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“इस्लामिक उम्माह की मरीचिका” in Punjab Kesari

 

भारत में इस्लामिक कट्टरवादियों का मानना रहा है कि उनके लिए देश बाद में और इस्लाम पहले है। इसलिए किसी भी गैरइस्लामिक व्यक्ति से पहले उनका फर्ज इस्लामिक बिरादरी या इस्लामिक उम्माह के प्रति है। ये सोच कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान (1919 – 1922) भी देश में इस्लामी उम्माह के नाम पर खिलाफत आंदोलन चलाया गया। शौकत अली, मुहम्मद अली और अबुल कलाम अजाद द्वारा चलाए गए इस आंदोलन का मकसद था ब्रिटिश साम्राज्य पर तुर्की में खिलाफत (खलीफा का शासन) न खत्म करने के लिए दबाव डालना। दुर्भाग्य की बात ये है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया क्योंकि इसकी एवज में उन्हें असहयोग आंदोलन में मुस्लिम नेताओं का साथ मिला।

बहरहाल तुर्की में खलीफा के पतन और आधुनिक सरकार के गठन के साथ भारत का खिलाफत आंदोलन तो अपनी मौत मर गया, लेकिन इस्लामिक बिरादरी को अलग मानने का ये विचार किसी न किसी रूप में लगातार जारी रहा। आगे चलकर भारत के विभाजन में भी इसका अहम हाथ रहा। आश्चर्य नहीं कि आजकल पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है उसमें पाकिस्तानी अपनी पहचान अपनी धरती में ढूंढने की जगह सउदी अरब में ढूंढ रहे हैं। उधर आजाद भारत में भी जब संविधान बनाया जाने लगा तो उसमें भी मुसलमानों को उनकी ‘अलग पहचान’ के नाम पर आधुनिक मूल्यों और कानूनों के तहत लाने की कोशिश नहीं की गई।

अस्सी के दशक में भारत में इस्लामिक उम्माह के जिन्न ने एक बार फिर सिर उठाया जब विदेश सेवा के अफसर से नेता बने सय्यद शहाबुद्दीन ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को ‘इंडियन मुस्लिम’ कहना गलत है, उन्हें तो ‘मुस्लिम इंडियन’ कहना चाहिए क्योंकि उनके लिए अपनी धार्मिक पहचान और इस्लामिक बिरादरी भारत से पहले है। शहाबुद्दीन ने बढ़-चढ़ कर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय अदालतें इस्लामिक कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकतीं।

आपको ध्यान होगा कि तीन तलाक मामले में गैरसरकारी संगठन आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने भी सबसे पहले यही कहा था कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकता। तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा में विधेयक पारित होने के बावजूद इस्लामिक कट्टरवादी अपने रूख पर कायम हैं। इनके लिए उन अधिकारों का कोई मतलब नहीं है जो भारतीय संविधान ने भारतीय नागरिक होने के नाते मुस्लिम महिलाओं को दिए हैं।

‘भारत के अस्तित्व’ को मान्यता न देने और इस्लामिक उम्माह की सर्वोच्चता का ये विकृत विचार अब भी जारी है। इंटरनेट जैसे विकसित संचार माध्यमों के साथ ही यह और बढ़ गया है। अगर आजादी से पहले खिलाफत आंदोलन चलाया गया तो आज हम देखते हैं कि अनेक कट्टरवादी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया में इस्लामिक खिलाफत का झंडाबरदार है। आश्चर्य नहीं कि ये संगठन भोले भाले भारतीयों को फुसला कर उन्हें इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में ‘जिहाद’ के लिए भेज रहे हैं।

भारत की प्रमुख आतंकवाद विरोधी संस्था नेशनल इनवेस्टीगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने हाल ही में भारत से आईएसआईएस में शामिल होने गए लोगों की सूची जारी की है। आश्चर्य नहीं कि इसमें सबसे ज्यादा लोग केरल से हैं जहां यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकारों ने ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर लंबे अर्से तक पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे अतिवादी संगठनों को प्रश्रय दिया।

भारत में कट्टरवादी संगठन ‘इस्लामिक उम्माह’ के नाम पर अर्से से आम मुसलमान को ठग रहे हैं। लेकिन एक बार तो इसकी जांच परख होनी ही चाहिए कि क्या दुनिया में वास्तव में कोई इस्लामिक उम्माह या बिरादरी जैसी कोई चीज है? शुरूआत करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान से जिसे इस्लाम और ‘टू नेशन थ्योरी’ के नाम पर बनाया गया और जिसे आज दुनिया में आतंकवाद का सबसे घिनौना और क्रूर गढ़ माना जाता है। वहां अंदरूनी हालात आज विस्फोटक हैं, एक मत के मुसलमान दूसरे मत के मुसलमानों को मार रहे हैं। याद रहे पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली भी मुसलमान थे जिनपर पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबी फौजियों ने अकथनीय जुल्म ढाए। इसका नतीजा अलग बांग्लादेश के रूप में सामने आया। सोचने की बात है कि अगर सारे मुसलमान एक बिरादरी होते तो बांग्लादेश अलग क्यों होता? पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों का नरसंहार करने वाली पाकी सेना अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। एक तरफ तो ये अपने आतंकियों के जरिए कश्मीर में हिंसा फैला रही है तो दूसरी तरफ इस्लामी उम्माह का वास्ता देकर फिलिस्तीन के नाम पर उन्माद भड़का रही है। हाल ही में आतंकी हाफिज सईद की रैली में फिलिस्तीनी राजदूत वलीद अबू अली के शामिल होने पर भारत ने सही एतराज जताया था। इस्लामी उम्माह की आड़ में आतंकियों को समर्थन कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?

पाकिस्तान इस्लामिक देश है। लेकिन पड़ोसी मुस्लिम देशों अफगानिस्तान और ईरान से इसका छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। अफगानिस्तान में आए दिन पाकिस्तानी आतंकवादी विस्फोट करते हैं जिनमें निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। इस्लामिक देश आपस में क्या सिर फुटव्वल कर रहे हैं इसपर बात करने से पहले ये बता दें कि दुनिया में इनका एक संगठन भी है – आॅर्गनाइजेशन आॅफ इस्लामिक काॅओपरेशन (ओआईसी) जिसके 57 सदस्य हैं। म्यांमार में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं के बाद जब लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को घर छोड़ना पड़ा, तब ओआईसी ने गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं किया। क्या रोहिंग्या मुसलमान कम मुसलमान थे जो दूसरे मुस्लिम देशों ने उनकी मदद नहीं की? वैसे भी अगर वास्तव में मुस्लिम उम्माह होती तो दुनिया में मुसलमानों के इतने देश ही क्यों होते?

अब नजर डालते हैं अन्य इस्लामिक देशों में चल रही उठा-पटक पर। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज दुनिया में अगर सबसे विस्फोटक स्थिति किसी की है तो वो इस्लामिक देशों की ही है। सबसे पहले बात मुसलमानों के सबसे प्रिय देश सउदी अरब की जहां उनके सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मौजूद हैं। सुन्नी बहुल सउदी अरब, शिया बहुल ईरान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। सउदी अरब को जहां शियाओं की भनक लगती है, वो वहां बदला लेने पहुंच जाता है। पड़ोसी देश यमन में भी उसने इसी वजह से 2015 में हस्तक्षेप किया। सउदी अरब ने कथित रूप से ईरान समर्थित शिया होउती विद्रोहियों को कुचलने और सुन्नी शासकों का समर्थन करने के लिए यमन में दखल दिया, लेकिन मामला हल नहीं हुआ, वहां लड़ाई अब भी जारी है। जून, 2017 में सउदी अरब के नेतृत्व में छह देशों ने कतर के बहिष्कार की घोषणा की क्योंकि कतर मिस्र के संगठन इस्लामिक ब्रदरहुड का समर्थन कर रहा था जिसे मिस्र आतंकवादी संगठन मानता है। यही नहीं सउदी अरब को इस बात से भी सख्त एतराज है कि कतर ईरान से व्यापार क्यों कर रहा है।

ध्यान रहे कुछ समय पूर्व सउदी अरब ने ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिजम कोआलिशन’ बनाया जिसका प्रमुख पाकिस्तान का पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ है। इस संगठन में 41 देश हैं और इसका मकसद दुनिया से आतंकवाद को उखाड़ फेंकना है। ये कहीं न कहीं हास्यास्पद लगता है क्योंकि दुनिया भर में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम फैलाने में सबसे बड़ा हाथ सउदी अरब का रहा है और आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की क्या भूमिका है, ये बताने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। सउदी अरब ने कागजी स्तर पर ये संगठन बना तो लिया है लेकिन इसे जमीन पर उतारना अभी बाकी है। बहरहाल राहिल शरीफ को इसका प्रमुख बनाए जाने से ईरान, पाकिस्तान से और कुपित हो गया है। ईरान का मानना है कि ‘आतंकवाद’ तो सिर्फ बहाना है, ये संगठन तो असल में उसे नीचा दिखाने के लिए बनाया गया है।

चाहे सउदी अरब हो या यमन, मिस्र, सीरिया, लीबिया, इराक या ईरान, पूरे इस्लामिक जगत में मारकाट मची हुई है। उधर सउदी अरब में युवा मोहम्मद बिन सलमान को युवराज (क्राउन प्रिंस) घोषित करने के बाद देश के अंदर भी कोहराम मचा हुआ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर उन्होंने अनेक राजकुमारों और बड़े व्यापारियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है। सलमान ने हाल ही में जैसे लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को बंदूक की नोक पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उससे भी सिर्फ खाड़ी देशों में ही नहीं, पश्चिम देशों में भी चिंता की लहर दौड़ गई। हरीरी ने अपने कथित इस्तीफे में कहा था कि वो लेबनान में ईरान समर्थित हिजबोल्ला के बढ़ते प्रभाव के कारण इस्तीफा दे रहे हैं। ध्यान रहे उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी 2005 में कार धमाके में मारे गए थे जिसके लिए हिजबोल्ला पर शक किया गया था।

वर्तमान में इस्लामिक दुनिया में मोटे तौर पर दो गुट नजर आते हैं। एक तो सउदी अरब के नेतृत्व वाला सुन्नी गुट जिसे अमेरिका समर्थन दे रहा है तो दूसरी तरफ शिया गुट है जिसे रूस का समर्थन हासिल है। इस्लामिक देशों के बढ़ते आपसी मतभेदों के बीच आईएसआईएस का उल्लेख करना आवश्यक है जिसने इराक और सीरिया के बड़े भूभाग पर कब्जा कर खिलाफत स्थापित करने की घोषण कर दी। पहले तो अपने-अपने स्वाथों के हिसाब से इस्लामिक देश इसका इस्तेमाल करते रहे और अंदर ही अंदर इसे मदद देते रहे पर जब इसके अत्याचारों और क्रूरताओं के वीभत्स किस्से सामने आने लगे तो महाशक्तियों को होश आया और इसकी सत्ता को उखाड़ फेंका गया। इसकी सत्ता भले ही समाप्त हो गई हो, पर इसके हजारों आतंकवादी अब भी जिंदा हैं और कुछ तो अफगानिस्तान में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान में आईएसआईएस नेटवर्क वास्तव में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का खेल है। अफगानिस्तान का जिक्र आया है तो वहां तालिबान और मुल्ला उमर की सरकार भी आपको याद होगी जिसे अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड संेटर पर अल कायदा के हमले के बाद उखाड़ फेंका।

दुनिया में इस्लामिक देशों में जो भीषण युद्ध और सिर फुटव्वल है, उसे देख कर सहज ही सवाल उठता है कि भारत में इस्लामिक कट्टरवादी किस ‘उम्माह’ की बात कर रहे हैं? जब दुनिया में ऐसी कोई चीज है ही नहीं तो ये भारतीय मुसलमानों को क्यों भरमा रहे हैं? आखिर इनका मकसद क्या है? ये क्यों नहीं चाहते कि भारतीय मुसलमान अपनी मिट्टी से जुड़ें, देश का संविधान मानें और दकियानूसी सोच छोड़ आधुनिकता और विकास की राह पर आगे बढ़ें? जाहिर है, इसके पीछे सिर्फ राजनीति ही नहीं, अनेक अंतरराष्ट्री षडयंत्र भी हैं।

“सेनेट में शांति प्रस्ताव, सीमा पर खूनखराबा बेनकाब हो चुकी है जनरल बाजवा की भारत नीति” in Punjab Kesari

पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने सुरक्षा, पड़ोसी देशों से संबंधों, अपनी विदेश यात्राओं और बहुत से अन्य महत्वपूर्ण मसलों पर दिसंबर 19 को सेनेट के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत किया और सांसदों के सवालों के जवाब दिए। अपेक्षा की गई थी कि सांसद इस बैठक के बारे में मीडिया से चर्चा नहीं करेंगे, लेकिन कुछ लोगों ने फिर भी इस विषय में बातचीत की। इसके मुताबिक बाजवा ने सांसदों से कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। अगर सरकार, भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने की पहल करेगी तो वो उसे समर्थन देंगे।

पाकी सेना परंपरागत रूप से भारत को दुश्मन नंबर एक मानती रही है। हालांकि आठवें सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी (29 नवंबर 2007 से 29 नवंबर 2013) ये तक कह चुके हैं कि पाकिस्तान का असली दुश्मन भारत नहीं, बल्कि देश के भीतर पल रहे आतंकी संगठन हैं, फिर भी सेना का रवैया नहीं बदला है। ऐसे में बाजवा का यह बयान ऐतिहासिक माना जा रहा है। उनके इस बयान का एक अर्थ ये भी माना जा सकता है कि आज पाकिस्तान की भारत नीति दोराहे पर आ गई है। इसमें संभवतः पहले जैसी कट्टरता नहीं बची है और वो इसमें परिवर्तन के बारे में भी सोच सकता है। आपको ज्ञात ही होगा कि वहां भारत, अन्य पड़ोसी देशों तथा अमेरिका के बारे में विदेशनीति सेना ही तय करती है। विदेश मंत्रालय की औकात कुल मिलाकर स्टेनो से अधिक नहीं होती। संभवतः यही कारण है कि पदच्युत प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पूरे चार साल तक किसी विदेश मंत्री की नियुक्ति नहीं की और ये विभाग खुद ही संभालते रहे ताकि सेना और चुनी हुई कठपुतली सरकार में कोई गलतफहमी न पैदा हो।

पाकिस्तान में शाहिद खकान अब्बासी की लचर सरकार और गहरे आर्थिक संकट के मद्दे नजर वहां बार-बार कयास लगाए जा रहे थे कि सेना एक बार फिर कमान संभाल सकती है। बाजवा के सेनेट के सामने पेश होने और नीति निर्माण में संसद को खुद वरीयता देने के बाद समझा जा रहा है कि सेना फिलहाल किसी तख्तापलट का इरादा नहीं रखती। लेकिन यहां हम चर्चा सिर्फ भारत के संबंध में उनके बयान तक सीमित रखेंगे।

