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“दोगले पाकिस्तान को दोस्ती नहीं धक्के की दरकार” in Punjab Keasri

हाल ही में सउदी अरब के दौरे से भीख लेकर लौटे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अब मलेशिया और चीन जाने की तैयारी में हैं। सउदी अरब में जब इमरान से भारत से रिश्तों के भारत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो भारत से अगले साल के लोक सभा चुनावों के बाद बात करेंगे। उन्हांेने कहा, ”भारत में पाकिस्तान को बुरा-भला कह कर वोट मिलते हैं। हमने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्हें वोट चाहिए।” जाहिर है इमरान ने ये बताने की जहमत नहीं उठाई कि भारत ने उनकी दोस्ती क्यों ठुकरा दी। आपको याद दिला दें कि लगभग जिस समय इमरान ‘दोस्ती’ की बातें कर रहे थे, लगभग उसी समय भारतीय विदेश मंत्रालय पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी को बुलाकर जम्मू-कश्मीर के सुंदरबनी सेक्टर में पाकिस्तानी सेना की बाॅर्डर एक्शन टीम द्वारा तीन भारतीय सैनिकों की हत्या पर विरोध जता रहा था।

इमरान ने भले ही रियाद में कश्मीर का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके साथ दौरे पर गए विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने स्वदेश लौटने के बाद अपने सााक्षात्कार में कहा, ”पाकिस्तान भले ही भारत से दोस्ती चाहता है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो ‘कश्मीर में भारत की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगा।” उन्होंने पाकिस्तान समर्थक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के पूर्व आयुक्त जैद राआद अल हुसैन की फर्जी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, ”कश्मीर में ज्यादतियां हो रहीं हैं, ये हम नहीं, दुनिया कह रही है, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कह रही है, दुनिया को अब इसका संज्ञान लेना चाहिए।” उन्होंने कश्मीर में पाकिस्तान के द्वारा आतंक के निर्यात को झूठ ठहराते हुए कहा कि वहां तो लोग ‘आजादी की लड़ाई’ लड़ रहे हैं। 27 अक्तूबर को पाकिस्तान ने कश्मीर के भारत के विलय के विरोध में ‘काला दिन’ मनाया और दिन भर जमकर भारत के विरूद्ध दुष्प्रचार किया।

इमरान और कुरैशी के बयानों से कुछ बातें स्पष्ट होती हैं – इमरान को अब मोदी सरकार से उम्मीद नहीं है, वो 2019 में शायद राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद कर रहे हैं जो खुलेआम भारत विरोधी नक्सली और इस्लामिक आतंकी संगठनों को समर्थन देते हैं। वो भारत से बातचीत दुनिया को दिखाने के लिए करना चाहते हैं ताकि पाकिस्तान की आतंकवादी छवि के कलंक को साफ किया जा सके और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा ग्रे लिस्ट में डाले जाने के असर को कम किया जा सके। ध्यान रहे एफएटीएफ आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है।

इमरान और पाकी सेना की भारत और कश्मीर नीति में कोई अंतर नहीं आया है। इमरान सरकार ने जमात-उद-दावा सरगना हाफिज सईद और उसकी फर्जी समासेवी संस्था फलाह-ए-इंसानियत को देश की प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची से बाहर कर भारत ही नहीं, अमेरिका को भी संदेश दिया है कि वो भले ही उसके सर पर करोड़ों डाॅलर का ईनाम रखे पर पाकिस्तान न तो उसे रोकेगा और न ही उसकी आतंकी गतिविधियों को। ज्ञात हो कि हाफिज सईद सिर्फ कश्मीरी ही नहीं, अनेक खालिस्तानी और रोहिंग्या आतंकियों की सरपरस्ती भी करता है।

