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“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“The Trafficking of persons (Prevention, protection, and rehabilitation) Bill: Transporting stolen lives from a hopeless present to an optimistic future” In TOI Blog

23-year-old Yazidi, Nadia Murad has been designated as the Ambassador for Dignity of Survivors of Human Trafficking for the UN’s Drugs and Crime body.  She is also a Nominee for the Nobel Peace Prize this year.

If humans have learned one thing from the past of their mistakes, it is to not blame the victim, but engage themselves in waging wars against the perpetrators of the crime that have subsumed their spirit.

This approach is a penetrating beam of light in a carton of doom that this world is racing to resemble.

So, is the Trafficking of Persons (Prevention, Protection, and Rehabilitation) Bill, introduced in Lok Sabha by the Minister of Women and Child Development, Maneka Gandhi on July 2018.
The bill accords importance to creating a National Anti Trafficking Bureau for reaching even grass-root level investigation in trafficking cases.

To tackle this menace, Anti Trafficking Relief and Rehabilitation Committees (ATC) will be established in national, state and district levels, which are to take care of compensation, repatriation, and reintegration. There would be protection homes and designated courts in addition.

While critics look at it as endless bureaucratisation, let’s face it, the trafficking racket is a spider’s web that sprawls across continents and begins in the most ordinary places.

Human trafficking is an umbrella term which subsumes trafficking for the purpose of sexual exploitation, forced labour, slavery, drug smuggling, organ smuggling and often for malicious activities such as terrorism, regional violence.

About 8 children go missing every hour, 4 are sexually abused,
2 raped.

In this organised crime, millions are being oppressed at homes, shops, brothels, colluding in an illicit $150 billion trade.
In his novel called ‘A Walk Across the Sun’ Corban Addison gives a chilling account of international trafficking for sexual slavery and drug smuggling in human beings. He explains how the nexus between corrupt police officials, pimps, locals is a net spread wide to reach the international arena. Emerging through the gruesome tale is a revelation and a haunting solution; he says “Trafficking will stop when men stop buying women. Until that happens, the best we can do is win one battle at a time.”

The fight against this evil is not a recent one but the approach is renewed.

Association of Nobel laureates in this war against this crime is a reflection of the urgency, importance of agency and pro-active engagement of civil society.

Nobel Laureate Kailash Satyarthi has been proactively engaged in the struggle against the suppression of children and young people.
In his Nobel peace prize speech, he narrates the woes of a trafficked child labourer.

“Is the world so poor that they cannot give a toy and a book, instead of forcing me to take a gun or a tool?”
Innocence has been cashed on for a donkey’s life of work.
Neither, worth the consequent despair.

However, human trafficking is not limited to kidnapping children and women for labour and sexual exploits as has been largely understood.

One of its myriad forms could be seen in the recent Rohingya refugee contention; here is the other dimension, discussed less often.

An international organisation of Migration has reported that there is evidence of trafficking of Rohingya refugees in India.

Though the media placed the moral compass on the shoulders of the government, it forgot to do its duty and bring to the surface, the fact that these very infiltrators are potential pawns. Speculation is rife that they chose Jammu for the proximity to Pakistan, a politically motivated migration. It points out to a probabilistic angle of terrorism and unnoticed crime. Media reports are unnerving, as they suggest humanitarian aid to migrants and fail to approach it with a circumstantial understanding.

Even religious places are no longer a safe haven.
With Missionaries and orphanages selling children, the age of doom is here.

It is not to malign religious institutions but to chide the clandestine activities that they carry forward under the cloak of benevolence.

Largely, it is the poor, underprivileged, under-informed, naïve who are unfortunate victims of trafficking.

With Government’s policies such as Ujjwala, Swadhar Greh, Juvenile Justice Act 2002, Code of Criminal procedure the issue of rehabilitation is well met.

Another innovation brought in by the government, the Aadhar card could be an effective move, as it keeps records of all the adults and children who are citizens of the country. Although there are hurdles in information storage and execution, these are more like teething problems.

If only people focus on the potential benefits more than minor inconveniences, the issues plaguing humanity can be addressed in a rightful way.

Trafficking is a crime against humanity. The war is to be collectively waged.

With this bill, there is hope that awareness will beget change.
This battle cannot, however, be won by the solitary action of the government.

It requires the sympathy of media, proactive involvement by civil society, and victims must come to the forefront.

Citizens must be welcoming to changes in the legal system.
Someone rightly said, to do nothing would be to die one day at a time.

“WHAT LIES BENEATH” in The Pioneer

The Church seems to have led the media by the nose in helping build a Congress-Communist narrative that dragged the RSS into the Tuticorin protests

The coverage by the national media of the protests in Tuticorin, Tamil Nadu, against Vedanta’s copper smelting plant has been injudicious, based on hearsay and without application of mind. A narrative has been parroted without critical examination.

It is true that protestors were killed in Tuticorin. But unfortunate and tragic as that is, did anyone bother to ask why police had to open fire? These protestors outnumbered the police force by a huge number at the collectorate; they assaulted police personnel physically, pelted them with stones, tore the clothes of female law enforcers and molested them, indulged in wanton acts of arson including setting fire to public property and indulged in an orgy of violence that threatened the safety of innocent people. Should it not be asked what forces were behind this extremely violent protest which is against every democratic norm? Was the protest sponsored or did it occur spontaneously? Who allowed the assault on police personnel and the burning of vehicles, buildings, ambulances and even setting the collectorate ablaze? Who made Tuticorin a battleground? Is death the only indicator of violence? Have we stopped condemning violence unless it results in deaths? Since when have we started celebrating protests indulge in acts of violence and destruction?

It is the absence of these questions being asked that the Opposition, led by the Congress and Communists, were quick to blame without any basis whatsoever the Narendra Modi-led Central Government rather than lay the responsibility for both the protests and the deaths of protestors in police firing at the door of the Tamil Nadu State Government which is in charge of law and order. But facts are of no consequence for those Opposition leaders who took to make wild, defamatory charges against Modi calling him a “murderer”. But then that is par for the course for the conspirators who pushed the Tuticorin protests into violence as it helped them in their goal of slinging mud at the Modi regime. Another motive could well have been to ensure the closure of the Sterlite Copper Smelting plant. But has anyone rationally thought about the negative effects of closing the plant? Is anyone worried about how this will affect our country’s economy and the thousands of employees who will be laid off?

The most provocative statement on the situation came from Congress chief Rahul Gandhi. Apropos of nothing in particular, he blamed the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) for the Tuticorin row, keeping in tune with his politics which begins and ends with RSS-baiting. When journalist Gauri Lankesh was murdered, Gandhi accused the Sangh of being behind the killing within half-an-hour of the shooting. When BS Yeddyurappa resigned as the Chief Minister of Karnataka because he couldn’t prove his majority on the floor of the House, Gandhi proclaimed he was supporting the rump JDS to “save the people from the RSS”. Rahul’s anti-Hindu bias is understandable but accusing the Sangh of being a terrorist organization is beyond the pale. In fact, the Congress-Communist cabal by baseless charges against the RSS instead of engaging in an ideological debate has ensured that the Sangh has come to represent Hindu sentiment nationwide. As a corollary, opposition to the RSS is considered ‘opposition to communalism’ and support of Islamic and Christian communalism and is termed ‘secularism’ by this cabal.

In the Tuticorin case, however, there seems to be more to it than just the reflexive blame-the-Sangh approach; a concerted attempt by the Church in those parts, supported by Gandhi and the so-called secular media, to drag the Sangh into the row is evident. The districts of Tirunelveli, Tuticorin and Kanyakumari in Tamil Nadu have the highest number of Christians and the Church has great influence on the public. It is not a coincidence that in the last two decades these districts have faced the greatest opposition to national development projects.

The Kudankulam Nuclear Power Project in Tirunelveli, which was developed in collaboration with Russia, also saw a lot of protests. America’s disdain for this project was quite evident. The then Prime Minister Manmohan Singh publicly blamed US-funded institutions for the protests against Kudankulam. The then Union Minister V Narayanasamy alleged that Bishop Yavon Ambrose of Tuticorin received Rs 54 crore and was the key figure behind the protests. Many Christian institutions such as People’s Education for Action and Liberation, and Good Vision were on the Union Home Ministry’s radar as instigators. The Home Secretary had announced that bank accounts of four such NGOs were sealed, as money was transferred from overseas to fund national protests and incite disruption.

The Christian population in Tuticorin is close to 30 per cent and the Church has a deep impact on residents’ everyday life. The plan to expand the Sterlite copper plant was brought forward as a new addition to the scope of already on-going disputes. Before the Sterlite plant was closed, it was producing four lakh tons of copper annually. Under the proposed expansion, which would have happened if not for the violent protests and subsequent deaths in police firing, Sterlite would have produced eight lakh tons of copper annually. If this project had gone through, almost all of India’s copper needs would have been met domestically.

According to official police reports, the Tuticorin protest has a clear foreign influence. Samarendra Das of the ‘Foil Vedanta Group’ flew in from London and secretly met Sterlite protesters and assured them that he would fully support the continuation of the protests, according to police. Is it a coincidence that after the Tuticorin violence John McDonnell, a prominent leader of the Opposition Labour Party in the UK, declared that Vedanta is a rogue company and demanded it be removed from the London Stock Exchange? The discussions regarding Sterlite were used to instigate the locals of Tuticorin. Brother Mohan C. Lazarus on a YouTube video said, without any scientific backing, that Sterlite is a toxic factory. He said that the Church is praying to shut down the factory. He further stated that a protest will be held on 24 March, 2018, at Rajaji Park in Tuticorin, where all Catholics, Pentecostals, Church of South India (CSI) would unite to participate against Sterlite. Scientists of the National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) and the National Green Tribunal (NGT) had visited Sterlite and certified that emissions were within prescribed limits. Then what have these Churches achieved by provoking people against Sterlite, claiming that pollution levels are extremely hazardous? The Kundankulam protests saw the participation of Bishop Yvon Ambroise and SP Udayakumar, while the Sterlite protest had Brother Mohan C. Lazarus and other churches in the surrounding area as prime movers. Is the anti-development attitude of the Church not to be questioned? If the Manmohan Singh Government could take action against such disruptive elements then why can’t the Modi Government?

Police were portrayed as villains in Tuticorin. The media narrative was overwhelmingly of trigger-happy cops going berserk; did anyone try to figure out why the police was compelled to take last-resort action? Local journalist N. Rajesh’s report says the Deputy Inspector General of Police Kapil Kumar Saratkar made elaborate arrangements at the protest venue so that activists would not reach the collectorate. Even when senior police officers were talking to protest leaders and asking them to ensure a peaceful demonstration, radical activists broke the barricades and used iron pieces from them to assault police personnel. Police responded with a ‘lathi’ charge. Rajesh’s report says he and some other journalists climbed to the rooftop of a hotel opposite the collectorate to get a better sense of what was going down. At 11:30 am some protesters, who had forced their way into the collectorate, began burning vehicles. When the protestors saw that their photographs were being clicked and videos being recorded, they pelted journalists with stones. When journalists came down from the roof of the hotel some were assaulted and many had their cameras snatched.

The testimony of the collectorate employees supports Rajesh’s reportage. A female employee said that at 11.10 a.m., she was having tea in the canteen with her colleagues; about 20 minutes later they witnessed bruised and battered police personnel being chased by stone-pelting protesters. The employees were scared and didn’t know what to do, so they went back to their office for safety. Then there was a second wave of protestors when an estimated 15,000-20,000 activists entered the collectorate office. They had weapons fashioned from iron rods, glass bottles, petrol bombs and lathis. They set about destroying the office and setting fire to government vehicles. There were about 100 policemen deployed for security who tried to control the protestors and prevent them from entering the collectorate. But the protesters outnumbered the policemen by thousands. They ruthlessly attacked the policemen who ran away in fear of their lives. They then set fire to all collectorate vehicles. The entire office was filled with smoke, suffocating the employees. The protesters didn’t even spare female police personnel. They tore their clothes and molested them. There are hundreds of eye-witnesses to what transpired and they all say the same thing.

Opportunistic politicians and parties who blame police for opening fire need to be more circumspect. Any loss of life is tragic and unfortunate, but what would they have done if faced with a life-threatening situation had they had been stationed at the Sterlite plant and tasked with ensuring its safety? Should violent mobs have been allowed to create havoc and decimate Tuticorin and the copper plant? Should physical assaults on cops and government officials have been allowed? Congress leader Ghulam Nabi Azad compared those who died in the police firing to the martyrs of Jallianwala Bagh. Azad should be asked if the martyrs of Jallianwala were armed with stones, iron rods, lathis, petrol bombs and glass bottles and whether they chased, assaulted and attempted to kill police officers and commit arson.

