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“नक्सलवादः आग से खेल रहे हैं राहुल गांधी” in Punjab Kesari

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नयर ने अपनी जीवनी ‘बियोंड द लाइंस’ में विस्तार से बताया है कि कैसे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में अकाली दल – जनता दल सरकार को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया। वो लिखते हैंः

“राजनीतिक सरजमीं पर भिंडरावाले का उदय 1977 में हुआ जब अकाली दल – जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा कर पंजाब में सरकार बनाई। जैल सिंह, हारने वाले मुख्यमंत्री जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने, सबसे ज्यादा नाखुश थे। एक तो उनकी सरकार चली गई थी और दूसरे गुरदयाल सिंह ढिल्लों कमीशन ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अधिकारों के दुरूपयोग का दोषी पाया था। ये कमीशन मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कामकाज की समीक्षा के लिए बनाया गया था।

संजय गांधी, जो अपने एक्स्ट्रा-काॅंस्टीट्यूशनल तौर-तरीकों के लिए जाने जाते थे, ने सुझाव दिया कि अकाली सरकार को चुनौती देने के लिए किसी ‘संत’ को आगे बढ़ाया जाए। संजय और जैल सिंह, खासतौर से जैल सिंह को अच्छी तरह से पता था कि कैसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने अकालियों से लोहा लिया था और कैसे उन्होंने सख्त स्वभाव अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को पटखनी देने के लिए संत फतेह सिंह को खड़ा किया था।”

कांग्रेस के भिंडरावाले को आगे बढ़ाने के फैसले ने आगे चल कर क्या गुल खिलाया, कैसे पंजाब ही नहीं पूरे उत्तरा भारत में खालिस्तानी आतंक का नंगा नाच हुआ, कैसे आॅपरेशन ब्लू स्टार हुआ, कैसे इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद कैसे और किसके द्वारा हजारों सिखों का नरसंहार हुआ, ये एक लंबी और दुखद कहानी है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस के वर्तनाम नेतृत्व ने इस से कोई सबक सिखा है?

अस्सी के दशक में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती श्री लंका में की। दक्षिण में एक के बाद एक चुनाव हार रही इंदिरा गांधी को लगा कि अगर वो श्री लंका में अपनी उपेक्षा के कारण आंदोलित तमिलों की मदद करेंगी तो उन्हें तमिलनाडु में तमिलों के वोट मिलेंगे। कांग्रेस को खोया हुआ जनाधार वापस मिल सकेगा। अगर लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल इलम (एलटीटीई) के पूर्व प्रमुख कुमारन पथमंथन उर्फ केपी की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने एलटीटीई की मदद की। बाद में जब एलटीटीई हाथ से निकलता दिखाई दिया तो कांग्रेस ने इससे हाथ खींच लिए। यही नहीं राजीव गांधी ने तमिल आतंकियों से लड़ने के लिए ‘पीस कीपिंग फोर्स’ भी भेजी। इसका नतीजा क्या रहा? एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।

सवाल ये है कि क्या खालिस्तानियों और तमिल आतंकियों को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने कोई सबक सीखा?

अब कश्मीर को लें। वर्ष 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। भारतीय फौज पाकिस्तानियों का मुकाबला कर ही रही थी कि जवाहर लाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। उन्होंने अपनी हरकतों से भारत को जो नासूर दिया, वो सबके सामने है। बाकी की रही सही कसर राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने 1987 में पूरी कर दी जब वहां विधान सभा चुनावों को फर्जी ठहरा कर अलगाववादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद पाक समर्थित आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर राज्य से भगाया गया और फिर विदेशी ताकतों के इशारे पर हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया। कांग्रेस, अलगाववादियों और आतंकियों के इस पूरे नंगे नाच को खामोश समर्थन देती रही। इसका क्या परिणाम निकला, वो बताने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सवाल फिर वही – क्या कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने इस प्रकरण से भी कोई सबक सीखा?

चाहे मसला कश्मीर का हो या खालिस्तान का या श्री लंका के तमिल आतंकियों का, स्पष्ट है कि वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और अपने पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। वैसे सवाल ये है कि इन घातक गलतियों का सबक क्या है? सबक बड़ा सादा है – अगर कोई राजनीतिक दल आतंकियों को बढ़ावा देता है तो कल को वहीं आतंकी उस पर भी हमला कर सकते हैं।

लेकिन हम आखिर ऐसा कह क्यों रहे हैं कि राहुल ने पार्टी और पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा? इसका कारण है उनका देशद्रोही नक्सलियों को खुले आम और पूर्ण समर्थन। आश्चर्य की बात तो ये है कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नक्सलवादी आतंकी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इस्लामिक आतंकियों से भी बड़ा। मनमोहन सरकार ने तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में ये भी कहा था कि अर्बन नक्सल और उनके समर्थक, जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना – पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई वैध सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं और लोगों को उसके खिलाफ भड़काते हैं।

आज हम इस बात को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जैसे अर्बन नक्सल और उनके कांग्रेसी और अन्य समर्थक एक स्वर से मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं, वो किसी से छुपा नहीं है। ये दावा करते हैं कि देश में आपातकाल है और मतभिन्नता को दबाया और कुचला जा रहा है। कोई इनसे सिर्फ एक आसान सा सवाल पूछे – अगर तुम्हें दबाया जा रहा होता तो तुम संवादादाता सम्मेलन कैसे कर पाते? तुम जो मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में झूठा प्रचार कर रहे हो, वो कैसे कर पाते? वैसे भी ये जिन अर्बन नक्सलियों को ‘बुद्धिजीवी’, ‘लेखक’, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ आदि बता रहे हैं, उनके खिलाफ पुलिस के पास पूरे सबूत हैं कि कैसे ये देश की सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रच रहे थे, कैसे इन सबका प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति से सीधा राब्ता था और ये कैसे उसके आदेशों पर न केवल अराजकता फैला रहे थे, बल्कि उसके लिए धन, हथियार आदि की व्यवस्था भी कर रहे थे। सीधी सी बात है अर्बन नक्सलियों को जंगल में बैठे उनके आकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। ये पाप में बराबरी के भागीदार हैं।

लेकिन राहुल गांधी को जैसे ये सब दिख ही नहीं रहा या वो इसे देखना ही नहीं चाहते। जैसा कि इतिहास गवाह है, आतंक और हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले नक्सलियों से सांठगांठ राहुल को उलटी भी पड़ सकती है। राहुल सोच रहे होंगे कि मैं चाणक्य की तरह मोदी के खिलाफ नक्सलियों का इस्तेमाल कर रहा हूं और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों और नक्सलियों का मोर्चा बना रहा हूं जिसमें जब दूसरे विपक्षी दल भी शामिल होंगे तो मेरी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। नक्सली दलितों को मोदी के खिलाफ भड़काएंगे, देश में व्यापक हिंसा करेंगे और मैं इस अराजकता के बीच कहूंगा कि मोदी देश नहीं संभाल सकते, अब बस मैं ही एक विकल्प हूं। राहुल गांधी के चीन से बढ़ते प्रेम के बीच लोग अब ये भी पूछने लगे हैं कि क्या राहुल, नक्सलियों और चीन के बीच कोई संबंध है? क्या चीन राहुल को भारत में प्रमोट कर रहा है और इसके लिए नक्सलियों का प्रयोग किया जा रहा है?

खेल चाहे जो हो। इसमें नक्सलियों का ज्यादा फायदा है। वो सोच रहे होंगे कि हम महत्वाकांक्षी राहुल गांधी के कंधों पर सवार होकर देश के कोने-कोने में फैल जाएंगे और जब हमारा काम निकल जाएगा तो उसका सफाया कर देंगे। नक्सलियों की प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) को देश की सबसे पुरानी पार्टी खुलेआम समर्थन दे, उससे बेहतर उसके लिए क्या हो सकता है? फिर कांग्रेस तो उन्हें सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ ही नहीं, पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। ये बात हमने भीमा कोरेगांव मामले में छह जून को दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सल रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिले पत्रों में भी देखी थी जिसमें एक काॅमरेड दूसरे काॅमरेड को कह रहा है कि अगर हम दलितों को आंदोलित करें तो कांग्रेस हमें पैसा और कानूनी सहायता देगी। जब 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सलियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सबने देखा कि कांग्रेस के वकीलों की पूरी फौज उनकी पैरवी में उतर पड़ी। इनमें अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, दुष्यंत दवे आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कांग्रेस के अनेक वकील जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में नक्सलियों के मुकदमें लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही नक्सलियों से सांठगांठ है? 28 अगस्त को अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद हमने देखा सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सदस्य रहे हर्ष मंदार और अरूणा राॅय जैसे लोग खुल कर अर्बन नक्सलियों के समर्थन में सामने आ गए। अर्बन नक्सलियों ने 30 अगस्त को दिल्ली में जो प्रेस काॅफ्रेंस की उसमें अरूणा राय शामिल हुई और इसमें बाकायदा कांग्रेसी वकीलों को धन्यवाद भी दिया गया। यूपीए के जमाने में हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करने वाली अरूंधति राॅय भी इसमें शामिल हुईं। दिलचस्प बात तो ये है कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल में उसकी तस्वीर भी इस्तेमाल की जैसे वो उसकी अलगाववादी घटिया सोच को मान्यता दे रही हो। इसमें राहुल गांधी के करीबी अर्बन नक्सल जिग्नेश मेवानी भी शामिल हुए। कुल मिलाकर अर्बन नक्सलियों के इस संवाददाता सम्मेलन में परोक्ष में कांग्रेस ही छायी रही।

नक्सलियों को कांग्रेस का समर्थन किस हद तक है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया की जांच करनी चाहिए। यहां सारे कांग्रेसी पत्रकार, वकील, तीस्ता सीतलवाड़ और जाॅन दयाल जैसे फर्जी मानवाधिकार कार्यकर्ता पूरा दम लगाकर प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के अर्बन नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं।

जिन अर्बन नक्सलियों के लिए राहुल गांधी, उनकी पार्टी और चेले इतने व्यथित हो रहे हैं, असल में यूपीए के कार्यकाल में खुद उनकी पार्टी ने उन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था जिनके ये सदस्य हैं। असल में दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। भीमा कोरेगांव केस में छह जून और 28 अगस्त को जो दस अर्बन नक्सल पकड़े गए हैं, उनमें से सात तो इन्हीं संस्थाओं में काम करते हैं। ये हैं – वरवर राव, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, अरूण फरेरा, वर्नन गोेंजालविस और महेश राउत। इनमें से ज्यादातर पर पहले ही मुकदमे दर्ज हैं और कई तो सजा भी काट चुके हैं। इनके देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी षडयंत्रों, दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय हथियार सप्लायरस से संपर्क हैं। भारतीय सेना के प्रति इनकी नफरत जगजाहिर है।

Urban Naxals: The Enemy within

Murders
Demolition of school buildings
Tribal women raped
Civilians kidnapped
Central Reserve Police Force (CRPF) persons killed
Ransoms demanded
and yet Naxals are called revolutionaries and not terrorists.

