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‘राम मंदिरः हिंदुओं के साथ दोहरा खेल बंद करे कांग्रेस’ in Punjab Kesari

अक्तूबर 29 को जब तीन सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने राम मंदिर मामले की जल्द सुनवाई की अपील को महज पांच मिनिट में अगले वर्ष जनवरी तक टाल दिया, तो समूचे हिंदू समाज में आक्रोश की लहर दौड़ गई। लोगों को ये लगने लगा कि कहीं मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कांग्रेस का ऐजेंडा तो नहीं चला रहे जो अगले लोकसभा चुनाव तक इस मसले का हल नहीं चाहती। याद दिला दें कि कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मांग की थी कि इस मसले की सुनवाई अगले आम चुनावों के बाद ही की जाए।

रामजन्म भूमि पर अदालती रवैये से निराश और नाराज राम भक्तों को अब एक ही रास्ता नजर आ रहा है – संसद राम मंदिर के लिए वैसे ही कानून बनाए जैसे सोमनाथ मंदिर के लिए बनाया था। इस विषय में नरेंद्र मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार कर ली है। इसमें सांसदों से लेकर प्रधानमंत्री तक को ज्ञापन देना और जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जनजागरण अभियान शामिल है।

कुछ दिन बाद 11 दिसंबर से संसद का शीतकालीन सत्र आरंभ हो रहा है। इससे पहले परिषद ने 15 नवंबर से सांसदों को ज्ञापन सौंपने का अभियान आरंभ कर दिया है। परिषद इस संबंध में 25 नवंबर को अयोध्या में एक विशाल आयोजन करेगी जिसमें प्रमुख साधु संतों सहित रामजन्म भूमि आंदोलन से जुड़े करीब एक लाख लोग भाग लेंगे। ऐसे ही आयोजन इस दिन नागपुर और बेंगलूरू में भी होंगे। नौ दिसंबर को दिल्ली में संतों की बैठक होगी। 18 दिसंबर के बाद पूरे देश में 5,000 से भी अधिक आयोजन होंगे ताकि लोग इस विषय में अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अगले वर्ष प्रयागराज में होने वाले कुंभ में भी इस मुद्दे पर धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ही नहीं अनेक भारतीय जनता पार्टी नेता और मुस्लिम संगठन भी राम मंदिर के लिए कानून बनाए जाने की मांग का समर्थन कर चुके हैं। उधर कट्टरवादी इस्लामिक-नक्सल कांग्रेस एक बार फिर राम मंदिर के नाम पर मुसलमानों को डराने और भड़काने में लग गई है। वो इसके लिए भय्याजी जोशी के उस बयान का इस्तेमाल कर रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो राम जन्म भूमि के लिए एक बार फिर 1992 जैसे आंदोलन किया जाएगा। याद दिला दें कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था और उसके बाद भड़के दंगों में अनेक लोग मारे गए थे।

असल में हुआ यूं था कि मुंबई में तीन दिन चली संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद भय्याजी जोशी संघ के विस्तार के बारे में संवाददाताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि गत छह वर्ष में संघ का डेढ़ गुना विस्तार हुआ है। करीब 35,500 गांवों में संघ की परियोजनाएं चल रही हैं। इस समय संघ की 55,825 शाखाएं हैं। संघ की साप्ताहिक और मासिक मिलन बैठकें क्रमशः 17,000 और 9,000 गांवों में होती हैं। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष अलग-अलग कार्यक्रमों में एक लाख स्वयंसेवकों की वृद्धि हुई है…। इस बीच एक संवाददाता ने पूछा कि क्या संघ राम मंदिर के लिए 1992 जैसे आंदोलन भी करेगा? इसपर उन्होंने ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो अवश्य ऐसा किया जाएगा। इसके बाद संघ के विस्तार और सामाजिक उपलब्धियों को तो मीडिया ने दरकिनार कर दिया और हर ओर सिर्फ एक ही बात की चर्चा हुई कि संघ ‘1992 जैसा’ माहौल पैदा करना चाहता है।

इस खबर को कांग्रेस जैसी कट्टरवादी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, इस विवाद के मूल प्रतिवादी हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी, कांग्रेसी मौलानाओं के जमावड़े आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड आदि ने भी तूल देना शुरू कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ये मसला अदालत में है तो 25 नवंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना के लोग अयोध्या क्यों आ रहे हैं, इससे वहां के मुसममानों में ही नहीं, हिंदुओं में भी भय पैदा हो गया है कि कहीं ‘बाहरी लोग’ ‘1992 जैसे’ दंगे न करें। इन लोगों को ये तो याद है कि 1992 में कुछ मुसलमान मारे गए थे, लेकिन उन्हें ये नहीं याद रहा कि इस विवाद में कितने हिंदू भी मारे गए। 1990 में तो उत्तरप्रदेश के तबके मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोटों की खातिर हिंदू कारसेवकों को गोलियों से भून दिया था। 1992 में जब विवादास्पद ढांचा ढहाए जाने के बाद दंगे भड़के तो उसमें मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी मारे गए। अयोध्या में ही एक मुस्लिम समाजवादी नेता ने हिंदुओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं थीं।

संघ और परिषद के ताजा आंदोलन को कठघरे में खड़ा करने वाली पार्टियां ये भूल जाती हैं कि 1992 में और 2018 में जमीन आसमान का अंतर है। आज आंदोलन का लक्ष्य मोदी सरकार को जनता की भावना से अवगत करवाना और उस पर कानून बनाने के लिए दबाव डालना है। रामभक्तों का अयोध्या जाना प्रतीक है राम मंदिर के प्रति अपनी आस्था दोहराने का न कि किसी को आक्रांत करने का।

वर्ष 1984 में जब से विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि आंदोलन चलाया है, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी आदि जैसी इस्लामिक पार्टियां परिषद और बजरंग दल को अतिवादी, हिंसक संगठनों के रूप में बदनाम करने में लगी हैं। जबकि स्वयं ये पार्टियां राष्ट्रविरोधी, खूनी नक्सलियों तथा पहले सिमी और अब पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे इस्लामिक आतंकी संगठनों को समर्थन देती रहीं हैं। हाल ही में भीमा कोरेगांव मामले में पूना पुलिस ने जो चार्जशीट दाखिल की है वो आंखें खोलने वाली है। ये लोग न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने का षडयंत्र भी कर रहे थे। इस चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों में वो पत्र भी है जिसमें एक नक्सली आतंकी दूसरे को कह रहा है कि यदि हम दलितों को भड़काते हैं और दंगे करवाते हैं तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हमें विŸाीय और कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस ने देश में कितने कैसे और कब कब दंगे भड़काए हैं, वो हम अपने स्तंभ में बताते रहते हैं।

सोचने की बात है कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नाम पर मुसलमानों को डराने वाली ये पार्टियां खुद कितने दंगे भड़का चुकी हैं और देश में कितने लोगों की हत्या करवा चुकी हैं। अयोध्या में विवादित ढांचा मुसलमानों का मक्का-मदीना जैसा कोई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल नहीं था, फिर भी इन पार्टियों ने इसे हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ का प्रतीक बना दिया और इसका इस्तेमाल मुस्लिम वोट बटोरने के लिए किया।

विवादित ढांचा गिरने के बाद जब दंगे भड़के तो इस्लामिक पार्टियों ने इसके लिए सीधे-सीधे संघ और उसकी सहयोगी संस्थाओं को जिम्मेदार ठहरा दिया। वैसे अब तक इस विषय में कोई गहन जांच नहीं हुई है कि ये दंगे किसने भड़काए? कभी किसी ने ये सोचा कि जब देश भर के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के सदस्य या तो अयोध्या में थे या जेल में तो दंगे किसने भड़काए? ऐसा तो नहीं कि दंगे किसी और ने करवाए और ठीकरा किसी और के सर पर फोड़ा गया? क्या ये मुसलमानों के ध्रुवीकरण की कुत्सित चाल नहीं थी? क्या आज भी वो ताकतें मुसलमानों को राम मंदिर के नाम पर डरा नहीं रहीें? ध्यान रहे आज की तरह तब ज्यादातर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें नहीं थी, तब केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं।

ये सही है कि जब विवादित ढांचा गिरा तब उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। ये भी सही है कि कल्याण सिंह ने ढांचा गिराए जाने की नैतिक जिम्मेदारी ली थी और चंद घंटों के भीतर ही इस्तीफा भी दे दिया था। लेकिन क्या ये सही नहीं है कि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और विद्वान नेता नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे। ढांचा गिरने और उसके बाद हुई हिंसा की क्या कोई जिम्मेदारी नरसिम्हा राव और उनकी सरकार की नहीं थी?