बाजवा के बयान पर भारत प्रतिक्रिया देता, इससे पहले पाकिस्तान में ही उसपर सवाल उठने लगे। सबसे पहला प्रश्नचिन्ह तो इसी बैठक में उनके जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) प्रमुख हाफिज सईद वाले बयान पर उठा। इसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान में सईद की महत्वपूर्ण भूमिका है और आम पाकिस्तानी की तरह उसे भी कश्मीर मुद्दा उठाने का हक है। मुंबई हमलों के आरोपी और अंतरराष्ट्रीय आतंकी सईद के बारे में उनके बयान को बिला शक उसकी आतंकी नीतियों का समर्थन समझा गया। आम राजनीतिक दलों ने इसे सईद की राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग के समर्थन के तौर पर लिया। ध्यान रहे वहां सेना, जमात को राजनीतिक पार्टी का रूप देकर मुख्यधारा में लाने और संवैधानिक वैधता दिलवाने की पूरी कोशिश कर रही है। सेना को इसमें दो खास फायदे दिखाई दे रहे हैं, एक – लगातार कमजोर हो रहे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज जैसे मुख्यधारा के दलांे के बीच सेना को अपना प्राॅक्सी राजनीतिक दल खड़ा करने का अवसर मिलेगा जो पूरी तरह उसके कब्जे में होगा और दो – जमात जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचाया जा सकेगा। सनद रहे कि पाक सरकार इसका विरोध कर रही है। दिसंबर 24 को सरकार ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर जमात की उस याचिका का औपचारिक रूप से विरोध भी किया जिसमें उसने मिल्ली मुस्लिम लीग को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने की मांग की है।

बाजवा ने भारत के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की बात तो कही पर कश्मीर पर उनका मत बिल्कुल भी नहीं बदला। अगर सेना पहले जैसे ही ‘कश्मीरियों’ (हुर्रियत के आतंकियों और अन्य कश्मीरी आतंकियों) को नैतिक और राजनयिक समर्थन (सीमापार से आंतकी समर्थन) देती रहेगी तो कश्मीर में शांति कैसे होगी? जाहिर है बाजवा संबंधों का सामान्यीकरण नही, सिर्फ दिखावा चाहते हैं। यह तमाशा अगर हुआ तो बहुत कुछ पहले जैसा ही होगा जिसमें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकने के लिए एक तरफ तो पाकिस्तान की चुनी हुई हुई सरकार (कठपुतली सरकार) भारत सरकार से बातचीत करती थी, तो दूसरी तरफ सेना अपना खेल खेलती रहती थी।

लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि आखिर बाजवा भारत के प्रति ये बयान देने के लिए क्यों मजबूर हुए। इसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी दबाव। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पाकिस्तानी सेना ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह उसके खिलाफ हर संभव कदम उठाएगा। इसमें पाकिस्तान में घुस कर आतंकी ठिकानों का सफाया, आर्थिक सहायता रोकना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी शामिल है। पाकी सेना एक तरफ तो सख्त बयानी के लिए अमेरिका से मुंहजोरी करती है तो दूसरी तरफ अंदरखाने में उसे मनाने की कोशिश भी करती है ताकि उसकी आर्थिक सहायता जारी रहे।

ध्यान रहे पाकिस्तान आजकल गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है और उसके पास तीन महीने के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा नहीं है। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बड़े गाजे-बाजे के साथ चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर की घोषणा की थी। अब साफ हो रहा है कि चीन ने इसके लिए सहायता नहीं बल्कि अरबों डाॅलर का उधार दिया है। इसे चुकाने में भी पाक सरकार की सांस फूल रही है। ऐसे में भारत से दुश्मनी की नीति और उसके नाम पर सेना पर हो रहे अरबों डाॅलर के खर्चे पर भी सवाल उठने लगे हैं। अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी सवाल उठाने लगे हैं कि क्या सेना पाक को चीन का उपनिवेश बनाना चाहती है? वो साफ-साफ कहने लगे हैं कि चीनी उपनिवेश बनने से अच्छा है, भारत से दोस्ती की जाए और उसके साथ व्यापार किया जाए…कश्मीर के चक्कर में पाकिस्तान को कंगाल नहीं किया जाए। लोग अब ये भी पूछ रहे हैं कि सेना विदेश नीति पर क्यों कब्जा जमाए बैठी है? क्यों पाकिस्तान के संबंध सिर्फ भारत से ही नहीं, ईरान और अफगानिस्तान से भी खराब हो रहे हैं?

भारत तो सीधे पाकिस्तानी सेना प्रमुख से बात नहीं करता। लेकिन यहां ये याद दिलाना उचित होगा कि भारत के बारे में टिप्पणी करने से पहले, बाजवा अक्तूबर में अफगानिस्तान और नवंबर में ईरान के दौरे पर भी गए। वहां उन्होंने क्रमशः राष्ट्रपति अशरफ घनी और राष्ट्रपति हसन रोहानी से भी बात की। दोनों देशों के साथ बेहद खराब संबंधों के बीच हुई इन यात्राओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन इन उच्च स्तरीय दौरों के बावजूद दोनों देशों से संबंध रत्ती भर भी नहीं सुधरे। 22 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में अफगान राजदूत महमूद सैकल ने एक बार फिर अपने देश में अस्थिरता के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। उधर 22 दिसंबर को ही अफगानिस्तान के औचक दौरे पर आए अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने बिना लगालपेट के कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा रहा है, लेकिन अब दिन लद गए हैं, ट्रंप प्रशासन ने सैनिकों को आतंकियों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का अधिकार दे दिया है।

स्पष्ट है बाजवा की दोगली विदेश नीति – बातचीत में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा पर जमीनी स्तर पर उन्हें बढ़ावा – पूरी तरह बेनकाब हो गई है। अब सवाल ये है कि भारत को क्या करना चाहिए? भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए इस्लामाबाद को उसकी धरती से सक्रिय आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी दो टूक शब्दों में कह दिया है कि जब तक पाकिस्तान कश्मीर में आतंक फैलाता रहेगा, उसके साथ संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

जहिर है भारत, बाजवा की कूटनीतिक चालों में फंसने और उन्हें शांति के मसीहा का प्रमाणपत्र देने के लिए तैयार नहीं है। वैसे भी उन्होंने अभी सिर्फ यही कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। इस शांतिवार्ता से उनका क्या तात्पर्य है, शांति के लिए वो किस हद तक अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार हैं? ये अभी स्पष्ट नहीं है। 23 दिसंबर को जैसे पाकिस्तानी गोलीबारी में भारतीय सेना के एक मेजर और तीन जवान शहीद हुए, उससे साफ है कि जमीनी स्तर पर पाकी सेना के खूनी इरादों में कोई कमी नहीं आई है।

एक बार को अगर भारत, पाकिस्तान के साथ शांतिवार्ता के लिए तैयार हो भी जाए, तो सवाल ये उठता है कि भारत को खक्कान अब्बासी सरकार से बातचीत करके क्या हासिल होगा जबकि वो खुद चंद महीनांे की मेहमान है (वहां जुलाई 2018 में आम चुनाव होने हैं)। हालांकि ये संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अगर भारत पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए सीधे पाकी सेना से बात करता है, तब भी क्या गारंटी है कि उसका कोई नतीजा निकलेगा? एक बार को मान लें कि बाजवा शांति के लिए समझौता करते हैं, तो क्या गारंटी है कि आने वाले जनरल उसका पालन करेंगे? सिर्फ बाजवा ही नहीं, पाकिस्तान के अधिकांश जनरल देश की भारत नीति पर वर्चस्व तो चाहते हैं पर उसे आम अवाम की भलाई के लिए नहीं, अपने फायदे के लिए चलाना चाहते हैं। जिस दिन पाकी जनरल जनता के नजरिए से सोचना शुरू कर देंगे, पाकिस्तान के रिश्ते, भारत ही नहीं, अफगानिस्तान और ईरान के साथ भी सामान्य हो जाएंगे।

“From moon to the world, it’s all about Indian women” in TOI Blog

It is always said to each and every Indian women out there that you are born to fight. Fight with rituals, myths, society, men domination and what not. Indian women have almost fought a war to be what they are now. Whether it is the great Matreiye or Kalpana Chawla or the world’s most beautiful lady- Manushi Chillar, every one has contributed a lot to make this nation proud and independent. Indian history is flooded with all these great women who had shown a remarkable face of themselves when the society needed them the most. One should not get surprised after knowing the fact the it was not the Indian men like Chanakya and Ashoka who dreamt of ‘Akhand Bharat’ but she was the mother of Puru, Anusuya who had been killed for dreaming so.

When it comes to sacrifice, those were Indian women who put their step forward before anyone to protect their family, to protect their nation. Rani Padmavati is in lot of debates nowadays and we Indians must not forget that she was the one who with other 16,000 women did ‘Johar’ after struggling against Alaudin khilji. Not only this, there were many powerful women like Rani Lakshmi Bai, Bhagwati Devi, Aasha Devi, Uda Devi and Begum Hazart Mahal who played an incredible role in 1857 Indian Revolution against Britishers. They made Britishers hollow from inside and this revolt encouraged various other women to jump in the Indian Freedom Movement. Women like Sarojini Naidu, Hansa Mehta, Durgabai, Renuka Ray and Malti Chowdhry had become sensations for Indian people who later on became the framers of Indian Constitution. Even when Netaji Subhash Chandra Bose build Indian national army, he made a special branch for women which was headed by Lakshmi Sehgal.

From then, our Indian government noticed the true power and capabilities of women of our country and allowed them to be there not only in Indian Military but also in Airforce and Navy so that they can fight with the enemies of our nation. But these ladies are just not strong, they are supreme in every other category and this was purely proved by the most beautiful ladies of this world and that too Indian whether we name Rita Fariya, Sushmita Sen, Aishwarya Rai, Diana Hayden, Yukta Mukhi, Priyanka Chopra or the most recent Manushi Chillar who has made India proud in front of the whole world. And its all about the culture and values of Indian women which are further been given to their daughters and Manushi Chillar gave a great example of this thing by beautifully describing her mother’s contribution in her life.

India was known as the underdeveloped land of snake charmers and acrobats, but these daughters has totally changed the image of our country. Its not just about beauty but also brain whether knowledge, logics or scriptures are concerned. And in all these things, government is also providing a back hand to develop women in every way possible. There is greater thrust on women’s issues by Modi’s government. One of most recent step taken by this government by passing a bill to abolish this ‘triple talak’ practice which would help the Muslim women to be stronger. He is building on a variety of women-focused initiatives like campaigns to educate girls, increased maternity leave, the provision of safer cooking fuels for rural families and also a bill seeking one-third representation for women in Parliament and State Assemblies seeing that women are no less than men in politics and can run a nation as well.

This journey of Indian women so far is much respectable and appreciable. They are now much capable of raising voice for their rights. It can easily be seen that women place themselves in a much stronger place nowadays as on one hand we have India’s first woman defence minister Nirmala Sitharaman while on other the lioness Sushma Swaraj whose voice is enough to calm other men down. These ladies are not less than anyone. Now no moon is farther for any new budding Kalpana Chalwla and the world seems less for ladies like Manushi Chillar.

India is a country of goddesses where women are treated above all, where they are worshipped, where disrespecting them is always an offence. Now they are awaken and much more powerful than ever, powerful enough that they don’t rely on others. They very well know how to fight with social disparities to maintain their family and how to fight with enemies to run a nation because Indian women are born fighters.

“सावधान! आकार लेना शुरू कर दिया है चीनी घेराबंदी ने” in Punjab Kesari

राजनयिकों के आरामदेह कक्षों और थिंक टैंकों के वातानुकूलित सेमीनारों से बाहर निकल, चीन की रणनीतिक घेराबंदी धीरे-धीरे जमीन पर आकार लेने लगी है। जिसकी आशंका थी, चीन जो चाहता था, वो हो रहा है। चीन की वजह से भारत के पड़ोसी देशों में जो परिवर्तन हो रहे हैं और घटनाक्रम जैसे करवट बदल रहा है, उसमें आवश्यक है कि हम कुछ देर रूक कर, सोच विचार कर, चीन और इन देशों के प्रति अपनी नीतियां बदलें या संशोधित करें।

सबसे पहले बात चीन की ही करते हैं। 11 दिसंबर को दिल्ली में हुई त्रिपक्षीय गठबंधन रिक (रशिया, इंडिया, चाइना) की बैठक के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने विदेश मंत्री वांग यी और सुषमा स्वराज की बातचीत के बारे में अपनी तरफ से विवरण दिया। इसके मुताबिक वांग ने सुषमा से कहा कि डोकलाम में “चीनी सीमा” में भारतीय सैनिकों के ”अवैध रूप“ से प्रवेश के बाद पैदा हुए विवाद से दोनों देशों के रिश्तों पर काफी दबाव पड़ा। हालांकि विवाद को राजनयिक जरिए से हल कर लिया गया लेकिन इससे सबक सीखना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। वांग ने कहा कि भारत-चीन संबंध महत्वपूर्ण काल में हैं और दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है आपसी विश्वास बढ़ाना।

वांग ने आगे कहा कि दोनों देशों ने ये विचार साझा किया कि चीन और भारत को एक दूसरे के विकास को अवसर के रूप में देखना चाहिए न कि चुनौती के रूप में और दोनों देश प्रतिद्वंद्वि कम और साझेदार अधिक हैं। इसलिए दोनों पक्षों को दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच हुई सहमति को क्रियान्वित करना चाहिए।

ध्यान रहे वांग के भारत आने से पहले चीन ने डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। यह पहली बार है जब सर्दियों में भी डोकलाम में चीनी सैनिक मौजूद हैं।

चीनी विदेश मंत्रालय के बयान के कुछ निहितार्थ हैं जिन्हें समझना आवश्यक है। एक – चीन ने साझा घोषणापत्र से अलग वांग और सुषमा की बातचीत को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह डोकलाम पर पर भारत के रूख से न केवल असहमत है, बल्कि नाराज भी है और इस नाराजगी को वह भारत की जनता को भी बताना चाहता है। दो – चीन ने अपनी तरफ से एक तरह से भारत को चेतावनी दी है। तीन – चीन के मुताबिक दोनों देशों के बीच पर्याप्त विश्वास नहीं है। चार – चीन चाहता है कि भारत, दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों में उसकी महत्वकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड की परियोजनाओं और विकास के नाम पर हो रही घेराबंदी को चुपचाप स्वीकार करे।

यहां तीन बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए, एक – रिक बैठक से पहले चीनी राजदूत ने कहा था कि भारत को वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल होना चाहिए और अगर भारत चाहेगा तो चीन पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाली चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना का नाम बदल देगा। चीन ने इसे आर्थिक विकास की परियोजना बताते हुए कहा कि इसका भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे सीमा विवाद से कोई लेना देना नहीं है। तीन – रिक की बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री सरगेई लेवरोव ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत को इस योजना में शामिल होना चाहिए और डरना नहीं चाहिए क्यांेकि किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए भारत के पास अच्छी प्रोफेशनल टीम है।

सुषमा और वांग की वार्ता के चीनी विदेश मंत्रालय के खुलासे और बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री द्वारा वन बेल्ट, वन रोड का मुद्दा उठाना ये दिखाता है कि रिक बैठक में इस विषय में बातचीत हुई, रूस ने इसमें चीन का साथ दिया, लेकिन भारत तैयार नहीं हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुछ दिन बाद ये अवश्य स्पष्ट किया कि अगर कोई सुझाव है और उसमें भारत की संवेदनशीलताओं और चिंताओं का ध्यान रखा जाता है, तो भारत उस पर अवश्य विचार करेगा।

