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“मोदी के नेतृत्व में नई उंचाइयों पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध” in Punjab Kesari

कुछ विपक्षी दलों ने बिना जाने-समझे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। मुसलमान वोटों की सांप्रदायिक राजनीति करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झप्पी को लेकर अपमानजनक ट्वीट तक कर डाले। लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी इस पार्टी से ऐसे बचकाने बर्ताव की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन आजकल ये पार्टी जिन हाथों में है और जैसे लोग इसका सोशल मीडिया विभाग संभाल रहे हैं, उनसे किसी परिपक्वता की आशा करना भी बेमानी है।

कांग्रेस भूल गई कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उसने झूठा दुष्प्रचार करके उनकी अमेरिका यात्रा तक पर प्रतिबंध लगवा दिया था। लेकिन इसके बावजूद मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जाॅर्ज बुश और बराक ओबामा के समझौतों का न केवल सम्मान किया बल्कि उन्हें आगे भी बढ़ाया। मोदी ने अपनी अमेरिका नीति में बिना किसी दुराग्रह के सिर्फ एक बात का ध्यान रखा और वो है – भारतीय हित।

पिछले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए उल्लेखनीय सुधार की अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो पता चलेगा कि ये उपलब्धियां एक दिन में हासिल नहीं हुईं। इनके पीछे दोनों देशों में विकसित हुई गहरी समझ है जिसे पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी ने आगे बढ़ाया। दीगर बात ये है कि दोनों देशों में सरकारें बदलीं, लेकिन परस्पर हितों में सहयोग और सामंजस्य की जो समझ विकसित हुई वो अक्षुण्ण रही। बहुमत के साथ सरकार में आए मोदी ने तो इसे नई ऊर्जा और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया। आज हम निसंदेह ये कह सकते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध आज जिस उंचाई पर हैं और जितने मजबूत हैं, वैसे पहले कभी नहीं थे।

जून 7, 2016 को अमेरिका ने भारत के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ (महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी) घोषित किया। इस वक्तव्य का शीर्षक था – द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाः एनड्योरिंग ग्लोबल पार्टनर्स इन द ट्वंटी फस्र्ट सेंचुरी (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारतः 21वीं सदी में स्थायी वैश्विक सहयोगी)। पिछले साल 22 अगस्त को ट्रंप द्वारा घोषित की गई नई दक्षिण एशिया नीति में इसकी प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है। ट्रंप ने इसमें न केवल भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में भारत की महत्वपूण भूमिका को रेखांकित किया बल्कि पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भी उसे अपना सहयोगी घोषित कर दिया। अमेरिका ने मोदी के कार्यकाल में भारत को दुनिया के चार बड़े मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम (बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं) में से तीन में प्रवेश करने की मदद की। ये हैं – मिसाइल टेक्नोलाॅजी कंट्रोल रिजीम (प्रवेश तिथि – जून 27, 2026), वासनर अरेंजमेंट (प्रवेश तिथि – दिसंबर 7, 2017) और आॅस्ट्रेलिया ग्रुप (प्रवेश तिथि – जनवरी 19, 2018)। चैथा महत्वपूर्ण मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम है – न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप। अमेरिका ने इसमें प्रवेश के लिए भी पूरी मदद की लेकिन चीन के अड़ियल रवैये के कारण भारत इसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि इसके लिए भी प्रयास जारी है।

भारत को विश्वस्त सहयोगी मानते हुए अमेरिका ने इसी वर्ष 31 जुलाई को भारत को स्ट्रैटेजिक ट्रेड आॅथोराइजशन -1 (एसटीए – 1) देश का दर्जा दिया। बहुत जल्दी, यानी चार अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इसके पश्चात भारत का दर्जा अमेरिका के नैटो (नाॅर्थ एटलांटिक ट्रीटी आॅर्गनाजेशन) सहयोगियों के समकक्ष हो गया। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले उत्पाद और रक्षा उपकरण बिना कानूनी अड़चनों और भारी-भरकम कागजी कार्यवाही के बेच सकेगा। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर राॅस के अनुसार एसटीए – 1 का दर्जा भारत को रक्षा क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात के लिए बेहतर अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत के दर्जे में यह महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले सात वर्षों में भारत अमेरिका से 9.7 अरब डाॅलर का उच्च तकनीक का सामान खरीद सकता था, लेकिन विभिन्न प्रतिबंधों के कारण यह संभव नहीं हो सका, परंतु अब ये संभव हो सकेगा।

अमेरिका ने जिन 36 देशों को ये दर्जा दिया है उनमें से अधिकतर नैटो सहयोगी हैं। अब तक एशिया में ये दर्जा सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान को ही दिया गया था। जाहिर है भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कदम को स्वागत किया। मंत्रालय ने कहा – “भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किए जाने का ये तार्किक उत्कर्ष है। ये इस बात को एक बार फिर स्थापित करता है कि संबंधित बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के जिम्मेदार सदस्य के रूप में भारत का रिकाॅर्ड बेदाग है। इससे भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस बीच दो अगस्त को अमेरिकी संसद ने नेशनल डिफेंस आॅथोराइजेशन एक्ट – 2019 के तहत भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकास एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काटसा) से छूट देने का विधेयक भी पारित कर दिया। भारत रूस से लगभग 4.5 अरब डाॅलर की लागत से एस-400 ट्राइंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहता है जिसमें रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से बाधा आ रही थी। बराक ओबामा के कार्यकाल में वाइट हाउस में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और सेनेट आम्र्ड सर्विसेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य रहे अनीश गोयल कहते हैं कि काटसा छूट के लिए अमेरिकी संसद की प्रशंसा की जानी चाहिए। ऐसा करके संसद ने दोनों देशों के संबंधों में आने वाले तनाव को दूर कर दिया है। ये इस बात का मजबूत संकेत है कि अमेरिका, भारत से अपने संबंधों को कितना महत्व देता है।

पिछले कुछ ही दिनों में अमेरिका ने जिस सक्रियता से भारत के साथ उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के क्षेत्र में पेश आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है और जैसे भारत की रक्षा जरूरतों को समझते हुए रूस से उच्च तकनीक वाली रक्षा सामग्री खरीदने के लिए छूट दी है, उससे भारत के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता तो प्रकट होती ही है, साथ में यह भी स्पष्ट होता है कि वो भारतीय-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक रीजन) में अपनी रणनीति को लागू करने के विषय में कितना गंभीर है जहां चीन का व्यावसायिक और रणनीतिक दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

चीन अगले 50 वर्षों के दौरान अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहा है। म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों तक ही नहीं चीन ने मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तक में अपने पैर पसारे हैं। वो दुनिया के 76 देशों में परियोजनाएं विकसित कर रहा है और रेल, सड़क, समुद्री मार्गों से ही नहीं दुनिया भर से वायु मार्गों से जुड़ने की योजना भी बना चुका है।

चीन को लगता है कि जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन और 20वीं सदी में अमेरिका की शक्तिशाली नौसेनाओं ने नौसैनिक अड्डों के विश्वव्यापी नेटवर्क के माध्यम से अपने व्यापारिक अधिपत्य को बढ़ाने का काम किया, वैसे ही अगर उसे भी अगली सदी में आगे बढ़ना है तो उसे भी दुनिया भर में, और खासतौर से भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में अपने अड्डे बनाने होंगे जहां विश्व के व्यस्ततम जलमार्ग मौजूद हैं। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वो सिर्फ अड्डे ही नहीं बना रहा, लंबी चैड़ी नौसेना भी तैयार कर रहा है।

चीन की नीयत और योजनाएं अब किसी से छुपी नहीं हैं। जाहिर है अमेरिका ने इसकी काट निकालने के लिए योजना तैयार कर उसे लागू करना भी शुरू कर दिया है। भारत इस योजना का महत्वपूर्ण अंग है। अगर अमेरिका ने इस क्षेत्र में भारत को अपना सहयोगी चुना है तो उसे तकनीकी और सैन्य दृष्टि से मजबूत भी बनाना होगा, उसे आधुनिकतम हथियार भी देने होंगे। अमेरिका ने इसके लिए ईमानदारी से प्रयास भी किए हैं। इस पूरी योजना का रणनीतिक महत्व है तो यह भी सच है कि इससे अमेरिका को हथियारों का नया और बड़ा बाजार भी मिलेगा। भारत को चाहिए कि वो अमेरिका का सहयोगी तो बने पर अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए। चीन जैसे पड़ोसी देश को दुश्मन न बनाया जाए, लेकिन उसके अतीत को देखते हुए तैयारी भी पूरी रखी जाए।

आगामी छह सिंतबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मैटिस की भारतीय विेदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ 2$2 वार्ता है। ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के शिखर सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण अमेरिका में प्रस्तावित यह वार्ता पहले टाल दी गई थी, अब ये भारत में होगी। 2$2 वार्ता में भारत के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री एक साथ अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री से बात करते हैं ताकि दोनों क्षेत्रों के बारे में समग्र और व्यापक बातचीत हो सके और अड़चनें दूर कर राजनयिक और रणनीतिक मसलों को जल्दी से जल्दी सुलझाया जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के संबंधों में आपसी समझ और गहरी होगी और जमीनी स्तर भी कामकाज को और गतिशील बनाया जा सकेगा।

“कर्नाटकः भाजपा का अतिविश्वास और पिछलग्गू कांग्रेस कीे दोहरी हार” in Punjab Kesari

कर्नाटक में मची उठा-पटक ने नेताओं को कई सबक सिखाए। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबक ये था कि अगर सुप्रीम कोर्ट सक्रिय हो जाए तो जोड़-तोड़ से सरकार बनाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। राज्यपाल वजू भाई वाला ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के बाद बहुमत साबित करने के लिए सिर्फ 24 घंटे का समय दिया। इस सीमित समय में येदियुरप्पा संख्याबल नहीं जुटा पाए और उन्होंने भावुक भाषण के बाद इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी विधायक उनके संपर्क में थे, लेकिन अंततः उन्होंने साथ नहीं दिया।

