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“हिंदू विरोधी वोट बैंक और संघ का अंधा विरोध” in Punjab Kesari

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘भविष्य का भारत’ विषय पर तीन दिवसीय चर्चा का आयोजन कर रहा है। इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वयं इस बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। संघ ने इसमें हर क्षेत्र और वर्ग के लोगों को न्यौता दिया। बुलावे पर अनेक कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों का रवैया खेदजनक रहा। चर्चा में आना या न आना उनका विशेषाधिकार था, लेकिन उन्होंने संघ के प्रति जो अपमानजनक टिप्पणियां कीं वो लोकतंत्र और सहिष्णुता की भारतीय परंपराओं के सर्वदा विरूद्ध थीं।

इन टिप्पणियों से कुछ बातें तो स्पष्ट हुईं। एक तो ये कि अपमानजनक टिप्पणी करने वाले लोगोें को संघ की वास्तविकता और दर्शन का कोई ज्ञान नहीं है। दूसरी ये कि इन्होंने संघ को हिंदुओं का एक प्रतीक बना दिया है। जो भी हिंदुओं से नफरत करता हो या उनसे नफरत करने वालों का समर्थन चाहता हो, वो संघ का अपमान करे और अपनी भड़ास निकाल दे। संघ को गाली देना, उसके खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ का सर्वदा उचित विरोध है।

संघ के न्यौते पर किसने क्या कहा, ये दोहराना उचित नहीं होगा, लेकिन संघ की विचारधारा के कुछ मूल तत्वों पर चर्चा की जाए, उससे पहले ये स्पष्ट करना जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र में संघ को अपने विचार रखने और उन्हें प्रचारित, प्रसारित करने का उतना ही हक है जितना सीआईसी पार्टियों को है। अगर सीआईसी पार्टियां राष्ट्रविरोधी, सुरक्षा बलों के हत्यारे नक्सलियों, कश्मीरी और पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकवादियों का समर्थन ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ मान सकती हैं तो संघ को भी अपनी अखंड भारत की परिकल्पना मानने और उसे साकार करने के लिए प्रयास करने का पूरा हक है। ध्यान रहे, इसके लिए संघ न तो किसी हिंसक गतिविधि को बढ़ावा दे रहा है और न ही समाज के विघटन की बात कर रहा है।

सीआईसी पार्टियां आंख मूंद कर संघ पर आरोप लगाती रही हैं कि संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है और अल्पसंख्यकों (हास्यास्पद है लेकिन 20 करोड़ मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहा जाता है) के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सीआईसी पार्टियां ये नहीं बतातीं कि ‘हिंदू’ से संघ का क्या अभिप्राय है? जो बात इन विघटनकारी इस्लामिक सांप्रदायिक दलों को नहीं पता, उसे हम स्पष्ट कर देते हैं। संघ के लिए ‘हिंदू’ एक व्यापक और समावेशी शब्द है। संघ के लिए हर वो व्यक्ति ‘हिंदू’ है जो भारत को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है।

सीआईसी पार्टियां मुसलमानों को डराती हैं कि संघ हिंदुओं को संगठित कर रहा है और जब ये मजबूत हो जाएगा तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ये सही है कि संघ हिंदुओं को संगठित करना चाहता है, लेकिन इसका उद्देश्य किसी धर्म, जाति, समुदाय के लोगों को आक्रांत करना या उनके अधिकार छीनना नहीं है। संगठन क्या है इसे स्पष्ट करते हुए संघ संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार कहते हैं – “किसी भी राष्ट्र की सामथ्र्य उसके संगठन के आधार पर निर्मित होती है। बिखरा हुआ समाज तो एक जमघट मात्र है। ‘जमघट’ और ‘संगठन’ दोनों शब्द समूहवाचक हैं, फिर भी दोनों का अर्थ भिन्न है। जमावड़े में अलग-अलग वृŸिा के और परस्पर कुछ भी संबंध न रखने वाले लोग होते हैं, किंतु संगठन में अनुशासन, अपनत्व और समाज-हित के संबंध सूत्र होते हैं जिनमें अत्यधिक स्नेहाकर्षण होता है। यह सीधा-सरल तत्व ध्यान में रखकर समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए संघ ने जन्म लिया है….संघ का ध्येय अपने धर्म, अपने समाज और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हिंदुओं का सक्षम संगठन करना है। इससे हमारा खोया आत्मविश्वास पुनः जाग्रत होगा और उसकी सामथ्र्य के सामने आक्रामकों की उद्दंड प्रकृति ढीली पड़ेगी तथा वे हमारे ऊपर आक्रमण करने की फिर सोच भी नहीं पाएंगे।”

विघटित समाज का क्या हश्र होता है वो हम 1947 में देख चुके हैं, जब माउंटबेटन ने कांग्रेस (जवाहरलाल नेहरू) और मुस्लिम लीग (मौहम्मद अली जिन्ना) के साथ मिलकर भारत का बंटवारा करवा दिया जिसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे खूनी दौर देखा जिसमें बीस लाख से ज्यादा लोग मारे गए और करोड़ों बेघर हुए। वैसे भी जब भारत का विघटन चाहने वाली शक्तियां खुद को संगठित कर और भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग कर अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए षडयंत्र कर सकती हैं तो भारत की अखंडता और एकता के पक्षधर हिंदुओं को एक करने में क्या बुराई है?

सीआईसी पार्टियांे बार-बार संघ के खिलाफ ये दुष्प्रचार करती हैं कि उसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया। आजादी के बाद बेशर्मी से भारतीयों की लाशों को रौंद कर सŸाा पर काबिज होने वाली कांग्रेस ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को कम्युनिस्टों के साथ मिलकर इस तरह लिखवाया जैसे उसके अलावा किसी और ने आजादी की लड़ाई मंे हिस्सा ही नहीं लिया। महात्मा गांधी ने निःसंदेह भारतीयों का जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन नेहरू तो अंग्रेजों के पिट्ठू ही रहे। वो जेल भी गए तो उन्हें वहां भरपूर सुविधाएं दी गईं। आपको बता दें कि संघ के संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वो कांग्रेस में भी रहे और उन्होंने क्रांतिकारियों का साथ भी दिया। वो कांग्रेस से अलग हो गए क्योंकि कांग्रेस का लक्ष्य भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता था वहीं उनका उद्देश्य ‘अखंड भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता’ था। 1925 में संघ की स्थापना के बाद भी हेडगेवार कांग्रेस नेतृत्व द्वारा संचालित आंदोलनों और सत्याग्रहों में भाग लेते रहे।

संघ की शाखाओं में तैयार होने वाले देशभक्त युवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। उनके सहयोगी नेताओं के लेखों एवं सरकारी दस्तावेजों से ये साबित होता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में लाखों स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर अग्रणी भूमिका निभाई थी। यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि इन स्वयंसेवकों ने अपने आदर्श ध्येय वाक्य ‘नहीं चाहिए पद, यश, गरिमा, सभी चढ़े मां के चरणों में’ के अनुसार अपनी संस्थागत पहचान से ऊपर उठकर सत्याग्रहों में भाग लिया और जेलों में अनेक प्रकार की यातनाएं एवं कष्ट सहन करते हुए अपनी राष्ट्रभक्ति का अतुलनीय परिचय दिया। पूर्व राष्ट्रपति और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को हेडगेवार के योगदान की पूरी जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने संघ के मुख्यालय में उन्हें ‘भारत मां का महान सपूत’ बताया था। सीआईसी पार्टियों के जो लोग आज संघ को अपशब्द कह रहे हैं उन्हें याद दिला दें कि महात्मा गांधी, डाॅक्टर भीमराव अंबेदकर, जमनालाल बजाज, डाॅक्टर जाकिर हुसैन, जयप्रकाश नारायण, जनरल करियप्पा आदि संघ के कार्यक्रमों में आ चुके हैं। 1963 में स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी के अवसर पर कन्याकुमारी में ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ निर्माण के समय भी संघ को सभी राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिला। इसके निर्माण के समर्थन में विभिन्न राजनीतिक दलों के 300 सांसदों के हस्ताक्षर एकनाथ रानाडे ने प्राप्त किए थे।