जाहिर है चीन और भारत के संबंध, रूस और चीन के संबंधों से अलग हैं और भारत चीन की इस परियोजना को उसके रणनीतिक विस्तार के औजार के रूप में देखता है। चीन समूचे एशिया पर अपना वर्चस्व चाहता है जिसे भारत स्वीकार नहीं करता। भारत और पाकिस्तान में कोई समानता न होने के बावजूद, चीन अपने हित साधने और भारत को नीचा दिखाने के लिए हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों की बराबरी का दावा करता है। ये भी भारत को पसंद नहीं है।

ये संयोग नहीं कि वांग का बयान आने के चंद घंटों के भीतर ही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंग्रेजी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में एक लेख छपा जिसका शीर्षक था – ”भारत क्षेत्रीय विकास से अधिक भूराजनीतिक समीकरणों को महत्व देता है“। इसमें कहा गया – ”श्रीलंका ने पिछले सप्ताह हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्षीय लीज पर देने की औपचारिकता समाप्त की। श्रीलंका सरकार ने इसका स्वागत किया, लेकिन भारत में इससे खतरे की घंटी बजने लगी। कोलंबो ने बार-बार भारत को भरोसा दिलाया कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल शुद्ध रूप से नागरिक उद्देश्य के लिए होगा, ये बंदरगाह चीन को हिंद महासागर में समुद्री रास्ते उपलब्ध करवाएगा, लेकिन भारतीय मीडिया बता रहा है कि इस अधिग्रहण के जरिए चीन इस क्षेत्र में अधिकाधिक रणनीतिक और आर्थिक वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है। दिलचस्प बात ये है कि चीन के वन बेल्ट, वन रोड से घिरने से डरा भारत हंबनटोटा में हवाईअड्डा बनाने पर विचार कर रहा है। नई दिल्ली की पुरानी रणनीतिक सोच इस क्षेत्र के अन्य देशों और चीन के बीच बढ़ रहे सहयोग को कम नहीं कर सकती। मालदीव ने हाल ही में चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थायित्व के बावजूद चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पर ईमानदारी से काम हो रहा है। इस क्षेत्र में चीन और अन्य देश विकास के लिए संयुक्त प्रयास कर रहे है। नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और अन्य देशों में चीनी निवेश ने अर्थव्यवस्था में सुधार किया है और लोगों को रोजगार दिया है।”

लेख में आगे कहा गया है कि ”श्रीलंका की अंदरूनी राजनीति मंे घुसने और नई दिल्ली को घेरने का चीन का कोई इरादा नहीं है। ये नई दिल्ली की संकीर्ण सोच होगी अगर वह चीन की सहयोगात्मक गतिविधियों को उसे घेरने और दक्षिण एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने की शोषणकारी रणनीतियों के तौर पर देखेगी। अगर भारत उनकी विकास की जरूरतंें पूरी कर सके तो श्रीलंका, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय देश भारत के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए तैयार हैं।“

भारत पर संकीर्ण सोच का आरोप लगाने वाला यह लेख बहुत ही चतुराई से अनेक तथ्यों को छुपा जाता है। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना अभिन्न अंग मानता है। इससे निकलने वाले सीपेक को भारत कैसे मान्यता दे सकता है? क्या चीन ने वहां निर्माण कार्य आरंभ करने से पहले भारत की अनुमति ली थी या भारत को किसी भी तरह विश्वास में लिया था? अगर चीन भारत के साथ सहयोग का इतना ही इच्छुक है तो वो मसूद अजहर और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप जैसे मसलों पर भारत का साथ क्यांे नहीं देता? चीन पाकिस्तान को पूरी तरह त्याग कर भारत के साथ क्यों नहीं आता? सारी दुनिया ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग देखना आरंभ कर दिया है, लेकिन चीन क्यों अब भी शीतयुद्ध की तरह भारत और पाकिस्तान की तुलना करना चाहता है? वो क्यों भारत को पाकी चश्मे से देखना चाहता है?

जहां तक सीपेक का सवाल है, उसके बारे में खबर ये है कि चीन ने पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के चलते उसकी अनेक परियोजनाओं को रोक दिया है। खबरें ये आ रही हैं कि चीन अब ये परियोजनाएं पाकी सेना की सरपरस्ती में पूरा करना चाहता है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानती है।

ग्लोबल टाइम्स का लेख कहता है कि हंबनटोटा के चीनी अधिग्रहण का श्रीलंका ने स्वागत किया। लेकिन हकीकत यह है कि उसने चीन से ऊंची दरांे पर ऋण लिया था। जब वो उसे वापस नहीं कर सका तो चीन ने उसे मजबूर किया कि वो उसे अपना प्रमुख बंदरगाह हंबनटोटा 99 साल की लीज पर दे। अगर चीन का मकसद सिर्फ व्यापार था तो उसे हंबनटोटा को 99 साल की लीज पर लेने की क्या जरूरत थी? क्या चीन भारत ही नहीं विश्व को भी यह लिखित में देने के लिए तैयार है कि वो श्रीलंका में हंबनटोटा और सीपेक के तहत पाकिस्तान में बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट को नौसैनिक अड्डों के रूप में कभी इस्तेमाल नहीं करेगा? वैसे भी साउथ चाइना सी प्रकरण के बाद दुनिया का चीन से भरोसा उठ गया है। चीन ने वहां न केवल अनधिकृत और अवैध नौसैनिक अड्डे बनाए, बल्कि इस विषय में अंतरराष्ट्रीय अदालत के निर्णय को भी कूड़े की टोकरी में फेंक दिया क्योंकि वो उसके पक्ष में नहीं था।

एक महत्वपूर्ण मसला नेपाल का भी है। वहां हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल ने एक अन्य दल सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के साथ बहुमत हासिल किया है। कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल – यूएमएल के नेता और जल्द ही नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले के पी शर्मा ओली चीन के बेहद करीब समझे जाते हैं। पिछली बार जब वो प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने चीन के साथ अनेक ऐसे समझौते किए जिन पर भारत को सख्त आपत्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल में विशेष दिलचस्पी दिखाई है। 1997 से 2014 तके कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री वहां नहीं गया। मोदी नेपाल के दो दौरे कर चुके हैं जबकि सुषमा स्वराज वहां पांच बार जा चुकी हैं। मोदी सरकार ने नेपाल में 900 मेगावाट की बिजली परियोजना के लिए समझौता किया, उसे 1.3 अरब डाॅलर का ऋण दिया। जब नेपाल में भयंकर भूकंप आया तो भारत ने अधिकतम सहायता की। लेकिन चीन के प्रेम में अंधे ओली पर मोदी सरकार के सकारात्मक कदमों का कितना असर पड़ेगा ये देखना दिलचस्प होगा।

एक तरफ भारत को चीन की कूटनीतिक धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ नेपाल में चीन समर्थक ओली का सत्ता संभालना, पाकिस्तान में सेना के साथ चीन का गठबंधन, श्रीलंका में बंदरगाह पर कब्जा, मालदीव के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, म्यांमार और बांग्लादेश में सड़क और समुद्री परियोजनाएं, चीन भले ही भारत को कितना भी संकीर्ण कहे, लेकिन भारत उसकी छुपी मंशा को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

ऐसे में भारत के सामने क्या विकल्प हैं? इसके लिए ठंडे दिमाग से लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी। चीन के पास विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार है जिसके जरिए वो देशों को खरीद रहा है और भारत को चुनौती दे रहा है कि तुम्हारी हिम्मत हो तो तुम भी खरीद लो। जाहिर है भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार, चीन से मुकाबला नहीं कर सकता, वैसे भी भारत लोकतांत्रिक देश है, यहां कम्युनिस्टों जैसे तानाशाही से काम नहीं लिया जा सकता। भारत सरकार भले ही चीनी सरकार की तरह तानाशाही से न काम कर सके, लेकिन उसे भी फैसले लेने की रफ्तार और क्षमता तो बढ़ानी ही होगी।

चीनी धमकियों और रणनीतिक घेराबंदी के मद्दे नजर भारत को सीमा पर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। भारत को संबंधित देशों को बिना लाग लपेट अपनी चिंताओं से अवगत भी करवाना होगा। लेकिन लगातार तनाव और युद्ध विकल्प नहीं हैं। आज दुनिया उसी के कसीदे पढ़ती है जिसके पास पैसा हो। भारत को अपनी आर्थिक ताकत को तेजी से बढ़ाना होगा, इसके लिए जरूरी हो तो चीन का इस्तेमाल भी करना होगा। पैसा कमाने के लिए चीन ने हर नियम-कानून को ताक पर रख दिया है। भारत को भी आदर्शवाद छोड़ व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा।

“Bill against Triple Talaq: How long will this fight continue? Include polygamy and Nikah Halala in this Bill too” in TOI Blog

On November 24, a 32-year-old woman was allegedly divorced by her husband via phone call. They were married for 10 years and have children. Her husband uttered “talaq” thrice on the phone as the woman wasn’t able to meet his extortionist demands for dowry.

“There were 177 reported cases of triple talaq before the Supreme Court verdict. Even after the verdict, 67 cases of instant talaq were reported. The majority of such cases were in Uttar Pradesh,” said a senior government official.

On August 22, the Supreme Court declared instant triple talaq unconstitutional. The court’s ruling was that instant triple talaq is “violative of the fundamental right under Article 14 (equality before law) of the Constitution of India”.

The verdict added that Muslim Personal Law (Sharia) Application Act, 1937, when it comes to the matter of triple talaq, must be removed. After the landmark judgment, it was up to Parliament to enact the legislation regarding Muslim marriages and divorce, which is to be implemented within six months of the Supreme Court ruling.

The government plans to introduce legislation aimed at outlawing the controversial Muslim practice of instant triple talaq in the coming winter session of Parliament. “The draft has been sent to all the state heads, and their recommendations and comments have been sought on the draft. Once that is done, further steps will be taken to table the Bill,” a Home ministry official had said. It has been reported that state heads had been given three months to give their suggestions and consent.

The plan is to bring a bill that will ban instant triple talaq, create a non-bailable punishment, and a three-year imprisonment sentence against the husband. The bill may also grant the wife maintenance and custody of her minor children by moving the court. The bill will make instant talaq through any form (verbal, writing, electronic etc) illegal and void. Any aggrieved Muslim woman would be entitled to approach a magistrate court to seek redressal.

A senior BJP leader said, “the issue of triple talaq has become a social concern because women have started coming out against it. The practice is now being opposed by women who are financially and socially vulnerable.” When instant triple talaq happens, a victim has no option but to approach the police for justice. “Even police are helpless as no action can be taken against the husband in the absence of punitive provisions in the law. The step taken by the government is a positive message and legislation will go a long way in deterring Muslim husbands from divorcing their wives. Legislation will also empower women who find themselves helpless against the use of the practice,” the BJP leader had said.

The best solution to remove all hardships faced by women would be to apply Uniform Civil Code nationally and remove Personal Laws. When it comes to polygamy, instant triple talaq and nikah halala in Sharia Law, they all are a violation of the rights and integrity of a woman. To follow a UCC which guides each individual under the same purview of the law with equality not only of religion, but also of gender, is the aim of our constitution and our judicial system. Till when will our Muslim sisters fight these archaic practices?
Though the problem of Personal Laws isn’t limited to Muslim women, it also extends to other factional divisions.

In 1991, Goolrukh Gupta, who was named Goolrukh Contractor before her marriage, was married in South Gujarat to a Hindu Man. Originally from the Zoroastrian faith, she held to her religion and continued her practices even after marriage. After her father’s death she was denied entry to the Tower of Silence in Mumbai, even though her father’s last rights were performed there.  She approached Gujarat High Court against this discrimination.

The Gujarat High Court stated in 2012 that due to the Special Marriage Act, (applicable where two individuals from different faiths marry), her religion had changed to that of her husband. She is no longer a Parsi and is now a Hindu. She took the case to the Supreme Court against the Gujarat High Court’s judgment which claimed that Ms Goolrukh Gupta ceased to be a Parsi after her marriage to a Hindu. Chief Justice Misra stated that a woman is not mortgaged to her husband after marriage, her individual identity as well as religious identity are maintained under the Special Marriage Act.

The Chief Justice further said that only a woman can choose to follow or curtail her religious identity, she has that freedom of choice under the Special Marriage Act. If only such freedom of choice, identity and equality were granted to members of all religions and faith.

“चीन पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है क्वाड्रीलेटरल, अपनी शर्तों पर इसका समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

वक्त की नई करवट के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय में नए समीकरणों की आहट भी सुनाई देने लगी है। सोवियत रूस के धराशायी होने के बाद माना जाने लगा कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर है और दुनिया में उसका सिक्का चलता है। लेकिन रूस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। अमेरिका के आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को सीमित करने और दुनिया को बहुध्रुवीय बनाए रखने के लिए शीत युद्ध से उबर रहे रूस ने दो महत्वपूर्ण संगठनों की परिकल्पना की। वर्ष 1993 में रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने रिक (रशिया, इंडिया, चाइना ट्राइलेटरल) का खाका पेश किया। हालांकि इसका पहला शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में ही हो पाया। वर्ष 1996 में पांच देशों – चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रशिया और तजाकिस्तान ने शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन की स्थापना की। इसका मूल उद्देश्य था शंघाई के सीमांत इलाके में सैन्य विश्वास विकसित करना और सीमा विवादों को शांति से हल करना। इन देशों ने सीमांत इलाकों में सैन्य बल कम करने के लिए 24 अप्रैल 1997 को एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। इसी साल 20 मई को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और चीनी प्रधानमंत्री जियांग जेमिन ने ‘मल्टीपोलर वल्र्ड’ (बहुध्रुवीय विश्व) के समझौते पर हस्ताक्षर किए। वर्ष 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसके पूणकालिक सदस्य बन गए।

लंबे अर्से तक अमेरिकी ये सोचते रहे कि सोवियत रूस जैसे चीन भी धीरे-धीरे ध्वस्त हो जाएगा। वर्ष 2002 में वहां एक किताब भी आई जिसका शीर्षक था – चाइना कोलेप्स थ्योरी (चीन के पतन का सिद्धांत)। लेकिन ये थ्योरी फेल हो गई। अगले आठ साल में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यही नहीं 2002 से 2017 के बीच चीन का सकल घरेलू उत्पाद तिगुना हो गया।

