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“पाकिस्तान पर कार्रवाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे अमेरिका, सभी पाकिस्तानियों को वापस भेजे” in Punjab Kesari

पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिकी राष्टंपति डोनाल्ड टंप द्वारा दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के बाद समय का पहिया तेजी से घूमा। शुरू में तो पाकिस्तानी विश्लेषक टंप को सिरफिरा और बिगड़ैल बता कर उसकी नई नीति का मजाक उडा़ते रह।े हाल ही में अमेिरका से लाटै े पाक सने टे की सरु क्षा समिति के प्रमुख मुशाहिद हुसैन स ̧यद ने तो ये तक कहा कि जब कोई अमेरिका में ही टंप को गंभीरता से नहीं लेता, तो पाकिस्तान को भी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। लेकिन अमेरिका द्वारा पहले 255 मिलियन डाॅलर आरै फिर कलु 1.1 बिलियन डाॅलर की सरु क्षा सहायता बदं करने के एलान के बाद पाकिस्तान को अहसास हो गया कि मामला बेहद गंभीर हो चुका है। अभी तो सुरक्षा सहायता बंद हुई है, अगर ऐसे ही चलता रहा तो संभव है मानवीय और विकास की मद में दी जा रही सहायता राशी भी रोक दी जाए।
अमेरिकी संसद मंे बलूचिस्तान को लेकर पहले ही कुछ बिल लंबित हैं, अब रिपब्लिकन सेनेटर रंैड पाॅल ने कहा है कि वो पाकिस्तान को हर तरह की सहायता बंद करने के संबंध में जल्दी ही विधेयक लाएंगे। राष्टंपति टंप ने इसे ‘गुड आइडिया’ कह कर इसका स्वागत भी किया है। इस बीच वाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के सामने सभी विकल्प खुले हैं। लेकिन बड़ा सवाल अब ये है कि क्या टंप प्रशासन ‘आॅक्टोपस’ 1⁄4सेना और हथियार उद्योग की लाॅबी1⁄2 के भीतराघातों को निरस्त कर पाएंगे जिसका पाकिस्तानी सेना और संभ्रांत वर्ग से गहरा और पुराना रिश्ता ह?ै
इस रिश्ते की एक बानगी हैं पाकिस्तानी विेदश मंत्री ख्वाजा आसिफ जिन्होंने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ है। इन्होंने अमेरिका को ‘यार मार’ तक बता दिया है। ये अमेरिका को सरेआम ललकार रहे हैं और उसकी ईंट से ईंट बजाने की धमकी तक दे रहे हैं। लेकिन विश्लेषक उनकी धमकियों पर ही सवाल उठा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके बच्चों का उसी अमेरिका में बसे होना जिसकी वो ईंट से ईंट बजाना चाहते हैं। ख्वाजा आसिफ की तीन लड़कियां और एक लड़का है। उनकी सबसे बड़ी बेटी अतिका सफदर ख्वाजा स्वतंत्र लेखक हैं और न्यूयाॅर्क में रहती हैं। उनकी दूसरी लड़की अमीरा सफदर ख्वाजा ने विदेश से पत्रकारिता की पढ़ाई की है जबकि उनकी सबसे छोटी बेटी फातिमा की शादी हाल ही मंे अमेि रकी पाकिस्तानी व्यापारी सल्ु तान खान के बटे  समीर से र्हइु हैं। फातिमा की शादी हालांकि लाहौर में हुई, लेकिन सगाई अमेरिका में ही हुई थी। उनका लड़का ख्वाजा मुहम्मद असद भी अमेरिका में बसा हुआ है।
जाहिर है पाकिस्तानी नते ा आरै जनरल इस्लाम आरै दश्े ाभक्ति के नाम पर आम नागरिक के साथ दोगला खेल खेलते हैं। एक तरफ तो वो लोगांे को उकसाते हैं कि वो अपने देश की खातिर सूली पर चढ़ने के लिए तैयार रहें, वहीं दूसरी ओर उनके खुद के बच्चे विदेशों में पढ़ाई करते हैं और वहां नौकरियां और व्यापार करते हैं। वो पाकिस्तान मंे खुला भ्रष्टाचार करते हैं और अपनी काली कमाई का विदेशों में निवेश करते हैं। अगर पाकिस्तान युद्ध मंे तबाह होता है तो फर्क आम पाकिस्तानी को ही पड़ेगा, ये तो विदेश भाग जाएंगे। इसलिए अगर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई करनी है तो तीन काम पहले करने होंगे – 1. अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तान की सेना और नेताआंे के साथ उसके रिश्तांे की रीढ़ तोड़नी होगी, 2. अमेरिका और उसके सहयोगी नैटो देशों में बसे जनरलों और नेताओं के बच्चों और अन्य रिश्तेदारांे को वापस भेजना होगा और 3. विदेशों में निवेशित इनकी काली कमाई को जब्त करना होगा। वाइट हाउस के अधिकारी पाकिस्तान के खिलाफ हर विकल्प ‘खुला’ होने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अगर पाकिस्तानी सेना और उसके मोहरे नेताआंे को घुटने पर लाना है, तो सबसे पहले इन विकल्पांे पर विचार करना
चाहिए।
अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तानी सेना और राजनीति के संबंध कितने गहरे हैं उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के लगभग हर बड़े जनरल और नेता के बच्चे/रिश्तेदार अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशांे में बसे हैं। जनता को देशभक्ति के नाम पर बेवकूफ बनाने वालांे में सबसे ऊपर नाम है पूर्व राष्टंपति और तानाशाह जनरल परवजे मश्ु ारर्फ का जो भारत विराध्े ाी आरै आतकं वाद समर्थक बयानों के लिए हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। ये खुद को देश का सबसे बड़ा देशभक्त मानते हैं और हाल ही में इन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि सरकार को विदेशों में बसे देश के दुश्मनों को मरवा देना चाहिए। इनपर बेनजीर भुट्टो के कत्ल का आरोप भी है। इनकी मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण हजारों पाकिस्तानियों ने जान गंवाई, लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि ये पाकी जनरल अरबपति भी है। जुलाई 2016 में पाकिस्तानी गृह मंत्रालय ने एक अदालती मामले के सिलसिले में बताया कि मुशरर्फ के पास देश में आठ संपत्तियां और नौ बंैक खाते हैं जिनकी कीमत अरबांे में हैं। ये तो सिर्फ पाकिस्तानी संपत्तियां हैं, इसके अलावा इनके पास इंग्लंैड, अमेरिका, दुबई, रियाद आदि मंे भी अनेक संपत्तियां हैं। इनकी पत्नी और बच्चों के पास भी बेशुमार दौलत है। इन्होंने देशभक्ति भले ही जसै ी भी की हो पर दश्े ा को भी भरपरू लटू ा। ध्यान रहे इनका बटे ा बिलाल मश्ु ारर्फ अमेि रकी नागरिक है। इनका बड़ा भाई डाॅक्टर जावेद मुशरर्फ अर्थशास्त्री है जो रोम में बसा है। इनका छोटा भाई नावेद मुशरर्फ एनिस्थोलाॅजिस्ट है जो अमेरिका में बसा है।