येदियुरप्पा को आमंत्रित करके वजू भाई वाला ने कोई असंवैधानिक काम नहीं किया। असल में कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति बने विधि विशेषज्ञ शंकरदयाल शर्मा ने ब्रिटिश संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए इसे सही ठहराया था। लेकिन सोचने की बात ये है कि क्या भाजपा दिल्ली के उदाहरण को नहीं दोहरा सकती थी, जब उसने सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने दिया। अगर ऐसा किया जाता तो कम से कम भाजपा विजय का नैतिक दावा तो कर सकती थी। वैसे भी इस पूरे प्रकरण में भाजपा बार-बार कांग्रेस से 19 साबित हुई। जैसी की खबर है, कांग्रेस ने मतदान के बाद ही जनता दल, सेक्युलर (जेडी,एस) से संपर्क साध लिया था। कांग्रेस ने बिना वक्त गंवाए वकीलों की बड़ी फौज के साथ आधी रात को ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। यही नहीं उसने अपने वरिष्ठतम नेताओं, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोईली आदि, की बड़ी टीम बेंगलूरू में तैनात की और पूरी सतर्कता से अपने विधायकों की रखवाली की।

लगता है, इस बार भाजपा कहीं न कहीं अतिविश्वास के कारण शहीद हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैलियों में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडी, एस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा की भरपूर तारीफ की। लेकिन क्या वजह है कि तारीफों के आदान-प्रदान के बावजूद दोनों दलों में बातचीत आगे न बढ़ सकी? भाजपा को पूर्व एनडीए सहयोगी तेलुगु देशम की नाराजगी भी भारी पड़ी। तेलुगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा को हराने की अपील जारी की। ध्यान रहे कर्नाटक में करीब 15 प्रतिशत तेलुगु भाषी हैं। राज्य के 12 जिलों में इनकी अच्छी खासी तादाद है। इस बार के लहरहीन चुनाव में जब एक-एक मत महत्वपूर्ण था, ऐसे में तेलुगु मतों की भी अपनी अहमियत थी। आपको याद दिला दें की 2013 के चुनाव में 49 सीटों पर विजय का अंतर 5,000 मतों से भी कम था। इसी तरह 2008 में 64 सीटों में ये अंतर 5,000 से कम था। इस बार के चुनाव में 11 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा 3,000 से भी कम मतों से हारी। देवरहिप्पारगी सीट पर तो भाजपा के प्रत्याशी सोमनगौड़ा बी पाटिल सिर्फ 90 मतों से हारे। अगर भाजपा को दक्षिण में पैर पसारने हैं तो स्पष्ट है उसे इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक सहयोगियों को संभाल कर रखना होगा।

भाजपा की हार-जीत का विश्लेषण तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेता करेंगे ही। लेकिन एक बात तो साफ है कि वो इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और उसने सिद्धारमैया को सत्ता से हटाया। लेकिन बूथ स्तर तक चुनाव प्रबंधन करने वाले अमित शाह को इस ओर ज्यादा ध्यान देना होगा कि कैसे लहरहीन चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित की जाए।

अब बात कांग्रेस की। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अपने संक्षिप्त संवाददाता सम्मेलने में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। हालांकि एक दिन पहले ही वो येदियुरप्पा के शपथग्रहण को लोकतंत्र की हत्या बता रहे थे और भारतीय सुप्रीम कोर्ट की तुलना पाकिस्तानी अदालतों से कर रहे थे। कर्नाटक में जो हुआ, वो भले ही लोकतंत्र की जीत हो, यहां असल में कांग्रेस की दोहरी हार हुई। एक तरफ तो सिद्धारमैया सरकार की विदाई हो गई तो दूसरी तरफ जेडी,एस से लगभग दोगुने विधायक होने के बावजूद कांग्रेस को जेडी, एस का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा। समझा जाता है कि कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला स्वयं राहुल ने किया। क्या अच्छा नहीं होता कि तुरत-फुरत फैसला करने की जगह वो पार्टी हित में कुमारास्वामी और उनके पिता एचडी देवेगौड़ा से स्थानीय नेताओं के साथ बात करते। भाजपा को बाहर रखने की जल्दी में उन्होंने अपने दल के हितों को ही कुर्बान कर दिया। चुनाव परिणाम आने से पहले ही उन्होंने राज्य में पांच साल शासन करने वाले सिद्धारमैया को दरकिनार कर दिया और सारी कमान दिल्ली के नेताओं को सौंप दी। अब सत्ता के बंटवारे में कांग्रेस को क्या मिलता है, ये देखना दिलचस्प होगा, लेकिन सियासी फैसले इतनी जल्दबाजी में नहीं लिए जाते। कुमारास्वामी ने एक बात तो बिल्कुल साफ कर दी है कि मुख्यमंत्री पद पर कोई समझौता नहीं हो सकता, पांच साल वो ही इस पद पर रहेंगे

राहुल के फैसले ने देश भर में कांग्रेस की छवि पिछलग्गू की बना दी। लगता है वो आगामी लोकसभा चुनावों तक जेडी,एस की मिन्नतें और चिरौरी कुछ वैसे ही करेंगे जैसे उत्तर प्रदेश में बबुआ अखिलेश यादव, बुआ मायावती की कर रहे हैं। बहुत से जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का पिछलग्गू बनने का फैसला राजनीतिक कारणों से कम और आर्थिक कारणों से ज्यादा था। एक अनुमान के अनुसार इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 7,000 से 10,000 करोड़ रूपए खर्च हुए, अगर ऐसे ही चला तो लोकसभा चुनावों में तो खर्च एक लाख करोड़ से ऊपर चला जाएगा। ऐसे में कांग्रेस को भी आय के स्थायी स्रोत की आवश्यकता होगी। भाजपा पहले ही आरोप लगाती रही है कि सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार कांग्रेस के बैंक के तौर पर काम कर रहे थे। शिवकुमार के लेनदेन की तो एक डायरी भी सामने आ चुकी है, जिसकी जांच जारी है। इस डायरी में पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं के नाम लिखे हैं।

बहरहाल कुमारास्वामी का पिछलग्गू बनने के राहुल गांधी के फैसले के राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं। इससे उनकी बारगेनिंग पाॅवर निश्चय ही कम हुई है। कर्नाटक में समर्पण के बाद क्षेत्रीय दल उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव तो उन्हें पहले ही कह चुके हैं कि वो विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं। कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने संकेत दिया कि अगर 2019 में कांग्रेस बड़े दल के रूप में उभरती है तो वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। सवाल ये है कि अगर कर्नाटक में बड़ा दल होने के बावजूद वो मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं ले सके तो प्रधानमंत्री पद कैसे लेंगे?

कांग्रेस के कुछ नेता राज्य में पार्टी की दोहरी हार के बावजूद गाल बजाने में जुटे हैं कि इसने 2019 के घटनाक्रम का संकेत दे दिया है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने। उन्हें समझना पड़ेगा कि भले ही भाजपा राज्य में सरकार न बना पाई हो, वो वहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और उसका वोट प्रतिशत भी सुधरा है। भाजपा के लिए असली चुनौती कर्नाटक में नहीं थी जहां उसके पास खोने को कुछ नहीं था, भाजपा की असली अग्नि परीक्षा तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में होगी जहां उसकी सरकारें हैं। अगर भाजपा यहां हारी तो ये कहना उचित होगा कि भाजपा की चुनौतियां बढ़ गईं हैं।

कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और सुविधाभोगी पत्रकारों को राहुल को चने के झाड़ पर चढ़ाना बंद करना चाहिए। ये लोग गुजरात के बाद भी राहुल की ‘नैतिक जीत’ का दावा करने लगे थे, जबकि हकीकत ये है कि नक्सलवाद, जातिवाद, इस्लामिक सपं्रदायवाद के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद वो वहां हारी थी। कांग्रेस ने लगभग यही नीतियां कर्नाटक चुनाव में भी अपनाईं। अलग झंडे के जरिए कन्नड़ स्वाभीमान जगाने की कोशिश की गई तो लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देकर हिंदुओं को विभाजित करने का प्रयास हुआ। यही नहीं आतंकवादी संगठन पापुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपीआई) का भी भरपूर इस्तेमाल हुआ। एसडीपीआई ने मुस्लिम मतों का विभाजन रोकने और कांग्रेस को जिताने के लिए अपने उम्मीदवार वापस लिए। यही नहीं मस्जिदों से फतवे जारी किए गए कि इस्लाम खतरे में है, इसे बचाने के लिए कांग्रेस को वोट दें। कांग्रेस के पक्ष में चर्च की तरफ से अपील जारी की गई।

कर्नाटक चुनाव से स्पष्ट है कि कांग्रेस इस्लामिक सांप्रदायिकता और तुष्टिवाद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। राहुल भाजपा को रोकने के लिए इतने डेस्परेट हो गए हैं कि अपनी पार्टी का भविष्य भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। स्पष्ट है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों के बारे में फिर से विचार करना पड़ेगा नहीं तो इस्लामिक ध्रुवीकरण की नीति उसे अगले लोकसभा चुनावों में फिर भारी पड़ेगी, भले ही वो कितना ‘टेम्पल रन’ खेल लें।

“कठुआ केसः बच्ची की लाश पर मोदी सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र” in Punjab Kesari

कठुआ मामले में मीडिया के एक बड़े वर्ग की भूमिका संदिग्ध ही नहीं निंदनीय भी रही। इस वर्ग ने इसकी कवरेज में जल्दबाजी ही नहीं, ज्यादती भी की। जिस तरह से मामले के तथ्यों से एक खास मकसद से छेड़छाड़ की गई या उन्हें जानबूझ कर छुपाया गया, वो बेहद आपत्तिजनक और भयावह है। कहना न होगा, इस घटना की कवरेज में मीडिया के इस वर्ग ने सारी सीमाएं लांघ दीं। सरेआम पीड़िता की तस्वीरें दिखाई गईं, उसका धर्म बताया गया, और तो और उसके कुछ फर्जी वीडियो भी सर्कुलेट करवाए गए। सारा मामला ये बनाया गया कि ‘दरिंदे हिंदू’ ‘अबला कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं का शीलहरण करते हैं और उनकी बच्चियों तक को नहीं छोड़ते’।

