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“पाकिस्तान पर कार्रवाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे अमेरिका, सभी पाकिस्तानियों को वापस भेजे” in Punjab Kesari

पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिकी राष्टंपति डोनाल्ड टंप द्वारा दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के बाद समय का पहिया तेजी से घूमा। शुरू में तो पाकिस्तानी विश्लेषक टंप को सिरफिरा और बिगड़ैल बता कर उसकी नई नीति का मजाक उडा़ते रह।े हाल ही में अमेिरका से लाटै े पाक सने टे की सरु क्षा समिति के प्रमुख मुशाहिद हुसैन स ̧यद ने तो ये तक कहा कि जब कोई अमेरिका में ही टंप को गंभीरता से नहीं लेता, तो पाकिस्तान को भी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। लेकिन अमेरिका द्वारा पहले 255 मिलियन डाॅलर आरै फिर कलु 1.1 बिलियन डाॅलर की सरु क्षा सहायता बदं करने के एलान के बाद पाकिस्तान को अहसास हो गया कि मामला बेहद गंभीर हो चुका है। अभी तो सुरक्षा सहायता बंद हुई है, अगर ऐसे ही चलता रहा तो संभव है मानवीय और विकास की मद में दी जा रही सहायता राशी भी रोक दी जाए।
अमेरिकी संसद मंे बलूचिस्तान को लेकर पहले ही कुछ बिल लंबित हैं, अब रिपब्लिकन सेनेटर रंैड पाॅल ने कहा है कि वो पाकिस्तान को हर तरह की सहायता बंद करने के संबंध में जल्दी ही विधेयक लाएंगे। राष्टंपति टंप ने इसे ‘गुड आइडिया’ कह कर इसका स्वागत भी किया है। इस बीच वाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के सामने सभी विकल्प खुले हैं। लेकिन बड़ा सवाल अब ये है कि क्या टंप प्रशासन ‘आॅक्टोपस’ 1⁄4सेना और हथियार उद्योग की लाॅबी1⁄2 के भीतराघातों को निरस्त कर पाएंगे जिसका पाकिस्तानी सेना और संभ्रांत वर्ग से गहरा और पुराना रिश्ता ह?ै
इस रिश्ते की एक बानगी हैं पाकिस्तानी विेदश मंत्री ख्वाजा आसिफ जिन्होंने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ है। इन्होंने अमेरिका को ‘यार मार’ तक बता दिया है। ये अमेरिका को सरेआम ललकार रहे हैं और उसकी ईंट से ईंट बजाने की धमकी तक दे रहे हैं। लेकिन विश्लेषक उनकी धमकियों पर ही सवाल उठा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके बच्चों का उसी अमेरिका में बसे होना जिसकी वो ईंट से ईंट बजाना चाहते हैं। ख्वाजा आसिफ की तीन लड़कियां और एक लड़का है। उनकी सबसे बड़ी बेटी अतिका सफदर ख्वाजा स्वतंत्र लेखक हैं और न्यूयाॅर्क में रहती हैं। उनकी दूसरी लड़की अमीरा सफदर ख्वाजा ने विदेश से पत्रकारिता की पढ़ाई की है जबकि उनकी सबसे छोटी बेटी फातिमा की शादी हाल ही मंे अमेि रकी पाकिस्तानी व्यापारी सल्ु तान खान के बटे  समीर से र्हइु हैं। फातिमा की शादी हालांकि लाहौर में हुई, लेकिन सगाई अमेरिका में ही हुई थी। उनका लड़का ख्वाजा मुहम्मद असद भी अमेरिका में बसा हुआ है।
जाहिर है पाकिस्तानी नते ा आरै जनरल इस्लाम आरै दश्े ाभक्ति के नाम पर आम नागरिक के साथ दोगला खेल खेलते हैं। एक तरफ तो वो लोगांे को उकसाते हैं कि वो अपने देश की खातिर सूली पर चढ़ने के लिए तैयार रहें, वहीं दूसरी ओर उनके खुद के बच्चे विदेशों में पढ़ाई करते हैं और वहां नौकरियां और व्यापार करते हैं। वो पाकिस्तान मंे खुला भ्रष्टाचार करते हैं और अपनी काली कमाई का विदेशों में निवेश करते हैं। अगर पाकिस्तान युद्ध मंे तबाह होता है तो फर्क आम पाकिस्तानी को ही पड़ेगा, ये तो विदेश भाग जाएंगे। इसलिए अगर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई करनी है तो तीन काम पहले करने होंगे – 1. अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तान की सेना और नेताआंे के साथ उसके रिश्तांे की रीढ़ तोड़नी होगी, 2. अमेरिका और उसके सहयोगी नैटो देशों में बसे जनरलों और नेताओं के बच्चों और अन्य रिश्तेदारांे को वापस भेजना होगा और 3. विदेशों में निवेशित इनकी काली कमाई को जब्त करना होगा। वाइट हाउस के अधिकारी पाकिस्तान के खिलाफ हर विकल्प ‘खुला’ होने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अगर पाकिस्तानी सेना और उसके मोहरे नेताआंे को घुटने पर लाना है, तो सबसे पहले इन विकल्पांे पर विचार करना
चाहिए।
अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तानी सेना और राजनीति के संबंध कितने गहरे हैं उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के लगभग हर बड़े जनरल और नेता के बच्चे/रिश्तेदार अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशांे में बसे हैं। जनता को देशभक्ति के नाम पर बेवकूफ बनाने वालांे में सबसे ऊपर नाम है पूर्व राष्टंपति और तानाशाह जनरल परवजे मश्ु ारर्फ का जो भारत विराध्े ाी आरै आतकं वाद समर्थक बयानों के लिए हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। ये खुद को देश का सबसे बड़ा देशभक्त मानते हैं और हाल ही में इन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि सरकार को विदेशों में बसे देश के दुश्मनों को मरवा देना चाहिए। इनपर बेनजीर भुट्टो के कत्ल का आरोप भी है। इनकी मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण हजारों पाकिस्तानियों ने जान गंवाई, लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि ये पाकी जनरल अरबपति भी है। जुलाई 2016 में पाकिस्तानी गृह मंत्रालय ने एक अदालती मामले के सिलसिले में बताया कि मुशरर्फ के पास देश में आठ संपत्तियां और नौ बंैक खाते हैं जिनकी कीमत अरबांे में हैं। ये तो सिर्फ पाकिस्तानी संपत्तियां हैं, इसके अलावा इनके पास इंग्लंैड, अमेरिका, दुबई, रियाद आदि मंे भी अनेक संपत्तियां हैं। इनकी पत्नी और बच्चों के पास भी बेशुमार दौलत है। इन्होंने देशभक्ति भले ही जसै ी भी की हो पर दश्े ा को भी भरपरू लटू ा। ध्यान रहे इनका बटे ा बिलाल मश्ु ारर्फ अमेि रकी नागरिक है। इनका बड़ा भाई डाॅक्टर जावेद मुशरर्फ अर्थशास्त्री है जो रोम में बसा है। इनका छोटा भाई नावेद मुशरर्फ एनिस्थोलाॅजिस्ट है जो अमेरिका में बसा है।
पाकिस्तान में सेना के जनरलों के पास लंबी चैड़ी जमीनें होना कोई अपवाद नहीं है। असल में वहां सेना के जनरलों को सेवानिवृत्ति पर 10 एकड़ जमीन दी जाती है और सेना प्रमुख को इसके अलावा 40 एकड़ अतिरिक्त जमीन मिलती है। वर्तमान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से पहले सेना प्रमुख रहे राहिल शरीफ को को भी 50 एकड़ जमीन दी गई जिसपर काफी विवाद भी हुआ। ये मामला तब शांत हुआ जब सेना ने इस विषय में अपने नीति-नियमों का सार्वजनिक तौर पर खुलासा किया।
लेकिन पाकिस्तान में सिर्फ जनरलों के पास ही लंबी-चैड़ी जायदादें नहीं हैं। वहां के राजनेता भी अपनी दौलत और विलासिता पूर्ण जीवन के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उनकी अनेक स्टील, चीनी और पेपर मिलंे हैं। उनके बेटे हसन और हुसैन इंग्लंैड में बसे हैं और वहीं से पारिवारिक व्यापार संभालते हैं। पनामा लिस्ट में नाम आने के बाद, पिछले वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अब वो और उनके परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार, हवाला, अघोषित संपत्तियों आदि के कई मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। नवाज शरीफ के समधि इसहाक डार दश्े ा के वित्त मत्रं ी हैं आरै उनपर भी भष््र टाचार के अनेक आरोप हैं। इसहाक डार के बड़े लड़के की शादी नवाज शरीफ की बड़ी बेटी अस्मा नवाज से वर्ष 2004 में जद्दे ाह, सउदी अरब में हइु र्। कहा जाता है कि मकु दमांे से बचने के लिए इसहाक डार आजकल लंदन के एक अस्पताल में भर्ती हैं और वहीं से वित्त मंत्रालय चला रहे हैं।
भष््र टाचार पर सिर्फ पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ही एकाधिकार नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल पाकिस्तान पीपल्स पार्टी भी कुछ कम नहीं है। बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद इसके प्रमुख बने उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट कहा जाता था। यानी वो हर सरकारी ठेके में दस प्रतिशत कमीशन लेते थ।े पाकिस्तानी के जानमे ाने जमीदं ार जरदारी की इग्ं लडंै , अमेि रका मंे ही नहीं खाड़ी के देशों में भी अकूत संपत्ति हैं।
जाहिर है अमेि रका को पाकिस्तान के खिलाफ र्काइे भी बडा़ कदम उठाने से पहले ये सुि नश्चत कर लेना चाहिए कि उसका उसका निशान कौन बनेगा और उसका अपेक्षित परिणाम मिलेगा कि नहीं। अगर अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवादियांे की तलाश में अंधे डंोन हमले करता है तो इससे आम पाकिस्तानी को जान-माल की भारी तबाही हागे ी, लेि कन असली दाष्े ाी यानी पाकिस्तानी जनरल आरै उनके इशारे पर सरकार चलाने वाले अमीर नेता फिर भी बचे रहेंगे। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को राह पर लाना है तो इन दोनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। वैसे भी आतंकवादी तो सिर्फ सेना के माहे रे हैं, उन्हें समाप्त करके कछु हासिल नहीं हागे ा। कछु दिन बाद सैि नक जनरल कछु आरै माहे रे खड़े कर देंगे।
अमेरिका को अगर अफगानिस्तान में सफलता हासिल करनी है तो पाकिस्तानी सेना की अफगान नीति को बदलवाना हागे। लेि कन पाकी सने  अपनी नीति बदलने की जगह अमेरिका से दो सौदे करना चाहती है – 1. अमेरिका अफगानिस्तान में भारत को बढ़ावा देना बंद करे और वहां उसके ‘स्टंेटेजिक इंटंेस्ट्स’ को मान्यता दे और 2. उसे भारत में खुला खेल खेलने का खुला मौका दे। अगर अमेरिका, पाकिस्तानी सेना की ये बातंे मानता है तो ठीक है, वरना पाकिस्तान न तो अफगानिस्तान में अपने आतंकियांे पर लगाम लगाएगा और न ही उसे अफगानिस्तान तक सैनिक सहायता पहंुचाने के लिए रास्ता देगा। पाकिस्तान ने अब अमेरिका को ये धमकी देना भी शुरू कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके साथ ऐसे ही सख्ती करता रहा तो वो चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर का न सिर्फ चीनी सहायता से सैन्यीकरण कर देगा, बल्कि ग्वादर पोर्ट पर भी चीन का सैनिक अड्डा बनवा देगा।
स्पष्ट है पाकिस्तानी उन्हीं आतंकवादियों को सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अमेरिका खत्म करना चाहता हैं। ये एक आरे तो अमेि रका में अपने बच्चांे को पढा़ ना आरै बसाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उसी पर आंख तरेर रहे हैं। ऐसे में अब अमेरिका को चाहिए कि वो पाकिस्तान की सफाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे और अपने यहां बसे हर पाकिस्तानी को वापस भजे  आरै अपने नटै  सहयाेि गयांे पर भी इसके लिए दबाव डाल।े जब तक पाकी जनरलांे आरै सभ्ं ाा्र तं वर्ग के आर्थिक और व्यक्तिगत हितों पर चोट नहीं होगी, आतंकवाद के प्रति उनका रवैया नहीं बदलेगा।

“Triple Talaq Bill: Opposition’s double game will be counterproductive” in TOI Blog

Biddat in talaq-e-bidat (triple talaq) means innovation, but in real sense it is no innovation but pervert distortion which is not even supported by Quran. Muslim men in India have used this ‘innovation’ to ruin the lives of women and they want it to continue the same way. Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Bill was introduced in the parliament by the Modi government not to interfere in the religious matters of Muslim community but to empower women by removing this distorted practice and punishing the culprits for their criminal act.

The bill was introduced for the mothers and sisters of our Muslim community, to uphold their dignity, respect and right to equality. There is no space for compromise in the instant talaq as it doesn’t leave any scope for that. This mindless practice allows Muslim men to terminate the marriage in a jiffy, leaving aggrieved woman with her children helpless and shelter less. So the only objective of this bill was, is and will be to stop talaq-e- bidat forever and provide succour to aggrieved Muslim women.

When marriage is solemnized in the presence of all the family members and friends then why triple talaq is given in a one-sided, secluded manner? This bill will strengthen the status of women and prevent their social and economic harassment. The opposition parties played double game on this issue in the parliament. They allowed the bill to pass smoothly in the Lok Sabha but taking advantage of their majority, created hurdles in the Rajya Sabha. They raised frivolous objections on the viability of the bill and tried hard to make the government bite the dust. Their clear intention was to appease fundamentalists whom they use as vote bank but little did they realize that their gimmicks would ultimately back-stab Muslim women and deprive them of long awaited justice.

