Naxalism” is not just a phrase but a real threat to the internal security of the country?

A: Of course it is not just a phrase but a real threat to our internal security. The latest government data shows that 90 districts of the country are currently Naxal affected. All these districts fall within rural areas with extreme levels of poverty and total lack of development. But their modus operandi in urban areas is a part of the Maoist strategy that has extensively been detailed and documented in the “Strategies and Tactics” document of the central committee of Communist Party of India (Maoist). This is the phenomenon of Urban Naxalism which is defined as the Maoist Naxal network of Left-wing intellectuals and students present in the universities, cultural organisations and civil society networks in towns and cities.

Q:  Do you think that Naxalism is still alive due to the ideological support it’s getting from the Urban Naxals sitting in the metropolitan cities?

A: As discussed above, Naxalism is the real threat to our internal security and Urban Naxalism is nothing but the backbone of Naxalism. Without that ideological support, it is not possible for anyone to go against the sovereignty and integrity of a nation to this extent.

Q: What inspired you to set up GIA? What are the works done by the group in the recent past?

A: For past few years, we all are witnessing a hazardous challenge in front of us and that is of creating a fake narrative. Now-a-days, a section of the media first creates a narrative among the target audience and then disseminates information which are spoon-fed to them instead of investigating things on the ground level and presenting facts. Everyone around tend to believe whatever they learn from the media. GIA is an effort to present a different and fact-based narrative to the people.

“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

“भारत से रिश्तों की कीमत चुकानी होगी इमरान को” in Punjab Kesari

इमरान खान ने अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ भी नहीं ली थी कि भारत में उनकी विदेश नीति के बारे में कयास लगने शुरू हो गए थे। चुनावी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी का यार और गद्दार तथा मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताने वाले इमरान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले ही संबोधन में भारत के साथ व्यापार की इच्छा जता दी। ऐसा उन्होंने शायद इसलिए किया कि दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को अपना वजूद बनाए रखने के लिए भारत से व्यापार करना बेहद जरूरी है।

इसपर पाकिस्तान में बवाल मच गया है। नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज ने सवाल उठाया है कि जब नवाज भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों की बात की तो उन्हें कौम का गद्दार करार दे दिया गया, आज अगर वही बात इमरान कह रहे हैं तो वो देशभक्त कैसे हो गए? आपको याद दिला दें कि नवाज पाकिस्तानी सेना की राय के खिलाफ मोदी के शपथग्रहण समारोह में आए थे। ये सेना को बहुत नागवार गुजरा था। इसके बाद मोदी जब उनके जन्मदिन पर अचानक उनके घर पहुंच गए तो उसके बाद तो उनके खिलाफ सेना के मीडिया नेटवर्क ने धुंआधार दुष्प्रचार ही शुरू कर दिया। उन्हें मोदी का यार और देश का गद्दार साबित करने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि बहुत से पूर्व जनरल टीवी बहसों में अब खुलेआम ये मानने लगे हैं कि ये निहित स्वार्थों द्वारा चलाया गया प्रायोजित दुष्प्रचार था जिसमें कोई तथ्य नहीं था।

बहरहाल ये बात ध्यान में रखनी होगी कि पाकिस्तान की भारत नीति का निर्धारण इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय में होता है। भारत में हम भले ही इमरान खान को लेकर कितनी ही चर्चा करें, लेकिन असलियत यही है कि जब तक पाकिस्तानी सेना नहीं चाहेगी, पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ इस संबंध में भारत की भी शर्तें होंगी ही। देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देगा या अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग उपलब्ध करवाएगा?

वैसे तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कई बार भारत के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जता चुके हैं और जब वो इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू से मिले तो उन्होंने एक बार फिर रिश्तों में बेहतरी की इच्छा जताई। लेकिन मोदी सरकार के लिए बाजवा की ‘इच्छा’ का कोई मतलब नहीं है। सरकार तो यह जानना चाहती है कि बाजवा की सेना ने भारत के खिलाफ जो मोर्चे खोले हुए हैं, उनमें जमीनी स्तर पर कितनों को बंद किया गया है, या कटौती की गई है।

सिद्धू, बाजवा की बातों से इतने भावविभोर हो गए कि उनके गले लग गए। लेकिन क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि वो उसी पंजाब में खालिस्तान और आतंकवाद की आग क्यों भड़का रहे हैं, जिसमें वो मंत्री हैं? क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने पाकी सेना को कश्मीर में रिहायशी ठिकानों पर हमला करने और निर्दोष नागरिकोें को मारने का आदेश क्यों दिया? जब बाजवा चिकनी चुपड़ी-बाते कर रहे थे तब क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पूरे भारत में जो जाल बिछा रखा है और वो जिस तरह यहां अलगाववाद की आग भड़का रही है, उसे कब बंद किया जाएगा?