जब ये घटना हुई तब माधव गोडबोले केंद्र में गृह सचिव थे। उन्होंने ‘अनफिनिश्ड इनिंग्स’ नाम से एक पुस्तक लिखी है। इसमें वो विस्तार से बताते हैं कि कैसे तबके गृह मंत्री एस बी चव्हाण ने विवादित स्थल को कब्जे में लेने के लिए छह दिसंबर से बहुत पहले जुलाई में ही योजना बना ली थी। लेकिन नरसिम्हा राव ने काफी विलंब से 24 नवंबर को केंद्रीय बलों को उत्तर प्रदेश भेजने की मंजूरी दी और बल वहां पहुंच भी गए, लेकिन उन्होंने उनकी तैनाती का आदेश कभी नहीं दिया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो नरसिम्हा राव ने वादा किया था कि अगर विवादित स्थल के नीचे मंदिर निकलता है तो वो ये परिसर हिंदुओं को दे देंगे। लेकिन खुदाई में मंदिर होने की पुष्टि के बावजूद राव वादे से मुकर गए। पहले परोक्ष रूप में ढांचा ढहाने में मदद करके और फिर अपने वादे से मुकर कर वो आखिर क्या खेल खेल रहे थे, वो क्या चाहते थे, ये अब तक अस्पष्ट है। लेकिन इतनी बात तो साफ है कि वो और उनकी पार्टी ढांचा गिराए जाने के बाद भड़के दंगों की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं और अनेक मुस्लिम संगठन भी इसका जोरदार समर्थन कर रहे हैं, तब कांग्रेस और उसके जैसी अन्य इस्लामिक-नक्सल पार्टियां एक बार फिर मुसलमानों को डराने में लग गईं हैं। हिंदू वोटों के लिए मंदिरों के दौरे करने वाले जनेऊधारी राहुल गांधी राम मंदिर के नाम पर खामोश हैं।

सुप्रीम कोर्ट के टरकाऊ और विपक्षी दलों के दोगले रवैये से हिंदुओं में निराशा और नाराजगी है और वो इस संबंध में सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन भी कर रहे हैं, लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं कि अयोध्या में एक बार फिर दंगे भड़केंगे। कांग्रेस, इकबाल अंसारी, आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और उनके राजनीतिक आका राम मंदिर के नाम पर लोगों को डराना बंद करें। अपनी राजनीति के लिए राम को बदनाम न करें। इन लोगों के भड़काऊ बयानों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अयोध्या ही नहीं, पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था चाक चैबंद रहेगी और किसी को डरने की आवश्यकता नहीं।

हाशिमपुरा नरसंहार और कांग्रेसी ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ in Punjab Kesari

करीब 31 साल बाद 31 अक्तूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाशिमपुरा नरसंहार मामले में 16 पीएसी जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इससे पहले निचली अदालत ने इन्हें बरी कर दिया था। क्रूरता की पराकाष्ठा माने जाने वाले इस कांड में 42 मुस्लिम मारे गए थे। एक साक्ष्य के अनुसार मेरठ दंगों के समय पीएसी ने हाशिमपुरा से एक ट्रक में 40 – 45 लोगों को अगवा किया गया था और इनमें से 42 को गोलियां मारकर मुरादनगर गंगनहर में फेंक दिया गया था।

इस मामले का लगभग हर विवरण अखबारों में छप चुका है। लेकिन जो बात नहीं छपी वो ये कि जब ये कांड हुआ तब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और खुद को स्वतंत्रता सेनानी बताने वाले वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे। आश्चर्य की बात है कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को पानी पी पी कर दिन रात कोसने वाली कांग्रेस हाशिमपुरा पर खामोश रही। न तो सोनिया गांधी और न ही राहुल गांधी ने इसके लिए देर से ही सही, माफी मांगी और न ही अफसोस जताया। अखलाक की मौत पर टसुए बहाने वाली मोमबत्ती ब्रिगेड भी नदारद रही। लगता है जैसे सबको सांप सूंघ गया।

दंगों के प्रति कांग्रेस, उसकी मोमबत्ती ब्रिगेड और ‘असहिष्णुता गैंग’ का नजरिया हमेशा से दोगला रहा है। जहां कांग्रेसी या उनके सहयोगी फंसते नजर आते हैं, वहां ये मुंह फेर लेते हैं और मुंह में सोंठ डाल कर बैठ जाते हैं, लेकिन मोदी सरकार को ये उन घटनाओं के लिए भी बदनाम करते हैं और घेरने के लिए तैयार हो जाते हैं, जहां उसका दोष तक नहीं होता। इस गैंग ने भारत में मुसलमानों की माॅब लिंचिंग के चुनींदा मामलों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत जोर-शोर से उछाला और इसका आरोप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी सरकार पर लगाया हालांकि ये एक भी मामले में इनका हाथ साबित नहीं कर पाए। वैसे भी ये कानून-व्यवस्था के मामले हैं जो केंद्र सरकार नहीं, राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

ये संयोग ही था कि जिस दिन हाशिमपुरा मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया, ठीक उसी दिन इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी थी। ये दिन भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जन्मजयंती का भी था। इस दिन एक ओर तो प्रधानमंत्री मोदी सरदार पटेल की मूर्ति का लोकार्पण कर रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस इंदिरा गांधी को शहीद बताते हुए उन्हें याद न करने के लिए मोदी को कोस रही थी। इंदिरा को शहीद मानना य न मानना, कांग्रेस की अपनी मर्जी है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो सीमा पर लड़ते हुए शहीद हुईं थीं? नहीं। असल में वो अपने ही बुने हुए उस राजनीतिक जाल में फंस गईं थीं जो उन्होंने पंजाब में अकालियों को घेरने के लिए बुना था। उन्होंने अपनी विभाजनकारी राजनीति की कीमत चुकाई थी। उन्होंने ऐसा ही खेल श्रीलंका में भी खेला था जिसका खामीयाजा अंत में उनके पुत्र राजीव गांधी को जान दे कर चुकाना पड़ा। वैसे कांग्रेसियों से ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि यदि इंदिरा ‘शहीद’ थीं तो उन हजारों सिखों का क्या जो उनकी हत्या के बाद फैले दंगों में मारे गए और जिनके परिजनों को आज तक न्याय नसीब नहीं हुआ।

खुद को ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ और ‘भारत की बहुलता’ का संरक्षक बताने वाली कांग्रेस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को ‘अल्पसंख्यक विरोधी’, ‘विभाजनकारी’ और ‘सांप्रदायिक’ आदि बताती है, लेकिन कभी अगर उसने आइना देखा होता या अपने गिरेबान में झांक कर देखा होता तो उसे अपनी असलियत बखूबी पता होती। आज वो ‘अल्पसंख्यकों के संरक्षण’ के नाम पर पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी संगठन से सहयोग कर रही है और ‘देश की बहुलता’ के नाम पर राष्ट्रविरोधी नक्सलियों से हाथ मिला रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राज बब्बर तो नक्सली आतंकियों को क्रांतिकारी और उनके खूनी खेल को ‘हक की लड़ाई’ बताते हैं। वहीं उसके एक अन्य नेता अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में दुर्दांत नक्सलियों का मुकदमा लड़ रहे हैं।

वैसे इस्लामिक आतंकियों को तुष्ट करने की कांग्रेसी नीति भी आश्चर्यजनक नहीं है। आजादी के बाद जब सरदार पटेल ने भारत में रह गए मुसलमानों से भारत के प्रति वफादार होने की बात कही तो जवाहरलाल नेहरू ने उनकी शिकायत महात्मा गांधी से कर दी। नेहरू नहीं चाहते थे कि किसी मुसलमान से भारत के प्रति वफादार होने की उम्मीद की जाए। आगे चलकर हम देखते हैं कि कांग्रेस ने न तो मुस्लिम पर्सनल लाॅ को ही हाथ लगाया और न ही कभी उनसे ये उम्मीद की या उन्हें कहा कि वो भारत और इसके संविधान के प्रति आस्था रखें। क्या ‘उदारवाद’ और ‘बहुलता का सम्मान‘ करने का अर्थ ये होना चाहिए कि मुसलमानों से देश और उसके संविधान के प्रति निष्ठा की अपेक्षा भी न की जाए और उनमें पनप रहे अतिवादी और आतंकवादी तत्वों को नजरअंदाज किया जाए? इसे अंधा तुष्टिकरण न कहा जाए तो और क्या कहा जाए?