The complexity of their existence lies in the dual roles they play, one covert as tribal sympathisers and revolutionaries and another overt as extortionists, terrorists, blood hungry rebels.

Since 1972, Naxalite insurgence has shed all capes it donned for relieving the rural people from the Zamindar’s oppression.
The Zamindars have disappeared from the modern day discourse.
Yet the spite of the tribals has remained the same across decades.

In 1972, following the death of Charu Majumdar, the Naxalite movement emerged in a fresh light; a light that blinds the eyes.
In the years that came, the red corridor had painted the town anything but red.
It gave leeway to new appendages, the ‘intellectual terrorists’

 

Somewhere between 4 G (4thgeneration Spectrum) and 4 GW (4thGeneration warfare) India has moved ahead and paradoxically retrogressed.
Some of the mealy mouthed intellectuals have discretely doubled as ‘Urban naxals’.

Urban naxals are the present day liaisons to the Naxalite movement.
They are the new extortionists, the new oppressors, the new roadblocks to development in whose name they thrive.

They have done a meticulous job in remaining hidden for decades.
A harmful nexus of university professors, media men, intelligentsia, IT professionals and medical practitioners has emerged.
Sitting in their comfortable air conditioned rooms, often living off the government’s subsidies, the tax payer’s money; these naxals have been engaging in causing irreversible harm to our nation.

They target the students, who are as naïve as a goat that is about to be butchered and turned into minced meat, after being well fed and well taken care of.
Universities have become the safe havens of these urban intellectual terrorists who deliver instructions, hiding behind their innocent lecturer costumes.
Just like their compatriots, the Naxals who hide in the thickets and undergrowths of the tribal hinterland.
Look around, maybe you’ll find a terrorist, right next to you.

The venomous speech of the intellectual propaganda cannot be denied, the words ‘bharat tere tukde honge’ will echo from the walls of Jawarharlal Nehru University to the entire country.
Pillars of education where debate and discussion have been taken for granted, are hotbeds of left terrorists, discretely introducing students to sinister propaganda.
It is a slow poison and it acts like Cancer, it spreads before you know you have reached Stage 4 GW.

Where students sat under trees and engaged in revered debates with their professors in gurukuls, today the guru has robbed them of knowledge, of intellectual development; he slow poisons them to believe in anti-establishment, destruction, disintegration.
With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

 

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth, our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see.
Macaulay wanted to destruct India’s culture and use it to their advantage by the divide and rule principle.
It appears that the Britishers passed on the beacon of destruction of India to the Congress party. And congress party has made the seat warm for the Naxals.

 

All congress has done in its decade long rule is to masquerade its incapacity by giving out doles to appease what it calls the minority section.
To make sure that they remain a faithful minority vote base, Congress has never truly dug them out of impoverishment.
It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism.

Congress has coordinated well with the Naxalite movement, the urban naxals strive to keep the issue of oppression alive.
While the challenges to this country lay in a plethora of issues such as child labour, sex trafficking, terrorism, substance abuse, the focus has been shifted to secularism, intolerance.
Problems are created, issues are staged and the youth brainwashed.

 

They are like the synapse, whose structure is not definitely visible.
Whose existence is inevitable to pass information from one neuron to another.
The Naxals have spread like the neurons and they use these synapses in the urban area as their linkages, their informants, their underground workers.
These transition points must be exposed, dealt with a blow.
The door to intellectual terrorism must be shut, before it makes the system collapse under its own weight.
Look around before it’s too late!

Urban Naxals: The blood thirsty chameleons

Is Naxalism just an ideology?
Is it followed by the tribals?
Does it have followers in the cities?

The poor have no ideology.
They follow an ideologist, one who paints them a rosier picture.
This ideology was efficiently transcribed by Charu Majumder, who wanted to alleviate poor tribals from the affliction of poverty.
What started in a small town called Naxabari in West Bengal soon spread like wild fire and subsumed the neighbouring states.
It carved a path in the woods, a road not hitherto taken.

While the Zamindari oppression was soon and successfully brought to a excruciating demise. The ideology of the Naxalites didn’t remain incorruptible for long, following the death of Charu Majumdar, the movement lost its purpose and sheen.

The road not taken became the road that should not have been taken.
In order to keep their funds flowing, the Naxals kidnap innocent civilians, through whom they demand a ransom.
They are known to take bribes from trucks that pass through the red corridor.
Reports of looting civilians that pass through the forests are also afloat.

The ideologists turned into mass murderers, they ironically became the enemy they were fighting against.

The spread is out of context if one looks at ‘Zamindari oppression’ as the seat of the movement.
In order to understand how these states came to be roped in, we need to look at the larger ideologues that the Naxals operate on.

The Red corridor developed along Odisha, Chattisgarh, Jharkhand, Andhra Pradesh.
However today, in roads are reaching Delhi, Haryana, Karnataka, Kerala.
The blue print for the future of the red corridor is bereft of buildings, roads, infrastructure, technology and development.
From the undergrowths of the mineral rich states, the chameleons have emerged into the city. The well educated and well aware, entitled, empowered citizens have been roped in their false narratives of growth and development.

The Urban Naxals
Sitting camouflaged behind the bushes and thickets of the jungle, the Naxalites could well orchestrate their guerrilla warfare tactics. However in order to seep into the urban landscape they figured it needed more than physical strength and so began the steady infestation of the mind.
They targeted scapegoats; intellectually pretentious people of the society that occupied the urban hinterlands.

The reach has cast a murky spider web of university lecturers, IT professionals, doctors, engineers, media and the most innocuous of all, students.
Professors have misused their seat of power and tool of empowerment to brainwash the youth of the nation, to drag them into their sorry network of destructive politics.

Universities are making to headlines not for their excellence in education but rather for the political turmoil, the ideological unrest, the intellectual debilitation.

Students are yelling about deconstruction, demolition, unrest. They are being injected the serum of soft terrorism into their brains.
The credit goes to the Maoists who have successfully created the Urban Naxals.

With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth and our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see

But surely such a destructive ideological movement couldn’t have survived without support.
Over its dynastic decade long rule, Congress has warmed the seat for the Naxals, it has handed support to their existence and spread.
Making all odds meet, the politics of destruction has united.

They have ensured that the vicious cycle of poor getting poorer and rich getting richer would remain a cliché for as long as they exist.
Like the age old adage says, “Give a man a fish, and you feed him for a day. Teach a man to fish, and you feed him for a lifetime.”
Congress chose to give fishes and so the mandate remained to give out doles to the poor and continue their cycle of oppression.
This although ensures a faithful vote bank, it never truly gets them out of the quick sand.

It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism

Let us not allow these political narratives to shape our minds and encourage us to become appendages of destruction.
Students of India! Behold! You are above this mediocre fight.
You are the new light that the country is aspiring to become, do not let the camouflaged terrorists dictate your path to development.

Sit back, look around, contemplate and introspect.
Watch your words, scrutinise your actions.
You are wiser than falling prey to the Urban Naxalism.
You are the new leaders!

“चिंताजनक है शहरी नक्सलियों और मुख्यधारा के दलों की सांठगांठ” in Punjab Kesari

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 640 जिलों में से 90 जिले अब भी माओवादी या नक्सली आतंक से पीड़ित हैं। यानी देश के करीब 15 प्रतिशत भूभाग पर उनका कब्जा है। मोदी सरकार का दावा है कि उसके अब तक के कार्यकाल में 44 जिलों को माओवादी आतंकियों के कब्जे से छुड़वाया गया। भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,000 वर्ग किलोमीटर है। इसके 15 प्रतिशत यानी 4,93,050 वर्ग किलोमीटर पर माओवादी आतंकियों का कब्जा है। ये क्षेत्रफल इंग्लैंड के कुल क्षेत्रफल 2,42,495 वर्ग किलोमीटर से लगभग दुगना है अर्थात किसी छोटे-मोटे देश से भी बडे़ भूभाग पर नक्सलियों का कब्जा है।

जाहिर है, ये समस्या छोटी नहीं है। ये अकारण नहीं था कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सली आतंकवाद को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ जंगलों में या सुरक्षित पनाहगाहों में ही रहते हैं? जवाब है नहीं। नक्सली सिर्फ उस इलाके पर कब्जा करके ही संतुष्ट नहीं हैं। उनका असली लक्ष्य तो है – भारत में अराजकताा फैलाना, उसे अस्थिर करना, उसके टुकड़े करना और फिर उसपर कब्जा करना। सिर्फ जंगलों में रह कर वो अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए जरूरी है वो देश के अन्य हिस्सों में भी अपने पैर पसारें, जंगलों के बाहर भी लोगों के बीच अपनी पैठ बनाएं। सरकारी कार्यालयों, मीडिया, पुलिस, प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, विधानसभाओं और लोकसभा में भी घुसपैठ करें। जंगलों से बाहर जो नक्सली चुपचाप अपने काम को अंजाम देते हैं, उन्हें हम अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली कहते हैं।

कभी आपने सोचा कि अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ आधी रात को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने वाले कौन लोग थे? वो कौन हैं जो आतंकियों को फांसी दिए जाने को ‘न्यायिक हत्या’ करार देते हैं और नक्सलियों के हाथों पुलिस वालों के मारे जाने पर जश्न मनाते हैं? वो कौन हैं जो कश्मीरी अलगाववादियों को महिमामंडित करते हैं, हिंदुओं को ‘फासीवादी’ करार देते हैं? ये और कोई नहीं शहरी नक्सली ही हैं। ये अपना नेरेटिव स्थापित करने के लिए फर्जी प्रचार करते हैं और लोगों को बहकाते हैं। हाल ही में जब नक्सलियों की प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की एक कुख्यात शहरी नक्सली शहला राशिद ने ट्वीट किया कि मोदी को नक्सली नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नितिन गडकरी खत्म करना चाहते हैं।

शहला राशिद की बात चली है तो बता दें कि जेएनयू में नक्सली गतिविधियों से परेशान अनेक शिक्षकों ने हाल ही में मीडिया को विश्वविद्यालय परिसर में इनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सबूत दिए। उन्होंने इसके लिए नक्सली विचारधारा वाले शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराया जो छात्रों का ब्रेनवाश करते हैं। वैसे भी वहां अफजल गुरू की बरसी पर हुए हंगामे को कौन भूल सकता है, जब सरेआम भारत विरोधी नारे लगाए गए। उसके बाद कैसे राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, डी राजा आदि वहां नक्सलियों को समर्थन देने पहंुचे, ये भी आप भूले नहीं होंगे। सिर्फ जेएनयू ही क्यों, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, नागपुर विश्विद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि भी इनके अड्डे बने हुए हैं। आपको नक्सली रोहित वेमूला का आत्महत्या प्रकरण तो याद ही होगा जिसे इन्होंने दुनिया भर में बहुत उछाला। रोहित नक्सलियों द्वारा चलाए जा रहे अंबेदकर विचार मंच का सदस्य था जबकि असलियत में अंबेदकर का नक्सलियों से तो क्या, कम्युनिस्टों तक से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। वो तो साम्यवाद के धुर विरोधी थे।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं, मीडिया, अदालतों, गैरसरकारी संगठनों यहां तक कि सरकारी महकमों तक में इनकी गहरी घुसपैठ है। इनका नेटवर्क सिर्फ भारत में ही नहीं, विकसित देशों में भी है। ये बहुत सोची समझी साजिश के तहत राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को उछालते हैं और सरकार पर दबाव बनाते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में इनकी पहुंच और पैठ कितनी गहरी है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 2014 में गिरफ्तार किए गए शहरी नक्सली और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साइंबाबा की रिहाई की अपील की। ध्यान रहे ये वही आयोग है जिसने कुछ ही दिन पहले कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में फर्जी रिपोर्ट जारी की थी।