The public may have a short memory but they cannot be fooled. Prior to Rahul Gandhi blaming the Sangh, and Ghulam Nabi’s comparison to Jallianwala Bagh, back in 2007 the UPA government led by Manmohan Singh had allowed the extension of the Sterlite plant. The Congress party’s blue-eyed boy and former Home and Finance Minister P. Chidambaram was a Director in Sterlite’s parent company Vedanta before becoming a minister in the UPA government. Blinded by his intense hatred for the Sangh, Rahul Gandhi has also forgotten that law and order is a state subject. There is no BJP government in Tamil Nadu, so why indirectly or directly accuse the RSS?

It is about time that the BJP, the Central Government, and especially the Union Home Ministry learn from this incident. Asking for a report on the incident is not enough. The Home Ministry has failed to investigate the conspiracy, for which it needs to work in collaboration with State Government officials, to bring out the truth. During Manmohan Singh’s regime, there were some attempts to stop radical elements in the Church harming the national interest. What is stopping the Modi Government from following suit?

“क्या आरएसएस के खिलाफ चर्च का षडयंत्र है तूतीकोरिन कांड?” in Punjab Kesari

कठुआ के बाद तूतीकोरिन मामले की कवरेज में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली का तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कान का कच्चा और आंख का अंधा है। कुछ लोग इसे हांकते हैं और ये अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना भेड़चाल में फंस जाता है।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारी मारे गए, ये सही है। लेकिन कौन लोग थे जिन्होंने पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनपर पत्थरों की बौछार की, महिला पुलिसकर्मियों के कपड़े फाड़े, किनके कारण प्रदर्शन हिंसक हुआ, इसके पीछे कौन सी ताकते थीं, ये प्रायोजित था या वास्तविक, किसने वाहनों, भवनों, एम्बुलेंसों और कलेक्ट्रेट को आग लगाई, किसने तूतीकोरिन को युद्ध का मैदान बना दिया? ये शायद किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की। सबको सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि गोली चली और लोग मरे। इसके लिए विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तमिलनाडु राज्य सरकार से ज्यादा केेंद्र की मोदी सरकार को दोष दिया। सोशल मीडिया पर कुछ विपक्षी तो प्रधानमंत्री मोदी को हत्यारा बताने लगे। शायद यही षडयंत्रकारियों का मकसद था, और उन्होंने इसे हासिल भी किया। स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट बंद करवाना और उसकी पेरेंट कंपनी वेदांता को बदनाम करना और नुकसान पहुंचाना भी एक मकसद था, लगे हाथों वो भी हासिल हो गया। चलो हाल-फिलहाल तो वो भी बंद हो गया है। यानी एक तीर से कई शिकार। किसे फिक्र है कि स्टरलाइट प्लांट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुंचेगा? कितने हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे?

सबसे ज्यादा घृणित और भड़काऊ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान था, जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। वैसे अल्पज्ञ राहुल गांधी को इसके लिए दोष देना भी मूर्खता ही होगी। उनकी तो राजनीति संघ से शुरू होती है और संघ पर ही खत्म हो जाती है। नक्सलियों से संबंध रखने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तो उन्होंने आधे घंटे के भीतर संघ पर उंगली तान दी। येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने एलान कर दिया कि मैं जनता को संघ से बचाउंगा। एक विशेष समुदाय से संबंध रखने के कारण राहुल का हिंदू विरोध समझ में आता है, लेकिन संघ को आतंकवादी साबित करने के लिए साजिश करना, समझ से परे है। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने संघ को हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया है। उसे एक टारगेट बना दिया गया है जिसपर हिंदुओं से नफरत करने वाला हर समुदाय, हर राजनीतिक दल बेखटके उंगली उठा सकता है। संघ का विरोध करना ‘सांप्रदायिकता का विरोध’ मान लिया गया है और इस्लामिक और ईसाई सांप्रदायिकता का समर्थन और ध्रुवीकरण ‘धर्म निरपेक्षता’।

बहरहाल हम लौट कर तूतीकोरिन पर आते हैं। इस मामले में राहुल द्वारा फटाफट संघ पर उंगली उठाना एक व्यापक साजिश का हिस्सा है जिसे तूतीकोरिन का चर्च अंजाम दे रहा है और जिसकी सरपरस्ती दिल्ली में राहुल गांधी और उनका चंपू मीडिया कर रहा है। हम जो कुछ कह रहे हैं वो बहुत जिम्मेदारी से कह रहे हैं। तमिलनाडु के तीन जिलों तिरूनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी में ईसाइयों की तादाद सर्वाधिक है और यहां आम जनता पर चर्च का काफी प्रभाव है। ये संयोग नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन्हीं तीन जिलों में विकास परियोजनाओं का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है।

तिरूनेलवेली में कंुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध आपको याद होगा जिसे रूस के सहयोग से बनाया जा रहा था जो अमेरिका को पसंद नहीं था। तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के लिए अमेरिका समर्थित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने आरोप लगाया था कि तूतीकोरिन के बिशप यवोन एम्ब्रोइस को प्रदर्शनों के लिए 54 करोड़ रूपए मिले थे और वो इन प्रदर्शनों के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इनके अलावा कई और ईसाई संस्थाएं जैसे पीपल्स एजुकेशन फाॅर एक्शन एंड लिबरेशन और गुड विशन भी प्रदर्शन भड़काने के लिए गृह मंत्रालय के रडार पर थीं। गृह सचिव ने घोषणा की थी कि चार ऐसे गैर सरकारी संगठनों के बैंक खाते सील कर दिए गए थे जो विदेशों से मिला पैसा प्रदर्शन भड़काने में लगा रहे थे।

तूनीकोरिन में ईसाई आबादी 30 प्रतिशत के करीब है और आम जनजीवन पर चर्च का गहरा असर है। यहां चल रहा स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट भी विवादों के घेरे में लाया गया। फिलहाल इसमें चार लाख टन तांबा सालाना बनाया जाता है। विस्तार के बाद इसकी क्षमता आठ लाख टन सालाना हो जाती। इससे भारत की तांबे की लगभग सारी जरूरत पूरी हो जाती और इसके आयात की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ध्यान रहे तांबे का इस्तेमाल विद्युतीकरण से लेकर रक्षा उपकरण के निर्माण तक अनेक स्थानों पर होता है। ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी बहुत जरूरी है।

पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक तूतीकोरिन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हाथ भी है। कुछ समय पहले लंदन से आया ‘फाॅइल वेदांता ग्रुप’ (वेदांता ग्रुप को असफल करो) का समरेंद्र दास स्टरलाइट प्रदर्शनकारियों से गुपचुप मिला। उसने इन्हें भरोसा दिलाया था कि वो प्रदर्शन जारी रखने में पूरी मदद करेगा। क्या ये सिर्फ संयोग है कि तूतीकोरिन हिंसा के बाद इंग्लैंड में विपक्षी लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता जाॅन मैकडोनल्ड ने वेदांता को अराजक कंपनी बताया और उसे लंदन स्टाॅक एक्सचेंज से हटाने की मांग की? तूतीकोरिन के चर्चों में लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काया गया। यू ट्यूब पर ब्रदर मोहन सी लाजरस का वीडिया उपलब्ध है जिसमें वो बिना किसी सबूत के स्टरलाइट को जहरीली फैक्ट्री बता रहा है। वो कहता है कि चर्च इसे बंद करने के लिए प्रार्थना कर रहा है। वो कहता है 24 मार्च, 2018 को राजाजी पार्क तूतीकोरिन में प्रदर्शन होगा जिसमें सभी कैथोलिक, पैंटाकोस्ट, सीएसआई चर्चों के लोग भाग लेंगे।

ध्यान रहे नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) जैसी संस्थाओं के वैज्ञानिक स्टरलाइट का दौरा कर चुके हैं और इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि इसका उत्सर्जन सेंट्रल पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और तमिलनाडु पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (टीएनपीसीबी) जैसी संस्थाओं द्वार तय किए गए मानकों के अनुसार है। ऐसे में चर्चों द्वारा झूठ बोल कर आम लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काने का क्या मकसद है? जहां कुंडनकुलम में बिशप यवोन एम्ब्रीओस और एसपी उदयकुमार थे, वहां स्टरलाइट मामले में ब्रदर मोहन लेजारस और क्षेत्र के अन्य चर्च हैं। देश की विकास परियोजनाओं के खिलाफ चर्च का ऐसा रूख क्या देशद्रोह नहीं है? अगर मनमोहन सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं?

क्या से संयोग है कि जिस समय तूतीकोरिन कांड की योजना बनाई जा रही थी ठीक उसी समय दिल्ली में आर्कबिशिप अनिल कूटो ‘ईसाइयों पर हमलों’ पर चिंता जता रहे थे और कह रहे थे कि देश कलहकारी दौर से गुजर रहा है और ईसाइयों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? क्या ये महज संयोग है कि कूटो के पत्र के बाद देश भर के चर्चों से उनके समर्थन में आवाज उठी जिसे कांग्रेस और अन्य ‘संघ विरोधी’ दलों ने भरपूर समर्थन दिया? क्या ये भी महज संयोग है कि घटना के तुरंत बाद सबसे पहले कमल हासन वहां पहुंचे जो इस समय दक्षिण भारत में ईसाई राजनीति के केंद्र में हैं?

तूतीकोरिन में गोली चलाने के लिए पुलिस को खलनायक बनाया गया। क्या दिल्ली के मीडिया ने एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं कि पुलिस को इसके लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? अगर प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू थे और उनके हाथों में लाठी-बल्लम, राॅड, पत्थर, पेट्रोल बम, शीशे की बोतलें सब कुछ थे। तूतीकोरिन के पत्रकार एन राजेश अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस कपिल सरतकर ने प्रदर्शन स्थल पर कड़ा इंतजाम किया था ताकि प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट तक नहीं पहुंच सकें। अभी पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात कर ही रही थी, कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरीकेड तोड़ दिया और उसे पुलिस पर फेंका। इसके बाद ही पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। मुझे लगा कि हालात गंभीर मोड़ ले रहे हैं तो मैं बाइपास रोड पर चला गया। मैं हालात को ठीक से समझने के लिए कलेक्ट्रेट के विपरीत एक होटल की इमारत की छत पर चढ़ गया। करीब साढ़े ग्यारह बजे कलेक्ट्रेट में घुसने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगानी शुरू कर दी। इनमें से कुछ लोगों ने जब देखा कि हम उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं और वीडियो बना रहे हैं तो उन्होंने हम पर पत्थरों की बौछार कर दी। जब हम नीचे उतरे तो उन्होंने हमें लाठियों से पीटा और हमारा कैमरा छीन लिया।

एन राजेश के विवरण का समर्थन कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी करते हैं। एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि करीब 11.10 बजे वो अपने सहयोगियों के साथ कैंटीन में चाय पीने गईं। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस कर्मचारी बदहवास तेजी से दौड़ते हुए आ रहे हैं और उनके पीछे लोग पत्थर फेंकते हुए आ रहे हैं। हम भयभीत थे, हमें नहीं पता था कि हम क्या करें, हम वापस कार्यालय में गए। इसके बार करीब 20,000 प्रदर्शनकारी कार्यालय में घुस गए। उनके पास हथियार थे, लाठियां थीं, लोहे के सरियेथे, कांच की बोतलें थीं, पेट्रोल बम थे। उन्होंने तेजी से कार्यालय का सामान बर्बाद करना शुरू कर दिया, पुलिस, कलेक्ट्रेट की गाड़ियों में आग लगा दी। वहां सुरक्षा के लिए तैनात करीब 100 पुलिसवालों ने उनका सामना किया, उन्हें नियंत्रित कर, बाहर भेजने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी हजारों में थे और पुलिसवाले बहुत कम। उन्होंने बेरहमी से पुलिसवालों पर हमला बोल दिया, वो अपनी जान बचा कर भागे। फिर उन्होंने कलेक्ट्रेट के सभी वाहनों को आग लगा दी, पूरा कार्यालय धुएंे से भर गया, चारों तरफ धुआं ही धुआं था। कार्यालय किसी युद्ध के मैदान की तरह लग रहा था। प्रदर्शनकारियों ने महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। उनकी कमीज फाड़ दी, उनके गुप्तांग में हाथ घुसाए। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट को भी नहीं बख्शा, उसमें भी आग लगा दी।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मौजूद है। सब एक ही चीज बताते हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, वाहनों, भवनों, कार्यालयों को फूंका, और तो और एम्बुलेंस तक को नहीं बख्शा। पुलिस वालों को खलनायक बताने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो उनकी जगह होते तो क्या करते? क्या उन्हें हिंसा और उन्माद का नंगा खेल खेलने की तब तक इजाजत देते जब तो वो तूतीकोरिन और स्टरलाइट प्लांट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देते? विवादास्पद, भड़काऊ और विघटनकारी बयानों के लिए बदनाम कांग्रेसी नेता गुलामनबी आजाद ने तो इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से कर दी। कोई गुलामनबी से पूछे कि क्या जलियांवाला में मारे गए लोग लाठियां, सरिए, पेट्रोल बम, कांच की बोतलें, पत्थर ले कर बैठे थे? क्या उन लोगों ने जनरल डायर और उसके पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था और उनके वाहनोें को आग लगा दी थी? क्या जलियांवाला में मौजूद लोगों ने हिंसा की पहल की थी?

जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर वो मूर्ख नहीं होती। राहुल गांधी ने संघ पर वार करने से पहले और गुलामनबी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग से करने से पहले दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो याद आ गया होता कि स्टरलाइट प्लांट के जिस विस्तार का विरोध हो रहा है, उसकी अनुमति स्वयं मनमोहन सरकार ने 2007 में दी थी। यही नहीं कांग्रेस के स्टार वित मंत्री और गृह मंत्री रहे विवादास्पद पी चिदंबरम 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनने से पहले स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता में निदेशक थे।

संघ के प्रति नफरत में अंधे राहुल गांधी को संघ के खिलाफ बयान देने से पहले ये भी याद नहीं रहा कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है, न कि केंद्र के। वैसे भी तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। राहुल गांधी के सीने में कितना जहर भरा है वो उनके ट्वीट से समझा जा सकता है जो कहता है – तमिलों का नरसंहार हो रहा है क्योंकि वो संघ की विचारधारा का पालन नहीं कर रहे। प्रदर्शनकारियों पर चलने वाली हर गोली का संबंध संघ और भाजपा से है।

इतनी नफरत, इतने भड़काऊ बयान, लाशों पर ऐसी ओछी राजनीति? पहले षडयंत्र करना और फिर उसे भुनाना राहुल गांधी और उनकी पार्टी अच्छी तरह सीख गए हैं। इस घटना से भाजपा, केंद्र सरकार को और खासतौर से गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सीख लेनी चाहिए। राजनाथ जी सिर्फ रिपोर्ट मंगाने से काम नहीं चलेगा। चाहे कठुआ का मामला हो या तूतीकोरिन का, गृह मंत्रालय ऐसे षडयंत्रों की त्वरित जांच कराने और सच्चाई सामने लाने में विफल रहा है। क्या इस मामले में रिपोर्ट तलब करने की जगह केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकार के साथ मिलकर नहीं काम करना चाहिए था? मनमोहन सरकार ने तो फिर भी चर्च के अराजकत तत्वों पर रोक लगाने की कोशिश की, आपने क्या किया? आप पर क्या दबाव है कि आप ऐसे तत्वों पर कार्रवाई नहीं कर रहे? कौन लोग इस षडयंत्र में शामिल थे, उन्हें कहां से पैसा मिल रहा है? क्या ये आपको नहीं मालूम? जनता जवाब चाहती है माननीय गृह मंत्री जी, और वो भी जल्दी।

“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।

“बंद हो एससी-एसटी एक्ट के नाम पर झूठ और हिंसा की राजनीति” in Punjab Kesari

न्यायमूर्ति यूयू ललित और एके गोयल की सुप्रीम कोर्ट बैंच ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत किसी सार्वजनिक कर्मचारी को उसके नियोक्ता प्राधिकारी की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। इसी प्रकार गैर-सार्वजनिक कर्मचारी को सीनियर सुपरिनटेंडेंट पुलिस की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत लोगों को झूठे मामलों से बचाने के लिए जरूरी है कि कोई भी कार्रवाई करने से पहले डिप्टी पुलिस सुपरिनटेंडेंट पुलिस ये जांच करें कि मामला एससी-एसटी एक्ट का बनता है या नहीं।

ध्यान रहे एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए अगर इसके तहत कोई शिकायत होती है तो आरोपित व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का शुरू में तो संज्ञान ही नहीं लिया गया लेकिन आगामी चुनावों के मद्दे नजर कुछ राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने की ठानी। विशुद्ध रूप से न्यायिक इस फैसले को भावात्मक रूप दिया गया और विपक्षी दलों ने इसके लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस पार्टी ने आनन-फानन में भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और दावा किया कि इस फैसले में उसका हाथ है। अदालत के फैसले के विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया जिसमें व्यापक हिंसा हुई और जान-माल की हानि हुई।

इन दंगों की इलैक्ट्राॅनिक मीडिया ने व्यापक कवरेज की। अदालत के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी लोगों का गुस्सा समझा जा सकता है, लेकिन दंगों की फुटेज से स्पष्ट था कि ये पूरी तरह प्रायोजित थे। पूना कोरेगांव के बाद एक बाद फिर भड़की इस हिंसा से साफ है कि एससी-एसटी समाज को मुख्यधारा से अलग करने और देश में हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए सुविचारित षडयंत्र हो रहा है। इस्लामिक आतंकियों, नक्सलियों और मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दलों के गठबंधन ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के विवादास्पद छात्र रोहित वेमुला को प्रतीक बनाकर जिस राजनीति की शुरूआत की थी, वो अब परवान चढ़ती नजर आ रही है।

हमने देखा कैसे कांग्रेस ने गुजरात में जिग्नेश मेवानी के साथ गठबंधन किया जिसे नक्सलियों और पाॅपुपर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों ने खुलेआम समर्थन दिया। पूना कोरेगांव में इसीे व्यक्ति के भड़काऊ भाषण के बाद महाराष्ट्र में व्यापक दंगे फैले। ये व्यक्ति राजनीतिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाता है और सरेआम लोगों को हिंसा के लिए भड़काता है।

बहरहाल एससी-एसटी वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को पुनर्विचार याचिका दायर की। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस पूरे प्रकरण में सरकार का हाथ होने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “सरकार सुप्रीम कोर्ट के तर्क से सहमत नहीं है जिसने एससी-एसटी एक्ट की संरचना को नए सिरे से गढ़ दिया है…हमें लगता है कि इस प्रकार के संवेदनशील मामले पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता थी और आंकड़ों के आधार पर ये तय किया जाना चाहिए था कि इसका दुरूपयोग हो रहा है या नहीं।” प्रसाद ने एससी-एसटी एक्ट के प्रति अपनी सरकार का समर्थन दोहराया और कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे मजबूत किया गया है। 1989 में मात्र 22 अपराध धारा 3, (1) और (2) के तहत दर्शाए गए थे, लेकिन 2015 में मोदी सरकार ने इस सूची में विस्तार किया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पांच दिन के भीतर ही सरकार ने पुनर्विचार याचिका तैयार कर ली थी, लेकिन छह दिन तक अदालत का अवकाश रहने के कारण इसे दायर नहीं किया जा सका।

सरकार ने इस विषय में दायर अपनी पुनर्विचार याचिका में स्पष्ट शब्दों में कहा, ”ये फैसला बड़ी जनसंख्या वाले एससी-एसटी वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ये संसद की उस विधायिका नीति के विपरीत है जो एससी-एसटी एक्ट में परिलक्षित होती है। एससी-एसटी वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए किए गए विभिन्न कार्यों के बावजूद उनकी स्थिति अब भी कमजोर है। उन्हें कई नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते, उनके खिलाफ अनेक अपराध किए जाते हैं, उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है…विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके खिलाफ गंभीर अपराध किए जाते हैं।“

स्पष्ट है सरकार ने इस वर्ग की भावनाओं और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को समझा और उसके अनुरूप सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

दो अप्रै्रल को हुई व्यापक हिंसा और सरकार की पुनर्विचार याचिका के बावजूद चार अप्रैल को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा, ”कई बार विरोध करने वाले अदालत के आदेश को ठीक से पढ़ते भी नहीं, इसमें निहित स्वार्थ भी शामिल हो सकते हैं।” अपने आदेश के पीछे की मंशा को साफ करते हुए अदालत ने कहा ”हमें निर्दोष लोगों को जेल भेजे जाने पर चिंता है, क्या किसी व्यक्ति की आजादी बिना किसी उचित प्रक्रिया के छीनी जा सकती है? सत्यापन का कोई तरीका तो होना ही चाहिए। अगर एक सार्वजनिक कर्मचारी के खिलाफ आरोप लगता है तो क्या होता है? अगर आरोप एटाॅर्नी जनरल के खिलाफ लगे तो क्या हो? उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए?”

इस विषय में 12 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अपने लिखित निवेदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। सरकार की ओर से एटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत की ये सोच गलत है कि वो कानून बना सकती है। अदालत द्वारा एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को क्षीण करने से देश को भारी नुकसान हुआ है। सरकार ने अदालत से आग्रह किया किया कि वो कानून में किए गए परिवर्तनों को तुरंत वापस ले ताकि वही कानून अपनाया जा सके जिसे संसद ने पारित किया है।

केंद्र सरकार इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में तो पक्ष रख ही रही है, लेकिन साथ ही उसने अन्य विकल्प भी खुले रखे हैं। 11 अप्रैल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई वरिष्ठ मंत्रियों की एक बैठक में इस विषय में अध्यादेश लाने पर भी चर्चा की गई। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया तो सरकार इस संबंध में अध्यादेश का रास्ता भी अपना सकती है।

अदालत में लड़ाई से लेकर अध्यादेश तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तक सबने स्पष्ट कर दिया है कि एससी-एसटी वर्ग को आहत करने वाले इस फैसले को नहीं माना जाएगा। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकार द्वारा पूरा समर्पण दिखाने और हर संभव प्रयास करने के बावजूद विपक्षी दल झूठ का भ्रमजाल फैलाने में लगे हैं।

मायावती को इस अवसर पर एक बार फिर कश्मीरी आतंकियों की जय जयकार करने वाला विवादास्पद नक्सली रोहित वेमूला याद आने लगा है। उन्होंने अनुसूतिच जाति वर्ग पर अपनी इजारेदारी जताते हुए भाजपा को इस वर्ग का विरोधी करार दिया है। मायावती आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उंगली उठा रही हैं, लेकिन इन्हीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए एससी-एसटी एक्ट का दुरूपयोग रोकने के बारे में 20 मई 2007 को एक आदेश निकाला था जिसमें कहा गया था, ”दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर एससी-एसटी को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं, इस बात का ध्यान रखा जाए कि निहित स्वार्थों के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल न होने पाए।” मायावती यहीं नहीं रूकीं, उन्होंने 29 अक्तूबर को इस संबंध में एक और आदेश निकाला जिसमें कहा गया था, ”एससी-एसटी सदस्यों के उत्पीड़न के मामलों में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान नहीं किया जाए।” सोचने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को क्या वही नहीं कहा था जो मायावती ने 2007 में कहा था। लेकिन आज मायावती केंद्र सरकार को चुनौती दे रहीं हैं कि अगर उसे एससी-एसटी से प्यार है तो वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाए।

उधर राहुल गांधी आग में घी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है वो मोदी के राष्ट्रवाद को जातिवाद से काट पाएंगे। तभी तो वो झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आतंकियों का गुणगान करने वाले नक्सली रोेहित वेमूला ने आत्महत्या की थी, लेकिन राहुल, मोदी सरकार पर उसकी हत्या का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस ने 60 साल के शासन में एससी-एसटी वर्ग के लिए क्या किया, वो ये तो नहीं बताते, लेकिन मौजूदा दशा के लिए वो मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, जिसने इस वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए पिछले चार साल में कांग्रेस के 60 साल से ज्यादा काम किया है। हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने सरेआम ये झूठ बोला कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। जातिवादी नफरत और हिंसा भड़काने के लिए इस से बड़ा षडयंत्र और क्या हो सकता है? अब इसे दुष्प्रचार और षडयंत्र नहीं तो और क्या कहेगे कि राहुल गांधी एससी-एसटी वर्ग को पोटने के लिए ‘संविधान बचाओ मुहिम’ का आगाज करने जा रहे हैं, जबकि संविधान या इस कानून पर कहीं कोई संकट है ही नहीं।

राहुल गांधी के जहरबुझे भड़काऊ बयानों के खिलाफ पांच अप्रैल को स्वयं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने एक ट्वीट कर राहुल पर आरोप लगाया कि वो ये झूठ बोल कर समाज में नफरत भड़का रहे हैं कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। उन्होंने सबूत के तौर पर राहुल गांधी के भाषण का अंश भी पेश किया जिसमें वो कह रहे थे, ”दलितों और आदिवासियों पर जुल्म बढ़ रहे हैं और एससी-एसटी एक्ट वापस ले लिया गया है। नरेंद्र मोदी जी एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं।“