मीडिया के इस वर्ग ने तथ्यों की जांच पड़ताल की कोशिश ही नहीं की क्योंकि उसकी मंशा इसकी थी ही नहीं। इस वर्ग ने भारत से अमेरिका तक इस मसले को उछाला। एक न्यूज चैनल ने ‘एनफ इस एनफ’ (काफी हो गया) शीर्षक से मोदी सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। राहुल गांधी, उनकी बहन और जीजा आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च पर निकल पड़े। पाकिस्तान के हर न्यूज चैनल ने दिखाया कि देखो कैसे ‘अत्याचारी हिंदू’ ‘कश्मीर में मुसलमानों पर जुल्म’ ढा रहे हैं’। अनेक हवाई अड्डों में लोगों को ऐसी टीशर्ट पहने देखा गया जिन पर लिखा गया था कि अपनी बेटियों को भारत मत भेजो, वहां महिलाएं-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। इंग्लैंड के हाउस आॅफ लाड्र्स में पाकिस्तानी मूल के लाॅर्ड अहमद ने ये मामला उठाया तो अमेरिका में इसे लेकर प्रदर्शन किए गए। दिल्ली में स्वाती मालीवाल तो आमरण अनशन पर बैठ गईं।

इस विषय में मोदी सरकार की जितनी किरकिरी की जा सकती थी, की गई। वल्र्ड बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड तक ने भारत में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता जताते हुए मोदी सरकार को नसीहत दे डाली। बाॅलीवुड और हाॅलीवुड की अभिनेत्रियों ने प्लेकार्ड लेकर मोदी सरकार के खिलाफ ट्वीट जारी किए। मोदी सरकार ने महिलाओं और बच्चियों के लिए चार साल जो काम किए, उन्हें एक झटके में मिट्टी में मिलाने की कोशिश की गई। मोदी सरकार ने जिस ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की थी, उसकी धज्जियां उड़ाईं गईं और सरकार को महिला विरोधी करार दे दिया गया।

चैतरफा हमलों से घबराई केंद्र सरकार ने च्चियोें से बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड देने वाला अध्यादेश पारित कर दिया। जबकि होना ये चाहिए था कि इस पूरे षडयंत्र की जल्दी से जल्दी जांच कराई जाती और षडयंत्रकारियों के नाम के साथ सच्चाई देश के सामने लाई जाती। ध्यान रहे जानीमानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों ने ही नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस अध्यादेश के प्रावधानों पर आपत्ति जताई।

अगर केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों या पत्रकारों के षडयंत्रकारी वर्ग ने इस मामले की तफ्तीश में थोड़ा सा भी समय और दिमाग लगाया होता तो, पता लग जाता कि इस विषय में जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा कठुआ के चीफ ज्यूडीशियल मेजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई चार्जशीट में कितने झोल हैं। चार्जशीट में सात लोगों के नाम दिए गए हैं जिनमें संाझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा और पांच पुलिस वाले शामिल हैं।

ध्यान रहे सांझीराम और उनके बेटे विशाल जंगोत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है कि वो बेगुनाह हैं। उन्होंने इस विषय में हलफनामा दायर कर कहा है कि जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच ने उनको फंसाया है। असली अपराधियों को पकड़ने और पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए जरूरी है कि इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा करवाई जाए। उन्होंने कहा कि इस मामले में मिथ्या और भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। खुद को पीड़िता का वकील कहने वाली दीपिका राजावत और उसका साथी तालिब हुसैन असल में ट्रायल कोर्ट में उसके वकील हैं ही नहीं, तब भी वो उसका वकील होने का दावा कर रहे हैं। यही नहीं वो हम पर उन्हें धमकाने का आरोप लगा रहे हैं जबकि धमकाया तो हमें जा रहा है। राज्य सरकार ने इन फर्जी लोगों को सुरक्षा भी उपलब्ध करवाई है, जिसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। सांझीराम ने अपने हलफनामे में पुलिस वालों के चरित्र पर भी सवाल उठाए हैं। स्पेशल टास्क फोर्स में शामिल डीएसपी इरफान वानी के खिलाफ तो बलात्कार का मुकदमा चल रहा है। ज्ञात हो कि सांझीराम या उसके परिवार के खिलाफ राज्य के किसी भी थाने में कभी भी कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनका परिवार देशभक्ति से ओतप्रोत है और उनका एक बेटा तो जलसेना में नौकरी भी करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच की सांझीराम की मांग को अस्वीकार कर दिया है, लेकिन कहा है कि इसकी जांच जम्मू-कश्मीर से बाहर पठानकोट के जिला और सत्र न्यायाधीश करेंगे जिसकी निगरानी वो स्वयं करेगा। सुनवाई रोजाना होगी और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई नौ जुलाई को होगी। अदालत के फैसले से कठुआ के लोगों में मायूसी है, लेकिन उन्हें अब भी उम्मीद है कि पठानकोट की अदालत इस मामले की निष्पक्षता से सुनवाई करेगी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच के षडयंत्र को समझेगी और दूध का दूध और पानी का पानी करेगी।

कठुआ के लोगों की उम्मीद के पीछे एक नहीं अनेक कारण हैं। एक बार को हम मान भी लें कि सांझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा झूठ बोल रहे हैं , तब भी इस मामले में और भी बहुत से ऐसे तथ्य हैं जो प्रथम दृष्टया ही ये स्पष्ट कर देते हैं कि ये पूरा मामला और इस बारे में दायर चार्जशीट कितनी फर्जी है। हम आगे बढ़ें इस से पहले बता दें कि घटना के समय विशाल के मेरठ में होने के सारे सबूत सामने आ चुके हैं, जिनमें वहां की वीडियो फुटेज भी शामिल है। यही नहीं विशाल के दोस्तों ने भी पुलिस पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उन्हें धमका कर विशाल के खिलाफ बयान लिए।

मृतक बच्ची के साथ सहानुभूति के साथ हम ये कहना चाहेंगे कि उसे न्याय मिले, लेकिन हम ये भी कहना चाहेंगे कि निर्दोष सांझीराम और उसके परिवार वालों को भी न्याय मिले और षडयंत्रकारियोें को सख्त से सख्त सजा दी जाए। हम इसे षडयंत्र क्यों कह रहे हैं इसके पीछे कई कारण और अनसुलझे सवाल हैं। इन पर आपको भी गौर करना चाहिए। इस मामले में दस दिन में तीन बार जांच टीम बदली गई, आखिर इसका क्या कारण है? एक ही तारीख को दो पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट क्यों दी गईं और दोनों में अलग-अलग तथ्य क्यों थे? कथित अपराधस्थल (देवस्थान) सील क्यों नहीं किया गया? आरोपियों ने पीड़िता को देवस्थान पर क्यों रखा जबकि वहां लगातार लोगों का आनाजाना था और चार्जशीट में जिन दिनों का उल्लेख किया गया है, उन दिनों वहां उत्सव भी मनाया जा रहा था? लाश सांझीराम के घर से महज 100 मीटर की दूरी पर मिली। अगर उन्होंने अपराध किया होता तो वो लाश को किसी गहरे नाले या घने जंगल में भी फेंक सकते थे, उन्होंने अपने घर के पास ही लाश क्यों फेंकी? चार्जशीट के अनुसार बच्ची से छह दिन तक सामूहिक बलात्कार हुआ, लेकिन पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट उसके गुप्तांग पर क्यों किसी चोट का जिक्र नहीं करती? चार्जशीट में बलात्कार के उल्लेख के बावजूद देवस्थान पर कहीं खून के निशान नहीं मिले, वहां मूत्र अथवा विष्ठा के निशान भी नहीं मिले, जबकि पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट कहती है कि मृतका की आंतों में पची हुई सामग्री थी, क्या ऐसा संभव है? किसने मृतका की तस्वीरें हाई रिसोल्यूशन कैमरे से खींचीं जो तमाम राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय एजेंसियों को भेजी गईं? छह दिन के कथित बलात्कार के बावजूद मृतका के पांव में जूते और सिर पर हेयरबैंड कैसे थे? ये कैसे हुआ कि पुलिस ने मृतका के कपड़ों को धोया और थाने में सुखाया? आरोप लगाया गया है कि मृतका को बेहोशी की दवा दी गई। छह दिन तक इस दवा का क्या असर था? चार्जशीट में उंगलियों और पैरों के निशान क्यों नहीं संलग्न किए गए?