सिद्धू को लगा कि करतारपुर लंगा खोलने की बात कह कर बाजवा ने सिखों पर बड़ा उपकार कर दिया। क्या उन्हें पलट कर बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि पाकिस्तानी गुरूद्वारों के दर्शन के लिए जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को आईएसआई के गुर्गे कब खालिस्तान के लिए भड़काना बंद करेंगे? कब बाजवा ‘रेफरेंडम 2020’ का राग बंद करेंगे और कब कनाडा, इंग्लैंड आदि में सिखों के गुरूद्वारों में दुष्प्रचार बंद करेंगे? हम एक बार को मान भी लें कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन खालिस्तान का क्या? नक्सलियों, इस्लामिक अलगाववादी संस्थाओं को दी जा रही सहायता का क्या?

इमरान के प्रति सिद्धू का लगाव और भारत में सिद्धू का विरोध होने पर इमरान का उनके बचाव में सामने आना समझा जा सकता है, लेकिन सवाल सिर्फ उनकी सदाशयता और नेकनीयति का नहीं है। इमरान को समझना होगा कि सिद्धू का विरोध करने वाले पाकिस्तान से दोस्ती के विरोधी नहीं हैं। वो दोस्ती के नाम पर भावविभोर हो अंधे हो जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि असली सवाल तो पाकिस्तानी सेना के रवैये में बदलाव का है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक समझती है और जिसका लक्ष्य है – ‘गजवा ए हिंद’ यानी हिंदुस्तान पर जीत। बेनजीर भुट्टो ने एक बार हिम्मत करके कहा था कि वो कश्मीर को भारत-पाक रिश्तों के बीच नहीं आने देंगी, लेकिन उनका क्या हश्र हुआ? उन्हें मरवा दिया गया। जब उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार थी, तब भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर फैसला भी हो गया था, लेकिन वो कौन लोग थे जिन्होंने अंतिम क्षण में इसे रूकवा दिया? नवाज शरीफ ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर समझौता किया ताकि आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सके, उसका भी क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। नवाज ने तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत में आतंकी भेजने पर भी सवाल उठाया, लेकिन सब जानते हैं, उन्हें गद्दार करार दिया गया।

इमरान ने अभी तक सेना की किसी भी नीति के खिलाफ चूं तक नहीं की है। उन्होंने तोे कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को सरेआम ‘आजादी की लड़ाई’ करार दिया है। मतलब साफ है, पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी भेजता रहेगा। इमरान खान की दूसरी बड़ी परेशानी ये है कि सेना के पूरे समर्थन के बावजूद उन्हें अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। उन्हें दूसरी छोटी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में वो चाहंे भी तो भारत-पाक संबंधों पर नवाज शरीफ जैसे खुल कर कोई राय नहीं जाहिर कर सकते। वैसे भी उनसे ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो सेना की कभी मुखालफत करेंगे क्योंकि उनकी पूरी पृष्ठभूमि ही सेना की है। उनका संबंध उस जनरल नियाजी से है जिसने बांग्लादेश में समर्पण किया था। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, सूचना मंत्री फवाद चैधरी, पेट्रोलियम मंत्री गुलाम सरवर खान जनरल परवेज मुशरर्फ के जमाने में मंत्री रह चुके हैं। उनके वित्त मंत्री असद उमर के पिता सेना के सेवानिवृत्त अफसर हैं। इमरान की कैबिनेट में मुशरर्फ के जमाने के इतने मंत्री हैं कि लोग पूछने लगे हैं कि जब ये लोग मुशरर्फ को कामयाब नहीं कर सके तो उन्हें क्या करेंगे।

मुंबई में हमलों के समय इमरान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी मुंबई में ही थे। उन्हें पाकिस्तानी सेना की हरकतें, देश की आर्थिक स्थिति, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंध, अमेरिकी दबाव, भारत के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और ईरान के साथ तल्ख संबंध, चीन की पैंतरेबाजी, सबका अहसास है। उन्हें पता है कि भले ही इमरान, मोदी जैसे विदेशी ताकतों से बराबरी के आधार पर संबंधों की बात करें, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि दुनिया की ताकते उन्हें वो इज्जत बख्शें जिसकी वो ख्वाहिश कर रहे हैं। वो इमरान को प्रधानमंत्री मोदी के पत्र का हवाला देते हुए भारत के साथ ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ की बात करते हैं। वो कहते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सामने बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बार तो उन्होंने ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ का गलत अर्थ निकाल लिया था और एलान कर दिया था कि भारत ने बातचीत का न्यौता भेजा है। लेकिन जल्द ही भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इसका मतलब ‘काॅम्प्रिहेंसिव डायलाॅग’ नहीं। वो नई सरकार की नीतियों और जमीन पर हालात का गंभीरता से जायजा ले रहा है और उसके बाद ही इस संबंध में कोई फैसला हो सकता है। हां, भारत, पाकिस्तान से संबंध पूरी तरह तोड़ेगा नहीं, दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री सर्विसेस, सुरक्षा सलाहकार आदि बातचीत करते रहेंगे, लेकिन भारत पाकिस्तानी घुसपैठ का जवाब पहले जैसे देता रहेगा।