When this practice was declared unconstitutional by the Supreme Court in view of the constitutional guarantees and rights given to Muslim women as equal citizens of India, it is not hard to understand why opposition parties are playing dirty politics over this issue. Thanks to their blind support for Islamic fundamentalists, this pervert practice is still continuing unabated. Recently, two more cases of instant divorce took place in Uttar Pradesh. In one of the cases, the woman was deserted because of skin colour and in the other, she was thrown out because she demanded money for the treatment of her daughter. Such uncouth treatment with women is simply shameful and unacceptable. How can a civilized society allow such blatant injustice?

Uttar Pradesh has become the first State to authenticate the Central government’s draft bill that makes triple talaq a cognizable and non-bailable offence. Under the draft law, triple talaq given by uttering, in writing or by electronic means such as email, SMS and WhatsApp — would be wrong or illegal and unconstitutional. The draft law, which provides for three-year imprisonment and a fine to a man trying to divorce his wife by uttering “talaq” three times, got the State government’s approval at a Cabinet meeting.

Politically motivated Muslim fundamentalists are attacking the Modi government for interfering in their religious matters but the fact remains that the proposed bill is not against their religion but the inhuman malpractice of triple talaq which according to Supreme Court infringes upon the fundamental rights of Muslim women. Whereas the Supreme Court declares triple talaq illegal, the bill provides the framework for the delivery of justice. When triple talaq is declared illegal by the Supreme Court, those who perpetrate such practice must be punished adequately and must provide compensation for their misdeeds.

Despite road block in the Rajya Sabha, the Modi government has expressed its 100% commitment towards this bill. If they really want to enact this law, they still have many options. The government can reintroduce it in the budget session after due consultation with the opposition parties. If the opposition parties try to vitiate the soul of the bill, then government can convene a joint parliamentary session to get it passed. Hope good sense will prevail on opposition parties this time and they will help government enact this historic law that empowers Muslim women.

“सेनेट में शांति प्रस्ताव, सीमा पर खूनखराबा बेनकाब हो चुकी है जनरल बाजवा की भारत नीति” in Punjab Kesari

पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने सुरक्षा, पड़ोसी देशों से संबंधों, अपनी विदेश यात्राओं और बहुत से अन्य महत्वपूर्ण मसलों पर दिसंबर 19 को सेनेट के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत किया और सांसदों के सवालों के जवाब दिए। अपेक्षा की गई थी कि सांसद इस बैठक के बारे में मीडिया से चर्चा नहीं करेंगे, लेकिन कुछ लोगों ने फिर भी इस विषय में बातचीत की। इसके मुताबिक बाजवा ने सांसदों से कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। अगर सरकार, भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने की पहल करेगी तो वो उसे समर्थन देंगे।

पाकी सेना परंपरागत रूप से भारत को दुश्मन नंबर एक मानती रही है। हालांकि आठवें सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी (29 नवंबर 2007 से 29 नवंबर 2013) ये तक कह चुके हैं कि पाकिस्तान का असली दुश्मन भारत नहीं, बल्कि देश के भीतर पल रहे आतंकी संगठन हैं, फिर भी सेना का रवैया नहीं बदला है। ऐसे में बाजवा का यह बयान ऐतिहासिक माना जा रहा है। उनके इस बयान का एक अर्थ ये भी माना जा सकता है कि आज पाकिस्तान की भारत नीति दोराहे पर आ गई है। इसमें संभवतः पहले जैसी कट्टरता नहीं बची है और वो इसमें परिवर्तन के बारे में भी सोच सकता है। आपको ज्ञात ही होगा कि वहां भारत, अन्य पड़ोसी देशों तथा अमेरिका के बारे में विदेशनीति सेना ही तय करती है। विदेश मंत्रालय की औकात कुल मिलाकर स्टेनो से अधिक नहीं होती। संभवतः यही कारण है कि पदच्युत प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पूरे चार साल तक किसी विदेश मंत्री की नियुक्ति नहीं की और ये विभाग खुद ही संभालते रहे ताकि सेना और चुनी हुई कठपुतली सरकार में कोई गलतफहमी न पैदा हो।

पाकिस्तान में शाहिद खकान अब्बासी की लचर सरकार और गहरे आर्थिक संकट के मद्दे नजर वहां बार-बार कयास लगाए जा रहे थे कि सेना एक बार फिर कमान संभाल सकती है। बाजवा के सेनेट के सामने पेश होने और नीति निर्माण में संसद को खुद वरीयता देने के बाद समझा जा रहा है कि सेना फिलहाल किसी तख्तापलट का इरादा नहीं रखती। लेकिन यहां हम चर्चा सिर्फ भारत के संबंध में उनके बयान तक सीमित रखेंगे।

बाजवा के बयान पर भारत प्रतिक्रिया देता, इससे पहले पाकिस्तान में ही उसपर सवाल उठने लगे। सबसे पहला प्रश्नचिन्ह तो इसी बैठक में उनके जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) प्रमुख हाफिज सईद वाले बयान पर उठा। इसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान में सईद की महत्वपूर्ण भूमिका है और आम पाकिस्तानी की तरह उसे भी कश्मीर मुद्दा उठाने का हक है। मुंबई हमलों के आरोपी और अंतरराष्ट्रीय आतंकी सईद के बारे में उनके बयान को बिला शक उसकी आतंकी नीतियों का समर्थन समझा गया। आम राजनीतिक दलों ने इसे सईद की राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग के समर्थन के तौर पर लिया। ध्यान रहे वहां सेना, जमात को राजनीतिक पार्टी का रूप देकर मुख्यधारा में लाने और संवैधानिक वैधता दिलवाने की पूरी कोशिश कर रही है। सेना को इसमें दो खास फायदे दिखाई दे रहे हैं, एक – लगातार कमजोर हो रहे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज जैसे मुख्यधारा के दलांे के बीच सेना को अपना प्राॅक्सी राजनीतिक दल खड़ा करने का अवसर मिलेगा जो पूरी तरह उसके कब्जे में होगा और दो – जमात जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचाया जा सकेगा। सनद रहे कि पाक सरकार इसका विरोध कर रही है। दिसंबर 24 को सरकार ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर जमात की उस याचिका का औपचारिक रूप से विरोध भी किया जिसमें उसने मिल्ली मुस्लिम लीग को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने की मांग की है।

बाजवा ने भारत के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की बात तो कही पर कश्मीर पर उनका मत बिल्कुल भी नहीं बदला। अगर सेना पहले जैसे ही ‘कश्मीरियों’ (हुर्रियत के आतंकियों और अन्य कश्मीरी आतंकियों) को नैतिक और राजनयिक समर्थन (सीमापार से आंतकी समर्थन) देती रहेगी तो कश्मीर में शांति कैसे होगी? जाहिर है बाजवा संबंधों का सामान्यीकरण नही, सिर्फ दिखावा चाहते हैं। यह तमाशा अगर हुआ तो बहुत कुछ पहले जैसा ही होगा जिसमें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकने के लिए एक तरफ तो पाकिस्तान की चुनी हुई हुई सरकार (कठपुतली सरकार) भारत सरकार से बातचीत करती थी, तो दूसरी तरफ सेना अपना खेल खेलती रहती थी।

लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि आखिर बाजवा भारत के प्रति ये बयान देने के लिए क्यों मजबूर हुए। इसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी दबाव। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पाकिस्तानी सेना ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह उसके खिलाफ हर संभव कदम उठाएगा। इसमें पाकिस्तान में घुस कर आतंकी ठिकानों का सफाया, आर्थिक सहायता रोकना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी शामिल है। पाकी सेना एक तरफ तो सख्त बयानी के लिए अमेरिका से मुंहजोरी करती है तो दूसरी तरफ अंदरखाने में उसे मनाने की कोशिश भी करती है ताकि उसकी आर्थिक सहायता जारी रहे।

ध्यान रहे पाकिस्तान आजकल गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है और उसके पास तीन महीने के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा नहीं है। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बड़े गाजे-बाजे के साथ चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर की घोषणा की थी। अब साफ हो रहा है कि चीन ने इसके लिए सहायता नहीं बल्कि अरबों डाॅलर का उधार दिया है। इसे चुकाने में भी पाक सरकार की सांस फूल रही है। ऐसे में भारत से दुश्मनी की नीति और उसके नाम पर सेना पर हो रहे अरबों डाॅलर के खर्चे पर भी सवाल उठने लगे हैं। अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी सवाल उठाने लगे हैं कि क्या सेना पाक को चीन का उपनिवेश बनाना चाहती है? वो साफ-साफ कहने लगे हैं कि चीनी उपनिवेश बनने से अच्छा है, भारत से दोस्ती की जाए और उसके साथ व्यापार किया जाए…कश्मीर के चक्कर में पाकिस्तान को कंगाल नहीं किया जाए। लोग अब ये भी पूछ रहे हैं कि सेना विदेश नीति पर क्यों कब्जा जमाए बैठी है? क्यों पाकिस्तान के संबंध सिर्फ भारत से ही नहीं, ईरान और अफगानिस्तान से भी खराब हो रहे हैं?

भारत तो सीधे पाकिस्तानी सेना प्रमुख से बात नहीं करता। लेकिन यहां ये याद दिलाना उचित होगा कि भारत के बारे में टिप्पणी करने से पहले, बाजवा अक्तूबर में अफगानिस्तान और नवंबर में ईरान के दौरे पर भी गए। वहां उन्होंने क्रमशः राष्ट्रपति अशरफ घनी और राष्ट्रपति हसन रोहानी से भी बात की। दोनों देशों के साथ बेहद खराब संबंधों के बीच हुई इन यात्राओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन इन उच्च स्तरीय दौरों के बावजूद दोनों देशों से संबंध रत्ती भर भी नहीं सुधरे। 22 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में अफगान राजदूत महमूद सैकल ने एक बार फिर अपने देश में अस्थिरता के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। उधर 22 दिसंबर को ही अफगानिस्तान के औचक दौरे पर आए अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने बिना लगालपेट के कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा रहा है, लेकिन अब दिन लद गए हैं, ट्रंप प्रशासन ने सैनिकों को आतंकियों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का अधिकार दे दिया है।

स्पष्ट है बाजवा की दोगली विदेश नीति – बातचीत में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा पर जमीनी स्तर पर उन्हें बढ़ावा – पूरी तरह बेनकाब हो गई है। अब सवाल ये है कि भारत को क्या करना चाहिए? भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए इस्लामाबाद को उसकी धरती से सक्रिय आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी दो टूक शब्दों में कह दिया है कि जब तक पाकिस्तान कश्मीर में आतंक फैलाता रहेगा, उसके साथ संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

जहिर है भारत, बाजवा की कूटनीतिक चालों में फंसने और उन्हें शांति के मसीहा का प्रमाणपत्र देने के लिए तैयार नहीं है। वैसे भी उन्होंने अभी सिर्फ यही कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। इस शांतिवार्ता से उनका क्या तात्पर्य है, शांति के लिए वो किस हद तक अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार हैं? ये अभी स्पष्ट नहीं है। 23 दिसंबर को जैसे पाकिस्तानी गोलीबारी में भारतीय सेना के एक मेजर और तीन जवान शहीद हुए, उससे साफ है कि जमीनी स्तर पर पाकी सेना के खूनी इरादों में कोई कमी नहीं आई है।

एक बार को अगर भारत, पाकिस्तान के साथ शांतिवार्ता के लिए तैयार हो भी जाए, तो सवाल ये उठता है कि भारत को खक्कान अब्बासी सरकार से बातचीत करके क्या हासिल होगा जबकि वो खुद चंद महीनांे की मेहमान है (वहां जुलाई 2018 में आम चुनाव होने हैं)। हालांकि ये संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अगर भारत पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए सीधे पाकी सेना से बात करता है, तब भी क्या गारंटी है कि उसका कोई नतीजा निकलेगा? एक बार को मान लें कि बाजवा शांति के लिए समझौता करते हैं, तो क्या गारंटी है कि आने वाले जनरल उसका पालन करेंगे? सिर्फ बाजवा ही नहीं, पाकिस्तान के अधिकांश जनरल देश की भारत नीति पर वर्चस्व तो चाहते हैं पर उसे आम अवाम की भलाई के लिए नहीं, अपने फायदे के लिए चलाना चाहते हैं। जिस दिन पाकी जनरल जनता के नजरिए से सोचना शुरू कर देंगे, पाकिस्तान के रिश्ते, भारत ही नहीं, अफगानिस्तान और ईरान के साथ भी सामान्य हो जाएंगे।

“From moon to the world, it’s all about Indian women” in TOI Blog

It is always said to each and every Indian women out there that you are born to fight. Fight with rituals, myths, society, men domination and what not. Indian women have almost fought a war to be what they are now. Whether it is the great Matreiye or Kalpana Chawla or the world’s most beautiful lady- Manushi Chillar, every one has contributed a lot to make this nation proud and independent. Indian history is flooded with all these great women who had shown a remarkable face of themselves when the society needed them the most. One should not get surprised after knowing the fact the it was not the Indian men like Chanakya and Ashoka who dreamt of ‘Akhand Bharat’ but she was the mother of Puru, Anusuya who had been killed for dreaming so.

