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“संघ को बदनाम करने की नापाक कोशिश” in Punjab Kesari

गांधी जयंती पर कोलकाता के दमदम नगर बाजार में बम विस्फोट हुआ जिसमें आठ साल का बच्चा मारा गया। अभी पुलिस ने केस दर्ज कर तफ्तीश शुरू भी नहीं की थी कि ममता बनर्जी सरकार के मंत्री पूर्णेंदू बोस ने इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि संघ के स्थानीय नेतृत्व से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक सबने इसकी निंदा की और बोस के बयान को बेसिरपैर का बताया, लेकिन राज्य सरकार के एक ‘जिम्मेदार’ मंत्री द्वारा तुरंत और वो भी बिना किसी सबूत के संघ को दोषी ठहराना चिंताजनक है। चिंताजनक इसलिए कि एक मंत्री द्वारा इस प्रकार बयान देना, कहीं न कहीं पुलिस और जांच एजेंसियों के काम को भी प्रभावित करता है। ये एक प्रकार से उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निर्देश देता है कि उन्हें जांच किस दिशा में ले जानी है और येन केन प्रकारेण अंततः किसे दोषी साबित करना है।

अब दूसरा मामला इस्लामपुर के दरीभीत स्कूल का देखिए। यहां पिछले महीने जब शिक्षकों की भर्ती के मामले में छात्रों ने विरोध किया तो पुलिस ने उनपर गोली चला दी। इससे दो छात्र मारे गए। इस मामले में तो स्वयं ममता बनर्जी ने संघ को दोषी ठहराया, हालांकि गोली ममता की पुलिस ने चलाई। संघ प्रवक्ता जिशनु बसु ने इस मसले में टीएमसी को कानूनी नोटिस भेज दिया है।

बिना किसी सबूत या जांच के संघ पर मिथ्या आरोप लगाने वाली ममता और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पश्चिम बंगाल को खुद कैसे आतंकियों का अड्डा बना रखा है वो इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले तीन साल में भारत में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सबसे अधिक एजेंट पश्चिम बंगाल से ही पकड़े गए हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलटने की कोशिश में लगे जमात-उल-मुजाहीदीन, बांग्लादेश (जेएमबी) के 30 आतंकी और उनकी बम बनाने की फैक्ट्रियां भी यहीं पकड़ी गईं थीं।

पिछले साल दिसंबर में खुफिया एजेंसियों ने खबर दी थी कि जेएमबी पश्चिम बंगाल और असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों को भड़काकर गुरिल्ला फोर्स बनाने की योजना पर काम कर रहा है और संघ और उसके सहयोगी संगठनों के नेता उसके निशाने पर हैं क्योंकि वही बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ का सबसे मुखर विरोध करते हैं। ध्यान रहे जेएमबी के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से प्रगाढ़ संबंध हैं और टीएमसी के अनेक पदाधिकारियों पर उसके एजेंटों को पालने के आरोप भी लगते रहे हैं। आपको ये भी याद होगा कि कैसे ममता के एक मंत्री फिरहद हाकिम ने पाकिस्तानी अखबार डाॅन की रिपोर्टर मलीहा हामिद सिद्दीकि को कोलकाता के गार्डन रीच इलाके की सैर कराते हुए उसे गर्व से ‘मिनी पाकिस्तान’ बताया था।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बदनाम ममता बनर्जी राज्य में ‘ममता बेगम’ के नाम से जानी जाती हैं। संघ और भारतीय जनता पार्टी से उनका द्वेष पुराना है। उन्होंने राज्य में होने वाले संघ प्रमुख मोहन भागवत के हर कार्यक्रम में रोड़े अटकाए हैं। उन्हें लगता है कि संघ को हिंदुओं का प्रतीक बनाकर और उसे प्रताड़ित और बदनाम कर वो हिंदुओं से नफरत करने वाले लोगों को परपीड़ा सुख दे सकती हैं और उनके वोट हासिल कर सकती हैं। लेकिन उनकी ये मानसिकता नई नहीं है, वो कांग्रेस से आईं हैं और वहां जवाहरलाल नेहरू के जमाने से नफरत फैलाने का ये रोग चला आ रहा है।

सोनिया सरकार के जमाने में इसने विकराल रूप धारणा कर लिया जब उनके सुशील शिंदे और पी चिदंबरम जैसे गृह मंत्रियों तथा उनके मातहत काम करने वाली पुलिस और जांच एजेंसियों ने इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ या ‘भगवा आतंकवाद’ के काल्पनिक विचार को जमीन पर उतारने के लिए संघ पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सब जानते हैं कि मुंबई हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिश थी, लेकिन कांग्रेस के एक दलाल अजीज बर्नी ने एक किताब लिखी – मुंबई हमलाः आरएसएस की साजिश और इसका विमोचन किया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने। दिग्विजय सिंह वही व्यक्ति हैं जिन्हें हेट प्रीचर जाकिर नायक ‘शांतिदूत’ नजर आता है और जो ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को ‘जी’ कह कर सम्मान देते हैं।

समझौता ट्रेन ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों ने आईएसआई एजेंट अजमत अली को पकड़ लिया था, लेकिन न जाने किस मंत्री के इशारे पर उसे छोड़ दिया गया और सेना के कर्तव्यनिष्ठ अफसर कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा आदि का पकड़ लिया गया और उनके खिलाफ फर्जी केस बनाए गए। यही हाल गोधरा कांड में हुआ। इसकी योजना पाकिस्तान में बनी, लेकिन पाकिस्तानी एजेंट कब कैसे गायब हो गया, पता ही नहीं चला। याद दिला दें कि गोधरा कांड के दो मुख्य अभियुक्त फारूक भाना और इमरान शेरू हैं। वारदात के समय भाना गोधरा में निर्दलीय पार्षद था। उसने वहां बोर्ड का निर्माण कांग्रेस की मदद से किया था। भाना खुद भी फरार हो गया था और 14 साल बाद ही वो पुलिस की पकड़ में आया।

गोधरा कांड के बाद कैसे गुजरात में दंगे भड़के और उसके बाद तबके मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताकर कैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया गया और कैसे भाजपा और संघ के खिलाफ मुसलमानों को लामबंद करने की कोशिश की गई वो किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस और अमेरिका में धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाने वाली कुछ ईसाई संस्थाओं ने तो मोदी के अमेरिका प्रवेश तक पर रोक लगवा दी थी।