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि नक्सलियों को पैसा कहां से मिलता है? ये अपने प्रभाव वाले इलाकों में लोगों पर मनमाने कर लगाते हैं और वहां काम करने वाली कंपनियों, ठेकेदारों आदि से वसूली करते हैं। ये मादक पदार्थों, हथियारों और जाली नोटों का कारोबार भी करते हैं। इनके लिए धन एकत्र करने के लिए शहरी नक्सली अलग-अलग नामों से गैरसरकारी संगठन बनाते हैं जो चीन और पाकिस्तान से ही नहीं, अमेरिका और इंग्लैंड आदि से इनके लिए ‘सहायता राशी’ इकट्ठा करते हैं। दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ काम करने वाली ईसाई और इस्लामिक संस्थाएं भी इन्हें काफी पैसा देती हैं। कभी आपने सोचा कि नक्सली इलाकों में ईसाई मिशनरियों पर कोई हमला क्यों नहीं होता? सिर्फ पुलिस, सुरक्षा बल या उनके कथित मुखबिर ही क्यों इनका शिकार बनते हैं?

शहरी नक्सलियों के काम करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। लेकिन ये लोग आमतौर से पहले पिछड़ी बस्तियों में जनकल्याण के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोलते हैं। धीरे-धीरे ये लोगों में आक्रोश भड़काते हैं या अगर कोई मसला पहले से ही गर्म हो तो उसमें आग में घी डालने का काम करते हैं। देसी-विदेशी मीडिया, विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार संगठनों आदि में बैठे इनके साथी तत्परता से इनका साथ देते हैं और जनता के मन में चुनी हुई सरकार की छवि बिगाड़ने का सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रचते हैं। पूरी कोशिश की जाती है कि लोगों का स्थापित व्यवस्था से मोहभंग हो और उसके प्रति आक्रोश बढ़े। आजकल शहरी नक्सली देश-दुनिया में मोदी सरकार की छवि बिगाड़ने और उसे मुस्लिम-दलित विरोधी करार देने की मुहिम छेड़े हुए हैं। इसके पीछे कारण ये है कि ये अपने अलगाववादियों, इस्लामिक आतंकियों और चर्च के नेटवर्क में दलितों को भी शामिल करना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने बहुत सोचे-समझे तरीके से दलित संगठनों में पैठ भी बना ली है। तथाकथित दलित रोहित वेमूला प्रकरण दलितों को भड़काने और उन्हें अपने साथ लाने की साजिश ही तो थी। दुख की बात है कि मुख्यधारा के दलों ने भी इस साजिश में इनका साथ दिया।

नक्सली, दलितों में पहुंच बनाने और उन्हें भड़काने को कोई मौका नहीं छोड़ते। भीमा कोरेगांव में इसी नाम से 200 साल पहले लड़े गए युद्ध की वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, सुधीर धवले आदि के भड़काऊ भाषणों के बाद फैली सुनियोजित हिंसा इसका जीता-जागता सबूत है। इस मामले में पुलिस की चार्जशीट आंखें खोलने वाली है। इसके मुताबिक नक्सली कई महीनों से इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर को खास तौर पर चुना क्योेंकि दलित भीमा कोरेगांव युद्ध को इसलिए याद करते हैं कि इसमें मूलतः दलित सैनिकों वाली ब्रिटिश सेना ने सवर्ण पेशवाओं की सेना को हराया था। अबकी बार इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी, और नक्सली इस अवसर का इस्तेमाल दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काने और अपने साथ लाने के लिए करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए भड़काऊ पोस्टर लगाए, पर्चे बांटे और आखिर में उग्र भाषण करवाए और उसके बाद सुनियोजित हिंसा की गई, अफवाहें फैलाई गईं और जितना हो सकता था, दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काया गया और उनसे दूर किया गया।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विलसन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

इस मामले में में दायर चार्जशीट में संलग्न दस्तावेज शहरी नक्सलियों के काम-काज, उनके सहयोगियों और उनके इरादों पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। एक पत्र में एक कामरेड दूसरे को बता रहा है कि ‘वरिष्ठ कामरेड’ ने ‘कांग्रेस में अपने मित्रों’ से बात कर ली है और वो सवर्ण विरोधी षडयंत्र के लिए पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। एक पत्र में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की हत्या के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि उनके लिए भी वैसा ही षडयंत्र हो जैसा राजीव गांधी की हत्या के लिए किया गया था। यानी उन्हें किसी सार्वजनिक समारोह में मौका मिलते ही खत्म कर दिया जाए।

भीमा कोरेगांव प्रकरण में शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी और उनके षडयंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद, देश-विदेश में इनके समर्थक इनके बचाव में उतर पड़े। इन्हें दलित अधिकार कार्यकर्ता बताया गया और दावा किया गया कि ‘दलित विरोधी, सवर्णवादी’ मोदी सरकार इनकी आवाज दबाने और इन्हें फंसाने की कोशिश कर रही है। इन्हें मानवाधिकारों का मसीहा बताया जा रहा है, जबकि असलियत ये है कि सिर्फ ये पांच ही नहीं, नक्सलियों को पूरा गैंग, संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग देश तोड़ने और बदनाम करने में करता है। ये ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘मानवाधिकारों’ के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं, जबकि हकीकत में ये सबसे पहले इनका गला घोंटते हैं। ये अपने अधिकार वाले इलाके में विकास के हर काम में बाधा डालते हैं, पुलिस थानांे, रेलवे स्टेशनों, बिजली कें खंभों, स्कूलों, सड़कों को डायनामाइट से उड़ा देते हैं। इनकी अपनी अदालतें चलती हैं जिनमें दोषियों और सरकार के मुखबिरों को सबक सिखाने के लिए दिल दहलाने वाली क्रूर सजाएं दी जाती हैं।

नक्सली और शहरों में उनके प्रतिनिधि तो देश के लिए घातक हैं हीं, उससे भी ज्यादा खतरनाक ये है कि कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, आम आदमी पार्टी जैसी मुख्यधारा की पार्टियां, अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए इनसे समझौता कर चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर इनका बचाव भी करती हैं। नक्सली जिग्नेश मेवानी और राहुल गांधी का रिश्ता किसी से छुपा नहीं है। दूर जाने की आवश्यकता नहीं, कुछ समय पहले हुए गुजरात और कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस ने नक्सलियोें, पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों और चर्च का जैसा इस्तमेमाल, उसे सबने देखा। कुछ वर्ष पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलियों को सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, क्या ये चिंता की बात नहीं कि आज उसी पार्टी के अध्यक्ष नक्सलियों की ढाल बन कर खड़े हो गए है?

“बलूचिस्तान की आजादी का खुल कर समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

पाकिस्तान की नई नई इस्लामिक कट्टरवादी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक य रसूल अल्लाह द्वारा ईशनिंदा पर मचाए गए हंगामे के कारण लगता है दुनिया की निगाह बलूचिस्तान में सेना के जुल्मो सितम से हट गई है। जिस समय तहरीक के इस्लामिक कट्टरवादी कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में पुलिस और अर्धसैनिक बलों से भिड़ रहे थे, लगभग उसी समय 25 नवंबर को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में फ्रंटीयर कोर के काफिले पर आत्मघाती हमले में पांच लोग मारे गए। ध्यान रहे पाकिस्तानी सेना और फ्रंटीयर कोर आजकल वहां रद्द-उल-फसाद नाम का आॅपरेशन चला रहे हैं जिसका मकसद वहां कथित आतंकवादियों (बलोच स्वतंत्रता सेनानियों) का जड़ से सफाया करना है। रद्द-उल-फसाद के नाम पर निर्दोष बलोचों पर लगातार अत्याचार किए जा रहे हैं जिसका स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी विरोध भी कर रहे हैं। खबर है कि सेना और फ्रंटीयर कोर से त्रस्त बलोचों ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) बना ली है। इसके नेता खैर बक्श मरी हैं और ये पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान और सीमा पार बलोच बहुल अफगान इलाकों में भी सक्रिय है।
कहना न होगा बलूचिस्तान में सैनिक, अर्धसैनिक बलों और पुलिस तथा स्वतंत्रता सेनानियों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, सुरक्षा बल उसके लिए बीएलए को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, हालांकि इसका सत्यापन आसान नहीं होता। नवंबर 21 को यहां के तुरबत इलाके में पाकिस्तानी सैनिकों और बलोच स्वतंत्रता सेनानियों की मुठभेड़ में एक सैनिक मारा गया। नवंबर 15 को इसी इलाके में 15 शव मिले थे। इसी दिन क्वेटा में पुलिस अधीक्षक मुहम्मद इलयास और उसके तीन परिवार वालों की सरेआम हत्या कर दी गई। कुछ दिन बाद इसी इलाके से पांच और लोगों के शव मिले। अधिकारियों के अनुसार ये सभी शव पंजाब प्रांत में रहने वालों के थे। सुरक्षा बलों के अनुसार तुरबत में 15 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी बीएलए ने ली। इससे पहले अक्तूबर 18 को पुलिस दल को ले जा रहे एक ट्रक में धमाके में आठ लोग मारे गए। इनमें से 7 पुलिस वाले थे। इस धमाके में 24 लोग घायल हुए। अगस्त 13 को सेना के एक ट्रक पर आत्मघाती दस्ते के हमले में आठ सैनिकों समेत 15 लोग मारे गए।

ये तो कुछ हालिया घटनाएं हैं, लेकिन बलूचिस्तान में हिंसक घटनाओं का सिलसिला लंबे अर्से से चला आ रहा है। जाहिर है पाकिस्तानी मीडिया वो खबरें तो प्रमुखता से देता है जिनमें पुलिस या सुरक्षा बलों को निशाना बनाया जाता है, लेकिन ये बलोचों पर सेना के पैशाचिक अत्याचारों और मानवाधिकार हनन की घटनाओं को दबा जाता है। बलूचिस्तान में सेना द्वारा नागरिकों की हत्या, अपहरण या प्रताड़ना की खबरें या तो प्रकाशित ही नहीं की जातीं और अगर की भी जाती हैं तो अंदरूनी पन्नों पर सिंगल काॅलम में। ऐसी खबरों को प्रकाशित करने के कारण इतने पत्रकार अपनी जान से हाथ धो चुके हैं कि अखबार मालिक ऐसी घटनाओं को कवर करने में भी डरने लगे हैं।

बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी सैकड़ों बार चिंता जता चुकी है, इसकी आलोचना कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वाॅच (एचआरडब्लू) के अनुसार बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन महामारी का रूप ले चुका है और पाकिस्तानी सरकार ने सेना की ज्यादतियों का विरोध करने वाले बलोचों की प्रताड़ना, अपहरण और गैरकानूनी हत्या रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। इसी प्रकार यूरोपीय संसद के आसियान प्रतिनिधि मार्क टाराबेला कहते हैं कि बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन की रिपोर्टें डरावनी हैं। वहां सैनिक और अर्धसैनिक बल व्यवस्थित तरीके से लोगों को निशाना बना रहे हैं और सरकार आंखें मूंदे बैठी है।

इंटरनेशनल वाॅयस फाॅर बलोच मिसिंग पर्संस के मुताबिक जनवरी 2014 तक बलूचिस्तान में 18,000 लोग गुमशुदा थे। इनमें से 2001 से 2013 के बीच 2,000 लोग मारे गए। 463 लोगों का जबरदस्ती अपहरण किया गया। इनमें से 157 को इतना प्रताड़ित किया गया कि वो जान से हाथ धो बैठे। मारे गए कुछ प्रसिद्ध बलोच स्वतंत्रता सेनानी हैं – मुनीर मेंगल, इमाद बलोच, अल्लाह नजर बलोच, जाकिर मजीद बलोच, गुलाम मोहम्मद बलोच ओर जाहिद बलोच।
पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बल अपहृत लोगों के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं इसका विवरण इन लोगों के परिवार वालों के बयानों से चलता है। इनके मुताबिक आततायी जिंदा लोगों पर तो जुल्म करते ही हैं, उनके मरने पर दिल, गुर्दे, फेफड़े, आंते तक निकाल लेते हैं। ऐसा परिवार वालों, संबंधियों और आस पास के लोगों को डराने के लिए किया जाता है ताकि वो अपना मुंह बंद रखें।

पाकिस्तान आजकल चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर (सीपेक) परियोजना के तहत वहां ग्वादर पोर्ट बना रहा है। इसके चलते बलोचों पर अत्याचार और बढ़ गए हैं। कहने को तो पाकिस्तान दावा करता है कि इससे बलोचों को रोजगार मिल रहा है और वहां आर्थिक समृद्धि आ रही है, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है। ग्वादर में काम करने वाले मजदूर तक चीन से लाए गए हैं। चीन इस पूरे क्षेत्र में अपनी करंसी चलाना चाहता है और जो लोग इस परियोजना में काम करना चाहते हैं, उन्हें अपनी भाषा सीखने पर मजबूर कर रहा है। ऐसे में बलोचों को इस परियोजना से कोई फायदा नहीं मिल रहा है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उनका सफाया ही किया जा रहा है। उन्हें अब डर सता रहा है कि कहीं पाकिस्तान के बाद वो चीन के उपनिवेश न बन कर रह जाएं। मौजूदा हालात को देखते हुए ये डर जायज भी है।

पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान में अपनी एजेंसियों की करतूतों पर तो पर्दा डाल देती है पर जब संघर्ष में इनके अपने लोग मरते हैं तो ये भारत पर इल्जाम लगाते हैं। पाकिस्तानियों को लगता है कि जो खेल वो कश्मीर में खेल रहे हैं, वहीं भारत बलूचिस्तान में खेल रहा है। अपने भारत विरोधी नेरेटिव को सही साबित करने के लिए इन्होंने कुलभूषण जाधव को राॅ के एजेंट के रूप में दुनिया के सामने पेश किया, लेकिन अफसोस कि दुनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया। अब ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस में चल रहा है।

लेकिन बलूचिस्तान का मसला इतना सरल नहीं है जितना पाकिस्तान दिखाने की कोशिश करता है। और न ही बलूचिस्तान उसका हिस्सा है जैसा वो दावा करता है। बलूचिस्तान का इतिहास असल में पाकिस्तान की बदनीयति और धोखाधड़ी का इतिहास है जिसे खुद पाकिस्तान के कायदे आजम मौहम्मद अली जिन्ना ने लिखा जिन्हें कलात के खान मीर अहमदयार खान अपना सबसे करीबी और विश्वासपात्र समझते थे। असल में विभाजन से पहले बलूचिस्तान में चार शाही रियासतें शामिल थीं – कलात, लसबेला, खारन और मकरान। मकरान, कलात का एक जिला था परंतु लसबेला और खारन का प्रशासन अंग्रेजों ने कलात के खान का सौंपा हुआ था।

पाकिस्तान बनने के तीन महीने पहले ही जिन्ना ने कलात के खान अहमदयार खान के नेतृत्व में बलूचिस्तान की आजादी के बारे में ब्रिटिश सरकार से बातचीत की। इसके बाद वायसराय, अहमदयार खान और जिन्ना के बीच कई बैठकें भी हुईं। इनके परिणामस्वरूप् 11 अगस्त 1947 को एक विज्ञप्ति जारी हुई जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान कलात को स्वतंत्र सार्वभौमिक राज्य के रूप में मान्यता देता है। इसमें ये भी कहा गया कि भविष्य में पाकिस्तान और बलूचिस्तान के संबंधों के बारे में कोई भी फैसला होने तक दोनों पक्ष ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (यथास्थिति समझौता) करेंगे। लेकिन अक्तूबर आते आते जिन्ना का मन बदल गया। उसे लगा कि पाकिस्तान में शामिल हुई अन्य रियासतों की तरह बलूचिस्तान को भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए। जिन्ना के दबाव में अहमदयार खान रक्षा, विदेश संबंध और संचार पाकिस्तान को देने के लिए तैयार हो गए पर उन्होंने तब तक किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया जब तक पाकिस्तान उसके साथ सम्मानजनक शर्तों पर संधि नहीं करता। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने राज्य की विधायिकाओं दार-उल-अवाम और दार-उल-उमरा की बैठकें भी बुलाई हैं। आगे की कार्रवाई उनकी सहमति से ही होगी। फरवरी 21, 1948 को दार-उल-अवाम की बैठक हुई जिसमें पाकिस्तान के साथ विलय के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। लेकिन इसके एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया कि कलात, भविष्य में पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के लिए संधि पर वार्ता करे।

लेकिन मार्च 18, 1948 को पाकिस्तान ने खारन, लसबेला और मकरान को जबरदस्ती अपना हिस्सा घोषित कर दिया। कलात के खान ने इसका विरोध किया। उन्होंने इसे ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ का उल्लंघन बताया। लेकिन इससे पाकिस्तान के कान पर जूं नहीं रेंगी। मार्च 26, 1948 को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस गई। एक ही दिन बाद मार्च 27 को कराची में घोषणा की गई कि अहमदयार खान ने घुटने टेक दिए हैं और वो अपनी रियासत के पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार हो गए हैं। इसके साथ ही बलूचिस्तान की 227 दिन चली आजादी भी समाप्त हो गई। स्पष्ट है, जिन्ना ने बंदूक के बल पर अहमदयार खान को विलय के लिए मजबूर किया। ध्यान रहे इस से पहले ही दार-उल-अवाम पाकिस्तान के साथ विलय का विरोध कर चुकी थी। इसलिए भले ही अहमदयार खान ने बंदूक के बल पर विलय की बात मान ली हो पर उसे कलात की विधायिका ने मंजूरी नहीं दी। यही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य ने भी कभी इस फैसले को मान्यता नहीं दी जिसने बलूचिस्तान का शासन अहमदयार खान को सौंपा था।

ये सही है कि पाकिस्तान ने बंदूक के बल पर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि अहमदयार खान ने बलूचिस्तान की आजादी के लिए काफी कोशिश की। उन्होंने ईरान और अफगानिस्तान के साथ भी समझौते की कोशिश की। वो लंदन के साथ कुछ वैसा ही समझौता भी चाहते थे जैसा उसने ओमान के साथ किया। उन्होंने आजाद बलूचिस्तान के लिए समर्थन जुटाने के वास्ते मार्च 1946 में एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भी भेजा था। ये प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से मिला। लेकिन आजाद ने बलूचिस्तान की आजादी को समर्थन से इनकार कर दिया। उन्हें लगा कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटेन का बगलबच्चा बन कर रह जाएगा जो भारतीय उपमहाद्वीप की आजादी के लिए अच्छा नहीं होगा।

बाद में खबरें आईं कि खान ने भारत के साथ विलय की कोशिश भी की, लेकिन इसे भी नकार दिया गया। जब पाकिस्तान, बलूचिस्तान की आजादी का बलात्कार कर रहा था, अंग्रेज ही नहीं, कांग्रेस के बड़े नेता भी खामोशी से देख रहे थे। बहरहाल दुनिया भर की उपेक्षा के बावजूद बलोचियों ने अपनी आजादी की ख्वाइश नहीं छोड़ी। उनका संघर्ष लगातार जारी रहा। खान को जिन्ना ने जो धोखा दिया, वो उसे कभी नहीं भूले। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि कांग्रेस ने खान के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया होता तो आज क्या हालात होते।

पाकिस्तान ने बलोचों की धरती पर तो कब्जा कर लिया पर उनका दिल जीतने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है और उसके करीब आधे भूभाग पर फैला है पर इसकी आबादी पाकिस्तान की कुल आबादी की महज दशमलव पांच प्रतिशत है। ह्यूमन डिवेलपमेंट इंडेक्स के हिसाब से ये पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है। पाकिस्तानियों ने उनकी जमीनों, खनिजों और प्राकृतिक गैस का भरपूर इस्तेमाल तो किया पर उसका फायदा उन्हें नहीं दिया। जिन्ना के धोखे और इस अंधे शोषण ने बलोचों को गुस्से से भर दिया जिसका नतीजा समय समय पर विद्रोह के रूप में सामने आया। बलूचिस्तान में सबसे बड़ा विद्रोह 2006 में हुआ जब सेना ने बलूचों के सर्वमान्य नेता सरदार अकबर बुगती और उनके 26 साथियों को धोखे से मार डाला।