कुरैशी से जब ये पूछा गया कि क्या वो सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भेंट करेंगे तो वो इसका उत्तर टाल गए। जाहिर है, अभी ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है, बाद में होगा, तो देखा जाएगा। छह सितंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मेटिस भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 वार्ता करेंगे। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है। देखना दिलचस्प होगा कि वो इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा से क्या बात करते हैं। कुरैशी अमेरिका के साथ ‘गलतफहमियों’ को बराबरी की सतह पर बात कर दूर करना चाहते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख रह चुके पाॅम्पिओ को इमरान और बाजवा कितना आश्वस्त कर पाते हैं, इस पर सबकी निगाह रहेगी। पर पाॅम्पिओ और इमरान की टेलीफोन पर हुई बातचीत में आतंकवाद पर चर्चा को लेकर जो झड़प हुई है और जैसे अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से अफगानिस्तान में आतंकवाद को लेकर तकाजे कर रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अमेरिका इमरान को मनमांगी मुराद नहीं देगा।

कुल मिलाकर अभी जो हालात हैं, उनमें कहा जा सकता है कि जब तक पाकी सेना भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती, भारत को इमरान से बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, भले ही वो इसके लिए कितना ही जोर दे। इमरान को समझना होगा कि अब भारत में मोदी सरकार है, मनमोहन सरकार नहीं जिसके राज में आतंक और झप्पियां एक साथ चला करते थे। उन्हें अगर भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने हैं तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“The Trafficking of persons (Prevention, protection, and rehabilitation) Bill: Transporting stolen lives from a hopeless present to an optimistic future” In TOI Blog

23-year-old Yazidi, Nadia Murad has been designated as the Ambassador for Dignity of Survivors of Human Trafficking for the UN’s Drugs and Crime body.  She is also a Nominee for the Nobel Peace Prize this year.

If humans have learned one thing from the past of their mistakes, it is to not blame the victim, but engage themselves in waging wars against the perpetrators of the crime that have subsumed their spirit.

This approach is a penetrating beam of light in a carton of doom that this world is racing to resemble.

So, is the Trafficking of Persons (Prevention, Protection, and Rehabilitation) Bill, introduced in Lok Sabha by the Minister of Women and Child Development, Maneka Gandhi on July 2018.
The bill accords importance to creating a National Anti Trafficking Bureau for reaching even grass-root level investigation in trafficking cases.

To tackle this menace, Anti Trafficking Relief and Rehabilitation Committees (ATC) will be established in national, state and district levels, which are to take care of compensation, repatriation, and reintegration. There would be protection homes and designated courts in addition.

While critics look at it as endless bureaucratisation, let’s face it, the trafficking racket is a spider’s web that sprawls across continents and begins in the most ordinary places.

Human trafficking is an umbrella term which subsumes trafficking for the purpose of sexual exploitation, forced labour, slavery, drug smuggling, organ smuggling and often for malicious activities such as terrorism, regional violence.

About 8 children go missing every hour, 4 are sexually abused,
2 raped.

In this organised crime, millions are being oppressed at homes, shops, brothels, colluding in an illicit $150 billion trade.
In his novel called ‘A Walk Across the Sun’ Corban Addison gives a chilling account of international trafficking for sexual slavery and drug smuggling in human beings. He explains how the nexus between corrupt police officials, pimps, locals is a net spread wide to reach the international arena. Emerging through the gruesome tale is a revelation and a haunting solution; he says “Trafficking will stop when men stop buying women. Until that happens, the best we can do is win one battle at a time.”

The fight against this evil is not a recent one but the approach is renewed.

Association of Nobel laureates in this war against this crime is a reflection of the urgency, importance of agency and pro-active engagement of civil society.

Nobel Laureate Kailash Satyarthi has been proactively engaged in the struggle against the suppression of children and young people.
In his Nobel peace prize speech, he narrates the woes of a trafficked child labourer.

“Is the world so poor that they cannot give a toy and a book, instead of forcing me to take a gun or a tool?”
Innocence has been cashed on for a donkey’s life of work.
Neither, worth the consequent despair.

However, human trafficking is not limited to kidnapping children and women for labour and sexual exploits as has been largely understood.

One of its myriad forms could be seen in the recent Rohingya refugee contention; here is the other dimension, discussed less often.

An international organisation of Migration has reported that there is evidence of trafficking of Rohingya refugees in India.

Though the media placed the moral compass on the shoulders of the government, it forgot to do its duty and bring to the surface, the fact that these very infiltrators are potential pawns. Speculation is rife that they chose Jammu for the proximity to Pakistan, a politically motivated migration. It points out to a probabilistic angle of terrorism and unnoticed crime. Media reports are unnerving, as they suggest humanitarian aid to migrants and fail to approach it with a circumstantial understanding.

Even religious places are no longer a safe haven.
With Missionaries and orphanages selling children, the age of doom is here.

It is not to malign religious institutions but to chide the clandestine activities that they carry forward under the cloak of benevolence.

Largely, it is the poor, underprivileged, under-informed, naïve who are unfortunate victims of trafficking.

With Government’s policies such as Ujjwala, Swadhar Greh, Juvenile Justice Act 2002, Code of Criminal procedure the issue of rehabilitation is well met.