पूर्व संघ प्रचारक एवं ‘युगप्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डाॅक्टर हेडगेवार का अंतिम लक्ष्य – भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक के लेखक नरेंद्र सहगल अपनी पुस्तक में लिखते हैं – ”आज भी संघ के विरोधी संघ पर कई प्रकार के आरोप लगाते हैं। संघ एक सांप्रदायिक सैनिक संगठन है। संघी संकीर्ण विचार के लोग हैं। मुस्लिम विरोधी हैं। दंगे करवाते हैं……संघ के विरोधी यदि संघ की वैचारिक चट्टान के साथ टकराकर अपना सिर फोड़ने की जगह संघ में आकर इसे समझने का थोड़ा भी प्रयास करें, तो वोे भी इस चट्टान का हिस्सा बन सकते हैं। अन्यथा संघ तो एक निश्चित गति से अपना काम कर ही रहा है। लोग ये भी कहते हैं कि संघ ने अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। सच्चाई यह है कि संघ के दरवाजे हैं ही नहीं, बंद क्या करें। उन्होंने ही अपने दरवाजे हमारे लिए बंद कर दिए हैं।“

नरेंद्र सहगल का विश्लेषण कितना सही है, ये मोहन भागवत के विज्ञान भवन के कार्यक्रम को लेकर खड़े किए गए मिथ्या विवाद से स्पष्ट हो जाता है। शास्त्रार्थ और विचार-विमर्श की महान भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए संघ ने विरोधी मतावलंबियों को भी निमंत्रण दिया, लेकिन उन्होंने न केवल अपने दरवाजे बंद किए, बल्कि असभ्य और असंसदीय व्यवहार भी किया। बहरहाल दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सिद्धांतों पर कायम है और लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा अनवरत जारी है। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, विद्या भारती, स्वदेशी जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय किसान संघ, आरोग्य भारती, भारत विकास परिषद, संस्कार भारती आदि जैसे अनेकानेक संगठनों के साथ वो मां भारती के सेवा में दिन-रात जुटा है। संघ से प्रेरित संगठनांे द्वारा इस समय देश में एक लाख साठ हजार से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं जिनसे लाभान्वित होने वाले अधिकांश लोग दलित वर्ग से संबंध रखते हैं।

“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

“नक्सलवादः आग से खेल रहे हैं राहुल गांधी” in Punjab Kesari

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नयर ने अपनी जीवनी ‘बियोंड द लाइंस’ में विस्तार से बताया है कि कैसे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में अकाली दल – जनता दल सरकार को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया। वो लिखते हैंः

“राजनीतिक सरजमीं पर भिंडरावाले का उदय 1977 में हुआ जब अकाली दल – जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा कर पंजाब में सरकार बनाई। जैल सिंह, हारने वाले मुख्यमंत्री जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने, सबसे ज्यादा नाखुश थे। एक तो उनकी सरकार चली गई थी और दूसरे गुरदयाल सिंह ढिल्लों कमीशन ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अधिकारों के दुरूपयोग का दोषी पाया था। ये कमीशन मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कामकाज की समीक्षा के लिए बनाया गया था।

संजय गांधी, जो अपने एक्स्ट्रा-काॅंस्टीट्यूशनल तौर-तरीकों के लिए जाने जाते थे, ने सुझाव दिया कि अकाली सरकार को चुनौती देने के लिए किसी ‘संत’ को आगे बढ़ाया जाए। संजय और जैल सिंह, खासतौर से जैल सिंह को अच्छी तरह से पता था कि कैसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने अकालियों से लोहा लिया था और कैसे उन्होंने सख्त स्वभाव अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को पटखनी देने के लिए संत फतेह सिंह को खड़ा किया था।”

कांग्रेस के भिंडरावाले को आगे बढ़ाने के फैसले ने आगे चल कर क्या गुल खिलाया, कैसे पंजाब ही नहीं पूरे उत्तरा भारत में खालिस्तानी आतंक का नंगा नाच हुआ, कैसे आॅपरेशन ब्लू स्टार हुआ, कैसे इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद कैसे और किसके द्वारा हजारों सिखों का नरसंहार हुआ, ये एक लंबी और दुखद कहानी है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस के वर्तनाम नेतृत्व ने इस से कोई सबक सिखा है?

अस्सी के दशक में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती श्री लंका में की। दक्षिण में एक के बाद एक चुनाव हार रही इंदिरा गांधी को लगा कि अगर वो श्री लंका में अपनी उपेक्षा के कारण आंदोलित तमिलों की मदद करेंगी तो उन्हें तमिलनाडु में तमिलों के वोट मिलेंगे। कांग्रेस को खोया हुआ जनाधार वापस मिल सकेगा। अगर लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल इलम (एलटीटीई) के पूर्व प्रमुख कुमारन पथमंथन उर्फ केपी की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने एलटीटीई की मदद की। बाद में जब एलटीटीई हाथ से निकलता दिखाई दिया तो कांग्रेस ने इससे हाथ खींच लिए। यही नहीं राजीव गांधी ने तमिल आतंकियों से लड़ने के लिए ‘पीस कीपिंग फोर्स’ भी भेजी। इसका नतीजा क्या रहा? एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।

सवाल ये है कि क्या खालिस्तानियों और तमिल आतंकियों को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने कोई सबक सीखा?

अब कश्मीर को लें। वर्ष 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। भारतीय फौज पाकिस्तानियों का मुकाबला कर ही रही थी कि जवाहर लाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। उन्होंने अपनी हरकतों से भारत को जो नासूर दिया, वो सबके सामने है। बाकी की रही सही कसर राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने 1987 में पूरी कर दी जब वहां विधान सभा चुनावों को फर्जी ठहरा कर अलगाववादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद पाक समर्थित आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर राज्य से भगाया गया और फिर विदेशी ताकतों के इशारे पर हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया। कांग्रेस, अलगाववादियों और आतंकियों के इस पूरे नंगे नाच को खामोश समर्थन देती रही। इसका क्या परिणाम निकला, वो बताने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सवाल फिर वही – क्या कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने इस प्रकरण से भी कोई सबक सीखा?

चाहे मसला कश्मीर का हो या खालिस्तान का या श्री लंका के तमिल आतंकियों का, स्पष्ट है कि वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और अपने पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। वैसे सवाल ये है कि इन घातक गलतियों का सबक क्या है? सबक बड़ा सादा है – अगर कोई राजनीतिक दल आतंकियों को बढ़ावा देता है तो कल को वहीं आतंकी उस पर भी हमला कर सकते हैं।

लेकिन हम आखिर ऐसा कह क्यों रहे हैं कि राहुल ने पार्टी और पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा? इसका कारण है उनका देशद्रोही नक्सलियों को खुले आम और पूर्ण समर्थन। आश्चर्य की बात तो ये है कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नक्सलवादी आतंकी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इस्लामिक आतंकियों से भी बड़ा। मनमोहन सरकार ने तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में ये भी कहा था कि अर्बन नक्सल और उनके समर्थक, जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना – पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई वैध सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं और लोगों को उसके खिलाफ भड़काते हैं।

आज हम इस बात को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जैसे अर्बन नक्सल और उनके कांग्रेसी और अन्य समर्थक एक स्वर से मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं, वो किसी से छुपा नहीं है। ये दावा करते हैं कि देश में आपातकाल है और मतभिन्नता को दबाया और कुचला जा रहा है। कोई इनसे सिर्फ एक आसान सा सवाल पूछे – अगर तुम्हें दबाया जा रहा होता तो तुम संवादादाता सम्मेलन कैसे कर पाते? तुम जो मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में झूठा प्रचार कर रहे हो, वो कैसे कर पाते? वैसे भी ये जिन अर्बन नक्सलियों को ‘बुद्धिजीवी’, ‘लेखक’, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ आदि बता रहे हैं, उनके खिलाफ पुलिस के पास पूरे सबूत हैं कि कैसे ये देश की सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रच रहे थे, कैसे इन सबका प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति से सीधा राब्ता था और ये कैसे उसके आदेशों पर न केवल अराजकता फैला रहे थे, बल्कि उसके लिए धन, हथियार आदि की व्यवस्था भी कर रहे थे। सीधी सी बात है अर्बन नक्सलियों को जंगल में बैठे उनके आकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। ये पाप में बराबरी के भागीदार हैं।

लेकिन राहुल गांधी को जैसे ये सब दिख ही नहीं रहा या वो इसे देखना ही नहीं चाहते। जैसा कि इतिहास गवाह है, आतंक और हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले नक्सलियों से सांठगांठ राहुल को उलटी भी पड़ सकती है। राहुल सोच रहे होंगे कि मैं चाणक्य की तरह मोदी के खिलाफ नक्सलियों का इस्तेमाल कर रहा हूं और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों और नक्सलियों का मोर्चा बना रहा हूं जिसमें जब दूसरे विपक्षी दल भी शामिल होंगे तो मेरी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। नक्सली दलितों को मोदी के खिलाफ भड़काएंगे, देश में व्यापक हिंसा करेंगे और मैं इस अराजकता के बीच कहूंगा कि मोदी देश नहीं संभाल सकते, अब बस मैं ही एक विकल्प हूं। राहुल गांधी के चीन से बढ़ते प्रेम के बीच लोग अब ये भी पूछने लगे हैं कि क्या राहुल, नक्सलियों और चीन के बीच कोई संबंध है? क्या चीन राहुल को भारत में प्रमोट कर रहा है और इसके लिए नक्सलियों का प्रयोग किया जा रहा है?