When it comes to sacrifice, those were Indian women who put their step forward before anyone to protect their family, to protect their nation. Rani Padmavati is in lot of debates nowadays and we Indians must not forget that she was the one who with other 16,000 women did ‘Johar’ after struggling against Alaudin khilji. Not only this, there were many powerful women like Rani Lakshmi Bai, Bhagwati Devi, Aasha Devi, Uda Devi and Begum Hazart Mahal who played an incredible role in 1857 Indian Revolution against Britishers. They made Britishers hollow from inside and this revolt encouraged various other women to jump in the Indian Freedom Movement. Women like Sarojini Naidu, Hansa Mehta, Durgabai, Renuka Ray and Malti Chowdhry had become sensations for Indian people who later on became the framers of Indian Constitution. Even when Netaji Subhash Chandra Bose build Indian national army, he made a special branch for women which was headed by Lakshmi Sehgal.

From then, our Indian government noticed the true power and capabilities of women of our country and allowed them to be there not only in Indian Military but also in Airforce and Navy so that they can fight with the enemies of our nation. But these ladies are just not strong, they are supreme in every other category and this was purely proved by the most beautiful ladies of this world and that too Indian whether we name Rita Fariya, Sushmita Sen, Aishwarya Rai, Diana Hayden, Yukta Mukhi, Priyanka Chopra or the most recent Manushi Chillar who has made India proud in front of the whole world. And its all about the culture and values of Indian women which are further been given to their daughters and Manushi Chillar gave a great example of this thing by beautifully describing her mother’s contribution in her life.

India was known as the underdeveloped land of snake charmers and acrobats, but these daughters has totally changed the image of our country. Its not just about beauty but also brain whether knowledge, logics or scriptures are concerned. And in all these things, government is also providing a back hand to develop women in every way possible. There is greater thrust on women’s issues by Modi’s government. One of most recent step taken by this government by passing a bill to abolish this ‘triple talak’ practice which would help the Muslim women to be stronger. He is building on a variety of women-focused initiatives like campaigns to educate girls, increased maternity leave, the provision of safer cooking fuels for rural families and also a bill seeking one-third representation for women in Parliament and State Assemblies seeing that women are no less than men in politics and can run a nation as well.

This journey of Indian women so far is much respectable and appreciable. They are now much capable of raising voice for their rights. It can easily be seen that women place themselves in a much stronger place nowadays as on one hand we have India’s first woman defence minister Nirmala Sitharaman while on other the lioness Sushma Swaraj whose voice is enough to calm other men down. These ladies are not less than anyone. Now no moon is farther for any new budding Kalpana Chalwla and the world seems less for ladies like Manushi Chillar.

India is a country of goddesses where women are treated above all, where they are worshipped, where disrespecting them is always an offence. Now they are awaken and much more powerful than ever, powerful enough that they don’t rely on others. They very well know how to fight with social disparities to maintain their family and how to fight with enemies to run a nation because Indian women are born fighters.

“सावधान! आकार लेना शुरू कर दिया है चीनी घेराबंदी ने” in Punjab Kesari

राजनयिकों के आरामदेह कक्षों और थिंक टैंकों के वातानुकूलित सेमीनारों से बाहर निकल, चीन की रणनीतिक घेराबंदी धीरे-धीरे जमीन पर आकार लेने लगी है। जिसकी आशंका थी, चीन जो चाहता था, वो हो रहा है। चीन की वजह से भारत के पड़ोसी देशों में जो परिवर्तन हो रहे हैं और घटनाक्रम जैसे करवट बदल रहा है, उसमें आवश्यक है कि हम कुछ देर रूक कर, सोच विचार कर, चीन और इन देशों के प्रति अपनी नीतियां बदलें या संशोधित करें।

सबसे पहले बात चीन की ही करते हैं। 11 दिसंबर को दिल्ली में हुई त्रिपक्षीय गठबंधन रिक (रशिया, इंडिया, चाइना) की बैठक के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने विदेश मंत्री वांग यी और सुषमा स्वराज की बातचीत के बारे में अपनी तरफ से विवरण दिया। इसके मुताबिक वांग ने सुषमा से कहा कि डोकलाम में “चीनी सीमा” में भारतीय सैनिकों के ”अवैध रूप“ से प्रवेश के बाद पैदा हुए विवाद से दोनों देशों के रिश्तों पर काफी दबाव पड़ा। हालांकि विवाद को राजनयिक जरिए से हल कर लिया गया लेकिन इससे सबक सीखना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। वांग ने कहा कि भारत-चीन संबंध महत्वपूर्ण काल में हैं और दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है आपसी विश्वास बढ़ाना।

वांग ने आगे कहा कि दोनों देशों ने ये विचार साझा किया कि चीन और भारत को एक दूसरे के विकास को अवसर के रूप में देखना चाहिए न कि चुनौती के रूप में और दोनों देश प्रतिद्वंद्वि कम और साझेदार अधिक हैं। इसलिए दोनों पक्षों को दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई सहमति को क्रियान्वित करना चाहिए।

ध्यान रहे वांग के भारत आने से पहले चीन ने डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। यह पहली बार है जब सर्दियों में भी डोकलाम में चीनी सैनिक मौजूद हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय के बयान के कुछ निहितार्थ हैं जिन्हें समझना आवश्यक है। एक – चीन ने साझा घोषणापत्र से अलग वांग और सुषमा की बातचीत को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह डोकलाम पर पर भारत के रूख से न केवल असहमत है, बल्कि नाराज भी है और इस नाराजगी को वह भारत की जनता को भी बताना चाहता है। दो – चीन ने अपनी तरफ से एक तरह से भारत को चेतावनी दी है। तीन – चीन के मुताबिक दोनों देशों के बीच पर्याप्त विश्वास नहीं है। चार – चीन चाहता है कि भारत, दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों में उसकी महत्वकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड की परियोजनाओं और विकास के नाम पर हो रही घेराबंदी को चुपचाप स्वीकार करे।

यहां तीन बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए, एक – रिक बैठक से पहले चीनी राजदूत ने कहा था कि भारत को वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए और अगर भारत चाहेगा तो चीन पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाली चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना का नाम बदल देगा। चीन ने इसे आर्थिक विकास की परियोजना बताते हुए कहा कि इसका भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे सीमा विवाद से कोई लेना देना नहीं है। तीन – रिक की बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री सरगेई लेवरोव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत को इस योजना में शामिल होना चाहिए और डरना नहीं चाहिए क्यांेकि किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए भारत के पास अच्छी प्रोफेशनल टीम है।

सुषमा और वांग की वार्ता के चीनी विदेश मंत्रालय के खुलासे और बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री द्वारा वन बेल्ट, वन रोड का मुद्दा उठाना ये दिखाता है कि रिक बैठक में इस विषय में बातचीत हुई, रूस ने इसमें चीन का साथ दिया, लेकिन भारत तैयार नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुछ दिन बाद ये अवश्य स्पष्ट किया कि अगर कोई सुझाव है और उसमें भारत की संवेदनशीलताओं और चिंताओं का ध्यान रखा जाता है, तो भारत उस पर अवश्य विचार करेगा।

जाहिर है चीन और भारत के संबंध, रूस और चीन के संबंधों से अलग हैं और भारत चीन की इस परियोजना को उसके रणनीतिक विस्तार के औजार के रूप में देखता है। चीन समूचे एशिया पर अपना वर्चस्व चाहता है जिसे भारत स्वीकार नहीं करता। भारत और पाकिस्तान में कोई समानता न होने के बावजूद, चीन अपने हित साधने और भारत को नीचा दिखाने के लिए हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों की बराबरी का दावा करता है। ये भी भारत को पसंद नहीं है।

ये संयोग नहीं कि वांग का बयान आने के चंद घंटों के भीतर ही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंग्रेजी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में एक लेख छपा जिसका शीर्षक था – ”भारत क्षेत्रीय विकास से अधिक भूराजनीतिक समीकरणों को महत्व देता है“। इसमें कहा गया – ”श्रीलंका ने पिछले सप्ताह हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्षीय लीज पर देने की औपचारिकता समाप्त की। श्रीलंका सरकार ने इसका स्वागत किया, लेकिन भारत में इससे खतरे की घंटी बजने लगी। कोलंबो ने बार-बार भारत को भरोसा दिलाया कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल शुद्ध रूप से नागरिक उद्देश्य के लिए होगा, ये बंदरगाह चीन को हिंद महासागर में समुद्री रास्ते उपलब्ध करवाएगा, लेकिन भारतीय मीडिया बता रहा है कि इस अधिग्रहण के जरिए चीन इस क्षेत्र में अधिकाधिक रणनीतिक और आर्थिक वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि चीन के वन बेल्ट, वन रोड से घिरने से डरा भारत हंबनटोटा में हवाईअड्डा बनाने पर विचार कर रहा है। नई दिल्ली की पुरानी रणनीतिक सोच इस क्षेत्र के अन्य देशों और चीन के बीच बढ़ रहे सहयोग को कम नहीं कर सकती। मालदीव ने हाल ही में चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थायित्व के बावजूद चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पर ईमानदारी से काम हो रहा है। इस क्षेत्र में चीन और अन्य देश विकास के लिए संयुक्त प्रयास कर रहे है। नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और अन्य देशों में चीनी निवेश ने अर्थव्यवस्था में सुधार किया है और लोगों को रोजगार दिया है।”

लेख में आगे कहा गया है कि ”श्रीलंका की अंदरूनी राजनीति मंे घुसने और नई दिल्ली को घेरने का चीन का कोई इरादा नहीं है। ये नई दिल्ली की संकीर्ण सोच होगी अगर वह चीन की सहयोगात्मक गतिविधियों को उसे घेरने और दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने की शोषणकारी रणनीतियों के तौर पर देखेगी। अगर भारत उनकी विकास की जरूरतंें पूरी कर सके तो श्रीलंका, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय देश भारत के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए तैयार हैं।“

भारत पर संकीर्ण सोच का आरोप लगाने वाला यह लेख बहुत ही चतुराई से अनेक तथ्यों को छुपा जाता है। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग मानता है। इससे निकलने वाले सीपेक को भारत कैसे मान्यता दे सकता है? क्या चीन ने वहां निर्माण कार्य आरंभ करने से पहले भारत की अनुमति ली थी या भारत को किसी भी तरह विश्वास में लिया था? अगर चीन भारत के साथ सहयोग का इतना ही इच्छुक है तो वो मसूद अजहर और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप जैसे मसलों पर भारत का साथ क्यांे नहीं देता? चीन पाकिस्तान को पूरी तरह त्याग कर भारत के साथ क्यों नहीं आता? सारी दुनिया ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग देखना आरंभ कर दिया है, लेकिन चीन क्यों अब भी शीतयुद्ध की तरह भारत और पाकिस्तान की तुलना करना चाहता है? वो क्यों भारत को पाकी चश्मे से देखना चाहता है?

जहां तक सीपेक का सवाल है, उसके बारे में खबर ये है कि चीन ने पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते उसकी अनेक परियोजनाओं को रोक दिया है। खबरें ये आ रही हैं कि चीन अब ये परियोजनाएं पाकी सेना की सरपरस्ती में पूरा करना चाहता है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानती है।

ग्लोबल टाइम्स का लेख कहता है कि हंबनटोटा के चीनी अधिग्रहण का श्रीलंका ने स्वागत किया। लेकिन हकीकत यह है कि उसने चीन से ऊंची दरांे पर ऋण लिया था। जब वो उसे वापस नहीं कर सका तो चीन ने उसे मजबूर किया कि वो उसे अपना प्रमुख बंदरगाह हंबनटोटा 99 साल की लीज पर दे। अगर चीन का मकसद सिर्फ व्यापार था तो उसे हंबनटोटा को 99 साल की लीज पर लेने की क्या जरूरत थी? क्या चीन भारत ही नहीं विश्व को भी यह लिखित में देने के लिए तैयार है कि वो श्रीलंका में हंबनटोटा और सीपेक के तहत पाकिस्तान में बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट को नौसैनिक अड्डों के रूप में कभी इस्तेमाल नहीं करेगा? वैसे भी साउथ चाइना सी प्रकरण के बाद दुनिया का चीन से भरोसा उठ गया है। चीन ने वहां न केवल अनधिकृत और अवैध नौसैनिक अड्डे बनाए, बल्कि इस विषय में अंतरराष्ट्रीय अदालत के निर्णय को भी कूड़े की टोकरी में फेंक दिया क्योंकि वो उसके पक्ष में नहीं था।

एक महत्वपूर्ण मसला नेपाल का भी है। वहां हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल ने एक अन्य दल सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के साथ बहुमत हासिल किया है। कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल के नेता और जल्द ही नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले के पी शर्मा ओली चीन के बेहद करीब समझे जाते हैं। पिछली बार जब वो प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने चीन के साथ अनेक ऐसे समझौते किए जिन पर भारत को सख्त आपत्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल में विशेष दिलचस्पी दिखाई है। 1997 से 2014 तके कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री वहां नहीं गया। मोदी नेपाल के दो दौरे कर चुके हैं जबकि सुषमा स्वराज वहां पांच बार जा चुकी हैं। मोदी सरकार ने नेपाल में 900 मेगावाट की बिजली परियोजना के लिए समझौता किया, उसे 1.3 अरब डाॅलर का ऋण दिया। जब नेपाल में भयंकर भूकंप आया तो भारत ने अधिकतम सहायता की। लेकिन चीन के प्रेम में अंधे ओली पर मोदी सरकार के सकारात्मक कदमों का कितना असर पड़ेगा ये देखना दिलचस्प होगा।

