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“कठुआ केसः बच्ची की लाश पर मोदी सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र” in Punjab Kesari

कठुआ मामले में मीडिया के एक बड़े वर्ग की भूमिका संदिग्ध ही नहीं निंदनीय भी रही। इस वर्ग ने इसकी कवरेज में जल्दबाजी ही नहीं, ज्यादती भी की। जिस तरह से मामले के तथ्यों से एक खास मकसद से छेड़छाड़ की गई या उन्हें जानबूझ कर छुपाया गया, वो बेहद आपत्तिजनक और भयावह है। कहना न होगा, इस घटना की कवरेज में मीडिया के इस वर्ग ने सारी सीमाएं लांघ दीं। सरेआम पीड़िता की तस्वीरें दिखाई गईं, उसका धर्म बताया गया, और तो और उसके कुछ फर्जी वीडियो भी सर्कुलेट करवाए गए। सारा मामला ये बनाया गया कि ‘दरिंदे हिंदू’ ‘अबला कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं का शीलहरण करते हैं और उनकी बच्चियों तक को नहीं छोड़ते’।

मीडिया के इस वर्ग ने तथ्यों की जांच पड़ताल की कोशिश ही नहीं की क्योंकि उसकी मंशा इसकी थी ही नहीं। इस वर्ग ने भारत से अमेरिका तक इस मसले को उछाला। एक न्यूज चैनल ने ‘एनफ इस एनफ’ (काफी हो गया) शीर्षक से मोदी सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। राहुल गांधी, उनकी बहन और जीजा आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च पर निकल पड़े। पाकिस्तान के हर न्यूज चैनल ने दिखाया कि देखो कैसे ‘अत्याचारी हिंदू’ ‘कश्मीर में मुसलमानों पर जुल्म’ ढा रहे हैं’। अनेक हवाई अड्डों में लोगों को ऐसी टीशर्ट पहने देखा गया जिन पर लिखा गया था कि अपनी बेटियों को भारत मत भेजो, वहां महिलाएं-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। इंग्लैंड के हाउस आॅफ लाड्र्स में पाकिस्तानी मूल के लाॅर्ड अहमद ने ये मामला उठाया तो अमेरिका में इसे लेकर प्रदर्शन किए गए। दिल्ली में स्वाती मालीवाल तो आमरण अनशन पर बैठ गईं।

इस विषय में मोदी सरकार की जितनी किरकिरी की जा सकती थी, की गई। वल्र्ड बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड तक ने भारत में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता जताते हुए मोदी सरकार को नसीहत दे डाली। बाॅलीवुड और हाॅलीवुड की अभिनेत्रियों ने प्लेकार्ड लेकर मोदी सरकार के खिलाफ ट्वीट जारी किए। मोदी सरकार ने महिलाओं और बच्चियों के लिए चार साल जो काम किए, उन्हें एक झटके में मिट्टी में मिलाने की कोशिश की गई। मोदी सरकार ने जिस ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की थी, उसकी धज्जियां उड़ाईं गईं और सरकार को महिला विरोधी करार दे दिया गया।

चैतरफा हमलों से घबराई केंद्र सरकार ने च्चियोें से बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड देने वाला अध्यादेश पारित कर दिया। जबकि होना ये चाहिए था कि इस पूरे षडयंत्र की जल्दी से जल्दी जांच कराई जाती और षडयंत्रकारियों के नाम के साथ सच्चाई देश के सामने लाई जाती। ध्यान रहे जानीमानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों ने ही नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस अध्यादेश के प्रावधानों पर आपत्ति जताई।

अगर केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों या पत्रकारों के षडयंत्रकारी वर्ग ने इस मामले की तफ्तीश में थोड़ा सा भी समय और दिमाग लगाया होता तो, पता लग जाता कि इस विषय में जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा कठुआ के चीफ ज्यूडीशियल मेजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई चार्जशीट में कितने झोल हैं। चार्जशीट में सात लोगों के नाम दिए गए हैं जिनमें संाझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा और पांच पुलिस वाले शामिल हैं।