एक परिवार के आसरे पलने वाली कांग्रेस को आजकल बड़ी परेशानी है कि भाजपा सरदार पटेल को क्यों बढ़ावा दे रही है। क्या उसे ये याद दिलाना होगा कि सरदार ने भारत को एकजुट किया जबकि नेहरू ने सत्ता की हवस में देश के विभाजन को बढ़ावा दिया। यही नहीं उन्होंने देश को कश्मीर की समस्या दी। हाथ में आई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट चीन को भेंट कर दी और तिब्बत पर चीन का वर्चस्व खुशी-खुशी स्वीकार किया। नेहरू एक तरफ तो खुद को जनवादी वामपंथी बताते थे तो दूसरी तरफ उन्होंने देश पर अंग्रेजी थोप दी जिसे एक प्रतिशत लोग भी नहीं समझते थे। नेहरू के वामपंथी रूझानों ने देश के विकास को इस मूर्खतापूर्ण विचारधारा का बंधक बना दिया और निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों को खलनायक जिसने अंततः उद्यमिता को ही कुंठित किया। सेना के प्रति नेहरू की नफरत की कीमत भी भारत ने 1962 में चुकाई जब चीन ने देश के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया।

कांग्रेस ने लंबे अर्से तक देश में शासन किया और बच्चों को वहीं इतिहास पढ़ाया जिसमें नेहरू और उसके वंशजों को महिमामंडित किया गया। लेकिन आज के वाई-फाई युग के युवा और बच्चे उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वो पूछते हैं कि इस्लामिक आतंकियो और नक्सलियों से सहयोग करने वाले राहुल गांधी ‘राष्ट्रवादी’ कैसे और क्यों हो सकते हैं? वो जानना चाहते हैं कि अपनी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सोनिया गांधी ने नक्सलियोें को क्यों जगह दी? वो पूछते हैं कि अगर नेहरू धर्मनिरपेक्ष थे तो उन्होंने धर्म के आधार पर बंटवारा क्यों स्वीकार कर लिया?

वो जब इंटरनेट पर भारत में दंगों का इतिहास खंगालते हैं तो पता लगता है कि सबसे बड़ी विभानकारी दंगा पार्टी तो कांग्रेस ही है। अगर नेहरू सत्ता की भूख पर काबू रखते तो शायद विभाजन टल सकता था और साथ ही टल सकती थी मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी जिसमें बीस लाख लोग मारे गए और करोड़ों विस्थापित हुए। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता संभाली और साथ ही दंगों की सरपरस्ती भी।

कांग्रेस के शासन में हुए कुछ दंगों की बानगी देखिए – रांची दंगे (वर्ष – 1967, मृतक – 184), गुजरात दंगे (वर्ष – 1969, मृतक – 512), मुरादाबाद दंगे (वर्ष – 1980, मृतक – 400), नेल्ली, असम दंगे (वर्ष – 1983, मृतक – 2191, गैरसरकारी अनुमान – 10,000), भिवंडी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 278), सिख विरोधी दंगे (वर्ष – 1984, मृतक – 2,800, गैरसरकारी अनुमान – 5,000), अहमदाबाद दंगे (वर्ष – 1985, मृतक – 275), मेरठ दंगे (वर्ष – 1987, मृतक – 346), भागलपुर दंगे (वर्ष – 1977, मृतक – 1,000)। ये तो सिर्फ बानगी है, केंद्र और विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों की सूची बहुत लंबी और वीभत्स है। अगर हम हरेक दंगे के कारणों का विश्लेषण करने बैठें तो आपको ऐसी-ऐसी बातें पता चलेंगी की आपको देश की इस सबसे पुरानी दंगा पार्टी से नफरत हो जाएगी और आप आगे से इसे वोट देने से पहले कई मर्तबा सोचेंगे।

हाशिमपुरा दंगों पर आए फैसले के बहाने हमने कांग्रेस की सोच और उसके शासनकाल में हुए दंगों पर एक नजर डाली। अब आप ही सोचिए कि जब दंगे हुए होंगे तो हर धर्म के लोग मारे गए होंगे। इन दंगों को हवा देने वाली पार्टी न तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ हो सकती है और न ही ‘राष्ट्रवादी’, उसका तो सिर्फ एक ही लक्ष्य है – भले ही भारतीयों की लाशें बिछानी पड़ें पर सत्ता मिलनी चाहिए। इसलिए हम इसे सिर्फ ‘सत्तावादी’ पार्टी कहेंगे।

“Are we aiming for Shinkasen before we seek our civic sense?” in TOI Blogs

History repeats itself, once as tragedy then as farce. We have repeatedly witnessed farcical mishaps but are yet to recognise tragedy as an irretrievable loss. It is no surprise that people lose their lives while crossing railway tracks in India, however it is a dismal situation that years after independence we are yet to reach an understanding with the common populace. Last week, 61 people lost their lives in Amritsar on the occasion of Dussehra. A festival symbolic of triumph over evil, will now sadly be recalled as the day innocents lost their lives. It is indeed history repeating itself for Amritsar, where days of festivities are remembered years hence for tragedies. While Jallianwala Bagh incident on Baisakhi will forever be the indelible scar that the external enemy left on India; the 2018 Dussehra incident will be remembered as a scar left by the enemy within.

If we look at the classic immediate response to tragedies in our country, we can trace an impeccable chart of blame routes. It is perhaps this area that we give our best performances at. As soon as the incident caught the eye of media, the fuel to flame was set indiscriminately. From pedestrians to the train driver to parliamentarians, to the police, to the Municipal Corporation, all have faced flak. In passing the blame, no stone was left unturned. Why are we obsessed with pinning a scape-goat rather than taking responsibility? Does it take too much ego, to be apologetic for the loss of innocent lives? Perhaps we have encouraged this blame game, by taking sides as bystanders. Perhaps we have instilled this toxic culture and we abide by it religiously, every time we assign blame.
We need scrutinise this culture more closely, because this is the AmritsarAmritsarbedrock of our management abilities. We need to attend to our culture of responsibility and adaptability, before we welcome modern age developments. Maybe we need to polish our civic sense before we aim for Shinkasen. In the age of burgeoning technological advances, catastrophes of crowd management have sadly become the prime concern. From stampedes at Elphinstone, Satraganchi, crowd management becomes foremost public safety concern.

We need to look at how citizens define civic sense. It does begin and end with keeping our surroundings clean; it is also about how we use communal spaces and for what purposes.  This incident brings to light how railway tracks are used as communal spaces by many people day in and day out. Some gather here for their evening share of shenanigans, some for cutting their route short by a few steps and a couple of minutes and others simply for catching some air. The fact that they find railway tracks to suite their convenience speaks volumes about the lack of space for communal purposes in the cities. While public safety awareness must be prioritised above all, taking cognizance of citizen grievances would be the way to break free from this vicious cycle.

We could imbibe a great deal of societal goals just by looking at revolutions and their immense power to transform. The Cuban literacy campaign was one such massive success. During the year of 1961, ‘literacy brigades’ were sent out and educators were sent to train and teach the illiterate to become self sufficient in reading and writing. Post this endeavour, the national literacy rate reached to 96% almost 36% jump in one year. This tiny step to make the population literate goes a long way beyond just being able to read and write. Education and literacy are not limited to knowledge acquisition and they invariably make a person the best version of himself. We need our workers, our citizens, our parliamentarians to reach this level for the common good of all.

Let us not conspire to place the blame on one authority, one person, and one situation and satiate our need to demonise those involved in this gut wrenching accident. It would be rather more humane to register our fault lines and start working on them without much ado. The parliamentarians need to ensure safer public spaces to accommodate people. The citizens need to ensure their safety and that of others, and they need to take responsibility for their actions and instill a civic sense for their own good. As for the Municipal Corporation, this event is an eye opener, and it should be treated as a reminder for compulsory precautionary measure to avert possible damages in the future. Together we can overcome obstacles, by taking more responsibility and according less blame.

“Off to Mars; yet stuck in drains!” in TOI Blogs

The grim reality of Manual Scavenging in India

Manual scavenging continues to plague us, decade after decade; death after death. We as a country have constantly challenged ourselves to find solutions to every problem, be it miniscule or scaling the lengths and breadths of mankind. Through our innovative methods and constantly boggling minds, we have dotted ourselves on the ‘World Achievers’ map in diverse fora. However, this basic element of human societies; sanitation, has received dismal attention.

Isn’t it ironical that, from being the world’s most ancient civilisation, the first well-planned drainage system, we have today come to the point of irreversible damage? To blame our ancestor architects would be superfluous, for they led the path even when scientific discovery didn’t favour conditions to explore space. How then did we end being a generation of lackadaisical dullards, when it comes to ground level management of our existence as a society?

Manual Scavenging is perhaps this century’s worst Human Rights breach. Despite concerted efforts of scientifically and environmentally conscious people batting for human rights, change has been reluctant to manifest. Bezwada Wilson, the founder of Safai Karamchari Andolan has been campaigning for an end to Manual Scavenging and his efforts were even recognised at the international dais when he became the recipient of the Ramon Magasasay award in 2016. With this achievement, the issue gained considerable spotlight back home, yet the snail’s pace for change remains.

As recently as last month, three labourers died while manually cleaning a sewage tank in Loni, Ghaziabad due to suffocation induced by poisonous gases. While we are a developing country, struggling with rising petrol prices and obsessing over Dollar exchange rate, we can certainly pay more attention to lives lost to the inefficiency in the sanitation system. Although Prime Minister Narendra Modi’s Swach Bharat Abhiyan has taken cognizance of this crucial issue, we as citizens, entrepreneurs, and socially responsible people need to think more and do more.