एक तरफ भारत को चीन की कूटनीतिक धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ नेपाल में चीन समर्थक ओली का सत्ता संभालना, पाकिस्तान में सेना के साथ चीन का गठबंधन, श्रीलंका में बंदरगाह पर कब्जा, मालदीव के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, म्यांमार और बांग्लादेश में सड़क और समुद्री परियोजनाएं, चीन भले ही भारत को कितना भी संकीर्ण कहे, लेकिन भारत उसकी छुपी मंशा को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

ऐसे में भारत के सामने क्या विकल्प हैं? इसके लिए ठंडे दिमाग से लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी। चीन के पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है जिसके जरिए वो देशों को खरीद रहा है और भारत को चुनौती दे रहा है कि तुम्हारी हिम्मत हो तो तुम भी खरीद लो। जाहिर है भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार, चीन से मुकाबला नहीं कर सकता, वैसे भी भारत लोकतांत्रिक देश है, यहां कम्युनिस्टों जैसे तानाशाही से काम नहीं लिया जा सकता। भारत सरकार भले ही चीनी सरकार की तरह तानाशाही से न काम कर सके, लेकिन उसे भी फैसले लेने की रफ्तार और क्षमता तो बढ़ानी ही होगी।

चीनी धमकियों और रणनीतिक घेराबंदी के मद्दे नजर भारत को सीमा पर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। भारत को संबंधित देशों को बिना लाग लपेट अपनी चिंताओं से अवगत भी करवाना होगा। लेकिन लगातार तनाव और युद्ध विकल्प नहीं हैं। आज दुनिया उसी के कसीदे पढ़ती है जिसके पास पैसा हो। भारत को अपनी आर्थिक ताकत को तेजी से बढ़ाना होगा, इसके लिए जरूरी हो तो चीन का इस्तेमाल भी करना होगा। पैसा कमाने के लिए चीन ने हर नियम-कानून को ताक पर रख दिया है। भारत को भी आदर्शवाद छोड़ व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा।

“Bill against Triple Talaq: How long will this fight continue? Include polygamy and Nikah Halala in this Bill too” in TOI Blog

On November 24, a 32-year-old woman was allegedly divorced by her husband via phone call. They were married for 10 years and have children. Her husband uttered “talaq” thrice on the phone as the woman wasn’t able to meet his extortionist demands for dowry.

“There were 177 reported cases of triple talaq before the Supreme Court verdict. Even after the verdict, 67 cases of instant talaq were reported. The majority of such cases were in Uttar Pradesh,” said a senior government official.

On August 22, the Supreme Court declared instant triple talaq unconstitutional. The court’s ruling was that instant triple talaq is “violative of the fundamental right under Article 14 (equality before law) of the Constitution of India”.

The verdict added that Muslim Personal Law (Sharia) Application Act, 1937, when it comes to the matter of triple talaq, must be removed. After the landmark judgment, it was up to Parliament to enact the legislation regarding Muslim marriages and divorce, which is to be implemented within six months of the Supreme Court ruling.

The government plans to introduce legislation aimed at outlawing the controversial Muslim practice of instant triple talaq in the coming winter session of Parliament. “The draft has been sent to all the state heads, and their recommendations and comments have been sought on the draft. Once that is done, further steps will be taken to table the Bill,” a Home ministry official had said. It has been reported that state heads had been given three months to give their suggestions and consent.

The plan is to bring a bill that will ban instant triple talaq, create a non-bailable punishment, and a three-year imprisonment sentence against the husband. The bill may also grant the wife maintenance and custody of her minor children by moving the court. The bill will make instant talaq through any form (verbal, writing, electronic etc) illegal and void. Any aggrieved Muslim woman would be entitled to approach a magistrate court to seek redressal.

A senior BJP leader said, “the issue of triple talaq has become a social concern because women have started coming out against it. The practice is now being opposed by women who are financially and socially vulnerable.” When instant triple talaq happens, a victim has no option but to approach the police for justice. “Even police are helpless as no action can be taken against the husband in the absence of punitive provisions in the law. The step taken by the government is a positive message and legislation will go a long way in deterring Muslim husbands from divorcing their wives. Legislation will also empower women who find themselves helpless against the use of the practice,” the BJP leader had said.

The best solution to remove all hardships faced by women would be to apply Uniform Civil Code nationally and remove Personal Laws. When it comes to polygamy, instant triple talaq and nikah halala in Sharia Law, they all are a violation of the rights and integrity of a woman. To follow a UCC which guides each individual under the same purview of the law with equality not only of religion, but also of gender, is the aim of our constitution and our judicial system. Till when will our Muslim sisters fight these archaic practices?
Though the problem of Personal Laws isn’t limited to Muslim women, it also extends to other factional divisions.

In 1991, Goolrukh Gupta, who was named Goolrukh Contractor before her marriage, was married in South Gujarat to a Hindu Man. Originally from the Zoroastrian faith, she held to her religion and continued her practices even after marriage. After her father’s death she was denied entry to the Tower of Silence in Mumbai, even though her father’s last rights were performed there.  She approached Gujarat High Court against this discrimination.

The Gujarat High Court stated in 2012 that due to the Special Marriage Act, (applicable where two individuals from different faiths marry), her religion had changed to that of her husband. She is no longer a Parsi and is now a Hindu. She took the case to the Supreme Court against the Gujarat High Court’s judgment which claimed that Ms Goolrukh Gupta ceased to be a Parsi after her marriage to a Hindu. Chief Justice Misra stated that a woman is not mortgaged to her husband after marriage, her individual identity as well as religious identity are maintained under the Special Marriage Act.

The Chief Justice further said that only a woman can choose to follow or curtail her religious identity, she has that freedom of choice under the Special Marriage Act. If only such freedom of choice, identity and equality were granted to members of all religions and faith.

“चीन पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है क्वाड्रीलेटरल, अपनी शर्तों पर इसका समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

वक्त की नई करवट के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय में नए समीकरणों की आहट भी सुनाई देने लगी है। सोवियत रूस के धराशायी होने के बाद माना जाने लगा कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर है और दुनिया में उसका सिक्का चलता है। लेकिन रूस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। अमेरिका के आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को सीमित करने और दुनिया को बहुध्रुवीय बनाए रखने के लिए शीत युद्ध से उबर रहे रूस ने दो महत्वपूर्ण संगठनों की परिकल्पना की। वर्ष 1993 में रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने रिक (रशिया, इंडिया, चाइना ट्राइलेटरल) का खाका पेश किया। हालांकि इसका पहला शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में ही हो पाया। वर्ष 1996 में पांच देशों – चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रशिया और तजाकिस्तान ने शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन की स्थापना की। इसका मूल उद्देश्य था शंघाई के सीमांत इलाके में सैन्य विश्वास विकसित करना और सीमा विवादों को शांति से हल करना। इन देशों ने सीमांत इलाकों में सैन्य बल कम करने के लिए 24 अप्रैल 1997 को एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। इसी साल 20 मई को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और चीनी प्रधानमंत्री जियांग जेमिन ने ‘मल्टीपोलर वल्र्ड’ (बहुध्रुवीय विश्व) के समझौते पर हस्ताक्षर किए। वर्ष 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसके पूणकालिक सदस्य बन गए।

लंबे अर्से तक अमेरिकी ये सोचते रहे कि सोवियत रूस जैसे चीन भी धीरे-धीरे ध्वस्त हो जाएगा। वर्ष 2002 में वहां एक किताब भी आई जिसका शीर्षक था – चाइना कोलेप्स थ्योरी (चीन के पतन का सिद्धांत)। लेकिन ये थ्योरी फेल हो गई। अगले आठ साल में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यही नहीं 2002 से 2017 के बीच चीन का सकल घरेलू उत्पाद तिगुना हो गया।

तेजी से उभरते चीन ने दुनिया का महानतम देश बनने का लक्ष्य रखा है। इसे ध्यान में रखते हुए चीन ने दुनिया की सुपर पावर अमेरिका के साथ वर्चस्व साझा करने, परस्पर सहयोग बढ़ाने और अपने लक्ष्य को धीरे-धीरे अमली जामा पहनाने के लिए कई प्रस्ताव किए जिन्हें अमेरिका ने निरस्त कर दिया। चीन ने जो प्रस्ताव किए उनमें संभवतः सबसे पहला था वन बेल्ट, वन रोड इनीशिएटिव। इस परियोजना के बारे में पिछले पांच साल से सुगबुगाहट चल रही है। हालांकि इसका पहला महासम्मेलन इसी वर्ष बीजिंग में हुआ, अमेरिका ने इसमें अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा लेकिन इसमें भागीदारी का कोई वादा नहीं किया। इसकी खास वजह रही परियोजना की अस्पष्टता और चीन का अंधा स्वार्थीपन। चीन ने इसके लिए विवादास्पद क्षेत्रों में जाने से भी परहेज नहीं किया। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है, लेकिन चीन ने वहां भी चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर बना डाला जो वन बेल्ट वन रोड का ही एक हिस्सा है। श्रीलंका और ग्रीस में चीन के व्यवहार से भी अमेरिका नाराज हुआ। चीन ने श्रीलंका और चीन को ऊंची दरों पर ऋण दिया और जब वो इसे अदा नहीं कर पाए तो उनके महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया। चीन ने तो ग्रीस पर यहा तक दबाव डाला कि वो उससे संबंधित यूरापियन यूनियन के मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों को बाधित करे।

चीन का दूसरा प्रस्ताव रहा – ‘न्यू माॅडल आॅफ ग्रेट पाॅवर रिलेशंस’ (शक्ति के महान संबंधों का नया माॅडल)। शी जिनपिंग के इस व्यक्तिगत प्रस्ताव पर अमेरिका के कुछ राजनयिकों ने विचार का प्रस्ताव किया, लेकिन ‘माॅडल’ की अस्पष्टता के कारण ये भी ठंडे बस्ते में चला गया। इसके निरस्त होने का एक बड़ा कारण चीन की अजीबो-गरीब अपेक्षा भी थी कि यदि चीन किसी अमेरिकी सहयोगी पर हमला करता है तो अमेरिका उसके बचाव में नहीं आएगा। ये एक तरह से चीन का वर्चस्व स्वीकार करने जैसा था। एशिया में अपना कब्जा बनाने के लिए चीन का एक अन्य प्रस्ताव था – ‘एशिया फाॅर एशियंस’ (एशिया एशियाई लोगों के लिए)। अमेरिका ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘कम्युनिटी आॅफ काॅमन डेस्टिनी’ (साझा नियति का समुदाय) नाम से प्रस्ताव दिया। लेकिन इसमें न तो ये स्पष्ट था कि ‘कम्युनिटी’ में कौन से देश शामिल होंगे और न ही ‘डेस्टिनी’ का अर्थ। लेकिन अमेरिका को लगा कि इसके तहत चीन अपने नेतृत्व में विश्व की ‘नियति’ निर्धारित करना चाहता है। इसलिए ये प्रस्ताव भी सिरे नहीं चढ़ पाया।

लेकिन अब तक अमेरिका को चीनी प्रस्ताव और उनके निहितार्थ अच्छी तरह समझ आने लगे थे। साथ ही यह भी समझ आ गया था कि चीन का उदय काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक है। अमेरिका ने अब न केवल चीन के अभ्युदय में सहायक बनीं पक्षपाती आर्थिक-व्यापारिक नीतियों का विश्लेषण और विरोध शुरू किया, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जगह भारतीय-प्रशांत क्षेत्र शब्दावली का प्रयोग शुरू किया। इसका सीधा सा उद्देश्य चीन को ये संकेत देना था कि अमेरिका एशिया में चीन के एकछत्र प्रभुत्व को मान्यता नहीं देता। अगर वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कब्जा जमाने की कोशिश करेगा तो भारत की मदद से उसका सामना किया जाएगा। इसी सिलसिले में बराक ओबामा ने भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी घोषित किया जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने और मजबूती से दोहराया। ट्रंप ने तो अपनी नयी दक्षिण एशिया नीति में चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान पर भी नकेल कसी और अफगानिस्तान में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार किया।

अपनी पहली एशिया यात्रा में, जिसमें चीन के साथ जापान, साउथ कोरिया, वियतनाम और फिलीपींस भी शामिल थे, ट्रंप ने अपने इरादे स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन जैसे भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है, वैसे ही अमेरिका को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का। ट्रंप ने उसके दुःसाहस के लिए भी सीधे चीन को जिम्मेदार ठहराया और उस पर लगाम लगाने की मांग की।

अब समय का पहिया लगभग पूरा घूम चुका है। पहले जहां रूस और चीन अमेरिका पर लगाम लगाने के लिए संधियां कर रहे थे वहीं अब अमेरिका, एशिया में चीन पर लगाम लगाने के लिए नए गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है। इस श्रंखला में जो सबसे महत्वपूर्ण गठबंधन उभर कर सामने आ रहा है वो है आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत और अमेरिका का क्वाड्रिलेटरल या संक्षेप में क्वाड। क्वाड्रिलेटरल का अर्थ होता है चार भुजाओं वाला। उम्मीद की जा रही है कि क्वाड चीन की महत्वकांक्षी ओबीओआर परियोजना को तो चुनौती देगा ही, भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और सैन्य विस्तारवाद पर भी रोक लगाएगा और उसपर निगाह रखेगा।