Another innovation brought in by the government, the Aadhar card could be an effective move, as it keeps records of all the adults and children who are citizens of the country. Although there are hurdles in information storage and execution, these are more like teething problems.

If only people focus on the potential benefits more than minor inconveniences, the issues plaguing humanity can be addressed in a rightful way.

Trafficking is a crime against humanity. The war is to be collectively waged.

With this bill, there is hope that awareness will beget change.
This battle cannot, however, be won by the solitary action of the government.

It requires the sympathy of media, proactive involvement by civil society, and victims must come to the forefront.

Citizens must be welcoming to changes in the legal system.
Someone rightly said, to do nothing would be to die one day at a time.

“WHAT LIES BENEATH” in The Pioneer

The Church seems to have led the media by the nose in helping build a Congress-Communist narrative that dragged the RSS into the Tuticorin protests

The coverage by the national media of the protests in Tuticorin, Tamil Nadu, against Vedanta’s copper smelting plant has been injudicious, based on hearsay and without application of mind. A narrative has been parroted without critical examination.

It is true that protestors were killed in Tuticorin. But unfortunate and tragic as that is, did anyone bother to ask why police had to open fire? These protestors outnumbered the police force by a huge number at the collectorate; they assaulted police personnel physically, pelted them with stones, tore the clothes of female law enforcers and molested them, indulged in wanton acts of arson including setting fire to public property and indulged in an orgy of violence that threatened the safety of innocent people. Should it not be asked what forces were behind this extremely violent protest which is against every democratic norm? Was the protest sponsored or did it occur spontaneously? Who allowed the assault on police personnel and the burning of vehicles, buildings, ambulances and even setting the collectorate ablaze? Who made Tuticorin a battleground? Is death the only indicator of violence? Have we stopped condemning violence unless it results in deaths? Since when have we started celebrating protests indulge in acts of violence and destruction?

It is the absence of these questions being asked that the Opposition, led by the Congress and Communists, were quick to blame without any basis whatsoever the Narendra Modi-led Central Government rather than lay the responsibility for both the protests and the deaths of protestors in police firing at the door of the Tamil Nadu State Government which is in charge of law and order. But facts are of no consequence for those Opposition leaders who took to make wild, defamatory charges against Modi calling him a “murderer”. But then that is par for the course for the conspirators who pushed the Tuticorin protests into violence as it helped them in their goal of slinging mud at the Modi regime. Another motive could well have been to ensure the closure of the Sterlite Copper Smelting plant. But has anyone rationally thought about the negative effects of closing the plant? Is anyone worried about how this will affect our country’s economy and the thousands of employees who will be laid off?

The most provocative statement on the situation came from Congress chief Rahul Gandhi. Apropos of nothing in particular, he blamed the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) for the Tuticorin row, keeping in tune with his politics which begins and ends with RSS-baiting. When journalist Gauri Lankesh was murdered, Gandhi accused the Sangh of being behind the killing within half-an-hour of the shooting. When BS Yeddyurappa resigned as the Chief Minister of Karnataka because he couldn’t prove his majority on the floor of the House, Gandhi proclaimed he was supporting the rump JDS to “save the people from the RSS”. Rahul’s anti-Hindu bias is understandable but accusing the Sangh of being a terrorist organization is beyond the pale. In fact, the Congress-Communist cabal by baseless charges against the RSS instead of engaging in an ideological debate has ensured that the Sangh has come to represent Hindu sentiment nationwide. As a corollary, opposition to the RSS is considered ‘opposition to communalism’ and support of Islamic and Christian communalism and is termed ‘secularism’ by this cabal.

In the Tuticorin case, however, there seems to be more to it than just the reflexive blame-the-Sangh approach; a concerted attempt by the Church in those parts, supported by Gandhi and the so-called secular media, to drag the Sangh into the row is evident. The districts of Tirunelveli, Tuticorin and Kanyakumari in Tamil Nadu have the highest number of Christians and the Church has great influence on the public. It is not a coincidence that in the last two decades these districts have faced the greatest opposition to national development projects.

The Kudankulam Nuclear Power Project in Tirunelveli, which was developed in collaboration with Russia, also saw a lot of protests. America’s disdain for this project was quite evident. The then Prime Minister Manmohan Singh publicly blamed US-funded institutions for the protests against Kudankulam. The then Union Minister V Narayanasamy alleged that Bishop Yavon Ambrose of Tuticorin received Rs 54 crore and was the key figure behind the protests. Many Christian institutions such as People’s Education for Action and Liberation, and Good Vision were on the Union Home Ministry’s radar as instigators. The Home Secretary had announced that bank accounts of four such NGOs were sealed, as money was transferred from overseas to fund national protests and incite disruption.

The Christian population in Tuticorin is close to 30 per cent and the Church has a deep impact on residents’ everyday life. The plan to expand the Sterlite copper plant was brought forward as a new addition to the scope of already on-going disputes. Before the Sterlite plant was closed, it was producing four lakh tons of copper annually. Under the proposed expansion, which would have happened if not for the violent protests and subsequent deaths in police firing, Sterlite would have produced eight lakh tons of copper annually. If this project had gone through, almost all of India’s copper needs would have been met domestically.