दोगला इमरान एक ओर तो बातचीत की पेशकश करता है, जबकि वास्तविकता ये है कि उसके आने के बाद पाकिस्तानी घुसपैठ और आतंकी कार्रवाइयां नियंत्रण रेखा से आगे बढ़, अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गई हैं। बदनाम पाकी खुफिया एजेंसी न केवल पंजाब में खालिस्तान के नाम पर हिंसा की साजिश रच रही है, बल्कि पंजाब, राजस्थान स्थित सीमा से घुसपैठिए और मादक पदार्थ भी भेज रही है। पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ दुनिया को भड़काने की हर संभव कोशिश कर रहा है। चाहे खालिस्तान के लिए ‘रेफरेंडम 2020’ का मामला हो या कश्मीर के विलय के खिलाफ ‘काला दिवस’ मनाने का, वो अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों में भारत के खिलाफ सक्रिय अभियान चला रहा है। उसे अफगानिस्तान में भारत का दखल अब भी मंजूर नहीं है और वो वहां अपनी नाक कटवा कर भी भारत का शगुन बिगाड़ने की इच्छा रखता है।

पाकिस्तान दीवालिया होने की कगार पर है और इमरान प्रधानमंत्री निवास की लक्जरी गाड़ियां और भैंसे बेचने पर मजबूर हो गए हैं, ऐसे में सहज ये सवाल उठता है कि जब देश की हालत इतनी पतली है तो वो आखिर भारत के विरोध के लिए संसाधन कैसे जुटा रहा है? इसका सीधा सा जवाब ये है कि आर्थिक तंगी के बावजूद पाकिस्तानी संसद ने सेना के बजट में कटौती की हिम्मत नहीं दिखाई है। ‘देश की सुरक्षा’ के नाम पर सेना अब भी भूखी-नंगी जनता का पेट काट कर ऐश कर रही है और दुनिया भर में आतंक फैला रही है। पाकी सेना ने विश्व में मादक पदार्थों की तस्करी का बड़ा जाल बिछाया हुआ है। भारत में हम तो सिर्फ ये जानते हैं कि कुख्यात आतंकी दाउद इब्राहिम उसके लिए काम करता है, लेकिन दुनिया में दाउद जैसे न जाने कितने तस्कर और आतंकी पाकी सेना की छत्रछाया में पलते हैं, ये कम ही लोग जानते होंगे। आखिर दुनिया में आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने उसे ऐसे ही तो ‘ग्रे लिस्ट’ में नहीं डाला। अपनी आतंकी हरकतों के लिए पैसा जुटाने के लिए पाकी संस्था देश में अनेक उद्योग चलाती है और सेना के अफसरों के परिवार वाले ही नहीं, खुद वो भी ठेकेदारी करते हैं।

बहुत दिन नहीं बीते जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भी आईएसआई की काली करतूतों में सक्रियता से सहयोग करती थी। अमेरिका के वर्तमान विदेश सचिव माइक पाॅम्पिओ सीआईए के पूर्व डायरेक्टर हैं, उन्हें पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क और ठिकानों की पूरी जानकारी है। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान द्वारा अपने यहां आतंकी ठिकानों की बात झुठलाने के बावजूद, वो बार-बार पाकिस्तान से इन्हें समाप्त करने की बात करते हैं। पाकिस्तान की आतंकी फंडिंग में चीन भी उसकी खासी मदद करता है। भारत में चल रही देश-विरोधी गतिविधियों में चीन और पाकिस्तान दोनों का ही सहयोग रहता है। हाल ही में जब चीनी गृह मंत्री झाओ केझी भारत आए तो गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे जैश-ए-मौहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में मदद करने के लिए तो कहा ही, साथ ही यूनाइटेड लिबरनेशन आॅफ असम के प्रमुख परेश बरूआ को भी चीन में शरण न देने के लिए कहा। बात चाहे भारत के भीतर की हो या मालदीव, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार या बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की, चीन और पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने और घेरने में एक दूसरे का पूरा सहयोग करते हैं।

मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने की नीति अपनाई थी, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने इसकी काट इमरान खान में ढूंढी। सेना को लगता है कि इमरान एक अपेक्षाकृत ईमानदार, आधुनिक खिलाड़ी के रूप में जाने जाते हैं। उनके कंधे पर बंदूक रखकर वो विश्व में अपनी छवि को बदलने का अभियान चला सकती है। नवाज शरीफ के कुछ बेबाक बयानों के कारण पाकी सेना को तगड़ा झटका लगा, लेकिन इमरान के आने के बाद उसने अपना जनसंपर्क अभियान बहुत तेजी से शुरू कर दिया है। इमरान तो अपने विदेशी दौर अब शुरू कर ही रहे हैं, सेना प्रमुख कमर जावदे बाजवा उनसे पहले ही अनेक यूरोपीय और अरब देशों के दौरे भी कर आए हैं।

बाजवा, इमरान और उनकी टीम अब दुनिया भर में घूम घूम कर ये भ्रम फैला रहे हैं कि हम तो बात करना चाहते हैं, लेकिन भारत ही तैयार नहीं होता। 24 अक्तूबर में दुनिया ने संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया। इस अवसर पर पाकिस्तान ने अपने यहां मौजूद विदेशी प्रतिनिधियों को बुला कर एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया और बातचीत तोड़ने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। जाहिर है अब इमरान ‘शांति के मसीहा’ बनने की कोशिश कर रहे हैं।

जाहिर है, इमरान के प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सक्रिय होने की कोशिश कर रहा है और सउदी अरब, तुर्की, चीन जैसे पुराने दोस्तों से गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश कर रहा है। भारत भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का बहिष्कार करे, लेकिन नई परिस्थितियों में इतने से काम नहीं चलेगा। भारत को दुनिया में पाकिस्तान विरोधी अभियान एक बार फिर सक्रियता से आरंभ करना होगा। कश्मीर और भारत में पाकिस्तानी आतंकी गतिविधियों की जानकारी दुनिया को नियमित रूप से और आवश्यक हो तो पूरी तैयारी के साथ देनी होगी। जहां-जहां इमरान या बाजवा जाते हैं, वहां अपना दूत भी भेजना होगा। सिर्फ पाकिस्तानी अधिकारियों को विदेश मंत्रालय में बुलाकर विरोध प्रकट करने से काम नहीं चलेगा।

भारत के कुछ राजनीतिक दल अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वाथों और वोट बैंक की राजनीति के चलते, भारत विरोधी ताकतों को हवा देते हैं और उनके हर कुकृत्य को ‘लोकतंत्र’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर सही ठहराने की कोशिश करते हैं। ऐसी ताकतें भले ही कितना उत्पात करें, इनसे सख्ती से निपटना होगा। आईएसआई आज सिर्फ घुसपैठिए ही नहीं भेजती, उसकी सोशल मीडिया आर्मी युवाओं में भीतर तक घुसपैठ कर चुकी है। ये लोग लगातार एक फर्जी नेरेटिव को हवा दे रहे हैं जो कहता है, ‘देश में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं, उनमें भारी नाराजगी और असंतोष है’, ‘भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार कर रहे हैं और इनका मुकाबला करने के लिए दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को एक हो जाना चाहिए’। कुल मिलाकर पाकिस्तान भारत के चुनावों को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

संक्षेप में कहें तो भारत को पाकिस्तानी चुनौती को हलके में नहीं लेना चाहिए। चाहे गृह मंत्री राजनाथ सिंह हों या थलसेना प्रमुख जनरल रावत, पाकिस्तान को बार-बार चेतावनी तो देते हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती। पाकिस्तान की सारी भुखमरी और मुफलिसी के बावजूद उसकी सेना का आतंकी नेटवर्क चाक-चैबंद है और उसे भारत में भी समर्थन देने वालों की कमी नहीं है। मजबूत पाकिस्तान भारत के हित में नहीं है। भारत सरकार को चाहिए कि वो पाकिस्तान पर पैनी निगाह रखे और देश की बाहर ही नहीं भीतर भी उसके हर षडयंत्र का जवाब दे।