कांग्रेस अध्यक्ष की ऐसी हरकत निश्चित ही निंदनीय है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए वो आजकल बिना किसी सबूत के कुछ भी बोल रहे हैं। सबने देखा कि उन्होंने गुजरात में पटेलों को आरक्षण का झुनझुना थमाया जबकि काननून ये संभव नहीं है। कर्नाटक में तो वो हिंदू समाज को ही बांटने पर उतर आए हैं। भारतीय लोकतंत्र की ये विडंबना हो गई है कि स्वार्थ में अंधे नेता समाज में आग लगाने के लिए बेसिरपैर के भड़काऊ बयान देते हैं और उनके चेले चपाटे इसे ब्रह्य वाक्य मान कर प्रचारित-प्रसारित करते हैं। ये खेल सिर्फ बयानों तक ही रहे तो भी गनीमत है, समाज को तोड़ने तथा हिंसा और आतंक फैलाने के लिए बाकायदा हिंसक गिरोहों को पैसा दिया जाता है और लाशों को ट्राॅफी समझा जाता है।

जाहिर है मोदी सरकार को सतर्क रहना होगा। एससी-एसटी वर्ग में असंतोष के नाम पर देश तोड़ने के लिए विघटनकारी ताकतें सक्रिय हो चुकी हैं। इन ताकतों से सख्ती से निपटना होगा, नहीं तो ये समाज को ही नहीं तोड़ेंगी, देश की छवि को भी भारी नुकसान पहुंचाएंगी। यदि इन पर लगाम नहीं लगाई गई तो सरकार आर्थिक्र विकास के लिए जो प्रयास कर रही है, वो धरे के धरे रह जाएंगे।

“वहाबी आतंक पर शहजादे सलमान की स्वीकारोक्ति स्वागतयोग्य लेकिन कई सवाल बाकी” in Punjab Kesari

सउदी अरब का वली अहद या क्राउन प्रिंस घोषित होने के बाद वैसे तो शहजादे मौहम्मद बिन सलमान अपने सामाजिक सुधारों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कथित संघर्ष के लिए लगातार सुर्खियों में रहे। लेकिन अपनी पहली अमेरिका यात्रा में उनके बयानों की कुछ ज्यादा ही चर्चा हो रही है और जैसे वो बयान हैं, उन पर बहस होना लाजमी भी है।

अमेरिका में शहजादे के विवादास्पद बयानों पर चर्चा से पहले एक नजर उनके सामाजिक सुधारों पर। सउदी में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत दिए जाने पर तो बहुत सुर्खियां बनीं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वहां महिलाओं को पुरूषों की अनुमति के बिना भी व्यापार शुरू करने की इजाजत दी गई है। वहां इतिहास में पहली बार एक महिला को स्टाॅक एक्सचेंज का प्रमुख नियुक्त किया गया है। अब सउदी महिलाएं तलाक के बाद बिना किसी मुकदमे के तुरंत अपने बच्चों की कस्टडी ले सकती हैं। पिछले साल दिसंबर में वहां पहली बार किसी महिला का संगीत कार्यक्रम हुआ। इस वर्ष जनवरी में जेद्दाह के एक खेल स्टेडियम में पहली बार महिलाओं को प्रवेश दिया गया। 35 वर्ष बाद सउदी में एक फिर सिनेमाहाॅल शुरू होंगे। वहां धार्मिक पुलिस बहुत शक्तिशाली है। शहजादे ने उसके अधिकार कम करने के लिए भी जोरदार लाॅबिंग की।

परंपरागत सोच से बाहर जा कर उन्होंने महिलाओं के प्रति जो उदारता दिखाई, उससे स्पष्ट लगने लगा है कि शहजादे देश के कट्टरवादी समाज को एक नई दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं। उनकी सोच भविष्योन्मुखी और समताकामी है, लेकिन ये भी सच है कि सदियों से कबिलाई सोच में बंद सउदी समाज को अभी इस दिशा में लंबा रास्ता तय करना है।

बहरहाल अब हम उनकी अमेरिका यात्रा पर आते हैं जहां उनके बयानां ने दुनिया को एक बदलते सउदी अरब से परिचित करवाया। जब उनसे सउदी द्वारा वित्तपोषित और प्रचारित वहाबी इस्लाम के बारे में पूछा गया जिसका उनके देश में अनुसरण किया जाता है और जिसे दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के लिए जिम्मेदार माना जाता है, तो उन्होंने कहा, “शीतयुद्ध के दौरान जब सहयोगी देशों ने कहा कि हम अपने संसाधन मुस्लिम देशों में सोवियत रूस का विस्तार रोकने में लगाएं, तब हमने विदेशों में मदरसों और मस्जिदों में निवेश शुरू किया। एक बार ये कार्यक्रम शुरू तो हो गया, लेकिन आने वाली सरकारें इस पर नियंत्रण न रख सकीं। हमें इस पर लगाम लगानी है। आजकल ऐसे कामों के लिए सरकार से ज्यादा पैसा सउदी फाउंडेशनों द्वारा दिया जाता है।

ये शायद पहली बार है जब सउदी अरब के शाही परिवार के किसी व्यक्ति ने इतनी साफगोई से ये माना कि वहाबी इस्लाम और इस्लामिक आतंकवाद के प्रसार में उसका प्रमुख हाथ रहा है। शहजादे सलमान के इस बयान के बाद पूरे इस्लामिक जगत में भूचाल आ गया। इसकी दो खास वजहें थीं। एक तो ये कि इस बयान ने दुनिया भर की इस्लामिक आतंकी तंजीमों को कठघरे में खड़ा कर दिया। अब तक वो अपने आतंकी रवैये को यह कह कर सही ठहराती रहीं हैं कि वो तो मुसलमानों पर पश्चिम के इसाई देशों की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं और उनका तथाकथित जिहाद बिल्कुल जायज है। दूसरा ये कि इस बयान ने आतंकी तंजीमों की फंडिंग पर सवाल खड़ा किया और ये भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस मद में दिए जा रहे धन पर लगाम लगाई जाएगी। ये सउदी धन पर पलने वाले वहाबी मदरसों और मस्जिदों के लिए बिलाशक बुरी खबर है।

कुछ कट्टरवादी इसे डोनाल्ड टंªप के सामने समर्पण मानते हैं क्योंकि ट्रंप ने न केवल इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को चुनावी मुद्दा बनाया, अपितु सत्ता में आने के बाद इसके खिलाफ ठोस कदम भी उठाए। लेकिन सच ये भी है कि शहजादे सलमान खुद अब इस प्रतिकामी सोच से अपने देश को बाहर लाना चाहते हैं और इस ओर कदम भी उठा चुके हैं। उन्हें लगता है कि यदि सउदी को तेल आश्रित अर्थव्यवस्था से परे जाना है तो उन्हें पश्चिमी देशों से बेहतर तालमेल करना पड़ेगा। यदि उन्हें अमीर पश्चिमी पर्यटकों को अपने देश की ओर आकर्षित करना है तो कबीलाई ढर्रा बदलना होगा।

शहजादे के बयान के बाद भारत में भी मंथन आरंभ हो गया है क्योंकि यहां भी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए बड़ी मात्रा में सउदी अरब से धन आया। देश भर में और खासतौर से केरल और कश्मीर में सउदी से अंधा पैसा आया और जल्दी ही इस धंधे में मुसलमान वोटों की राजनीति करने वाले दल भी शामिल हो गए। इन्होंने तेजी से बढ़ते इस्लामिक कट्टरवाद से जानबूझ कर निगाहें फेर लीं। जिन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई उसे ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया। हद तो तब हुई जब देश में हिंदुओं को ही आतंकवादी साबित करने की साजिश होने लगी। क्या हम जाकिर नायक को भूल सकते हैं जिसने हिंदुओं के खिलाफ विषवमन करने और उनका धर्म परिवर्तन करने के लिए पूरा दम लगा दिया। जिस तरह केरल और कश्मीर में धरती से जुड़े उदारवादी इस्लाम की जगह वहाबी इस्लाम ने पैर पसारे, क्या उसे झुठलाया जा सकता है।

बहरहाल शहजादे सलमान के बयान का सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान में देखने को मिला। रूस के अफगानिस्तान में घुसने के बाद फ्रंटलाइन स्टेट होने के नाते पाकिस्तान को सउदी से सबसे ज्यादा पैसा मिला। जहां अस्सी के दशक से अब तक 32,000 से भी ज्यादा मदरसे खोले जा चुके हैं। इन्हीं मदरसों से निकले तालीबानियों की मदद से अमेरिका ने अफगानिस्तान से रूस को खदेड़ा और पाकिस्तान ने वहां अपने बगल बच्चों की सरकार बनाने का सपना साकार किया। सउदी ने पाकिस्तान को परमाणु बम विकसित करने के लिए भी भरपूर धन दिया और शायद यही वजह है जब उसने पहली बार बम तैयार किया तो उसे ‘इस्लामिक बम’ का नाम दिया गया। आश्चर्य नहीं कि कुछ समय पूर्व जब सउदी ने 39 देशों वाला आतंकवाद विरोधी सैन्य गठबंधन बनाया तो उसका मुखिया पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ को बनाया।

सउदी ने न सिर्फ पाकिस्तान को वहाबी इस्लाम के प्रसार के लिए भरपूर धन दिया बल्कि उसे दुनिया भर की कट्टर इस्लामिक ताकतों को एकजुट करने, आतंकियों का नेटवर्क तैयार करने और उनमें पैसा बांटने का काम भी सौंपा। इस काम में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई और उसके उच्चायोगांे और दूतावासों ने सक्रिय भूमिका निभाई। ओसामा बिन लादेन से लेकर मुल्ला उमर तक अगर दुनिया के सबसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी अगर पाकिस्तान में ही पाए गए हैं तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

शहजादे सलमान के बयान से पाकिस्तान बहुत चिंतित है क्योंकि उसने इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं, दुश्मन देशों भारत और बांग्लादेश में भी आतंकी नेटवर्क खड़ा करने के लिए किया। अगर सउदी से आने वाले धन में कटौती होती है तो इसका असर सीधे पाकी मदरसों और आतंकी तंजीमों पर पड़ेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए ये बेशक बहुत बुरी खबर है।

शहजादे सलमान के इस्राइल से जुड़े बयान ने भी दुनिया में तहलका मचाया। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों की तरह ही इस्राइल को भी अपने लिए जमीन का हक है। ये असल में इस बात की ओर इशारा था कि शहजादे सलमान और अमेरिका में इस विषय में अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। उनके दौरे में इसकी पुष्टि भी हो गई। पता लगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने इस्राइल और फिलिस्तीन के लिए शांति योजना तैयार करने के वास्ते अपने दामाद जेरेड कुशनर को नियुक्त किया है। उन्होंने इस संबंध में शहजादे से भी बात भी की है। कुशनर चाहते हैं कि शांति योजना तैयार होने के बाद सउदी अरब और दूसरे अरब देश फिलिस्तीन को समझौता मानने के लिए समझाएं।

ध्यान रहे सउदी अरब का इस विवाद पर आधिकारिक मत ये है कि जो भी शांति समझौता हो उसमें फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी जाए और पूर्वी येरूशलम को उसकी राजधानी माना जाए। कुछ समय पूर्व जब ट्रंप ने येरूशलम को इस्राइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी थी तो अरब देशों ने इसे पीड़ादायक बताया था। सउदी अरब की विदेशनीति का आंख मूंद कर अनुसरण करने वाले पाकिस्तान को इससे भी समस्या है। दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तान की स्कूली किताबों में दुनिया का जो नक्शा छापा जाता है उसमें इस्राइल का वजूद ही नहीं होता। यही नहीं पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा होता है कि ये इस्राइल को छोड़ सभी देशों के लिए मान्य है।

वहाबी आतंकवाद और इस्राइल जैस विषयों पर शहजादे सलमान की बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इनकी असली परीक्षा तो इनके क्रियान्वयन के समय ही होगी। अब जब उन्होंने इस्राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, तो क्या वो अपने जानी दुश्मन ईरान की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे तथा कतर, यमन और सीरिया में भी शांति की नई राहें तलाशेंगे या इस्राइल के साथ संबंधों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे क्योंकि सउदी की तरह इस्राइल भी ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। अमेरिका के तुरंत बाद उनके फ्रांस दौरे में ईरान के मसले पर हुई तनातनी से तो नहीं लगता कि वो फिलहाल ईरान के प्रति नरमी बरतने के मूड में हैं। ध्यान रहे फ्रांस, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ हुए समझौते का समर्थक है और जब ट्रंप ने इसे रद्द करने की धमकी दी थी तो फ्रांस ने उन्हें इसके खिलाफ चेताया भी था।