ध्यान रहे सांझीराम और उनके बेटे विशाल जंगोत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है कि वो बेगुनाह हैं। उन्होंने इस विषय में हलफनामा दायर कर कहा है कि जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच ने उनको फंसाया है। असली अपराधियों को पकड़ने और पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए जरूरी है कि इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा करवाई जाए। उन्होंने कहा कि इस मामले में मिथ्या और भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। खुद को पीड़िता का वकील कहने वाली दीपिका राजावत और उसका साथी तालिब हुसैन असल में ट्रायल कोर्ट में उसके वकील हैं ही नहीं, तब भी वो उसका वकील होने का दावा कर रहे हैं। यही नहीं वो हम पर उन्हें धमकाने का आरोप लगा रहे हैं जबकि धमकाया तो हमें जा रहा है। राज्य सरकार ने इन फर्जी लोगों को सुरक्षा भी उपलब्ध करवाई है, जिसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। सांझीराम ने अपने हलफनामे में पुलिस वालों के चरित्र पर भी सवाल उठाए हैं। स्पेशल टास्क फोर्स में शामिल डीएसपी इरफान वानी के खिलाफ तो बलात्कार का मुकदमा चल रहा है। ज्ञात हो कि सांझीराम या उसके परिवार के खिलाफ राज्य के किसी भी थाने में कभी भी कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनका परिवार देशभक्ति से ओतप्रोत है और उनका एक बेटा तो जलसेना में नौकरी भी करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच की सांझीराम की मांग को अस्वीकार कर दिया है, लेकिन कहा है कि इसकी जांच जम्मू-कश्मीर से बाहर पठानकोट के जिला और सत्र न्यायाधीश करेंगे जिसकी निगरानी वो स्वयं करेगा। सुनवाई रोजाना होगी और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई नौ जुलाई को होगी। अदालत के फैसले से कठुआ के लोगों में मायूसी है, लेकिन उन्हें अब भी उम्मीद है कि पठानकोट की अदालत इस मामले की निष्पक्षता से सुनवाई करेगी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच के षडयंत्र को समझेगी और दूध का दूध और पानी का पानी करेगी।

कठुआ के लोगों की उम्मीद के पीछे एक नहीं अनेक कारण हैं। एक बार को हम मान भी लें कि सांझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा झूठ बोल रहे हैं , तब भी इस मामले में और भी बहुत से ऐसे तथ्य हैं जो प्रथम दृष्टया ही ये स्पष्ट कर देते हैं कि ये पूरा मामला और इस बारे में दायर चार्जशीट कितनी फर्जी है। हम आगे बढ़ें इस से पहले बता दें कि घटना के समय विशाल के मेरठ में होने के सारे सबूत सामने आ चुके हैं, जिनमें वहां की वीडियो फुटेज भी शामिल है। यही नहीं विशाल के दोस्तों ने भी पुलिस पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उन्हें धमका कर विशाल के खिलाफ बयान लिए।

मृतक बच्ची के साथ सहानुभूति के साथ हम ये कहना चाहेंगे कि उसे न्याय मिले, लेकिन हम ये भी कहना चाहेंगे कि निर्दोष सांझीराम और उसके परिवार वालों को भी न्याय मिले और षडयंत्रकारियोें को सख्त से सख्त सजा दी जाए। हम इसे षडयंत्र क्यों कह रहे हैं इसके पीछे कई कारण और अनसुलझे सवाल हैं। इन पर आपको भी गौर करना चाहिए। इस मामले में दस दिन में तीन बार जांच टीम बदली गई, आखिर इसका क्या कारण है? एक ही तारीख को दो पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट क्यों दी गईं और दोनों में अलग-अलग तथ्य क्यों थे? कथित अपराधस्थल (देवस्थान) सील क्यों नहीं किया गया? आरोपियों ने पीड़िता को देवस्थान पर क्यों रखा जबकि वहां लगातार लोगों का आनाजाना था और चार्जशीट में जिन दिनों का उल्लेख किया गया है, उन दिनों वहां उत्सव भी मनाया जा रहा था? लाश सांझीराम के घर से महज 100 मीटर की दूरी पर मिली। अगर उन्होंने अपराध किया होता तो वो लाश को किसी गहरे नाले या घने जंगल में भी फेंक सकते थे, उन्होंने अपने घर के पास ही लाश क्यों फेंकी? चार्जशीट के अनुसार बच्ची से छह दिन तक सामूहिक बलात्कार हुआ, लेकिन पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट उसके गुप्तांग पर क्यों किसी चोट का जिक्र नहीं करती? चार्जशीट में बलात्कार के उल्लेख के बावजूद देवस्थान पर कहीं खून के निशान नहीं मिले, वहां मूत्र अथवा विष्ठा के निशान भी नहीं मिले, जबकि पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट कहती है कि मृतका की आंतों में पची हुई सामग्री थी, क्या ऐसा संभव है? किसने मृतका की तस्वीरें हाई रिसोल्यूशन कैमरे से खींचीं जो तमाम राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय एजेंसियों को भेजी गईं? छह दिन के कथित बलात्कार के बावजूद मृतका के पांव में जूते और सिर पर हेयरबैंड कैसे थे? ये कैसे हुआ कि पुलिस ने मृतका के कपड़ों को धोया और थाने में सुखाया? आरोप लगाया गया है कि मृतका को बेहोशी की दवा दी गई। छह दिन तक इस दवा का क्या असर था? चार्जशीट में उंगलियों और पैरों के निशान क्यों नहीं संलग्न किए गए?