According to official police reports, the Tuticorin protest has a clear foreign influence. Samarendra Das of the ‘Foil Vedanta Group’ flew in from London and secretly met Sterlite protesters and assured them that he would fully support the continuation of the protests, according to police. Is it a coincidence that after the Tuticorin violence John McDonnell, a prominent leader of the Opposition Labour Party in the UK, declared that Vedanta is a rogue company and demanded it be removed from the London Stock Exchange? The discussions regarding Sterlite were used to instigate the locals of Tuticorin. Brother Mohan C. Lazarus on a YouTube video said, without any scientific backing, that Sterlite is a toxic factory. He said that the Church is praying to shut down the factory. He further stated that a protest will be held on 24 March, 2018, at Rajaji Park in Tuticorin, where all Catholics, Pentecostals, Church of South India (CSI) would unite to participate against Sterlite. Scientists of the National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) and the National Green Tribunal (NGT) had visited Sterlite and certified that emissions were within prescribed limits. Then what have these Churches achieved by provoking people against Sterlite, claiming that pollution levels are extremely hazardous? The Kundankulam protests saw the participation of Bishop Yvon Ambroise and SP Udayakumar, while the Sterlite protest had Brother Mohan C. Lazarus and other churches in the surrounding area as prime movers. Is the anti-development attitude of the Church not to be questioned? If the Manmohan Singh Government could take action against such disruptive elements then why can’t the Modi Government?

Police were portrayed as villains in Tuticorin. The media narrative was overwhelmingly of trigger-happy cops going berserk; did anyone try to figure out why the police was compelled to take last-resort action? Local journalist N. Rajesh’s report says the Deputy Inspector General of Police Kapil Kumar Saratkar made elaborate arrangements at the protest venue so that activists would not reach the collectorate. Even when senior police officers were talking to protest leaders and asking them to ensure a peaceful demonstration, radical activists broke the barricades and used iron pieces from them to assault police personnel. Police responded with a ‘lathi’ charge. Rajesh’s report says he and some other journalists climbed to the rooftop of a hotel opposite the collectorate to get a better sense of what was going down. At 11:30 am some protesters, who had forced their way into the collectorate, began burning vehicles. When the protestors saw that their photographs were being clicked and videos being recorded, they pelted journalists with stones. When journalists came down from the roof of the hotel some were assaulted and many had their cameras snatched.

The testimony of the collectorate employees supports Rajesh’s reportage. A female employee said that at 11.10 a.m., she was having tea in the canteen with her colleagues; about 20 minutes later they witnessed bruised and battered police personnel being chased by stone-pelting protesters. The employees were scared and didn’t know what to do, so they went back to their office for safety. Then there was a second wave of protestors when an estimated 15,000-20,000 activists entered the collectorate office. They had weapons fashioned from iron rods, glass bottles, petrol bombs and lathis. They set about destroying the office and setting fire to government vehicles. There were about 100 policemen deployed for security who tried to control the protestors and prevent them from entering the collectorate. But the protesters outnumbered the policemen by thousands. They ruthlessly attacked the policemen who ran away in fear of their lives. They then set fire to all collectorate vehicles. The entire office was filled with smoke, suffocating the employees. The protesters didn’t even spare female police personnel. They tore their clothes and molested them. There are hundreds of eye-witnesses to what transpired and they all say the same thing.

Opportunistic politicians and parties who blame police for opening fire need to be more circumspect. Any loss of life is tragic and unfortunate, but what would they have done if faced with a life-threatening situation had they had been stationed at the Sterlite plant and tasked with ensuring its safety? Should violent mobs have been allowed to create havoc and decimate Tuticorin and the copper plant? Should physical assaults on cops and government officials have been allowed? Congress leader Ghulam Nabi Azad compared those who died in the police firing to the martyrs of Jallianwala Bagh. Azad should be asked if the martyrs of Jallianwala were armed with stones, iron rods, lathis, petrol bombs and glass bottles and whether they chased, assaulted and attempted to kill police officers and commit arson.

The public may have a short memory but they cannot be fooled. Prior to Rahul Gandhi blaming the Sangh, and Ghulam Nabi’s comparison to Jallianwala Bagh, back in 2007 the UPA government led by Manmohan Singh had allowed the extension of the Sterlite plant. The Congress party’s blue-eyed boy and former Home and Finance Minister P. Chidambaram was a Director in Sterlite’s parent company Vedanta before becoming a minister in the UPA government. Blinded by his intense hatred for the Sangh, Rahul Gandhi has also forgotten that law and order is a state subject. There is no BJP government in Tamil Nadu, so why indirectly or directly accuse the RSS?

It is about time that the BJP, the Central Government, and especially the Union Home Ministry learn from this incident. Asking for a report on the incident is not enough. The Home Ministry has failed to investigate the conspiracy, for which it needs to work in collaboration with State Government officials, to bring out the truth. During Manmohan Singh’s regime, there were some attempts to stop radical elements in the Church harming the national interest. What is stopping the Modi Government from following suit?