We require capital investment for appropriate gear such as goggles, gumboots, waterproof gloves, and respiratory protection. Along with building toilets in rural and urban areas, we need the Swachta Mission to tackle the issue of faecal sludge management first and foremost. For a rain-fed, water-scarce country like ours, it becomes all the more relevant. However certain daunting questions remain, where do we get funds for the same? What technology is the most appropriate for a country like ours? What are some of the eco-friendly and budget-friendly ways we can adopt? Most importantly how do we reduce the waste generation, how do we become responsible stakeholders in this fight?

The government of India has often outsourced activities that it was unable to reach perfection in. Although met with resistance, cleaning of monuments has been privatised and the step is welcome if the results are in favour. A similar model in sewage treatment could perhaps clear the murk of our sanitation system. Faecal sludge management has been introduced in railways, with a concept of Biodigester toilets, designed by Defence Research and Development Organisation (DRDO). In these toilets, the anaerobic disintegration of human waste through bacteria releases Methane gas which can be further re-used. This being cost-effective solution is quite appropriate and brings about a transformation in the level playing field.

Apart from the technological innovation in the drainage system and capital investment required for sanitation gear, we also need to scrutinise the aim of reaching ‘Zero Waste’. Every couple of years, Sweden makes it to the headlines for being the most advanced country when it comes to recycling and waste management. It goes extra miles, by importing waste from neighbouring countries to keep its state of art recycling plants functioning. The energy released from burning waste is then utilised in keeping its national heating network running. Such a renewable waste management approach is inspirational!

In European countries, there is a ban on landfills; hence they send the garbage to Sweden instead of paying fines. Though we have an upper limit on landfills, it almost looks like the 4 landfills of Delhi are competing with each other as to who reaches the sky first. Not only has it caused deaths due to collapsing piles of garbage but the toxic waste has been percolating into the groundwater over the years. What could be more disastrous than living in a polluted environment having nothing else to consume, but polluted food and water. The cycle is self-defeating.

Hydraulic engineering needs a revamp for most cities drainage systems, the sooner it’s done the better. Banned in 1993, manual scavenging continues to be practiced in 2018. It is about time, that manual scavenging is taken off our dictionaries, off the face of this planet. Each and every life matters and should be treated with dignity. After all, it couldn’t be more appropriate, to call cleanliness next to godliness, and losing lives in the pursuit is nothing short of a debacle.

‘मी टू’ और रिवर्स तालीबनाइजेशन का खतरा in Punjab Kesari

‘मी टू’ के कारण समाज में जैसे भूचाल आ गया है। ऐसे मौके पर हिंदी फिल्म दाग के गाने का मुखड़ा याद आता है – जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। कब कहां किसका असली चेहरा बेनकाब होगा, किसका मुखौटा नोच फेंका जाएगा, हर ओर भय मिश्रित आशंका है। लोग अपने नजदीकी रिश्तेदारों को भी संदेह की नजर से देखने लगे हैं। अधिसंख्य लोग इसे आधुनिक भारतीय नारी के साहस और संघर्ष का प्रतीक मान रहे हैं। जब अमेरिका में ‘मी टू’ का बवंडर उठा था तो यहां लोगों ने सोचा था कि भारत में ऐसा कुछ होना असंभव है क्योंकि भारतीय नारी भले ही कितनी आधुनिक क्यों न हो वो ऐसे विषय सार्वजनिक रूप से नहीं उठाएगी क्योंकि इससे कहीं न कहीं उसकी खुद की छवि भी धूमिल होगी।

लेकिन अंततः हमने देखा कि भारत भी ‘मी टू’ तूफान से अछूता नहीं रहा। टेलीविजन और फिल्मों से शुरू हुआ ये अभियान आखिरकार विश्वविद्यालयों, मीडिया से होता हुआ राजनीति तक भी पहुंचा और इस चक्कर में विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर और एनएसयूआई अध्यक्ष फिरोज खान को अपनी गद्दी भी गंवानी पड़ी। कांग्रेस ने अगर अकबर का मामला उठाया तो भारतीय जनता पार्टी ने राहुल पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली सुकन्या देवी, सेक्स सीडी कांड में फंसे अभिषेक मनु सिंघवी और संदिग्ध हालात में मारी गई शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का मामला जोर-शोर से उठाया। इस बीच महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सभी राजनीतिक दलों को सुझाव दे डाला कि वो महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों की जांच के लिए प्रकोष्ठ बनाएं ताकि काॅरपोरेट सेक्टर जैसे उनके यहां भी ऐसे मामलों की सुनवाई हो सके और पीड़िताओं को न्याय मिल सके।

आधुनिकता का सारा दर्शन, राजनीति, सुझाव और सुझाव देने वाली समिति का विचार एक तरफ, ये पूरा प्रकरण कई अन्य गंभीर सवाल भी उठाता है। कुछ लोग इसे पुरूषवादी सोच कह सकते हैं लेकिन चाहे एससी-एसटी एक्ट का मामला हो या दहेज कानून के सख्त प्रावधानों का, स्वयं सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि बिना पर्याप्त आधार के, महज शिकायत की बिना पर किसी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहां तो हम देखते हैं कि कथित आरोपियों का पूरा का पूरा मीडिया ट्रायल चल रहा है। कानून का एक नियम है – जब तक व्यक्ति दोषी न साबित हो, वो निर्दोष है। यहां तो पुलिस में एफआईआर भी दर्ज नहीं होती और महज एक सोशल मीडिया पोस्ट के बूते पर व्यक्ति का मानमर्दन आरंभ हो जाता है, सुर्खियां बन जाती हैं, लोग चटखारे ले-ले कर चर्चा शुरू कर देते हैं।

ऐसे में सहज ही ये विचार आता है कि इस पूरी कार्यवाही का उद्देश्य आखिर क्या है – भड़ास निकालना, समाज को सतर्क करना, न्याय पाना, किसी को लांछित करना, बदला लेना या सिर्फ विवाद खड़ा करना? गंभीरता से सोचें तो ‘मी टू’ से किसी को शीघ्रता से न्याय मिलने की अपेक्षा करना तो उचित नहीं होगा, हां इससे बदला अवश्य लिया जा सकता है, किसी को बदनाम अवश्य किया जा सकता है, अगर कोई सोचता है कि विवाद खड़ा करके और सुर्खियां बटोर कर न्याय हासिल किया जा सकता है, तो ये व्यर्थ ही होगा। न्याय तो फिर भी स्थायी संतोष दे सकता है, सुर्खियों का क्या? आज हैं, कल नहीं।

भारतीय इतिहास में ‘नो मी नाॅट’ के असंख्य प्रसंग हैं जब हमारी बहादुर नारियांे ने अत्याचारियों का जमकर प्रतिकार किया और जरूरत पड़ी तो मौत को भी गले लगाया। चाहें रामायण हो या महाभारत, भारत के इन दोनों प्रमुख महाग्रंथों के मूल में नारी ही है। रामायण में रावण के आतंक के बावजूद सीता हार नहीं मानतीं, वहीं महाभारत में दुर्योधन के दंभ और लिप्सा के कारण चीरहरण का शिकार होने वाली द्रौपदी आखिरकार बदला लेकर ही रहती हैं। सवाल ये उठता है और ये निःसंदेह बड़ा सवाल है कि आज ‘मी टू’ के तहत सामने आने वाली महिलाएं तब क्यों नहीं बोलीं जब उनके साथ कथित तौर पर ज्यादती की जा रही थी? अगर वो तब आवाज उठातीं, तो संभव है वो कुछ और महिलाओं को भी कथित खलनायक का शिकार होने से बचा पातीं? जिस समय इनके साथ कथित ज्यादती हुई, तब ज्यादातर महिलाएं व्यस्क थीं, पढ़ी-लिखी थीं, पूरे होशो-हवास में थीं कि ज्यादती का तुरंत विरोध करतीं। अगर इन्हें वास्तव में ‘ज्यादती’ इतनी बुरी लग रही थी तो इन्होंने उसी समय तुरंत उस व्यक्ति का झापड़ क्यों नहीं रसीद किया या थाने जा कर रिपोर्ट नहीं लिखवाई? हम ये नहीं कहते कि ये महिलाएं खुद्दार नहीं हैं, लेकिन क्या किसी खुद्दार महिला को तुरंत प्रतिकार नहीं करना चाहिए? उसे बीस साल तक क्यों इंतजार करना चाहिए?