ये घटना कठुआ के रसना गांव में हुई। उसके बाशिंदे कहते हैं कि 16 जनवरी 2018 की रात को गांव का मेन ट्रांसफाॅर्मर फंुक गया। इसकी वजह से पूरे गांव में बिजली नहीं थी। इस बीच रात को ढाई बजे कंबल ओढ़े दो आदमी बुलेट मोटरसाइकिल पर आए। वो आंधे घंटे बाद चले गए। ये संदिग्ध लोग कौन थे? पुलिस उनका पता क्यों नहीं लगा रही? आपको बता दें कि सात दिन गायब रहने के बाद पीड़िता की लाश 17 जनवरी को मिली।

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच और चार्जशीट में कितनी खामियां हैं। जाहिर है ये पूरी कहानी मनमाने तरीके से बिना उचित सबूतों के गढ़ी गई है। ये खामियां चीख-चीख कर कहती है कि इस पूरी घटना के पीछे साजिश है। जिस प्रकार पीड़िता की तस्वीर वायरल की गई, उसका नाम उजागर किया गया, देवस्थान को लांछित किया गया, उस से स्पष्ट है कि इस साजिश के पीछे मकसद सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना और हिंदुओं और भारत को लांछित करना था। जिस प्रकार पूरा घटनाक्रम हुआ और उसे भारत से पाकिस्तान और इंग्लैंड, अमेरिका तक उछाला गया, उससे साफ है कि सब कुछ पूर्वनियोजित था।

कहना न होगा इस पूरी साजिश में षडयंत्रकारी पत्रकारों ने सक्रिय भूमिका निभाई। जिन वकीलों और नेताओं ने इस फर्जी मामले के खिलाफ आवाज उठाई, उन्होंने उन्हें भी खलनायक बना दिया। इन वकीलों और नेताओं में कांग्रेस के लोग भी शामिल थे।

आपको बता दें कि इस मामले को आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) और उसकी राजनीतिक शाखा एसडीपीआई जोर-शोर से कर्नाटक चुनाव में उछाल रहे हैं। सनद रहे कि पीएफआई में प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के अनेक सदस्य प्रमुख पदों पर सक्रिय हैं और इसके बदनाम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी संबंध हैं। ये प्लेकार्ड ले कर घूम-घूम कर लोगों को बता रहे हैं कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म आती है। ये वहीं संगठन है जिसने गुजरात विधानसभा चुनावों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नक्सलियों के साथ मिलकर जिग्नेश मेवानी का समर्थन किया था और उसे धन उपलब्ध करवाया था। पीड़िता की फर्जी वकील दीपिका राजावत का भी जेएनयू के नक्सली सर्किट से घनिष्ठ संबंध है। ये पूरा वो टुकड़े-टुकड़े गैंग है जो नक्सलियों, कश्मीरी आतंकियों और अब जिन्ना के समर्थन में जेएनयू से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया तक ‘आजादी’ के नारे लगाता है और जिसके राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और सरकारी-गैरसरकारी संगठनों में एजेंट बैठे हुए हैं। इनका नेटवर्क किसी भी मुद्दे को बहुत कम समय में दुनिया भर में फैला सकता है। जाहिर है इनके अनेक भारत विरोधी खुफिया एजेंसियों से भी घनिष्ठ संबंध हैं।

ये वही गैंग है जिसकी सरपरस्ती में अनुच्छेद 370 के बावजूद जम्मू में रोहिंग्या लोगों को बसाया गया है और जिसके वकील इनके लिए सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ते हैं। अब इनका निशाना है बकरवाल समुदाय जिसकी पीड़िता एक सदस्य थी। ये समुदाय देशभक्त माना जाता है और श्रीनगर के कट्टरवादी वहाबियों से दूर रहता है। ये पूरा षडयंत्र कहीं न कहीं इस समुदाय को हिंदुआंे से दूर करने और रेडिकालाइज करने का भी है ताकि वो घाटी के इस्लामिक दलों को वोट दें।

देश में जब से मोदी सरकार आई है, ये गैंग तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर दलितों और मुसलमानों को उसके खिलाफ भड़काने के लिए सोचे-समझे तरीके से काम कर रहा है। ये पूरी कोशिश कर रहा है कि दलितों को नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों के संगठनों से जोड़ा जाए। आपको रोहित वेमूला, अखलाक, जुनैद, पशु तस्करों, मध्य प्रदेश में पुलिस भर्ती के दौरान उम्मीदवारों की छाती पर जाति लिखने, जेएनयू, जादवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आदि के विवाद अवश्य याद होंगे जिनमें इस गैंग ने भारत की लचर कानून व्यवस्था और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का नाजायज लाभ उठा कर, मोदी सरकार और देश को अंतरराष्ट्री स्तर पर बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडा।

इस गैंग की निशानी ये है कि ये सिर्फ मुसलमानों या दलितों के मामलों में व्यथित होता है। हिंदुओं पर अगर कोई अत्याचार करे तो इसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस मामले में सीबीआई जांच की मांग खारिज कर दी हो, मगर सरकार को इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। ये सिर्फ पीड़िता को न्याय दिलवाने के लिए ही नहीं, भारत का सम्मान बहाल करने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अब सरकार को सिर्फ कठुआ मामले की ही जांच नहीं करनी चाहिए, उन लोगों को भी पकड़ कर हमेशा के लिए जेल में डालना चाहिए जिन्होंने इसे तोड़-मरोड़ के दुनिया के सामने भारत को कलंकित किया। इस पूरे षडयंत्र में अनेक स्वनामधन्य पत्रकार भी शामिल हैं। सरकार को इनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।