तेजी से उभरते चीन ने दुनिया का महानतम देश बनने का लक्ष्य रखा है। इसे ध्यान में रखते हुए चीन ने दुनिया की सुपर पावर अमेरिका के साथ वर्चस्व साझा करने, परस्पर सहयोग बढ़ाने और अपने लक्ष्य को धीरे-धीरे अमली जामा पहनाने के लिए कई प्रस्ताव किए जिन्हें अमेरिका ने निरस्त कर दिया। चीन ने जो प्रस्ताव किए उनमें संभवतः सबसे पहला था वन बेल्ट, वन रोड इनीशिएटिव। इस परियोजना के बारे में पिछले पांच साल से सुगबुगाहट चल रही है। हालांकि इसका पहला महासम्मेलन इसी वर्ष बीजिंग में हुआ, अमेरिका ने इसमें अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा लेकिन इसमें भागीदारी का कोई वादा नहीं किया। इसकी खास वजह रही परियोजना की अस्पष्टता और चीन का अंधा स्वार्थीपन। चीन ने इसके लिए विवादास्पद क्षेत्रों में जाने से भी परहेज नहीं किया। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है, लेकिन चीन ने वहां भी चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर बना डाला जो वन बेल्ट वन रोड का ही एक हिस्सा है। श्रीलंका और ग्रीस में चीन के व्यवहार से भी अमेरिका नाराज हुआ। चीन ने श्रीलंका और चीन को ऊंची दरों पर ऋण दिया और जब वो इसे अदा नहीं कर पाए तो उनके महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया। चीन ने तो ग्रीस पर यहा तक दबाव डाला कि वो उससे संबंधित यूरापियन यूनियन के मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों को बाधित करे।

चीन का दूसरा प्रस्ताव रहा – ‘न्यू माॅडल आॅफ ग्रेट पाॅवर रिलेशंस’ (शक्ति के महान संबंधों का नया माॅडल)। शी जिनपिंग के इस व्यक्तिगत प्रस्ताव पर अमेरिका के कुछ राजनयिकों ने विचार का प्रस्ताव किया, लेकिन ‘माॅडल’ की अस्पष्टता के कारण ये भी ठंडे बस्ते में चला गया। इसके निरस्त होने का एक बड़ा कारण चीन की अजीबो-गरीब अपेक्षा भी थी कि यदि चीन किसी अमेरिकी सहयोगी पर हमला करता है तो अमेरिका उसके बचाव में नहीं आएगा। ये एक तरह से चीन का वर्चस्व स्वीकार करने जैसा था। एशिया में अपना कब्जा बनाने के लिए चीन का एक अन्य प्रस्ताव था – ‘एशिया फाॅर एशियंस’ (एशिया एशियाई लोगों के लिए)। अमेरिका ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘कम्युनिटी आॅफ काॅमन डेस्टिनी’ (साझा नियति का समुदाय) नाम से प्रस्ताव दिया। लेकिन इसमें न तो ये स्पष्ट था कि ‘कम्युनिटी’ में कौन से देश शामिल होंगे और न ही ‘डेस्टिनी’ का अर्थ। लेकिन अमेरिका को लगा कि इसके तहत चीन अपने नेतृत्व में विश्व की ‘नियति’ निर्धारित करना चाहता है। इसलिए ये प्रस्ताव भी सिरे नहीं चढ़ पाया।

लेकिन अब तक अमेरिका को चीनी प्रस्ताव और उनके निहितार्थ अच्छी तरह समझ आने लगे थे। साथ ही यह भी समझ आ गया था कि चीन का उदय काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक है। अमेरिका ने अब न केवल चीन के अभ्युदय में सहायक बनीं पक्षपाती आर्थिक-व्यापारिक नीतियों का विश्लेषण और विरोध शुरू किया, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जगह भारतीय-प्रशांत क्षेत्र शब्दावली का प्रयोग शुरू किया। इसका सीधा सा उद्देश्य चीन को ये संकेत देना था कि अमेरिका एशिया में चीन के एकछत्र प्रभुत्व को मान्यता नहीं देता। अगर वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कब्जा जमाने की कोशिश करेगा तो भारत की मदद से उसका सामना किया जाएगा। इसी सिलसिले में बराक ओबामा ने भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी घोषित किया जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने और मजबूती से दोहराया। ट्रंप ने तो अपनी नयी दक्षिण एशिया नीति में चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान पर भी नकेल कसी और अफगानिस्तान में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार किया।

अपनी पहली एशिया यात्रा में, जिसमें चीन के साथ जापान, साउथ कोरिया, वियतनाम और फिलीपींस भी शामिल थे, ट्रंप ने अपने इरादे स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन जैसे भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है, वैसे ही अमेरिका को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का। ट्रंप ने उसके दुःसाहस के लिए भी सीधे चीन को जिम्मेदार ठहराया और उस पर लगाम लगाने की मांग की।

अब समय का पहिया लगभग पूरा घूम चुका है। पहले जहां रूस और चीन अमेरिका पर लगाम लगाने के लिए संधियां कर रहे थे वहीं अब अमेरिका, एशिया में चीन पर लगाम लगाने के लिए नए गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है। इस श्रंखला में जो सबसे महत्वपूर्ण गठबंधन उभर कर सामने आ रहा है वो है आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत और अमेरिका का क्वाड्रिलेटरल या संक्षेप में क्वाड। क्वाड्रिलेटरल का अर्थ होता है चार भुजाओं वाला। उम्मीद की जा रही है कि क्वाड चीन की महत्वकांक्षी ओबीओआर परियोजना को तो चुनौती देगा ही, भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और सैन्य विस्तारवाद पर भी रोक लगाएगा और उसपर निगाह रखेगा।

अमेरिका क्वाड के लिए भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया को हर तरह की मदद देने के लिए तैयार है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अमेरिका की हथियार बेचने की चाल है। लेकिन ओबीओआर के नाम पर चीन की अब तक की हरकतों को देखते हुए लगता है कि हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा जा सकता और इसका मजबूत अंतरराष्ट्रीय विकल्प तैयार करना जरूरी है ताकि क्वाड के सिर्फ चार देश ही नही,ं जापान से अमेरिका तक पूरी दुनिया में कानून सम्मत, न्यायपूर्ण तरीके से व्यापार किया जा सके। ओबीओआर के नाम पर जहां चीन जहां समुद्री मार्गों पर मनमाने तरीके से कब्जा करने की कोशिश कर रहा है वहीं म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल आदि में विवादास्पद क्षेत्रों में घुस रहा है। ये व्यापार संवर्धन के नाम पर गरीब देशों को ऊंची दरों पर ़ऋण दे रहा है और जब ये देश ऋण चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं तो उनकी जमीनों पर मनमानी शर्तों पर कब्जा कर रहा है। कुल जमा ये कि चीन अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर आर्थिक उपनिवेशवाद को नए सिरे से बढ़ावा दे रहा है।

मोटे तौर पर क्वाड का लक्ष्य तो स्पष्ट है, पर इसकी बारीकियों का सामने आना अभी बाकी है। काफी समय तक तो क्वाड सिर्फ राजनयिक बातचीत और जुमलेबाजी तक सीमित रहा। इसे चीन का प्रभाव ही कहा जाएगा कि भारत जैसे देश इसकी आवश्यकता को महसूस करते हुए भी इससे जुड़ने से बचते रहे। इस वर्ष फिलीपींस में ईस्ट एशिया समिट के दौरान 12 नवंबर को चारों देश जापान की अध्यक्षता में इस विषय पर विचार करने बैठे। इसके बाद चारों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए लेकिन किसी ने भी अपने बयान में चीन का उल्लेख नहीं किया। बयानों से पता लगा कि बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कानून सम्मत व्यवस्था, कनेक्टीविटी (संयोजकता), समुद्री सुरक्षा, नाॅर्थ कोरिया और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन अलग-अलग बयानों से साफ है कि चारों देशों को एक साझी कार्यसूची पर पहुंचना अभी बाकी है। बहरहाल भारत ने स्पष्ट किया कि वो अपनी एक्ट ईस्ट पाॅलिसी को भारतीय-प्रशांत क्षेत्र मंे अपनी नीति का मूल आधार बनाना चाहता है। भारत चाहता है कि इस क्षेत्र में आसियान देशों की केंद्रीय भूमिका बनी रहे। यहां दो बातें बताना चाहेंगे। एक – जब फिलीपींस में क्वाड पर बातचीत हो रही थी तब चारों देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी वहां मौजूद थे। दो – भारत ने 26 जनवरी की परेड में आसियान देशों के प्रमुखों को निमंत्रित किया है और उन्होंने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है।

यदि चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए क्वाड बन गया तो इसका स्वरूप क्या होगा, इसका अधिकार क्षेत्र क्या होगा, जापान से अफ्रीका और अमेरिका तक विभिन्न देश इससे कैसे जुड़ेंगे, ये चीन के आर्थिक उपनिवेशवाद का कैसे जवाब देगा, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर मंथन जारी है। ध्यान रहे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस वर्ष सितंबर में भारत आए थे। उनकी यात्रा के दौरान भारत और जापान ने जो संयुक्त घोषणापत्र जारी किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि दोनों देश भारतीय-प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और उदार बनाने के लिए एक ऐसी मूल्य आधारित साझेदारी के प्रति समर्पित हैं जिसमें संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान किया जाता हो, विवादों को बातचीत से सुलझाया जाता हो, जहां छोटे और बड़े सभी देशों को बेरोकटोक समुद्री और हवाई यात्रा की छूट हो और वे टिकाऊ विकास और निद्र्वंंद्व, खुले, निष्पक्ष व्यापार और निवेश व्यवस्था का लाभ उठा सकें। भारत-जापान संयुक्त घोषणापत्र में जापान और अफ्रीका के बीच व्यापार मार्ग ढूंढने के प्रयासों का भी स्वागत किया गया।

ध्यान रहे कुछ दिनों बाद यानी 12 नवंबर को भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया त्रिपक्षीय समूह की बैठक भी हो रही है। इस समूह की पिछली तीन बैठकों में संयुक्त समुद्र व्यापार परियोजनाओं, सहयोग, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि पर बातचीत हुई। आगामी बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा वातावरण की समीक्षा तो होगी ही, साथ ही नाॅर्थ कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के मद्दे नजर परमाणु विस्तार, समुद्र के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद और इस क्षेत्र में समुद्री सीमा विवाद आदि पर भी चर्चा होगी।

भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया की वार्ता से ठीक एक दिन पहले रिक (रूस, इंडिया, चीन) की मंत्री स्तरीय बैठक भी होगी। यह बैठक इस वर्ष के आरंभ में ही होनी थी, लेकिन दलाई लामा के अरूणाचल यात्रा के विरोध में चीन ने इसे टाल दिया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की दोनों बैठकों पर निगाह रहेगी। नई परिस्थितियों में भारत को भी संतुलन बनाकर चलना होगा। भारत का चीन के साथ लगभग सौ अरब डाॅलर का व्यापार है, पर ये भी हकीकत है कि पड़ोसी और विशाल बाजार होने के नाते चीन से सबसे ज्यादा खतरा भी भारत को ही है। भारत ने चाइना-पाकिस्तान काॅरीडोर के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर आपत्ति जताई है। आगामी रिक बैठक को देखते हुए चीन ने कहा है कि यदि भारत इसमें शामिल होता है तो वो इसका नाम बदल सकता है। भारत को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है क्योंकि चीन नाम बदलने के लिए भले तैयार दिखता हो, पर पाक अधिकृत कश्मीर से हटने के लिए नहीं।

जवाहरलाल नेहरू ने ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए गुटनिरपेक्षता की अवधारणा पर चलने का फैसला किया। लेकिन आज टकराव वैचारिक नहीं बल्कि व्यापारिक और सामरिक है। चीन आज अपनी विचारधारा के बल पर नहीं, पैसे के बल पर दुनिया का शोषण करना चाहता है। अच्छी बात है कि ऐसे समय में नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंनेे विदेशनीति को अधिक व्यावहारिक, सुदृढ़, धारदार, निर्णयात्मक और किन्हीं अर्थों में अधिक उदात्त, निर्भीक और स्पष्टवादी तथा पूरी तरह राष्ट्रसापेक्ष बना दिया है। अब विदेशनीति का आधार व्यक्तिगत सनक, राजनीतिक विचारधारा या किसी समुदाय का तुष्टिकरण नहीं बल्कि राष्ट्रहित है। अब विदेशनीति देश के आर्थिक, सामरिक विकास का औजार है। यह औजार है भारत के अंतरराष्ट्रीय अभ्युदय की बुनियाद तैयार करने का। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वो क्वाड्रीलेटरल में अवश्य शामिल हों लेकिन अपनी शर्तों पर।

“We welcome capital punishment for child rapists” in TOI Blog

Shivraj Singh Chouhan, the chief minister of Madhya Pradesh, wants death as punishment to rapists. This extreme sentiment felt 8 months ago by Mr Chouhan has now taken civic action. According to National Crime Records Bureau (NCRB) in 2016 Madhya Pradesh recorded the highest number of rape cases in the country. In the past two months there has been a sharp increase in rape crimes, and on this Sunday the Madhya Pradesh state cabinet passed a proposal for amendment of the Indian Penal Code (IPC) for harsher punishments for rape, molestation, stalking, and sexual harassment. The proposal has approved the appeal for death penalty of raping a girl child 12 years old or younger, and for convicts convicted of gang rape. There is also an amendment in the IPC to increase fine and punishment for rape convicts.

After the Cabinet meeting Finance Minister of MP Jayant Malaiya stated that there should be provisions for harsher punishment under IPC sections 376 (rape) and 493 (cohabitation caused by a man deceitfully inducing a belief of lawful marriage). “The recommendation is to impose a fine of Rs 1 lakh for such crimes in addition to harsher punishment for stalking, harassment, rape, and capital punishment for those convicted of rape and gang rape of children aged 12 years and below,” Malaiya said. “For this, the proposal is to add a subsection 376A IPC and 376D (gang rape) IPC. Punishment should be increased under section 493A also.”

Even though Madhya Pradesh might have passed the amendment for this bill the result may not be predictable as it will have to be passed by both houses of Parliament due to the request of capital punishment. A proposal for amendment of these two sections will be presented in the assembly during the winter session. After it is passed in the House, it will be sent to the President for assent.

After the infamously heinous Nirbhaya rape case public demand was to make it safer for women to leave her household without fear for her life or integrity. Another demand was to have stricter and swifter punishable action against criminals, and for more effective criminal proceedings in court. It was during that time that Indian nationals and eminent politicians demanded capital punishment for rapists, Mr Chouhan is one of them. Yet Madhya Pradesh has decided to approve the amendment after the state had come under criticism over rape incidents. The greatest trigger being when a 19 year old UPSC aspirant was raped when returning home from coaching. Her FIR registration was delayed and it led to the suspension of some police officers. In 2014 MP reported 5,076 rape cases, which was 14 percent of the total rape incidents reported in the country.

Yet the proposal has narrowed down to specifics, it will be applicable to a child under the age of 12 and the child should be a girl. The biggest flaw with this amendment is that the rape or molestation of boys is not taken into account. Amod Kanth, former police officer and founder of NGO Prayas said, “When we conducted a national study on child abuse in 2007, along with the Ministry of Women and Child Development, we found that there were as many male victims of child abuse as female.” It is time to forget about gender when it comes to rape, justice for everybody should be on an equal basis irrespective of their differences.