खेल चाहे जो हो। इसमें नक्सलियों का ज्यादा फायदा है। वो सोच रहे होंगे कि हम महत्वाकांक्षी राहुल गांधी के कंधों पर सवार होकर देश के कोने-कोने में फैल जाएंगे और जब हमारा काम निकल जाएगा तो उसका सफाया कर देंगे। नक्सलियों की प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) को देश की सबसे पुरानी पार्टी खुलेआम समर्थन दे, उससे बेहतर उसके लिए क्या हो सकता है? फिर कांग्रेस तो उन्हें सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ ही नहीं, पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। ये बात हमने भीमा कोरेगांव मामले में छह जून को दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सल रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिले पत्रों में भी देखी थी जिसमें एक काॅमरेड दूसरे काॅमरेड को कह रहा है कि अगर हम दलितों को आंदोलित करें तो कांग्रेस हमें पैसा और कानूनी सहायता देगी। जब 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सलियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सबने देखा कि कांग्रेस के वकीलों की पूरी फौज उनकी पैरवी में उतर पड़ी। इनमें अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, दुष्यंत दवे आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कांग्रेस के अनेक वकील जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में नक्सलियों के मुकदमें लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही नक्सलियों से सांठगांठ है? 28 अगस्त को अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद हमने देखा सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सदस्य रहे हर्ष मंदार और अरूणा राॅय जैसे लोग खुल कर अर्बन नक्सलियों के समर्थन में सामने आ गए। अर्बन नक्सलियों ने 30 अगस्त को दिल्ली में जो प्रेस काॅफ्रेंस की उसमें अरूणा राय शामिल हुई और इसमें बाकायदा कांग्रेसी वकीलों को धन्यवाद भी दिया गया। यूपीए के जमाने में हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करने वाली अरूंधति राॅय भी इसमें शामिल हुईं। दिलचस्प बात तो ये है कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल में उसकी तस्वीर भी इस्तेमाल की जैसे वो उसकी अलगाववादी घटिया सोच को मान्यता दे रही हो। इसमें राहुल गांधी के करीबी अर्बन नक्सल जिग्नेश मेवानी भी शामिल हुए। कुल मिलाकर अर्बन नक्सलियों के इस संवाददाता सम्मेलन में परोक्ष में कांग्रेस ही छायी रही।

नक्सलियों को कांग्रेस का समर्थन किस हद तक है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया की जांच करनी चाहिए। यहां सारे कांग्रेसी पत्रकार, वकील, तीस्ता सीतलवाड़ और जाॅन दयाल जैसे फर्जी मानवाधिकार कार्यकर्ता पूरा दम लगाकर प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के अर्बन नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं।

जिन अर्बन नक्सलियों के लिए राहुल गांधी, उनकी पार्टी और चेले इतने व्यथित हो रहे हैं, असल में यूपीए के कार्यकाल में खुद उनकी पार्टी ने उन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था जिनके ये सदस्य हैं। असल में दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। भीमा कोरेगांव केस में छह जून और 28 अगस्त को जो दस अर्बन नक्सल पकड़े गए हैं, उनमें से सात तो इन्हीं संस्थाओं में काम करते हैं। ये हैं – वरवर राव, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, अरूण फरेरा, वर्नन गोेंजालविस और महेश राउत। इनमें से ज्यादातर पर पहले ही मुकदमे दर्ज हैं और कई तो सजा भी काट चुके हैं। इनके देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी षडयंत्रों, दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय हथियार सप्लायरस से संपर्क हैं। भारतीय सेना के प्रति इनकी नफरत जगजाहिर है।

Urban Naxals: The Enemy within

Murders
Demolition of school buildings
Tribal women raped
Civilians kidnapped
Central Reserve Police Force (CRPF) persons killed
Ransoms demanded
and yet Naxals are called revolutionaries and not terrorists.

The complexity of their existence lies in the dual roles they play, one covert as tribal sympathisers and revolutionaries and another overt as extortionists, terrorists, blood hungry rebels.

Since 1972, Naxalite insurgence has shed all capes it donned for relieving the rural people from the Zamindar’s oppression.
The Zamindars have disappeared from the modern day discourse.
Yet the spite of the tribals has remained the same across decades.

In 1972, following the death of Charu Majumdar, the Naxalite movement emerged in a fresh light; a light that blinds the eyes.
In the years that came, the red corridor had painted the town anything but red.
It gave leeway to new appendages, the ‘intellectual terrorists’

 

Somewhere between 4 G (4thgeneration Spectrum) and 4 GW (4thGeneration warfare) India has moved ahead and paradoxically retrogressed.
Some of the mealy mouthed intellectuals have discretely doubled as ‘Urban naxals’.

Urban naxals are the present day liaisons to the Naxalite movement.
They are the new extortionists, the new oppressors, the new roadblocks to development in whose name they thrive.

They have done a meticulous job in remaining hidden for decades.
A harmful nexus of university professors, media men, intelligentsia, IT professionals and medical practitioners has emerged.
Sitting in their comfortable air conditioned rooms, often living off the government’s subsidies, the tax payer’s money; these naxals have been engaging in causing irreversible harm to our nation.

They target the students, who are as naïve as a goat that is about to be butchered and turned into minced meat, after being well fed and well taken care of.
Universities have become the safe havens of these urban intellectual terrorists who deliver instructions, hiding behind their innocent lecturer costumes.
Just like their compatriots, the Naxals who hide in the thickets and undergrowths of the tribal hinterland.
Look around, maybe you’ll find a terrorist, right next to you.

The venomous speech of the intellectual propaganda cannot be denied, the words ‘bharat tere tukde honge’ will echo from the walls of Jawarharlal Nehru University to the entire country.
Pillars of education where debate and discussion have been taken for granted, are hotbeds of left terrorists, discretely introducing students to sinister propaganda.
It is a slow poison and it acts like Cancer, it spreads before you know you have reached Stage 4 GW.

Where students sat under trees and engaged in revered debates with their professors in gurukuls, today the guru has robbed them of knowledge, of intellectual development; he slow poisons them to believe in anti-establishment, destruction, disintegration.
With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

 

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth, our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see.
Macaulay wanted to destruct India’s culture and use it to their advantage by the divide and rule principle.
It appears that the Britishers passed on the beacon of destruction of India to the Congress party. And congress party has made the seat warm for the Naxals.

 

All congress has done in its decade long rule is to masquerade its incapacity by giving out doles to appease what it calls the minority section.
To make sure that they remain a faithful minority vote base, Congress has never truly dug them out of impoverishment.
It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism.

Congress has coordinated well with the Naxalite movement, the urban naxals strive to keep the issue of oppression alive.
While the challenges to this country lay in a plethora of issues such as child labour, sex trafficking, terrorism, substance abuse, the focus has been shifted to secularism, intolerance.
Problems are created, issues are staged and the youth brainwashed.

 

They are like the synapse, whose structure is not definitely visible.
Whose existence is inevitable to pass information from one neuron to another.
The Naxals have spread like the neurons and they use these synapses in the urban area as their linkages, their informants, their underground workers.
These transition points must be exposed, dealt with a blow.
The door to intellectual terrorism must be shut, before it makes the system collapse under its own weight.
Look around before it’s too late!

Urban Naxals: The blood thirsty chameleons

Is Naxalism just an ideology?
Is it followed by the tribals?
Does it have followers in the cities?

The poor have no ideology.
They follow an ideologist, one who paints them a rosier picture.
This ideology was efficiently transcribed by Charu Majumder, who wanted to alleviate poor tribals from the affliction of poverty.
What started in a small town called Naxabari in West Bengal soon spread like wild fire and subsumed the neighbouring states.
It carved a path in the woods, a road not hitherto taken.