पाकिस्तान में सेना के जनरलों के पास लंबी चैड़ी जमीनें होना कोई अपवाद नहीं है। असल में वहां सेना के जनरलों को सेवानिवृत्ति पर 10 एकड़ जमीन दी जाती है और सेना प्रमुख को इसके अलावा 40 एकड़ अतिरिक्त जमीन मिलती है। वर्तमान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से पहले सेना प्रमुख रहे राहिल शरीफ को को भी 50 एकड़ जमीन दी गई जिसपर काफी विवाद भी हुआ। ये मामला तब शांत हुआ जब सेना ने इस विषय में अपने नीति-नियमों का सार्वजनिक तौर पर खुलासा किया।
लेकिन पाकिस्तान में सिर्फ जनरलों के पास ही लंबी-चैड़ी जायदादें नहीं हैं। वहां के राजनेता भी अपनी दौलत और विलासिता पूर्ण जीवन के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उनकी अनेक स्टील, चीनी और पेपर मिलंे हैं। उनके बेटे हसन और हुसैन इंग्लंैड में बसे हैं और वहीं से पारिवारिक व्यापार संभालते हैं। पनामा लिस्ट में नाम आने के बाद, पिछले वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अब वो और उनके परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार, हवाला, अघोषित संपत्तियों आदि के कई मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। नवाज शरीफ के समधि इसहाक डार दश्े ा के वित्त मत्रं ी हैं आरै उनपर भी भष््र टाचार के अनेक आरोप हैं। इसहाक डार के बड़े लड़के की शादी नवाज शरीफ की बड़ी बेटी अस्मा नवाज से वर्ष 2004 में जद्दे ाह, सउदी अरब में हइु र्। कहा जाता है कि मकु दमांे से बचने के लिए इसहाक डार आजकल लंदन के एक अस्पताल में भर्ती हैं और वहीं से वित्त मंत्रालय चला रहे हैं।
भष््र टाचार पर सिर्फ पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ही एकाधिकार नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल पाकिस्तान पीपल्स पार्टी भी कुछ कम नहीं है। बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद इसके प्रमुख बने उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट कहा जाता था। यानी वो हर सरकारी ठेके में दस प्रतिशत कमीशन लेते थ।े पाकिस्तानी के जानमे ाने जमीदं ार जरदारी की इग्ं लडंै , अमेि रका मंे ही नहीं खाड़ी के देशों में भी अकूत संपत्ति हैं।
जाहिर है अमेि रका को पाकिस्तान के खिलाफ र्काइे भी बडा़ कदम उठाने से पहले ये सुि नश्चत कर लेना चाहिए कि उसका उसका निशान कौन बनेगा और उसका अपेक्षित परिणाम मिलेगा कि नहीं। अगर अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवादियांे की तलाश में अंधे डंोन हमले करता है तो इससे आम पाकिस्तानी को जान-माल की भारी तबाही हागे ी, लेि कन असली दाष्े ाी यानी पाकिस्तानी जनरल आरै उनके इशारे पर सरकार चलाने वाले अमीर नेता फिर भी बचे रहेंगे। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को राह पर लाना है तो इन दोनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। वैसे भी आतंकवादी तो सिर्फ सेना के माहे रे हैं, उन्हें समाप्त करके कछु हासिल नहीं हागे ा। कछु दिन बाद सैि नक जनरल कछु आरै माहे रे खड़े कर देंगे।
अमेरिका को अगर अफगानिस्तान में सफलता हासिल करनी है तो पाकिस्तानी सेना की अफगान नीति को बदलवाना हागे। लेि कन पाकी सने  अपनी नीति बदलने की जगह अमेरिका से दो सौदे करना चाहती है – 1. अमेरिका अफगानिस्तान में भारत को बढ़ावा देना बंद करे और वहां उसके ‘स्टंेटेजिक इंटंेस्ट्स’ को मान्यता दे और 2. उसे भारत में खुला खेल खेलने का खुला मौका दे। अगर अमेरिका, पाकिस्तानी सेना की ये बातंे मानता है तो ठीक है, वरना पाकिस्तान न तो अफगानिस्तान में अपने आतंकियांे पर लगाम लगाएगा और न ही उसे अफगानिस्तान तक सैनिक सहायता पहंुचाने के लिए रास्ता देगा। पाकिस्तान ने अब अमेरिका को ये धमकी देना भी शुरू कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके साथ ऐसे ही सख्ती करता रहा तो वो चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर का न सिर्फ चीनी सहायता से सैन्यीकरण कर देगा, बल्कि ग्वादर पोर्ट पर भी चीन का सैनिक अड्डा बनवा देगा।
स्पष्ट है पाकिस्तानी उन्हीं आतंकवादियों को सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अमेरिका खत्म करना चाहता हैं। ये एक आरे तो अमेि रका में अपने बच्चांे को पढा़ ना आरै बसाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उसी पर आंख तरेर रहे हैं। ऐसे में अब अमेरिका को चाहिए कि वो पाकिस्तान की सफाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे और अपने यहां बसे हर पाकिस्तानी को वापस भजे  आरै अपने नटै  सहयाेि गयांे पर भी इसके लिए दबाव डाल।े जब तक पाकी जनरलांे आरै सभ्ं ाा्र तं वर्ग के आर्थिक और व्यक्तिगत हितों पर चोट नहीं होगी, आतंकवाद के प्रति उनका रवैया नहीं बदलेगा।