“बलूचिस्तान की आजादी का खुल कर समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

पाकिस्तान की नई नई इस्लामिक कट्टरवादी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक य रसूल अल्लाह द्वारा ईशनिंदा पर मचाए गए हंगामे के कारण लगता है दुनिया की निगाह बलूचिस्तान में सेना के जुल्मो सितम से हट गई है। जिस समय तहरीक के इस्लामिक कट्टरवादी कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भिड़ रहे थे, लगभग उसी समय 25 नवंबर को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में फ्रंटीयर कोर के काफिले पर आत्मघाती हमले में पांच लोग मारे गए। ध्यान रहे पाकिस्तानी सेना और फ्रंटीयर कोर आजकल वहां रद्द-उल-फसाद नाम का आॅपरेशन चला रहे हैं जिसका मकसद वहां कथित आतंकवादियों (बलोच स्वतंत्रता सेनानियों) का जड़ से सफाया करना है। रद्द-उल-फसाद के नाम पर निर्दोष बलोचों पर लगातार अत्याचार किए जा रहे हैं जिसका स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी विरोध भी कर रहे हैं। खबर है कि सेना और फ्रंटीयर कोर से त्रस्त बलोचों ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) बना ली है। इसके नेता खैर बक्श मरी हैं और ये पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान और सीमा पार बलोच बहुल अफगान इलाकों में भी सक्रिय है।
कहना न होगा बलूचिस्तान में सैनिक, अर्धसैनिक बलों और पुलिस तथा स्वतंत्रता सेनानियों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, सुरक्षा बल उसके लिए बीएलए को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, हालांकि इसका सत्यापन आसान नहीं होता। नवंबर 21 को यहां के तुरबत इलाके में पाकिस्तानी सैनिकों और बलोच स्वतंत्रता सेनानियों की मुठभेड़ में एक सैनिक मारा गया। नवंबर 15 को इसी इलाके में 15 शव मिले थे। इसी दिन क्वेटा में पुलिस अधीक्षक मुहम्मद इलयास और उसके तीन परिवार वालों की सरेआम हत्या कर दी गई। कुछ दिन बाद इसी इलाके से पांच और लोगों के शव मिले। अधिकारियों के अनुसार ये सभी शव पंजाब प्रांत में रहने वालों के थे। सुरक्षा बलों के अनुसार तुरबत में 15 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी बीएलए ने ली। इससे पहले अक्तूबर 18 को पुलिस दल को ले जा रहे एक ट्रक में धमाके में आठ लोग मारे गए। इनमें से 7 पुलिस वाले थे। इस धमाके में 24 लोग घायल हुए। अगस्त 13 को सेना के एक ट्रक पर आत्मघाती दस्ते के हमले में आठ सैनिकों समेत 15 लोग मारे गए।

ये तो कुछ हालिया घटनाएं हैं, लेकिन बलूचिस्तान में हिंसक घटनाओं का सिलसिला लंबे अर्से से चला आ रहा है। जाहिर है पाकिस्तानी मीडिया वो खबरें तो प्रमुखता से देता है जिनमें पुलिस या सुरक्षा बलों को निशाना बनाया जाता है, लेकिन ये बलोचों पर सेना के पैशाचिक अत्याचारों और मानवाधिकार हनन की घटनाओं को दबा जाता है। बलूचिस्तान में सेना द्वारा नागरिकों की हत्या, अपहरण या प्रताड़ना की खबरें या तो प्रकाशित ही नहीं की जातीं और अगर की भी जाती हैं तो अंदरूनी पन्नों पर सिंगल काॅलम में। ऐसी खबरों को प्रकाशित करने के कारण इतने पत्रकार अपनी जान से हाथ धो चुके हैं कि अखबार मालिक ऐसी घटनाओं को कवर करने में भी डरने लगे हैं।

बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी सैकड़ों बार चिंता जता चुकी है, इसकी आलोचना कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाॅच (एचआरडब्लू) के अनुसार बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन महामारी का रूप ले चुका है और पाकिस्तानी सरकार ने सेना की ज्यादतियों का विरोध करने वाले बलोचों की प्रताड़ना, अपहरण और गैरकानूनी हत्या रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी प्रकार यूरोपीय संसद के आसियान प्रतिनिधि मार्क टाराबेला कहते हैं कि बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन की रिपोर्टें डरावनी हैं। वहां सैनिक और अर्धसैनिक बल व्यवस्थित तरीके से लोगों को निशाना बना रहे हैं और सरकार आंखें मूंदे बैठी है।

इंटरनेशनल वाॅयस फाॅर बलोच मिसिंग पर्संस के मुताबिक जनवरी 2014 तक बलूचिस्तान में 18,000 लोग गुमशुदा थे। इनमें से 2001 से 2013 के बीच 2,000 लोग मारे गए। 463 लोगों का जबरदस्ती अपहरण किया गया। इनमें से 157 को इतना प्रताड़ित किया गया कि वो जान से हाथ धो बैठे। मारे गए कुछ प्रसिद्ध बलोच स्वतंत्रता सेनानी हैं – मुनीर मेंगल, इमाद बलोच, अल्लाह नजर बलोच, जाकिर मजीद बलोच, गुलाम मोहम्मद बलोच ओर जाहिद बलोच।
पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बल अपहृत लोगों के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं इसका विवरण इन लोगों के परिवार वालों के बयानों से चलता है। इनके मुताबिक आततायी जिंदा लोगों पर तो जुल्म करते ही हैं, उनके मरने पर दिल, गुर्दे, फेफड़े, आंते तक निकाल लेते हैं। ऐसा परिवार वालों, संबंधियों और आस पास के लोगों को डराने के लिए किया जाता है ताकि वो अपना मुंह बंद रखें।

पाकिस्तान आजकल चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना के तहत वहां ग्वादर पोर्ट बना रहा है। इसके चलते बलोचों पर अत्याचार और बढ़ गए हैं। कहने को तो पाकिस्तान दावा करता है कि इससे बलोचों को रोजगार मिल रहा है और वहां आर्थिक समृद्धि आ रही है, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। ग्वादर में काम करने वाले मजदूर तक चीन से लाए गए हैं। चीन इस पूरे क्षेत्र में अपनी करंसी चलाना चाहता है और जो लोग इस परियोजना में काम करना चाहते हैं, उन्हें अपनी भाषा सीखने पर मजबूर कर रहा है। ऐसे में बलोचों को इस परियोजना से कोई फायदा नहीं मिल रहा है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उनका सफाया ही किया जा रहा है। उन्हें अब डर सता रहा है कि कहीं पाकिस्तान के बाद वो चीन के उपनिवेश न बन कर रह जाएं। मौजूदा हालात को देखते हुए ये डर जायज भी है।

पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान में अपनी एजेंसियों की करतूतों पर तो पर्दा डाल देती है पर जब संघर्ष में इनके अपने लोग मरते हैं तो ये भारत पर इल्जाम लगाते हैं। पाकिस्तानियों को लगता है कि जो खेल वो कश्मीर में खेल रहे हैं, वहीं भारत बलूचिस्तान में खेल रहा है। अपने भारत विरोधी नेरेटिव को सही साबित करने के लिए इन्होंने कुलभूषण जाधव को राॅ के एजेंट के रूप में दुनिया के सामने पेश किया, लेकिन अफसोस कि दुनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया। अब ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस में चल रहा है।

लेकिन बलूचिस्तान का मसला इतना सरल नहीं है जितना पाकिस्तान दिखाने की कोशिश करता है। और न ही बलूचिस्तान उसका हिस्सा है जैसा वो दावा करता है। बलूचिस्तान का इतिहास असल में पाकिस्तान की बदनीयति और धोखाधड़ी का इतिहास है जिसे खुद पाकिस्तान के कायदे आजम मौहम्मद अली जिन्ना ने लिखा जिन्हें कलात के खान मीर अहमदयार खान अपना सबसे करीबी और विश्वासपात्र समझते थे। असल में विभाजन से पहले बलूचिस्तान में चार शाही रियासतें शामिल थीं – कलात, लसबेला, खारन और मकरान। मकरान, कलात का एक जिला था परंतु लसबेला और खारन का प्रशासन अंग्रेजों ने कलात के खान का सौंपा हुआ था।

पाकिस्तान बनने के तीन महीने पहले ही जिन्ना ने कलात के खान अहमदयार खान के नेतृत्व में बलूचिस्तान की आजादी के बारे में ब्रिटिश सरकार से बातचीत की। इसके बाद वायसराय, अहमदयार खान और जिन्ना के बीच कई बैठकें भी हुईं। इनके परिणामस्वरूप् 11 अगस्त 1947 को एक विज्ञप्ति जारी हुई जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान कलात को स्वतंत्र सार्वभौमिक राज्य के रूप में मान्यता देता है। इसमें ये भी कहा गया कि भविष्य में पाकिस्तान और बलूचिस्तान के संबंधों के बारे में कोई भी फैसला होने तक दोनों पक्ष ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (यथास्थिति समझौता) करेंगे। लेकिन अक्तूबर आते आते जिन्ना का मन बदल गया। उसे लगा कि पाकिस्तान में शामिल हुई अन्य रियासतों की तरह बलूचिस्तान को भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए। जिन्ना के दबाव में अहमदयार खान रक्षा, विदेश संबंध और संचार पाकिस्तान को देने के लिए तैयार हो गए पर उन्होंने तब तक किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया जब तक पाकिस्तान उसके साथ सम्मानजनक शर्तों पर संधि नहीं करता। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने राज्य की विधायिकाओं दार-उल-अवाम और दार-उल-उमरा की बैठकें भी बुलाई हैं। आगे की कार्रवाई उनकी सहमति से ही होगी। फरवरी 21, 1948 को दार-उल-अवाम की बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान के साथ विलय के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। लेकिन इसके एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि कलात, भविष्य में पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के लिए संधि पर वार्ता करे।

लेकिन मार्च 18, 1948 को पाकिस्तान ने खारन, लसबेला और मकरान को जबरदस्ती अपना हिस्सा घोषित कर दिया। कलात के खान ने इसका विरोध किया। उन्होंने इसे ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ का उल्लंघन बताया। लेकिन इससे पाकिस्तान के कान पर जूं नहीं रेंगी। मार्च 26, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस गई। एक ही दिन बाद मार्च 27 को कराची में घोषणा की गई कि अहमदयार खान ने घुटने टेक दिए हैं और वो अपनी रियासत के पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार हो गए हैं। इसके साथ ही बलूचिस्तान की 227 दिन चली आजादी भी समाप्त हो गई। स्पष्ट है, जिन्ना ने बंदूक के बल पर अहमदयार खान को विलय के लिए मजबूर किया। ध्यान रहे इस से पहले ही दार-उल-अवाम पाकिस्तान के साथ विलय का विरोध कर चुकी थी। इसलिए भले ही अहमदयार खान ने बंदूक के बल पर विलय की बात मान ली हो पर उसे कलात की विधायिका ने मंजूरी नहीं दी। यही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य ने भी कभी इस फैसले को मान्यता नहीं दी जिसने बलूचिस्तान का शासन अहमदयार खान को सौंपा था।

ये सही है कि पाकिस्तान ने बंदूक के बल पर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि अहमदयार खान ने बलूचिस्तान की आजादी के लिए काफी कोशिश की। उन्होंने ईरान और अफगानिस्तान के साथ भी समझौते की कोशिश की। वो लंदन के साथ कुछ वैसा ही समझौता भी चाहते थे जैसा उसने ओमान के साथ किया। उन्होंने आजाद बलूचिस्तान के लिए समर्थन जुटाने के वास्ते मार्च 1946 में एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भी भेजा था। ये प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से मिला। लेकिन आजाद ने बलूचिस्तान की आजादी को समर्थन से इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटेन का बगलबच्चा बन कर रह जाएगा जो भारतीय उपमहाद्वीप की आजादी के लिए अच्छा नहीं होगा।

बाद में खबरें आईं कि खान ने भारत के साथ विलय की कोशिश भी की, लेकिन इसे भी नकार दिया गया। जब पाकिस्तान, बलूचिस्तान की आजादी का बलात्कार कर रहा था, अंग्रेज ही नहीं, कांग्रेस के बड़े नेता भी खामोशी से देख रहे थे। बहरहाल दुनिया भर की उपेक्षा के बावजूद बलोचियों ने अपनी आजादी की ख्वाइश नहीं छोड़ी। उनका संघर्ष लगातार जारी रहा। खान को जिन्ना ने जो धोखा दिया, वो उसे कभी नहीं भूले। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि कांग्रेस ने खान के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया होता तो आज क्या हालात होते।

पाकिस्तान ने बलोचों की धरती पर तो कब्जा कर लिया पर उनका दिल जीतने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और उसके करीब आधे भूभाग पर फैला है पर इसकी आबादी पाकिस्तान की कुल आबादी की महज दशमलव पांच प्रतिशत है। ह्यूमन डिवेलपमेंट इंडेक्स के हिसाब से ये पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है। पाकिस्तानियों ने उनकी जमीनों, खनिजों और प्राकृतिक गैस का भरपूर इस्तेमाल तो किया पर उसका फायदा उन्हें नहीं दिया। जिन्ना के धोखे और इस अंधे शोषण ने बलोचों को गुस्से से भर दिया जिसका नतीजा समय समय पर विद्रोह के रूप में सामने आया। बलूचिस्तान में सबसे बड़ा विद्रोह 2006 में हुआ जब सेना ने बलूचों के सर्वमान्य नेता सरदार अकबर बुगती और उनके 26 साथियों को धोखे से मार डाला।

कभी पंजाब में तो कभी कश्मीर मे, पाकिस्तान आजादी के बाद से लगातार भारत से पंगा लेता रहा है। 90 के दशक से कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत में उसकी प्राॅक्सी वाॅर जारी है। इंदिरा गांधी ने मजबूर होकर बांग्लादेश के संघर्ष में हस्तक्षेप किया था, परंतु उसके बाद भारत ने पाकिस्तान में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई। बलूचिस्तान में लोगों पर अकथनीय अत्याचार हुआ, लेकिन भारत ने कभी वहां फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। भारत सरकार पाकिस्तान की असली सरकार यानी सेना को छोड़, वहां की कठपुतली चुनी हुई सरकारों से गलबहियां करती रही और सेना भारत में मनमानी करती रही। पाकी सेना एक तरफ तो कश्मीर में आतंकवाद फैलाती रही तो दूसरी तरफ बलोच अशांति के लिए भारतीय खुफिया ऐजेंसी राॅ को जिम्मेदार ठहराती रही। भारत हमेशा इन आरोपों से इनकार करता रहा। पर 2009 में तबके प्रधानमंत्रियों युसुफ रजा गिलानी और मनमोहन सिंह ने शर्मअल शेख में एक संयुक्त घोषणपत्र जारी किया जिसमें पहली बार बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ। हालांकि इसमें बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत को सीधे तौर पर तो जिम्मेदार नहीं ठहराया गया पर ये अवश्य कहा गया – “प्रधानमंत्री गिलानी ने उल्लेख किया कि बलूचिस्तान और अन्य इलाकों में आतंक के बारे में पाकिस्तान के पास कुछ सूचना है”। कुछ लोगों ने इस घोषणापत्र को मनमोहन की नरमी का प्रतीक बताया तो कुछ ने आरोप लगाया कि वो सांप्रदायिक विदेशनीति अपना रहे हैं| और पाकी खुफिया एजेंसी के हाथ में खेल रहे हैं। बहरहाल काफी फजीहत के बाद मनमोहन सरकार ने इस घोषणापत्र से पल्ला झाड़ लिया।