While the Zamindari oppression was soon and successfully brought to a excruciating demise. The ideology of the Naxalites didn’t remain incorruptible for long, following the death of Charu Majumdar, the movement lost its purpose and sheen.

The road not taken became the road that should not have been taken.
In order to keep their funds flowing, the Naxals kidnap innocent civilians, through whom they demand a ransom.
They are known to take bribes from trucks that pass through the red corridor.
Reports of looting civilians that pass through the forests are also afloat.

The ideologists turned into mass murderers, they ironically became the enemy they were fighting against.

The spread is out of context if one looks at ‘Zamindari oppression’ as the seat of the movement.
In order to understand how these states came to be roped in, we need to look at the larger ideologues that the Naxals operate on.

The Red corridor developed along Odisha, Chattisgarh, Jharkhand, Andhra Pradesh.
However today, in roads are reaching Delhi, Haryana, Karnataka, Kerala.
The blue print for the future of the red corridor is bereft of buildings, roads, infrastructure, technology and development.
From the undergrowths of the mineral rich states, the chameleons have emerged into the city. The well educated and well aware, entitled, empowered citizens have been roped in their false narratives of growth and development.

The Urban Naxals
Sitting camouflaged behind the bushes and thickets of the jungle, the Naxalites could well orchestrate their guerrilla warfare tactics. However in order to seep into the urban landscape they figured it needed more than physical strength and so began the steady infestation of the mind.
They targeted scapegoats; intellectually pretentious people of the society that occupied the urban hinterlands.

The reach has cast a murky spider web of university lecturers, IT professionals, doctors, engineers, media and the most innocuous of all, students.
Professors have misused their seat of power and tool of empowerment to brainwash the youth of the nation, to drag them into their sorry network of destructive politics.

Universities are making to headlines not for their excellence in education but rather for the political turmoil, the ideological unrest, the intellectual debilitation.

Students are yelling about deconstruction, demolition, unrest. They are being injected the serum of soft terrorism into their brains.
The credit goes to the Maoists who have successfully created the Urban Naxals.

With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth and our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see

But surely such a destructive ideological movement couldn’t have survived without support.
Over its dynastic decade long rule, Congress has warmed the seat for the Naxals, it has handed support to their existence and spread.
Making all odds meet, the politics of destruction has united.

They have ensured that the vicious cycle of poor getting poorer and rich getting richer would remain a cliché for as long as they exist.
Like the age old adage says, “Give a man a fish, and you feed him for a day. Teach a man to fish, and you feed him for a lifetime.”
Congress chose to give fishes and so the mandate remained to give out doles to the poor and continue their cycle of oppression.
This although ensures a faithful vote bank, it never truly gets them out of the quick sand.

It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism

Let us not allow these political narratives to shape our minds and encourage us to become appendages of destruction.
Students of India! Behold! You are above this mediocre fight.
You are the new light that the country is aspiring to become, do not let the camouflaged terrorists dictate your path to development.

Sit back, look around, contemplate and introspect.
Watch your words, scrutinise your actions.
You are wiser than falling prey to the Urban Naxalism.
You are the new leaders!

“भारत से रिश्तों की कीमत चुकानी होगी इमरान को” in Punjab Kesari

इमरान खान ने अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ भी नहीं ली थी कि भारत में उनकी विदेश नीति के बारे में कयास लगने शुरू हो गए थे। चुनावी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी का यार और गद्दार तथा मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताने वाले इमरान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले ही संबोधन में भारत के साथ व्यापार की इच्छा जता दी। ऐसा उन्होंने शायद इसलिए किया कि दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को अपना वजूद बनाए रखने के लिए भारत से व्यापार करना बेहद जरूरी है।

इसपर पाकिस्तान में बवाल मच गया है। नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज ने सवाल उठाया है कि जब नवाज भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों की बात की तो उन्हें कौम का गद्दार करार दे दिया गया, आज अगर वही बात इमरान कह रहे हैं तो वो देशभक्त कैसे हो गए? आपको याद दिला दें कि नवाज पाकिस्तानी सेना की राय के खिलाफ मोदी के शपथग्रहण समारोह में आए थे। ये सेना को बहुत नागवार गुजरा था। इसके बाद मोदी जब उनके जन्मदिन पर अचानक उनके घर पहुंच गए तो उसके बाद तो उनके खिलाफ सेना के मीडिया नेटवर्क ने धुंआधार दुष्प्रचार ही शुरू कर दिया। उन्हें मोदी का यार और देश का गद्दार साबित करने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि बहुत से पूर्व जनरल टीवी बहसों में अब खुलेआम ये मानने लगे हैं कि ये निहित स्वार्थों द्वारा चलाया गया प्रायोजित दुष्प्रचार था जिसमें कोई तथ्य नहीं था।

बहरहाल ये बात ध्यान में रखनी होगी कि पाकिस्तान की भारत नीति का निर्धारण इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय में होता है। भारत में हम भले ही इमरान खान को लेकर कितनी ही चर्चा करें, लेकिन असलियत यही है कि जब तक पाकिस्तानी सेना नहीं चाहेगी, पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ इस संबंध में भारत की भी शर्तें होंगी ही। देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देगा या अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग उपलब्ध करवाएगा?

वैसे तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कई बार भारत के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जता चुके हैं और जब वो इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू से मिले तो उन्होंने एक बार फिर रिश्तों में बेहतरी की इच्छा जताई। लेकिन मोदी सरकार के लिए बाजवा की ‘इच्छा’ का कोई मतलब नहीं है। सरकार तो यह जानना चाहती है कि बाजवा की सेना ने भारत के खिलाफ जो मोर्चे खोले हुए हैं, उनमें जमीनी स्तर पर कितनों को बंद किया गया है, या कटौती की गई है।

सिद्धू, बाजवा की बातों से इतने भावविभोर हो गए कि उनके गले लग गए। लेकिन क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि वो उसी पंजाब में खालिस्तान और आतंकवाद की आग क्यों भड़का रहे हैं, जिसमें वो मंत्री हैं? क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने पाकी सेना को कश्मीर में रिहायशी ठिकानों पर हमला करने और निर्दोष नागरिकोें को मारने का आदेश क्यों दिया? जब बाजवा चिकनी चुपड़ी-बाते कर रहे थे तब क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पूरे भारत में जो जाल बिछा रखा है और वो जिस तरह यहां अलगाववाद की आग भड़का रही है, उसे कब बंद किया जाएगा?

सिद्धू को लगा कि करतारपुर लंगा खोलने की बात कह कर बाजवा ने सिखों पर बड़ा उपकार कर दिया। क्या उन्हें पलट कर बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि पाकिस्तानी गुरूद्वारों के दर्शन के लिए जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को आईएसआई के गुर्गे कब खालिस्तान के लिए भड़काना बंद करेंगे? कब बाजवा ‘रेफरेंडम 2020’ का राग बंद करेंगे और कब कनाडा, इंग्लैंड आदि में सिखों के गुरूद्वारों में दुष्प्रचार बंद करेंगे? हम एक बार को मान भी लें कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन खालिस्तान का क्या? नक्सलियों, इस्लामिक अलगाववादी संस्थाओं को दी जा रही सहायता का क्या?

इमरान के प्रति सिद्धू का लगाव और भारत में सिद्धू का विरोध होने पर इमरान का उनके बचाव में सामने आना समझा जा सकता है, लेकिन सवाल सिर्फ उनकी सदाशयता और नेकनीयति का नहीं है। इमरान को समझना होगा कि सिद्धू का विरोध करने वाले पाकिस्तान से दोस्ती के विरोधी नहीं हैं। वो दोस्ती के नाम पर भावविभोर हो अंधे हो जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि असली सवाल तो पाकिस्तानी सेना के रवैये में बदलाव का है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक समझती है और जिसका लक्ष्य है – ‘गजवा ए हिंद’ यानी हिंदुस्तान पर जीत। बेनजीर भुट्टो ने एक बार हिम्मत करके कहा था कि वो कश्मीर को भारत-पाक रिश्तों के बीच नहीं आने देंगी, लेकिन उनका क्या हश्र हुआ? उन्हें मरवा दिया गया। जब उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार थी, तब भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर फैसला भी हो गया था, लेकिन वो कौन लोग थे जिन्होंने अंतिम क्षण में इसे रूकवा दिया? नवाज शरीफ ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर समझौता किया ताकि आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सके, उसका भी क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। नवाज ने तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत में आतंकी भेजने पर भी सवाल उठाया, लेकिन सब जानते हैं, उन्हें गद्दार करार दिया गया।