“इस्लामिक उम्माह की मरीचिका” in Punjab Kesari

 

भारत में इस्लामिक कट्टरवादियों का मानना रहा है कि उनके लिए देश बाद में और इस्लाम पहले है। इसलिए किसी भी गैरइस्लामिक व्यक्ति से पहले उनका फर्ज इस्लामिक बिरादरी या इस्लामिक उम्माह के प्रति है। ये सोच कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान (1919 – 1922) भी देश में इस्लामी उम्माह के नाम पर खिलाफत आंदोलन चलाया गया। शौकत अली, मुहम्मद अली और अबुल कलाम अजाद द्वारा चलाए गए इस आंदोलन का मकसद था ब्रिटिश साम्राज्य पर तुर्की में खिलाफत (खलीफा का शासन) न खत्म करने के लिए दबाव डालना। दुर्भाग्य की बात ये है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया क्योंकि इसकी एवज में उन्हें असहयोग आंदोलन में मुस्लिम नेताओं का साथ मिला।

बहरहाल तुर्की में खलीफा के पतन और आधुनिक सरकार के गठन के साथ भारत का खिलाफत आंदोलन तो अपनी मौत मर गया, लेकिन इस्लामिक बिरादरी को अलग मानने का ये विचार किसी न किसी रूप में लगातार जारी रहा। आगे चलकर भारत के विभाजन में भी इसका अहम हाथ रहा। आश्चर्य नहीं कि आजकल पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है उसमें पाकिस्तानी अपनी पहचान अपनी धरती में ढूंढने की जगह सउदी अरब में ढूंढ रहे हैं। उधर आजाद भारत में भी जब संविधान बनाया जाने लगा तो उसमें भी मुसलमानों को उनकी ‘अलग पहचान’ के नाम पर आधुनिक मूल्यों और कानूनों के तहत लाने की कोशिश नहीं की गई।

अस्सी के दशक में भारत में इस्लामिक उम्माह के जिन्न ने एक बार फिर सिर उठाया जब विदेश सेवा के अफसर से नेता बने सय्यद शहाबुद्दीन ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को ‘इंडियन मुस्लिम’ कहना गलत है, उन्हें तो ‘मुस्लिम इंडियन’ कहना चाहिए क्योंकि उनके लिए अपनी धार्मिक पहचान और इस्लामिक बिरादरी भारत से पहले है। शहाबुद्दीन ने बढ़-चढ़ कर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय अदालतें इस्लामिक कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकतीं।

आपको ध्यान होगा कि तीन तलाक मामले में गैरसरकारी संगठन आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने भी सबसे पहले यही कहा था कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकता। तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा में विधेयक पारित होने के बावजूद इस्लामिक कट्टरवादी अपने रूख पर कायम हैं। इनके लिए उन अधिकारों का कोई मतलब नहीं है जो भारतीय संविधान ने भारतीय नागरिक होने के नाते मुस्लिम महिलाओं को दिए हैं।