मोदी सरकार ने भी पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से संबंध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर प्रयास पर पाकी सेना ने आतंकी हमलों के जरिए पानी फेर दिया। यही नहीं कश्मीर में भी हालात को और बदतर बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले भाइयों को याद किया। अब तक पाकी लाइन को चला रहे भारतीय मीडिया ने इसके बाद पहली बार खुल कर बलोचिस्तान में चल रहे दमन की खबरें प्रकाशित करना शुरू किया। भारत में भी विस्थापित बलोच नागरिकों के सम्मेलन हुए। यही नहीं सरदार अकबर बुगती के पोते बरहमदाग खान बुगती ने भारत में शरण के लिए आवेदन भी किया जो आजकल स्विटजरलैंड में रह रहे हैं। हाल ही में स्विटजरलैंड ने उनके राजनीतिक शरण के आवेदन को ठुकरा दिया क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया हुआ है। याद रहे ये वही पाकिस्तान है जिसने हाल ही में मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी और लश्कर-ए-तौएबा के प्रमुख को सारे अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद रिहा कर दिया था।

प्रधानमंत्री की पहल के बाद भारत ने ये मसला संयुक्त राष्ट्र समेत लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। खुद बलोच विस्थापितों ने ये मसला आॅफिस आॅफ यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशनर फाॅर रिफ्यूजीस (यूएनएचसीआर) में जोरशोर से उठाया। अमेरिका सहित दुनिया भर में इस मसले पर सेमीनार और विचार गोष्ठियां आयोजित की गईं। अमेरिका के दो सेनेटरों ने तो बलूचिस्तान की आजादी के लिए प्रस्ताव भी रखा। इससे पहले 2012 में अमेरिकी कांग्रेसमेन डाना रोहराबाचर और लूई गाहमर्ट ने हाउस आॅफ रेप्रेसेंटेटिव में बलूचिस्तान के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देने के लिए बिल पेश किया था।

पाकिस्तान ने जिस तरह हाफिज सईद को बेशर्मी से रिहा किया है और जैसे उसके आतंकी संगठन जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) को राजनीतिक संगठन (मिल्ली मुस्लिम लीग) के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है और जैसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुली धमकियों के बावजूद पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों के बारे में दोगली नीति अपना रहा है, उससे ये साफ हो गया है कि भारत को अब ये लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ेगी।

अब मोदी सरकार को बलूचिस्तान के बारे में जबानी जमाखर्च बंद कर कुछ मजबूत कदम उठाने हांेगे। सबसे पहले तो बरहमदाग बुगती को राजनीतिक शरण देनी होगी और साफ तौर से एलान करना होगा कि जैसे पाकिस्तान कश्मीर के आतंकवादियों को ‘नैतिक और राजनयिक’ समर्थन देता है, वैसे ही भारत भी अब खुले आम बलोच स्वतंत्रता सेनानियों को समर्थन देगा। भारत बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता और बलोच लोगों की इच्छा के अनुसार उसे अलग देश का दर्जा मिलना ही चाहिए। भारत को अमेरिका को भी स्पष्ट करना होगा कि यदि वो अफगानिस्तान के स्थायित्व में भारत का समर्थन चाहता है तो उसे बलोच आजादी का समर्थन करना होगा। बलोच लोगों के नरसंहार पर अब उसे अपनी जबान खोलनी ही होगी।

पाकी सेना की शह पर सीपेक के नाम पर चीन विवादास्पद पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में घुस गया है। जाहिर तौर पर चीन इसे ‘विकासपरक आर्थिक गतिविधि’ बता रहा है, लेकिन इसके सैन्य और रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि अमेरिकी ने सीपेक की वैधता पर उंगली उठाई है पर ग्वादर पोर्ट के बारे में कभी कोई वक्तव्य नहीं दिया है। अब अमेरिका को मजूबर किया जाना चाहिए कि वो इस विषय में अपनी राय स्पष्ट करे।
भारत के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा है। ये सिर्फ हाफिज सईद और उसके बारे में अमेरिकी बयानों तक सीमित नहीं है। ट्रंप की सभी धमकियों के बावजूद पाकी सेना भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए तैयार नहीं है। अब भारत को इसका हल खुद निकालना होगा और इसका रास्ता बलूचिस्तान से होते हुए जाता है।

“The power of a mother: from Manushi Chillar to Majid Khan” in TOI Blog

India is a nation whose people value their mother with reverence, from the portrayal of deities in powerful and caregiving roles to men folding their hands in obeisance to ‘lakshmi’. A country which terms its nation as ‘Bharat Mata’ is a rare find in this technologically advancing world. The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.

After a 17 year drought, India’s Manushi Chhillar won the coveted Miss World 2017 title in China. The previous winner was Priyanka Chopra, in her winning answer, Priyanka stated that her idol is Mother Theresa. Manushi, after 17 years, also gave a response based on the value of mother’s which received a huge applause from the audience. The question asked was, “Which profession deserves the highest salary and why?” The 20-year-old said, “A mother deserves the highest respect. It’s just not about cash but also the love and respect that you give to someone. My mother has been a huge inspiration. it is the mother’s job that deserves the biggest salary.”

This reply has awoken the people of India to embrace their cultural values and put their beloved mother’s on the pedestal they deserve yet are rarely acknowledged for.

It has been the argument of feminists that housewives are the largest unpaid workers globally, resulting in work done worth billions of dollars yet not recognised in our economy. The Organisation for Economic Cooperation and Development revealed that an average woman in India spends five hours a day in unpaid work, Indian men spent under 51.8 minutes a day. If the same woman has children from the age range of 1 to 6 years of age, the workload hours increase. Yet the term ‘housewife’ is frowned upon, a mother’s work is thought to be trivial, and her life imagined to be a ‘waste’.

Even if the work of a mother is thought to be a backbreaking task the entire process is imagined to have no economic value whatsoever, even though motherhood helps prepare kids for the national and international labour market. Yet all the efforts that a mother puts into the household, giving her love to her child are not disregarded. On one hand, where a mother’s love brought the coveted Miss World title back to India, a mother’s love also brought back a son from the brink of self and national destruction.

The effect of the love of a mother on her child is profound. Footballer Majid Khan who joined Lashkar-e-Taiba returned home after seeing a video of his mother crying for his return. Majid was seen at the funeral of Muzamil Manzoor, a militant killed during a gunfight in Kund. A week after he announced on Facebook that he was joining the militant ranks he returned. J&K chief minister Mehbooba Mufti welcomed Majid’s decision to return home.

‘’A mother’s love prevailed. Her impassioned appeal helped in getting Majid, an aspiring footballer, back home. Every time a youngster resorts to violence, it is his family which suffers the most,’’ she tweeted. Shortly after the return of Majid Khan, a 16-year-old boy heeded to his parents’ call and returned home in Chimmer village.
Seeing the positive effect that has been created by these videos of mothers telling their sons to come back home, many other mothers of terrorist sons have started doing the same.

In response, there are sons who are returning back home and aren’t being arrested. The government of J&K has declared that there will be no penalty for first-time offenders of any crime. In this manner, we can see that the role of a caregiver isn’t limited to our conventional belief of mother, but is also by the government. This different approach to rehabilitation of the youth, the belief that there is still hope, and the understanding that there is a gap in approach between the Indian government and Kashmiri youth has brought about a new approach.

The question still arises that with the hullabaloo surrounding Manushi Chillar’s response, to the return of children from terrorist groups, are we truly deserving to be called a nation who respects their mother in the 21st century? Compared to Western countries where children tend to live in nuclear families and leave their residence at the tender age of 18 years old, the attachment to parents isn’t as strong as in India.

Or yet that was the case until at least a decade ago, the new age trend is for Indian children to be educated outside of India and continue to live there, Indian children are leaving their parents alone. To achieve the dream of being successful in life, where success is measured in terms of international standards of income, the primary caregiver falls behind. Perhaps it is time to follow what we preach, not just say that we love our mothers but be there to care for our caregivers at a time that matters the most.

“देशभक्ति और राष्ट्रवादः चीन से सबक लें भारत के कम्युनिस्ट” in Punjab Kesari

भारतीय कम्युनिस्ट…माफ कीजिएगा भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट अपने देशद्रोही तौेर तरीकों और राजनीतिक हत्याओं के लिए बदनाम हैं। इनका ये देशद्रोही रवैया आजादी के पहले से चला आ रहा है। इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का अपमान ही नहीं किया, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे कद्दावर नेताओं को अपशब्द कहे और देश के विभाजन का समर्थन भी किया। 1962 की लड़ाई में इन्होंने बेशर्मी से चीन का साथ दिया। अपनी हत्यारी, विघटनकारी और राष्ट्रविरोधी विचारधारा के चलते ये लगातार भारत में बाहरी ताकतों की सहायता से चलाए जा रहे आतंकवादी, अलगाववादी हिंसक आंदोलनों का समर्थन करते रहे हैं। ये यहीं रूक जाते तब भी गनीमत थी, ये धर्मनिरपेक्षता के चोले में प्रतिगामी इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरवाद का समर्थन भी करते हैं। शायद यही वजह है कि क्रूर आईएस में सबसे ज्यादा मुसलमान लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) शासित केरल से ही गए।

भारत की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों और देश के 90,000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा जमा कर बैठे माओवादियों का चीन से गहरा नाता है। इन्होंने मानवाधिकारों के तिरस्कार और राजनीतिक विरोधियों की हत्या की सीख चीन से बखूबी ली है, वैसे ये इनकी विचारधारा के मूलभूत तत्वों में भी शामिल हैं। लेकिन ये चीन से कुछ अच्छी बातें भी सीख सकते थे जो इन्होंने शायद जानबूझ कर नहीं सीखीं क्योंकि ये इनकी विचारधारा से ज्यादा इनके निहित स्वार्थों के विपरीत हैं।

इन्हें चीन से जो चीज सबसे पहले और सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है वह है – प्रबल राष्ट्रवाद और देशभक्ति। भारत में जब भी कोई देश प्रेम या देश के लिए बलिदान होने की बात करता है तो सबसे पहले कम्युनिस्ट ही उसका मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं। उसे फासिस्ट बताया जाता है, उसे दकियानूस साबित करने की हरसंभव कोशिश की जाती है और उसे आधुनिकता और उदारवाद का विरोधी करार दिया जाता है। हालांकि अभी तक ये साबित नहीं कर पाए हैं कि देश से प्रेम करना और उसके प्रति वफादार होना कैसे उदारवाद और आधुनिकता विरोधी है और क्योंकर देश को गाली देना ही खुलेपन और आधुनिकता की निशानी माना जाए। अपनी इसी विकृत विचारधारा के कारण ये हमेशा से देश की सेना का मजाक उड़ाते रहे हैं और उसके खिलाफ शत्रुओं को समर्थन देते रहे हैं। मेजर रितुल गोगोई मामले में कैसे सारे कम्युनिस्ट और नक्सली सेना के खिलाफ एकजुट हो गए, वो देश शायद ही कभी भूल पाए। हम कैसे भूल सकते हैं कि जब अप्रैल 2010 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए थे तब इन्होंने कैसे जश्न मनाया था और मिठाइयां बांटी थीं।

भारत के कम्युनिस्टों और नक्सलियों की विकृत राष्ट्रद्रोही नीतियों के उलट चीन में कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ से ही प्रबल राष्ट्रवाद और यहां तक ही विकृत विस्तारवादी राष्ट्रवाद की समर्थक रही है। इसी विस्तारवादी नीति के कारण उन्होंने तिब्बत हड़पा, अक्साई चीन पर कब्जा जमाया और अब भी अरूणाचल प्रदेश समेत भारत के अनेक हिस्सों पर दावा ठोक रहे हैं। यही नहीं अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी उनका यही रवैया है। चाहे जापान हो, वियतनाम हो, भूटान हो या ताईवान, चीन का शायद ही कोई पड़ोसी होगा जो उसके विस्तारवादी रवैये से परेशान नहीं होगा। अब तो चीन सिर्फ जमीन पर ही नहीं, समुद्री मार्गों पर भी कब्जा जमाने में लग गया है। वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट और साउथ चाइना सी का विवाद इसी का परिणाम है। आज दुनिया भर की ताकतें चीन पर आरोप लगा रही हैं कि वो आर्थिक रूप से कमजोर देशों को ऊंची दरों पर कर्जा देकर उन्हें अपने जाल में फैला रहा है और एक नए किस्म के आर्थिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहा है।

भारत के कम्युनिस्ट और नक्सल कभी चीन के विस्तारवादी राष्ट्रवाद पर उंगली नहीं उठाते, लेकिन देश की राष्ट्रवादी पार्टियों का मजाक उडाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बेहतर हो ये देश को तोड़ने का एजेंडा छोड़ कर अपने प्रेरणा स्रोत और पितृ देश चीन की तरह भारत की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करें।
भारत में जब राष्ट्र के मूलभूत प्रतीकों जैसे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत या तिरंगे के सम्मान की बात उठती है तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। ये इनकी विचारधारा के अनुरूप तो है ही, इससे इन्हें कट्टरवादी मुसलमानांे को पोटने का मौका मिलता है जो मानते हैं कि वो मुसलमान पहले हैं और उनके लिए मुस्लिम बिरादरी भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर हम इस मामले में भारत की तुलना चीन से करें तो पता लगेगा कि वहां कम्युनिस्ट पार्टी नागरिकों को देशभक्ति सिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसी वर्ष सितंबर में नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘नेशनल एनथम लाॅ’ को मंजूरी दी। इसके अनुसार पूरे देश में प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में राष्ट्रगान बजाया और गाया जाना चाहिए। इस कानून के मुताबिक राष्ट्रगान देशभक्ति की शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। चीन का संविधान कहता है कि “चीनियों को अपने देश और लोगों को प्यार करना चाहिए…उन्हें देशभक्ति, सामूहिकता, अंतरराष्ट्रवाद और साम्यवाद की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसके अलावा शिक्षा से जुड़े कानून कहते हैं कि छात्रों को हर स्तर पर देशभक्ति की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षकों से संबंधित कानून के अनुसार देशभक्ति की शिक्षा देना अध्यापकों का कर्तव्य है। स्वयं राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसपर बार बार बल देते रहे हैं। दिसंबर 2015 में शी ने कहा देशभक्ति चीनी राष्ट्र का अध्यात्मिक केंद्र है और देशभक्ति की शिक्षा देश के समूचे शिक्षातंत्र में प्रवाहित होनी चाहिए।

हाल ही में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीें नेशनल कांग्रेस मंे शी जिनपिंग को एक बार फिर राष्ट्रपति चुना गया । जहां भारत के कम्युनिस्ट यहां चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों को समर्थन और बढ़ावा देते हैं, वहीं शी जिनपिंग ने कहा कि ”हम किसी भी ऐसे व्यक्ति को सहन नहीं करेंगे जो देश की एक इंच जमीन भी देश से अलग करने की कोशिश करेगा…..ध्यान रहे खून पानी से ज्यादा गाढ़ा होता है…हमें ऐसे लोगों का सामना करने के लिए देशभक्त ताकतों को मजबूत करना होगा, देशभक्ति का प्रचार करना होगा।“ शी का इशारा ताइवान और हाॅंगकाॅंग की ओर था। ताइवान खुद को अलग देश मानता है। हाॅंगकाॅंग चीन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन वहां लोकतंत्र समर्थक चीनी साम्यवाद का विरोध कर रहे हैं।