इमरान ने अभी तक सेना की किसी भी नीति के खिलाफ चूं तक नहीं की है। उन्होंने तोे कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को सरेआम ‘आजादी की लड़ाई’ करार दिया है। मतलब साफ है, पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी भेजता रहेगा। इमरान खान की दूसरी बड़ी परेशानी ये है कि सेना के पूरे समर्थन के बावजूद उन्हें अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। उन्हें दूसरी छोटी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में वो चाहंे भी तो भारत-पाक संबंधों पर नवाज शरीफ जैसे खुल कर कोई राय नहीं जाहिर कर सकते। वैसे भी उनसे ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो सेना की कभी मुखालफत करेंगे क्योंकि उनकी पूरी पृष्ठभूमि ही सेना की है। उनका संबंध उस जनरल नियाजी से है जिसने बांग्लादेश में समर्पण किया था। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, सूचना मंत्री फवाद चैधरी, पेट्रोलियम मंत्री गुलाम सरवर खान जनरल परवेज मुशरर्फ के जमाने में मंत्री रह चुके हैं। उनके वित्त मंत्री असद उमर के पिता सेना के सेवानिवृत्त अफसर हैं। इमरान की कैबिनेट में मुशरर्फ के जमाने के इतने मंत्री हैं कि लोग पूछने लगे हैं कि जब ये लोग मुशरर्फ को कामयाब नहीं कर सके तो उन्हें क्या करेंगे।

मुंबई में हमलों के समय इमरान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी मुंबई में ही थे। उन्हें पाकिस्तानी सेना की हरकतें, देश की आर्थिक स्थिति, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंध, अमेरिकी दबाव, भारत के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और ईरान के साथ तल्ख संबंध, चीन की पैंतरेबाजी, सबका अहसास है। उन्हें पता है कि भले ही इमरान, मोदी जैसे विदेशी ताकतों से बराबरी के आधार पर संबंधों की बात करें, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि दुनिया की ताकते उन्हें वो इज्जत बख्शें जिसकी वो ख्वाहिश कर रहे हैं। वो इमरान को प्रधानमंत्री मोदी के पत्र का हवाला देते हुए भारत के साथ ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ की बात करते हैं। वो कहते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सामने बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बार तो उन्होंने ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ का गलत अर्थ निकाल लिया था और एलान कर दिया था कि भारत ने बातचीत का न्यौता भेजा है। लेकिन जल्द ही भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इसका मतलब ‘काॅम्प्रिहेंसिव डायलाॅग’ नहीं। वो नई सरकार की नीतियों और जमीन पर हालात का गंभीरता से जायजा ले रहा है और उसके बाद ही इस संबंध में कोई फैसला हो सकता है। हां, भारत, पाकिस्तान से संबंध पूरी तरह तोड़ेगा नहीं, दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री सर्विसेस, सुरक्षा सलाहकार आदि बातचीत करते रहेंगे, लेकिन भारत पाकिस्तानी घुसपैठ का जवाब पहले जैसे देता रहेगा।

कुरैशी से जब ये पूछा गया कि क्या वो सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भेंट करेंगे तो वो इसका उत्तर टाल गए। जाहिर है, अभी ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है, बाद में होगा, तो देखा जाएगा। छह सितंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मेटिस भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 वार्ता करेंगे। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है। देखना दिलचस्प होगा कि वो इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा से क्या बात करते हैं। कुरैशी अमेरिका के साथ ‘गलतफहमियों’ को बराबरी की सतह पर बात कर दूर करना चाहते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख रह चुके पाॅम्पिओ को इमरान और बाजवा कितना आश्वस्त कर पाते हैं, इस पर सबकी निगाह रहेगी। पर पाॅम्पिओ और इमरान की टेलीफोन पर हुई बातचीत में आतंकवाद पर चर्चा को लेकर जो झड़प हुई है और जैसे अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से अफगानिस्तान में आतंकवाद को लेकर तकाजे कर रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अमेरिका इमरान को मनमांगी मुराद नहीं देगा।

कुल मिलाकर अभी जो हालात हैं, उनमें कहा जा सकता है कि जब तक पाकी सेना भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती, भारत को इमरान से बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, भले ही वो इसके लिए कितना ही जोर दे। इमरान को समझना होगा कि अब भारत में मोदी सरकार है, मनमोहन सरकार नहीं जिसके राज में आतंक और झप्पियां एक साथ चला करते थे। उन्हें अगर भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने हैं तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

“The Trafficking of persons (Prevention, protection, and rehabilitation) Bill: Transporting stolen lives from a hopeless present to an optimistic future” In TOI Blog

23-year-old Yazidi, Nadia Murad has been designated as the Ambassador for Dignity of Survivors of Human Trafficking for the UN’s Drugs and Crime body.  She is also a Nominee for the Nobel Peace Prize this year.

If humans have learned one thing from the past of their mistakes, it is to not blame the victim, but engage themselves in waging wars against the perpetrators of the crime that have subsumed their spirit.

This approach is a penetrating beam of light in a carton of doom that this world is racing to resemble.

So, is the Trafficking of Persons (Prevention, Protection, and Rehabilitation) Bill, introduced in Lok Sabha by the Minister of Women and Child Development, Maneka Gandhi on July 2018.
The bill accords importance to creating a National Anti Trafficking Bureau for reaching even grass-root level investigation in trafficking cases.

To tackle this menace, Anti Trafficking Relief and Rehabilitation Committees (ATC) will be established in national, state and district levels, which are to take care of compensation, repatriation, and reintegration. There would be protection homes and designated courts in addition.

While critics look at it as endless bureaucratisation, let’s face it, the trafficking racket is a spider’s web that sprawls across continents and begins in the most ordinary places.

Human trafficking is an umbrella term which subsumes trafficking for the purpose of sexual exploitation, forced labour, slavery, drug smuggling, organ smuggling and often for malicious activities such as terrorism, regional violence.

About 8 children go missing every hour, 4 are sexually abused,
2 raped.

In this organised crime, millions are being oppressed at homes, shops, brothels, colluding in an illicit $150 billion trade.
In his novel called ‘A Walk Across the Sun’ Corban Addison gives a chilling account of international trafficking for sexual slavery and drug smuggling in human beings. He explains how the nexus between corrupt police officials, pimps, locals is a net spread wide to reach the international arena. Emerging through the gruesome tale is a revelation and a haunting solution; he says “Trafficking will stop when men stop buying women. Until that happens, the best we can do is win one battle at a time.”

The fight against this evil is not a recent one but the approach is renewed.

Association of Nobel laureates in this war against this crime is a reflection of the urgency, importance of agency and pro-active engagement of civil society.

Nobel Laureate Kailash Satyarthi has been proactively engaged in the struggle against the suppression of children and young people.
In his Nobel peace prize speech, he narrates the woes of a trafficked child labourer.

“Is the world so poor that they cannot give a toy and a book, instead of forcing me to take a gun or a tool?”
Innocence has been cashed on for a donkey’s life of work.
Neither, worth the consequent despair.

However, human trafficking is not limited to kidnapping children and women for labour and sexual exploits as has been largely understood.

One of its myriad forms could be seen in the recent Rohingya refugee contention; here is the other dimension, discussed less often.

An international organisation of Migration has reported that there is evidence of trafficking of Rohingya refugees in India.

Though the media placed the moral compass on the shoulders of the government, it forgot to do its duty and bring to the surface, the fact that these very infiltrators are potential pawns. Speculation is rife that they chose Jammu for the proximity to Pakistan, a politically motivated migration. It points out to a probabilistic angle of terrorism and unnoticed crime. Media reports are unnerving, as they suggest humanitarian aid to migrants and fail to approach it with a circumstantial understanding.

Even religious places are no longer a safe haven.
With Missionaries and orphanages selling children, the age of doom is here.

It is not to malign religious institutions but to chide the clandestine activities that they carry forward under the cloak of benevolence.

Largely, it is the poor, underprivileged, under-informed, naïve who are unfortunate victims of trafficking.

With Government’s policies such as Ujjwala, Swadhar Greh, Juvenile Justice Act 2002, Code of Criminal procedure the issue of rehabilitation is well met.

Another innovation brought in by the government, the Aadhar card could be an effective move, as it keeps records of all the adults and children who are citizens of the country. Although there are hurdles in information storage and execution, these are more like teething problems.

If only people focus on the potential benefits more than minor inconveniences, the issues plaguing humanity can be addressed in a rightful way.

Trafficking is a crime against humanity. The war is to be collectively waged.