ये घटना कठुआ के रसना गांव में हुई। उसके बाशिंदे कहते हैं कि 16 जनवरी 2018 की रात को गांव का मेन ट्रांसफाॅर्मर फंुक गया। इसकी वजह से पूरे गांव में बिजली नहीं थी। इस बीच रात को ढाई बजे कंबल ओढ़े दो आदमी बुलेट मोटरसाइकिल पर आए। वो आंधे घंटे बाद चले गए। ये संदिग्ध लोग कौन थे? पुलिस उनका पता क्यों नहीं लगा रही? आपको बता दें कि सात दिन गायब रहने के बाद पीड़िता की लाश 17 जनवरी को मिली।

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच और चार्जशीट में कितनी खामियां हैं। जाहिर है ये पूरी कहानी मनमाने तरीके से बिना उचित सबूतों के गढ़ी गई है। ये खामियां चीख-चीख कर कहती है कि इस पूरी घटना के पीछे साजिश है। जिस प्रकार पीड़िता की तस्वीर वायरल की गई, उसका नाम उजागर किया गया, देवस्थान को लांछित किया गया, उस से स्पष्ट है कि इस साजिश के पीछे मकसद सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना और हिंदुओं और भारत को लांछित करना था। जिस प्रकार पूरा घटनाक्रम हुआ और उसे भारत से पाकिस्तान और इंग्लैंड, अमेरिका तक उछाला गया, उससे साफ है कि सब कुछ पूर्वनियोजित था।

कहना न होगा इस पूरी साजिश में षडयंत्रकारी पत्रकारों ने सक्रिय भूमिका निभाई। जिन वकीलों और नेताओं ने इस फर्जी मामले के खिलाफ आवाज उठाई, उन्होंने उन्हें भी खलनायक बना दिया। इन वकीलों और नेताओं में कांग्रेस के लोग भी शामिल थे।

आपको बता दें कि इस मामले को आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) और उसकी राजनीतिक शाखा एसडीपीआई जोर-शोर से कर्नाटक चुनाव में उछाल रहे हैं। सनद रहे कि पीएफआई में प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के अनेक सदस्य प्रमुख पदों पर सक्रिय हैं और इसके बदनाम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी संबंध हैं। ये प्लेकार्ड ले कर घूम-घूम कर लोगों को बता रहे हैं कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म आती है। ये वहीं संगठन है जिसने गुजरात विधानसभा चुनावों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नक्सलियों के साथ मिलकर जिग्नेश मेवानी का समर्थन किया था और उसे धन उपलब्ध करवाया था। पीड़िता की फर्जी वकील दीपिका राजावत का भी जेएनयू के नक्सली सर्किट से घनिष्ठ संबंध है। ये पूरा वो टुकड़े-टुकड़े गैंग है जो नक्सलियों, कश्मीरी आतंकियों और अब जिन्ना के समर्थन में जेएनयू से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया तक ‘आजादी’ के नारे लगाता है और जिसके राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और सरकारी-गैरसरकारी संगठनों में एजेंट बैठे हुए हैं। इनका नेटवर्क किसी भी मुद्दे को बहुत कम समय में दुनिया भर में फैला सकता है। जाहिर है इनके अनेक भारत विरोधी खुफिया एजेंसियों से भी घनिष्ठ संबंध हैं।

ये वही गैंग है जिसकी सरपरस्ती में अनुच्छेद 370 के बावजूद जम्मू में रोहिंग्या लोगों को बसाया गया है और जिसके वकील इनके लिए सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ते हैं। अब इनका निशाना है बकरवाल समुदाय जिसकी पीड़िता एक सदस्य थी। ये समुदाय देशभक्त माना जाता है और श्रीनगर के कट्टरवादी वहाबियों से दूर रहता है। ये पूरा षडयंत्र कहीं न कहीं इस समुदाय को हिंदुआंे से दूर करने और रेडिकालाइज करने का भी है ताकि वो घाटी के इस्लामिक दलों को वोट दें।

देश में जब से मोदी सरकार आई है, ये गैंग तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर दलितों और मुसलमानों को उसके खिलाफ भड़काने के लिए सोचे-समझे तरीके से काम कर रहा है। ये पूरी कोशिश कर रहा है कि दलितों को नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों के संगठनों से जोड़ा जाए। आपको रोहित वेमूला, अखलाक, जुनैद, पशु तस्करों, मध्य प्रदेश में पुलिस भर्ती के दौरान उम्मीदवारों की छाती पर जाति लिखने, जेएनयू, जादवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आदि के विवाद अवश्य याद होंगे जिनमें इस गैंग ने भारत की लचर कानून व्यवस्था और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का नाजायज लाभ उठा कर, मोदी सरकार और देश को अंतरराष्ट्री स्तर पर बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडा।

इस गैंग की निशानी ये है कि ये सिर्फ मुसलमानों या दलितों के मामलों में व्यथित होता है। हिंदुओं पर अगर कोई अत्याचार करे तो इसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस मामले में सीबीआई जांच की मांग खारिज कर दी हो, मगर सरकार को इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। ये सिर्फ पीड़िता को न्याय दिलवाने के लिए ही नहीं, भारत का सम्मान बहाल करने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अब सरकार को सिर्फ कठुआ मामले की ही जांच नहीं करनी चाहिए, उन लोगों को भी पकड़ कर हमेशा के लिए जेल में डालना चाहिए जिन्होंने इसे तोड़-मरोड़ के दुनिया के सामने भारत को कलंकित किया। इस पूरे षडयंत्र में अनेक स्वनामधन्य पत्रकार भी शामिल हैं। सरकार को इनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

“मोदी की विश्वदृष्टि की बानगी है उनकी विदेश नीति” in Punjab Kesari

काॅमनवेल्थ हेड्स आॅफ गाॅरमेंट मीटिंग (चोगम) में भाग लेने लंदन गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘भारत की बात सबके साथ’ नामक एक कार्यक्रम में अनेक विषयों पर लोगों के सवालों के जवाब दिए। ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित सेंट्रल हाॅल वेस्टमिंस्टर में आयोजित इस कार्यक्रम उन्होंने अपनी विदेशनीति के बारे में भी विस्तार से बात की।

मोदी ने कहा कि लोग आशंका जताते थे कि एक राज्य का मुख्यमंत्री भारत की विदेशनीति कैसे संभालेगा, लेकिन उन्होंने सभी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान जब लोगों ने उनकी विदेश नीति के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वो किसी देश से न नजर नीची करके बात करने में विश्वास रखते हैं, न उठा कर, हम नजर मिला कर बात करने में यकीन रखते हैं। अब मोदी को सरकार में आए लगभग चार साल बीत गए हैं, और उनकी विदेश नीति में ये स्वाभिमान स्पष्ट तौर पर नजर आता है।

उनके नेतृत्व में भारत ने अपने हितों की बुनियाद पर सभी देशों से बात की, भले वो परस्पर दुश्मन ही क्यों न हों। मोदी एक ओर तो इस्राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने तो दूसरी ओर वो फिलिस्तीन भी गए। इसी प्रकार अगर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मौहम्मद अब्बास भारत आए तो इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू भी आए। मोदी ने दोनों देशों को अलग-अलग करके देखा और दोनो के महत्व और अपेक्षाओं को स्वीकार किया। फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंधों की बानगी तब देखने को मिली जब भारत ने पाकिस्तान में उसके राजदूत वलीद अबू अली के आतंकी हाफिज सईद के साथ मंच साझा करने पर आपत्ति जताई और फिलिस्तीनी राष्ट्रपति ने उन्हें एक झटके में पाकिस्तान से वापस बुला लिया।

मोदी ने ‘भारत की बात, सबके साथ’ कार्यक्रम में अपनी इस्राइल यात्रा का जिक्र करते हुए पूछा कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री पिछले 70 साल में वहां क्यों नहीं गया? तो इसका सीधा उत्तर है पहले की सरकारों द्वारा भारत की विदेशनीति को सांप्रदायिक रंग में रंगना। पूर्ववर्ती सरकारों ने इस्राइल से राजनयिक संबंध तो बनाए पर प्रधानमंत्रियों ने वहां जाने का साहस नहीं किया क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे मुस्लिम नाराज हो सकते हैं। कहना न होगा इस मुस्लिम फैक्टर ने पाकिस्तान को भी शह दी जिसने भारत में आतंकी जाल फैलाया और सीमा पर हमारे हजारों जवान मरवाए।

बहरहाल, अगर मोदी अगर सउदी अरब गए तो ईरान भी गए। मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्थलांे मक्का और मदीना का घर होने के कारण सउदी अरब भारतीय मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ईरान के साथ भी भारत के हजारों साल से सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं और वो भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी आवश्यक है। अमेरिका, सउदी अरब और इस्राइल, ईरान के जानी दुश्मन बने हुए हैं, लेकिन भारत ने वहां रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह का निर्माण किया है और जलअवरूद्ध अफगानिस्तान के लिए नए व्यापारिक और सामरिक रास्ते बनाए हैं। फिलहाल ईरान में भारत से ज्यादा चीन का निवेश है, लेकिन भारत ने भी तय कर लिया है कि वो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस देश से हर हालत में संबंध कायम रखेगा जो मध्य एशिया के अनेक तेल और प्राकृतिक गैस समृद्ध देशों से व्यापार की महत्वपूर्ण धुरी है।

मोदी के आने से पहले सरकारें लगातार शक्तिशाली होते जा रहे चीन के खिलाफ बोलने से कतराती थीं। हालत ये हुई कि चीन ने धीरे धीरे हमारे सभी पड़ोसी देशों में घुसपैठ कर ली। आज ये कहा जाए तो ज्यादती नहीं होगी कि मालदीव, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार पूरी तरह उसके कब्जे में हैं। मालदीव में जब चीन समर्थक ताकतों ने तत्कालीन राष्ट्रपति मौहम्मद नाशिद का तख्ता पलट किया तो भारत मूक दर्शक बना देखता रहा।

यही हाल नेपाल में हुआ, जब चीन समर्थक माओवादी हजारों की तादाद में नेपाली लोगों की हत्या कर रहे थे, भारत अहस्तक्षेप की नीति के तहत चुप रहा जिसका नतीजा ये हुआ कि आज नेपाल में उनकी सरकार है और भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस हाशिए पर है। ये बात अलग है कि मोदी ने इस सरकार के साथ भी कामकाज करने का फैसला किया है। इसके पीछे मुख्यतः तीन कारण हैं – 1) नेपाल भारत का पड़ोसी देश ही नहीं, घनिष्ठ सांस्कृतिक सहयोगी भी है, नेपाल के लाखों लोग भारत में काम करते हैं, भारत और नेपाल का रोटी-बेटी का रिश्ता है, 2) उससे सुरक्षा की दृष्टि से भी बातचीत जरूरी है क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वहां ठिकाने बना रखे हैं जिनका भारत के विरूद्ध इस्तेमाल होता है, कल को अगर चीन, नेपाल का सैन्य उद्देश्य से इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो भारत को भी नेपाल में सहयोगियों के साथ रणनीति बनाने और विरोध जताने की आवश्यता होगी 3) चीन सार्क देशों का इस्तेमाल भारत में अपने माल की डंपिंग के लिए कर रहा है, इसे रोकने के लिए भी भारत को नेपाल के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना होगा।