भारतीय नेता जब भी देशगौरव या राष्ट्रउत्थान और सशक्तीकरण की बात करते हैं तो सबसे पहले साम्यवादी ताकतें ही उनका विरोध और अपमान करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। इस विषय में इन्हें चीन से सबक लेने की सख्त जरूरत है। 19वीं पार्टी कांग्रेस में शी बहुत शान से बताते हैं कि पिछले पांच साल में चीनी का सकल घरेलू उत्पाद 54 ट्रिलियन डाॅलर से बढ़ कर 80 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच गया। इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रही। इस अवधि में चीन ने सेना के आधुनिकीकरण और सशक्तीकरण के लिए अनेक कदम उठाए। शी ने वर्ष 2050 तक अपनी सेना को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाने का लक्ष्य भी रखा। ध्यान रहे, चीन ने साम्यवादी व्यवस्था होते हुए भी बड़े बड़े पूंजीपतियों को बढ़ावा दिया, लेकिन भारत के कम्युनिस्ट भारत के उद्यमियों को विलेन की तरह चित्रित करने से बाज नहीं आते। चीन अपनी सेना के दम पर दुनिया जीतने का सपना देखता है, लेकिन यहां के साम्यवादी नागरिकों को देश की सेना के खिलाफ भड़काने से बाज नहीं आते।

भारत के कम्युनिस्ट खुद को देश के हजारों वर्ष पुराने इतिहास और संस्कृति से अलग मानते हैं। कहा जाए कि इसे त्याज्य मानते हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्होंने हमेशा ही भारतीय इतिहास को अपने संकीर्ण नजरिए से देखा है जिसके कारण इनके इतिहासकारों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में भयानक विसंगतियां पैदा हो गई हैं। अगर भूले से भी कोई भारतीय अपने इतिहास को स्वर्णिम बता दे या अपने भारतीय होने पर गौरव करे तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसका मान मर्दन करने के लिए बंदूक उठा लेते हैं।

इनके खिलाफ शी जिनपिंग ने अपने भाषण में चीन के 5,000 साल पुराने इतिहास का गर्व से जिक्र किया। वो कहते है -“5,000 साल के इतिहास के साथ हमारे देश ने शानदार सभ्यता रची, दुनिया को महत्वपूर्ण योगदान दिए और हम दुनिया के सबसे महान देशों में से एक बने। लेकिन 1840 के अफीम युद्ध के बाद देश घरेलू विवादों के अंधेरे में डूब गया…….जब से आधुनिक युग शुरू हुआ है देश का कायाकल्प करना और उसे पुरानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना चीनी लोगों का सबसे महान स्वप्न रहा है।“ अगर भारत में कोई भारत को पुरानी बुलंदियों तक पहुंचाने की बात करे तो कम्युनिस्ट तुरंत उसे ‘रिवाइवलिस्ट’ कह कर गाली देना शुरू कर देंगे।

हमारे यहां कम्युनिस्ट संसद पर हमला करने वालों की पैरवी करते हैं, कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानने वाले हुर्रियत के आतंकियों की चैखट पर सजदा करते हैं। ये हमें जबरदस्ती ये पढ़ाने की कोशिश करते हैं कि अलगाववाद की बात करना उदारवाद है और अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है। इनके विपरीत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अलगाववाद तो क्या लोकतंत्र की बात करने वालों तक को सहन नहीं करती। वो लोकतंत्र की मांग करने वालों पर टैंक चलवा देती है (आपको ‘1989 का लोकतंत्र आंदोलन’ और तिअनअनमेन चैक पर छात्रों पर टैंक चलवाना याद होगा), ये चीनी नेल्सन मंडेला कहे जाने वाले ल्यू जिआबो को कैद में डाल देती है। इन्हेें शांति और मानवाधिकारों के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाता है पर चीनी इन्हें जेल में तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर करते हैं। चीन राजनयिक अपने हितों के लिए किस हद तक जा सकते हैं उसे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के प्रति उनके रवैये से समझा जाता है। दलाई लामा दुनिया के जिस भी देश में जाते हैं, उनका दूतावास उसके नेताओं को पहले ही धमकी देने लगता है कि दलाई लामा के स्वागत से उनके संबंध चीन से बिगड़ सकते हैं। जहां चीनी मीडिया हर कूटनीतिक और राजनयिक अभियान में अपने देश का साथ देता है, वहीं यहां के पार्टी कामरेड अपनी सरकार और देश के हितों में पलीता लगाने में ही शान समझते हैं।

भारत के कम्युनिस्ट लंबी चैड़ी बातें तो करते हैं धर्मनिरपेक्षता की, लेकिन बड़ी बेशर्मी से इस्लामिक कट्टरवादियों को प्रश्रय और प्रोत्साहन देते हैं। इनके विपरीत आप उईगुर प्रांत में इस्लामिक कट्टरवादियों और अलगाववादियों के खिलाफ चीनी सरकार का रवैया देखिए। वहां उन्होंने मुसलमानों के रोजा रखने, दाढ़ी बढ़ाने, काले कपड़े पहनने तक पर रोक लगा दी है।

एक बात और, चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया और भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-बड़े पार्टी अधिकारियों तक को जेल की हवा खिला दी। लेकिन हमारे यहां ये खरबों रूपए के घोटालों की आरोपी कांग्रेस और दुनिया की भ्रष्टतम नेताओं में से एक सोनिया गांधी के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं।

अब सोचने की बात ये है कि साम्यवाद तो चीनी भी मानते हैं और भारत के कम्युनिस्ट भी, लेकिन यहां के कम्युनिस्ट अपने देश, उसकी हजारों साल पुरानी संस्कृति, उसके गौरव, उसकी सेना, उसके लोगों की देशभक्ति, वफादारी के खिलाफ क्यों हैं? इन्हें क्यों हिंदुओं से इतनी नफरत है? ये क्यों इस्लामिक कट्टरवादियों और आतंकवादियों के सरपरस्त और खैरख्वाह बने हुए हैं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं – एकः ये अपनी विचारधारा को सर्वोपरी मानते हैं, खुद को अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन का हिस्सा मानते हैं और इनका भारत और उसके इतिहास और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है, इनका लक्ष्य तो किसी भी तरह सत्ता हासिल करना है और इसके लिए भारत विरोधियों को बढ़ावा देना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं। दोः भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट विदेशी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जिनका लक्ष्य देश को तोड़ना और देश में गृहयुद्ध और अराजकता भड़काना है। इनका अपना कोई वजूद नहीं है, ये सिर्फ वैचारिक उपनिवेशवाद और अंधे तरीके से अपने आकाओं का हुकुम बजाने में विश्वास करते हैं।

बात चाहे पहली हो या दूसरी, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि विचारधारा के नाम पर देश को तोड़ने के षडयंत्रों को अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी को देश की अखंडता और एकता से खिलवाड़ का मौका नहीं दिया जा सकता। कम्युनिस्टों का भारत द्रोह का पुराना और वीभत्स इतिहास है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो इन पर प्रतिबंध भी लगाना चाहिए। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं इसे समझाने के लिए हम इनके विघटनकारी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेख समाप्त करेंगे।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का झुकाव साम्यवाद की तरफ था जिसकी भारत ने बड़ी कीमत भी चुकाई, लेकिन स्वयं नेहरू ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को सबक सिखाया था। हैदराबाद का निजाम और उसके रजाकार (सैनिक) भारत में विलय के खिलाफ थे। इसी प्रकार सीपीआई भी भारत में विलय नहीं चाहती थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के बाद निजाम तो भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गया लेकिन सीपाआई के काॅमरेडों ने रजाकारों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी और तेलंगाना के करीब 3,000 गांवों पर कब्जा भी जमा लिया। ये यहां रिपबिल्क आॅफ तेलंगाना स्थापित करना चाहते थे। ये सोचते थे कि जैसे माओ त्से तुंग ने चीन के एक हिस्से येनान पर कब्जे के बाद पूरे देश पर कब्जा कर लिया वैसे ही ये भी तेलंगाना के बाद पूरे भारत को हथिया लेंगे। भारत के खिलाफ इनका गुरिल्ला युद्ध 1951 तक चला। इन्होंने अपनी मुहिम के लिए सोवियत रूस से गुहार लगाई, लेकिन स्टालिन ने इनका साथ नहीं दिया। इसके बाद इनके हौसले पस्त हो गए। ये लोग नेहरू सरकार को ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवादियों का नौकर बताते थे। कहना न होगा नेहरू ने इन्हें अच्छा सबक सिखाया। 1962 में जब कम्युनिस्टों ने बेशर्मी से चीन का साथ दिया तब फिर नेहरू सरकार ने इनके कई नेताओं को सलाखों के पीछे भेजा।

अपनी हरकतों और औंधी सोच की वजह से भारत में कम्युनिस्ट का राजनीतिक प्रभाव धीरे धीरे सीमित हो रहा है लेकिन पत्रकारिता, साहित्य, इतिहास, शिक्षण संस्थानों आदि कई क्षेत्रों में कामरेडों ने कांग्रेस की मदद से गहरी पैठ बना ली है। ये अब भी प्याले में तूफान खड़ा करने और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। अब सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि ये भारत के लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया का नाजायज फायदा न उठा पाएं। सरकार को इनकी हरकतों पर निगाह रखनी चाहिए और जब ये देशद्रोह के आरोपी पाए जाएं, तो तुरंत इन्हें फांसी पर लटकाया जाना चाहिए।

“Air pollution: Just because you can’t see it, doesn’t mean it isn’t there” in TOI Blog

When the pollution level was at hazardous for 20 days straight the government didn’t act. It took one day of smog and countless number of accidents for the government of New Delhi to wake up and begin planning to curb pollution. When the pollution is visible, makes breathing and eating difficult is when actions are taken. What most people don’t know is that pollution is high for most of the year, and indoor pollution level is more than outdoor pollution. A delayed reaction to pollution is equivalent to no action taken whatsoever, but there are small changes that we can make to help our environment.

The effect of pollution is most harmful for the elderly, young children, and especially more for the child in the mother’s womb. Pregnant mothers who face Delhi’s terrible pollution levels are at a higher risk to give birth to an asthmatic child. More and more people are prone to lung infections, persistent cough, inflammations of the skin, the risk and statistic of heart attacks increases manifold. Public and government school children who go to school during these pollution days have no protection whatsoever, windows are broken or open and so are classroom doors. This means that apart from the 3 day holiday this month that the government issued as a protection notice, the rest of the month children have to inhale life threatening pollutants into their lungs. There is no need to pollute the developing lungs of the future of our nation, reduced lung function also affects the performance of the mind. Pollution decreases performance and activity of the brain, so smog isn’t only in the air it’s also in the mind.

Pollution is more indoors due to the fumes from cooking oil, the gas stove, incense and mosquito repellants. There is limited ventilation, there are some preventative measures that can be used at home. Instead of lighting candles and incense sticks, light a lamp at the temple. Install powerful exhaust fans in the kitchen, and indoor plants to act as natural air purifiers. The unfortunate scenario is that air purifiers are at an extremely hiked price, for a middle class or underprivileged family it becomes an expensive added expenditure. Yet whoever can buy these purifiers, and face masks should do so. Keep checking the pollution levels on a daily basis, and if a mother fears that it’s too polluted and schools aren’t closed, then keep the child indoors. There is nothing more important than living a complete and healthy life.

Doctors suggest people should leave the city during dangerous pollution levels, so does the government, so do armchair pollution experts. It is a good solution, unfortunately it isn’t a feasible solution. There are many responsibilities that a person has in Delhi, whether it’s their job, or their education everything cannot be left for 3 – 4 months. Also it isn’t possible for a large population of our national capital to afford migrating for chunks of a year to another city. Rehabilitation isn’t a feasible solution, economically or even socially.

The solution shouldn’t be to displace a major portion of our population from the capital of our nation, a place where nation building decisions are made. The solution should be to make our people re-habilitate our Delhi, to create a feeling of compassion instead of fear by stopping this pollution problem once and for all.

The Delhi government started the odd-even formula last year, this year it has been rejected. The reason for rejection is the exemption for women and 2-wheelers. This is a fear that has been called out by anti-feminists and pro-humanists, when women empowerment becomes a bias to put women at a higher pedestal than other genders, when women empowerment is confused with special treatment, and when women empowerment is only done for the appeasement of the vote banks. I am sure that the women of Delhi will agree that for the healthy and long life of millions of Delhiites they can stop driving and start taking public conveyance, that there are other ways to look at the safety of women, and that when it comes to the safety of women major rules haven’t been implemented. The safety of women isn’t guaranteed by a woman driving a car, it’s by the installation of CCTV cameras, of rules, laws and regulations for her safety, and for proper lighting in parks and on roads. If someone drives a car it doesn’t mean that they are safe!

Pollution levels didn’t hike to the level that they did last year during Diwali, fortunately due to the temporary ban in distribution of crackers. Yet the common knowledge is that pollution travels from the villages of Punjab and Haryana due to crop burning. This air travels to Delhi, and is landlocked until the winds circulate the air.

Strict measures need to be taken in Punjab and Haryana to curb these activities, during metro construction water should be poured so that particulate matter from dust doesn’t circulate, and holidays should be declared for offices and schools when pollution levels are too dangerous. But the battle against pollution is a far off struggle, and the most that can be done is a mother can take over the household and protect her unborn fetus, her infant, and her child from a short lived future by taking small steps at home.