‘भारत के अस्तित्व’ को मान्यता न देने और इस्लामिक उम्माह की सर्वोच्चता का ये विकृत विचार अब भी जारी है। इंटरनेट जैसे विकसित संचार माध्यमों के साथ ही यह और बढ़ गया है। अगर आजादी से पहले खिलाफत आंदोलन चलाया गया तो आज हम देखते हैं कि अनेक कट्टरवादी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया में इस्लामिक खिलाफत का झंडाबरदार है। आश्चर्य नहीं कि ये संगठन भोले भाले भारतीयों को फुसला कर उन्हें इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में ‘जिहाद’ के लिए भेज रहे हैं।

भारत की प्रमुख आतंकवाद विरोधी संस्था नेशनल इनवेस्टीगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने हाल ही में भारत से आईएसआईएस में शामिल होने गए लोगों की सूची जारी की है। आश्चर्य नहीं कि इसमें सबसे ज्यादा लोग केरल से हैं जहां यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकारों ने ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर लंबे अर्से तक पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे अतिवादी संगठनों को प्रश्रय दिया।

भारत में कट्टरवादी संगठन ‘इस्लामिक उम्माह’ के नाम पर अर्से से आम मुसलमान को ठग रहे हैं। लेकिन एक बार तो इसकी जांच परख होनी ही चाहिए कि क्या दुनिया में वास्तव में कोई इस्लामिक उम्माह या बिरादरी जैसी कोई चीज है? शुरूआत करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान से जिसे इस्लाम और ‘टू नेशन थ्योरी’ के नाम पर बनाया गया और जिसे आज दुनिया में आतंकवाद का सबसे घिनौना और क्रूर गढ़ माना जाता है। वहां अंदरूनी हालात आज विस्फोटक हैं, एक मत के मुसलमान दूसरे मत के मुसलमानों को मार रहे हैं। याद रहे पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली भी मुसलमान थे जिनपर पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबी फौजियों ने अकथनीय जुल्म ढाए। इसका नतीजा अलग बांग्लादेश के रूप में सामने आया। सोचने की बात है कि अगर सारे मुसलमान एक बिरादरी होते तो बांग्लादेश अलग क्यों होता? पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों का नरसंहार करने वाली पाकी सेना अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। एक तरफ तो ये अपने आतंकियों के जरिए कश्मीर में हिंसा फैला रही है तो दूसरी तरफ इस्लामी उम्माह का वास्ता देकर फिलिस्तीन के नाम पर उन्माद भड़का रही है। हाल ही में आतंकी हाफिज सईद की रैली में फिलिस्तीनी राजदूत वलीद अबू अली के शामिल होने पर भारत ने सही एतराज जताया था। इस्लामी उम्माह की आड़ में आतंकियों को समर्थन कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?

पाकिस्तान इस्लामिक देश है। लेकिन पड़ोसी मुस्लिम देशों अफगानिस्तान और ईरान से इसका छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। अफगानिस्तान में आए दिन पाकिस्तानी आतंकवादी विस्फोट करते हैं जिनमें निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। इस्लामिक देश आपस में क्या सिर फुटव्वल कर रहे हैं इसपर बात करने से पहले ये बता दें कि दुनिया में इनका एक संगठन भी है – आॅर्गनाइजेशन आॅफ इस्लामिक काॅओपरेशन (ओआईसी) जिसके 57 सदस्य हैं। म्यांमार में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं के बाद जब लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को घर छोड़ना पड़ा, तब ओआईसी ने गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं किया। क्या रोहिंग्या मुसलमान कम मुसलमान थे जो दूसरे मुस्लिम देशों ने उनकी मदद नहीं की? वैसे भी अगर वास्तव में मुस्लिम उम्माह होती तो दुनिया में मुसलमानों के इतने देश ही क्यों होते?

अब नजर डालते हैं अन्य इस्लामिक देशों में चल रही उठा-पटक पर। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज दुनिया में अगर सबसे विस्फोटक स्थिति किसी की है तो वो इस्लामिक देशों की ही है। सबसे पहले बात मुसलमानों के सबसे प्रिय देश सउदी अरब की जहां उनके सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मौजूद हैं। सुन्नी बहुल सउदी अरब, शिया बहुल ईरान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। सउदी अरब को जहां शियाओं की भनक लगती है, वो वहां बदला लेने पहुंच जाता है। पड़ोसी देश यमन में भी उसने इसी वजह से 2015 में हस्तक्षेप किया। सउदी अरब ने कथित रूप से ईरान समर्थित शिया होउती विद्रोहियों को कुचलने और सुन्नी शासकों का समर्थन करने के लिए यमन में दखल दिया, लेकिन मामला हल नहीं हुआ, वहां लड़ाई अब भी जारी है। जून, 2017 में सउदी अरब के नेतृत्व में छह देशों ने कतर के बहिष्कार की घोषणा की क्योंकि कतर मिस्र के संगठन इस्लामिक ब्रदरहुड का समर्थन कर रहा था जिसे मिस्र आतंकवादी संगठन मानता है। यही नहीं सउदी अरब को इस बात से भी सख्त एतराज है कि कतर ईरान से व्यापार क्यों कर रहा है।