अमेरिका क्वाड के लिए भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया को हर तरह की मदद देने के लिए तैयार है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अमेरिका की हथियार बेचने की चाल है। लेकिन ओबीओआर के नाम पर चीन की अब तक की हरकतों को देखते हुए लगता है कि हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा जा सकता और इसका मजबूत अंतरराष्ट्रीय विकल्प तैयार करना जरूरी है ताकि क्वाड के सिर्फ चार देश ही नही,ं जापान से अमेरिका तक पूरी दुनिया में कानून सम्मत, न्यायपूर्ण तरीके से व्यापार किया जा सके। ओबीओआर के नाम पर जहां चीन जहां समुद्री मार्गों पर मनमाने तरीके से कब्जा करने की कोशिश कर रहा है वहीं म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल आदि में विवादास्पद क्षेत्रों में घुस रहा है। ये व्यापार संवर्धन के नाम पर गरीब देशों को ऊंची दरों पर ़ऋण दे रहा है और जब ये देश ऋण चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं तो उनकी जमीनों पर मनमानी शर्तों पर कब्जा कर रहा है। कुल जमा ये कि चीन अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर आर्थिक उपनिवेशवाद को नए सिरे से बढ़ावा दे रहा है।

मोटे तौर पर क्वाड का लक्ष्य तो स्पष्ट है, पर इसकी बारीकियों का सामने आना अभी बाकी है। काफी समय तक तो क्वाड सिर्फ राजनयिक बातचीत और जुमलेबाजी तक सीमित रहा। इसे चीन का प्रभाव ही कहा जाएगा कि भारत जैसे देश इसकी आवश्यकता को महसूस करते हुए भी इससे जुड़ने से बचते रहे। इस वर्ष फिलीपींस में ईस्ट एशिया समिट के दौरान 12 नवंबर को चारों देश जापान की अध्यक्षता में इस विषय पर विचार करने बैठे। इसके बाद चारों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए लेकिन किसी ने भी अपने बयान में चीन का उल्लेख नहीं किया। बयानों से पता लगा कि बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कानून सम्मत व्यवस्था, कनेक्टीविटी (संयोजकता), समुद्री सुरक्षा, नाॅर्थ कोरिया और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन अलग-अलग बयानों से साफ है कि चारों देशों को एक साझी कार्यसूची पर पहुंचना अभी बाकी है। बहरहाल भारत ने स्पष्ट किया कि वो अपनी एक्ट ईस्ट पाॅलिसी को भारतीय-प्रशांत क्षेत्र मंे अपनी नीति का मूल आधार बनाना चाहता है। भारत चाहता है कि इस क्षेत्र में आसियान देशों की केंद्रीय भूमिका बनी रहे। यहां दो बातें बताना चाहेंगे। एक – जब फिलीपींस में क्वाड पर बातचीत हो रही थी तब चारों देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी वहां मौजूद थे। दो – भारत ने 26 जनवरी की परेड में आसियान देशों के प्रमुखों को निमंत्रित किया है और उन्होंने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है।

यदि चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए क्वाड बन गया तो इसका स्वरूप क्या होगा, इसका अधिकार क्षेत्र क्या होगा, जापान से अफ्रीका और अमेरिका तक विभिन्न देश इससे कैसे जुड़ेंगे, ये चीन के आर्थिक उपनिवेशवाद का कैसे जवाब देगा, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर मंथन जारी है। ध्यान रहे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस वर्ष सितंबर में भारत आए थे। उनकी यात्रा के दौरान भारत और जापान ने जो संयुक्त घोषणापत्र जारी किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि दोनों देश भारतीय-प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और उदार बनाने के लिए एक ऐसी मूल्य आधारित साझेदारी के प्रति समर्पित हैं जिसमें संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान किया जाता हो, विवादों को बातचीत से सुलझाया जाता हो, जहां छोटे और बड़े सभी देशों को बेरोकटोक समुद्री और हवाई यात्रा की छूट हो और वे टिकाऊ विकास और निद्र्वंंद्व, खुले, निष्पक्ष व्यापार और निवेश व्यवस्था का लाभ उठा सकें। भारत-जापान संयुक्त घोषणापत्र में जापान और अफ्रीका के बीच व्यापार मार्ग ढूंढने के प्रयासों का भी स्वागत किया गया।

ध्यान रहे कुछ दिनों बाद यानी 12 नवंबर को भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया त्रिपक्षीय समूह की बैठक भी हो रही है। इस समूह की पिछली तीन बैठकों में संयुक्त समुद्र व्यापार परियोजनाओं, सहयोग, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि पर बातचीत हुई। आगामी बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा वातावरण की समीक्षा तो होगी ही, साथ ही नाॅर्थ कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के मद्दे नजर परमाणु विस्तार, समुद्र के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद और इस क्षेत्र में समुद्री सीमा विवाद आदि पर भी चर्चा होगी।

भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया की वार्ता से ठीक एक दिन पहले रिक (रूस, इंडिया, चीन) की मंत्री स्तरीय बैठक भी होगी। यह बैठक इस वर्ष के आरंभ में ही होनी थी, लेकिन दलाई लामा के अरूणाचल यात्रा के विरोध में चीन ने इसे टाल दिया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की दोनों बैठकों पर निगाह रहेगी। नई परिस्थितियों में भारत को भी संतुलन बनाकर चलना होगा। भारत का चीन के साथ लगभग सौ अरब डाॅलर का व्यापार है, पर ये भी हकीकत है कि पड़ोसी और विशाल बाजार होने के नाते चीन से सबसे ज्यादा खतरा भी भारत को ही है। भारत ने चाइना-पाकिस्तान काॅरीडोर के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर आपत्ति जताई है। आगामी रिक बैठक को देखते हुए चीन ने कहा है कि यदि भारत इसमें शामिल होता है तो वो इसका नाम बदल सकता है। भारत को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है क्योंकि चीन नाम बदलने के लिए भले तैयार दिखता हो, पर पाक अधिकृत कश्मीर से हटने के लिए नहीं।

जवाहरलाल नेहरू ने ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए गुटनिरपेक्षता की अवधारणा पर चलने का फैसला किया। लेकिन आज टकराव वैचारिक नहीं बल्कि व्यापारिक और सामरिक है। चीन आज अपनी विचारधारा के बल पर नहीं, पैसे के बल पर दुनिया का शोषण करना चाहता है। अच्छी बात है कि ऐसे समय में नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंनेे विदेशनीति को अधिक व्यावहारिक, सुदृढ़, धारदार, निर्णयात्मक और किन्हीं अर्थों में अधिक उदात्त, निर्भीक और स्पष्टवादी तथा पूरी तरह राष्ट्रसापेक्ष बना दिया है। अब विदेशनीति का आधार व्यक्तिगत सनक, राजनीतिक विचारधारा या किसी समुदाय का तुष्टिकरण नहीं बल्कि राष्ट्रहित है। अब विदेशनीति देश के आर्थिक, सामरिक विकास का औजार है। यह औजार है भारत के अंतरराष्ट्रीय अभ्युदय की बुनियाद तैयार करने का। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वो क्वाड्रीलेटरल में अवश्य शामिल हों लेकिन अपनी शर्तों पर।

“We welcome capital punishment for child rapists” in TOI Blog

Shivraj Singh Chouhan, the chief minister of Madhya Pradesh, wants death as punishment to rapists. This extreme sentiment felt 8 months ago by Mr Chouhan has now taken civic action. According to National Crime Records Bureau (NCRB) in 2016 Madhya Pradesh recorded the highest number of rape cases in the country. In the past two months there has been a sharp increase in rape crimes, and on this Sunday the Madhya Pradesh state cabinet passed a proposal for amendment of the Indian Penal Code (IPC) for harsher punishments for rape, molestation, stalking, and sexual harassment. The proposal has approved the appeal for death penalty of raping a girl child 12 years old or younger, and for convicts convicted of gang rape. There is also an amendment in the IPC to increase fine and punishment for rape convicts.

After the Cabinet meeting Finance Minister of MP Jayant Malaiya stated that there should be provisions for harsher punishment under IPC sections 376 (rape) and 493 (cohabitation caused by a man deceitfully inducing a belief of lawful marriage). “The recommendation is to impose a fine of Rs 1 lakh for such crimes in addition to harsher punishment for stalking, harassment, rape, and capital punishment for those convicted of rape and gang rape of children aged 12 years and below,” Malaiya said. “For this, the proposal is to add a subsection 376A IPC and 376D (gang rape) IPC. Punishment should be increased under section 493A also.”

Even though Madhya Pradesh might have passed the amendment for this bill the result may not be predictable as it will have to be passed by both houses of Parliament due to the request of capital punishment. A proposal for amendment of these two sections will be presented in the assembly during the winter session. After it is passed in the House, it will be sent to the President for assent.

After the infamously heinous Nirbhaya rape case public demand was to make it safer for women to leave her household without fear for her life or integrity. Another demand was to have stricter and swifter punishable action against criminals, and for more effective criminal proceedings in court. It was during that time that Indian nationals and eminent politicians demanded capital punishment for rapists, Mr Chouhan is one of them. Yet Madhya Pradesh has decided to approve the amendment after the state had come under criticism over rape incidents. The greatest trigger being when a 19 year old UPSC aspirant was raped when returning home from coaching. Her FIR registration was delayed and it led to the suspension of some police officers. In 2014 MP reported 5,076 rape cases, which was 14 percent of the total rape incidents reported in the country.

Yet the proposal has narrowed down to specifics, it will be applicable to a child under the age of 12 and the child should be a girl. The biggest flaw with this amendment is that the rape or molestation of boys is not taken into account. Amod Kanth, former police officer and founder of NGO Prayas said, “When we conducted a national study on child abuse in 2007, along with the Ministry of Women and Child Development, we found that there were as many male victims of child abuse as female.” It is time to forget about gender when it comes to rape, justice for everybody should be on an equal basis irrespective of their differences.

“बलूचिस्तान की आजादी का खुल कर समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

पाकिस्तान की नई नई इस्लामिक कट्टरवादी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक य रसूल अल्लाह द्वारा ईशनिंदा पर मचाए गए हंगामे के कारण लगता है दुनिया की निगाह बलूचिस्तान में सेना के जुल्मो सितम से हट गई है। जिस समय तहरीक के इस्लामिक कट्टरवादी कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भिड़ रहे थे, लगभग उसी समय 25 नवंबर को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में फ्रंटीयर कोर के काफिले पर आत्मघाती हमले में पांच लोग मारे गए। ध्यान रहे पाकिस्तानी सेना और फ्रंटीयर कोर आजकल वहां रद्द-उल-फसाद नाम का आॅपरेशन चला रहे हैं जिसका मकसद वहां कथित आतंकवादियों (बलोच स्वतंत्रता सेनानियों) का जड़ से सफाया करना है। रद्द-उल-फसाद के नाम पर निर्दोष बलोचों पर लगातार अत्याचार किए जा रहे हैं जिसका स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी विरोध भी कर रहे हैं। खबर है कि सेना और फ्रंटीयर कोर से त्रस्त बलोचों ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) बना ली है। इसके नेता खैर बक्श मरी हैं और ये पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान और सीमा पार बलोच बहुल अफगान इलाकों में भी सक्रिय है।
कहना न होगा बलूचिस्तान में सैनिक, अर्धसैनिक बलों और पुलिस तथा स्वतंत्रता सेनानियों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, सुरक्षा बल उसके लिए बीएलए को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, हालांकि इसका सत्यापन आसान नहीं होता। नवंबर 21 को यहां के तुरबत इलाके में पाकिस्तानी सैनिकों और बलोच स्वतंत्रता सेनानियों की मुठभेड़ में एक सैनिक मारा गया। नवंबर 15 को इसी इलाके में 15 शव मिले थे। इसी दिन क्वेटा में पुलिस अधीक्षक मुहम्मद इलयास और उसके तीन परिवार वालों की सरेआम हत्या कर दी गई। कुछ दिन बाद इसी इलाके से पांच और लोगों के शव मिले। अधिकारियों के अनुसार ये सभी शव पंजाब प्रांत में रहने वालों के थे। सुरक्षा बलों के अनुसार तुरबत में 15 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी बीएलए ने ली। इससे पहले अक्तूबर 18 को पुलिस दल को ले जा रहे एक ट्रक में धमाके में आठ लोग मारे गए। इनमें से 7 पुलिस वाले थे। इस धमाके में 24 लोग घायल हुए। अगस्त 13 को सेना के एक ट्रक पर आत्मघाती दस्ते के हमले में आठ सैनिकों समेत 15 लोग मारे गए।

ये तो कुछ हालिया घटनाएं हैं, लेकिन बलूचिस्तान में हिंसक घटनाओं का सिलसिला लंबे अर्से से चला आ रहा है। जाहिर है पाकिस्तानी मीडिया वो खबरें तो प्रमुखता से देता है जिनमें पुलिस या सुरक्षा बलों को निशाना बनाया जाता है, लेकिन ये बलोचों पर सेना के पैशाचिक अत्याचारों और मानवाधिकार हनन की घटनाओं को दबा जाता है। बलूचिस्तान में सेना द्वारा नागरिकों की हत्या, अपहरण या प्रताड़ना की खबरें या तो प्रकाशित ही नहीं की जातीं और अगर की भी जाती हैं तो अंदरूनी पन्नों पर सिंगल काॅलम में। ऐसी खबरों को प्रकाशित करने के कारण इतने पत्रकार अपनी जान से हाथ धो चुके हैं कि अखबार मालिक ऐसी घटनाओं को कवर करने में भी डरने लगे हैं।

बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी सैकड़ों बार चिंता जता चुकी है, इसकी आलोचना कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाॅच (एचआरडब्लू) के अनुसार बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन महामारी का रूप ले चुका है और पाकिस्तानी सरकार ने सेना की ज्यादतियों का विरोध करने वाले बलोचों की प्रताड़ना, अपहरण और गैरकानूनी हत्या रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी प्रकार यूरोपीय संसद के आसियान प्रतिनिधि मार्क टाराबेला कहते हैं कि बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन की रिपोर्टें डरावनी हैं। वहां सैनिक और अर्धसैनिक बल व्यवस्थित तरीके से लोगों को निशाना बना रहे हैं और सरकार आंखें मूंदे बैठी है।

इंटरनेशनल वाॅयस फाॅर बलोच मिसिंग पर्संस के मुताबिक जनवरी 2014 तक बलूचिस्तान में 18,000 लोग गुमशुदा थे। इनमें से 2001 से 2013 के बीच 2,000 लोग मारे गए। 463 लोगों का जबरदस्ती अपहरण किया गया। इनमें से 157 को इतना प्रताड़ित किया गया कि वो जान से हाथ धो बैठे। मारे गए कुछ प्रसिद्ध बलोच स्वतंत्रता सेनानी हैं – मुनीर मेंगल, इमाद बलोच, अल्लाह नजर बलोच, जाकिर मजीद बलोच, गुलाम मोहम्मद बलोच ओर जाहिद बलोच।
पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बल अपहृत लोगों के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं इसका विवरण इन लोगों के परिवार वालों के बयानों से चलता है। इनके मुताबिक आततायी जिंदा लोगों पर तो जुल्म करते ही हैं, उनके मरने पर दिल, गुर्दे, फेफड़े, आंते तक निकाल लेते हैं। ऐसा परिवार वालों, संबंधियों और आस पास के लोगों को डराने के लिए किया जाता है ताकि वो अपना मुंह बंद रखें।

पाकिस्तान आजकल चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना के तहत वहां ग्वादर पोर्ट बना रहा है। इसके चलते बलोचों पर अत्याचार और बढ़ गए हैं। कहने को तो पाकिस्तान दावा करता है कि इससे बलोचों को रोजगार मिल रहा है और वहां आर्थिक समृद्धि आ रही है, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। ग्वादर में काम करने वाले मजदूर तक चीन से लाए गए हैं। चीन इस पूरे क्षेत्र में अपनी करंसी चलाना चाहता है और जो लोग इस परियोजना में काम करना चाहते हैं, उन्हें अपनी भाषा सीखने पर मजबूर कर रहा है। ऐसे में बलोचों को इस परियोजना से कोई फायदा नहीं मिल रहा है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उनका सफाया ही किया जा रहा है। उन्हें अब डर सता रहा है कि कहीं पाकिस्तान के बाद वो चीन के उपनिवेश न बन कर रह जाएं। मौजूदा हालात को देखते हुए ये डर जायज भी है।

पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान में अपनी एजेंसियों की करतूतों पर तो पर्दा डाल देती है पर जब संघर्ष में इनके अपने लोग मरते हैं तो ये भारत पर इल्जाम लगाते हैं। पाकिस्तानियों को लगता है कि जो खेल वो कश्मीर में खेल रहे हैं, वहीं भारत बलूचिस्तान में खेल रहा है। अपने भारत विरोधी नेरेटिव को सही साबित करने के लिए इन्होंने कुलभूषण जाधव को राॅ के एजेंट के रूप में दुनिया के सामने पेश किया, लेकिन अफसोस कि दुनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया। अब ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस में चल रहा है।

लेकिन बलूचिस्तान का मसला इतना सरल नहीं है जितना पाकिस्तान दिखाने की कोशिश करता है। और न ही बलूचिस्तान उसका हिस्सा है जैसा वो दावा करता है। बलूचिस्तान का इतिहास असल में पाकिस्तान की बदनीयति और धोखाधड़ी का इतिहास है जिसे खुद पाकिस्तान के कायदे आजम मौहम्मद अली जिन्ना ने लिखा जिन्हें कलात के खान मीर अहमदयार खान अपना सबसे करीबी और विश्वासपात्र समझते थे। असल में विभाजन से पहले बलूचिस्तान में चार शाही रियासतें शामिल थीं – कलात, लसबेला, खारन और मकरान। मकरान, कलात का एक जिला था परंतु लसबेला और खारन का प्रशासन अंग्रेजों ने कलात के खान का सौंपा हुआ था।

पाकिस्तान बनने के तीन महीने पहले ही जिन्ना ने कलात के खान अहमदयार खान के नेतृत्व में बलूचिस्तान की आजादी के बारे में ब्रिटिश सरकार से बातचीत की। इसके बाद वायसराय, अहमदयार खान और जिन्ना के बीच कई बैठकें भी हुईं। इनके परिणामस्वरूप् 11 अगस्त 1947 को एक विज्ञप्ति जारी हुई जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान कलात को स्वतंत्र सार्वभौमिक राज्य के रूप में मान्यता देता है। इसमें ये भी कहा गया कि भविष्य में पाकिस्तान और बलूचिस्तान के संबंधों के बारे में कोई भी फैसला होने तक दोनों पक्ष ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (यथास्थिति समझौता) करेंगे। लेकिन अक्तूबर आते आते जिन्ना का मन बदल गया। उसे लगा कि पाकिस्तान में शामिल हुई अन्य रियासतों की तरह बलूचिस्तान को भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए। जिन्ना के दबाव में अहमदयार खान रक्षा, विदेश संबंध और संचार पाकिस्तान को देने के लिए तैयार हो गए पर उन्होंने तब तक किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया जब तक पाकिस्तान उसके साथ सम्मानजनक शर्तों पर संधि नहीं करता। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने राज्य की विधायिकाओं दार-उल-अवाम और दार-उल-उमरा की बैठकें भी बुलाई हैं। आगे की कार्रवाई उनकी सहमति से ही होगी। फरवरी 21, 1948 को दार-उल-अवाम की बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान के साथ विलय के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। लेकिन इसके एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि कलात, भविष्य में पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के लिए संधि पर वार्ता करे।

लेकिन मार्च 18, 1948 को पाकिस्तान ने खारन, लसबेला और मकरान को जबरदस्ती अपना हिस्सा घोषित कर दिया। कलात के खान ने इसका विरोध किया। उन्होंने इसे ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ का उल्लंघन बताया। लेकिन इससे पाकिस्तान के कान पर जूं नहीं रेंगी। मार्च 26, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस गई। एक ही दिन बाद मार्च 27 को कराची में घोषणा की गई कि अहमदयार खान ने घुटने टेक दिए हैं और वो अपनी रियासत के पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार हो गए हैं। इसके साथ ही बलूचिस्तान की 227 दिन चली आजादी भी समाप्त हो गई। स्पष्ट है, जिन्ना ने बंदूक के बल पर अहमदयार खान को विलय के लिए मजबूर किया। ध्यान रहे इस से पहले ही दार-उल-अवाम पाकिस्तान के साथ विलय का विरोध कर चुकी थी। इसलिए भले ही अहमदयार खान ने बंदूक के बल पर विलय की बात मान ली हो पर उसे कलात की विधायिका ने मंजूरी नहीं दी। यही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य ने भी कभी इस फैसले को मान्यता नहीं दी जिसने बलूचिस्तान का शासन अहमदयार खान को सौंपा था।

ये सही है कि पाकिस्तान ने बंदूक के बल पर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि अहमदयार खान ने बलूचिस्तान की आजादी के लिए काफी कोशिश की। उन्होंने ईरान और अफगानिस्तान के साथ भी समझौते की कोशिश की। वो लंदन के साथ कुछ वैसा ही समझौता भी चाहते थे जैसा उसने ओमान के साथ किया। उन्होंने आजाद बलूचिस्तान के लिए समर्थन जुटाने के वास्ते मार्च 1946 में एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भी भेजा था। ये प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से मिला। लेकिन आजाद ने बलूचिस्तान की आजादी को समर्थन से इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटेन का बगलबच्चा बन कर रह जाएगा जो भारतीय उपमहाद्वीप की आजादी के लिए अच्छा नहीं होगा।

बाद में खबरें आईं कि खान ने भारत के साथ विलय की कोशिश भी की, लेकिन इसे भी नकार दिया गया। जब पाकिस्तान, बलूचिस्तान की आजादी का बलात्कार कर रहा था, अंग्रेज ही नहीं, कांग्रेस के बड़े नेता भी खामोशी से देख रहे थे। बहरहाल दुनिया भर की उपेक्षा के बावजूद बलोचियों ने अपनी आजादी की ख्वाइश नहीं छोड़ी। उनका संघर्ष लगातार जारी रहा। खान को जिन्ना ने जो धोखा दिया, वो उसे कभी नहीं भूले। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि कांग्रेस ने खान के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया होता तो आज क्या हालात होते।

पाकिस्तान ने बलोचों की धरती पर तो कब्जा कर लिया पर उनका दिल जीतने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और उसके करीब आधे भूभाग पर फैला है पर इसकी आबादी पाकिस्तान की कुल आबादी की महज दशमलव पांच प्रतिशत है। ह्यूमन डिवेलपमेंट इंडेक्स के हिसाब से ये पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है। पाकिस्तानियों ने उनकी जमीनों, खनिजों और प्राकृतिक गैस का भरपूर इस्तेमाल तो किया पर उसका फायदा उन्हें नहीं दिया। जिन्ना के धोखे और इस अंधे शोषण ने बलोचों को गुस्से से भर दिया जिसका नतीजा समय समय पर विद्रोह के रूप में सामने आया। बलूचिस्तान में सबसे बड़ा विद्रोह 2006 में हुआ जब सेना ने बलूचों के सर्वमान्य नेता सरदार अकबर बुगती और उनके 26 साथियों को धोखे से मार डाला।

कभी पंजाब में तो कभी कश्मीर मे, पाकिस्तान आजादी के बाद से लगातार भारत से पंगा लेता रहा है। 90 के दशक से कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत में उसकी प्राॅक्सी वाॅर जारी है। इंदिरा गांधी ने मजबूर होकर बांग्लादेश के संघर्ष में हस्तक्षेप किया था, परंतु उसके बाद भारत ने पाकिस्तान में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई। बलूचिस्तान में लोगों पर अकथनीय अत्याचार हुआ, लेकिन भारत ने कभी वहां फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। भारत सरकार पाकिस्तान की असली सरकार यानी सेना को छोड़, वहां की कठपुतली चुनी हुई सरकारों से गलबहियां करती रही और सेना भारत में मनमानी करती रही। पाकी सेना एक तरफ तो कश्मीर में आतंकवाद फैलाती रही तो दूसरी तरफ बलोच अशांति के लिए भारतीय खुफिया ऐजेंसी राॅ को जिम्मेदार ठहराती रही। भारत हमेशा इन आरोपों से इनकार करता रहा। पर 2009 में तबके प्रधानमंत्रियों युसुफ रजा गिलानी और मनमोहन सिंह ने शर्मअल शेख में एक संयुक्त घोषणपत्र जारी किया जिसमें पहली बार बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ। हालांकि इसमें बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत को सीधे तौर पर तो जिम्मेदार नहीं ठहराया गया पर ये अवश्य कहा गया – “प्रधानमंत्री गिलानी ने उल्लेख किया कि बलूचिस्तान और अन्य इलाकों में आतंक के बारे में पाकिस्तान के पास कुछ सूचना है”। कुछ लोगों ने इस घोषणापत्र को मनमोहन की नरमी का प्रतीक बताया तो कुछ ने आरोप लगाया कि वो सांप्रदायिक विदेशनीति अपना रहे हैं| और पाकी खुफिया एजेंसी के हाथ में खेल रहे हैं। बहरहाल काफी फजीहत के बाद मनमोहन सरकार ने इस घोषणापत्र से पल्ला झाड़ लिया।

मोदी सरकार ने भी पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से संबंध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर प्रयास पर पाकी सेना ने आतंकी हमलों के जरिए पानी फेर दिया। यही नहीं कश्मीर में भी हालात को और बदतर बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले भाइयों को याद किया। अब तक पाकी लाइन को चला रहे भारतीय मीडिया ने इसके बाद पहली बार खुल कर बलोचिस्तान में चल रहे दमन की खबरें प्रकाशित करना शुरू किया। भारत में भी विस्थापित बलोच नागरिकों के सम्मेलन हुए। यही नहीं सरदार अकबर बुगती के पोते बरहमदाग खान बुगती ने भारत में शरण के लिए आवेदन भी किया जो आजकल स्विटजरलैंड में रह रहे हैं। हाल ही में स्विटजरलैंड ने उनके राजनीतिक शरण के आवेदन को ठुकरा दिया क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया हुआ है। याद रहे ये वही पाकिस्तान है जिसने हाल ही में मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी और लश्कर-ए-तौएबा के प्रमुख को सारे अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद रिहा कर दिया था।

प्रधानमंत्री की पहल के बाद भारत ने ये मसला संयुक्त राष्ट्र समेत लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। खुद बलोच विस्थापितों ने ये मसला आॅफिस आॅफ यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशनर फाॅर रिफ्यूजीस (यूएनएचसीआर) में जोरशोर से उठाया। अमेरिका सहित दुनिया भर में इस मसले पर सेमीनार और विचार गोष्ठियां आयोजित की गईं। अमेरिका के दो सेनेटरों ने तो बलूचिस्तान की आजादी के लिए प्रस्ताव भी रखा। इससे पहले 2012 में अमेरिकी कांग्रेसमेन डाना रोहराबाचर और लूई गाहमर्ट ने हाउस आॅफ रेप्रेसेंटेटिव में बलूचिस्तान के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देने के लिए बिल पेश किया था।