संघ पर सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस ने ही निशाना साधा ऐसा नहीं है। हमने देखा है कि जब भी किसी राष्ट्रविरोधी विचारधारा या आतंकी पर हमला हुआ है तो उसने पलट कर संघ पर हमला किया है। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और कई अन्य विश्वविद्यालयों में पलने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल और उनकी सरपरस्त कम्युनिस्ट पार्टियां, इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमाक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया, कश्मीर के आतंकी संगठन और सपा और राजद जैसी अनेक इस्लामिक सांप्रदायिक पाटियां आदि सभी शामिल हैं। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियांे और कांग्रेस के शासन में कैसे सैकड़ों संघ कार्यकर्ताओं को सरेआम कत्ल किया गया है, वो किसी से छुपा नहीं है। इसी प्रकार कर्नाटक में भी संघ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न और हत्याएं जारी हैं। हर चुनाव से पहले चर्च और मौलवी कैसे संघ के विरूद्ध भड़ास निकालते हैं और भाजपा के खिलाफ फतवा जारी करते हैं, वो भी मंजरे आम पर है। मतलब साफ है – संघ अखंड भारत का समर्थन करता है तो जो भी भारत को तोड़ना चाहता है वो संघ पर हमला करता है।

हाल ही में रिपब्लिक टीवी ने लंदन आधारित खालिस्तानियों पर एक स्टिंग आॅपरेशन किया। आश्चर्य तो तब हुआ आईएसआई के पैसे पर पलने वाले प्रतिबंधित ‘दल खालसा’ के आतंकी गुरचरण सिंह ने अपने आतंकी रवैये को सही ठहराने के लिए संघ को दोषी ठहराना शुरू कर दिया। इस खूनी दरिंदे से कोई पूछे कि जब तुमने आईएसआई के इशारे पर अस्सी के दशक में पंजाब में खालिस्तान की आग लगाई तो संघ कहां था? संघ जिम्मेदार था तो तुमने इंदिरा गांधी की हत्या क्यों करवा दी? आश्चर्य की बात है कि आज पंजाब में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार है लेकिन लंदन में बैठे ये लोग पंजाब में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या करवा रहे हैं। स्टिंग में ये दावा करते हैं कि पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव में इन्होंने आम आदमी पार्टी को पैसा दिया। आम आदमी पार्टी क्या पंजाब में संघ के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी?

स्टिंग में किसने क्या कहा और उसके पीछे कौन है, सब जानते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बताने के नेरेटिव का इस्तेमाल अब पाकिस्तान भी खुल कर कर रहा है। इस बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान पर हमला किया तो पलट कर उसने संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बता कर हमला किया। संघ को ‘हिंदू आतंकी’ के रूप में बदनाम करने की साजिश कांग्रेस ने पाकिस्तान के इशारे पर की या पाकिस्तान ने कांग्रेस के दुष्प्रचार का दुरूपयोग किया, इसकी जांच होनी ही चाहिए। जो भी हो, चाहे कांग्रेस हो या पाकिस्तान दोनों में एक बात तो काॅमन है – हिंदुओं के प्रति नफरत। ये भी सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल देश में तो संघ के प्रति नफरत फैलाते हैं, विदेश में भी उसका अपमान करने से बाज नहीं आते जबकि वहां उनके अनर्गल वक्तवयों का जवाब देने संघ का कोई कार्यकर्ता भी मौजूद नहीं होता।

भारत से लेकर पाकिस्तान और इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक दुनिया भर में जिस प्रकार इस्लामिक आतंकी संगठन और ईसाई चर्च संघ पर निशाना साध रहे हैं, उसका गहन अध्ययन होना चाहिए। इसके लिए कौन से देशी-विदेशी संगठन और राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और उनका आपस में क्या संबंध है, उस पर विचार होना ही चाहिए। बहरहाल इतना तो साफ है कि भारत में कांग्रेस, टीएमसी, सीपीएम, राजद, सपा आदि जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां के कट्टर इस्लामिक दल भी आज संघ को निशाना बना रहे हैं। सब एक ही जुबान बोल रहे हैें और सबका एक ही मकसद है – इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने या उससे ध्यान हटाने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का हौवा खड़ा करना। इस मामले में आईएसआई, कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों से दस कदम आगे है। उसके टुकड़ों पर पलने वाले कश्मीरी, खालिस्तानी, बांग्लादेशी, बर्मी आतंकी सभी अब एक स्वर से इसका जाप कर रहे हैं।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में दिल्ली के विज्ञान भवन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष मजबूती और स्पष्टता से रखा था। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अब जरूरी है कि संघ विश्व समुदाय के साथ वैचारिक आदान-प्रदान और प्रगाढ़ करे और अपने उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण सामाजिक सांस्कृतिक योगदान और परियोजनाओं के विषय में उन्हें अधिक जानकारी दे।

“ऐतिहासिक है संघ प्रमुख मोहन भागवत का विज्ञान भवन व्याख्यान” in Punjab Kesari

भ्रष्टाचार के कीचड़ में अच्छी तरह नहाए-धोए, लिपटे, सने, डूबे फर्जी गांधी परिवार के पूत राहुल (सपूत या कपूत ये आप तय करिए) पूछ रहे हैं कि देश को संगठित करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कौन होता है, देश को संगठित होना होगा तो वो खुद हो जाएगा। राहुल जैसा आदमी, जिसकी पूरी चुनाव नीति अंधी इस्लामिक-ईसाई सांप्रदायिकता, नफरत, दुष्प्रचार, देशद्रोहियों से सांठगांठ, अलगाववाद, क्षेत्रीय-जातीय विभाजन पर आधारित हो, अगर ऐसे सवाल न पूछता तो आश्यर्च होता। असल में राहुल और उनके पूर्वजों ने संघ के खिलाफ नफरत फैलाने की दसियों साल से लगातार साजिश की। अब जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में इसका जवाब सकारात्मकता, सम्मान और स्नेह से दिया तो वो तिलमिला गए। संसद में प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाकर ‘प्यार का ढोंग’ करने वाले राहुल को समझ नहीं आया कि भागवत को क्या जवाब दें? उन्हें लग रहा है कि समावेशी संस्कृति की बात करके भागवत कहीं उन लोगों को कांग्रेस से दूर न कर दें जिन्हें ‘हिंदुओं का हौवा’ दिखाकर कांग्रेस ने अपने साथ रखने की कोशिश की है।

कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भागवत की व्याख्यान माला ने वास्तव में इतिहास रच दिया। कांग्रेस और सीपीएम जैसी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों ने बड़ी मेहनत से कई दशकों तक संघ की जैसी तस्वीर बनाने की कोशिश की थी, भागवत ने एक झटके में उसके चीथड़े उड़ा दिए। ऐसा नहीं है कि उन्होंने ये या ऐसे विचार पहले नहीं व्यक्त किए, लेकिन ये पहली बार हुआ जब दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विज्ञान भवन से उन्होंने विश्व को संबोधित किया और दुनिया ने न केवल उन्हें ध्यान से सुना, बल्कि उन्होंने जो कहा उसे गहराई से गुना भी।