अगर कोई नासमझ बच्ची अपने साथ हुई ज्यादती का व्यस्क होने पर खुलासा करे तो समझ में आता है कि जब उसके साथ गलत हरकत हुई, तब शायद उसे उसका अर्थ भी नहीं मालूम था, लेकिन पूर्णतः शिक्षित, व्यस्क, खुद के आधुनिक होने का दावा करने वाली महिलाएं बीस साल बाद नींद से जागें तो थोड़ा अजीब लगता है। इन महिलाओं की मंशा पर भी संदेह पैदा होता है।

इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो के फिल्मी किस्सों से लेकर आधुनिक फिल्मी पत्रिकाओं तक, ऐसे बेशुमार किस्से हमारे आपके सामने से गुजरे होंगे। कभी इसे ‘फेवर’ बोला गया तो कभी ‘कास्टिंग काउच’। जब तक निभे तब तक ‘लिव इन’, जब बिगड़े तो ‘बलात्कार’। आधुनिक भारत में स्त्री-पुरूष संबंधों में ‘नई सोच’ और ‘आक्रामक महिला समर्थक’ कानूनों ने नए आयाम जोड़े हैं। सेक्स से जुड़ी नैतिकता की पुरातनपंथी मान्याताएं लगभग हवा हो चुकी हैं। पहले जहां पुरूष बादशाह होता था वो अब ‘रिसीविंग एंड’ पर आ गया है।

समाज आज शायद ये समझ नहीं पा रहा, कि पहले आक्रामक महिला समर्थक कानूनों और अब ‘मी टू’ जैसे अभियानों के कारण आम महिलाओं की मुश्किलें कितनी बढ़ गईं हैं। कभी आपने गौर किया कि अचानक ऐसी संस्थाओं की संख्या कितनी बढ़ गई है जिसमें सिर्फ पुरूषों को काम दिया जाता है और महिलाओं के लिए दरवाजे सदा के लिए बंद कर दिए गए हैं। ये एक किस्म का ‘रिवर्स तालिबनाइजेशन’ हो रहा है। पुरूषों और महिलाओं के बीच सहजता तेजी से खत्म होती जा रही है। महिलाओं के लिए अवश्य ही सुरक्षित माहौल होना चाहिए, लेकिन पुरूषों का क्या? एक शिकायत के बाद उन्हें जेल भेज देना चाहिए या एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनके जीवन भर के यश को मिट्टी में मिला देना चाहिए? सेक्स एक स्वाभाविक-प्राकृतिक भावना है। कभी किसी ने सोचा कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो स्त्री और पुरूष कैसे अपनी भावना की अभिव्यक्ति कर पाएंगे? ऐसे बंद समाज के क्या दीर्घकालिक परिणाम होंगे?

न तो हम महिलाओं पर ज्यादतियों का समर्थन करते हैं और न ही उनकी न्याय की आकांक्षा का, लेकिन हम कानूनों का दुरूपयोग रोकने के पक्ष में अवश्य हैं। भारत के लगभग हर सरकारी विभाग और काॅरपोरेट में ऐसे प्रकोष्ठ बनाए गए हैं जहां महिलाएं ज्यादतियों की शिकायत कर सकती हैं, लेकिन आश्यर्य है कि दुनिया को जागरूक बनाने का दावा करने वाले मीडिया में ऐसे प्रकोष्ठ देखने को नहीं मिलते। यही हाल फिल्म और टीवी जगत का भी है। बेहतर होगा कि वहां भी परिस्थितियों के अनुसार ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं। महिलाओं को सुरक्षा तो मिले ही, लेकिन मिथ्या आरोप लगाने वाली महिलाओं को सजा और पुरूषों को हर्जाना भी मिले।

“#MeToo: Keeping silent v/s staying woke” in TOI Blogs

Legend it that the fate of truth and lie was irrevocably met with, on one fine day.

The lie says to the truth, “It’s a marvellous day today!”

Truth looks up to the skies and sighs, for the day was really beautiful.

They spend a lot of time together, ultimately arriving beside a well.

The lie tells the truth: “The water is very nice let’s take a bath together!”

The truth tests the water and discovers that it indeed is very nice.

They undress and start bathing. Suddenly the Lie comes out of the water, puts on the clothes of truth and runs away. The furious truth comes out of the water and runs everywhere to find the lie and get her clothes back.

The world, seeing the truth naked; turns its gaze away, with contempt and rage. The poor truth returns to the well and disappears forever, hiding therein, its shame.

Since then the lie travels the world dressed as truth, satisfying the needs of the society, because the World in any case, harbours no wish at all to meet the naked truth. (excerpt taken from The Speaking Tree)

In the light of the #MeToo movement that has taken the nation by storm, truth and lie have become the two most talked of participants. Anyone who has seen Akira Kurosawa’s Rashomon would understand how truth is a VIBGYOR and each colour has a story to tell. The allegations seem to be just about as complex. However, just the fear of false allegations should not hold us back, from instilling the fear of crime abetted. The crime of violating consent, misconduct, gangrapes are the most heinous and deserve to be brought to book at all costs.

Karl Marx and his sympathisers relegated women to the second or the lesser sphere and believed that in the scheme of things, women must become forbearers of this lesser sphere. They were to do their duty diligently and produce a score of children (read men) who would then go on to build an indestructible workforce or at least a Reserve Army. However convenient the explanation seemed for years gone by, women’s role in the society has transcended the sphere of being a child making factory. The new age workforce is a slap on the face of misogynistic societies. A transition is actively shaping up and therefore causing inconvenience to years of imbalanced power rhetoric. Women have come to occupy important roles in a plethora of professional spheres and are comfortably outdoing the age-old stereotypes.

The #MeToo movement is rather revolutionary as it hits the bull’s eye. For the first time in so long, more and more women are using the social media as a platform to unveil years of hidden trauma and hopelessness. We have lived in a society where the rich got away with most of the crimes, that the others had to inevitably bear the consequences of. It is ironical that it isn’t the justice system that is making people come forth and unleash their complaints, but rather social media, that has mostly been an inconvenient mirror to the society. This movement is making the society and its hierarchy of power and gender politics stand on their head.

Some men have apologised, some resigned, some are defiant and in turn have called it a reversed witch-hunt. A lot of men seem to sympathise with the alleged, calling women, sympathy seekers, drama queens and the sorts. Truth be told, these are the kind of reactions which strengthen our resolute in the fight against sexual assaults. Victim shaming has been the most played out card in history; unfortunately, it is no longer going to stub voices. The #MeToo movement has indeed given voice to the voiceless; power to the powerless.

Why is now the right time, you ask.

When an ambulance with an all-powerful siren, streams through the roads unhindered and yet reaches the hospital late, it comes under scanners. Not just the ambulance driver, traffic police, people’s civic sense, road structure, you name it and an avalanche of probabilistic reasons ascend.

Why then do we show apathy to justice delayed and often denied, when it comes to women survivors of rape and misconduct. After all, isn’t the physical, mental, and psychological health of women just as important, if not more?

Instead of questioning why women are opening up now and that too to social media, a gracious society would thank them for coming forth. However, media trials are only a channel for those who had their hands tied. Media trials do not constitute as a legal course of action.

It would be laughable to assume that these women coming out on social media are unaware of the same. It is taught in 8th standard school textbooks, that an FIR must be filed and in case it is not registered by the police, then one can approach the Magistrate. However robust our legal justice system is, as evident, it is inadequate in registering cases thus filed. The culture of inherent male chauvinism, victim shaming, abuse of power has made filing FIRs a lot more cumbersome. A responsible society must come forth to nip the issue in the bud. It begins with accepting that there is a web of entrenched issues to deal with.

The government of India has made it mandatory for every employer to constitute an Internal Complaints Committee (ICC). Ministry of women and child development dedicated a portal of ‘She-Box’ where women can submit complaints. These proactive measures are certain outlets apart from filing an FIR.

It becomes all the more relevant now, to question whether it is indeed time for gender sensitisation courses to start at school level. For one, it is the role of the stakeholders to look into the crux of the problem. And we are all stakeholders in this society, parents, school teachers, social media influencers, advertisements, movies, government, corporate houses, professional office spaces, are each to follow a role set that makes them responsible citizens of the society.

Let us stop normalising errant behaviour, let us stop casually airing “Men will be Men” across TV and in everyday conversations. It is rightly said, “Spare the rod, and spoil the child” If parents and teachers do not step up and mould children right from their youth, it is likely that they would become deviant from the norms of the society. They often inculcate vices, growing up; transitioning from unchecked youth to belligerent adults.

This is a war against apathy, misogyny, chauvinism; it is not a war between men and women, it is not about Bollywood v/s Hollywood. The sooner we understand this, the sooner we become ‘Woke’. Let us all aim for ‘Justice sans Frontiers’.