ध्यान रहे कुछ दिन पहले नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत आए थे और अब मोदी भी नेपाल जाने वाले हैं। इस बीच नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार चीन गए जहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भारत-नेपाल-चीन आर्थिक गलियारे का प्रस्ताव किया। भारत ने हिमालय निकलने वाले इस गलियारे पर अभी कोई सहमति नहीं दी है। भारत, पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करता रहा है क्योंकि वो पाक अधिकृत कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है और इस गलियारे को अपनी संप्रभुता में दखलअंदाजी। जाहिर है ऐसे में इस नए प्रस्ताव के सभी पहलुओं और परिणामों पर सोच विचार करके ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

उधर पाकिस्तान और म्यांमार में चीन किस हद तक घुसपैठ कर चुका है, ये किसी से छुपा नहीं है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के साथ ही म्यांमार में भी संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। चीन बांग्लादेश में भी जगह बनाने की भरपूर कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार वहां भी सामंजस्य कायम करने की पूरी कोशिश कर रही है। बांग्लादेश में तो विपक्षी नेता खालिदा जिया का पुत्र तारिक जिया चीनी हथियारों के साथ पकड़ा गया था जिन्हें पूर्वोत्तर भारत के आतंकियों को सप्लाई किया जाना था।

जहां तक स्वयं चीन की बात है, मोदी सरकार ने उसे भी स्पष्ट कर दिया है कि वो उसके दबाव में नहीं आएगी। डोकलाम विवाद पर भारत की दृढ़ता इसका सबूत है। मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक बातचीत के लिए 27-28 अप्रैल को चीन में होंगे। समझा जाता है कि इससे डोकलाम विवाद के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी को कम करने में मदद मिलेगी और सीमा विवाद सहित अन्य आपसी मुद्दों को हल करने की दिशा में नए कदम उठाए जाएंगे। बातचीत अच्छी बात है, लेकिन भारत को जमीन वास्तविकताओं को भी नजरअंजदाज नहीं करना चाहिए। आज चीन के पास बेशुमार पैसा है। वो विभिन्न देशों में अपनी हित सिद्धी के लिए पैसे के दम पर स्थानीय नेताओं को खरीदता है और सरकारों का तख्ता पलट करवाने की कोशिश करता है और अक्सर कामयाब भी होता है। भारत में भी कुछ नेताओं की चीन से करीबी को संदिग्ध दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हम भले ही चीन के साथ नजर मिला कर बात करें पर ये भी ध्यान रखें – घर का भेदी लंका ढाए। भारत में कम्युनिस्टों-नक्सलियों और विभिन्न आतंकी संगठनों को चीनी मदद को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

मोदी ने न सिर्फ पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाने की कोशिश की है, विश्व पटल पर भी नए शक्ति समीकरण तलाश किए हैं। उन्होंने न केवल अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड आदि के साथ रणनीतिक संबंधों को दृढ़ किया है, बल्कि उनके साथ रणनीतिक साझेदारी भी विकसित की है। उन्होंने आॅस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ मिल कर स्ट्रैटेजिक क्वाड्रिलेटरल (रणनीतिक चतुर्भज) बनाने की नींव रखी है। यही नहीं व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध आसियान देशों के साथ संबंधों को पुनर्जीवित किया है। आपको याद होगा गणतंत्र दिवस समारोह में आसियान के दसों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था। मोदी ने भारतीय विदेश नीति में लंबे अर्से तक उपेक्षित रहे अफ्रीकी देशों पर भी ध्यान केंद्रित किया। चीन वहां लंबे अर्से से चुपचाप काम कर रहा था और जिबूती में तो उसने अपना सैन्य अड्डा भी बना लिया था। मोदी सरकार ने इन देशों के साथ भागीदारी की नए सिरे से नींव रखी और भारत में इनके राष्ट्राध्यक्षों के विशाल सम्मेलन भी किए।

मोदी सरकार ने प्रयास किए कि विदेशनीति को देश की समृद्धि और व्यापार वृद्धि का जरिया भी बनाया जाए। आपको याद होगा कि इस बार जब चेन्ई में डिफेंस एक्सपो हुई तो उससे पहले दुनिया भर में भारतीय दूतावासों के सुरक्षा संबंधी अधिकारियों को बुला कर खास ब्रीफिंग दी गई। उन्हें हथियार बनाने वाली भारतीय कंपनियों और संबंधित अधिकारियों से बातचीत करने के लिए प्रेरित किया गया ताकि वो जिन देशों में तैनात हैं वहां भारतीय हथियारों के लिए बाजार ढूंढ सकें। लेकिन यहां ये कहना आवश्यक है कि अगर व्यापार में चीन से टक्कर लेनी है तो उसके तौर तरीकों को समझना और जरूरत पड़े तो अपनाना भी होगा। व्यापार में कोरे आदर्शवाद और नैतिकता से काम नहीं चलता।

मोदी ने भारत के व्यापारिक, सामरिक और रणनीतिक हितों के संवर्धन के लिए जी-20, ब्रिक्स, एससीओ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भरपूर इस्तेमाल किया। यही नहीं लगभग मृतप्राय पड़े काॅमनवेल्थ में भी जान फूंकने की कोशिश की। इंग्लैंड में हुए ताजा काॅमनवेल्थ शिखर सम्मेलन में उन्होंने सदस्य देशों को प्रेरित किया कि वो इसके परंपरागत ढांचे से बाहर निकल इसे आपसी समृद्धि का औजार बनाएं। उन्होंने ब्रिटेन के साथ भी नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए और पहली बार इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक सहयोग और समुद्री आवाजाही की आजादी पर खुलकर चर्चा की। इसे दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीतियों के विरूद्ध सहयोग के लिए सहमति समझा जा सकता है।

अगर ये कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोदी ने भारत की विदेशनीति का सही मायनों में गुटनिरपेक्ष बनाया। इस गुटनिरपेक्षता का आधार राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि देशहित है। यही वजह है कि आज भले ही अमेरिका और रूस में तनातनी चरम पर हो, भारत के दोनों से बेहतर संबंध हैं, आज भले ही चीन हमें घेरने में लगा हो, हम उसके साथ फिर से सैन्य अभ्यास करने के लिए तैयार हैं, अमेरिका ने जब उत्तर कोरिया को अपना दुश्मन नंबर एक करार दिया तब भी हमने उससे अपने राजनयिक संबंध तोड़े नहीं। अच्छी बात ये है कि आज सभी बड़े देश ये समझ गए हैं कि मोदी सरकार वही करेगी जो उसके देशहित में होगा, इसलिए उसे अपने हिसाब से चलाने की जगह बेहतर है, भारत के उभरते बाजार में अपने पांव जमाओ और समृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ो।

मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में भारत ने दुनिया के लगभग सभी देशों से संबंधों को पुनर्जीवित और प्रगाढ़ किया है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किए गए हैं। हर देश और हर प्रयास की चर्चा तो असंभव है, लेकिन संक्षेप में कहें तो ये मोदी की विश्वदृष्टि है जिसके कारण आज भारत किसी राजनीतिक विचारधारा के कारण नहीं, बल्कि व्यापारिक, सामरिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक कारणों से तीसरी दुनिया की आवाज के तौर पर उभर रहा है। अंत में एक सवाल आपसे – आज दुनिया के कितने देश 21 जून को एक साथ योग दिवस मनाते हैं?

“बंद हो एससी-एसटी एक्ट के नाम पर झूठ और हिंसा की राजनीति” in Punjab Kesari

न्यायमूर्ति यूयू ललित और एके गोयल की सुप्रीम कोर्ट बैंच ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत किसी सार्वजनिक कर्मचारी को उसके नियोक्ता प्राधिकारी की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। इसी प्रकार गैर-सार्वजनिक कर्मचारी को सीनियर सुपरिनटेंडेंट पुलिस की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत लोगों को झूठे मामलों से बचाने के लिए जरूरी है कि कोई भी कार्रवाई करने से पहले डिप्टी पुलिस सुपरिनटेंडेंट पुलिस ये जांच करें कि मामला एससी-एसटी एक्ट का बनता है या नहीं।

ध्यान रहे एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए अगर इसके तहत कोई शिकायत होती है तो आरोपित व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का शुरू में तो संज्ञान ही नहीं लिया गया लेकिन आगामी चुनावों के मद्दे नजर कुछ राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने की ठानी। विशुद्ध रूप से न्यायिक इस फैसले को भावात्मक रूप दिया गया और विपक्षी दलों ने इसके लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस पार्टी ने आनन-फानन में भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और दावा किया कि इस फैसले में उसका हाथ है। अदालत के फैसले के विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया जिसमें व्यापक हिंसा हुई और जान-माल की हानि हुई।

इन दंगों की इलैक्ट्राॅनिक मीडिया ने व्यापक कवरेज की। अदालत के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी लोगों का गुस्सा समझा जा सकता है, लेकिन दंगों की फुटेज से स्पष्ट था कि ये पूरी तरह प्रायोजित थे। पूना कोरेगांव के बाद एक बाद फिर भड़की इस हिंसा से साफ है कि एससी-एसटी समाज को मुख्यधारा से अलग करने और देश में हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए सुविचारित षडयंत्र हो रहा है। इस्लामिक आतंकियों, नक्सलियों और मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दलों के गठबंधन ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के विवादास्पद छात्र रोहित वेमुला को प्रतीक बनाकर जिस राजनीति की शुरूआत की थी, वो अब परवान चढ़ती नजर आ रही है।

हमने देखा कैसे कांग्रेस ने गुजरात में जिग्नेश मेवानी के साथ गठबंधन किया जिसे नक्सलियों और पाॅपुपर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों ने खुलेआम समर्थन दिया। पूना कोरेगांव में इसीे व्यक्ति के भड़काऊ भाषण के बाद महाराष्ट्र में व्यापक दंगे फैले। ये व्यक्ति राजनीतिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाता है और सरेआम लोगों को हिंसा के लिए भड़काता है।