इस पूरे परिदृश्य में भारत को भी अपने पत्ते सही तरीके से खेलने चाहिए। दक्षिण एशिया में आतंकवाद के खिलाफ भारत और अमेरिका सहयोग कर रहे हैं। अपनी दक्षिण एशिया नीति में ट्रंप ने भारत को करीबी सहयोगी माना है। ये सही समय है जब भारत भी अपनी खुफिया जानकारियों के साथ सउदी अरब से संपर्क करे और वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए देश में आ रहे पैसे पर रोक लगाए। यही नहीं भारत को सउदी फाउंडेशनों, आईएसआई और इनके सहयोग से भारत में पनपीं आतंकी तंजीमों पर रोक के लिए भी सउदी से सहयोग मांगना चाहिए।

“नेपालः सदभावना के साथ सतर्कता भी आवश्यक” in Punjab Kesari

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी ने हाल ही में नेपाल का दौरा किया। अब्बासी भले ही कठपुतली प्रधानमंत्री हों, पर उनका दौरा और उनके वक्तव्य कई सवाल खड़े करते हैं। ये दौरा असल में नेपाल के नए प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल, यूएमएल के नेता केपी ओली की भारत से खंुदक, चीन से नजदीकी और भविष्य में उनकी नीतियों की एक बानगी है।

आमतौर से नेपाल के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद सबसे पहले भारत का दौरा करते हैं, लेकिन ओली ने सबसे पहले नेपाल-चीन सीमा का दौरा किया और वहां चीन का गुणगान किया। उनके यहां जो पहला राष्ट्राध्यक्ष आया है, वो पाकिस्तानी है। अब्बासी नेपाल के दौरे पर तो गए ही, वहां उन्होंने ओली के साथ मिलकर भारत को चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कश्मीर में तथाकथित मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाया और जल्द से जल्द सार्क सम्मेलन करवाने की बात की। अब्बासी के दौरे का संकेत ये था कि भारत भले ही सार्क में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश करे और इस्लामाबाद में प्रस्तावित शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करे, लेकिन नेपाल, पाकिस्तान को अपना रहा है और चीन की सरपरस्ती में दक्षिण एशिया में नए समीकरण उभर रहे हैं। अब्बासी ने चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना की जम कर तारीफ की जिसके तहत पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान काॅरीडोर (सीपेक) बनाया जा रहा है जो पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है। ज्ञात हो नेपाल भी चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में हिस्सेदारी के लिए सहमति दे चुका है।

जाहिर है चीन के करीबी ओली, उसकी शह पर उसके एक अन्य पिट्ठू पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को मुंह चिढ़ा रहे थे। अब्बासी ने वहां जा कर कहा, “पाकिस्तान, नेपाल की एकता, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता को प्रमुखता से महत्व देते हुए इसका समर्थन देता है।” ये और कुछ नहीं ओली के विचारों की ही प्रतिध्वनि है जो किसी भी कीमत पर भारत को नेपाल से दूर करने पर तुले हैं और इसके लिए उन्होंने नेपाली स्वाभीमान और राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। कहने की आवश्यकता नहीं उन्होंने चुनावों में जी भर कर भारत के खिलाफ विषवमन किया और उस पर नेपाल की संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता से खेलने का आरोप लगाया। भारत पर नेपाल के मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाने वाले ओली अब खुद अपने देश को चीन को बेचने के लिए तैयार बैठे हैं, लेकिन अब उन्हें देश की अखंडता और संप्रभुता का ध्यान क्यों नहीं आ रहा? सीपेक के नाम पर चीन जैसे पाकिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है और जिसका पाकिस्तान के सभी बुद्धिजीवी आजकल एक स्वर से विरोध कर रहे हैं, क्या वो ओली को नहीं दिखता? क्या ओली ये बताने का कष्ट करेंगे कि नेपाल में अभूतपूर्व रक्तपात करने वाले उनके माओवादी सहयोगी किसकी मदद से उनके देशवासियों का खून बहा रहे थे? उन्हें हथियार और पैसा कहां से मिल रहा था?

कुछ भारतीय कम्युनिस्ट पत्रकार ओली के भारत विरोधी रवैये के लिए मोदी सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। ये आधा सच है, जबकि पूरा सच ये है कि ओली चीन के पिट्ठू हैं। भारत उनकी कितनी ही लल्लो-चप्पो करले वो भारत के साथ नहीं आएंगे। इसके सबूत के तौर पर हम कुछ तथ्य रखना चाहेंगे।

ओली जब अक्तूबर 2015 से अगस्त 2016 के बीच पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने चीन के साथ अनेक समझौते किए जिनका साफ मकसद था नेपाल से भारत को बाहर करने के लिए चीन को कमान सौंपना और व्यापार के लिए भारत पर निर्भरता समाप्त करना। इसमें ओली सफल भी हुए। आज नेपाल में चीन सबसे बड़ा निवेशक है। ओली ने चीन से नजदीकी बढ़ाने के लिए ट्रांसिट ट्रीटी (पारगमन संधि) पर हस्ताक्षर किए ताकि नेपाल और चीन को सड़क और रेल मार्ग से जोड़ा जा सके।

ओली को उम्मीद है कि जब चीन तिब्बत में शिगास्ते और क्यीरोंग तक रेल नेटवर्क ले आएगा तो उसे नेपाल तक लाना मुश्किल नहीं होगा। ध्यान रहे चीन अपने क्निघाई-तिब्बत रेेलवे को 2020 तक नेपाल सीमा तक ले जाना चाहता है और उसने इसे काठमांडू तक ले जाने की भी इच्छा जताई है। तिब्बत स्थित क्यीरोंग नेपाल के रासुवगाधी बाॅर्डर ट्रांसिट पाॅइंट से 25 किलोमीटर दूर है और यहां से काठमांडू मुश्किल से 50 किलोमीटर। इसके अलावा चीन और नेपाल को जोड़ने के लिए तीन सड़कों का निर्माण भी चल रहा है। ये दो वर्षों में पूरा हो जाएगा। यानी नेपाल के रेल, सड़क नेटवर्क और अर्थव्यवस्था पर पर चीन का पूरा कब्जा और भारत के जरिए होने वाले व्यापार को भी वाया चीन करने का जुगाड़।

जाहिर है ओली के रहते चीन के लिए राजधानी काठमांडू तक सीधी पहुंच बनाना और आसान हो जाएगा। चीन का ओली पर कितना प्रभाव है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पिछली सरकारों ने चीन से जुड़ी जिन परियोजनाओं को नकारा था, वो उन्हें भी फिर से जीवित करने के लिए तैयार हैं। पिछली शेरबहादुर देउबा सरकार ने 2.5 अरब डाॅलर की बूढ़ी गंडक परियोजना को अनियमितताओं के चलते रद्द कर दिया था, लेकिन ओली ने उसे फिर से शुरू करने का ऐलान किया है। रेल, सड़क और इस बांध परियोजना के अलावा भी चीन नेपाल में अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाएं चला रहा है। इनमें पोखरा इंटरनेशनल रीजनल एयरपोर्ट, काठमांडु रिंग रोड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट, अपर त्रिशूल जल विद्युत परियोजना आदि भी शामिल हैं। यही नहीं नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा बनने के लिए हस्ताक्षर भी किए हैं।

ओली की भारत के प्रति क्या नीति रहने वाली है? ये उनके चीन के प्रति बेहद उदार रवैये और अब्बासी के दौरे से काफी कुछ स्पष्ट हो चुका है। हाल ही में हाँगकाँग के अखबार ‘साउथ चाइना माॅर्निंग पोस्ट’ में उनका विस्तृत साक्षात्कार छपा है। चीन परस्त इस अखबार में वो भारत के बारे में बेलौस अपनी राय रखते हैं। भारत के साथ काम करने के सवाल पर वो कहते हंै, ”हमारे भारत के साथ सदैव बेहतरीन संबंध रहेे हैं, भारत में ‘कुछ लोगों’ ने गलतफहमी पैदा की, लेकिन भारतीय नेताओं ने मुझे आश्वासन दिया है कि भविष्य में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और हम एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करेंगे।”

आगे वो अपनी असली मंशा प्रकट करते हैं, ”हम बदलते समय के अनुसार भारत के साथ अपने रिश्ते ‘अपडेट’ करना चाहते हैं। दोनों देशों के रिश्तों के ‘हर विशेष प्रावधान’ की समीक्षा करना चाहते हैं जिसमें भारतीय फौज में नेपाली नागरिकों का काम करना भी शामिल है।” वो आगे कहते हैं, ”भारत के साथ हमारी अच्छी कनेक्टीविटी है, वो सब ठीक है, हम इसे और भी बढ़ाऐंगे, लेकिन हम नहीं भूल सकते कि हमारे दो पड़ोसी हैं। हम सिर्फ एक देश पर ही निर्भर रहना या सिर्फ एक ही विकल्प नहीं चाहते।”

ओली का संकेत साफ है – समय बदल गया है यानी नेपाल में चीन युग आरंभ हो चुका है, नेपाल अपनी मर्जी के मुताबिक (या चीनी निर्देशानुसार) भारत से संबंध रखेगा, अब भारत को उस से कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। ऐसे में भारत के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। भारत के लिए चिंता की बात इसलिए भी है कि भारत-नेपाल की मुक्त सीमा का लाभ उठाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने नेपाल में अनेक अड्डे बना रखे हैं। वहां आतंकवादियों का कितना बोलबाला है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि अनेक दुर्दांत आतंकवादी बिहार में भारत-नेपाल सीमा से पकड़े गए हैं। ओली की भारत विरोधी नीतियों को देखते हुए ये आशंका होना स्वाभाविक है कि ओली ऐसी गतिविधियों को रोकने में मदद करेंगे भी कि नहीं। भारत के लिए इस से भी बड़ी चिंता है नेपाल की राजनीति पर खूनी माओवादियों हिस्सेदारी। ध्यान दिला दें कि नेपाल में ओली के बाद दूसरे प्रमुख कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के भारतीय नक्सलियों से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। प्रचंड के नेतृत्व में नेपाली माओवादियों ने खून की वीभत्स होली खेली है जिसका इतिहास भारतीय माओवादियों से भी अधिक भयावह है। भारत, नेपाल को व्यापार में अनेक सुविधाएं और छूट देता है। भारत में अपना सामान डंप करने के लिए चीन पहले ही इनका फायदा उठा रहा है। ओली के नेतृत्व में चीन की ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा नहीं मिलेगा, क्या वो इसकी गारंटी देंगे?

ऐसी स्थिति में भारत क्या नीति अपनाए? भारत के सामने क्या विकल्प हैं? जाहिर है इस विषय में कोई कदम उठाने से पहले भारत को राजनीति से इतर दोनों देशों के सैकड़ों साल पुराने रिश्तों का भी ध्यान रखना होगा। नेपाल के तराई इलाके में रहने वाले लोगों से भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। दोनों देशों के बीच धार्मिक पर्यटन और शैक्षिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी पुरानी परंपरा है, नेपाल के लाखों लोग भारतीय सेना और अन्य स्थानों में काम करते हैं, उन्हें भारतीयों जैसे यहां संपत्ति खरीदने की अनुमति भी है, उनकी मुद्रा भी हमारी मुद्रा पर आधारित है।

ऐसे में नेपाल के संबंध में भारत के विकल्प असीमित नहीं हैं। भारत के लिए सबसे पहला विकल्प तो है प्रतीक्षा और अहस्तक्षेप। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘पड़ोसी पहले’ की नीति अपनाई है। इसे ध्यान में रखते हुए ओली के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडु का दौरा कर चुकी हैं और नेपाल की नई सरकर को पूरा समर्थन जता चुकी हैं। अब खबर आई है कि ओली भी किसी अन्य देश में जाने से पहले भारत का दौरा करेंगे और आगामी महीनों में प्रधानमंत्री मोदी भी नेपाल जाएंगे। जाहिर है अपनी तरफ से सकारात्मक रहते हुए भारत को शांति से ये देखना चाहिए कि समय बीतने के साथ नेपाल में हालात क्या करवट लेते हैं और ओली का भारत विरोध और चीन प्रेम किस सीमा तक जाता है और इसे लेकर वहां अंदरूनी कशमकश किस हद तक बढ़ती है।