पाकिस्तान ने जिस तरह हाफिज सईद को बेशर्मी से रिहा किया है और जैसे उसके आतंकी संगठन जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) को राजनीतिक संगठन (मिल्ली मुस्लिम लीग) के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है और जैसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुली धमकियों के बावजूद पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों के बारे में दोगली नीति अपना रहा है, उससे ये साफ हो गया है कि भारत को अब ये लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ेगी।

अब मोदी सरकार को बलूचिस्तान के बारे में जबानी जमाखर्च बंद कर कुछ मजबूत कदम उठाने हांेगे। सबसे पहले तो बरहमदाग बुगती को राजनीतिक शरण देनी होगी और साफ तौर से एलान करना होगा कि जैसे पाकिस्तान कश्मीर के आतंकवादियों को ‘नैतिक और राजनयिक’ समर्थन देता है, वैसे ही भारत भी अब खुले आम बलोच स्वतंत्रता सेनानियों को समर्थन देगा। भारत बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता और बलोच लोगों की इच्छा के अनुसार उसे अलग देश का दर्जा मिलना ही चाहिए। भारत को अमेरिका को भी स्पष्ट करना होगा कि यदि वो अफगानिस्तान के स्थायित्व में भारत का समर्थन चाहता है तो उसे बलोच आजादी का समर्थन करना होगा। बलोच लोगों के नरसंहार पर अब उसे अपनी जबान खोलनी ही होगी।

पाकी सेना की शह पर सीपेक के नाम पर चीन विवादास्पद पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में घुस गया है। जाहिर तौर पर चीन इसे ‘विकासपरक आर्थिक गतिविधि’ बता रहा है, लेकिन इसके सैन्य और रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि अमेरिकी ने सीपेक की वैधता पर उंगली उठाई है पर ग्वादर पोर्ट के बारे में कभी कोई वक्तव्य नहीं दिया है। अब अमेरिका को मजूबर किया जाना चाहिए कि वो इस विषय में अपनी राय स्पष्ट करे।
भारत के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा है। ये सिर्फ हाफिज सईद और उसके बारे में अमेरिकी बयानों तक सीमित नहीं है। ट्रंप की सभी धमकियों के बावजूद पाकी सेना भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए तैयार नहीं है। अब भारत को इसका हल खुद निकालना होगा और इसका रास्ता बलूचिस्तान से होते हुए जाता है।

“The power of a mother: from Manushi Chillar to Majid Khan” in TOI Blog

India is a nation whose people value their mother with reverence, from the portrayal of deities in powerful and caregiving roles to men folding their hands in obeisance to ‘lakshmi’. A country which terms its nation as ‘Bharat Mata’ is a rare find in this technologically advancing world. The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.

After a 17 year drought, India’s Manushi Chhillar won the coveted Miss World 2017 title in China. The previous winner was Priyanka Chopra, in her winning answer, Priyanka stated that her idol is Mother Theresa. Manushi, after 17 years, also gave a response based on the value of mother’s which received a huge applause from the audience. The question asked was, “Which profession deserves the highest salary and why?” The 20-year-old said, “A mother deserves the highest respect. It’s just not about cash but also the love and respect that you give to someone. My mother has been a huge inspiration. it is the mother’s job that deserves the biggest salary.”

This reply has awoken the people of India to embrace their cultural values and put their beloved mother’s on the pedestal they deserve yet are rarely acknowledged for.

It has been the argument of feminists that housewives are the largest unpaid workers globally, resulting in work done worth billions of dollars yet not recognised in our economy. The Organisation for Economic Cooperation and Development revealed that an average woman in India spends five hours a day in unpaid work, Indian men spent under 51.8 minutes a day. If the same woman has children from the age range of 1 to 6 years of age, the workload hours increase. Yet the term ‘housewife’ is frowned upon, a mother’s work is thought to be trivial, and her life imagined to be a ‘waste’.

Even if the work of a mother is thought to be a backbreaking task the entire process is imagined to have no economic value whatsoever, even though motherhood helps prepare kids for the national and international labour market. Yet all the efforts that a mother puts into the household, giving her love to her child are not disregarded. On one hand, where a mother’s love brought the coveted Miss World title back to India, a mother’s love also brought back a son from the brink of self and national destruction.

The effect of the love of a mother on her child is profound. Footballer Majid Khan who joined Lashkar-e-Taiba returned home after seeing a video of his mother crying for his return. Majid was seen at the funeral of Muzamil Manzoor, a militant killed during a gunfight in Kund. A week after he announced on Facebook that he was joining the militant ranks he returned. J&K chief minister Mehbooba Mufti welcomed Majid’s decision to return home.

‘’A mother’s love prevailed. Her impassioned appeal helped in getting Majid, an aspiring footballer, back home. Every time a youngster resorts to violence, it is his family which suffers the most,’’ she tweeted. Shortly after the return of Majid Khan, a 16-year-old boy heeded to his parents’ call and returned home in Chimmer village.
Seeing the positive effect that has been created by these videos of mothers telling their sons to come back home, many other mothers of terrorist sons have started doing the same.

In response, there are sons who are returning back home and aren’t being arrested. The government of J&K has declared that there will be no penalty for first-time offenders of any crime. In this manner, we can see that the role of a caregiver isn’t limited to our conventional belief of mother, but is also by the government. This different approach to rehabilitation of the youth, the belief that there is still hope, and the understanding that there is a gap in approach between the Indian government and Kashmiri youth has brought about a new approach.

The question still arises that with the hullabaloo surrounding Manushi Chillar’s response, to the return of children from terrorist groups, are we truly deserving to be called a nation who respects their mother in the 21st century? Compared to Western countries where children tend to live in nuclear families and leave their residence at the tender age of 18 years old, the attachment to parents isn’t as strong as in India.

Or yet that was the case until at least a decade ago, the new age trend is for Indian children to be educated outside of India and continue to live there, Indian children are leaving their parents alone. To achieve the dream of being successful in life, where success is measured in terms of international standards of income, the primary caregiver falls behind. Perhaps it is time to follow what we preach, not just say that we love our mothers but be there to care for our caregivers at a time that matters the most.

“देशभक्ति और राष्ट्रवादः चीन से सबक लें भारत के कम्युनिस्ट” in Punjab Kesari

भारतीय कम्युनिस्ट…माफ कीजिएगा भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट अपने देशद्रोही तौेर तरीकों और राजनीतिक हत्याओं के लिए बदनाम हैं। इनका ये देशद्रोही रवैया आजादी के पहले से चला आ रहा है। इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का अपमान ही नहीं किया, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे कद्दावर नेताओं को अपशब्द कहे और देश के विभाजन का समर्थन भी किया। 1962 की लड़ाई में इन्होंने बेशर्मी से चीन का साथ दिया। अपनी हत्यारी, विघटनकारी और राष्ट्रविरोधी विचारधारा के चलते ये लगातार भारत में बाहरी ताकतों की सहायता से चलाए जा रहे आतंकवादी, अलगाववादी हिंसक आंदोलनों का समर्थन करते रहे हैं। ये यहीं रूक जाते तब भी गनीमत थी, ये धर्मनिरपेक्षता के चोले में प्रतिगामी इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरवाद का समर्थन भी करते हैं। शायद यही वजह है कि क्रूर आईएस में सबसे ज्यादा मुसलमान लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) शासित केरल से ही गए।

भारत की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों और देश के 90,000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा जमा कर बैठे माओवादियों का चीन से गहरा नाता है। इन्होंने मानवाधिकारों के तिरस्कार और राजनीतिक विरोधियों की हत्या की सीख चीन से बखूबी ली है, वैसे ये इनकी विचारधारा के मूलभूत तत्वों में भी शामिल हैं। लेकिन ये चीन से कुछ अच्छी बातें भी सीख सकते थे जो इन्होंने शायद जानबूझ कर नहीं सीखीं क्योंकि ये इनकी विचारधारा से ज्यादा इनके निहित स्वार्थों के विपरीत हैं।

इन्हें चीन से जो चीज सबसे पहले और सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है वह है – प्रबल राष्ट्रवाद और देशभक्ति। भारत में जब भी कोई देश प्रेम या देश के लिए बलिदान होने की बात करता है तो सबसे पहले कम्युनिस्ट ही उसका मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं। उसे फासिस्ट बताया जाता है, उसे दकियानूस साबित करने की हरसंभव कोशिश की जाती है और उसे आधुनिकता और उदारवाद का विरोधी करार दिया जाता है। हालांकि अभी तक ये साबित नहीं कर पाए हैं कि देश से प्रेम करना और उसके प्रति वफादार होना कैसे उदारवाद और आधुनिकता विरोधी है और क्योंकर देश को गाली देना ही खुलेपन और आधुनिकता की निशानी माना जाए। अपनी इसी विकृत विचारधारा के कारण ये हमेशा से देश की सेना का मजाक उड़ाते रहे हैं और उसके खिलाफ शत्रुओं को समर्थन देते रहे हैं। मेजर रितुल गोगोई मामले में कैसे सारे कम्युनिस्ट और नक्सली सेना के खिलाफ एकजुट हो गए, वो देश शायद ही कभी भूल पाए। हम कैसे भूल सकते हैं कि जब अप्रैल 2010 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए थे तब इन्होंने कैसे जश्न मनाया था और मिठाइयां बांटी थीं।

भारत के कम्युनिस्टों और नक्सलियों की विकृत राष्ट्रद्रोही नीतियों के उलट चीन में कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ से ही प्रबल राष्ट्रवाद और यहां तक ही विकृत विस्तारवादी राष्ट्रवाद की समर्थक रही है। इसी विस्तारवादी नीति के कारण उन्होंने तिब्बत हड़पा, अक्साई चीन पर कब्जा जमाया और अब भी अरूणाचल प्रदेश समेत भारत के अनेक हिस्सों पर दावा ठोक रहे हैं। यही नहीं अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी उनका यही रवैया है। चाहे जापान हो, वियतनाम हो, भूटान हो या ताईवान, चीन का शायद ही कोई पड़ोसी होगा जो उसके विस्तारवादी रवैये से परेशान नहीं होगा। अब तो चीन सिर्फ जमीन पर ही नहीं, समुद्री मार्गों पर भी कब्जा जमाने में लग गया है। वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट और साउथ चाइना सी का विवाद इसी का परिणाम है। आज दुनिया भर की ताकतें चीन पर आरोप लगा रही हैं कि वो आर्थिक रूप से कमजोर देशों को ऊंची दरों पर कर्जा देकर उन्हें अपने जाल में फैला रहा है और एक नए किस्म के आर्थिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहा है।

भारत के कम्युनिस्ट और नक्सल कभी चीन के विस्तारवादी राष्ट्रवाद पर उंगली नहीं उठाते, लेकिन देश की राष्ट्रवादी पार्टियों का मजाक उडाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बेहतर हो ये देश को तोड़ने का एजेंडा छोड़ कर अपने प्रेरणा स्रोत और पितृ देश चीन की तरह भारत की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करें।
भारत में जब राष्ट्र के मूलभूत प्रतीकों जैसे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत या तिरंगे के सम्मान की बात उठती है तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। ये इनकी विचारधारा के अनुरूप तो है ही, इससे इन्हें कट्टरवादी मुसलमानांे को पोटने का मौका मिलता है जो मानते हैं कि वो मुसलमान पहले हैं और उनके लिए मुस्लिम बिरादरी भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर हम इस मामले में भारत की तुलना चीन से करें तो पता लगेगा कि वहां कम्युनिस्ट पार्टी नागरिकों को देशभक्ति सिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसी वर्ष सितंबर में नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘नेशनल एनथम लाॅ’ को मंजूरी दी। इसके अनुसार पूरे देश में प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में राष्ट्रगान बजाया और गाया जाना चाहिए। इस कानून के मुताबिक राष्ट्रगान देशभक्ति की शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। चीन का संविधान कहता है कि “चीनियों को अपने देश और लोगों को प्यार करना चाहिए…उन्हें देशभक्ति, सामूहिकता, अंतरराष्ट्रवाद और साम्यवाद की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसके अलावा शिक्षा से जुड़े कानून कहते हैं कि छात्रों को हर स्तर पर देशभक्ति की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षकों से संबंधित कानून के अनुसार देशभक्ति की शिक्षा देना अध्यापकों का कर्तव्य है। स्वयं राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसपर बार बार बल देते रहे हैं। दिसंबर 2015 में शी ने कहा देशभक्ति चीनी राष्ट्र का अध्यात्मिक केंद्र है और देशभक्ति की शिक्षा देश के समूचे शिक्षातंत्र में प्रवाहित होनी चाहिए।

हाल ही में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीें नेशनल कांग्रेस मंे शी जिनपिंग को एक बार फिर राष्ट्रपति चुना गया । जहां भारत के कम्युनिस्ट यहां चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों को समर्थन और बढ़ावा देते हैं, वहीं शी जिनपिंग ने कहा कि ”हम किसी भी ऐसे व्यक्ति को सहन नहीं करेंगे जो देश की एक इंच जमीन भी देश से अलग करने की कोशिश करेगा…..ध्यान रहे खून पानी से ज्यादा गाढ़ा होता है…हमें ऐसे लोगों का सामना करने के लिए देशभक्त ताकतों को मजबूत करना होगा, देशभक्ति का प्रचार करना होगा।“ शी का इशारा ताइवान और हाॅंगकाॅंग की ओर था। ताइवान खुद को अलग देश मानता है। हाॅंगकाॅंग चीन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन वहां लोकतंत्र समर्थक चीनी साम्यवाद का विरोध कर रहे हैं।