ध्यान रहे कुछ समय पूर्व सउदी अरब ने ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिजम कोआलिशन’ बनाया जिसका प्रमुख पाकिस्तान का पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ है। इस संगठन में 41 देश हैं और इसका मकसद दुनिया से आतंकवाद को उखाड़ फेंकना है। ये कहीं न कहीं हास्यास्पद लगता है क्योंकि दुनिया भर में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम फैलाने में सबसे बड़ा हाथ सउदी अरब का रहा है और आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की क्या भूमिका है, ये बताने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। सउदी अरब ने कागजी स्तर पर ये संगठन बना तो लिया है लेकिन इसे जमीन पर उतारना अभी बाकी है। बहरहाल राहिल शरीफ को इसका प्रमुख बनाए जाने से ईरान, पाकिस्तान से और कुपित हो गया है। ईरान का मानना है कि ‘आतंकवाद’ तो सिर्फ बहाना है, ये संगठन तो असल में उसे नीचा दिखाने के लिए बनाया गया है।

चाहे सउदी अरब हो या यमन, मिस्र, सीरिया, लीबिया, इराक या ईरान, पूरे इस्लामिक जगत में मारकाट मची हुई है। उधर सउदी अरब में युवा मोहम्मद बिन सलमान को युवराज (क्राउन प्रिंस) घोषित करने के बाद देश के अंदर भी कोहराम मचा हुआ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर उन्होंने अनेक राजकुमारों और बड़े व्यापारियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है। सलमान ने हाल ही में जैसे लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को बंदूक की नोक पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उससे भी सिर्फ खाड़ी देशों में ही नहीं, पश्चिम देशों में भी चिंता की लहर दौड़ गई। हरीरी ने अपने कथित इस्तीफे में कहा था कि वो लेबनान में ईरान समर्थित हिजबोल्ला के बढ़ते प्रभाव के कारण इस्तीफा दे रहे हैं। ध्यान रहे उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी 2005 में कार धमाके में मारे गए थे जिसके लिए हिजबोल्ला पर शक किया गया था।

वर्तमान में इस्लामिक दुनिया में मोटे तौर पर दो गुट नजर आते हैं। एक तो सउदी अरब के नेतृत्व वाला सुन्नी गुट जिसे अमेरिका समर्थन दे रहा है तो दूसरी तरफ शिया गुट है जिसे रूस का समर्थन हासिल है। इस्लामिक देशों के बढ़ते आपसी मतभेदों के बीच आईएसआईएस का उल्लेख करना आवश्यक है जिसने इराक और सीरिया के बड़े भूभाग पर कब्जा कर खिलाफत स्थापित करने की घोषण कर दी। पहले तो अपने-अपने स्वाथों के हिसाब से इस्लामिक देश इसका इस्तेमाल करते रहे और अंदर ही अंदर इसे मदद देते रहे पर जब इसके अत्याचारों और क्रूरताओं के वीभत्स किस्से सामने आने लगे तो महाशक्तियों को होश आया और इसकी सत्ता को उखाड़ फेंका गया। इसकी सत्ता भले ही समाप्त हो गई हो, पर इसके हजारों आतंकवादी अब भी जिंदा हैं और कुछ तो अफगानिस्तान में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान में आईएसआईएस नेटवर्क वास्तव में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का खेल है। अफगानिस्तान का जिक्र आया है तो वहां तालिबान और मुल्ला उमर की सरकार भी आपको याद होगी जिसे अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड संेटर पर अल कायदा के हमले के बाद उखाड़ फेंका।

दुनिया में इस्लामिक देशों में जो भीषण युद्ध और सिर फुटव्वल है, उसे देख कर सहज ही सवाल उठता है कि भारत में इस्लामिक कट्टरवादी किस ‘उम्माह’ की बात कर रहे हैं? जब दुनिया में ऐसी कोई चीज है ही नहीं तो ये भारतीय मुसलमानों को क्यों भरमा रहे हैं? आखिर इनका मकसद क्या है? ये क्यों नहीं चाहते कि भारतीय मुसलमान अपनी मिट्टी से जुड़ें, देश का संविधान मानें और दकियानूसी सोच छोड़ आधुनिकता और विकास की राह पर आगे बढ़ें? जाहिर है, इसके पीछे सिर्फ राजनीति ही नहीं, अनेक अंतरराष्ट्री षडयंत्र भी हैं।

“कब तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करेंगी ममता बनर्जी?” in Punjab Kesari