बहरहाल एससी-एसटी वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को पुनर्विचार याचिका दायर की। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस पूरे प्रकरण में सरकार का हाथ होने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “सरकार सुप्रीम कोर्ट के तर्क से सहमत नहीं है जिसने एससी-एसटी एक्ट की संरचना को नए सिरे से गढ़ दिया है…हमें लगता है कि इस प्रकार के संवेदनशील मामले पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता थी और आंकड़ों के आधार पर ये तय किया जाना चाहिए था कि इसका दुरूपयोग हो रहा है या नहीं।” प्रसाद ने एससी-एसटी एक्ट के प्रति अपनी सरकार का समर्थन दोहराया और कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे मजबूत किया गया है। 1989 में मात्र 22 अपराध धारा 3, (1) और (2) के तहत दर्शाए गए थे, लेकिन 2015 में मोदी सरकार ने इस सूची में विस्तार किया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पांच दिन के भीतर ही सरकार ने पुनर्विचार याचिका तैयार कर ली थी, लेकिन छह दिन तक अदालत का अवकाश रहने के कारण इसे दायर नहीं किया जा सका।

सरकार ने इस विषय में दायर अपनी पुनर्विचार याचिका में स्पष्ट शब्दों में कहा, ”ये फैसला बड़ी जनसंख्या वाले एससी-एसटी वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ये संसद की उस विधायिका नीति के विपरीत है जो एससी-एसटी एक्ट में परिलक्षित होती है। एससी-एसटी वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए किए गए विभिन्न कार्यों के बावजूद उनकी स्थिति अब भी कमजोर है। उन्हें कई नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते, उनके खिलाफ अनेक अपराध किए जाते हैं, उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है…विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके खिलाफ गंभीर अपराध किए जाते हैं।“

स्पष्ट है सरकार ने इस वर्ग की भावनाओं और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को समझा और उसके अनुरूप सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

दो अप्रै्रल को हुई व्यापक हिंसा और सरकार की पुनर्विचार याचिका के बावजूद चार अप्रैल को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा, ”कई बार विरोध करने वाले अदालत के आदेश को ठीक से पढ़ते भी नहीं, इसमें निहित स्वार्थ भी शामिल हो सकते हैं।” अपने आदेश के पीछे की मंशा को साफ करते हुए अदालत ने कहा ”हमें निर्दोष लोगों को जेल भेजे जाने पर चिंता है, क्या किसी व्यक्ति की आजादी बिना किसी उचित प्रक्रिया के छीनी जा सकती है? सत्यापन का कोई तरीका तो होना ही चाहिए। अगर एक सार्वजनिक कर्मचारी के खिलाफ आरोप लगता है तो क्या होता है? अगर आरोप एटाॅर्नी जनरल के खिलाफ लगे तो क्या हो? उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए?”

इस विषय में 12 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अपने लिखित निवेदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। सरकार की ओर से एटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत की ये सोच गलत है कि वो कानून बना सकती है। अदालत द्वारा एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को क्षीण करने से देश को भारी नुकसान हुआ है। सरकार ने अदालत से आग्रह किया किया कि वो कानून में किए गए परिवर्तनों को तुरंत वापस ले ताकि वही कानून अपनाया जा सके जिसे संसद ने पारित किया है।

केंद्र सरकार इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में तो पक्ष रख ही रही है, लेकिन साथ ही उसने अन्य विकल्प भी खुले रखे हैं। 11 अप्रैल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई वरिष्ठ मंत्रियों की एक बैठक में इस विषय में अध्यादेश लाने पर भी चर्चा की गई। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया तो सरकार इस संबंध में अध्यादेश का रास्ता भी अपना सकती है।

अदालत में लड़ाई से लेकर अध्यादेश तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तक सबने स्पष्ट कर दिया है कि एससी-एसटी वर्ग को आहत करने वाले इस फैसले को नहीं माना जाएगा। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकार द्वारा पूरा समर्पण दिखाने और हर संभव प्रयास करने के बावजूद विपक्षी दल झूठ का भ्रमजाल फैलाने में लगे हैं।

मायावती को इस अवसर पर एक बार फिर कश्मीरी आतंकियों की जय जयकार करने वाला विवादास्पद नक्सली रोहित वेमूला याद आने लगा है। उन्होंने अनुसूतिच जाति वर्ग पर अपनी इजारेदारी जताते हुए भाजपा को इस वर्ग का विरोधी करार दिया है। मायावती आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उंगली उठा रही हैं, लेकिन इन्हीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए एससी-एसटी एक्ट का दुरूपयोग रोकने के बारे में 20 मई 2007 को एक आदेश निकाला था जिसमें कहा गया था, ”दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर एससी-एसटी को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं, इस बात का ध्यान रखा जाए कि निहित स्वार्थों के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल न होने पाए।” मायावती यहीं नहीं रूकीं, उन्होंने 29 अक्तूबर को इस संबंध में एक और आदेश निकाला जिसमें कहा गया था, ”एससी-एसटी सदस्यों के उत्पीड़न के मामलों में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान नहीं किया जाए।” सोचने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को क्या वही नहीं कहा था जो मायावती ने 2007 में कहा था। लेकिन आज मायावती केंद्र सरकार को चुनौती दे रहीं हैं कि अगर उसे एससी-एसटी से प्यार है तो वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाए।

उधर राहुल गांधी आग में घी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है वो मोदी के राष्ट्रवाद को जातिवाद से काट पाएंगे। तभी तो वो झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आतंकियों का गुणगान करने वाले नक्सली रोेहित वेमूला ने आत्महत्या की थी, लेकिन राहुल, मोदी सरकार पर उसकी हत्या का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस ने 60 साल के शासन में एससी-एसटी वर्ग के लिए क्या किया, वो ये तो नहीं बताते, लेकिन मौजूदा दशा के लिए वो मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, जिसने इस वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए पिछले चार साल में कांग्रेस के 60 साल से ज्यादा काम किया है। हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने सरेआम ये झूठ बोला कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। जातिवादी नफरत और हिंसा भड़काने के लिए इस से बड़ा षडयंत्र और क्या हो सकता है? अब इसे दुष्प्रचार और षडयंत्र नहीं तो और क्या कहेगे कि राहुल गांधी एससी-एसटी वर्ग को पोटने के लिए ‘संविधान बचाओ मुहिम’ का आगाज करने जा रहे हैं, जबकि संविधान या इस कानून पर कहीं कोई संकट है ही नहीं।

राहुल गांधी के जहरबुझे भड़काऊ बयानों के खिलाफ पांच अप्रैल को स्वयं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने एक ट्वीट कर राहुल पर आरोप लगाया कि वो ये झूठ बोल कर समाज में नफरत भड़का रहे हैं कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। उन्होंने सबूत के तौर पर राहुल गांधी के भाषण का अंश भी पेश किया जिसमें वो कह रहे थे, ”दलितों और आदिवासियों पर जुल्म बढ़ रहे हैं और एससी-एसटी एक्ट वापस ले लिया गया है। नरेंद्र मोदी जी एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं।“

कांग्रेस अध्यक्ष की ऐसी हरकत निश्चित ही निंदनीय है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए वो आजकल बिना किसी सबूत के कुछ भी बोल रहे हैं। सबने देखा कि उन्होंने गुजरात में पटेलों को आरक्षण का झुनझुना थमाया जबकि काननून ये संभव नहीं है। कर्नाटक में तो वो हिंदू समाज को ही बांटने पर उतर आए हैं। भारतीय लोकतंत्र की ये विडंबना हो गई है कि स्वार्थ में अंधे नेता समाज में आग लगाने के लिए बेसिरपैर के भड़काऊ बयान देते हैं और उनके चेले चपाटे इसे ब्रह्य वाक्य मान कर प्रचारित-प्रसारित करते हैं। ये खेल सिर्फ बयानों तक ही रहे तो भी गनीमत है, समाज को तोड़ने तथा हिंसा और आतंक फैलाने के लिए बाकायदा हिंसक गिरोहों को पैसा दिया जाता है और लाशों को ट्राॅफी समझा जाता है।

जाहिर है मोदी सरकार को सतर्क रहना होगा। एससी-एसटी वर्ग में असंतोष के नाम पर देश तोड़ने के लिए विघटनकारी ताकतें सक्रिय हो चुकी हैं। इन ताकतों से सख्ती से निपटना होगा, नहीं तो ये समाज को ही नहीं तोड़ेंगी, देश की छवि को भी भारी नुकसान पहुंचाएंगी। यदि इन पर लगाम नहीं लगाई गई तो सरकार आर्थिक्र विकास के लिए जो प्रयास कर रही है, वो धरे के धरे रह जाएंगे।

“मोदी नीतिः अस्त-व्यस्त, पस्त पाकिस्तान” in Punjab Kesari

मुस्लिम वोटों का सौदा करने वाले भारतीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय रहा है – पाकिस्तान। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक, सबने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध कायम करने के प्रयास किए। 10 साल शासन करने वाले मनमोहन सिंह भी इस कोशिश में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन सबके साथ समस्या ये रही कि इन्होंने पाकिस्तान में प्रत्यक्षतः सत्तासीन नेताओं से बात करने की कोशिश की और पर्दे के पीछे काम करने वाली असल सत्ता यानी सेना को नजरअंदाज किया।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो उन्होंने भी इसी लीक पर चलने की कोशिश की। तबके पाकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को शपथग्रहण समारोह में बुलाया। अचानक उनके घर भी पहुंचे, तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जब भी भारत ने सद्भावना प्रदर्शित करने के लिए बड़ा कदम उठाया, पाकिस्तानी सेना ने उसका जवाब खून खराबे से दिया।

जल्द ही मोदी सरकार को समझ आ गया कि जिस नवाज शरीफ से वो बात करने की कोशिश कर रहे हैं, वो सेना की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं। वो सेना की अनुमति के बिना भारत से संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकते।