With this bill, there is hope that awareness will beget change.
This battle cannot, however, be won by the solitary action of the government.

It requires the sympathy of media, proactive involvement by civil society, and victims must come to the forefront.

Citizens must be welcoming to changes in the legal system.
Someone rightly said, to do nothing would be to die one day at a time.

“मोदी के नेतृत्व में नई उंचाइयों पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध” in Punjab Kesari

कुछ विपक्षी दलों ने बिना जाने-समझे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। मुसलमान वोटों की सांप्रदायिक राजनीति करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झप्पी को लेकर अपमानजनक ट्वीट तक कर डाले। लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी इस पार्टी से ऐसे बचकाने बर्ताव की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन आजकल ये पार्टी जिन हाथों में है और जैसे लोग इसका सोशल मीडिया विभाग संभाल रहे हैं, उनसे किसी परिपक्वता की आशा करना भी बेमानी है।

कांग्रेस भूल गई कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उसने झूठा दुष्प्रचार करके उनकी अमेरिका यात्रा तक पर प्रतिबंध लगवा दिया था। लेकिन इसके बावजूद मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जाॅर्ज बुश और बराक ओबामा के समझौतों का न केवल सम्मान किया बल्कि उन्हें आगे भी बढ़ाया। मोदी ने अपनी अमेरिका नीति में बिना किसी दुराग्रह के सिर्फ एक बात का ध्यान रखा और वो है – भारतीय हित।

पिछले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए उल्लेखनीय सुधार की अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो पता चलेगा कि ये उपलब्धियां एक दिन में हासिल नहीं हुईं। इनके पीछे दोनों देशों में विकसित हुई गहरी समझ है जिसे पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी ने आगे बढ़ाया। दीगर बात ये है कि दोनों देशों में सरकारें बदलीं, लेकिन परस्पर हितों में सहयोग और सामंजस्य की जो समझ विकसित हुई वो अक्षुण्ण रही। बहुमत के साथ सरकार में आए मोदी ने तो इसे नई ऊर्जा और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया। आज हम निसंदेह ये कह सकते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध आज जिस उंचाई पर हैं और जितने मजबूत हैं, वैसे पहले कभी नहीं थे।

जून 7, 2016 को अमेरिका ने भारत के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ (महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी) घोषित किया। इस वक्तव्य का शीर्षक था – द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाः एनड्योरिंग ग्लोबल पार्टनर्स इन द ट्वंटी फस्र्ट सेंचुरी (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारतः 21वीं सदी में स्थायी वैश्विक सहयोगी)। पिछले साल 22 अगस्त को ट्रंप द्वारा घोषित की गई नई दक्षिण एशिया नीति में इसकी प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है। ट्रंप ने इसमें न केवल भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में भारत की महत्वपूण भूमिका को रेखांकित किया बल्कि पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भी उसे अपना सहयोगी घोषित कर दिया। अमेरिका ने मोदी के कार्यकाल में भारत को दुनिया के चार बड़े मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम (बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं) में से तीन में प्रवेश करने की मदद की। ये हैं – मिसाइल टेक्नोलाॅजी कंट्रोल रिजीम (प्रवेश तिथि – जून 27, 2026), वासनर अरेंजमेंट (प्रवेश तिथि – दिसंबर 7, 2017) और आॅस्ट्रेलिया ग्रुप (प्रवेश तिथि – जनवरी 19, 2018)। चैथा महत्वपूर्ण मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम है – न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप। अमेरिका ने इसमें प्रवेश के लिए भी पूरी मदद की लेकिन चीन के अड़ियल रवैये के कारण भारत इसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि इसके लिए भी प्रयास जारी है।

भारत को विश्वस्त सहयोगी मानते हुए अमेरिका ने इसी वर्ष 31 जुलाई को भारत को स्ट्रैटेजिक ट्रेड आॅथोराइजशन -1 (एसटीए – 1) देश का दर्जा दिया। बहुत जल्दी, यानी चार अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इसके पश्चात भारत का दर्जा अमेरिका के नैटो (नाॅर्थ एटलांटिक ट्रीटी आॅर्गनाजेशन) सहयोगियों के समकक्ष हो गया। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले उत्पाद और रक्षा उपकरण बिना कानूनी अड़चनों और भारी-भरकम कागजी कार्यवाही के बेच सकेगा। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर राॅस के अनुसार एसटीए – 1 का दर्जा भारत को रक्षा क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात के लिए बेहतर अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत के दर्जे में यह महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले सात वर्षों में भारत अमेरिका से 9.7 अरब डाॅलर का उच्च तकनीक का सामान खरीद सकता था, लेकिन विभिन्न प्रतिबंधों के कारण यह संभव नहीं हो सका, परंतु अब ये संभव हो सकेगा।

अमेरिका ने जिन 36 देशों को ये दर्जा दिया है उनमें से अधिकतर नैटो सहयोगी हैं। अब तक एशिया में ये दर्जा सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान को ही दिया गया था। जाहिर है भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कदम को स्वागत किया। मंत्रालय ने कहा – “भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किए जाने का ये तार्किक उत्कर्ष है। ये इस बात को एक बार फिर स्थापित करता है कि संबंधित बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के जिम्मेदार सदस्य के रूप में भारत का रिकाॅर्ड बेदाग है। इससे भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस बीच दो अगस्त को अमेरिकी संसद ने नेशनल डिफेंस आॅथोराइजेशन एक्ट – 2019 के तहत भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकास एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काटसा) से छूट देने का विधेयक भी पारित कर दिया। भारत रूस से लगभग 4.5 अरब डाॅलर की लागत से एस-400 ट्राइंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहता है जिसमें रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से बाधा आ रही थी। बराक ओबामा के कार्यकाल में वाइट हाउस में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और सेनेट आम्र्ड सर्विसेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य रहे अनीश गोयल कहते हैं कि काटसा छूट के लिए अमेरिकी संसद की प्रशंसा की जानी चाहिए। ऐसा करके संसद ने दोनों देशों के संबंधों में आने वाले तनाव को दूर कर दिया है। ये इस बात का मजबूत संकेत है कि अमेरिका, भारत से अपने संबंधों को कितना महत्व देता है।

पिछले कुछ ही दिनों में अमेरिका ने जिस सक्रियता से भारत के साथ उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के क्षेत्र में पेश आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है और जैसे भारत की रक्षा जरूरतों को समझते हुए रूस से उच्च तकनीक वाली रक्षा सामग्री खरीदने के लिए छूट दी है, उससे भारत के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता तो प्रकट होती ही है, साथ में यह भी स्पष्ट होता है कि वो भारतीय-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक रीजन) में अपनी रणनीति को लागू करने के विषय में कितना गंभीर है जहां चीन का व्यावसायिक और रणनीतिक दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

चीन अगले 50 वर्षों के दौरान अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहा है। म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों तक ही नहीं चीन ने मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तक में अपने पैर पसारे हैं। वो दुनिया के 76 देशों में परियोजनाएं विकसित कर रहा है और रेल, सड़क, समुद्री मार्गों से ही नहीं दुनिया भर से वायु मार्गों से जुड़ने की योजना भी बना चुका है।

चीन को लगता है कि जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन और 20वीं सदी में अमेरिका की शक्तिशाली नौसेनाओं ने नौसैनिक अड्डों के विश्वव्यापी नेटवर्क के माध्यम से अपने व्यापारिक अधिपत्य को बढ़ाने का काम किया, वैसे ही अगर उसे भी अगली सदी में आगे बढ़ना है तो उसे भी दुनिया भर में, और खासतौर से भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में अपने अड्डे बनाने होंगे जहां विश्व के व्यस्ततम जलमार्ग मौजूद हैं। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वो सिर्फ अड्डे ही नहीं बना रहा, लंबी चैड़ी नौसेना भी तैयार कर रहा है।

चीन की नीयत और योजनाएं अब किसी से छुपी नहीं हैं। जाहिर है अमेरिका ने इसकी काट निकालने के लिए योजना तैयार कर उसे लागू करना भी शुरू कर दिया है। भारत इस योजना का महत्वपूर्ण अंग है। अगर अमेरिका ने इस क्षेत्र में भारत को अपना सहयोगी चुना है तो उसे तकनीकी और सैन्य दृष्टि से मजबूत भी बनाना होगा, उसे आधुनिकतम हथियार भी देने होंगे। अमेरिका ने इसके लिए ईमानदारी से प्रयास भी किए हैं। इस पूरी योजना का रणनीतिक महत्व है तो यह भी सच है कि इससे अमेरिका को हथियारों का नया और बड़ा बाजार भी मिलेगा। भारत को चाहिए कि वो अमेरिका का सहयोगी तो बने पर अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए। चीन जैसे पड़ोसी देश को दुश्मन न बनाया जाए, लेकिन उसके अतीत को देखते हुए तैयारी भी पूरी रखी जाए।