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में लंबे अर्से तक नंबर दो स्थान पर रहे पार्टी के मुख्य रणनीतिकार मुकुल राय हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। इसे लेकर काफी टीका टिप्पणी हुई। ये मामला लंबे समय तक ट्वीटर पर ट्रेंड भी करता रहा। ये सही है कि उनका व्यक्तित्व टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी जैसा करिश्माई नहीं है, लेकिन ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ममता की सफलता में उनका बड़ा हाथ रहा है और उनकी सोच को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। कुछ लोग मानते हैं कि उनका भाजपा में शामिल होना उतना ही ऐतिहासिक है जितना ममता बनर्जी का कांग्रेस से अलग होकर 1997 में टीएमसी बनाना। लेकिन क्या टीएमसी का ये भेदी ममता की लंका ढहा पाएगा? ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन भाजपा को उम्मीद अवश्य है कि जैसे ममता ने हत्यारे कम्युनिस्टों की सत्ता की दौड़ पर लगाम लगाई, वैसे ही मुकुल भी ममता के इस्लामिक सांप्रदायिक शासन पर लगाम लगाएंगे।

भाजपा की उम्मीद संभवतः उत्तर प्रदेश और बिहार के अनुभवों पर टिकी है जहां उसने मुसलमान-यादव की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी सांप्रदायिक पार्टियों पर लगाम लगाई। भाजपा के 11 प्रतिशत वोट के मुकाबले, 45 प्रतिशत वोट के साथ टीएमसी इस समय निःसंदेह अजेय दिखाई देती है, लेकिन गत वर्षों में जैसे भाजपा ने कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को दरकिनार किया है, उससे यह स्पष्ट हो चुका है कि राज्य में वो अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है और सही रणनीतियों के साथ वह अवश्य ही आगे बढ़ेगी, भले ही इसमें कुछ समय लगे।

बेशर्मी की हद तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करने वाली ममता समझती हैं कि जब तक मुसलमान उनके साथ हैं, उन्हें कोई हरा नहीं सकता। लेकिन लंबे अर्से में उनकी यही इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति उनका वाटरलू भी साबित हो सकती है। लगभग 32 साल के कम्युनिस्ट शासन के बाद जब ममता ने कमान संभाली तो लगा था कि राज्य राजनीतिक हत्याओं, अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर आएगा, लेकिन अफसोस, ऐसा हो न सका। वर्ष 2011 के बाद 2016 में ममता दोबारा मुख्यमंत्री भी चुनी गईं, लेकिन हालात बद से बदतर होते गए।

ममता बनर्जी का सिरफिरापन, सनकीपन, देश से अलग खुद को बंगाल की महारानी समझने का भ्रम, सब अपनी जगह, लेकिन सबसे अधिक जो खतरनाक है, वो है उनकी अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता। कई बार तो केंद्र और भाजपा के विरोध में ममता इतनी अंधी हो जाती हैं कि संवैधानिक मर्यादाओं को भी पार कर जाती हैं। जब वो ये दिखाने की कोशिश करती हैं कि ‘इस्लामिक पश्चिम बंगाल सरकार’, ‘हिंदू केंद्र सरकार’ का बड़ी दिलेरी से सामना कर रही है, तो स्थिति विस्फोटक हो जाती है। ममता की अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और मानसिक दिवालिएपन पर दया आती है, लेकिन चिंता भी होती है कि उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी महान विभूतियों की जन्म और कर्मभूमि को आज कैसे नरक में बदल दिया है।

ममता की इस अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता की वजह आखिर क्या है। इसे समझने के लिए बंगाल की जनसंख्यकी (डेमोग्राफी) और राजनीतिक इतिहास को समझना होगा। वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार वहां करीब 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। राजधानी कोलकाता में ही उनकी आबादी करीब 21 प्रतिशत है। बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर देश में सर्वाधिक है। देश में अगर मुस्लिम आबादी 0.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है तो बंगाल में ये दर 1.77 प्रतिशत की दर से। इसके मुकाबले देश भर में जहां हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 0.7 प्रतिशत गिरी है, वहीं बंगाल में यह 1.94 प्रतिशत की दर से कम हुई है।

बंगाल के तीन जिलों में तो मुस्लिम आबादी, हिंदू आबादी से आगे बढ़ गई है। ये जिले हैं मुर्शिदाबाद (हिंदू – 23 लाख, मुस्लिम 47 लाख), मालदा (हिंदू – 19 लाख, मुस्लिम – 20 लाख) और नाॅर्थ दिनाजपुर (हिंदू – 14 लाख, मुस्लिम – 15 लाख)। भारत में मुस्लिम आबादी के घनत्व के हिसाब से अगर अनंतनाग जिला (जम्मू एवं कश्मीर) सबसे आगे है, तो हैड काउंट के हिसाब से मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम) और कांग्रेस जैसे इस्लामिक दल भले ही मुस्लिम जनसख्या विस्फोट के लिए बंगाल से सटे बिहार के मुस्लिम बहुल जिलों – पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार को जिम्मेदार ठहराते हों, लेकिन हकीकत तो यही है कि बंगाल में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठिएं आए हैं जिन्हें इस्लामिक दलों ने अपनी सांप्रदायिक राजनीति के कारण राज्य में बसने में सहायता की है।
लेकिन परेशानी मुस्लिम आबादी से नहीं है। परेशानी मुसलमानों के नाम पर की जाने वाली विघटनकारी राजनीति से है जिसे कहीं न कहीं मुसलमान (विशेषकर पुरूष) समर्थन और बढ़ावा भी देते हैं। इस्लामिक पहचान के नाम पर की जाने वाली ये राजनीति आजादी के पहले से चली आ रही है। पूर्वी बंगाल के पूर्वी पाकिस्तान बनने में भी इसका बड़ा हाथ रहा। अगर हम इतिहास के पन्ने खंगालें तो हमें पता लगेगा कि बंगाल वही जगह है जहां मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों और कांग्रेस को अपना दम दिखाने के लिए 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन’ का एलान किया जिसके बाद हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों में हजारों लोग मारे गए। ध्यान रहे मुर्शिदाबाद में आजादी के दो दिन बाद तिरंगा फहराया गया क्योंकि वहां के मुसलमानों ने ये मान लिया था कि उन्हें तो पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होना है।