25 दिसंबर 2015 को मोदी शरीफ के निमंत्रण पर अचानक लाहौर पहुंचे। मकसद था नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देना और उनके परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेना। मोदी के स्वागत के लिए शरीफ स्वयं अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पहुंचे। इससे भारत और पाकिस्तान में सद्भावना की नई उम्मीद जगी, लेकिन पाकी सेना को ये रास नहीं आया। सेना समर्थक मीडिया ने शरीफ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को मोदी के हाथों बेच दिया। 10 दिन के अंदर ही यानी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर हमला हो गया। भारत ने इसके लिए जैश-ए-मौहम्मद को जिम्मेदार ठहराया और शरीफ ने इस हमले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी जांच के लिए पठानकोट भी आए, लेकिन मामला किसी सिरे तक नहीं पहुंचा।

पठानकोट मामले की जांच चल ही रही थी कि 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ जिसमें 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। भारत ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक सरकार से जांच की अपेक्षा करने की जगह, पाकिस्तान पर चहुंमुखी हमला करने की योजना बनाई। इसमें सैन्य, राजनयिक, रणनीतिक से लेकर सिंधु जल समझौते तक, हर क्षेत्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने की नीति बनाई गई। मोदी सरकार ने एक झटके में पुरानी सरकारों के इस तर्क को कूड़ेदान में डाल दिया कि स्थिर पाकिस्तान, भारत के लिए जरूरी है। ये समझ लिया गया कि जब तक पाकिस्तान को उसकी हिमाकत की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, वो बाज नहीं आएगा।

उड़ी हमले की अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, कनाडा, भूटान और यहां तक कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी निंदा की। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने घोषणा की कि वो अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेगी, लेकिन इसका समय और स्थान वो खुद तय करेगी। जाहिर है, मोदी सरकार ने अब भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से अपनी तरह से निपटने की छूट दे दी थी।

उड़ी हमले के करीब 10 दिन बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें वहां मौजूद आतंकियों के अनेक ठिकानों पर हमला किया गया। सर्जिकल स्ट्राइक भारत की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब तक भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को देश की सीमा में ही मारती थी, यह पहली बार थी जब सेना ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) पार कर हमला किया। ये भारत की तरफ से स्पष्ट संकेत था कि अब वो रक्षात्मक नीति छोड़, आक्रामक नीति अपनाएगा और जरूरत पड़ने पर एलओसी पार करने में परहेज नहीं करेगा। अब तक पाकिस्तान अपने परमाणु बम की धमकी देता था, सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही भारत सरकार ने उसकी परमाणु धमकियों की भी धज्जियां उड़ा दीं।

सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद जब पाकिस्तानी सेना नहीं मानी तो भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसके तहत लंबी दूरी के हथियारों से एलओसी के परे आतंकी ठिकानों को ही नहीं, पाकी सेना को भी निशाना बनाया जाने लगा। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि पाकी सेना पर इसका असर नहीं पड़ा है और वो बदस्तूर घुसपैठिए भेज रही है। यदि गहराई में देखा जाए तो समझ आएगा कि इस दौर में भारतीय सेना ने एलओसी और अंतरराष्ट्ररीय सीमा पर जितने घुसपैठिए और पाकी सैनिक मार गिराए, उतने पहले कभी नहीं हलाक किए गए। यही नहीं भारतीय सेना ने देश की सीमा के भीतर भी जितने आतंकी अब मारे हैं, उतने पहले कभी नहीं मारे।

अगर आप पाक अधिकृत कश्मीर के न्यूज चैनलों को देखें तो आपको पता चलेगा कि भारतीय सेना की नई नीतियों का किस हद तक असर हुआ है। वहां लोग कहते हैं कि वो लगातार युद्ध जैसे हालात में जी रहे हैं और न तो पाकिस्तानी सेना और न ही सरकार उनके जान-माल के नुकसान की भरपाई कर रही है। वो चाहते हैं कि इससे पहले भारतीय सेना और कोई बड़ा कदम उठाए, पाकी सेना अपने आतंकी शिविर वहां से हटा ले। वो कहते हैं कि पाकी सेना की मूर्खता और हठधर्मी की वजह से उनका व्यापार और रोजगार चैपट हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है। जाहिर है इस समय पीओके निवासियों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वो पाकी सेना की आतंकी नीति से मुक्ति पाना चाहते हैं।

इस बीच 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला भी उठा दिया। संकेत साफ था कि अगर पाकिस्तान बाज नहीं आएगा तो भारत, जम्मू-कश्मीर से परे भी संघर्ष के नए क्षेत्र खोलने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान ने जहां-जहां कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत ने वहां-वहां बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला उठाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब और अलग-थलग करने का भूतो न भविष्यिति प्रयास शुरू कर दिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इन प्रयासों को बहुत बल मिला।

अमेरिका ने मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात से पहले ही, न सिर्फ भारत को रणनीतिक सहयोगी बनाने की बराक ओबामा की नीति का पुरजोर समर्थन किया, बल्कि सय्यद सलाहुद्दीन के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन को अंतरराष्ट्रीय संगठन भी घोषित कर दिया जिसे पाकिस्तान ‘कश्मीरियों की आजादी की आवाज’ बताता रहा है। संदेश साफ था कि अमेरिका को कश्मीरियों की पाक समर्थित आजादी की मुहिम में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद तो ट्रंप ने एक के बाद एक अनेक ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान को गहरा आघात लगा। 21 अगस्त 2017 को ट्रंप ने नई दक्षिण एशिया नीति का एलान किया जिसमें पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भारत को महत्वपूर्ण स्थान देने की घोषणा की गई। दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के समय ट्रंप ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी कि अगर उसने अपनी धरती से आतंकी शिविर समाप्त नहीं किए तो उसे नतीजा भुगतना पड़ेगा।

पाकिस्तान ने आदतन अमेरिका की धमकी को हलके में लिया। वो भूल गया कि अब वाइट हाउस में बराक ओबामा नहीं डोनाल्ड ट्रंप बैठे हैं। ट्रंप ने पहले तो पाकिस्तान की करीब दो अरब डाॅलर की रक्षा सहायता बंद करने का एलान किया फिर ये सुनिश्चित किया कि उसे दुनिया में टेरर फंडिंग और हवाला कारोबार की निगरानी करने वाली ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया जाए। पाकिस्तान इस सदमे उभरा भी नहीं था कि अमेरिका ने परमाणु प्रसार का आरोप लगा कर पाकिस्तान की उन सात कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए जो उसके परमाणु हथियारोें के लिए सामान उपलब्ध करवाती हैं।

अमेरिका के नए विदेश मंत्री और सीआईए के पूर्व प्रमुख माइक पोमपेओ ने खुली धमकी दे दी है कि अगर पाकिस्तान नहीं चेता तो अमेरिका उससे मेजर नाॅन-नेटो अलाय (महत्वपूर्ण गैर-नैटो सहयोगी) का दर्जा वापसस ले लेगा, उसे आतंकी देश घोषित करेगा और उसके अधिकारियों के अमेरिका आने पर रोक भी लगाएगा। जाहिर है अमेरिका जो कदम उठाएगा, उसके सहयोगी भी उसका अनुसरण करेंगे।

पाकिस्तानी आतंकी फक्ट्रियों के लिए अमेरिका से एक और बुरी खबर हाल ही में तब आई, जब वहां के दौरे पर गए सउदी अरब के शहजादे मौहम्मद बिन सलमान ने घोषणा की कि वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की नीति समाप्त करेंगे जिसके तहत सउदी वित्तीय सहायता से दुनिया भर में वहाबी मदरसे खोले गए और आतंकी बनाए गए। इस नीति का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान ने उठाया जहां 32,000 से ज्यादा ऐसे मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों में तैयार आतंकियों को पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करता है। जाहिर है शहजादे सलमान की घोषणा पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्रियों पर सीधे असर करेंगी। अमेरिका और सउदी अरब के फैसले उसकी विदेश नीति के दो प्रमुख स्तंभों – परमाणु बम और आतंकी नेटवर्क, दोनों को प्रभावित करेंगे।

अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारत ने सैन्य और राजनयिक दोनों स्तर पर पाकिस्तान को घेरा है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के अंतरराष्ट्रीय अभियान का पश्चिमी देशों में ही नहीं, खाड़ी के मुस्लिम देशों में भी व्यापक असर हुआ है, जो पहले कभी पाकिस्तान के करीबी माने जाते थे। आज चाहे अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देश भी उसके खिलाफ हैं। उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी न केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसके विरूद्ध आवाज उठाई, बल्कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ में भी उसके खिलाफ मत दिया। पाकी सेना अपनी जनता को भरमाती है कि चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पाकिस्तान की माली हालत बहुत बेहतर कर देगा, लेकिन चीन ने इसकी लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं से हाथ खींच लिए हैं। ध्यान रहे पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले इस काॅरीडोर का भारत विरोध करता रहा है क्योंकि भारत इसे अपना अटूट अंग मानता है।

भारत अब तक अपने बयानों और कामों से पाकिस्तान को ये स्पष्ट संदेश दे चुका है कि अगर उसने भारत में आतंक का निर्यात नहीं बंद किया तो वो सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार करने से नहीं हिचकेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान से इससे सबसे बड़ी खलबली मची है। वहां आम आवाम को बिजली, पेयजल, रोजगार, इंधन, शिक्षा कुछ भी हासिल नहीं है। ऐसे में अगर भारत ने पानी रोक लिया तो उसके खेत खलिहान सूख जाएंगे और भारत बिना कोई यु़द्ध किए ही युद्ध जीत जाएगा।

हाल ही में पाकी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने चुनींदा पत्रकारों के सामने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे जिसे उनके चमचे ‘बाजवा डाॅक्टरीन’ के नाम से प्रचारित कर रहे हैं। इसमें बाजवा कहते हैं कि भारत को आर्थिक कारणों से बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा। वो डींगे मारते हुए कहते हैं कि उन्होंने कठोर अमेरिकी दबाव के बावजूद, परवेज मुशरर्फ की तरह घुटने नहीं टेके। हो सकता है वो पाकिस्तानियों को बहलाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हों, लेकिन इन्हीं पाकिस्तानियों ने हाल ही में देखा कि कैसे एक अमेरिकी एयरपोर्ट पर उनके प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की खाना तलाशी ली गई और कैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने उन्हें आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह देकर बैरंग वापस कर दिया।

भारत में विपक्षी दल बिना सोचे समझे मोदी सरकार पर आरोप लगा देते हैं कि उसकी कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। अब तक ये स्पष्ट हो गया होगा कि मोदी सरकार ने अपने अनुभवों और पाकिस्तान की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी नीति न केवल तैयार की है, बल्कि उसे हर मोर्चे पर लागू भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात – इसका आधार किसी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, राष्ट्रहित है। संभवतः यही कारण है कि मोदी सरकार ने हुर्रियत के पाकिस्तानी दलालों पर भी हाथ डाल दिया है, जिन्हें पिछली सरकारें पवित्र गाय समझती थीं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पाकिस्तान के चुने हुए नेताओं से बातचीत का नाटक करने की जगह, सीधे उसकी सेना पर वार किया है। इसका दंश वो महसूस भी कर रही है। धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कस रहा है। उसे स्पष्ट कर दिया गया है कि उसे अपनी हरकतों की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब ये उसे तय करना है कि वो अभी सुधरने का संकल्प लेती है या नुकसान उठाने के बाद। ध्यान रहे इस बार सुधार का नाटक नहीं चलेगा।

“Budget 2018: The government takes major steps with the aim of uplifting the nation’s women and children” in TOI Blog

The year 2017 witnessed landmark rulings in the favor of women which were on a standstill for decades, having begun with women appointed in high profile government positions, and keen awareness for child protection.