उनके संबोधन से सबसे ज्यादा निराशा तो कांग्रेस जैसी सीआईसी पार्टियों को हुई जिन्होंने संघ को ‘हिंदू सांप्रदायिक’ ठहरा कर इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उनके मुंह पर जोरदार तमाचा तब लगा जब भागवत ने कहा कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व संभव ही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, ”हिंदू राष्ट्र का अर्थ ये नहीं कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा उस दिन हिंदुत्व ही नहीं रहेगा। हिंदुत्व तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है।“

उन्होंने कहा, ”संघ ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को नहीं मानता। हम तो सबको अपना मानते हैं। यह शब्द ब्रिटिश काल में भारत आया, पहले ये नहीं था। मेरा मानना है कि जिन मुस्लिम बस्तियों के पास संघ की शाखा है, वहां मुस्लिम ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मैं तो कहता हूं सबको संघ में आकर संघ को देखना चाहिए और अगर हमारी बात में कोई कमी मिले तो फिर कहिए“।

वो यहीं नहीं रूके, उन्होंने संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकर की विवादित पुस्तक ‘बंच आॅफ थाॅट्स’ के बारे में भी खुल कर अपने विचार रखे जिसमें मुसलमानों पर कुछ कथित रूप से विवादित टिप्पणियां की गईं हैं। उन्होंने कहा, “‘बंच आॅफ थाॅट्स’ गुरू जी के भाषणों का संग्रह है जो एक विशिष्ट संदर्भ में दिए गए थे और वो शाश्वत नहीं हैं। संघ हठधर्मी नहीं है, जैसे समय बदलता है, वैसे हमारे विचार भी बदलते हैं। डाॅक्टर हेडगेवार ने कहा था हम बदलते समय के अनुसार खुद को ढालने के लिए स्वतंत्र हैं।”

सीआईसी कांग्रेस ने संघ को ‘हिंदू आतंकवादी संगठन’ घोषित करने की भरपूर साजिश की। हेट प्रीचर जाकिर नायक को शांति का मसीहा बताने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने तो मुंबई हमलों पर एक किताब का विमोचन तक किया जिसका नाम था – ‘मुंबई हमले, आरएसएस की साजिश’। लेकिन भागवत ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के योगदान की प्रशंसा की और कहा कि इस पार्टी में भी अनेक ऐसे महानुभाव हुए जिनसे हम अब भी प्रेरणा लेते हैं। ध्यान रहे, उन्होंने सोनिया और राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर तो कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन ये अवश्य कहा, “हम लोग तो सर्वलोक युक्त भारत वाले लोग हैं, मुक्त वाले नहीं हैं”।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे समय तक संघ के बारे में ये छवि बनाने की कोशिश की कि संघ में तानाशाही चलती है और वो भारत के झंडे और संविधान को नहीं मानता। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया, “संविधान में सभी भारतीयों की सहमति है। इसका पालन करना हम सबका कर्तव्य है….मैंने जो कुछ भी कहा है वो संविधान के अनुसार ही कहा है। संघ संविधान की प्रधानता स्वीकार करता है और हम इसका पूरी तरह सम्मान करते हैं”।

यूपीए के जमाने में कहने को तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन असली राज तो 10 जनपथ से चलता था। सब मनमोहन सरकार को ‘रिमोट कंट्रोल’ सरकार कहते थे। इसके जवाब में सीआईसी कांग्रेस ने भ्रम फैलाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार का रिमोट कंट्रोल नागपुर स्थित संघ के कार्यालय में है। भागवत ने इसे सरासर गलत बताया, ”अक्सर लोग कयास लगाते हैं कि मोदी सरकार के किसी निर्णय के लिए संघ मुख्यालय से फोन आया होगा, ये निराधार है। सरकार में जो लोग काम कर रहे हैं, वो वरिष्ठ हैं और राजनीति में उनका अनुभव हमसे भी कहीं अधिक है। भाजपा न तो किसी सलाह के लिए हम पर निर्भर रहती है और न ही हम सलाह देते हैं। अगर उन्हें कोई सुझाव चाहिए होता है और हमारे पास देने के लिए कुछ होता है तो हम देते हैं“।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे अर्से तक संघ को ‘ब्राह्मणवादी’, ‘मनुवादी’ कह कर एक खास वर्ग से बांधने की कोशिश की और ये प्रचार किया कि संघ आरक्षण विरोधी है। संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि, “हम किसी की जाति नहीं पूछते। हम विषमता में विश्वास नहीं रखते। हम चाहते हैं कि जाति विभेद पूरी तरह समाप्त हो, लेकिन ये लंबी यात्रा है। हम अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं हैं। अगर देश में सर्वे करवाया जाए तो संघ के स्वयंसेवकों में अंतरजातीय विवाह के उदाहरण सबसे ज्यादा मिलेंगे”। उन्होंने बिना लागलपेट के कहा, “संघ सामाजिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। संविधान सम्मत सभी तरह के आरक्षण का संघ समर्थन करता है। हमारे संविधान में सामाजिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ये जारी रहना चाहिए, ऐसा संघ का विचार है। समस्या आरक्षण से नहीं, इसपर होने वाली राजनीति से है। सवाल ये है कि समाज में बराबरी कैसे आएगी? तो जो ऊपर हैं, वो थोड़ा नीचे झुकेंगे और जो नीचे हैं वे एड़ियां ऊंची करेंगे तब ही बराबरी आएगी। समाज के कुछ वर्गों को निर्बल हमने बनाया है। निर्बल रहे समाज के वर्गों को ऊपर लाने के लिए हमें सौ-डेढ़ सौ साल परेशानी आती है तो भी उसे हमें स्वीकार करना होगा”।

गाय के नाम पर देश के कुछ हिस्सों में हिंसक घटनाएं हुईं। सीआईसी पार्टियों ने आंख मूंद कर इसके लिए संघ और उसके सहयोगी संगठनों को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि वो अब तक एक भी घटना में संघ का हाथ नहीं साबित कर पाए। इस विषय पर उन्होंने कहा, “गाय के नाम पर हत्या करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। गाय या किसी भी विषय पर हिंसा करना अनुचित है। कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चहिए”।

सीआईसी पार्टियां अक्सर संघ को दकियानूस बताकर उसे महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करती रहीं हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल तो इस विषय में बिना जाने-समझे कुछ भी बोलते रहे हैं। भागवत ने महिलाओं के लिए बराबरी के दर्जे की वकालत की। उन्होंने कहा कि हम महिलाओं को जगदंबा स्वरूप मान कर पूजा तो करते हैं परंतु वास्तव में उनकी हालत बहुत खराब है। हमें उनकी स्वतंत्रता और सशक्तीकरण के लिए काम करने की आवश्यकता है और इसकी शुरूआत घर से ही करनी होगी।