“प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उत्तर भारतीयों को भड़काने की साजिश” in Punjab Kesari

गुजरात में कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस का वीभत्स दंगाई चेहरा एक बार फिर उजागर हुआ है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सांप्रदायिक दंगे नहीं करवाए, उसने गुजरात में 14 माह की मासूम बच्ची के घृणित बलात्कार का बहाना बना उससे भी घृणित काम किया – वहां दूसरे राज्यों, विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार 1⁄4ध्यान रहे दोनों राज्यों में एनडीए की सरकार है1⁄2 से आए मजदूरों-कामगारों पर हमला बोल दिया और उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया। इस पूरे षडयंत्र के पीछे अगर कोई है तो वो है राहुल गांधी का खास आदमी अल्पेश ठाकोर। बच्ची क्योंकि ठाकोर समुदाय की थी, तो इस वहशी को अपनी दरिंदगी दिखाने का और भी मौका मिल गया और इसकी ‘ठाकोर सेना’ 1⁄4पालतू गुंडों 1⁄2 ने बाहर से आए मजदूरों पर कहर बरपा कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं, कांग्रेस के अनेक विधायकों और कार्यकर्ताओं ने भी इस जघन्य कांड में अल्पेश का साथ दिया।

प्रवासियों को घरों में घुस कर धमकाया गया, ईंट, पत्थर, सरिया, तलवार, जो हाथ आया, उसका इस्तेमाल किया गया। आदमियों को तो छोड़िए, महिलाओं और छोट-छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। मजबूरन हजारों की तादाद में लोगों ने पलायन किया। जब अल्पेश ठाकोर से लोगों ने इस विषय में पूछा तो वो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए घड़ियाली आंसू बहाने लगा और राजनीति छोड़ने के दावे करने लगा। अन्य राज्यों के लोगों को लग सकता है कि बाहरी लोगों के प्रति अल्पेश और उसकी सेना की हिंसा बच्ची के बलात्कार का नतीजा थी, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। अल्पेश के अनेक पुराने वीडियो सामने आए हैं जिनमें वो स्थानीय लोगों को बाहरी मजदूरों के खिलाफ भड़का रहा है और हिंसा की न केवल धमकी दे रहा है, बल्कि लोगोें को उसके लिए उकसा भी रहा है।

राज्य पुलिस ने कथित बलात्कारी को जल्द ही पकड़ लिया, लेकिन अल्पेश और उसके गुंडों ने फिर भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच शुरू कर दिया। स्पष्ट है कि इसके पीछे कोई ‘आक्रोश’ काम नहीं कर रहा था। यह सोची-समझी साजिश थी जिसका असल मकसद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पशोपेश में डालना था जो स्वयं गुजराती हैं, लेकिन काशी से चुनाव लड़ कर लोकसभा पहुंचे हैं। इसका दूसरा और खास मकसद था उत्तर भारत के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काना। जाहिर है, इस कांड के शुरू होते ही काशी में प्रधानमंत्री को धमकी देने वाले पोस्टर लगने शुरू हो गए जिसमें उन्हें चेताया गया था कि आखिर तो उन्हें चुनाव लड़ने यहीं आना पड़ेगा।

अल्पेश के आका राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री को उलाहना देना शुरू कर दिया कि पहले तो वो खुद लोगों को रोजगार नहीं दे पा रहे, और जब युवा अपना घर-बार छोड़ कर दूसरे राज्यों में रोजीरोटी ढूंढने जा रहे हैं तो उनकी रक्षा भी नहीं कर पा रहे। कहना न होगा, आलाकमान का आदेश मिलते ही, कांग्रेसी गिद्धों की पूरी टोली ने इस मसले पर डिजीटल मीडिया में मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। ये तो उसी कहावत को चरितार्थ करने जैसा है – उलटा चोर कोतवाल को डांटे। स्पष्ट है कांग्रेसियों ने इस साजिश को पूरी मेहनत और तैयारी से लागू किया। गुजरात में अल्पेश और उसके गुंडों से लेकर दिल्ली में आलाकमान और मीडिया में कांग्रेसी पिट्ठुओं तक सबने अपना फर्ज बखूबी निभाया और पूरे देश में विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश की गई। महाराष्टं में मोदी के खिलाफ नफरत फैलाने की कमान संभाली मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम ने जो खुद मूलतः बिहार से हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार की समाजवादी पार्टी 1⁄4सपा1⁄2, बहुजन समाज पार्टी 1⁄4बसपा1⁄2, राष्ट्रीय जनता दल 1⁄4राजद1⁄2 जैसी सीआईसी पार्टियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने शुरू कर दिए। आग लगाने वाले अल्पेश ठाकोर के खिलाफ तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटा, वो सीधे मोदी पर गोले दागने लगे – मोदी और उनकी पार्टी की राज्य सरकार बाहरी लोगों की रक्षा में असफल रही है…मोदी अब उत्तर प्रदेश और बिहार में किस मुंह से जाएंगे जहां के लोगों को सबसे ज्यादा शिकार बनाया गया है। इस पूरे खेल में

सीआईसी मीडिया की जितनी निंदा की जाए वो कम है। अल्पेश ठाकोर और उसके गुंडों की हरकतें वीडियो में कैद हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन ये लोग बजाए कांग्रेस की ओछी हरकतें दिखाने के, बड़ी फरमाबरदारी से राहुल गांधी के अजीबो-गरीब बयान दिखाने में लगे रहे। इनमें से एक ने भी राहुल से अल्पेश के बारे में सवाल नहीं पूछा उलटे राज्य में हिंसा के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया।

इस कांड से एक बात साफ हो गई है कि राहुल गांधी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले गुजरात विधानसभा में चुनाव में हमने देखा कि कैसे उन्होंने अल्पेश ठाकोर के साथ ही हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे लोगों से हाथ मिलाया। अल्पेश के साथ ही हार्दिक और जिग्नेश का इतिहास भी संदिग्ध और विवादास्पद है। हार्दिक ने 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में पटेल आरक्षण की मांग पर रैली की। रैली के बाद जब वो उपवास पर बैठने लगे तो पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश। इस पर उनके समर्थकांे ने हिंसा और तोडफोड़ शुरू कर दी। हिंसा इतनी अधिक बढ़ गई की सरकार को कफ्र्यु लगा कर सेना बुलानी पड़ी। जिग्नेश मेवानी की नक्सल पृष्ठभूमि भी जगजाहिर है। गुजरात चुनाव और बाद में भीमा कोरेगांव आदि में उसके भड़काऊ भाषण किसी से छुपे नहीं हैं। अर्बन नक्सल रोना विल्सन के लैपटाॅप से महाराष्टं पुलिस को जो दस्तावेज मिले उनसे स्पष्ट है कि उसने कांग्रेस नेतृत्व और नक्सलियों के बीच संपर्कसूत्र की भूमिका भी निभाई। इन्हीं दस्तावेजों से ये भी पता चला था कि कांग्रेस दंगा फैलाने और समाज को तोड़ने के लिए नक्सलियों को आर्थिक और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। इसका सबूत हमें तब मिला जब वरवर राव, गौतम नवलखा, वरनन गोंजालविस, अरूण फरेरा और सुधा भारद्वाज जैसे दुर्दांत नक्सलियों की पैरवी करने कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी स्वयं सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और उनके समर्थन में लेख लिखते पाए गए। यहां चलते-चलते एक बात और बता दें, गुजरात चुनाव में इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया 1⁄4एसडीपीआई1⁄2 ने कांग्रेस और जिग्नेश की पूरी मदद की। यही नहीं कर्नाटक चुनाव में भी एसडीपीआई ने कांग्रेस का पूरा साथ दिया।

गुजरात सरकार को अल्पेश ठाकोर द्वारा प्रायोजित दंगों को चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। भले ही कांग्रेसियों को गुजरात में सिर्फ वर्ष 2002 के दंगे याद रहते हों जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे, लेकिन राज्य में कांग्रेसी हिंसा का बहुत लंबा और क्रूर इतिहास रहा है। आपको जानकर आश्यर्च होगा कि 2002 के दंगों में अनेक कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेसी शासन में साठ के दशक से नब्बे के दशक तक सैकड़ों दंगे हुए। वर्ष 1969 1⁄4हितेंद्रभाई देसाई, कांग्रेस1⁄2, 1985 1⁄4माधवसिंह सोलंकी, कांग्रेस1⁄2, 1987 1⁄4अमरसिंह चैधरी, कांग्रेस1⁄2, 1990 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 और 1992 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 में राज्य में बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। हफ्ता दर हफ्ता चलने वाले ये दंगे इतने बड़े और विकराल थे कि 2002 के दंगे तो इनके सामने कुछ भी नहीं थे। भले ही मोदी ने लंबे अर्से तक राज्य में दंगों पर लगाम लगाई, लेकिन ताजा हिंसा बताती है कि राज्य में कांग्रेस की दंगा मशीनरी पूरी तरह चाक-चैबंद है। अगर सरकार सचेत नहीं रही, तो लोक सभा चुनावों से पहले ऐसी घटनाएं फिर हो सकती हैं।

राहुल गांधी आज बेशर्मी से प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा मांग रहे हैं, लेकिन वो अपनी गिरेबान में झांक कर देखने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर उन्हें थोड़ी सी भी शर्म होती तो क्या वो अल्पेश ठाकोर को पार्टी से बाहर नहीं करते? लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि कांग्रेस की नीति ही अब देश को जाति और धर्म के नाम पर तोड़ने तथा हिंसा और अराजकता फैलाने की है। मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के जवाब में उनका एक ही नारा है – ‘सबका विनाश, सबका सत्यानाश’।

“Adultery: Is the sanctity of marriage being sacrificed at the altar of equality?” in TOI Blogs

The elephant in the room is being tickled. With an influx of coming of the age issues, there is a heap of unwashed cases, piling up helplessly in a corner. The Supreme Court is doing well to chase archaic laws out of the country, but in some cases, the chase seems to be rather hasty. The repeal of Anti Adultery law is one such contention. Section 497 of the IPC is an imported concept and it so words adultery as though speaking of women as material possession and emphasising on the passivity of female sexuality, both as a matter of mere male importance and their agency alone. While the SC moves ahead to scrap the Anti Adultery law, removing it from the lenses of law itself, is a hard stance.