आगामी छह सिंतबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मैटिस की भारतीय विेदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ 2$2 वार्ता है। ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के शिखर सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण अमेरिका में प्रस्तावित यह वार्ता पहले टाल दी गई थी, अब ये भारत में होगी। 2$2 वार्ता में भारत के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री एक साथ अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री से बात करते हैं ताकि दोनों क्षेत्रों के बारे में समग्र और व्यापक बातचीत हो सके और अड़चनें दूर कर राजनयिक और रणनीतिक मसलों को जल्दी से जल्दी सुलझाया जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के संबंधों में आपसी समझ और गहरी होगी और जमीनी स्तर भी कामकाज को और गतिशील बनाया जा सकेगा।

“Which colour is your violence? Scrutinising mob lynching in India through transparent glasses” in TOI Blog

One’s heart bleeds for the loss of life, whether it belongs to one religion or the other, one caste or the other.

The incidents of mob lynching are as painful as stabbing a dagger in the heart of the country. The attacks to which several lives have succumbed are deeply condemned.

India has sadly witnessed mob violence since its inception and yet it takes on a different kind of podium today; one where it is not just about religious differences as used to be the case, post partition, but increasingly about the involvement of agencies that orchestrate moral sensitivities of the society.

It is deeply perturbing that one’s bereavement is cashed upon by certain people for political mileage.

Pratik Sinha of Alt news adds an interesting perspective to the new age WhatsApp driven mob violence, he says , “Suddenly people from the rural areas in particular are inundated with information and are unable to distinguish from what is real and what is not. They tend to believe whatever is sent to them.” The nature of trigger has changed over time and so has the indulgence of Opposition parties.

Media has been playing the blame game back and forth and waiting for the ball in the court to be coloured by the accusations launched by one party against another. It is a strong tactic for prime time and TRP but a heartless one indeed.

With no sufficient proof, with a severely deficient background check, and a largely biased lobby, how can one expect the truth to be delivered, the way it is.

It is quite unsettling that the news reports have been relaying Hindu religious fundamentalism like a parrot lured with red chillies. The victims of mob lynching are always shown as wearing the green garb while the perpetrators of crime, an orange one.

Why are so many attacks on Hindus dusted under the carpet?

Killing of Hindu devotees at Akshradham temple of Gandhinagar, temples of Jammu and Kashmir , Godhra have been called as acts of mere terrorism and it has been categorically stated time and again that terrorism has no religion.

However hooliganism has religious back support?

When Muslims are killed, they are viewed as minority, when Hindus are killed it is mere behavioural condemnation with suddenly no weightage given to religion? When a Muslim is killed, the murderer is naturally presumed to be given shelter and shade of RSS propaganda, even though no report, no statistics can verify it.

Where Islam is guarded against, Hinduism is not?

Such divisive treatment is the root cause of perpetuating violence.
The point of this argument is not to portray Hindus as victims but rather to show that the acts of hate crime need to be viewed with a zeal for justice for individual lives, not with a politically tarnished religious lobby.

Furthermore, the term ‘Cow vigilantism’ is being used as sensitive bait where the dialogue between two religions can be made into a political strife and be used in divisive voting.

The opposition parties seem to want to hit two birds with one stone with the issue of cow slaughter as they wage wars between the sensitivities of Dalits and lower caste men and Muslims as opposed to Hindus.

Yogi Adityanath made a clear speech where he stated that the people’s lives are important and so are the cows. This was misinterpreted and misquoted as cows being more important than people and hence once again paid media sowed the seeds for hate and hate induced crime.

Some went on to put words in his mouth and make his concern look like apathy towards loss of life. If anything, the Chief Minister of Uttar Pradesh has acted as a law abiding minister and only banned illegal slaughterhouses. Why, is not the protection of cows a mandate of the Directive Principles of State Policy, Article 48?

Prime Minister Narendra Modi has condemned the self styled cow vigilantes and also brought to the surface how these are anti social elements, playing the gossip mongers, hate spreaders, pulling wool over the eyes of innocent people.

It is in the keeping with the issue of circulation of false news and politically motivated messages that the Government has decided to revamp the structure.

As observed, fake news in India travels extensively through Apps such as ‘Whatsapp’ and these become the fulcrum of mob violence.

A four-member committee headed by Union Home Secretary Rajiv Gauba has been constituted to tender suggestions to deal with the issue of mob lynching. Recommendations will be submitted to Home Minister Rajnath Singh and further on to Prime Minister Narendra Modi.

The selective screening of issues is another of the dirty tricks employed by paid media. Why does the news of BJP workers being killed by TMC in West Bengal only get a one day, one para coverage?

A certain nexus of the opposition parties wants to oust the party in power by using these diabolic narratives.

It is also uncanny that such controversies always seem to crop up right around the elections.

Is the life of a party person less valuable than a socially religious person? What a low move to kill the party workers because they have performed well in Panchayat polls. However, the loss of life is condemned less here because well, there are no religious signs to play with?

If violence has a colour it’s not green or orange, it’s red, it’s blue back.

We condemn violence, we condemn death, we condemn cheap tricks that infest upon the wounds of the mothers and fathers, brothers and sisters of our nation.

“इमरान! तुम सेना के बूट पाॅलिश करने वाले नहीं तो और क्या हो?” in Punjab Kesari

चुनावी नतीजे आने के बाद अपने पहले विजय संबोधन में इमरान खान ने भारतीय मीडिया से शिकायत की कि उसने उन्हें बाॅलीवुड फिल्मों के विलेन (आतंकी पाकी सेना के एजेंट) के तौर पर पेश किया। अगर इमरान के नजरिए से देखें तो हो सकता है कि उनकी शिकायत जायज हो, लेकिन अगर ठोस तथ्यों के आधार पर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मीडिया का रवैया बहुत हद तक सही है। वैसे भी भारतीय मीडिया इमरान की तरह सेना के इशारों पर नहीं चलता जिन्हें उनकी दूसरी पूर्व पत्नी रेहाम खान सेना का ‘बूट पाॅलिशर’ करार दे चुकी हैं।

भारतीय मीडिया अगर इमरान को सेना का एजेंट मानता है जो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। बात शुरू करते हैं प्री-पोल रिगिंग से यानी चुनाव से पहले की धांधली से। क्या ये अकस्मात था कि पाकिस्तानी अदालतों ने चुनाव से एन पहले ताबड़तोड़ कई फैसले सुनाए और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को जेल भिजवा दिया? क्या ये महज संयोग था कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज (पीएमएलएन) के अनेक मजबूत उम्मीदवारों को धमकाया गया और पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया गया? क्या ये संयोग था कि चुनाव प्रचार के दौरान इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को वरीयता दी गई जबकि पीएमएलएन और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को अनेक स्थान पर रैली करने की इजाजत तक नहीं दी गई? आखिर किसकी शह पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद के गुर्गों को चुनाव लड़ने की मोहलत दी गई? आखिर क्यों एन चुनाव से पहले 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना और घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया? आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने इमरान को जिताने के लिए पूरी बिसात बिछाई….इतनी मेहनत (धांधली) की? आखिर क्यों सेना और इमरान की आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूजचैनलों पर गाज गिराई गई, उनका प्रसारण का रोका गया?