“क्या आरएसएस के खिलाफ चर्च का षडयंत्र है तूतीकोरिन कांड?” in Punjab Kesari

कठुआ के बाद तूतीकोरिन मामले की कवरेज में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली का तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कान का कच्चा और आंख का अंधा है। कुछ लोग इसे हांकते हैं और ये अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना भेड़चाल में फंस जाता है।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारी मारे गए, ये सही है। लेकिन कौन लोग थे जिन्होंने पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनपर पत्थरों की बौछार की, महिला पुलिसकर्मियों के कपड़े फाड़े, किनके कारण प्रदर्शन हिंसक हुआ, इसके पीछे कौन सी ताकते थीं, ये प्रायोजित था या वास्तविक, किसने वाहनों, भवनों, एम्बुलेंसों और कलेक्ट्रेट को आग लगाई, किसने तूतीकोरिन को युद्ध का मैदान बना दिया? ये शायद किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की। सबको सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि गोली चली और लोग मरे। इसके लिए विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तमिलनाडु राज्य सरकार से ज्यादा केेंद्र की मोदी सरकार को दोष दिया। सोशल मीडिया पर कुछ विपक्षी तो प्रधानमंत्री मोदी को हत्यारा बताने लगे। शायद यही षडयंत्रकारियों का मकसद था, और उन्होंने इसे हासिल भी किया। स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट बंद करवाना और उसकी पेरेंट कंपनी वेदांता को बदनाम करना और नुकसान पहुंचाना भी एक मकसद था, लगे हाथों वो भी हासिल हो गया। चलो हाल-फिलहाल तो वो भी बंद हो गया है। यानी एक तीर से कई शिकार। किसे फिक्र है कि स्टरलाइट प्लांट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुंचेगा? कितने हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे?

सबसे ज्यादा घृणित और भड़काऊ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान था, जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। वैसे अल्पज्ञ राहुल गांधी को इसके लिए दोष देना भी मूर्खता ही होगी। उनकी तो राजनीति संघ से शुरू होती है और संघ पर ही खत्म हो जाती है। नक्सलियों से संबंध रखने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तो उन्होंने आधे घंटे के भीतर संघ पर उंगली तान दी। येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने एलान कर दिया कि मैं जनता को संघ से बचाउंगा। एक विशेष समुदाय से संबंध रखने के कारण राहुल का हिंदू विरोध समझ में आता है, लेकिन संघ को आतंकवादी साबित करने के लिए साजिश करना, समझ से परे है। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने संघ को हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया है। उसे एक टारगेट बना दिया गया है जिसपर हिंदुओं से नफरत करने वाला हर समुदाय, हर राजनीतिक दल बेखटके उंगली उठा सकता है। संघ का विरोध करना ‘सांप्रदायिकता का विरोध’ मान लिया गया है और इस्लामिक और ईसाई सांप्रदायिकता का समर्थन और ध्रुवीकरण ‘धर्म निरपेक्षता’।

बहरहाल हम लौट कर तूतीकोरिन पर आते हैं। इस मामले में राहुल द्वारा फटाफट संघ पर उंगली उठाना एक व्यापक साजिश का हिस्सा है जिसे तूतीकोरिन का चर्च अंजाम दे रहा है और जिसकी सरपरस्ती दिल्ली में राहुल गांधी और उनका चंपू मीडिया कर रहा है। हम जो कुछ कह रहे हैं वो बहुत जिम्मेदारी से कह रहे हैं। तमिलनाडु के तीन जिलों तिरूनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी में ईसाइयों की तादाद सर्वाधिक है और यहां आम जनता पर चर्च का काफी प्रभाव है। ये संयोग नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन्हीं तीन जिलों में विकास परियोजनाओं का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है।

तिरूनेलवेली में कंुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध आपको याद होगा जिसे रूस के सहयोग से बनाया जा रहा था जो अमेरिका को पसंद नहीं था। तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के लिए अमेरिका समर्थित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने आरोप लगाया था कि तूतीकोरिन के बिशप यवोन एम्ब्रोइस को प्रदर्शनों के लिए 54 करोड़ रूपए मिले थे और वो इन प्रदर्शनों के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इनके अलावा कई और ईसाई संस्थाएं जैसे पीपल्स एजुकेशन फाॅर एक्शन एंड लिबरेशन और गुड विशन भी प्रदर्शन भड़काने के लिए गृह मंत्रालय के रडार पर थीं। गृह सचिव ने घोषणा की थी कि चार ऐसे गैर सरकारी संगठनों के बैंक खाते सील कर दिए गए थे जो विदेशों से मिला पैसा प्रदर्शन भड़काने में लगा रहे थे।