भारत के समक्ष दूसरा विकल्प है जैसे को तैसा। ओली अगर भारतीय सेना में नेपालियों की भर्ती, सीमा प्रबंधन आदि पर विवाद करते हैं तो भारत भी उचित कदम उठाने चाहिए, खास कर सीमा प्रबंधन के विषय में। भारत को अब वैसे भी सीमा पर बेहतर प्रबंधन और हर आने-जाने वाले व्यक्ति की कड़ी निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

पिछले वर्ष विवादों के बावजूद भारत-चीन व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और ये 80 अरब डाॅलर के ऊपर जा पहुंचा। हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि भारत और चीन की दोस्ती को हिमालय भी नहीं रोक सकता। ऐसे में भारत को चीन को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि उसे वास्तव में दोस्ती निभानी है तो पाकिस्तान, नेपाल और मालदीव में इसका सबूत भी देना होगा। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और मालदीव के बाद नेपाल तीसरा ऐसा देश है जो इस समय सीधे चीन के असर में है। अगर चीन टकराव की नीति अपनाते हुए अपने बगलबच्चों के जरिए भारत को परेशान करने की कोशिश करेगा तो भारत निश्चय ही उचित कदम उठाएगा।

आखिर में भारत को भले इंसान और बड़े भाई के चरित्र से बाहर आना पड़ेगा। नेपाल सरकार के साथ ही नेपाली नागरिकों को भी अपनी सीमाओं और पसंद, नापसंद से अवगत करवाते रहना होगा ताकि वो भी अपनी सरकार पर दबाव बनाए रखें। 11 मार्च को ओली ने संसद में दो तिहाई सांसदों के साथ बहुमत साबित किया। नेपाल के नए संविधान के तहत उन्हें अब तानाशाहों जैसे अनेक विशेषाधिकार मिल गए हैं। वो इनका दुरूपयोग न करें, इसके लिए सबसे पहले जनता को ही अंकुश लगाना होगा।

“घनी के शांति प्रस्ताव और पाकिस्तान-तालीबान का दोगला रवैया” in Punjab Kesari

गत 28 फरवरी को अफगानिस्तान में दूसरी काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपनी ओर से शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस 23 देशों, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और नैटो का एक समूह है जो अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।

काॅफ्रेंस के पहले दिन ही बड़ी घोषणा करते हुए घनी ने कहा कि वो तालीबान को वैध राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने तालीबानी आतंकियों को कहा कि वो हिंसा छोड़ें और शांति स्वीकार करने के लिए सामने आएं ताकि देश को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि युद्धविराम और शांति प्रक्रिया पर सहमति बननी चाहिए। उन्होंने तालीबान को खुश करने के लिए अनेक प्रस्ताव भी किए। इनमें शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले तालीबानियों को सुरक्षा देना, बंदियों को छोडना, तालीबानी नेताओं के खिलाफ प्रतिबंध हटाना, तालीबान सदस्यों और उनके परिवारों को पासपोर्ट और वीसा देना, उनके लिए काबुल में कार्यालय खोलना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति घनी ने कहा कि उनका देश शांति को खतरे में डालने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है और दीर्घकालीन शांति के लिए वो हर तरह के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो शांति कायम करने के लिए बातचीत करे और ये बातचीत काबुल में हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो अतीत को भुला कर नए सिरे से बातचीत के लिए तैयार हैं।

पाकिस्तान ने घनी का तालीबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि वो शांति प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। असल में पाकिस्तान दिखावटी तौर पर ही सही, लंबे अर्से से बातचीत के लिए जोर डालता रहा है। घनी के प्रस्ताव के चंद घंटों के भीतर ही पाकिस्तान में अफगान राजदूत डाॅक्टर ओमर जखीवल ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासेर खान जंजुआ से बात की। जखीवाल ने जंजुआ को काबुल में हुए शांति सम्मेलन और राष्ट्रपति घनी के प्रस्तावों के बारे में बताया।

जंजुआ ने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में खून खराबे का जल्द अंत चाहता है। उन्होंने कहा “पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति अनिवार्य है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोगों के साथ सर्वनिष्ठ और सहभागी भविष्य के विचार में विश्वास रखता है, इसलिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शांति पहलों के तहत राजनीतिक सुलह-सफाई के प्रयासों का हमेशा स्वागत किया है। पाकिस्तान, राष्ट्रपति घनी के वार्ता और आपसी समझदारी के जरिए शांति लाने के प्रयास का स्वागत करता है और इसे सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।”

अब सवाल ये उठता है कि काबुल पीस प्रोसेस के तहत जैसे घनी ने शांति प्रस्ताव किया और चंद ही घंटों के भीतर जैसे उसे पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया, ये आखिर हुआ कैसे और इसके क्या निहितार्थ हैं? क्या पाकिस्तान वास्तव में उतना ईमानदार है जितना वो दिखा रहा है? और इस प्रस्ताव पर तालीबान का रूख क्या है और क्यों है? इसे कई तरह से समझा जा सकता है।

पहले देखते हैं कि पाकिस्तानी समीक्षक इसके बारे में क्या कहते हैं। वो इसके लिए अपने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को श्रेय देते हैं। उनके अनुसार इसके लिए जमीन जनरल बाजवा की पिछले साल अक्तूबर में हुई काबुल यात्रा के दौरान तैयार की गई। इस यात्रा के कुछ समय के भीतर ही पाकिस्तान ने खामोशी से अफगान तालीबान और हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकियों को काबुल को सौंप दिया। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने ये अभूतपूर्व कदम ये जताने के लिए उठाया कि इस्लामाबाद किस हद तक अफगानिस्तान के साथ सहयोग करना चाहता है। जनरल बाजवा की यात्रा के बाद दोनों देश लगातार संपर्क में रहे और पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लगातार ये आग्रह करता रहा कि वो तालीबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हो। पाकिस्तान, अमेरिका और अफगानिस्तान को बार-बार ये कहता रहा है कि अफगानिस्तान में लंबे अर्से से चले आ रहे संघर्ष का हल सिर्फ संवाद से ही हो सकता है और इसके लिए अफगानिस्तान को तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कुछ प्रोत्साहन देने होंगे।पाकिस्तानी समीक्षकों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान, तालीबान पर भी वार्ता का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डालता रहा है।

दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी उप सहायक सचिव एलिस वेल्स ने कुछ समय पूर्व कहा था कि अमेरिका ने तालीबान के लिए भी बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। इस पर तालीबान ने बातचीत के लिए सहमति तो दिखाई लेकिन शर्तें ऐसी रखीं जिन्हें मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन है। तालीबान ने अमेरिका को एक पत्र में कहा कि “अफगान मसला हल करने में सहायता मिल सकती है अगर अमेरिका अफगानिस्तान पर अपना कब्जा छोड़े और लोगों की वैध मांगों को स्वीकार करे जिसमें सरकार बनाने का तालीबान का हक भी शामिल है और चर्चा के बारे में अपनी चिंताएं और अनुरोध इस्लामिक अमीरात (तालीबान सरकार) को एक शांतिपूर्ण माध्यम से पहुंचाए।” तालीबान ने अमेरिका को अपने खत में हिंसा का रास्ता छोड़ने और इस समस्या को बातचीत से सुलझाने की सलाह भी दी। तालीबान ने अमेरिका से बातचीत के लिए सहमति जताई क्योंकि वो अफगान सरकार को वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। वो खुद को अफगानिस्तान की जायज सरकार मानता है जिसे अमेरिका ने गिराया था।

तालीबान के पत्र पर एलिस वेल्स ने कहा है कि अब ये दिखाने की जिम्मेदारी तालीबान पर है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं। ये बातचीत मुझसे या अमेरिका से नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की वैध और संप्रभु सरकार से होनी चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तानी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान ने पहले भी अफगान तालीबान और काबुल में वार्ता शुरू करवाई थी, लेकिन इसके नेता मुल्ला उमर और फिर उसके उत्तराधिकारी की ड्रोन हमले में हत्या के बाद वो ठप हो गई। पाकिस्तान इसके लिए अफगान सरकार में कुछ तत्वों को जिम्मेदार ठहराता है।

अब इस मसले को अफगानिस्तान के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान में शांति और अखंडता के लिए काम करने वाली अफगान हाई पीस काउंसिल के मुताबिक तालीबान ने अब तक ये प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। ज्ञात हो कि अपने मकसद में सफलता हासिल करने के लिए ये तालीबान से भी संपर्क रखती है। इसका गठन सितंबर 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया था।

काउंसिल के मीडिया विभाग के प्रमुख सय्यद एहसानुद्दीन ताहेरी कहते हैं कि ये तालीबान के लिए स्वर्णिम अवसर है। उन्हें अमेरिका को बातचीत के लिए पत्र लिखने की जगह अफगान सरकार से बात करनी चाहिए। अब गंेद उनके पाले में है, देखना होगा कि वो शरिया के खिलाफ कत्लोगारत जारी रखते हैं और अपनी मर्जी चलाते हैं या लोगों की आवाज सुनते हैं। ध्यान रहे कि अगर अफगान सरकार तालीबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं तो उनसे भी ये अपेक्षा की जाती है कि उन्हें भी अफगान सरकार को मान्यता देनी होगी और कानून के शासन का सम्मान करना होगा जिसमें महिलाओं के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है जिसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बहुत महत्व देते हैं।

जनवरी में हाई पीस काउंसिल के सदस्यों ने अफगान सरकार और तालीबान के बीच अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था। इसके बाद काउंसिल ने आरोप लगाया था कि कुछ देश (पाकिस्तान) अफगानिस्तान में शांति कायम करने में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि वो वहां शांति के पक्षधर नहीं हैं। काउंसिल के प्रमुख मौहम्मद करीम खलीली ने हालांकि कहा कि तालीबान के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी है और तालीबान को बातचीत की मेज तक लाने के तौर-तरीके तलाशे जा रहे हैं। उन्होंने देश के 26 प्रांतों में 280 बैठकें की हैं और उन्हें उम्मीद है कि इनके कारण तालीबान को औपचारिक बातचीत के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी। जाहिर है पीस काउंसिल के प्रयासों से घनी के शांति प्रयासों को भी बल मिला होगा।

अब देखते हैं कि इसके विषय में अमेरिका क्या सोचता है। अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए घनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि वो आतंकवादियों पर तब तक दबाव जारी रखेगा जब तक वो हार नहीं मान लेते। अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत जाॅन आर बास ने कहा कि हम एक बार फिर तालीबान का आहवान करते हैं कि वो बिना शर्त अफगान सरकार से वार्ता शुरू करे। वो कहते हैं ”तालीबान युद्ध के मैदान में ही नहीं, मादक पदार्थों से आमदनी और आय के स्रोतों पर भी काफी दबाव महसूस कर रहे हैं, क्षेत्रीय देशों सहित इतने सारे देशों की अपील के बाद उनपर दबाव और बढ़ गया है, जब तक हमें फर्क नजर नहीं आता, हम अफगान बलों की सहायता जारी रखेंगे।“ अमेरिकी सेना ने नवंबर से ही तालीबानी ठिकानों, उनके प्रशिक्षण शिविरों, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं पर हमले बढ़ा दिए हैं। उधर पेंटागन प्रवक्ता दाना वाइट ने कहा है कि तालीबान को आतंक छोड़ना होगा और उसे अफगान संविधान का सम्मान करना ही होगा और फिर उन्हें वार्ता की मेज पर आना होगा।

आखिर में पूर्व अमेरिकी राजनयिक और अफगान मामलों के जानकार बरनेट रूबिन की राय। वो कहते हैं कि “अफगान सरकार का प्रस्ताव अच्छा है और तालीबान बातचीत के लिए तैयार भी होता दिख रहा है, लेकिन वो सीधे अमेरिका से बात करना चाहता है क्योंकि उसकी सरकार अमेरिका ने ही गिराई थी। इस्लामाबाद प्रत्यक्ष रूप से भले ही ताजा शांति प्रस्ताव का स्वागत करे पर बहुत कम संभावना है कि वो इसके लिए तालीबान पर दबाव नहीं डालेगा क्योंकि वो उसकी दोस्ती को नहीं खोना चाहता। मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कोई ठोस प्रयास करेगा। ये सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत इस विषय में कोई ठोस पहल करेगा। हकीकत ये है कि पाकिस्तान पर अमेरिका से ज्यादा प्रभाव चीन का है।”

जाहिर है अफगानिस्तान में शांति की राह में काफी पेंच हैं। खून खराबे के बावजूद अफगान सरकार शांति के लिए भी प्रयास करना चाहती है, वहीं अमेरिका की नीति है तालीबान और उसके आका पाकिस्तान को उनके घुटनों पर लाना। उधर पाकिस्तान तालीबान के साथ मिलकर दोहरा खेल खेल रहा है। जाहिर तौर पर तो वो शांति प्रस्ताव स्वीकार करता है पर तालीबान के जरिए उसपर शर्तें लगवाता है। वो अप्रत्क्ष रूप से अमेरिका को बाध्य करना चाहता है कि वो तालीबान को असली अफगान सरकार के रूप में स्वीकार करे। यही तालीबान का प्रस्ताव भी है।