Upholding the national pledge to uplift and protect women and children, the government has kick-started 2018 with greater momentum than the previous year. The Union Budget of 2018 has heightened its focus on welfare for women and children. This year’s budget has provided the Women and Child Development Ministry with an increase in funds by almost 12%, bringing the total to Rs. 24,700 Crores.

To inculcate a panorama of women ranging from rural to urban, Finance Minister Arun Jaitley introduced a boon to working women. With our prevailing governments no-nonsense attitude we witnessed a range of successes in the previous year’s Budget, 2018 is aimed at being the icing on the cake with yet provisions and more protection.

The obvious disparity in pay based on gender has been long plaguing the world, this year’s Budget aims at curbing economic discrimination. With a never before introduced provision, Arun Jaitley announced a reduction in the contribution that women employees make to the Employees Provident Fund Organisation, from 12% to 8%.

This move will increase the take-home pay, and is expected to increase job opportunities. India has a women’s labour force participation at a meager 24% as opposed to 40% globally, hopefully the reduction in EPFO will bring us at a global par. Modi’s campaign ‘Start Up India’ has made leaps and bounds through MUDRA Yojana, a scheme to provide funds to first time entrepreneurs at a concessional rate.

Arun Jaitley stated that a whopping 76% of the beneficiaries are women, to continue from the previous year this scheme has received a boost of Rs 3 Lakh Crores.  In order to further assist working women and mothers we will see a significant increase to existing schemes in the coming financial year.

The National Creche Scheme’s allocation will be doubled; under this scheme the children of working mothers are provided a safe haven, while the allocation for Working Women’s Hostel Scheme has been raised by 20%. These facilities are free of cost and provide women the required freedom and safety needed to be self-dependent.

On the other hand to further ensure cost-cutting and better health standards of women there is the Ujjwala Yojana. Under this Yojana poor families are provided cleaner cooking gas for a bare minimum amount, which is a boon to the health of women who choke in the kitchen due to the smoke from cooking. Conceived two years ago the current government exceeded its annual target in 2016-17, for the 2018-19 budget we can expect a similar projection.

The Pradhan Mantri Saubhagya Yojana, which provides free electricity to rural households has been given a target of 4 crores households, and 2 crore toilets will be installed under the Swachch Bharat Mission.  Mahila Shakti Kendra, a One Stop Shop for women empowerment at the village level, is one of the ambitious projects of the Ministry. Its allocation has been increased four-fold to Rs. 267 Crores.

The Finance Minister further stated that the loans extended to Women Self-Help Groups are expected to increase to Rs. 75000 Crores by the end of 2018-19 from Rs. 42500 Crores. Rs. 500 Crores have been provided for transfer to the Nirbhaya fund from which various schemes of Central Government and State Governments are supported for safety and protection of women. The enhanced allocation will help in creating a safety net for women in difficult situations.

Witnessing the horrendous 2017 events which brought a limelight to the predominant vulnerability of children, the Ministry has shown that the protection of children is an important area of focus. The allocation for the protection of children has been increased by 12% for the year 2018-19.

Arun Jaitley also shared some good news about a recently started Scheme launched by the Beti Bachao Beti Padhao Campaign. Approximately 1.26 crore girls have benefitted through the Sukanya Samridhi Yojana accounts, which is a deposit scheme meant to meet the marriage and education expense of a girl child.

Discrimination against women is prevalent in all classes, yet up till now each budget was focused on underprivileged women. The major complaint by most regarding the previous budget was that working class women weren’t included.

For this year’s budget the government has taken serious consideration and introduced the reduction of EPFO for women of all classes. This year’s budget has been widely received with warmth when it comes to women and children, especially due to the great achievements by the current government in previous budgets.

Exposing Hate India Brigade

The exposure of the Hate India Brigade has many inseparable perspectives; to understand the complexity of this nexus is a national responsibility and requires complete understanding of the underlying meaning of each organisation’s action. This nexus is an amalgamation of NGO’s, international powers, media and politicians that strive together to misguide the Indian national, each has their own agenda. The shock is that to propagate their agenda, a collusion has been formed with terrorists and anti-national forces, resulting in a threat to the safety of our citizens.

The most frightening aspect of this nexus is the illegal work of NGOs. When the CBI investigated registered NGOs, it was found that there were 31 lakh registered NGOs, double the number of registered schools in the country. Per 709 persons there is only one police personnel; but for 400 persons there is one NGO. To have more NGOs than police personnel is a shocking disparity.

An NGO in itself is not objectionable. What is objectionable is when it is driven by the ambition to break the country rather than serving the nation, when the ambition is to spur communal violence, when the ambition is to protect violent Naxals in the name of human rights.

Many NGOs accept money from foreign countries to fight against the implementation of Indian nuclear energy plants. In 2012, the UPA government cancelled the registration of three NGOs that attempted to hamper work on the Kudankulam nuclear plant. The accusation was that they were taking money from America to stage their protests.

When the National Investigation Agency probed the Kashmiri Hawala money, it was found that there were many NGOs involved. When the Narendra Modi government took proactive steps to stop illegal misconduct of NGOs, nationally and internationally, they responded with well-planned and orchestrated propaganda against the government, calling them fascists.

Another group, taken aback by the rise of Narendra Modi, are self-proclaimed non-religious persons who support Islamic hardliners and their agenda, the ‘Award wapsi gang’. In 2014, they felt that it would be difficult to stop Modi from becoming Prime Minister, but issued an appeal to the public, hoping to change the course of the election. In the name of liberalism, they support anti-national activities. They hug the anti-national nonentities from Jawaharlal Nehru University, and in the name of freedom of speech and anti-death penalty, give protection to Naxals and terrorists. Every day they issue statements supporting Hurriyat, and now applaud Karnataka for raising its own flag.

The issue of cow protection has taken the media by storm with false allegations by the nexus making the issue a daily national staple. Protection of cows is enshrined in Article 48 of the Directive Principles of the Constitution. It is testimony that the founders of our Constitution hoped that future governments would create a law to stop cow slaughter.

In Haryana, an example of this gang’s evil was seen in an episode in which one Junaid was killed over a fight for a railway seat. The Hate India Brigade spread rumors at times linking the scuffle to cow vigilantism and at times to eating beef. The Kerala government dramatically declared Rs. 10 Lakh compensation to the family of Junaid. But when the family of Junaid came forward to testify that the quarrel was over a seat and had nothing to do with any other issue, they all fell silent. Their job was only to throw dirt on the government in the hope that someday the defamation will stick.

The ugly face of communists comes forth when it’s seen that all disruptive, anti-national, and terrorist movements are supported by them. For them their ideology is first and the nation is later. They don’t believe in nationalism. They don’t think of India as one, they believe India is a confederation of nations. At times it is suspected that they work at the behest of foreign powers to promote their agenda. Independent India’s greatest tragedy is the hypocrisy of vandals.

Communists never respected the Independence Struggle; they tried to fail the ‘Quit India’ movement. Mahatma Gandhi, Subhas Chandra Bose and Jai Prakash Narayan were mocked. They didn’t stop here and refused to accept independence and started an armed struggle against the nation. In 1962, they supported China; they supported the national emergency and press censorship in 1975.

During the ethnic cleansing of three lakh Kashmiri Pundits, the communists, Congress Party, and media gang were quiet; now they are giving publicity and support to stone pelters. It is well-known that stone-pelters are paid and deadly terrorists are protected. During the attack on the Amarnath yatra, their agenda was to create communal riots all over the nation, but the Modi government handled the situation with a firm hand.

Knowledge of the Malda and Dhulagarh incidents in West Bengal reached Delhi, but the Hate India Brigade and their collaborators in the media simply squashed (read censored) these issues. The Basirhat riots attracted attention when Arnab Goswami and Rahul Shivshankar did a post-mortem of the Bengal riots. After this, it was as if Pandora’s Box was opened. Take the evacuation of Kashmiri pundits or the atrocities of Hindu’s in Bengal, when Hindus die, nobody takes notice.

In the Noida Sector 78 Mahagun Society case, Bangladeshis attacked a gated society on the false accusation made by Zohra Bibi, who worked in flats in the society. A mob of 500 people collected and violently stormed into the gated society. This incident raised many questions, namely, instead of trying to find Zohra Bibi, why did people reach the society with sticks and stones?

Within one night, how did so many people find items to fight with, and who collected them together to fight at 6 a.m.? This incident is evidence of the fact that a greater force is working within the nation, a strategically aligned force, which comes together to brainwash the less-informed public.

We all need to wake up and work for the nation; this is only possible by scrutinizing each action with careful analysis.

The author is a successful businesswoman – IWEC Awardee, social activist, honoured by the  President of India.