तूनीकोरिन में ईसाई आबादी 30 प्रतिशत के करीब है और आम जनजीवन पर चर्च का गहरा असर है। यहां चल रहा स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट भी विवादों के घेरे में लाया गया। फिलहाल इसमें चार लाख टन तांबा सालाना बनाया जाता है। विस्तार के बाद इसकी क्षमता आठ लाख टन सालाना हो जाती। इससे भारत की तांबे की लगभग सारी जरूरत पूरी हो जाती और इसके आयात की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ध्यान रहे तांबे का इस्तेमाल विद्युतीकरण से लेकर रक्षा उपकरण के निर्माण तक अनेक स्थानों पर होता है। ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी बहुत जरूरी है।

पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक तूतीकोरिन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हाथ भी है। कुछ समय पहले लंदन से आया ‘फाॅइल वेदांता ग्रुप’ (वेदांता ग्रुप को असफल करो) का समरेंद्र दास स्टरलाइट प्रदर्शनकारियों से गुपचुप मिला। उसने इन्हें भरोसा दिलाया था कि वो प्रदर्शन जारी रखने में पूरी मदद करेगा। क्या ये सिर्फ संयोग है कि तूतीकोरिन हिंसा के बाद इंग्लैंड में विपक्षी लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता जाॅन मैकडोनल्ड ने वेदांता को अराजक कंपनी बताया और उसे लंदन स्टाॅक एक्सचेंज से हटाने की मांग की? तूतीकोरिन के चर्चों में लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काया गया। यू ट्यूब पर ब्रदर मोहन सी लाजरस का वीडिया उपलब्ध है जिसमें वो बिना किसी सबूत के स्टरलाइट को जहरीली फैक्ट्री बता रहा है। वो कहता है कि चर्च इसे बंद करने के लिए प्रार्थना कर रहा है। वो कहता है 24 मार्च, 2018 को राजाजी पार्क तूतीकोरिन में प्रदर्शन होगा जिसमें सभी कैथोलिक, पैंटाकोस्ट, सीएसआई चर्चों के लोग भाग लेंगे।

ध्यान रहे नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) जैसी संस्थाओं के वैज्ञानिक स्टरलाइट का दौरा कर चुके हैं और इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि इसका उत्सर्जन सेंट्रल पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और तमिलनाडु पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (टीएनपीसीबी) जैसी संस्थाओं द्वार तय किए गए मानकों के अनुसार है। ऐसे में चर्चों द्वारा झूठ बोल कर आम लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काने का क्या मकसद है? जहां कुंडनकुलम में बिशप यवोन एम्ब्रीओस और एसपी उदयकुमार थे, वहां स्टरलाइट मामले में ब्रदर मोहन लेजारस और क्षेत्र के अन्य चर्च हैं। देश की विकास परियोजनाओं के खिलाफ चर्च का ऐसा रूख क्या देशद्रोह नहीं है? अगर मनमोहन सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं?

क्या से संयोग है कि जिस समय तूतीकोरिन कांड की योजना बनाई जा रही थी ठीक उसी समय दिल्ली में आर्कबिशिप अनिल कूटो ‘ईसाइयों पर हमलों’ पर चिंता जता रहे थे और कह रहे थे कि देश कलहकारी दौर से गुजर रहा है और ईसाइयों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? क्या ये महज संयोग है कि कूटो के पत्र के बाद देश भर के चर्चों से उनके समर्थन में आवाज उठी जिसे कांग्रेस और अन्य ‘संघ विरोधी’ दलों ने भरपूर समर्थन दिया? क्या ये भी महज संयोग है कि घटना के तुरंत बाद सबसे पहले कमल हासन वहां पहुंचे जो इस समय दक्षिण भारत में ईसाई राजनीति के केंद्र में हैं?

तूतीकोरिन में गोली चलाने के लिए पुलिस को खलनायक बनाया गया। क्या दिल्ली के मीडिया ने एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं कि पुलिस को इसके लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? अगर प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू थे और उनके हाथों में लाठी-बल्लम, राॅड, पत्थर, पेट्रोल बम, शीशे की बोतलें सब कुछ थे। तूतीकोरिन के पत्रकार एन राजेश अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस कपिल सरतकर ने प्रदर्शन स्थल पर कड़ा इंतजाम किया था ताकि प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट तक नहीं पहुंच सकें। अभी पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात कर ही रही थी, कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरीकेड तोड़ दिया और उसे पुलिस पर फेंका। इसके बाद ही पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। मुझे लगा कि हालात गंभीर मोड़ ले रहे हैं तो मैं बाइपास रोड पर चला गया। मैं हालात को ठीक से समझने के लिए कलेक्ट्रेट के विपरीत एक होटल की इमारत की छत पर चढ़ गया। करीब साढ़े ग्यारह बजे कलेक्ट्रेट में घुसने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगानी शुरू कर दी। इनमें से कुछ लोगों ने जब देखा कि हम उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं और वीडियो बना रहे हैं तो उन्होंने हम पर पत्थरों की बौछार कर दी। जब हम नीचे उतरे तो उन्होंने हमें लाठियों से पीटा और हमारा कैमरा छीन लिया।