स्पष्ट है संघ प्रमुख ने देश-समाज से जुड़े हर महत्वपूर्ण विषय पर विचार रखे। लेकिन उनके विचारों के मूल में एक ही सूत्र था – देश प्रथम, वस्तुस्थित का ईमानादारी से संज्ञान लेना और देश के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करना। संभवतः यही कारण था कि उन्होंने कश्मीर में अलगाववाद और इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाले अनुच्छेद 35 ए और 370 का निःसंकोच विरोध किया। कुल मिलाकर भागवत ने स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि संघ का उद्देश्य भारतीय नागरिकों का नैतिक और चारित्रिक विकास है ताकि व्यवस्थागत कमियों के बावजूद वो अपने कंधों पर देश को नई ऊंचाई तक ले जा सकें। संघ समाज में एकता, नैतिकता और शुचिता का पक्षधर है, इसलिए वो संगठन में भी इसका पूरा ध्यान रखता है।

आज चार करोड़ से भी अधिक लोग दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े हैं। रोज इसकी 60,000 से अधिक शाखाएं लगती हैं। संघ से प्रेरित तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं देश भर में 1,70,000 से ज्यादा समाजकल्याण की परियोजनाएं चला रही हैं जिनका सबसे अधिक लाभ दलित-आदिवासी वर्ग को होता है। संघ के अमूल्य और अतुलनीय सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान के बावजूद सीआईसी पार्टियों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण इसे सिर्फ कट्टरवादी हिंदू संगठन के रूप में पेश किया। लेकिन भागवत ने इसकी परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्मांधता के खिलाफ सचेत किया, “विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले डेढ़ से दो हजार साल में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम पर बहुत अधर्म हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। सबसे पहले हिंदू को सच्चा और अच्छा हिंदू बनना पड़ेगा“।

कहना न होगा भागवत ने ये साबित कर दिया कि अगर भारत में सच्चे अर्थों में कोई प्रगतिशील, उदारवादी, सुधारवादी, समावेशी, आधुनिक, राष्ट्रवादी संगठन है तो वो है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

‘Urban Naxals is not just a phrase, it’s a real threat to India’ in The Sunday Guardian

Entrepreneur Lalita Nijhawan exposes the Maoist modus operandi in urban areas to garner ideological support from intellectuals and academicians.

 

Lalita Nijhawan, a multifaceted woman entrepreneur, has been extensively supporting the academic debates on the issue of “Urban Naxalism”. She leads a travel conglomerate and owns Nijhawan Group of Companies which has diverse business modules across the country. Nijhawan tells The Sunday Guardian how “vulture politics” around caste, secessionism and nationalism drove her to form the Group of Intellectuals and Academics (GIA), a women’s forum working towards creating a nationalist intellectual space in the country. Excerpts:

Q: GIA has been organising seminars and debates on the Urban Naxal issue. According to you, how big is this Naxal problem for the country?

A: GIA is a forum of professional and expressive women that took shape in 2015, to question the hypocritical and exclusionary intellectual space claimed by a certain group. It came into being amidst a rhetoric and hysteric atmosphere created by anti-national campaigns in the country. The GIA team includes a Presidential awardee, pro-vice chancellors, noted mountaineers, dancers of international fame, senior advocates, university teachers, journalists and entrepreneurs. We conduct monthly seminars on vital current issues, publications, press conferences, marches and public signature campaigns to draw the attention of the society towards the vulture politics around caste, secessionism and nationalism.

We take these issues to concerned authorities and, on the basis of our fact-finding reports, we try to convince the governments to make changes in their policies. The GIA takes up different issues which ails the country. Urban Naxalism is just one of them but there are other issues too which the GIA has worked on. These issues include Jisha case, Triple Talaq, Kathua case, nationalism, women empowerment, exposing the anti-national hate-monger brigade, etc.

Q: Do you think “Urban Naxalism” is not just a phrase but a real threat to the internal security of the country?

A: Of course it is not just a phrase but a real threat to our internal security. The latest government data shows that 90 districts of the country are currently Naxal affected. All these districts fall within rural areas with extreme levels of poverty and total lack of development. But their modus operandi in urban areas is a part of the Maoist strategy that has extensively been detailed and documented in the “Strategies and Tactics” document of the central committee of Communist Party of India (Maoist). This is the phenomenon of Urban Naxalism which is defined as the Maoist Naxal network of Left-wing intellectuals and students present in the universities, cultural organisations and civil society networks in towns and cities.

Q:  Do you think that Naxalism is still alive due to the ideological support it’s getting from the Urban Naxals sitting in the metropolitan cities?

A: As discussed above, Naxalism is the real threat to our internal security and Urban Naxalism is nothing but the backbone of Naxalism. Without that ideological support, it is not possible for anyone to go against the sovereignty and integrity of a nation to this extent.

Q: What inspired you to set up GIA? What are the works done by the group in the recent past?

A: For past few years, we all are witnessing a hazardous challenge in front of us and that is of creating a fake narrative. Now-a-days, a section of the media first creates a narrative among the target audience and then disseminates information which are spoon-fed to them instead of investigating things on the ground level and presenting facts. Everyone around tend to believe whatever they learn from the media. GIA is an effort to present a different and fact-based narrative to the people.

“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

“नक्सलवादः आग से खेल रहे हैं राहुल गांधी” in Punjab Kesari

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नयर ने अपनी जीवनी ‘बियोंड द लाइंस’ में विस्तार से बताया है कि कैसे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में अकाली दल – जनता दल सरकार को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया। वो लिखते हैंः

“राजनीतिक सरजमीं पर भिंडरावाले का उदय 1977 में हुआ जब अकाली दल – जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा कर पंजाब में सरकार बनाई। जैल सिंह, हारने वाले मुख्यमंत्री जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने, सबसे ज्यादा नाखुश थे। एक तो उनकी सरकार चली गई थी और दूसरे गुरदयाल सिंह ढिल्लों कमीशन ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अधिकारों के दुरूपयोग का दोषी पाया था। ये कमीशन मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कामकाज की समीक्षा के लिए बनाया गया था।

संजय गांधी, जो अपने एक्स्ट्रा-काॅंस्टीट्यूशनल तौर-तरीकों के लिए जाने जाते थे, ने सुझाव दिया कि अकाली सरकार को चुनौती देने के लिए किसी ‘संत’ को आगे बढ़ाया जाए। संजय और जैल सिंह, खासतौर से जैल सिंह को अच्छी तरह से पता था कि कैसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने अकालियों से लोहा लिया था और कैसे उन्होंने सख्त स्वभाव अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को पटखनी देने के लिए संत फतेह सिंह को खड़ा किया था।”

कांग्रेस के भिंडरावाले को आगे बढ़ाने के फैसले ने आगे चल कर क्या गुल खिलाया, कैसे पंजाब ही नहीं पूरे उत्तरा भारत में खालिस्तानी आतंक का नंगा नाच हुआ, कैसे आॅपरेशन ब्लू स्टार हुआ, कैसे इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद कैसे और किसके द्वारा हजारों सिखों का नरसंहार हुआ, ये एक लंबी और दुखद कहानी है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस के वर्तनाम नेतृत्व ने इस से कोई सबक सिखा है?