असल में अफगानिस्तान में शांति तभी आ सकती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना बगल बच्चा बनाने की नीति छोड़े। इस नीति में तालीबान उसका महत्वपूर्ण हथियार है, इसीलिए वो उसे संरक्षण, प्रशिक्षण और हथियार भी देता है। तालीबान के खात्मे का मतलब है, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का खात्मा। यही वजह है कि जाहिर तौर पर काबुल प्रोसेस के प्रस्तावों का समर्थन करने के बावजूद वो इन्हें अमली जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। तालीबान ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। अपने एक ट्वीट में इसके प्रवक्ता ने कहा है कि घनी का प्रस्ताव “सामूहिक समर्पण का षडयंत्र है।”

घनी ने तालीबान की व्यापक हिंसा के बावजूद उदारता दिखाई, लेकिन पाकिस्तान और तालीबान ने इसमें सेंध लगा दी है। लगता है जैसे मामला जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। लेकिन ऐसा नहीं है, कई सतहों पर बातचीत जारी है। वैसे भी अब हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकना पहले जितना आसान नहीं है। घनी के प्रस्ताव में पलीता लगा कर पाकिस्तान और तालीबान अपना ही अहित करेंगे। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची में शामिल करवा चुका है, अगर ऐसी ही चला तो उसे ब्लैक लिस्ट में भी शामिल किया जा सकता है। ताजा खबरों के मुताबिक अब यूरोपियन यूनियन भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।

दीवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज और आतंकवाद से जूझ रहा है। वो विनाश के रास्ते पर और आगे बढ़ेगा या संभलेगा…उसे अफगानिस्तान का सपना प्यारा है या देश की जनता का कल्याण? ये पाकी सेना को तय करना है।

“Being Sridevi: An abundance of love, humility & self-sacrifice” in TOI Blogs

India’s first female superstar and Padma Shri Awardee, Sridevi, has been cremated with state honours.

Wrapped in the Tricolor, in a hearse draped with garlands, she was given a gun salute before her last journey. Thousands of mourners clamored to catch a last glimpse of the country’s most powerful actress, a heroine who ensnared watchers of the silver screen with her enamoring presence, often times overshadowing her male counterpart.

The untimely demise of a woman who carried such power came as a shock to all, especially with the twists and turns of the various autopsies creating a shroud of mystery. The news of her death first came as a shock and was defined as a sudden heart attack, later revealed that there was a certain amount of alcohol content in her blood, finally with Dubai authorities stating that her death was due to drowning as she fell unconscious. How all these scenarios intertwine is still a mystery, but the final report is yet to be divulged to the public.

None the less, news of her sudden death has put the nation into a frenzy, and as sketchy as it all looks it would be good for the government to step in and hamper another label of ‘mystery death’. There are too many national heroes, superstars, and well-acclaimed individuals from journalists, to ministers whose death is questionable.

Stories regarding Sridevi’s rather tumultuous life are hitting the headlines. With Ram Gopal Verma’s letter to Sridevi’s fans he has revealed the great sadness behind the ever-smiling face. Sridevi started acting from the tender age of 4 years, her career spanned the course of 50 years. As she kept climbing the ladder of success her personal life was disintegrating. Actors were paid a bulk of their money in black, Sridevi’s father trusted friends and relatives with that money.

After her father’s demise she lost a huge chunk of her hard earned money, and was reared by her overprotective mother. Her mother had invested in a series of bad real estates, leading to more loss. In the 1990’s Sridevi’s mother had a brain tumor, but the surgery was botched leading to damaged brain function. In the midst Srilatha, Sridevi’s sister eloped with her neighbor. Sridevi’s mother signed a will putting the remaining assets in Sridevi’s name, but Srilatha filed a case stating that their mother wasn’t in the right frame of mind to make a sound decision.

When Sridevi finally met Boney Kapoor they were both broke, they fell in love but Boney Kapoor was married. Sridevi was called a ‘home wrecker’ and punched in the stomach by Boney Kapoor’s mother. Many actors and personalities of the industry have come forward and said that Sridevi was unhappy, that she had a miserable personal life, but the one place she was at peace is in front of the camera.

Sridevi was one of the highest paid Bollywood Actress in the 1990’s, at times paid more than her male costars. She is the one and only actress who was capable of huge box office success without the support of a male hero, in fact she would overshadow her male costars and many actors would fear working with her. In the movie ‘Khuda Gawah’ Sridevi managed to overshadow fellow superstar and now King of Bollywood Amitabh Bachchan.

After an 8 year sabbatical she made her return with the movie ‘English Vinglish’ which according to Komal Nahta is “the best comeback in Bollywood history”. Established as a formidable actress on-screen with versatile roles each time she did a movie, Sridevi was a shy and humble person off-screen. In her last advertisement she created a homely feel on set, she was keen on being punctual, and didn’t have the ‘star tantrum’ that are usually heard of in celebrities. Her passion and love for acting reflected with the ease she would perform.

Two decades of her life she has spent as the wife of Boney Kapoor and the mother of Jhanvi and Khushi, her daughters. She let her rising career take a step back and placed her family in the forefront, even after her experience with her family she gave all her love to her husband and daughters. Frequently the family was seen together, often times she was seen holding her daughters hands and promoting them for upcoming movies. At the core of her being she was a woman with abundant love, self-sacrificing and humble. Let us remember Sridevi not for the manner of her untimely demise, but for the beauty she shared with her devoted fans.

“Budget 2018: The government takes major steps with the aim of uplifting the nation’s women and children” in TOI Blog

The year 2017 witnessed landmark rulings in the favor of women which were on a standstill for decades, having begun with women appointed in high profile government positions, and keen awareness for child protection.

Upholding the national pledge to uplift and protect women and children, the government has kick-started 2018 with greater momentum than the previous year. The Union Budget of 2018 has heightened its focus on welfare for women and children. This year’s budget has provided the Women and Child Development Ministry with an increase in funds by almost 12%, bringing the total to Rs. 24,700 Crores.

To inculcate a panorama of women ranging from rural to urban, Finance Minister Arun Jaitley introduced a boon to working women. With our prevailing governments no-nonsense attitude we witnessed a range of successes in the previous year’s Budget, 2018 is aimed at being the icing on the cake with yet provisions and more protection.

The obvious disparity in pay based on gender has been long plaguing the world, this year’s Budget aims at curbing economic discrimination. With a never before introduced provision, Arun Jaitley announced a reduction in the contribution that women employees make to the Employees Provident Fund Organisation, from 12% to 8%.

This move will increase the take-home pay, and is expected to increase job opportunities. India has a women’s labour force participation at a meager 24% as opposed to 40% globally, hopefully the reduction in EPFO will bring us at a global par. Modi’s campaign ‘Start Up India’ has made leaps and bounds through MUDRA Yojana, a scheme to provide funds to first time entrepreneurs at a concessional rate.

Arun Jaitley stated that a whopping 76% of the beneficiaries are women, to continue from the previous year this scheme has received a boost of Rs 3 Lakh Crores.  In order to further assist working women and mothers we will see a significant increase to existing schemes in the coming financial year.

The National Creche Scheme’s allocation will be doubled; under this scheme the children of working mothers are provided a safe haven, while the allocation for Working Women’s Hostel Scheme has been raised by 20%. These facilities are free of cost and provide women the required freedom and safety needed to be self-dependent.

On the other hand to further ensure cost-cutting and better health standards of women there is the Ujjwala Yojana. Under this Yojana poor families are provided cleaner cooking gas for a bare minimum amount, which is a boon to the health of women who choke in the kitchen due to the smoke from cooking. Conceived two years ago the current government exceeded its annual target in 2016-17, for the 2018-19 budget we can expect a similar projection.

The Pradhan Mantri Saubhagya Yojana, which provides free electricity to rural households has been given a target of 4 crores households, and 2 crore toilets will be installed under the Swachch Bharat Mission.  Mahila Shakti Kendra, a One Stop Shop for women empowerment at the village level, is one of the ambitious projects of the Ministry. Its allocation has been increased four-fold to Rs. 267 Crores.

The Finance Minister further stated that the loans extended to Women Self-Help Groups are expected to increase to Rs. 75000 Crores by the end of 2018-19 from Rs. 42500 Crores. Rs. 500 Crores have been provided for transfer to the Nirbhaya fund from which various schemes of Central Government and State Governments are supported for safety and protection of women. The enhanced allocation will help in creating a safety net for women in difficult situations.

Witnessing the horrendous 2017 events which brought a limelight to the predominant vulnerability of children, the Ministry has shown that the protection of children is an important area of focus. The allocation for the protection of children has been increased by 12% for the year 2018-19.

Arun Jaitley also shared some good news about a recently started Scheme launched by the Beti Bachao Beti Padhao Campaign. Approximately 1.26 crore girls have benefitted through the Sukanya Samridhi Yojana accounts, which is a deposit scheme meant to meet the marriage and education expense of a girl child.

Discrimination against women is prevalent in all classes, yet up till now each budget was focused on underprivileged women. The major complaint by most regarding the previous budget was that working class women weren’t included.

For this year’s budget the government has taken serious consideration and introduced the reduction of EPFO for women of all classes. This year’s budget has been widely received with warmth when it comes to women and children, especially due to the great achievements by the current government in previous budgets.

“गंभीर चुनौतियों के बावजूद महत्वपूर्ण है भारत-ईरान संबंध” in Punjab Kesari

ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी का भारत दौरा नरेंद्र मोदी सरकार की परिपक्व और व्यावहारिक विदेश नीति का उदाहरण है। हाल ही में सुन्नी इस्लामिक देशों ओमान, यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) और फिलिस्तीन के दौरे से लौटे प्रधानमंत्री मोदी ने जिस खुले दिल से दुनिया के सबसे बड़े शिया इस्लामिक देश के राष्ट्रपति का स्वागत किया और इस यात्रा की जो उपलब्धियां रहीं, वो भारत के लिए निःसंदेह संतोषजनक और उत्साहवर्धक हैं। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं और व्यापारिक संपर्क मार्गों की दृष्टि से भी यह दौरा बेहद लाभदायक रहा। ये सही है कि जमीनी हकीकत, कागजी उपलब्धियों से बेहद अलग होती है। लेकिन ये भी सही है कि लंबे रास्ते की ओर भी पहले एक ही कदम बढ़ाया जाता है।

खाड़ी देशों में जैसे अंतर्विरोध हैं, वो किसी से छुपे नहीं हैं। एक तरफ तो सुन्नी सउदी अरब की शिया ईरान से दुश्मनी है तो दूसरी ओर उसने कतर पर शियाओें के प्रति नरम रवैया अपनाने के लिए प्रतिबंध लगा रखे हैं। सउदी अरब ने तो 34 देशों का ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिस्म कोआलिशन’ तक बना लिया है जिसके प्रमुख पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ हैं। सउदी अरब का आरोप है कि ईरान यमन, सीरिया, लेबनान आदि में शिया आतंकियों को समर्थन और हथियार दे रहा है। अब तक तो पाकी सेना संसद के प्रस्ताव के मुताबिक सउदी अरब अपने सैनिक भेजने से बच रही थी, परंतु कुछ दिन पहले सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने इसे दरकिनार करते हुए वहां सैनिक भेजने का फैसला भी कर लिया है। जाहिर से बात है ईरान इस कदम को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। इससे पाकिस्तान और ईरान के संबंध और बदतर होंगे।

वहींे दूसरी ओर इसराइल और ईरान की पुरानी दुश्मनी है। इसराइल तो एक बार ईरान के परमाणु ठिकानांे पर हमला भी कर चुका है। गत 10 फरवरी को दोनों देशों में तनाव अचानक फिर बढ़ गया जब इसराइल ने अपनी वायु सीमा में सीरिया से आए एक ड्रोन को धराशायी कर दिया। इस कार्रवाई में, 1982 के बाद पहली बार इसराइल का एक एफ 16 विमान भी निशाना बना। इसराइल ने इसके लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है और जवाबी कार्रवाई की धमकी भी दी है।

इन सबके बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान समझौते (ज्वाइंट काॅम्प्रीहैंसिव प्लान आॅफ एक्शन) से बाहर आने की धमकी है जिसे 14 जुलाई 2015 को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों, जर्मनी और ईरान के बीच अंजाम दिया गया। जाहिर है ओबामा जहां इस्लामिक दुनिया में तनाव कम करने की कोशिश कर रहे थे, वहां ट्रंप खुलेतौर पर सउदी अरब और इसराइल का पक्ष ले रहे हैं जहां से अमेरिका को बड़े पैमाने पर हथियारों के आॅर्डर मिलते हैं।