कभी पंजाब में तो कभी कश्मीर मे, पाकिस्तान आजादी के बाद से लगातार भारत से पंगा लेता रहा है। 90 के दशक से कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत में उसकी प्राॅक्सी वाॅर जारी है। इंदिरा गांधी ने मजबूर होकर बांग्लादेश के संघर्ष में हस्तक्षेप किया था, परंतु उसके बाद भारत ने पाकिस्तान में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई। बलूचिस्तान में लोगों पर अकथनीय अत्याचार हुआ, लेकिन भारत ने कभी वहां फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। भारत सरकार पाकिस्तान की असली सरकार यानी सेना को छोड़, वहां की कठपुतली चुनी हुई सरकारों से गलबहियां करती रही और सेना भारत में मनमानी करती रही। पाकी सेना एक तरफ तो कश्मीर में आतंकवाद फैलाती रही तो दूसरी तरफ बलोच अशांति के लिए भारतीय खुफिया ऐजेंसी राॅ को जिम्मेदार ठहराती रही। भारत हमेशा इन आरोपों से इनकार करता रहा। पर 2009 में तबके प्रधानमंत्रियों युसुफ रजा गिलानी और मनमोहन सिंह ने शर्मअल शेख में एक संयुक्त घोषणपत्र जारी किया जिसमें पहली बार बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ। हालांकि इसमें बलूचिस्तान की स्थिति के लिए भारत को सीधे तौर पर तो जिम्मेदार नहीं ठहराया गया पर ये अवश्य कहा गया – “प्रधानमंत्री गिलानी ने उल्लेख किया कि बलूचिस्तान और अन्य इलाकों में आतंक के बारे में पाकिस्तान के पास कुछ सूचना है”। कुछ लोगों ने इस घोषणापत्र को मनमोहन की नरमी का प्रतीक बताया तो कुछ ने आरोप लगाया कि वो सांप्रदायिक विदेशनीति अपना रहे हैं| और पाकी खुफिया एजेंसी के हाथ में खेल रहे हैं। बहरहाल काफी फजीहत के बाद मनमोहन सरकार ने इस घोषणापत्र से पल्ला झाड़ लिया।

मोदी सरकार ने भी पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से संबंध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर प्रयास पर पाकी सेना ने आतंकी हमलों के जरिए पानी फेर दिया। यही नहीं कश्मीर में भी हालात को और बदतर बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले भाइयों को याद किया। अब तक पाकी लाइन को चला रहे भारतीय मीडिया ने इसके बाद पहली बार खुल कर बलोचिस्तान में चल रहे दमन की खबरें प्रकाशित करना शुरू किया। भारत में भी विस्थापित बलोच नागरिकों के सम्मेलन हुए। यही नहीं सरदार अकबर बुगती के पोते बरहमदाग खान बुगती ने भारत में शरण के लिए आवेदन भी किया जो आजकल स्विटजरलैंड में रह रहे हैं। हाल ही में स्विटजरलैंड ने उनके राजनीतिक शरण के आवेदन को ठुकरा दिया क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया हुआ है। याद रहे ये वही पाकिस्तान है जिसने हाल ही में मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी और लश्कर-ए-तौएबा के प्रमुख को सारे अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद रिहा कर दिया था।

प्रधानमंत्री की पहल के बाद भारत ने ये मसला संयुक्त राष्ट्र समेत लगभग हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। खुद बलोच विस्थापितों ने ये मसला आॅफिस आॅफ यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशनर फाॅर रिफ्यूजीस (यूएनएचसीआर) में जोरशोर से उठाया। अमेरिका सहित दुनिया भर में इस मसले पर सेमीनार और विचार गोष्ठियां आयोजित की गईं। अमेरिका के दो सेनेटरों ने तो बलूचिस्तान की आजादी के लिए प्रस्ताव भी रखा। इससे पहले 2012 में अमेरिकी कांग्रेसमेन डाना रोहराबाचर और लूई गाहमर्ट ने हाउस आॅफ रेप्रेसेंटेटिव में बलूचिस्तान के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देने के लिए बिल पेश किया था।

पाकिस्तान ने जिस तरह हाफिज सईद को बेशर्मी से रिहा किया है और जैसे उसके आतंकी संगठन जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) को राजनीतिक संगठन (मिल्ली मुस्लिम लीग) के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है और जैसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुली धमकियों के बावजूद पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों के बारे में दोगली नीति अपना रहा है, उससे ये साफ हो गया है कि भारत को अब ये लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ेगी।

अब मोदी सरकार को बलूचिस्तान के बारे में जबानी जमाखर्च बंद कर कुछ मजबूत कदम उठाने हांेगे। सबसे पहले तो बरहमदाग बुगती को राजनीतिक शरण देनी होगी और साफ तौर से एलान करना होगा कि जैसे पाकिस्तान कश्मीर के आतंकवादियों को ‘नैतिक और राजनयिक’ समर्थन देता है, वैसे ही भारत भी अब खुले आम बलोच स्वतंत्रता सेनानियों को समर्थन देगा। भारत बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता और बलोच लोगों की इच्छा के अनुसार उसे अलग देश का दर्जा मिलना ही चाहिए। भारत को अमेरिका को भी स्पष्ट करना होगा कि यदि वो अफगानिस्तान के स्थायित्व में भारत का समर्थन चाहता है तो उसे बलोच आजादी का समर्थन करना होगा। बलोच लोगों के नरसंहार पर अब उसे अपनी जबान खोलनी ही होगी।

पाकी सेना की शह पर सीपेक के नाम पर चीन विवादास्पद पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में घुस गया है। जाहिर तौर पर चीन इसे ‘विकासपरक आर्थिक गतिविधि’ बता रहा है, लेकिन इसके सैन्य और रणनीतिक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि अमेरिकी ने सीपेक की वैधता पर उंगली उठाई है पर ग्वादर पोर्ट के बारे में कभी कोई वक्तव्य नहीं दिया है। अब अमेरिका को मजूबर किया जाना चाहिए कि वो इस विषय में अपनी राय स्पष्ट करे।
भारत के लिए आतंकवाद बड़ा मुद्दा है। ये सिर्फ हाफिज सईद और उसके बारे में अमेरिकी बयानों तक सीमित नहीं है। ट्रंप की सभी धमकियों के बावजूद पाकी सेना भारत में अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए तैयार नहीं है। अब भारत को इसका हल खुद निकालना होगा और इसका रास्ता बलूचिस्तान से होते हुए जाता है।

“देशद्रोही नक्सल आतंकियों के सफाए के लिए सेना तैनात की जाए” in Punjab Kesari

हाल ही में खबर आई कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके के धूरबेड़ और पिनका में पुलिस दल ने एक महिला नक्सली समेत छह नक्सलियों को मार गिराया और उनके पास से बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए। यह कार्रवाई छह नवंबर को शुरू किए गए आॅपरेशन प्रहार के दूसरे चरण के तहत  हुई। यह संभवतः पहली बार है जब नक्सलियों को दक्षिण बस्तर के बीहड़ांे में उनके इलाके में घुस कर खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। इस इलाके के ‘भयावह जंगलों ओर दुर्गम पहाड़ियों’ में नक्सलियों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। इससे पहले दो दशक तक तक पुलिस और अन्य सुरक्षा बल इनके आस-पास भी नहीं पहुंच पाए थे। इसलिए यहां पहुंच पाना ही बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

आपके और मेरे मन में स्वाभिवक ही सवाल उठता है कि जिन ‘भयावह और बीहड़’ जंगलों में नक्सली आराम से अड्डा बना सकते हैं, वहां पुलिस या अन्य बल अब तक क्यों नहीं पहुंच सके? वहां जाना वास्तव में मुश्किल था या जाने की इच्छाशक्ति ही नहीं थी? इतने वर्ष बाद, अिखर अब ही क्यों पुलिस वहां पहुंच पाई है?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें भारत में खूनी नक्सलियों के इतिहास पर नजर डालनी होगी। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि इतने साल बाद आज अगर पुलिस इन ‘दुर्गम’ इलाकों में जाने की हिम्मत जुटा रही है तो इसका एक बहुत बड़ा कारण केंद्र और छत्तीगढ़ की भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं जिन्होंने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ता दिखाई है।

येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए हिंसा और हत्या को वैध मानने वाली नक्सली मुहिम की शुरूआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी के दो सदस्यों कानू सन्याल और चारू मजूमदार  ने पचास साल पहले 1967 में पश्चिम बंगाल में की। यह नक्सलबाड़ी गांव से आरंभ हुई, इसलिए इसे नक्सलवाद के रूप में जाना गया। कानू और चारू ने अपने हत्यारे दर्शन के अनुसार ये खूनी सिलसिला जमींदारों के खिलाफ भूमिहीन किसानों को न्याय दिलवाने के नाम पर आरंभ किया था। ध्यान रहे नक्सलवादियों को माओवादी भी कहा जाता है क्योंकि ये चीन के बदनाम सिरफिरे कम्युनिस्ट तानाशाह माओ त्से तुंग के हिंसक राजनीतिक दर्शन को मानते हैं जो कहता है कि सत्ता बंदूक की नोक से आगे बढ़ती है। माओ ने अपनी कुख्यात और सनकी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान करोड़ों चीनियों को मरवाया।

ये संयोग की बात है कि माओ की मूर्खतापूर्ण सांस्कृतिक क्रांति (1966) और भारत में नक्सलवाद (1967) लगभग एक साथ ही  शुरू हुए। भूमिहीन किसानों, आदिवासियों और गरीबों को हक दिलवाने के नाम पर शुरू किए गए हत्यारे नक्सलवाद का असली लक्ष्य भारत सरकार को उखाड़ फेंकना और साम्यवादी शासन स्थापित करना था। जैसे जैसे समय बीता, हत्यारे नक्सलियों की मंशा भी स्पष्ट होती चली गई। वर्ष 2007 तक ये खूनी दरिंदे अपने पंजे 14 राज्यों तक फैला चुके थे। 2009 में 10 राज्यों के 180 जिलों में इनका प्रभाव था, जबकि 2011 में सरकार ने दावा किया कि इन्हें नौ राज्यों के 83 जिलों तक सीमित कर दिया गया था। वर्ष 2016 में जारी एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक नक्सली अब भी 10 राज्यों के 106 जिलों में फैले थे। आपको ज्ञात ही होगा कि नक्सल हिंसा में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सुरक्षा बल, आम नागरिक और खुद नक्सली भी शामिल हैं।

भारत में कम्युनिस्टों के अलग-अलग गुट या कहें पार्टियां भले ही जाहिर तौर पर नक्सलवाद से किनारा करती रहीं हों, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इन्होंने अंदर ही अंदर इन्हें भरपूर समर्थन और संसाधन उपलब्ध करवाए। जहां मुख्य धारा की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियां बैलेट (मतपत्र) के जरिए सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश करती रहीं, वहीं नक्सली इनकी सैन्य इकाई बन कर बुलेट (गोली) के जरिए देश के बड़े भूभाग पर अपना विस्तार करते रहे।

कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा और कौन सी ताकतें थीं जिन्होंने नक्सलियों को अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में मदद की? कैसे ये नक्सली जंगलों और बीहड़ों से निकलकर विश्वविद्यालयों, सरकारी दफ्तरों, मीडिया संस्थानों, अदालतों आदि तक पहुंच गए? कैसे इन्होंने विश्वविद्यालयों में अपनी छात्र इकाइयां और स्लीपर सेल स्थापित किए? कैसे इन्होंने गैर सरकारी संगठनों का बड़ा नेटवर्क बना और देश-विदेश से चंदा उगाह,  छोटे बड़े शहरों में जनता को उकसाने और भड़काने के लिए कार्यकर्ता और नेटवर्क तैयार किए? कैसे ये संगठन विदेशी इशारों पर भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे? कैसे इनके वकील इनकी देशद्रोही गतिविधियों को कानूनी संरक्षण देने के लिए अदालतों में उतर गए?