अस्सी के दशक में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती श्री लंका में की। दक्षिण में एक के बाद एक चुनाव हार रही इंदिरा गांधी को लगा कि अगर वो श्री लंका में अपनी उपेक्षा के कारण आंदोलित तमिलों की मदद करेंगी तो उन्हें तमिलनाडु में तमिलों के वोट मिलेंगे। कांग्रेस को खोया हुआ जनाधार वापस मिल सकेगा। अगर लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल इलम (एलटीटीई) के पूर्व प्रमुख कुमारन पथमंथन उर्फ केपी की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने एलटीटीई की मदद की। बाद में जब एलटीटीई हाथ से निकलता दिखाई दिया तो कांग्रेस ने इससे हाथ खींच लिए। यही नहीं राजीव गांधी ने तमिल आतंकियों से लड़ने के लिए ‘पीस कीपिंग फोर्स’ भी भेजी। इसका नतीजा क्या रहा? एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।

सवाल ये है कि क्या खालिस्तानियों और तमिल आतंकियों को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने कोई सबक सीखा?

अब कश्मीर को लें। वर्ष 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। भारतीय फौज पाकिस्तानियों का मुकाबला कर ही रही थी कि जवाहर लाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। उन्होंने अपनी हरकतों से भारत को जो नासूर दिया, वो सबके सामने है। बाकी की रही सही कसर राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने 1987 में पूरी कर दी जब वहां विधान सभा चुनावों को फर्जी ठहरा कर अलगाववादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद पाक समर्थित आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर राज्य से भगाया गया और फिर विदेशी ताकतों के इशारे पर हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया। कांग्रेस, अलगाववादियों और आतंकियों के इस पूरे नंगे नाच को खामोश समर्थन देती रही। इसका क्या परिणाम निकला, वो बताने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सवाल फिर वही – क्या कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने इस प्रकरण से भी कोई सबक सीखा?

चाहे मसला कश्मीर का हो या खालिस्तान का या श्री लंका के तमिल आतंकियों का, स्पष्ट है कि वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और अपने पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। वैसे सवाल ये है कि इन घातक गलतियों का सबक क्या है? सबक बड़ा सादा है – अगर कोई राजनीतिक दल आतंकियों को बढ़ावा देता है तो कल को वहीं आतंकी उस पर भी हमला कर सकते हैं।

लेकिन हम आखिर ऐसा कह क्यों रहे हैं कि राहुल ने पार्टी और पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा? इसका कारण है उनका देशद्रोही नक्सलियों को खुले आम और पूर्ण समर्थन। आश्चर्य की बात तो ये है कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नक्सलवादी आतंकी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इस्लामिक आतंकियों से भी बड़ा। मनमोहन सरकार ने तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में ये भी कहा था कि अर्बन नक्सल और उनके समर्थक, जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना – पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई वैध सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं और लोगों को उसके खिलाफ भड़काते हैं।

आज हम इस बात को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जैसे अर्बन नक्सल और उनके कांग्रेसी और अन्य समर्थक एक स्वर से मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं, वो किसी से छुपा नहीं है। ये दावा करते हैं कि देश में आपातकाल है और मतभिन्नता को दबाया और कुचला जा रहा है। कोई इनसे सिर्फ एक आसान सा सवाल पूछे – अगर तुम्हें दबाया जा रहा होता तो तुम संवादादाता सम्मेलन कैसे कर पाते? तुम जो मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में झूठा प्रचार कर रहे हो, वो कैसे कर पाते? वैसे भी ये जिन अर्बन नक्सलियों को ‘बुद्धिजीवी’, ‘लेखक’, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ आदि बता रहे हैं, उनके खिलाफ पुलिस के पास पूरे सबूत हैं कि कैसे ये देश की सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रच रहे थे, कैसे इन सबका प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति से सीधा राब्ता था और ये कैसे उसके आदेशों पर न केवल अराजकता फैला रहे थे, बल्कि उसके लिए धन, हथियार आदि की व्यवस्था भी कर रहे थे। सीधी सी बात है अर्बन नक्सलियों को जंगल में बैठे उनके आकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। ये पाप में बराबरी के भागीदार हैं।

लेकिन राहुल गांधी को जैसे ये सब दिख ही नहीं रहा या वो इसे देखना ही नहीं चाहते। जैसा कि इतिहास गवाह है, आतंक और हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले नक्सलियों से सांठगांठ राहुल को उलटी भी पड़ सकती है। राहुल सोच रहे होंगे कि मैं चाणक्य की तरह मोदी के खिलाफ नक्सलियों का इस्तेमाल कर रहा हूं और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों और नक्सलियों का मोर्चा बना रहा हूं जिसमें जब दूसरे विपक्षी दल भी शामिल होंगे तो मेरी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। नक्सली दलितों को मोदी के खिलाफ भड़काएंगे, देश में व्यापक हिंसा करेंगे और मैं इस अराजकता के बीच कहूंगा कि मोदी देश नहीं संभाल सकते, अब बस मैं ही एक विकल्प हूं। राहुल गांधी के चीन से बढ़ते प्रेम के बीच लोग अब ये भी पूछने लगे हैं कि क्या राहुल, नक्सलियों और चीन के बीच कोई संबंध है? क्या चीन राहुल को भारत में प्रमोट कर रहा है और इसके लिए नक्सलियों का प्रयोग किया जा रहा है?