“देशद्रोही नक्सल आतंकियों के सफाए के लिए सेना तैनात की जाए” in Punjab Kesari

हाल ही में खबर आई कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके के धूरबेड़ और पिनका में पुलिस दल ने एक महिला नक्सली समेत छह नक्सलियों को मार गिराया और उनके पास से बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए। यह कार्रवाई छह नवंबर को शुरू किए गए आॅपरेशन प्रहार के दूसरे चरण के तहत  हुई। यह संभवतः पहली बार है जब नक्सलियों को दक्षिण बस्तर के बीहड़ांे में उनके इलाके में घुस कर खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। इस इलाके के ‘भयावह जंगलों ओर दुर्गम पहाड़ियों’ में नक्सलियों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। इससे पहले दो दशक तक तक पुलिस और अन्य सुरक्षा बल इनके आस-पास भी नहीं पहुंच पाए थे। इसलिए यहां पहुंच पाना ही बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

आपके और मेरे मन में स्वाभिवक ही सवाल उठता है कि जिन ‘भयावह और बीहड़’ जंगलों में नक्सली आराम से अड्डा बना सकते हैं, वहां पुलिस या अन्य बल अब तक क्यों नहीं पहुंच सके? वहां जाना वास्तव में मुश्किल था या जाने की इच्छाशक्ति ही नहीं थी? इतने वर्ष बाद, अिखर अब ही क्यों पुलिस वहां पहुंच पाई है?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें भारत में खूनी नक्सलियों के इतिहास पर नजर डालनी होगी। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि इतने साल बाद आज अगर पुलिस इन ‘दुर्गम’ इलाकों में जाने की हिम्मत जुटा रही है तो इसका एक बहुत बड़ा कारण केंद्र और छत्तीगढ़ की भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं जिन्होंने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ता दिखाई है।

येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए हिंसा और हत्या को वैध मानने वाली नक्सली मुहिम की शुरूआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी के दो सदस्यों कानू सन्याल और चारू मजूमदार  ने पचास साल पहले 1967 में पश्चिम बंगाल में की। यह नक्सलबाड़ी गांव से आरंभ हुई, इसलिए इसे नक्सलवाद के रूप में जाना गया। कानू और चारू ने अपने हत्यारे दर्शन के अनुसार ये खूनी सिलसिला जमींदारों के खिलाफ भूमिहीन किसानों को न्याय दिलवाने के नाम पर आरंभ किया था। ध्यान रहे नक्सलवादियों को माओवादी भी कहा जाता है क्योंकि ये चीन के बदनाम सिरफिरे कम्युनिस्ट तानाशाह माओ त्से तुंग के हिंसक राजनीतिक दर्शन को मानते हैं जो कहता है कि सत्ता बंदूक की नोक से आगे बढ़ती है। माओ ने अपनी कुख्यात और सनकी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान करोड़ों चीनियों को मरवाया।

ये संयोग की बात है कि माओ की मूर्खतापूर्ण सांस्कृतिक क्रांति (1966) और भारत में नक्सलवाद (1967) लगभग एक साथ ही  शुरू हुए। भूमिहीन किसानों, आदिवासियों और गरीबों को हक दिलवाने के नाम पर शुरू किए गए हत्यारे नक्सलवाद का असली लक्ष्य भारत सरकार को उखाड़ फेंकना और साम्यवादी शासन स्थापित करना था। जैसे जैसे समय बीता, हत्यारे नक्सलियों की मंशा भी स्पष्ट होती चली गई। वर्ष 2007 तक ये खूनी दरिंदे अपने पंजे 14 राज्यों तक फैला चुके थे। 2009 में 10 राज्यों के 180 जिलों में इनका प्रभाव था, जबकि 2011 में सरकार ने दावा किया कि इन्हें नौ राज्यों के 83 जिलों तक सीमित कर दिया गया था। वर्ष 2016 में जारी एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक नक्सली अब भी 10 राज्यों के 106 जिलों में फैले थे। आपको ज्ञात ही होगा कि नक्सल हिंसा में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सुरक्षा बल, आम नागरिक और खुद नक्सली भी शामिल हैं।

भारत में कम्युनिस्टों के अलग-अलग गुट या कहें पार्टियां भले ही जाहिर तौर पर नक्सलवाद से किनारा करती रहीं हों, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इन्होंने अंदर ही अंदर इन्हें भरपूर समर्थन और संसाधन उपलब्ध करवाए। जहां मुख्य धारा की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियां बैलेट (मतपत्र) के जरिए सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश करती रहीं, वहीं नक्सली इनकी सैन्य इकाई बन कर बुलेट (गोली) के जरिए देश के बड़े भूभाग पर अपना विस्तार करते रहे।

कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा और कौन सी ताकतें थीं जिन्होंने नक्सलियों को अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में मदद की? कैसे ये नक्सली जंगलों और बीहड़ों से निकलकर विश्वविद्यालयों, सरकारी दफ्तरों, मीडिया संस्थानों, अदालतों आदि तक पहुंच गए? कैसे इन्होंने विश्वविद्यालयों में अपनी छात्र इकाइयां और स्लीपर सेल स्थापित किए? कैसे इन्होंने गैर सरकारी संगठनों का बड़ा नेटवर्क बना और देश-विदेश से चंदा उगाह,  छोटे बड़े शहरों में जनता को उकसाने और भड़काने के लिए कार्यकर्ता और नेटवर्क तैयार किए? कैसे ये संगठन विदेशी इशारों पर भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे? कैसे इनके वकील इनकी देशद्रोही गतिविधियों को कानूनी संरक्षण देने के लिए अदालतों में उतर गए?

इसके लिए कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार है जिसके राज में इन्हें न केवल भौगोलिक विस्तार मिला बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी इन्होंने घुसपैठ बनाई। यूपीए सरकार में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को रिमोट से चलाने के लिए एडवाईजरी काउंसिल बनाई थी। इसके ज्यादातर सदस्य इसी नेटवर्क से संबंध रखते थे। इससे इनकी पहुंच और प्रभाव का अंदाज लगाया जा सकता है और सोनिया गांधी की मानसिकता को भी समझा जा सकता है जिन्होंने ‘आईडिया आॅफ इंडिया’, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, ‘विविधता’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ आदि जैसे मोटे-मोटे जुमलों की आड़ में इन्हें फलने फूलने और देश विरोधी गतिविधियां करने का मौका दिया।

वैश्विक स्तर पर भले ही इस्लामिक आतंकवादी और कम्युनिस्ट अलग अलग नजर आते हों लेकिन भारत को तोड़ने के साझे लक्ष्य के चलते यहां इन्होंने हाथ मिला लिए हैं। आज ये सिर्फ गरीब किसानों और मजदूरों के लिए ही लड़ने का नाटक नहीं करते, ये बाकायदा इस्लामिक आतंकवादियों के लिए भी संघर्ष करते हैं। संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की फांसी रूकवाने के लिए अदालत से मीडिया तक कैसे पूरा नक्सली गैंग सक्रिय हो गया था, ये हमने अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना है। कैसे अरूंधती राय हुर्रियत के आतंकवादी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करती थी, ये भी बहुत पहले की बात नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के जिस ‘दलित’ अराजकतावादी रोहित वेमूला के लिए नक्सलियों ने आसमान सिर पर उठा लिया, वो मुंबई हमलों के दोषी आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में जिंदाबाद के नारे लगाता था और जुलूस निकालता था। यही नहीं वो राष्ट्रवादी छात्र संगठनों के सदस्यों के साथ मार पिटाई भी करता था। ये सब भी हम जानते हैं।

नक्सलियों और कम्युनिस्टों की राजनीति का अगर हम ध्यान से अध्ययन करें तो हमें पता लगेगा कि अब इनका पूरा जोर मुसलमानों और दलितों को अपने साथ लाने पर है। कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने पिछले 70 साल में जैसे मुसलमानों में अलगावाद और आतंकवाद का जहर बोया, ऐसे में ये नक्सलियों के लिए आसान टारगेट हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय तक इस्लामिक आतंकवादियों की बरसी मनाना, राष्ट्रविरोधी सेमीनार आयोजित करना, ‘दलित’ रोहित वेमूला के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालना, खुद लोगों की बेरहमी से हत्या करने के बावजूद मोदी सरकार पर ‘असहिष्णुता’ का आरोप लगाना, ये सभी इनकी विघटनकारी रणनीति के ही हिस्से हैं।

सड़क से संसद तक नक्सलियों के इस एजेंडा को कांग्रेस ने कैसे समर्थन दिया, कैसे राहुल गांधी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक इनके समर्थन में चक्कर मारे, कैसे कांग्रेसी वकीलों ने इनके मुकदमे लड़े, ये किसी से छुपा नहीं है।

अब ये स्पष्ट हो चुका है कि भूमिहीनों और गरीबों की लड़ाई लड़ने का ढोंग करने वाले खूनी नक्सली वास्तव में विकास विरोधी हैं। जब भी सरकारों ने इनके प्रभाव वाले इलाकों में कोई विकास कार्य करने की कोशिश की, इन्होंने पलीता ही लगाया। ये नहीं चाहते कि इनके प्रभाव वाले इलाकों में लोग बाहरी दुनिया से जुडं़े या उसके बारे में जानें। इसीलिए ये बिजली के खंभे, सरकारी स्कूल, रेलवे स्टेशन, हर वो चीज जला देते हैं जो नक्सल इलाके के लोगों को बाहर से जुड़ने का अवसर देती है या इसकी संभावना पैदा करती है। इन्होंने अपने इलाकों में अपने स्कूल खोले हैं जहां इनकी पाठ्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं जो बच्चों के दिमाग में भारत के खिलाफ जहर भरने और उन्हें ब्रेनवाश्ड हत्यारा बनाने का काम करती हैं।

अब सवाल ये उठता है कि नक्सलियों के पास पैसा और हथियार कहां से आते हैं? कैसे ये जंगलों में अपनी हुकूमत चलाते हैं। इसका स्पष्ट उत्तर है कि इन्हें पाकिस्तान और चीन की खुफिया एजेंसियों से पैसा और हथियार मिलते हैं। इसके अलावा ये अपने इलाकों में चलने वाली फैक्ट्रियों और खानों के मालिकों से हफ्ता वसूलते हैं, शहरों में चलने वाले इनके एनजीओ देश-विदेश में इनके लिए पैसा जुटाते हैं। ये अपने इलाकों में अफीम उगाते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थों का धंधा करते हैं। ये समय समय पर पुलिस थानों पर हमले करते हैं जहां से इन्हें बड़े पैमाने पर हथियार मिलते हैं। खुफिया जानकारियों के मुताबिक अब तो इन्होंने खुल कर हथियारों का उत्पादन शुरू कर दिया है। इनमें से कुछ हथियार ये देश के दूसरे हिस्सों में असामाजिक तत्वों को भी बेचते हैं। ये सुपारी किलिंग का काम भी करते हैं। आज नक्सली अलग इकाई के रूप में काम नहीं करते, इनके कश्मीरी आतंकवादियों से लेकर नगालैंड और असम के अलगाववादियों तक सबसे संपर्क और लेनदेन है और ये बेधड़क भारत में चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों का समर्थन करते हैं।

अब सवाल ये है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए? अक्सर ये सवाल उठता है कि जब नक्सली घने जंगलों में रह सकते हैं और वहां से समानांतर सरकार चला सकते हैं तो केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के सुरक्षा बल वहां क्यों नहीं पहुंच सकते? क्यों नहीं सरकार इनके खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाती और इन्हें एक झटके में समाप्त करती? इसका दो टूक उत्तर है कि अब तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। ये भी देखने में आया कि कुछ पार्टियों ने इन्हें बढ़ावा दिया और इन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। जातिवाद और इस्लामिक संप्रदायवाद के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियों ने लगातार विघटनकारी भावनाओं और संगठनों को प्रोत्साहित किया और राष्ट्रवादी ताकतों का मजाक उड़ाया। ऐसे में इनसे नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई की कैसे अपेक्षा की जा सकती है?

नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले कहते हैं कि सरकार को उनसे बात करनी चाहिए और शातिपूर्वक तरीके से इस समस्या को हल करना चाहिए। लेकिन अनुभव बताता है कि ‘शांतिपूर्वक तरीका’ सिर्फ इन हत्यारों को अधिक संगठित और दृढ़ होने का ही अवसर और समय प्रदान करता है। एक अन्य तबका है जो कहता है कि नक्सल क्षेत्रों में विकास कर इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के लिए भी बहुत जतन कर लिए हैं। अब ये साफ हो चुका है कि इनका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। जब तक नक्सलियों की निरंकुश सत्ता  समाप्त नहीं की जाती, इनके प्रभाव वाले इलाकों में विकास की कोई किरण नहीं पहुंचेगी।

पिछले पचास साल का अनुभव बताता है कि नक्सलियों का लक्ष्य भारत को तोड़ना है, और ये किसी भी सूरत में इससे पीछे नहीं हटेंगे। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि सरकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नक्सलियों के समर्थकों से डरे बिना इनके खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़े। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए आॅपरेशन चला रही है, लेकिन ऐसी कार्रवाइयों से ये मसला हल नहीं होगा। ये काननू व्यवस्था का कोई मामूली मसला नहीं है, जिसे राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर हल कर सकें। केंद सरकार को रेड काॅरीडोर (नक्सल प्रभावित इलाके को इस नाम से भी जाना जाता है) को सीधे अपने कब्जे में लेकर इनके खिलाफ बाकायदा सैनिक कार्रवाई करनी चाहिए और इससे पहले कोई चेतावनी भी नहीं दी जानी चाहिए। अब तक नक्सलियों के खिलाफ अलग बल बनाने की कवायद होती रही है। भारत की थल सेना और वायु सेना आधुनिकतम हथियारों से सुसज्जित है। ऐसे में अलग बल पर पैसा व्यर्थ करने की जगह अब केंद्र सरकार को अपने सैन्य बलों का इस्तेमाल करना चाहिए। आवश्यकता लगे तो उन्हें इसके लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

अब ये रेटोरिक बंद होना चाहिए कि नक्सली भी भारतीय नागरिक हैं और इनके खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हकीकत तो ये है कि ये देश के उतने ही बड़े दुश्मन हैं जितनी बड़ी पाकिस्तानी सेना। हम उठते बैठते कश्मीर में आतंकवाद की बात करते हैं और हमने उसके सफाए के लिए सेना भी तैनात कर रखी है। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल मात्र 15,948 वर्ग किलोमीटर है, जबकि रेड काॅरीडोर 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। जब सेना कश्मीर में आतंकवादियों के सफाए के लिए अभियान चला सकती है, तो इतने बड़े इलाके को खूनी नक्सली आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? एक बात और, अब नक्सलियों के लिए ‘लेफ्टविंग एक्ट्रीमिस्ट’ जैसे शब्द नहीं इस्तेमाल होने चाहिए। ये देशद्रोही आतंकवादी हत्यारे हैं। इन्हें और इनके समर्थकों को इसी नाम से बुलाया जाना चाहिए।

लेकिन समस्या सिर्फ जंगलों से ही नक्सलियों को खदेड़ने की नहीं है। हमने देखा है कि कैसे अनेक विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्रों को इस ओर धकेल रहे हैं, कैसे मीडिया और अदालतों में बैठे इनके लोग पूरा गैंग बनाकर इनके हितों को आगे बढ़ा रहे हैं और देश का समर्थन करने वालों का मजाक उड़ा रहे हैं और उन्हें ही खलनायक बना रहे हैं। अब इनके खिलाफ शहरों में भी कार्रवाई आरंभ होनी चाहिए। मीडिया और अदालत में इनके एजेंटों, गली मोहल्लों में इनके गैर सरकारी संगठनों, विश्वविद्यालयों में इनके समर्थक शिक्षकों, छात्र संगठनों, स्लीपर सेलों, विदेशों में बैठे इनके सरपरस्तों की पहचान कोई मुश्किल नहीं है

सरकार को चाहिए कि इस समस्या के उन्मूलन के लिए निश्चित समय सीमा के लिए एक अलग समन्वय मंत्रालय का गठन करे जो जंगलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक राष्ट्रदोहियों के खिलाफ कार्रवाई की रूपरेखा तैयार करे और उसे अमली जामा पहनाए। इसके साथ ही संविधान में संशोधन भी किए जाएं ताकि नक्सली आतंकवादी मानवाधिकारों के नाम पर छूटने न पाएं। सरकार अपने यहां नौकरी और आर्थिक सहायता सिर्फ उन्हीं लोगों, संगठनों और संस्थानों को दे जो देश के प्रति वफादारी का लिखित हलफनामा दें। इस हलफनामे का उल्लंघन करने वाले को न सिर्फ सेवा से हटाया जाए, बल्कि उसे सख्त से सख्त सजा भी दी जाए। जब तक देश से नक्सली आतंकियों का जड़ मूल से सफाया न हो जाए, विश्वविद्यालयों में राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।

 

 

 

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