इसके लिए कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार है जिसके राज में इन्हें न केवल भौगोलिक विस्तार मिला बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी इन्होंने घुसपैठ बनाई। यूपीए सरकार में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को रिमोट से चलाने के लिए एडवाईजरी काउंसिल बनाई थी। इसके ज्यादातर सदस्य इसी नेटवर्क से संबंध रखते थे। इससे इनकी पहुंच और प्रभाव का अंदाज लगाया जा सकता है और सोनिया गांधी की मानसिकता को भी समझा जा सकता है जिन्होंने ‘आईडिया आॅफ इंडिया’, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, ‘विविधता’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ आदि जैसे मोटे-मोटे जुमलों की आड़ में इन्हें फलने फूलने और देश विरोधी गतिविधियां करने का मौका दिया।

वैश्विक स्तर पर भले ही इस्लामिक आतंकवादी और कम्युनिस्ट अलग अलग नजर आते हों लेकिन भारत को तोड़ने के साझे लक्ष्य के चलते यहां इन्होंने हाथ मिला लिए हैं। आज ये सिर्फ गरीब किसानों और मजदूरों के लिए ही लड़ने का नाटक नहीं करते, ये बाकायदा इस्लामिक आतंकवादियों के लिए भी संघर्ष करते हैं। संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की फांसी रूकवाने के लिए अदालत से मीडिया तक कैसे पूरा नक्सली गैंग सक्रिय हो गया था, ये हमने अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना है। कैसे अरूंधती राय हुर्रियत के आतंकवादी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करती थी, ये भी बहुत पहले की बात नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के जिस ‘दलित’ अराजकतावादी रोहित वेमूला के लिए नक्सलियों ने आसमान सिर पर उठा लिया, वो मुंबई हमलों के दोषी आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में जिंदाबाद के नारे लगाता था और जुलूस निकालता था। यही नहीं वो राष्ट्रवादी छात्र संगठनों के सदस्यों के साथ मार पिटाई भी करता था। ये सब भी हम जानते हैं।

नक्सलियों और कम्युनिस्टों की राजनीति का अगर हम ध्यान से अध्ययन करें तो हमें पता लगेगा कि अब इनका पूरा जोर मुसलमानों और दलितों को अपने साथ लाने पर है। कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने पिछले 70 साल में जैसे मुसलमानों में अलगावाद और आतंकवाद का जहर बोया, ऐसे में ये नक्सलियों के लिए आसान टारगेट हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय तक इस्लामिक आतंकवादियों की बरसी मनाना, राष्ट्रविरोधी सेमीनार आयोजित करना, ‘दलित’ रोहित वेमूला के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालना, खुद लोगों की बेरहमी से हत्या करने के बावजूद मोदी सरकार पर ‘असहिष्णुता’ का आरोप लगाना, ये सभी इनकी विघटनकारी रणनीति के ही हिस्से हैं।

सड़क से संसद तक नक्सलियों के इस एजेंडा को कांग्रेस ने कैसे समर्थन दिया, कैसे राहुल गांधी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक इनके समर्थन में चक्कर मारे, कैसे कांग्रेसी वकीलों ने इनके मुकदमे लड़े, ये किसी से छुपा नहीं है।

अब ये स्पष्ट हो चुका है कि भूमिहीनों और गरीबों की लड़ाई लड़ने का ढोंग करने वाले खूनी नक्सली वास्तव में विकास विरोधी हैं। जब भी सरकारों ने इनके प्रभाव वाले इलाकों में कोई विकास कार्य करने की कोशिश की, इन्होंने पलीता ही लगाया। ये नहीं चाहते कि इनके प्रभाव वाले इलाकों में लोग बाहरी दुनिया से जुडं़े या उसके बारे में जानें। इसीलिए ये बिजली के खंभे, सरकारी स्कूल, रेलवे स्टेशन, हर वो चीज जला देते हैं जो नक्सल इलाके के लोगों को बाहर से जुड़ने का अवसर देती है या इसकी संभावना पैदा करती है। इन्होंने अपने इलाकों में अपने स्कूल खोले हैं जहां इनकी पाठ्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं जो बच्चों के दिमाग में भारत के खिलाफ जहर भरने और उन्हें ब्रेनवाश्ड हत्यारा बनाने का काम करती हैं।

अब सवाल ये उठता है कि नक्सलियों के पास पैसा और हथियार कहां से आते हैं? कैसे ये जंगलों में अपनी हुकूमत चलाते हैं। इसका स्पष्ट उत्तर है कि इन्हें पाकिस्तान और चीन की खुफिया एजेंसियों से पैसा और हथियार मिलते हैं। इसके अलावा ये अपने इलाकों में चलने वाली फैक्ट्रियों और खानों के मालिकों से हफ्ता वसूलते हैं, शहरों में चलने वाले इनके एनजीओ देश-विदेश में इनके लिए पैसा जुटाते हैं। ये अपने इलाकों में अफीम उगाते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थों का धंधा करते हैं। ये समय समय पर पुलिस थानों पर हमले करते हैं जहां से इन्हें बड़े पैमाने पर हथियार मिलते हैं। खुफिया जानकारियों के मुताबिक अब तो इन्होंने खुल कर हथियारों का उत्पादन शुरू कर दिया है। इनमें से कुछ हथियार ये देश के दूसरे हिस्सों में असामाजिक तत्वों को भी बेचते हैं। ये सुपारी किलिंग का काम भी करते हैं। आज नक्सली अलग इकाई के रूप में काम नहीं करते, इनके कश्मीरी आतंकवादियों से लेकर नगालैंड और असम के अलगाववादियों तक सबसे संपर्क और लेनदेन है और ये बेधड़क भारत में चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों का समर्थन करते हैं।

अब सवाल ये है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए? अक्सर ये सवाल उठता है कि जब नक्सली घने जंगलों में रह सकते हैं और वहां से समानांतर सरकार चला सकते हैं तो केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के सुरक्षा बल वहां क्यों नहीं पहुंच सकते? क्यों नहीं सरकार इनके खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाती और इन्हें एक झटके में समाप्त करती? इसका दो टूक उत्तर है कि अब तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। ये भी देखने में आया कि कुछ पार्टियों ने इन्हें बढ़ावा दिया और इन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। जातिवाद और इस्लामिक संप्रदायवाद के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियों ने लगातार विघटनकारी भावनाओं और संगठनों को प्रोत्साहित किया और राष्ट्रवादी ताकतों का मजाक उड़ाया। ऐसे में इनसे नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई की कैसे अपेक्षा की जा सकती है?

नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले कहते हैं कि सरकार को उनसे बात करनी चाहिए और शातिपूर्वक तरीके से इस समस्या को हल करना चाहिए। लेकिन अनुभव बताता है कि ‘शांतिपूर्वक तरीका’ सिर्फ इन हत्यारों को अधिक संगठित और दृढ़ होने का ही अवसर और समय प्रदान करता है। एक अन्य तबका है जो कहता है कि नक्सल क्षेत्रों में विकास कर इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के लिए भी बहुत जतन कर लिए हैं। अब ये साफ हो चुका है कि इनका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। जब तक नक्सलियों की निरंकुश सत्ता  समाप्त नहीं की जाती, इनके प्रभाव वाले इलाकों में विकास की कोई किरण नहीं पहुंचेगी।

पिछले पचास साल का अनुभव बताता है कि नक्सलियों का लक्ष्य भारत को तोड़ना है, और ये किसी भी सूरत में इससे पीछे नहीं हटेंगे। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि सरकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नक्सलियों के समर्थकों से डरे बिना इनके खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़े। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए आॅपरेशन चला रही है, लेकिन ऐसी कार्रवाइयों से ये मसला हल नहीं होगा। ये काननू व्यवस्था का कोई मामूली मसला नहीं है, जिसे राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर हल कर सकें। केंद सरकार को रेड काॅरीडोर (नक्सल प्रभावित इलाके को इस नाम से भी जाना जाता है) को सीधे अपने कब्जे में लेकर इनके खिलाफ बाकायदा सैनिक कार्रवाई करनी चाहिए और इससे पहले कोई चेतावनी भी नहीं दी जानी चाहिए। अब तक नक्सलियों के खिलाफ अलग बल बनाने की कवायद होती रही है। भारत की थल सेना और वायु सेना आधुनिकतम हथियारों से सुसज्जित है। ऐसे में अलग बल पर पैसा व्यर्थ करने की जगह अब केंद्र सरकार को अपने सैन्य बलों का इस्तेमाल करना चाहिए। आवश्यकता लगे तो उन्हें इसके लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

अब ये रेटोरिक बंद होना चाहिए कि नक्सली भी भारतीय नागरिक हैं और इनके खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हकीकत तो ये है कि ये देश के उतने ही बड़े दुश्मन हैं जितनी बड़ी पाकिस्तानी सेना। हम उठते बैठते कश्मीर में आतंकवाद की बात करते हैं और हमने उसके सफाए के लिए सेना भी तैनात कर रखी है। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल मात्र 15,948 वर्ग किलोमीटर है, जबकि रेड काॅरीडोर 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। जब सेना कश्मीर में आतंकवादियों के सफाए के लिए अभियान चला सकती है, तो इतने बड़े इलाके को खूनी नक्सली आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? एक बात और, अब नक्सलियों के लिए ‘लेफ्टविंग एक्ट्रीमिस्ट’ जैसे शब्द नहीं इस्तेमाल होने चाहिए। ये देशद्रोही आतंकवादी हत्यारे हैं। इन्हें और इनके समर्थकों को इसी नाम से बुलाया जाना चाहिए।

लेकिन समस्या सिर्फ जंगलों से ही नक्सलियों को खदेड़ने की नहीं है। हमने देखा है कि कैसे अनेक विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्रों को इस ओर धकेल रहे हैं, कैसे मीडिया और अदालतों में बैठे इनके लोग पूरा गैंग बनाकर इनके हितों को आगे बढ़ा रहे हैं और देश का समर्थन करने वालों का मजाक उड़ा रहे हैं और उन्हें ही खलनायक बना रहे हैं। अब इनके खिलाफ शहरों में भी कार्रवाई आरंभ होनी चाहिए। मीडिया और अदालत में इनके एजेंटों, गली मोहल्लों में इनके गैर सरकारी संगठनों, विश्वविद्यालयों में इनके समर्थक शिक्षकों, छात्र संगठनों, स्लीपर सेलों, विदेशों में बैठे इनके सरपरस्तों की पहचान कोई मुश्किल नहीं है