खेल चाहे जो हो। इसमें नक्सलियों का ज्यादा फायदा है। वो सोच रहे होंगे कि हम महत्वाकांक्षी राहुल गांधी के कंधों पर सवार होकर देश के कोने-कोने में फैल जाएंगे और जब हमारा काम निकल जाएगा तो उसका सफाया कर देंगे। नक्सलियों की प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) को देश की सबसे पुरानी पार्टी खुलेआम समर्थन दे, उससे बेहतर उसके लिए क्या हो सकता है? फिर कांग्रेस तो उन्हें सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ ही नहीं, पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। ये बात हमने भीमा कोरेगांव मामले में छह जून को दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सल रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिले पत्रों में भी देखी थी जिसमें एक काॅमरेड दूसरे काॅमरेड को कह रहा है कि अगर हम दलितों को आंदोलित करें तो कांग्रेस हमें पैसा और कानूनी सहायता देगी। जब 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सलियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सबने देखा कि कांग्रेस के वकीलों की पूरी फौज उनकी पैरवी में उतर पड़ी। इनमें अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, दुष्यंत दवे आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कांग्रेस के अनेक वकील जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में नक्सलियों के मुकदमें लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही नक्सलियों से सांठगांठ है? 28 अगस्त को अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद हमने देखा सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सदस्य रहे हर्ष मंदार और अरूणा राॅय जैसे लोग खुल कर अर्बन नक्सलियों के समर्थन में सामने आ गए। अर्बन नक्सलियों ने 30 अगस्त को दिल्ली में जो प्रेस काॅफ्रेंस की उसमें अरूणा राय शामिल हुई और इसमें बाकायदा कांग्रेसी वकीलों को धन्यवाद भी दिया गया। यूपीए के जमाने में हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करने वाली अरूंधति राॅय भी इसमें शामिल हुईं। दिलचस्प बात तो ये है कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल में उसकी तस्वीर भी इस्तेमाल की जैसे वो उसकी अलगाववादी घटिया सोच को मान्यता दे रही हो। इसमें राहुल गांधी के करीबी अर्बन नक्सल जिग्नेश मेवानी भी शामिल हुए। कुल मिलाकर अर्बन नक्सलियों के इस संवाददाता सम्मेलन में परोक्ष में कांग्रेस ही छायी रही।

नक्सलियों को कांग्रेस का समर्थन किस हद तक है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया की जांच करनी चाहिए। यहां सारे कांग्रेसी पत्रकार, वकील, तीस्ता सीतलवाड़ और जाॅन दयाल जैसे फर्जी मानवाधिकार कार्यकर्ता पूरा दम लगाकर प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के अर्बन नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं।

जिन अर्बन नक्सलियों के लिए राहुल गांधी, उनकी पार्टी और चेले इतने व्यथित हो रहे हैं, असल में यूपीए के कार्यकाल में खुद उनकी पार्टी ने उन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था जिनके ये सदस्य हैं। असल में दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। भीमा कोरेगांव केस में छह जून और 28 अगस्त को जो दस अर्बन नक्सल पकड़े गए हैं, उनमें से सात तो इन्हीं संस्थाओं में काम करते हैं। ये हैं – वरवर राव, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, अरूण फरेरा, वर्नन गोेंजालविस और महेश राउत। इनमें से ज्यादातर पर पहले ही मुकदमे दर्ज हैं और कई तो सजा भी काट चुके हैं। इनके देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी षडयंत्रों, दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय हथियार सप्लायरस से संपर्क हैं। भारतीय सेना के प्रति इनकी नफरत जगजाहिर है।

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“देशभक्ति और राष्ट्रवादः चीन से सबक लें भारत के कम्युनिस्ट” in Punjab Kesari

भारतीय कम्युनिस्ट…माफ कीजिएगा भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट अपने देशद्रोही तौेर तरीकों और राजनीतिक हत्याओं के लिए बदनाम हैं। इनका ये देशद्रोही रवैया आजादी के पहले से चला आ रहा है। इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का अपमान ही नहीं किया, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे कद्दावर नेताओं को अपशब्द कहे और देश के विभाजन का समर्थन भी किया। 1962 की लड़ाई में इन्होंने बेशर्मी से चीन का साथ दिया। अपनी हत्यारी, विघटनकारी और राष्ट्रविरोधी विचारधारा के चलते ये लगातार भारत में बाहरी ताकतों की सहायता से चलाए जा रहे आतंकवादी, अलगाववादी हिंसक आंदोलनों का समर्थन करते रहे हैं। ये यहीं रूक जाते तब भी गनीमत थी, ये धर्मनिरपेक्षता के चोले में प्रतिगामी इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरवाद का समर्थन भी करते हैं। शायद यही वजह है कि क्रूर आईएस में सबसे ज्यादा मुसलमान लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) शासित केरल से ही गए।

भारत की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों और देश के 90,000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा जमा कर बैठे माओवादियों का चीन से गहरा नाता है। इन्होंने मानवाधिकारों के तिरस्कार और राजनीतिक विरोधियों की हत्या की सीख चीन से बखूबी ली है, वैसे ये इनकी विचारधारा के मूलभूत तत्वों में भी शामिल हैं। लेकिन ये चीन से कुछ अच्छी बातें भी सीख सकते थे जो इन्होंने शायद जानबूझ कर नहीं सीखीं क्योंकि ये इनकी विचारधारा से ज्यादा इनके निहित स्वार्थों के विपरीत हैं।

इन्हें चीन से जो चीज सबसे पहले और सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है वह है – प्रबल राष्ट्रवाद और देशभक्ति। भारत में जब भी कोई देश प्रेम या देश के लिए बलिदान होने की बात करता है तो सबसे पहले कम्युनिस्ट ही उसका मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं। उसे फासिस्ट बताया जाता है, उसे दकियानूस साबित करने की हरसंभव कोशिश की जाती है और उसे आधुनिकता और उदारवाद का विरोधी करार दिया जाता है। हालांकि अभी तक ये साबित नहीं कर पाए हैं कि देश से प्रेम करना और उसके प्रति वफादार होना कैसे उदारवाद और आधुनिकता विरोधी है और क्योंकर देश को गाली देना ही खुलेपन और आधुनिकता की निशानी माना जाए। अपनी इसी विकृत विचारधारा के कारण ये हमेशा से देश की सेना का मजाक उड़ाते रहे हैं और उसके खिलाफ शत्रुओं को समर्थन देते रहे हैं। मेजर रितुल गोगोई मामले में कैसे सारे कम्युनिस्ट और नक्सली सेना के खिलाफ एकजुट हो गए, वो देश शायद ही कभी भूल पाए। हम कैसे भूल सकते हैं कि जब अप्रैल 2010 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए थे तब इन्होंने कैसे जश्न मनाया था और मिठाइयां बांटी थीं।