We welcome the nuanced analysis that seeks to undo gender inequality across all laws and especially the Anti-Adultery law. Former Chief Justice of India, Deepak Misra, is in the right to say “Husband is not the master of a woman”. The subordination of a married woman to her husband and of women to men, in general, has outlived its time. The structuring of such archaic laws are no doubt problematic, but that calls for all the more reason to amend them according to the age we live in.

Today’s society is fast progressing towards diverse avenues, hitherto untouched. What we are essentially seeing is a poor concoction of the East with the West. In Indian society since time immemorial, the way of being has been ‘collective’ as opposed to the West where the focus is on ‘individualistic’ societies.  This becomes particularly important to the various institutions that work in tandem with the basic fibre of the society.

Marriages in India are viewed as the sacred union of not just man and wife, but of their respective families. It is a rather collectivist affair and rightly affects the families involved, thereby the society as a whole. Indians are keen on preserving their culture and the unique traditions that make up their identity. Equality and faithfulness are not contradictory; they are rather complimentary in a marriage. Equality and dedication in marriage are the ingredients that give stability to the basic unit of society. The bone of contention arises when we speak of eliminating dedication from this equation. It cannot be sacrificed and shouldn’t be, and that’s why it’s called a ‘Holy Alliance’.

With marriage, present-day advances have introduced us to ‘Dating’, ‘Live-In relationships’, ‘Divorce’, and now repealing the ‘Anti Adultery law’. While most imported concepts tend to get comfortably merged, some may have far-fetched ramifications.

Marital infidelity is a delicate issue and requires much more careful examination on the part of the State. Women have been flogged and beaten to death when found to be adulterous. For men, it has been accepted in certain cases and gone unnoticed in others. These instances reflect the public view on the subject, and it must not be turned a blind eye to. While Justice Chandrachud contends that people must be free to choose their sexual choices even within marriage and that the country must be liberal and accepting of the same, there arises a moral contention herewith. In India, marriages are not viewed as mere civil contracts but rather a sacred union whose sanctity is not to be fiddled with, even in the name of liberalism. The Anti Adultery law touches on the principles of sexual autonomy, practices of the private realm, societal moral fabric and constitutional overreach. For this reason, it is a subtle link between the private and the public; the covert and the overt.

In his work titled ‘Policing families’ Jacques Danzelot makes an interesting observation, he offers an account of how public interference shaped the private realm since the 18th Century. The emphasis is on families and how they are seen as social linkages between the public and the private realm and is applicable to our cause. Head of the family have a discretionary power and act as a fulcrum for its existence, and in turn, they are dialectically responsible for the protection of the members. Therefore the state uses these important dynamics to translate into the private realm, what is essentially public in nature. This is done to ensure public order.

Two solutions emerge from his work, one is how the public and private realm converge without weaving panic across the society and secondly how the private sphere can become an active agent in not only transforming itself but also the society. When we speak of adultery, it is seen as belonging to the private realm, but if it were left to be so, ensuing chaos could spill out to the society. Repealing the law, only makes the act more conspicuous because no avenues are offered where the wrongs can be corrected, for those who so desire.

Indians are not so forgiving when the question of adultery arises, right from Panchayat diktats to the city’s moral impulse, it is considered a crime. If there is no law to condemn the same, mob rulings will become more fervent, as has already been happening in the crevices where the law could scarcely enter. The state must ensure that the sanctity of marriage is maintained with the aid of laws and provide its citizens with an outlet for their anguish. By repealing the anti-adultery law, the SC believes it is moving out of the private sphere and thereby leaving the matters of individual families up to their discretion, but that can lead to a mass hysteria as each set their own moral compass and justify their chosen way of reprimanding. Through its verdict, the SC is further confusing a lot that is getting drained in a quagmire of cultures.

The Indian culture has taken pride in its monogamous marriage setting and has been organic in its acceptance of the option of divorce for cases where fall outs are inevitable. However, let us not forget that society is built on a set of cultural practices that are revered. Stability of marriage is one of the ways in which our society learns to stand on its own feet and keep moving forward, collectively. It is therefore of utmost importance that the nuances surrounding holy matrimony are dealt with, rather than letting them blow to the wind.

Supreme court must have undergone a careful consideration of the ramifications of repealing the Anti Adultery law, for ours is a society that is emotionally charged about the moral bedrock and has taken to mob violence in areas where the law has failed to provide them with a solution.

‘Urban Naxals is not just a phrase, it’s a real threat to India’ in The Sunday Guardian

Entrepreneur Lalita Nijhawan exposes the Maoist modus operandi in urban areas to garner ideological support from intellectuals and academicians.

 

Lalita Nijhawan, a multifaceted woman entrepreneur, has been extensively supporting the academic debates on the issue of “Urban Naxalism”. She leads a travel conglomerate and owns Nijhawan Group of Companies which has diverse business modules across the country. Nijhawan tells The Sunday Guardian how “vulture politics” around caste, secessionism and nationalism drove her to form the Group of Intellectuals and Academics (GIA), a women’s forum working towards creating a nationalist intellectual space in the country. Excerpts:

Q: GIA has been organising seminars and debates on the Urban Naxal issue. According to you, how big is this Naxal problem for the country?

A: GIA is a forum of professional and expressive women that took shape in 2015, to question the hypocritical and exclusionary intellectual space claimed by a certain group. It came into being amidst a rhetoric and hysteric atmosphere created by anti-national campaigns in the country. The GIA team includes a Presidential awardee, pro-vice chancellors, noted mountaineers, dancers of international fame, senior advocates, university teachers, journalists and entrepreneurs. We conduct monthly seminars on vital current issues, publications, press conferences, marches and public signature campaigns to draw the attention of the society towards the vulture politics around caste, secessionism and nationalism.

We take these issues to concerned authorities and, on the basis of our fact-finding reports, we try to convince the governments to make changes in their policies. The GIA takes up different issues which ails the country. Urban Naxalism is just one of them but there are other issues too which the GIA has worked on. These issues include Jisha case, Triple Talaq, Kathua case, nationalism, women empowerment, exposing the anti-national hate-monger brigade, etc.

Q: Do you think “Urban Naxalism” is not just a phrase but a real threat to the internal security of the country?

A: Of course it is not just a phrase but a real threat to our internal security. The latest government data shows that 90 districts of the country are currently Naxal affected. All these districts fall within rural areas with extreme levels of poverty and total lack of development. But their modus operandi in urban areas is a part of the Maoist strategy that has extensively been detailed and documented in the “Strategies and Tactics” document of the central committee of Communist Party of India (Maoist). This is the phenomenon of Urban Naxalism which is defined as the Maoist Naxal network of Left-wing intellectuals and students present in the universities, cultural organisations and civil society networks in towns and cities.

Q:  Do you think that Naxalism is still alive due to the ideological support it’s getting from the Urban Naxals sitting in the metropolitan cities?

A: As discussed above, Naxalism is the real threat to our internal security and Urban Naxalism is nothing but the backbone of Naxalism. Without that ideological support, it is not possible for anyone to go against the sovereignty and integrity of a nation to this extent.

Q: What inspired you to set up GIA? What are the works done by the group in the recent past?

A: For past few years, we all are witnessing a hazardous challenge in front of us and that is of creating a fake narrative. Now-a-days, a section of the media first creates a narrative among the target audience and then disseminates information which are spoon-fed to them instead of investigating things on the ground level and presenting facts. Everyone around tend to believe whatever they learn from the media. GIA is an effort to present a different and fact-based narrative to the people.