सरकार को चाहिए कि इस समस्या के उन्मूलन के लिए निश्चित समय सीमा के लिए एक अलग समन्वय मंत्रालय का गठन करे जो जंगलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक राष्ट्रदोहियों के खिलाफ कार्रवाई की रूपरेखा तैयार करे और उसे अमली जामा पहनाए। इसके साथ ही संविधान में संशोधन भी किए जाएं ताकि नक्सली आतंकवादी मानवाधिकारों के नाम पर छूटने न पाएं। सरकार अपने यहां नौकरी और आर्थिक सहायता सिर्फ उन्हीं लोगों, संगठनों और संस्थानों को दे जो देश के प्रति वफादारी का लिखित हलफनामा दें। इस हलफनामे का उल्लंघन करने वाले को न सिर्फ सेवा से हटाया जाए, बल्कि उसे सख्त से सख्त सजा भी दी जाए। जब तक देश से नक्सली आतंकियों का जड़ मूल से सफाया न हो जाए, विश्वविद्यालयों में राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।

 

 

 

“कब तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करेंगी ममता बनर्जी?” in Punjab Kesari

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में लंबे अर्से तक नंबर दो स्थान पर रहे पार्टी के मुख्य रणनीतिकार मुकुल राय हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। इसे लेकर काफी टीका टिप्पणी हुई। ये मामला लंबे समय तक ट्वीटर पर ट्रेंड भी करता रहा। ये सही है कि उनका व्यक्तित्व टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी जैसा करिश्माई नहीं है, लेकिन ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ममता की सफलता में उनका बड़ा हाथ रहा है और उनकी सोच को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। कुछ लोग मानते हैं कि उनका भाजपा में शामिल होना उतना ही ऐतिहासिक है जितना ममता बनर्जी का कांग्रेस से अलग होकर 1997 में टीएमसी बनाना। लेकिन क्या टीएमसी का ये भेदी ममता की लंका ढहा पाएगा? ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन भाजपा को उम्मीद अवश्य है कि जैसे ममता ने हत्यारे कम्युनिस्टों की सत्ता की दौड़ पर लगाम लगाई, वैसे ही मुकुल भी ममता के इस्लामिक सांप्रदायिक शासन पर लगाम लगाएंगे।

भाजपा की उम्मीद संभवतः उत्तर प्रदेश और बिहार के अनुभवों पर टिकी है जहां उसने मुसलमान-यादव की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी सांप्रदायिक पार्टियों पर लगाम लगाई। भाजपा के 11 प्रतिशत वोट के मुकाबले, 45 प्रतिशत वोट के साथ टीएमसी इस समय निःसंदेह अजेय दिखाई देती है, लेकिन गत वर्षों में जैसे भाजपा ने कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को दरकिनार किया है, उससे यह स्पष्ट हो चुका है कि राज्य में वो अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है और सही रणनीतियों के साथ वह अवश्य ही आगे बढ़ेगी, भले ही इसमें कुछ समय लगे।

बेशर्मी की हद तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करने वाली ममता समझती हैं कि जब तक मुसलमान उनके साथ हैं, उन्हें कोई हरा नहीं सकता। लेकिन लंबे अर्से में उनकी यही इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति उनका वाटरलू भी साबित हो सकती है। लगभग 32 साल के कम्युनिस्ट शासन के बाद जब ममता ने कमान संभाली तो लगा था कि राज्य राजनीतिक हत्याओं, अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर आएगा, लेकिन अफसोस, ऐसा हो न सका। वर्ष 2011 के बाद 2016 में ममता दोबारा मुख्यमंत्री भी चुनी गईं, लेकिन हालात बद से बदतर होते गए।

ममता बनर्जी का सिरफिरापन, सनकीपन, देश से अलग खुद को बंगाल की महारानी समझने का भ्रम, सब अपनी जगह, लेकिन सबसे अधिक जो खतरनाक है, वो है उनकी अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता। कई बार तो केंद्र और भाजपा के विरोध में ममता इतनी अंधी हो जाती हैं कि संवैधानिक मर्यादाओं को भी पार कर जाती हैं। जब वो ये दिखाने की कोशिश करती हैं कि ‘इस्लामिक पश्चिम बंगाल सरकार’, ‘हिंदू केंद्र सरकार’ का बड़ी दिलेरी से सामना कर रही है, तो स्थिति विस्फोटक हो जाती है। ममता की अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और मानसिक दिवालिएपन पर दया आती है, लेकिन चिंता भी होती है कि उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी महान विभूतियों की जन्म और कर्मभूमि को आज कैसे नरक में बदल दिया है।

ममता की इस अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता की वजह आखिर क्या है। इसे समझने के लिए बंगाल की जनसंख्यकी (डेमोग्राफी) और राजनीतिक इतिहास को समझना होगा। वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार वहां करीब 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। राजधानी कोलकाता में ही उनकी आबादी करीब 21 प्रतिशत है। बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर देश में सर्वाधिक है। देश में अगर मुस्लिम आबादी 0.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है तो बंगाल में ये दर 1.77 प्रतिशत की दर से। इसके मुकाबले देश भर में जहां हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 0.7 प्रतिशत गिरी है, वहीं बंगाल में यह 1.94 प्रतिशत की दर से कम हुई है।

बंगाल के तीन जिलों में तो मुस्लिम आबादी, हिंदू आबादी से आगे बढ़ गई है। ये जिले हैं मुर्शिदाबाद (हिंदू – 23 लाख, मुस्लिम 47 लाख), मालदा (हिंदू – 19 लाख, मुस्लिम – 20 लाख) और नाॅर्थ दिनाजपुर (हिंदू – 14 लाख, मुस्लिम – 15 लाख)। भारत में मुस्लिम आबादी के घनत्व के हिसाब से अगर अनंतनाग जिला (जम्मू एवं कश्मीर) सबसे आगे है, तो हैड काउंट के हिसाब से मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम) और कांग्रेस जैसे इस्लामिक दल भले ही मुस्लिम जनसख्या विस्फोट के लिए बंगाल से सटे बिहार के मुस्लिम बहुल जिलों – पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार को जिम्मेदार ठहराते हों, लेकिन हकीकत तो यही है कि बंगाल में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठिएं आए हैं जिन्हें इस्लामिक दलों ने अपनी सांप्रदायिक राजनीति के कारण राज्य में बसने में सहायता की है।
लेकिन परेशानी मुस्लिम आबादी से नहीं है। परेशानी मुसलमानों के नाम पर की जाने वाली विघटनकारी राजनीति से है जिसे कहीं न कहीं मुसलमान (विशेषकर पुरूष) समर्थन और बढ़ावा भी देते हैं। इस्लामिक पहचान के नाम पर की जाने वाली ये राजनीति आजादी के पहले से चली आ रही है। पूर्वी बंगाल के पूर्वी पाकिस्तान बनने में भी इसका बड़ा हाथ रहा। अगर हम इतिहास के पन्ने खंगालें तो हमें पता लगेगा कि बंगाल वही जगह है जहां मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों और कांग्रेस को अपना दम दिखाने के लिए 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन’ का एलान किया जिसके बाद हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों में हजारों लोग मारे गए। ध्यान रहे मुर्शिदाबाद में आजादी के दो दिन बाद तिरंगा फहराया गया क्योंकि वहां के मुसलमानों ने ये मान लिया था कि उन्हें तो पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होना है।

इस्लामिक राजनीति के कुछ खास लक्षण हैं – मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काना, उनकी इस भावना को तुष्ट करना कि वो भारतीय बाद में हैं और मुसलमान पहले, उन्हें भारत के हितों से पहले मुस्लिम उम्मा ं(बिरादरी) के हित देखने चाहिए और ऐसा करना जायज भी है, उन्हें मनमाने ढंग से भारतीय संविधान की पक्षपाती व्याख्या करने का हक है, उन्हें कबीलाई सोच वाले और महिला विरोधी पर्सनल लाॅ का पालन करने का पूरा हक है, अगर कोई मुसलमान आतंकी घटनाओं में पकड़ा जाए, तब भी उसे छुड़ा लिया जाना चाहिए क्योंक ऐसा वो इस्लाम के नाम पर कर रहा है, मुसलमान का भारत से कोई कोई लेना देना नहीं है, ये तो उसका दुर्भाग्य है कि वो सउदी अरब में पैदा न हो कर यहां पैदा हुआ है। ये संभवतः इसी राजनीति का परिणाम है कि भारत में ज्यादातर मुस्लिम अलग बस्तियों में रहना पसंद करते हैं जहां दूसरे धर्म के लोगों का प्रवेश तक अक्सर वर्जित होता है।

दुखद बात तो ये है कि पाकिस्तान बनने के बावजूद, कांग्रेस जैसी इस्लामिक पार्टियों ने बांग्ला मुसलमानों में ऐसी भावनाओं को भड़काया और बढ़ाया, इन्हें जायज ठहराया। असल बात तो ये है कि उन्हें भारतीय बनना सिखाया ही नहीं गया। न ही इस बात की कभी उनसे अपेक्षा ही की गई। उन्हें ये कहने तक की हिम्मत नहीं की गई कि वो राष्ट्रगान के समय खड़े हों या राष्ट्रगीत का सम्मान करें। कांग्रेस के सत्ताच्युत होने के बाद कम्युनिस्टों ने इस राष्ट्रविरोधी राजनीति को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर आगे बढ़ाया। लेकिन चिंता की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद के इस दौर में टीएमसीे हालात सुधारने की जगह इस्लामिक सांप्रदायिकता और अलगाववाद को नई सीमाओं तक ले जा रही हैं। ममता राज्य में 40 बड़े और सैकड़ों छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। उनकी पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं है। कानून व्यवस्था घास चरने चली गई है। मुस्लिम तुष्टिकरण की हालत ये है कि अगर दुर्गा पूजा और मोहर्रम एक साथ पड़ जाएं तो ममता विसर्जन का समय और दिन बदलने का आदेश दे देती है। अपने त्यौहार इज्जत और हक से मनाने के लिए हिंदुओं को बार-बार अदालत जाना पड़ता है। अदालत भी बार-बार ममता के आदेशों को अवैध बताती है, पर ममता है कि मानती ही नहीं।

ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण की एक और मिसाल है मौलाना नूर-उर-रहमान बरकती जिसे उन्होंने अपना धर्म भाई बनाया हुआ है। ये हजरत लंबे समय तक कोलकाता की मशहुर टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम रहे। ये वही मौलाना है जिसने नोटबंदी का विरोध करते हुए 8 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेहद शर्मनाक फतवा जारी किया। इसने टीएमसी सांसद इदरीस अली के साथ एक संवाददाता सम्मेलन में एलान किया कि वो उस व्यक्ति को 25 लाख रूपए का इनाम देगा जो प्रधानमंत्री का सिर मुड़ा कर और दाढ़ी साफ कर उनके मुंह पर कालिख पोतेगा। जब केंद्र सरकार ने लाल बत्ती पर रोक लगाने का आदेश जारी किया तो इसने उसे भी मानने से इनकार कर दिया। इसने कहा कि मैं तो सिर्फ राज्य सरकार का आदेश मानता हूं जिसने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। बरकती ने अनेक राष्ट्रविरोधी बयान भी दिए। इसके शर्मनाक और अराजक बयानों से परेशान होकर 17 मई 2017 को वक्फ ट्रस्टी बोर्ड ने इसे टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम पद से बर्खास्त करने की घोषणा कर दी। वक्फ ने तो इसे हटा दिया पर ये अब भी ममता की नाक का बाल बना हुआ है और प्रधानमंत्री ही नहीं देश विरोधी बयानों के बावजूद आज तक इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। याद रहे सुप्रसिद्ध गायक सोनू निगम के खिलाफ आपत्तिजनक फतवा जारी करने वाला मौलवी सय्यद शाह अतेफ अली भी इसका चेला है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के बाद अब राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह देने की तैयारी की जा रही है। म्यांमार में इस्लामिक रोहिंग्या आतंकवादियों ने सेना और पुलिस पर सैकड़ों हमले किए। इनके बाद हुई जवाबी कार्रवाई के कारण लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ना पड़ा। केंद्र सरकार इन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानती है लेकिन राज्य में इस्लामिक संगठन टीएमसी की सरपरस्ती में सरेआम इनके समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं जिनमें केंद्र सरकार के खिलाफ ही नहीं, हिंदुओं के खिलाफ भी आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छोटे से छोटे कार्यक्रम को कानून व्यवस्था का बहाना बना कर रोकने वाली ममता सरकार इन्हें खामोशी से देख रही है।

बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत में निर्विघ्न सुविधाएं मिलें, इसके लिए राज्य सरकार ‘आधार’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। ये बात अलग है कि अदालत ने उसे याद दिलाया कि राज्य सरकारें केंद्रीय कानूनों के खिलाफ मुकदमा नहीं कर सकतीं। यदि ममता को परेशानी हो तो वो स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

अपनी विघटनकारी-सांप्रदायिक राजनीति के कारण ममता ने लगातार केंद्र सरकार के साथ टकराव का वातावरण बनाया हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में सभी राज्य सरकारों और शैक्षिक संस्थाओं को सरदार वल्लभ भाई पटेल जन्म जयंती (31 अक्तूबर) को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्देश दिया, लेकिन ममता ने बड़ी ढिठाई से इसे मानने से मना कर दिया। याद रहे ये वही ममता हैं जिन्होंने पाकिस्तान के प्रबल समर्थक अल्लामा इकबाल के पोते वलीद इकबाल को पाकिस्तान से बुलाकर सम्मानित किया। वलीद पाकिस्तान की बदनाम सेना की समर्थक माने जाने वाली इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ का नेता भी है। वलीद का सम्मान समारोह 30 मई 2015 को कोलकाता में हुआ। लेकिन केंद्र सरकार के निर्देशों की अवहेला का यह पहला किस्सा नहीं है। इससे पहले ममता ने अध्यापक दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में भी केंद्र सरकार के निर्देशों को ठेंगा दिखाया। एक बार तो ममता ने सैनिक वाहनों की आवाजाही को लेकर केंद्र पर उनका तख्ता पलट करने का आरोप तक लगा दिया और सारी रात सचिवालय में डटी रहीं। नोटबंदी पर वो किस तरह मोदी सरकार पर बिफरीं और कैसे उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों में आकंठ डूबे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मोर्चा बनाया, वो भी आपको अवश्य याद होगा।

चलते चलते एक महत्वपूर्ण बात – बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद आजकल पूरी ताकत से आईएसआई समर्थित इस्लामिक कट्टरवादियों का सफाया करने में लगी हैं। उनके देश के अनेक आतंकवादी भाग कर पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में छुप रहे हैं, कैंप बना रहे हैं। ममता को इस विषय में देशहित का ध्यान रखते हुए सतर्कता बरतनी चाहिए और उनकी उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनकी पार्टी के अनेक पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों पर बांग्लादेश में मवेशियों और अन्य वस्तुओं की तस्करी के आरोप भी लगे हैं। उन्हें इनकी जांच करवानी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन में भारत ही नहीं बांग्लादेश सरकार का भी सहयोग करना चाहिए।

अनुभव बताता है कि इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति जनविरोधी और विकासविरोधी रही है। बंगाल की अधिसंख्य हिंदु आबादी कब तक इसके कारण गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में फंसी रहेगी? धीरे-धीरे लोग समझने लगे हैं कि इस्लामिक कट्टरवाद-अलगाववाद को पालना-पोसना और अराजकता को बढ़ावा देना ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘जनवाद’ नहीं होता। मुसलमानों को पोटने के चक्कर में जिस तरह ममता, मोदी सरकार की विकासोन्मुखी-जनोन्मुखी नीतियों और कार्यक्रमों का विरोध कर रहीं हैं, उससे जनता का अहित ही हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश भर में विकास के मुद्दे को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। भाजपा को मुकुल के समर्थन से इसे घर घर तक पहुंचाना चाहिए।

राजनीतिक दृष्टि से फिलहाल ममता भले ही सुरक्षित दिखती हों, पर सही नीतियों और रणनीतियों से भाजपा उनका पासा पलट भी सकती है। मुकुल राय का भाजपा प्रवेश तो सिर्फ एक चेतावनी है। वैसे भी राज्य में उनके अलावा मुसलमान वोटों के अन्य सौदागर भी हैं। अगर उन्हें याद न हो तो हम याद दिला दें – कांग्रेस और कम्युनिस्ट दल। अगर उन्होंने समय रहते अपना रवैया नहीं बदला तो राज्य के धर्मनिरपेक्ष हिंदू उन्हें समझा देंगे कि असली धर्मनिरपेक्षता क्या होती है।

Exposing Hate India Brigade

The exposure of the Hate India Brigade has many inseparable perspectives; to understand the complexity of this nexus is a national responsibility and requires complete understanding of the underlying meaning of each organisation’s action. This nexus is an amalgamation of NGO’s, international powers, media and politicians that strive together to misguide the Indian national, each has their own agenda. The shock is that to propagate their agenda, a collusion has been formed with terrorists and anti-national forces, resulting in a threat to the safety of our citizens.

The most frightening aspect of this nexus is the illegal work of NGOs. When the CBI investigated registered NGOs, it was found that there were 31 lakh registered NGOs, double the number of registered schools in the country. Per 709 persons there is only one police personnel; but for 400 persons there is one NGO. To have more NGOs than police personnel is a shocking disparity.

An NGO in itself is not objectionable. What is objectionable is when it is driven by the ambition to break the country rather than serving the nation, when the ambition is to spur communal violence, when the ambition is to protect violent Naxals in the name of human rights.

Many NGOs accept money from foreign countries to fight against the implementation of Indian nuclear energy plants. In 2012, the UPA government cancelled the registration of three NGOs that attempted to hamper work on the Kudankulam nuclear plant. The accusation was that they were taking money from America to stage their protests.

When the National Investigation Agency probed the Kashmiri Hawala money, it was found that there were many NGOs involved. When the Narendra Modi government took proactive steps to stop illegal misconduct of NGOs, nationally and internationally, they responded with well-planned and orchestrated propaganda against the government, calling them fascists.

Another group, taken aback by the rise of Narendra Modi, are self-proclaimed non-religious persons who support Islamic hardliners and their agenda, the ‘Award wapsi gang’. In 2014, they felt that it would be difficult to stop Modi from becoming Prime Minister, but issued an appeal to the public, hoping to change the course of the election. In the name of liberalism, they support anti-national activities. They hug the anti-national nonentities from Jawaharlal Nehru University, and in the name of freedom of speech and anti-death penalty, give protection to Naxals and terrorists. Every day they issue statements supporting Hurriyat, and now applaud Karnataka for raising its own flag.

The issue of cow protection has taken the media by storm with false allegations by the nexus making the issue a daily national staple. Protection of cows is enshrined in Article 48 of the Directive Principles of the Constitution. It is testimony that the founders of our Constitution hoped that future governments would create a law to stop cow slaughter.

In Haryana, an example of this gang’s evil was seen in an episode in which one Junaid was killed over a fight for a railway seat. The Hate India Brigade spread rumors at times linking the scuffle to cow vigilantism and at times to eating beef. The Kerala government dramatically declared Rs. 10 Lakh compensation to the family of Junaid. But when the family of Junaid came forward to testify that the quarrel was over a seat and had nothing to do with any other issue, they all fell silent. Their job was only to throw dirt on the government in the hope that someday the defamation will stick.

The ugly face of communists comes forth when it’s seen that all disruptive, anti-national, and terrorist movements are supported by them. For them their ideology is first and the nation is later. They don’t believe in nationalism. They don’t think of India as one, they believe India is a confederation of nations. At times it is suspected that they work at the behest of foreign powers to promote their agenda. Independent India’s greatest tragedy is the hypocrisy of vandals.

Communists never respected the Independence Struggle; they tried to fail the ‘Quit India’ movement. Mahatma Gandhi, Subhas Chandra Bose and Jai Prakash Narayan were mocked. They didn’t stop here and refused to accept independence and started an armed struggle against the nation. In 1962, they supported China; they supported the national emergency and press censorship in 1975.

During the ethnic cleansing of three lakh Kashmiri Pundits, the communists, Congress Party, and media gang were quiet; now they are giving publicity and support to stone pelters. It is well-known that stone-pelters are paid and deadly terrorists are protected. During the attack on the Amarnath yatra, their agenda was to create communal riots all over the nation, but the Modi government handled the situation with a firm hand.

Knowledge of the Malda and Dhulagarh incidents in West Bengal reached Delhi, but the Hate India Brigade and their collaborators in the media simply squashed (read censored) these issues. The Basirhat riots attracted attention when Arnab Goswami and Rahul Shivshankar did a post-mortem of the Bengal riots. After this, it was as if Pandora’s Box was opened. Take the evacuation of Kashmiri pundits or the atrocities of Hindu’s in Bengal, when Hindus die, nobody takes notice.

In the Noida Sector 78 Mahagun Society case, Bangladeshis attacked a gated society on the false accusation made by Zohra Bibi, who worked in flats in the society. A mob of 500 people collected and violently stormed into the gated society. This incident raised many questions, namely, instead of trying to find Zohra Bibi, why did people reach the society with sticks and stones?

Within one night, how did so many people find items to fight with, and who collected them together to fight at 6 a.m.? This incident is evidence of the fact that a greater force is working within the nation, a strategically aligned force, which comes together to brainwash the less-informed public.

We all need to wake up and work for the nation; this is only possible by scrutinizing each action with careful analysis.

The author is a successful businesswoman – IWEC Awardee, social activist, honoured by the  President of India.