भारत के कम्युनिस्टों और नक्सलियों की विकृत राष्ट्रद्रोही नीतियों के उलट चीन में कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ से ही प्रबल राष्ट्रवाद और यहां तक ही विकृत विस्तारवादी राष्ट्रवाद की समर्थक रही है। इसी विस्तारवादी नीति के कारण उन्होंने तिब्बत हड़पा, अक्साई चीन पर कब्जा जमाया और अब भी अरूणाचल प्रदेश समेत भारत के अनेक हिस्सों पर दावा ठोक रहे हैं। यही नहीं अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी उनका यही रवैया है। चाहे जापान हो, वियतनाम हो, भूटान हो या ताईवान, चीन का शायद ही कोई पड़ोसी होगा जो उसके विस्तारवादी रवैये से परेशान नहीं होगा। अब तो चीन सिर्फ जमीन पर ही नहीं, समुद्री मार्गों पर भी कब्जा जमाने में लग गया है। वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट और साउथ चाइना सी का विवाद इसी का परिणाम है। आज दुनिया भर की ताकतें चीन पर आरोप लगा रही हैं कि वो आर्थिक रूप से कमजोर देशों को ऊंची दरों पर कर्जा देकर उन्हें अपने जाल में फैला रहा है और एक नए किस्म के आर्थिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहा है।

भारत के कम्युनिस्ट और नक्सल कभी चीन के विस्तारवादी राष्ट्रवाद पर उंगली नहीं उठाते, लेकिन देश की राष्ट्रवादी पार्टियों का मजाक उडाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बेहतर हो ये देश को तोड़ने का एजेंडा छोड़ कर अपने प्रेरणा स्रोत और पितृ देश चीन की तरह भारत की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करें।
भारत में जब राष्ट्र के मूलभूत प्रतीकों जैसे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत या तिरंगे के सम्मान की बात उठती है तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। ये इनकी विचारधारा के अनुरूप तो है ही, इससे इन्हें कट्टरवादी मुसलमानांे को पोटने का मौका मिलता है जो मानते हैं कि वो मुसलमान पहले हैं और उनके लिए मुस्लिम बिरादरी भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर हम इस मामले में भारत की तुलना चीन से करें तो पता लगेगा कि वहां कम्युनिस्ट पार्टी नागरिकों को देशभक्ति सिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसी वर्ष सितंबर में नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘नेशनल एनथम लाॅ’ को मंजूरी दी। इसके अनुसार पूरे देश में प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में राष्ट्रगान बजाया और गाया जाना चाहिए। इस कानून के मुताबिक राष्ट्रगान देशभक्ति की शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। चीन का संविधान कहता है कि “चीनियों को अपने देश और लोगों को प्यार करना चाहिए…उन्हें देशभक्ति, सामूहिकता, अंतरराष्ट्रवाद और साम्यवाद की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसके अलावा शिक्षा से जुड़े कानून कहते हैं कि छात्रों को हर स्तर पर देशभक्ति की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षकों से संबंधित कानून के अनुसार देशभक्ति की शिक्षा देना अध्यापकों का कर्तव्य है। स्वयं राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसपर बार बार बल देते रहे हैं। दिसंबर 2015 में शी ने कहा देशभक्ति चीनी राष्ट्र का अध्यात्मिक केंद्र है और देशभक्ति की शिक्षा देश के समूचे शिक्षातंत्र में प्रवाहित होनी चाहिए।

हाल ही में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीें नेशनल कांग्रेस मंे शी जिनपिंग को एक बार फिर राष्ट्रपति चुना गया । जहां भारत के कम्युनिस्ट यहां चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों को समर्थन और बढ़ावा देते हैं, वहीं शी जिनपिंग ने कहा कि ”हम किसी भी ऐसे व्यक्ति को सहन नहीं करेंगे जो देश की एक इंच जमीन भी देश से अलग करने की कोशिश करेगा…..ध्यान रहे खून पानी से ज्यादा गाढ़ा होता है…हमें ऐसे लोगों का सामना करने के लिए देशभक्त ताकतों को मजबूत करना होगा, देशभक्ति का प्रचार करना होगा।“ शी का इशारा ताइवान और हाॅंगकाॅंग की ओर था। ताइवान खुद को अलग देश मानता है। हाॅंगकाॅंग चीन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन वहां लोकतंत्र समर्थक चीनी साम्यवाद का विरोध कर रहे हैं।

भारतीय नेता जब भी देशगौरव या राष्ट्रउत्थान और सशक्तीकरण की बात करते हैं तो सबसे पहले साम्यवादी ताकतें ही उनका विरोध और अपमान करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। इस विषय में इन्हें चीन से सबक लेने की सख्त जरूरत है। 19वीं पार्टी कांग्रेस में शी बहुत शान से बताते हैं कि पिछले पांच साल में चीनी का सकल घरेलू उत्पाद 54 ट्रिलियन डाॅलर से बढ़ कर 80 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच गया। इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रही। इस अवधि में चीन ने सेना के आधुनिकीकरण और सशक्तीकरण के लिए अनेक कदम उठाए। शी ने वर्ष 2050 तक अपनी सेना को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाने का लक्ष्य भी रखा। ध्यान रहे, चीन ने साम्यवादी व्यवस्था होते हुए भी बड़े बड़े पूंजीपतियों को बढ़ावा दिया, लेकिन भारत के कम्युनिस्ट भारत के उद्यमियों को विलेन की तरह चित्रित करने से बाज नहीं आते। चीन अपनी सेना के दम पर दुनिया जीतने का सपना देखता है, लेकिन यहां के साम्यवादी नागरिकों को देश की सेना के खिलाफ भड़काने से बाज नहीं आते।

भारत के कम्युनिस्ट खुद को देश के हजारों वर्ष पुराने इतिहास और संस्कृति से अलग मानते हैं। कहा जाए कि इसे त्याज्य मानते हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्होंने हमेशा ही भारतीय इतिहास को अपने संकीर्ण नजरिए से देखा है जिसके कारण इनके इतिहासकारों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में भयानक विसंगतियां पैदा हो गई हैं। अगर भूले से भी कोई भारतीय अपने इतिहास को स्वर्णिम बता दे या अपने भारतीय होने पर गौरव करे तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसका मान मर्दन करने के लिए बंदूक उठा लेते हैं।

इनके खिलाफ शी जिनपिंग ने अपने भाषण में चीन के 5,000 साल पुराने इतिहास का गर्व से जिक्र किया। वो कहते है -“5,000 साल के इतिहास के साथ हमारे देश ने शानदार सभ्यता रची, दुनिया को महत्वपूर्ण योगदान दिए और हम दुनिया के सबसे महान देशों में से एक बने। लेकिन 1840 के अफीम युद्ध के बाद देश घरेलू विवादों के अंधेरे में डूब गया…….जब से आधुनिक युग शुरू हुआ है देश का कायाकल्प करना और उसे पुरानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना चीनी लोगों का सबसे महान स्वप्न रहा है।“ अगर भारत में कोई भारत को पुरानी बुलंदियों तक पहुंचाने की बात करे तो कम्युनिस्ट तुरंत उसे ‘रिवाइवलिस्ट’ कह कर गाली देना शुरू कर देंगे।