इस्लामिक राजनीति के कुछ खास लक्षण हैं – मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काना, उनकी इस भावना को तुष्ट करना कि वो भारतीय बाद में हैं और मुसलमान पहले, उन्हें भारत के हितों से पहले मुस्लिम उम्मा ं(बिरादरी) के हित देखने चाहिए और ऐसा करना जायज भी है, उन्हें मनमाने ढंग से भारतीय संविधान की पक्षपाती व्याख्या करने का हक है, उन्हें कबीलाई सोच वाले और महिला विरोधी पर्सनल लाॅ का पालन करने का पूरा हक है, अगर कोई मुसलमान आतंकी घटनाओं में पकड़ा जाए, तब भी उसे छुड़ा लिया जाना चाहिए क्योंक ऐसा वो इस्लाम के नाम पर कर रहा है, मुसलमान का भारत से कोई कोई लेना देना नहीं है, ये तो उसका दुर्भाग्य है कि वो सउदी अरब में पैदा न हो कर यहां पैदा हुआ है। ये संभवतः इसी राजनीति का परिणाम है कि भारत में ज्यादातर मुस्लिम अलग बस्तियों में रहना पसंद करते हैं जहां दूसरे धर्म के लोगों का प्रवेश तक अक्सर वर्जित होता है।

दुखद बात तो ये है कि पाकिस्तान बनने के बावजूद, कांग्रेस जैसी इस्लामिक पार्टियों ने बांग्ला मुसलमानों में ऐसी भावनाओं को भड़काया और बढ़ाया, इन्हें जायज ठहराया। असल बात तो ये है कि उन्हें भारतीय बनना सिखाया ही नहीं गया। न ही इस बात की कभी उनसे अपेक्षा ही की गई। उन्हें ये कहने तक की हिम्मत नहीं की गई कि वो राष्ट्रगान के समय खड़े हों या राष्ट्रगीत का सम्मान करें। कांग्रेस के सत्ताच्युत होने के बाद कम्युनिस्टों ने इस राष्ट्रविरोधी राजनीति को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर आगे बढ़ाया। लेकिन चिंता की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद के इस दौर में टीएमसीे हालात सुधारने की जगह इस्लामिक सांप्रदायिकता और अलगाववाद को नई सीमाओं तक ले जा रही हैं। ममता राज्य में 40 बड़े और सैकड़ों छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। उनकी पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं है। कानून व्यवस्था घास चरने चली गई है। मुस्लिम तुष्टिकरण की हालत ये है कि अगर दुर्गा पूजा और मोहर्रम एक साथ पड़ जाएं तो ममता विसर्जन का समय और दिन बदलने का आदेश दे देती है। अपने त्यौहार इज्जत और हक से मनाने के लिए हिंदुओं को बार-बार अदालत जाना पड़ता है। अदालत भी बार-बार ममता के आदेशों को अवैध बताती है, पर ममता है कि मानती ही नहीं।

ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण की एक और मिसाल है मौलाना नूर-उर-रहमान बरकती जिसे उन्होंने अपना धर्म भाई बनाया हुआ है। ये हजरत लंबे समय तक कोलकाता की मशहुर टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम रहे। ये वही मौलाना है जिसने नोटबंदी का विरोध करते हुए 8 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेहद शर्मनाक फतवा जारी किया। इसने टीएमसी सांसद इदरीस अली के साथ एक संवाददाता सम्मेलन में एलान किया कि वो उस व्यक्ति को 25 लाख रूपए का इनाम देगा जो प्रधानमंत्री का सिर मुड़ा कर और दाढ़ी साफ कर उनके मुंह पर कालिख पोतेगा। जब केंद्र सरकार ने लाल बत्ती पर रोक लगाने का आदेश जारी किया तो इसने उसे भी मानने से इनकार कर दिया। इसने कहा कि मैं तो सिर्फ राज्य सरकार का आदेश मानता हूं जिसने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। बरकती ने अनेक राष्ट्रविरोधी बयान भी दिए। इसके शर्मनाक और अराजक बयानों से परेशान होकर 17 मई 2017 को वक्फ ट्रस्टी बोर्ड ने इसे टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम पद से बर्खास्त करने की घोषणा कर दी। वक्फ ने तो इसे हटा दिया पर ये अब भी ममता की नाक का बाल बना हुआ है और प्रधानमंत्री ही नहीं देश विरोधी बयानों के बावजूद आज तक इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। याद रहे सुप्रसिद्ध गायक सोनू निगम के खिलाफ आपत्तिजनक फतवा जारी करने वाला मौलवी सय्यद शाह अतेफ अली भी इसका चेला है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के बाद अब राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह देने की तैयारी की जा रही है। म्यांमार में इस्लामिक रोहिंग्या आतंकवादियों ने सेना और पुलिस पर सैकड़ों हमले किए। इनके बाद हुई जवाबी कार्रवाई के कारण लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ना पड़ा। केंद्र सरकार इन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानती है लेकिन राज्य में इस्लामिक संगठन टीएमसी की सरपरस्ती में सरेआम इनके समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं जिनमें केंद्र सरकार के खिलाफ ही नहीं, हिंदुओं के खिलाफ भी आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छोटे से छोटे कार्यक्रम को कानून व्यवस्था का बहाना बना कर रोकने वाली ममता सरकार इन्हें खामोशी से देख रही है।

बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत में निर्विघ्न सुविधाएं मिलें, इसके लिए राज्य सरकार ‘आधार’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। ये बात अलग है कि अदालत ने उसे याद दिलाया कि राज्य सरकारें केंद्रीय कानूनों के खिलाफ मुकदमा नहीं कर सकतीं। यदि ममता को परेशानी हो तो वो स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

अपनी विघटनकारी-सांप्रदायिक राजनीति के कारण ममता ने लगातार केंद्र सरकार के साथ टकराव का वातावरण बनाया हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में सभी राज्य सरकारों और शैक्षिक संस्थाओं को सरदार वल्लभ भाई पटेल जन्म जयंती (31 अक्तूबर) को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्देश दिया, लेकिन ममता ने बड़ी ढिठाई से इसे मानने से मना कर दिया। याद रहे ये वही ममता हैं जिन्होंने पाकिस्तान के प्रबल समर्थक अल्लामा इकबाल के पोते वलीद इकबाल को पाकिस्तान से बुलाकर सम्मानित किया। वलीद पाकिस्तान की बदनाम सेना की समर्थक माने जाने वाली इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ का नेता भी है। वलीद का सम्मान समारोह 30 मई 2015 को कोलकाता में हुआ। लेकिन केंद्र सरकार के निर्देशों की अवहेला का यह पहला किस्सा नहीं है। इससे पहले ममता ने अध्यापक दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में भी केंद्र सरकार के निर्देशों को ठेंगा दिखाया। एक बार तो ममता ने सैनिक वाहनों की आवाजाही को लेकर केंद्र पर उनका तख्ता पलट करने का आरोप तक लगा दिया और सारी रात सचिवालय में डटी रहीं। नोटबंदी पर वो किस तरह मोदी सरकार पर बिफरीं और कैसे उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों में आकंठ डूबे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मोर्चा बनाया, वो भी आपको अवश्य याद होगा।

चलते चलते एक महत्वपूर्ण बात – बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद आजकल पूरी ताकत से आईएसआई समर्थित इस्लामिक कट्टरवादियों का सफाया करने में लगी हैं। उनके देश के अनेक आतंकवादी भाग कर पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में छुप रहे हैं, कैंप बना रहे हैं। ममता को इस विषय में देशहित का ध्यान रखते हुए सतर्कता बरतनी चाहिए और उनकी उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनकी पार्टी के अनेक पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों पर बांग्लादेश में मवेशियों और अन्य वस्तुओं की तस्करी के आरोप भी लगे हैं। उन्हें इनकी जांच करवानी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन में भारत ही नहीं बांग्लादेश सरकार का भी सहयोग करना चाहिए।

अनुभव बताता है कि इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति जनविरोधी और विकासविरोधी रही है। बंगाल की अधिसंख्य हिंदु आबादी कब तक इसके कारण गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में फंसी रहेगी? धीरे-धीरे लोग समझने लगे हैं कि इस्लामिक कट्टरवाद-अलगाववाद को पालना-पोसना और अराजकता को बढ़ावा देना ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘जनवाद’ नहीं होता। मुसलमानों को पोटने के चक्कर में जिस तरह ममता, मोदी सरकार की विकासोन्मुखी-जनोन्मुखी नीतियों और कार्यक्रमों का विरोध कर रहीं हैं, उससे जनता का अहित ही हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश भर में विकास के मुद्दे को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। भाजपा को मुकुल के समर्थन से इसे घर घर तक पहुंचाना चाहिए।

राजनीतिक दृष्टि से फिलहाल ममता भले ही सुरक्षित दिखती हों, पर सही नीतियों और रणनीतियों से भाजपा उनका पासा पलट भी सकती है। मुकुल राय का भाजपा प्रवेश तो सिर्फ एक चेतावनी है। वैसे भी राज्य में उनके अलावा मुसलमान वोटों के अन्य सौदागर भी हैं। अगर उन्हें याद न हो तो हम याद दिला दें – कांग्रेस और कम्युनिस्ट दल। अगर उन्होंने समय रहते अपना रवैया नहीं बदला तो राज्य के धर्मनिरपेक्ष हिंदू उन्हें समझा देंगे कि असली धर्मनिरपेक्षता क्या होती है।