भारतीय नेता जब भी देशगौरव या राष्ट्रउत्थान और सशक्तीकरण की बात करते हैं तो सबसे पहले साम्यवादी ताकतें ही उनका विरोध और अपमान करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। इस विषय में इन्हें चीन से सबक लेने की सख्त जरूरत है। 19वीं पार्टी कांग्रेस में शी बहुत शान से बताते हैं कि पिछले पांच साल में चीनी का सकल घरेलू उत्पाद 54 ट्रिलियन डाॅलर से बढ़ कर 80 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच गया। इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रही। इस अवधि में चीन ने सेना के आधुनिकीकरण और सशक्तीकरण के लिए अनेक कदम उठाए। शी ने वर्ष 2050 तक अपनी सेना को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाने का लक्ष्य भी रखा। ध्यान रहे, चीन ने साम्यवादी व्यवस्था होते हुए भी बड़े बड़े पूंजीपतियों को बढ़ावा दिया, लेकिन भारत के कम्युनिस्ट भारत के उद्यमियों को विलेन की तरह चित्रित करने से बाज नहीं आते। चीन अपनी सेना के दम पर दुनिया जीतने का सपना देखता है, लेकिन यहां के साम्यवादी नागरिकों को देश की सेना के खिलाफ भड़काने से बाज नहीं आते।

भारत के कम्युनिस्ट खुद को देश के हजारों वर्ष पुराने इतिहास और संस्कृति से अलग मानते हैं। कहा जाए कि इसे त्याज्य मानते हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्होंने हमेशा ही भारतीय इतिहास को अपने संकीर्ण नजरिए से देखा है जिसके कारण इनके इतिहासकारों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में भयानक विसंगतियां पैदा हो गई हैं। अगर भूले से भी कोई भारतीय अपने इतिहास को स्वर्णिम बता दे या अपने भारतीय होने पर गौरव करे तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसका मान मर्दन करने के लिए बंदूक उठा लेते हैं।

इनके खिलाफ शी जिनपिंग ने अपने भाषण में चीन के 5,000 साल पुराने इतिहास का गर्व से जिक्र किया। वो कहते है -“5,000 साल के इतिहास के साथ हमारे देश ने शानदार सभ्यता रची, दुनिया को महत्वपूर्ण योगदान दिए और हम दुनिया के सबसे महान देशों में से एक बने। लेकिन 1840 के अफीम युद्ध के बाद देश घरेलू विवादों के अंधेरे में डूब गया…….जब से आधुनिक युग शुरू हुआ है देश का कायाकल्प करना और उसे पुरानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना चीनी लोगों का सबसे महान स्वप्न रहा है।“ अगर भारत में कोई भारत को पुरानी बुलंदियों तक पहुंचाने की बात करे तो कम्युनिस्ट तुरंत उसे ‘रिवाइवलिस्ट’ कह कर गाली देना शुरू कर देंगे।

हमारे यहां कम्युनिस्ट संसद पर हमला करने वालों की पैरवी करते हैं, कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानने वाले हुर्रियत के आतंकियों की चैखट पर सजदा करते हैं। ये हमें जबरदस्ती ये पढ़ाने की कोशिश करते हैं कि अलगाववाद की बात करना उदारवाद है और अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है। इनके विपरीत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अलगाववाद तो क्या लोकतंत्र की बात करने वालों तक को सहन नहीं करती। वो लोकतंत्र की मांग करने वालों पर टैंक चलवा देती है (आपको ‘1989 का लोकतंत्र आंदोलन’ और तिअनअनमेन चैक पर छात्रों पर टैंक चलवाना याद होगा), ये चीनी नेल्सन मंडेला कहे जाने वाले ल्यू जिआबो को कैद में डाल देती है। इन्हेें शांति और मानवाधिकारों के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाता है पर चीनी इन्हें जेल में तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर करते हैं। चीन राजनयिक अपने हितों के लिए किस हद तक जा सकते हैं उसे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के प्रति उनके रवैये से समझा जाता है। दलाई लामा दुनिया के जिस भी देश में जाते हैं, उनका दूतावास उसके नेताओं को पहले ही धमकी देने लगता है कि दलाई लामा के स्वागत से उनके संबंध चीन से बिगड़ सकते हैं। जहां चीनी मीडिया हर कूटनीतिक और राजनयिक अभियान में अपने देश का साथ देता है, वहीं यहां के पार्टी कामरेड अपनी सरकार और देश के हितों में पलीता लगाने में ही शान समझते हैं।

भारत के कम्युनिस्ट लंबी चैड़ी बातें तो करते हैं धर्मनिरपेक्षता की, लेकिन बड़ी बेशर्मी से इस्लामिक कट्टरवादियों को प्रश्रय और प्रोत्साहन देते हैं। इनके विपरीत आप उईगुर प्रांत में इस्लामिक कट्टरवादियों और अलगाववादियों के खिलाफ चीनी सरकार का रवैया देखिए। वहां उन्होंने मुसलमानों के रोजा रखने, दाढ़ी बढ़ाने, काले कपड़े पहनने तक पर रोक लगा दी है।

एक बात और, चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया और भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-बड़े पार्टी अधिकारियों तक को जेल की हवा खिला दी। लेकिन हमारे यहां ये खरबों रूपए के घोटालों की आरोपी कांग्रेस और दुनिया की भ्रष्टतम नेताओं में से एक सोनिया गांधी के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं।

अब सोचने की बात ये है कि साम्यवाद तो चीनी भी मानते हैं और भारत के कम्युनिस्ट भी, लेकिन यहां के कम्युनिस्ट अपने देश, उसकी हजारों साल पुरानी संस्कृति, उसके गौरव, उसकी सेना, उसके लोगों की देशभक्ति, वफादारी के खिलाफ क्यों हैं? इन्हें क्यों हिंदुओं से इतनी नफरत है? ये क्यों इस्लामिक कट्टरवादियों और आतंकवादियों के सरपरस्त और खैरख्वाह बने हुए हैं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं – एकः ये अपनी विचारधारा को सर्वोपरी मानते हैं, खुद को अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन का हिस्सा मानते हैं और इनका भारत और उसके इतिहास और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है, इनका लक्ष्य तो किसी भी तरह सत्ता हासिल करना है और इसके लिए भारत विरोधियों को बढ़ावा देना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं। दोः भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट विदेशी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जिनका लक्ष्य देश को तोड़ना और देश में गृहयुद्ध और अराजकता भड़काना है। इनका अपना कोई वजूद नहीं है, ये सिर्फ वैचारिक उपनिवेशवाद और अंधे तरीके से अपने आकाओं का हुकुम बजाने में विश्वास करते हैं।

बात चाहे पहली हो या दूसरी, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि विचारधारा के नाम पर देश को तोड़ने के षडयंत्रों को अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी को देश की अखंडता और एकता से खिलवाड़ का मौका नहीं दिया जा सकता। कम्युनिस्टों का भारत द्रोह का पुराना और वीभत्स इतिहास है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो इन पर प्रतिबंध भी लगाना चाहिए। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं इसे समझाने के लिए हम इनके विघटनकारी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेख समाप्त करेंगे।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का झुकाव साम्यवाद की तरफ था जिसकी भारत ने बड़ी कीमत भी चुकाई, लेकिन स्वयं नेहरू ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को सबक सिखाया था। हैदराबाद का निजाम और उसके रजाकार (सैनिक) भारत में विलय के खिलाफ थे। इसी प्रकार सीपीआई भी भारत में विलय नहीं चाहती थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के बाद निजाम तो भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गया लेकिन सीपाआई के काॅमरेडों ने रजाकारों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी और तेलंगाना के करीब 3,000 गांवों पर कब्जा भी जमा लिया। ये यहां रिपबिल्क आॅफ तेलंगाना स्थापित करना चाहते थे। ये सोचते थे कि जैसे माओ त्से तुंग ने चीन के एक हिस्से येनान पर कब्जे के बाद पूरे देश पर कब्जा कर लिया वैसे ही ये भी तेलंगाना के बाद पूरे भारत को हथिया लेंगे। भारत के खिलाफ इनका गुरिल्ला युद्ध 1951 तक चला। इन्होंने अपनी मुहिम के लिए सोवियत रूस से गुहार लगाई, लेकिन स्टालिन ने इनका साथ नहीं दिया। इसके बाद इनके हौसले पस्त हो गए। ये लोग नेहरू सरकार को ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवादियों का नौकर बताते थे। कहना न होगा नेहरू ने इन्हें अच्छा सबक सिखाया। 1962 में जब कम्युनिस्टों ने बेशर्मी से चीन का साथ दिया तब फिर नेहरू सरकार ने इनके कई नेताओं को सलाखों के पीछे भेजा।

अपनी हरकतों और औंधी सोच की वजह से भारत में कम्युनिस्ट का राजनीतिक प्रभाव धीरे धीरे सीमित हो रहा है लेकिन पत्रकारिता, साहित्य, इतिहास, शिक्षण संस्थानों आदि कई क्षेत्रों में कामरेडों ने कांग्रेस की मदद से गहरी पैठ बना ली है। ये अब भी प्याले में तूफान खड़ा करने और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। अब सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि ये भारत के लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया का नाजायज फायदा न उठा पाएं। सरकार को इनकी हरकतों पर निगाह रखनी चाहिए और जब ये देशद्रोह के आरोपी पाए जाएं, तो तुरंत इन्हें फांसी पर लटकाया जाना चाहिए।

‘Love Jihad’: Akhila alias Hadiya & the safety of our nation’s daughters

When a Muslim boy marries a non-Muslim girl and feigns love to convert her to Islam it’s called ‘Love Jihad’, a similarly common tactic by some Christian cults is ‘Love Bombing’. The Hadiya lawsuit put the spotlight on “love jihad”. Akhila Ashokan, a 24-year-old homeopathic doctor converted to Islam and renamed herself Hadiya Shefin, she married Shafin Jahan even after her family’s dissent. It’s alleged she was recruited and brainwashed by the Islamic State terrorist group and her husband was their pawn terrorist. Akhila’s marriage with Shafin Jahan was declared annulled by lower court after the girl’s father complained that her conversion to Islam wasn’t simply a case of ‘love marriage’ but of ‘love jihad’. Her father, a retired military man Ashokan KM, challenged the validity of the marriage in the high court and got the relationship annulled.

The NIA stated in the Supreme Court that non-Muslim girls are lured, converted and finally sent to Syria to join ISIS, victims are most popularly found on college campus. In September 2012 two girls stated that they had been forced to convert by Muslim youths. The young men were members of a student organization and were subsequently arrested without bail. There are YouTube videos which show rescued girls who share their horrific experience of surviving Love Jihad, most of them Keralites. Times Now has also released “love jihad” tapes. Many similar situations have been reported by women.

One example is of Nimisha Fathima, which is widely shared on the internet. She married into a family of Christian converted Muslims, her husband, husband’s brother and his wife have all fled the country with Nimisha. Nimisha’s Mother has requested an investigation into Love Jihad as the last communication she had with her daughter was in 2016 June when Nimisha was eight months pregnant. It’s believed that her daughter may be in a remote location of Afghanistan in an attempt to join ISIS. Similar reports of Love Jihad activities have emerged from Pakistan and the United Kingdom.

Love jihad isn’t new, the term has been newly conceptualized but the process has been underway for centuries. Now the rewards for a successful conversion for the purpose of jihad have changed. The most important reasons that conversion to Islam are sought after are the following:

1. To increase the Muslim population and spread the word of Islam globally

2. To deploy procreated children in terrorist organizations

3. Financial gain from Muslim organizations for successful conversions

4. Creating pornographic films and marketing them thereby threatening the victims to remain silent, as well as selling those films in Gulf countries

5. The victims are transported and sold to Gulf countries as sex-slaves. The price of virgin girls is extremely high in these slave-markets

Prize money is involved in Gulf countries. Non-Muslims are being converted on mass scale and given money for conversion, especially in the Philippines. A few decades ago a large sum for the same was provided to converters, now the prize money amount is reduced. But for a poor person it’s good enough. In India the reason for conversion isn’t money but the belief that there will be a place in Heaven reserved for their ‘good deed’.

When it comes down to the infamous Hadiya case, the Supreme Court has observed that there is no law which states that a girl cannot marry a criminal. But the Akhila’s case isn’t just about marrying a criminal committed of a petty crime, it’s about ‘psychological hijacking’, it’s about terrorism, and it’s a question of our national security. Even though we live in a modern society and it is the era of recognizing human rights, have we forgotten about human protection in the process? There are susceptible, young and innocent girls that are being brainwashed by terrorist organizations. They are marrying for love while their criminal counterparts are marrying to convert more people into jihad. In this case if Akhila’s father is able to foresee said difficulties and shows concern for her only child is he to be vilified?

Akhila’s guardian Zainaba stated that the marriage was arranged, that Akhila and her husband met a month prior to the wedding. Is it not then conspicuous that Akhila is more willing to live with a husband whom she has barely met, going against her father’s wishes of taking a rational decision towards marriage, and is fighting for someone she doesn’t know. What pushed a girl like Akhila alias Hadiya to take the decision to be under Zainaba’s guardianship and be married within a month? Who had told her that such is a necessity to live a wholesome life? It is not

difficult to see that the girl was not able to make a conscientious choice regarding her marriage to her spouse, and has been influenced to take this step as well, if such is the case. Until Shafin Jahan’s connections to Islamic terrorist organizations are cleared by intelligence personnel the safety of Akhila cannot be guaranteed. The safety of the daughters of our nation is primary, and it’s time to educate our daughters about the possibilities of entrapment.