हमारे यहां कम्युनिस्ट संसद पर हमला करने वालों की पैरवी करते हैं, कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानने वाले हुर्रियत के आतंकियों की चैखट पर सजदा करते हैं। ये हमें जबरदस्ती ये पढ़ाने की कोशिश करते हैं कि अलगाववाद की बात करना उदारवाद है और अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है। इनके विपरीत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अलगाववाद तो क्या लोकतंत्र की बात करने वालों तक को सहन नहीं करती। वो लोकतंत्र की मांग करने वालों पर टैंक चलवा देती है (आपको ‘1989 का लोकतंत्र आंदोलन’ और तिअनअनमेन चैक पर छात्रों पर टैंक चलवाना याद होगा), ये चीनी नेल्सन मंडेला कहे जाने वाले ल्यू जिआबो को कैद में डाल देती है। इन्हेें शांति और मानवाधिकारों के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाता है पर चीनी इन्हें जेल में तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर करते हैं। चीन राजनयिक अपने हितों के लिए किस हद तक जा सकते हैं उसे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के प्रति उनके रवैये से समझा जाता है। दलाई लामा दुनिया के जिस भी देश में जाते हैं, उनका दूतावास उसके नेताओं को पहले ही धमकी देने लगता है कि दलाई लामा के स्वागत से उनके संबंध चीन से बिगड़ सकते हैं। जहां चीनी मीडिया हर कूटनीतिक और राजनयिक अभियान में अपने देश का साथ देता है, वहीं यहां के पार्टी कामरेड अपनी सरकार और देश के हितों में पलीता लगाने में ही शान समझते हैं।

भारत के कम्युनिस्ट लंबी चैड़ी बातें तो करते हैं धर्मनिरपेक्षता की, लेकिन बड़ी बेशर्मी से इस्लामिक कट्टरवादियों को प्रश्रय और प्रोत्साहन देते हैं। इनके विपरीत आप उईगुर प्रांत में इस्लामिक कट्टरवादियों और अलगाववादियों के खिलाफ चीनी सरकार का रवैया देखिए। वहां उन्होंने मुसलमानों के रोजा रखने, दाढ़ी बढ़ाने, काले कपड़े पहनने तक पर रोक लगा दी है।

एक बात और, चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया और भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-बड़े पार्टी अधिकारियों तक को जेल की हवा खिला दी। लेकिन हमारे यहां ये खरबों रूपए के घोटालों की आरोपी कांग्रेस और दुनिया की भ्रष्टतम नेताओं में से एक सोनिया गांधी के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं।

अब सोचने की बात ये है कि साम्यवाद तो चीनी भी मानते हैं और भारत के कम्युनिस्ट भी, लेकिन यहां के कम्युनिस्ट अपने देश, उसकी हजारों साल पुरानी संस्कृति, उसके गौरव, उसकी सेना, उसके लोगों की देशभक्ति, वफादारी के खिलाफ क्यों हैं? इन्हें क्यों हिंदुओं से इतनी नफरत है? ये क्यों इस्लामिक कट्टरवादियों और आतंकवादियों के सरपरस्त और खैरख्वाह बने हुए हैं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं – एकः ये अपनी विचारधारा को सर्वोपरी मानते हैं, खुद को अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन का हिस्सा मानते हैं और इनका भारत और उसके इतिहास और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है, इनका लक्ष्य तो किसी भी तरह सत्ता हासिल करना है और इसके लिए भारत विरोधियों को बढ़ावा देना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं। दोः भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट विदेशी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जिनका लक्ष्य देश को तोड़ना और देश में गृहयुद्ध और अराजकता भड़काना है। इनका अपना कोई वजूद नहीं है, ये सिर्फ वैचारिक उपनिवेशवाद और अंधे तरीके से अपने आकाओं का हुकुम बजाने में विश्वास करते हैं।

बात चाहे पहली हो या दूसरी, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि विचारधारा के नाम पर देश को तोड़ने के षडयंत्रों को अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी को देश की अखंडता और एकता से खिलवाड़ का मौका नहीं दिया जा सकता। कम्युनिस्टों का भारत द्रोह का पुराना और वीभत्स इतिहास है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो इन पर प्रतिबंध भी लगाना चाहिए। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं इसे समझाने के लिए हम इनके विघटनकारी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेख समाप्त करेंगे।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का झुकाव साम्यवाद की तरफ था जिसकी भारत ने बड़ी कीमत भी चुकाई, लेकिन स्वयं नेहरू ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को सबक सिखाया था। हैदराबाद का निजाम और उसके रजाकार (सैनिक) भारत में विलय के खिलाफ थे। इसी प्रकार सीपीआई भी भारत में विलय नहीं चाहती थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के बाद निजाम तो भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गया लेकिन सीपाआई के काॅमरेडों ने रजाकारों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी और तेलंगाना के करीब 3,000 गांवों पर कब्जा भी जमा लिया। ये यहां रिपबिल्क आॅफ तेलंगाना स्थापित करना चाहते थे। ये सोचते थे कि जैसे माओ त्से तुंग ने चीन के एक हिस्से येनान पर कब्जे के बाद पूरे देश पर कब्जा कर लिया वैसे ही ये भी तेलंगाना के बाद पूरे भारत को हथिया लेंगे। भारत के खिलाफ इनका गुरिल्ला युद्ध 1951 तक चला। इन्होंने अपनी मुहिम के लिए सोवियत रूस से गुहार लगाई, लेकिन स्टालिन ने इनका साथ नहीं दिया। इसके बाद इनके हौसले पस्त हो गए। ये लोग नेहरू सरकार को ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवादियों का नौकर बताते थे। कहना न होगा नेहरू ने इन्हें अच्छा सबक सिखाया। 1962 में जब कम्युनिस्टों ने बेशर्मी से चीन का साथ दिया तब फिर नेहरू सरकार ने इनके कई नेताओं को सलाखों के पीछे भेजा।

अपनी हरकतों और औंधी सोच की वजह से भारत में कम्युनिस्ट का राजनीतिक प्रभाव धीरे धीरे सीमित हो रहा है लेकिन पत्रकारिता, साहित्य, इतिहास, शिक्षण संस्थानों आदि कई क्षेत्रों में कामरेडों ने कांग्रेस की मदद से गहरी पैठ बना ली है। ये अब भी प्याले में तूफान खड़ा करने और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। अब सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि ये भारत के लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया का नाजायज फायदा न उठा पाएं। सरकार को इनकी हरकतों पर निगाह रखनी चाहिए और जब ये देशद्रोह के आरोपी पाए जाएं, तो तुरंत इन्हें फांसी पर लटकाया जाना चाहिए।