एन राजेश के विवरण का समर्थन कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी करते हैं। एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि करीब 11.10 बजे वो अपने सहयोगियों के साथ कैंटीन में चाय पीने गईं। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस कर्मचारी बदहवास तेजी से दौड़ते हुए आ रहे हैं और उनके पीछे लोग पत्थर फेंकते हुए आ रहे हैं। हम भयभीत थे, हमें नहीं पता था कि हम क्या करें, हम वापस कार्यालय में गए। इसके बार करीब 20,000 प्रदर्शनकारी कार्यालय में घुस गए। उनके पास हथियार थे, लाठियां थीं, लोहे के सरियेथे, कांच की बोतलें थीं, पेट्रोल बम थे। उन्होंने तेजी से कार्यालय का सामान बर्बाद करना शुरू कर दिया, पुलिस, कलेक्ट्रेट की गाड़ियों में आग लगा दी। वहां सुरक्षा के लिए तैनात करीब 100 पुलिसवालों ने उनका सामना किया, उन्हें नियंत्रित कर, बाहर भेजने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी हजारों में थे और पुलिसवाले बहुत कम। उन्होंने बेरहमी से पुलिसवालों पर हमला बोल दिया, वो अपनी जान बचा कर भागे। फिर उन्होंने कलेक्ट्रेट के सभी वाहनों को आग लगा दी, पूरा कार्यालय धुएंे से भर गया, चारों तरफ धुआं ही धुआं था। कार्यालय किसी युद्ध के मैदान की तरह लग रहा था। प्रदर्शनकारियों ने महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। उनकी कमीज फाड़ दी, उनके गुप्तांग में हाथ घुसाए। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट को भी नहीं बख्शा, उसमें भी आग लगा दी।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मौजूद है। सब एक ही चीज बताते हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, वाहनों, भवनों, कार्यालयों को फूंका, और तो और एम्बुलेंस तक को नहीं बख्शा। पुलिस वालों को खलनायक बताने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो उनकी जगह होते तो क्या करते? क्या उन्हें हिंसा और उन्माद का नंगा खेल खेलने की तब तक इजाजत देते जब तो वो तूतीकोरिन और स्टरलाइट प्लांट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देते? विवादास्पद, भड़काऊ और विघटनकारी बयानों के लिए बदनाम कांग्रेसी नेता गुलामनबी आजाद ने तो इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से कर दी। कोई गुलामनबी से पूछे कि क्या जलियांवाला में मारे गए लोग लाठियां, सरिए, पेट्रोल बम, कांच की बोतलें, पत्थर ले कर बैठे थे? क्या उन लोगों ने जनरल डायर और उसके पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था और उनके वाहनोें को आग लगा दी थी? क्या जलियांवाला में मौजूद लोगों ने हिंसा की पहल की थी?

जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर वो मूर्ख नहीं होती। राहुल गांधी ने संघ पर वार करने से पहले और गुलामनबी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग से करने से पहले दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो याद आ गया होता कि स्टरलाइट प्लांट के जिस विस्तार का विरोध हो रहा है, उसकी अनुमति स्वयं मनमोहन सरकार ने 2007 में दी थी। यही नहीं कांग्रेस के स्टार वित मंत्री और गृह मंत्री रहे विवादास्पद पी चिदंबरम 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनने से पहले स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता में निदेशक थे।

संघ के प्रति नफरत में अंधे राहुल गांधी को संघ के खिलाफ बयान देने से पहले ये भी याद नहीं रहा कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है, न कि केंद्र के। वैसे भी तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। राहुल गांधी के सीने में कितना जहर भरा है वो उनके ट्वीट से समझा जा सकता है जो कहता है – तमिलों का नरसंहार हो रहा है क्योंकि वो संघ की विचारधारा का पालन नहीं कर रहे। प्रदर्शनकारियों पर चलने वाली हर गोली का संबंध संघ और भाजपा से है।

इतनी नफरत, इतने भड़काऊ बयान, लाशों पर ऐसी ओछी राजनीति? पहले षडयंत्र करना और फिर उसे भुनाना राहुल गांधी और उनकी पार्टी अच्छी तरह सीख गए हैं। इस घटना से भाजपा, केंद्र सरकार को और खासतौर से गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सीख लेनी चाहिए। राजनाथ जी सिर्फ रिपोर्ट मंगाने से काम नहीं चलेगा। चाहे कठुआ का मामला हो या तूतीकोरिन का, गृह मंत्रालय ऐसे षडयंत्रों की त्वरित जांच कराने और सच्चाई सामने लाने में विफल रहा है। क्या इस मामले में रिपोर्ट तलब करने की जगह केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकार के साथ मिलकर नहीं काम करना चाहिए था? मनमोहन सरकार ने तो फिर भी चर्च के अराजकत तत्वों पर रोक लगाने की कोशिश की, आपने क्या किया? आप पर क्या दबाव है कि आप ऐसे तत्वों पर कार्रवाई नहीं कर रहे? कौन लोग इस षडयंत्र में शामिल थे, उन्हें कहां से पैसा मिल रहा है? क्या ये आपको नहीं मालूम? जनता जवाब चाहती है माननीय गृह मंत्री जी, और वो भी जल्दी।

“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।