“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

“भारत से रिश्तों की कीमत चुकानी होगी इमरान को” in Punjab Kesari

इमरान खान ने अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ भी नहीं ली थी कि भारत में उनकी विदेश नीति के बारे में कयास लगने शुरू हो गए थे। चुनावी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी का यार और गद्दार तथा मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताने वाले इमरान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले ही संबोधन में भारत के साथ व्यापार की इच्छा जता दी। ऐसा उन्होंने शायद इसलिए किया कि दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को अपना वजूद बनाए रखने के लिए भारत से व्यापार करना बेहद जरूरी है।

इसपर पाकिस्तान में बवाल मच गया है। नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज ने सवाल उठाया है कि जब नवाज भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों की बात की तो उन्हें कौम का गद्दार करार दे दिया गया, आज अगर वही बात इमरान कह रहे हैं तो वो देशभक्त कैसे हो गए? आपको याद दिला दें कि नवाज पाकिस्तानी सेना की राय के खिलाफ मोदी के शपथग्रहण समारोह में आए थे। ये सेना को बहुत नागवार गुजरा था। इसके बाद मोदी जब उनके जन्मदिन पर अचानक उनके घर पहुंच गए तो उसके बाद तो उनके खिलाफ सेना के मीडिया नेटवर्क ने धुंआधार दुष्प्रचार ही शुरू कर दिया। उन्हें मोदी का यार और देश का गद्दार साबित करने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि बहुत से पूर्व जनरल टीवी बहसों में अब खुलेआम ये मानने लगे हैं कि ये निहित स्वार्थों द्वारा चलाया गया प्रायोजित दुष्प्रचार था जिसमें कोई तथ्य नहीं था।

बहरहाल ये बात ध्यान में रखनी होगी कि पाकिस्तान की भारत नीति का निर्धारण इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय में होता है। भारत में हम भले ही इमरान खान को लेकर कितनी ही चर्चा करें, लेकिन असलियत यही है कि जब तक पाकिस्तानी सेना नहीं चाहेगी, पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ इस संबंध में भारत की भी शर्तें होंगी ही। देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देगा या अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग उपलब्ध करवाएगा?

वैसे तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कई बार भारत के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जता चुके हैं और जब वो इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू से मिले तो उन्होंने एक बार फिर रिश्तों में बेहतरी की इच्छा जताई। लेकिन मोदी सरकार के लिए बाजवा की ‘इच्छा’ का कोई मतलब नहीं है। सरकार तो यह जानना चाहती है कि बाजवा की सेना ने भारत के खिलाफ जो मोर्चे खोले हुए हैं, उनमें जमीनी स्तर पर कितनों को बंद किया गया है, या कटौती की गई है।

सिद्धू, बाजवा की बातों से इतने भावविभोर हो गए कि उनके गले लग गए। लेकिन क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि वो उसी पंजाब में खालिस्तान और आतंकवाद की आग क्यों भड़का रहे हैं, जिसमें वो मंत्री हैं? क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने पाकी सेना को कश्मीर में रिहायशी ठिकानों पर हमला करने और निर्दोष नागरिकोें को मारने का आदेश क्यों दिया? जब बाजवा चिकनी चुपड़ी-बाते कर रहे थे तब क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पूरे भारत में जो जाल बिछा रखा है और वो जिस तरह यहां अलगाववाद की आग भड़का रही है, उसे कब बंद किया जाएगा?

सिद्धू को लगा कि करतारपुर लंगा खोलने की बात कह कर बाजवा ने सिखों पर बड़ा उपकार कर दिया। क्या उन्हें पलट कर बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि पाकिस्तानी गुरूद्वारों के दर्शन के लिए जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को आईएसआई के गुर्गे कब खालिस्तान के लिए भड़काना बंद करेंगे? कब बाजवा ‘रेफरेंडम 2020’ का राग बंद करेंगे और कब कनाडा, इंग्लैंड आदि में सिखों के गुरूद्वारों में दुष्प्रचार बंद करेंगे? हम एक बार को मान भी लें कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन खालिस्तान का क्या? नक्सलियों, इस्लामिक अलगाववादी संस्थाओं को दी जा रही सहायता का क्या?

इमरान के प्रति सिद्धू का लगाव और भारत में सिद्धू का विरोध होने पर इमरान का उनके बचाव में सामने आना समझा जा सकता है, लेकिन सवाल सिर्फ उनकी सदाशयता और नेकनीयति का नहीं है। इमरान को समझना होगा कि सिद्धू का विरोध करने वाले पाकिस्तान से दोस्ती के विरोधी नहीं हैं। वो दोस्ती के नाम पर भावविभोर हो अंधे हो जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि असली सवाल तो पाकिस्तानी सेना के रवैये में बदलाव का है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक समझती है और जिसका लक्ष्य है – ‘गजवा ए हिंद’ यानी हिंदुस्तान पर जीत। बेनजीर भुट्टो ने एक बार हिम्मत करके कहा था कि वो कश्मीर को भारत-पाक रिश्तों के बीच नहीं आने देंगी, लेकिन उनका क्या हश्र हुआ? उन्हें मरवा दिया गया। जब उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार थी, तब भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर फैसला भी हो गया था, लेकिन वो कौन लोग थे जिन्होंने अंतिम क्षण में इसे रूकवा दिया? नवाज शरीफ ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर समझौता किया ताकि आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सके, उसका भी क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। नवाज ने तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत में आतंकी भेजने पर भी सवाल उठाया, लेकिन सब जानते हैं, उन्हें गद्दार करार दिया गया।

इमरान ने अभी तक सेना की किसी भी नीति के खिलाफ चूं तक नहीं की है। उन्होंने तोे कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को सरेआम ‘आजादी की लड़ाई’ करार दिया है। मतलब साफ है, पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी भेजता रहेगा। इमरान खान की दूसरी बड़ी परेशानी ये है कि सेना के पूरे समर्थन के बावजूद उन्हें अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। उन्हें दूसरी छोटी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में वो चाहंे भी तो भारत-पाक संबंधों पर नवाज शरीफ जैसे खुल कर कोई राय नहीं जाहिर कर सकते। वैसे भी उनसे ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो सेना की कभी मुखालफत करेंगे क्योंकि उनकी पूरी पृष्ठभूमि ही सेना की है। उनका संबंध उस जनरल नियाजी से है जिसने बांग्लादेश में समर्पण किया था। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, सूचना मंत्री फवाद चैधरी, पेट्रोलियम मंत्री गुलाम सरवर खान जनरल परवेज मुशरर्फ के जमाने में मंत्री रह चुके हैं। उनके वित्त मंत्री असद उमर के पिता सेना के सेवानिवृत्त अफसर हैं। इमरान की कैबिनेट में मुशरर्फ के जमाने के इतने मंत्री हैं कि लोग पूछने लगे हैं कि जब ये लोग मुशरर्फ को कामयाब नहीं कर सके तो उन्हें क्या करेंगे।

मुंबई में हमलों के समय इमरान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी मुंबई में ही थे। उन्हें पाकिस्तानी सेना की हरकतें, देश की आर्थिक स्थिति, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंध, अमेरिकी दबाव, भारत के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और ईरान के साथ तल्ख संबंध, चीन की पैंतरेबाजी, सबका अहसास है। उन्हें पता है कि भले ही इमरान, मोदी जैसे विदेशी ताकतों से बराबरी के आधार पर संबंधों की बात करें, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि दुनिया की ताकते उन्हें वो इज्जत बख्शें जिसकी वो ख्वाहिश कर रहे हैं। वो इमरान को प्रधानमंत्री मोदी के पत्र का हवाला देते हुए भारत के साथ ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ की बात करते हैं। वो कहते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सामने बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बार तो उन्होंने ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ का गलत अर्थ निकाल लिया था और एलान कर दिया था कि भारत ने बातचीत का न्यौता भेजा है। लेकिन जल्द ही भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इसका मतलब ‘काॅम्प्रिहेंसिव डायलाॅग’ नहीं। वो नई सरकार की नीतियों और जमीन पर हालात का गंभीरता से जायजा ले रहा है और उसके बाद ही इस संबंध में कोई फैसला हो सकता है। हां, भारत, पाकिस्तान से संबंध पूरी तरह तोड़ेगा नहीं, दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री सर्विसेस, सुरक्षा सलाहकार आदि बातचीत करते रहेंगे, लेकिन भारत पाकिस्तानी घुसपैठ का जवाब पहले जैसे देता रहेगा।

कुरैशी से जब ये पूछा गया कि क्या वो सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भेंट करेंगे तो वो इसका उत्तर टाल गए। जाहिर है, अभी ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है, बाद में होगा, तो देखा जाएगा। छह सितंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मेटिस भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 वार्ता करेंगे। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है। देखना दिलचस्प होगा कि वो इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा से क्या बात करते हैं। कुरैशी अमेरिका के साथ ‘गलतफहमियों’ को बराबरी की सतह पर बात कर दूर करना चाहते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख रह चुके पाॅम्पिओ को इमरान और बाजवा कितना आश्वस्त कर पाते हैं, इस पर सबकी निगाह रहेगी। पर पाॅम्पिओ और इमरान की टेलीफोन पर हुई बातचीत में आतंकवाद पर चर्चा को लेकर जो झड़प हुई है और जैसे अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से अफगानिस्तान में आतंकवाद को लेकर तकाजे कर रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अमेरिका इमरान को मनमांगी मुराद नहीं देगा।

कुल मिलाकर अभी जो हालात हैं, उनमें कहा जा सकता है कि जब तक पाकी सेना भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती, भारत को इमरान से बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, भले ही वो इसके लिए कितना ही जोर दे। इमरान को समझना होगा कि अब भारत में मोदी सरकार है, मनमोहन सरकार नहीं जिसके राज में आतंक और झप्पियां एक साथ चला करते थे। उन्हें अगर भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने हैं तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

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