अमेरिकी ने चीन के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाने के लिए इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में भारत को अपना रणनीतिक साझीदार बनाया है, पर भारत अमेरिका की नीति आंख मूंद कर मानने के लिए तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनय में कोई दोस्ती या दुश्मनी स्थायी नहीं होती और सभी देश अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। वैस भी अमेरिका और चीन में काफी फासला है। चीन तो भारत का पड़ोसी है। अगर भारत स्थानीय स्तर पर अपने हितों की रक्षा नहीं करेगा तो वैश्विक स्तर पर वो उसका मुकाबल क्या करेगा। अमेरिका को अगर भारत के साथ रणनीतिक साझीदारी करनी है तो उसके हितों को भी समझना पड़़ेगा।

भारतीय हितों के लिए अगर इसराइल और सउदी अरब महत्वपूर्ण हैं तो ईरान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सच पूछा जाए तो इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों के लिए भी कहीं न कहीं ईरान अहम है। संभवतः यही कारण है कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन भारत आए तो उन्होंने चाबहार बंदरगाह के मुद्दे पर भारत का यह कहते हुए समर्थन किया था कि अमेरिका, ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोधी है, उसके लोगों की भलाई के लिए निर्मित की जा रही परियोजनाओं का नहीं।

असल में अमेरिका अभी अफगानिस्तान से जाने के मूड में नहीं है, लेकिन वहां अपने साजो सामान की आपूर्ति के लिए पाकिस्तानी ब्लैकमेल से बाहर आने के विकल्प भी तलाश रहा है। ऐसे में चाबहार बंदरगाह अमेरिका को अफगानिस्तान तक पहुंचने का बेहतरीन विकल्प उपलब्ध करवा सकता है। भारत ने रोहानी के दौरे में ईरान समझौते का खुल कर समर्थन किया। ये ट्रंप प्रशासन के लिए भी एक इशारा है कि वो ईरान से टकराव के स्थान पर सामंजस्य का रूख अपनाए। रोहानी ने हैदराबाद की सुन्नी मक्का मस्जिद में अपने संबोधन में शिया और सुन्नी समुदायों को अपने मतभेद कम करने और आमजन की भलाई के लिए काम करने का संदेश दिया। जाहिर है ये संदेश सउदी अरब के लिए था। सउदी अरब और उसके सहयोगी देश इसका संज्ञान लेते हैं या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन रोहानी ने तनाव कम करने की दिशा में अपनी तरफ से महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

रोहानी के बयान अमेरिका के लिए भी थे। उन्होंने ने सिर्फ सुन्नी देशों से तनाव कम करने की मंशा जताई, बल्कि ईरान समझौते के प्रति भी अपना समर्थन और समर्पण दोहराया। उम्मीद की जानी चाहिए कि सउदी अरब, उसके सहयोगी सुन्नी देश और अमेरिका इसका संज्ञान लेंगे। चीन अपने आर्थिक-राजनीतिक वर्चस्व को बढ़ाने के लिए जिस प्रकार दुनिया भर को धमका रहा है, रोहानी ने उसके खिलाफ भी भारत में आवाज उठाई और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक संबंध बराबरी और ईमानदारी के आधार पर होने चाहिए और देशों की संप्रभुता से समझौता नहीं होना चाहिए। जाहिर है ईरान का इशारा चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना की ओर था जिसकी आड़ में चीन दुनिया भर में सड़कों का जाल बिछा रहा है और बंदरगाहों पर कब्जा कर रहा है। इसके लिए वो साम, दाम, दंड, भेद हर तरह की नीति अपना रहा है।

ईरान मध्य एशिया में वन बेल्ट, वन रोड परियोजना का महत्यपूर्ण विकल्प उपलब्ध करवाता है। चाबहार बंदरगाह सिर्फ जल अवरूद्ध अफगानिस्तान को ही व्यापारिक मार्ग उपलब्ध नहीं करवाता, ये मध्य एशियाई देशों और रूस तक नया व्यापार मार्ग खोलता है। रोहानी की यात्रा में भारत ने चाबहार-जाहेदान रेल मार्ग के निर्माण के लिए अपना वादा फिर दोहराया। ध्यान रहे चाबहार पहले ही अफगानिस्तान-ईरान सीमा पर जाहेदान और मिलक/ जरंज क्षेत्र से सड़क मार्ग से जुड़ चुका है। इसके बाद जरंज-डेलाराम सड़क मार्ग का निर्माण भी किया जा चुका है जो अफगानिस्तान के गारलेंड हाइवे से जुड़ता है जो कंधार, काबुल और हेरात से जुड़ा हुआ है। चाबहार सिर्फ अफगानिस्तान से संपर्क के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, ये तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों से संपर्क के लिए भी अहम है।

ईरान सिर्फ चाबहार की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं है, ‘इंटरनेशनल नाॅर्थ-साउथ ट्रांसिट काॅरिडोर’ (आईएनएसटीसी) की नजरिए से भी बहुत जरूरी है जो बंदर अब्बास से शुरू हो कर उत्तर में कैस्पियन सागर तक फैला है। ईरान की उत्तरी सीमा, बंदर अब्बास से विभिन्न रेल और सड़क मार्गों से जुड़ी है और अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद इसका इस्तेमाल मध्य एशियाई देशों, रूस और अफगानिस्तान के साथ व्यापार के लिए होता रहा है। ये ज्यादातर व्यापार दुबई के जरिए होता है।

हाल ही में एक रूसी कंपनी ने बंदर अब्बास से माॅस्को और सेंट पिटसबर्ग के बीच रेल सेवा भी आरंभ की। कुछ दिन पूर्व भारत ने इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट और ट्रांसिट से जुड़े अश्गाबात समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, ईरान और ओमान शामिल हैं। ये मध्य एशिया के देशों को खाड़ी के बाजारों से जोड़ता है। इसमें भी ईरान की केंद्रीय भूमिका है। आपको याद दिला दें कि कुछ ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओमान गए थे जहां भारत और ओमान ने दुक्मा बंदरगाह को लेकर दूरगामी समझौते किए जो व्यापारिक संपर्क और सामरिक दृष्टि से बहुत सराहे गए।

जाहिर है ईरान, पश्चिम और मध्य एशिया और अफगानिस्तान को जोड़ने में जैसी भूमिका निभा सकता है, उसे भारत अच्छी तरह समझता है। ईरान के साथ तनाव बढ़ाने की जगह, उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका भी इसे समझेगा और अपने सहयोगी सुन्नी देशों को समझाएगा। अमेरिका-भारत-ईरान संबंध न सिर्फ चीन के बदनीयत विस्तार को रोकने में भूमिका निभा सकते हैं बल्कि पश्चिम एशिया में तनाव पर भी लगाम लगा सकते हैं। इनसे आतंकवादी देश पाकिस्तान पर नियंत्रण करने में भी मदद मिलेगी।

ये संबंध अफगानिस्तान में भी नई इबारत लिख सकते हैं जो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है। अमेरिका ने अपनी नई दक्षिण एशिया नीति में अफगानिस्तान में भारत को विशेष भूमिका दी है। जाहिर है इसका एक आयाम वहां आर्थिक विकास के लिए आंतरिका ढांचा तैयार करना और अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण देना है, वहीं इसका दूसरा आयाम अफगानिस्तान की पाकिस्तानी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना भी है। भारत ने इसमें बड़ी सफलता भी पाई है। पाकिस्तान के रास्ते होने वाले अफगानी व्यापार में पिछले एक वर्ष में 80 फीसदी गिरावट आई है। चाबहार-जाहेदान रेलमार्ग बनने के बाद तो ये लगभग समाप्त ही हो जाएगी। इसका साफ असर कराची में देखा जा सकता है, जहां अनेक बड़ी मिलें ठप्प हो गई हैं। हालत ये है कि आज कराची के व्यापार संगठन सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो अपनी नीतियां बदले, नही ंतो उनके भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

पाकिस्तान को अपनी ‘रणनीतिक स्थिति’ पर बड़ा नाज था। उसे लगता था कि वो दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है, लेकिन ईरान ने उसके सारे सपने तोड़ दिए। रही-सही कसर चाबहार ने पूरी कर दी जिसने भारत के लिए अफगानिस्तान तक ही नहीं, समूचे मध्य एशिया तक नए रास्ते खोल दिए। ध्यान रहे भारत लंबे अर्से तक पाकिस्तान की चिरौरी करता रहा कि वो अफगानिस्तान तक उसे सड़क मार्ग की सुविधा दे। भारत ने यहां तक कहा कि वो इसके लिए भी तैयार है कि भारतीय सीमा से अफगानिस्तान तक भारतीय माल पाकिस्तानी ट्रकों में जाए, लेकिन पाकिस्तान तैयार नहीं हुआ।

चीन अपने दक्षिण इलाके शिनजियांग से पाकी बलूचिस्तान में ग्वादर तक ‘चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर’ का निर्माण कर रहा है। इसके लिए ग्वादर में अरब सागर के तट पर विशाल बंदरगाह भी बनाया जा रहा है। चीन चाहता है कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देश भी ग्वादर से जुड़ें लेकिन पाकिस्तानी हठधर्मिता और आतंकवाद के कारण ग्वादार बंदरगाह के औचित्य पर ही सवालिया निशान लग गया हैै।

भारत ने सदा बहुत ईमानदारी और संजीदगी से ईरान का साथ दिया है। ये सही है कि वर्ष 2009 में भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरूद्ध इंटरनेशनल एटाॅमिक एनर्जी एजेंसी के एक प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन ये भी सच है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारत ने कभी उससे संबंध नहीं तोड़े। लेकिन 2015 के समझौते के बाद उसने भारत को हलके में लेना शुरू कर दिया। अब ट्रंप की नई नीतियों, धमकियों और सुन्नी देशों की चुनातियों के मद्दे नजर ईरान को भारत के साथ संबंधों के स्थायित्व का महत्व समझ में आ रहा है। आज ईरान भारतीय मुद्रा में व्यापार करने की संभावनाएं तलाशने और ऊर्जा क्षेत्र में नए समझौतों के लिए भी तैयार हो गया है। इसमें खटाई में पड़़ी फरजाद बी गैस फील्ड भी शामिल है जिसकी खोज एक भारतीय समूह ने की थी जिसमें ओएनजीसी विदेश और इंडियन आॅयल काॅरपोरेशन शामिल थे।

पिछले वर्ष जून में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्ला खमनेई ने ईद-उल-फितर पर अपने संबोधन में यमन, बहरीन के साथ कश्मीर का सवाल भी उठाया जिसका भारत ने भरपूर विरोध किया। ईरान के बलूच और सिस्तान इलाकों में पाकिस्तान-सउदी अरब समर्थित सुन्नी आतंकी गुट जैश-उल-अद्ल (न्याय की सेना) के ईरानी सेना पर लगातार हमलों के बाद उसने न सिर्फ पाकिस्तानी सेना को खुलेआम धमकी दी है, बल्कि कश्मीर का मुद्दा भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। स्पष्ट है अब भारत की तरह ईरान को भी लगने लगा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जरूरी है कि उसकी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर दोतरफा दबाव बनाया जाए।

रोहानी की यात्रा के दौरान भारत और ईरान ने नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से का परिचालन 18 महीने के लिए भारत को सौंपने, दोहरे कराधान-वित्तीय चोरी रोकने, राजनयिक पासपोर्ट धारकों को वीजा अनिवार्यता से छूट देने, व्यापार बेहतरी के लिए विशेषज्ञ समूह बनाने आदि से जुड़े समझौते शामिल हैं। ईरान और भारत आपसी व्यापार अपनी-अपनी करंसी में करने पर विचार करने के लिए भी सहमत हो गए हैं। जाहिर है ये समझौते दोनों के संबंधों में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं बशर्ते दोनों एक दूसरे के हितों और सीमाओं को ईमानदारी से समझें, आपसी संबंधों में यदा-कदा पेश होने वाली नाखुशगवार घटनाओं को प्रतिष्ठा का सवाल बनाए बिना और उनसे विचलित हुए बिना दूरगामी लक्ष्य पर निगाह रखें।

अंत में एक महत्वपूर्ण बात। दुश्मनी से दुश्मनी बढ़ती है। ईरान को अगर अपने हालात बेहतर करने हैं और दुनिया को साथ लेना है तो उसे पहले से कहीं अधिक संयम बरतना होगा।