इसका जवाब इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ने दिया। उन्होंने इसके लिए साफ तौर से पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने साफ कहा कि आईएसआई अपने इरादे पूरे करने के लिए अदालतों, मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सबको धमकाती है। जज सिद्दिकी को 30 जुलाई को उनकी इस ‘हिमाकत’ के लिए सजा भी दे दी गई। वो इमरान खान नाअहली (अयोग्यता) केस की सुनवाई करने वाली डिवीजनल बैंच के सदस्य थे। उन्हें बड़ी बेशर्मी से इससे हटा दिया गया और उनकी जगह जज मियां गुल हसन औरंगजेब को शामिल किया गया। इस मामले की सुनवाई एक अगस्त को होनी है, लेकिन फैसला क्या आएगा, लगता है ये भी पहले ही तय हो चुका है।

अब बात करते हैं चुनाव के दौरान होने वाली धांधलियों की। आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि ये सिर्फ भारतीय मीडिया नहीं था जिसने पाकिस्तानी चुनावों को फर्जी करार दिया। पाकिस्तान के अनेक दलों ने चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार किया है। पीएमएलएन और पीपीपी ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे तक मांग लिए। 27 जुलाई को विपक्षी दलों की बैठक में पीएमएलएन और मुŸााहिदा मजलिए-ए-अमल ने चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। नेशनल असेंबलीऔर राज्यों की विधानसभाओं के करीब 300 उम्मीदवारों ने फिर से मतगणना की मांग की है।

इमरान खुद को पाकिस्तान का नया हीरो मानने की गलतफहमी पाल सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें खुद नहीं सोचना चाहिए कि उनकी और आईएसआई की इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद क्यों वो नेशनल असेंबली और पंजाब विधानसभा में सादा बहुमत तक नहीं हासिल कर सके? ऐसा क्या हुआ कि आतंकियों को चुनाव लड़वाने की महत्वकांक्षी योजना क्यों मुंह के बल गिर पड़ी? आईएसआई की पूरी मेहनत के बावजूद वो एक सीट तक नहीं हासिल कर सके?

इमरान क्या इस बात का जवाब देना चाहेंगे कि जो मतगणना चंद घंटों में पूरी हो जाती है, वो चार दिन तक भी पूरी क्यों नहीं हो सकी? नेशनल असेंबली की करीब 18 सीटें ऐसी हैं जिनमें इमरान की पार्टी की जीत का अंतर 1,000 मतों का भी नहीं है। 23 सीटों में जीत का अंतर 5,000 से भी कम है, जबकि 41 सीटों में 10,000 से भी कम। ध्यान रहे इन सीटों पर रिजेक्टेड वोट हजारों में हैं।

मतगणना में देरी क्यों की गई? अन्य सीटों के मुकाबले चुनींदा सीटों पर ही रिजेक्टेड वोट इतनी बड़ी तादाद में क्यों पड़े? क्या पाकिस्तान के वोटर इतने जाहिल हैं कि वो ठीक से वोट तक नहीं दे सकते? आखिर एन चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग का सर्वर क्यों जवाब दे गया? ऐसे हालात में पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी क्यों आंख मंूद कर मान ले कि पाकिस्तानी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुए?

27 जुलाई को इस्लामाबाद में अपने संवाददाता सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के निगरानी दल ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से अवसर नहीं मिला। इमरान भले ही इस बार के चुनावों को सबसे साफ-सुथरे बता रहे हों, लेकिन यूरोपियन यूनियन इलेक्शन आॅब्सर्वेशन मिशन (ईयूईओएम) के चीफ आॅब्सर्वर माइकल गेहलर ने साफ कहा, “इस बार के चुनाव 2013 के चुनावों जितने अच्छे नहीं थे। हालांकि सभी पार्टियों को निष्पक्ष तरीके से समान अवसर देने के लिए अनेक वैधानिक उपाय मौजूद थे, लेकिन हमारा निष्कर्ष है कि न तो इस मामले में समानता बरती गई और न ही पार्टियों को बराबरी से अवसर मिले। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व सŸाारूढ़ दल को हानि पहुंचाने के लिए व्यवस्थागत तरीके से प्रयास किए गए। राजनीतिक दलों, नेताओं, उम्मीदवारों और चुनाव अधिकारियों पर लगातार हमलों ने चुनाव प्रचार के माहौल को प्रभावित किया।“

यूरोपियन पार्लियामेंट इलेक्शन आॅब्सर्वेशन डेलीगेशन के प्रमुख जीन लैम्बार्ट ने मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में फौजियों की उपस्थिति पर आपŸिा दर्ज करवाई। उन्होंने कहा, “हम मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में सुरक्षाबलों की उपस्थिति से हैरान थे। हम सुरक्षा की आवश्यकता समझते हैं, लेकिन चुनाव सिविल सोसायटी का काम होता है, हम चाहते हैं कि इसमें सेना से ज्यादा सिविल संस्थाओं का सुपरविशन हो, खासतौर से मतदान केंद्रों के भीतर जहां लोग वोट डालते हैं।”

यही नहीं काॅमनवेल्थ पर्यवेक्षकों ने भी अनेक विषयों पर आपŸिा जताई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में कहा, ”शासन-प्रणाली की मजबूत लोकतांत्रिक और सिविल संस्थाओं का विकास पाकिस्तान के दीर्घकालिक स्थायित्व और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में अमेरिका, मतदान पूर्व चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों को लेकर पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की चिंताओं से सहमति जताता है। इनमें अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना भी शामिल है….हम इस विषय में ईयूईओएम के निष्कर्षों से भी सहमत हैं।“

यूरोपियन यूनियन, काॅमनवेल्थ और अमेरिका इशारों ही इशारों में जिन्हें पाकिस्तान के लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे हैं, क्या इमरान उसे नहीं समझ पा रहे हैं? क्या ये ‘लोकतंत्र के दुश्मन’ ही तो इमरान के दोस्त नहीं हैं? ये सिर्फ भारत का मीडिया ही नहीं है जो उन्हें सेना का पिट्टू मानता है, पूरी दुनिया और खुद उनके देश के लोग और चुने गए स्वतंत्र उम्मीदवार भी यही मानते हैं जिन्हें इमरान को समर्थन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इमरान ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’, झूठा और न जाने क्या क्या कहा, वो हो सकता है भारत में मुसलमान वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलोें को बहुत भाया हो, लेकिन उससे करोंड़ों-करोड़ लोगों को इमरान से वितृष्णा भी हुई है। इमरान ने नवाज शरीफ को मोदी का यार बताते हुए नारा लगाया – जो मोदी का यार है, वो देश का गद्दार है। नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए पर इमरान ने उनपर ‘देश बेचने’ का आरोप लगा दिया। न केवल चुनावी भाषणों में, बल्कि अपने विजय संबोधन में भी इमरान ने जैसे कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताया और भारतीय फौज को गाली दी, उससे भारत की आम जनता का उनसे मोहभंग होना स्वाभाविक है।

ये आश्चर्यचकित ही करता है कि जो इमरान पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नवाज शरीफ को भारत से व्यापार के लिए ‘गद्दार’ बताते रहे, वो अपने विजय संबोधन में आतंकवाद को जायज ठहराते हुए भी भारत से दोस्ती के गीत गाने लगे, भारत के साथ ‘व्यापार संबंधों’ की बात करने लगे? डूबती हुई पाकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में 100 दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की है। जाहिर है, भारत के साथ व्यापारिक संबंध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्हें अब थूक कर चाटना भी मंजूर है। इमरान, शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन चले अपने धरने को इतनी जल्दी भूल जाएंगे, ऐसा सोचा भी न था।

इमरान खान! भारतीय मीडिया तुम्हें ‘बाॅलीवुड के विलेन’ की तरह नहीं पेश कर रहा, तुम्हें सिर्फ ‘सच का आइना’ दिखा रहा है। तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें पाकिस्तान के युवाओं की धड़कन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है, हालांकि हम ये भी नहीं मानते। इस बार कुल 51.85 प्रतिशत मत पड़े, इसमें सिर्फ तुम्हारे समर्थक और युवा ही नहीं, दूसरी पार्टियों के समर्थक और सभी आयुवर्ग के लोग थे। ऐसे में हमारे लिए ये बात गले के नीचे उतारना मुश्किल है कि तुम युवाओं के दिल की धड़कन हो, लेकिन जैसे आईएसआई ने तुम्हें जितवाने के लिए जी जान एक कर दिए, उससे ये तो साफ है कि तो सेना के मुखबिर हो।

भारत की सेना को लतिया कर तुम भारत के नेताओं का समर्थन नहीं हासिल कर सकते। पाकिस्तान के आवाम ने हाफिज सईद के उम्मीदवारों को धक्का दे कर ये स्पष्ट कर दिया है कि वो आतंकवाद के समर्थक नहीं है। अगर तुम्हारी सेना खुद ये बात समझ जाए, या तुम उन्हें अपनी नीतियों बदलने के लिए तैयार कर सको तो दोनों देशोें के संबंध बेहतर हो सकते हैं। याद रखना आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। अगर तुम और तुम्हारी सेना कश्मीर सहित पूरे भारत में अपना आतंकी नेटवर्क समेटने के लिए गंभीरता दिखाओगे तो भारत तुम्हारी अवश्य मदद करेगा। पहल तुम्हें और तुम्हारी सेना को ही करनी होगी।