“इमरान! तुम सेना के बूट पाॅलिश करने वाले नहीं तो और क्या हो?” in Punjab Kesari

चुनावी नतीजे आने के बाद अपने पहले विजय संबोधन में इमरान खान ने भारतीय मीडिया से शिकायत की कि उसने उन्हें बाॅलीवुड फिल्मों के विलेन (आतंकी पाकी सेना के एजेंट) के तौर पर पेश किया। अगर इमरान के नजरिए से देखें तो हो सकता है कि उनकी शिकायत जायज हो, लेकिन अगर ठोस तथ्यों के आधार पर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मीडिया का रवैया बहुत हद तक सही है। वैसे भी भारतीय मीडिया इमरान की तरह सेना के इशारों पर नहीं चलता जिन्हें उनकी दूसरी पूर्व पत्नी रेहाम खान सेना का ‘बूट पाॅलिशर’ करार दे चुकी हैं।

भारतीय मीडिया अगर इमरान को सेना का एजेंट मानता है जो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। बात शुरू करते हैं प्री-पोल रिगिंग से यानी चुनाव से पहले की धांधली से। क्या ये अकस्मात था कि पाकिस्तानी अदालतों ने चुनाव से एन पहले ताबड़तोड़ कई फैसले सुनाए और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को जेल भिजवा दिया? क्या ये महज संयोग था कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज (पीएमएलएन) के अनेक मजबूत उम्मीदवारों को धमकाया गया और पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया गया? क्या ये संयोग था कि चुनाव प्रचार के दौरान इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को वरीयता दी गई जबकि पीएमएलएन और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को अनेक स्थान पर रैली करने की इजाजत तक नहीं दी गई? आखिर किसकी शह पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद के गुर्गों को चुनाव लड़ने की मोहलत दी गई? आखिर क्यों एन चुनाव से पहले 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना और घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया? आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने इमरान को जिताने के लिए पूरी बिसात बिछाई….इतनी मेहनत (धांधली) की? आखिर क्यों सेना और इमरान की आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूजचैनलों पर गाज गिराई गई, उनका प्रसारण का रोका गया?

इसका जवाब इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ने दिया। उन्होंने इसके लिए साफ तौर से पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने साफ कहा कि आईएसआई अपने इरादे पूरे करने के लिए अदालतों, मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सबको धमकाती है। जज सिद्दिकी को 30 जुलाई को उनकी इस ‘हिमाकत’ के लिए सजा भी दे दी गई। वो इमरान खान नाअहली (अयोग्यता) केस की सुनवाई करने वाली डिवीजनल बैंच के सदस्य थे। उन्हें बड़ी बेशर्मी से इससे हटा दिया गया और उनकी जगह जज मियां गुल हसन औरंगजेब को शामिल किया गया। इस मामले की सुनवाई एक अगस्त को होनी है, लेकिन फैसला क्या आएगा, लगता है ये भी पहले ही तय हो चुका है।

अब बात करते हैं चुनाव के दौरान होने वाली धांधलियों की। आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि ये सिर्फ भारतीय मीडिया नहीं था जिसने पाकिस्तानी चुनावों को फर्जी करार दिया। पाकिस्तान के अनेक दलों ने चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार किया है। पीएमएलएन और पीपीपी ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे तक मांग लिए। 27 जुलाई को विपक्षी दलों की बैठक में पीएमएलएन और मुŸााहिदा मजलिए-ए-अमल ने चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। नेशनल असेंबलीऔर राज्यों की विधानसभाओं के करीब 300 उम्मीदवारों ने फिर से मतगणना की मांग की है।

इमरान खुद को पाकिस्तान का नया हीरो मानने की गलतफहमी पाल सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें खुद नहीं सोचना चाहिए कि उनकी और आईएसआई की इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद क्यों वो नेशनल असेंबली और पंजाब विधानसभा में सादा बहुमत तक नहीं हासिल कर सके? ऐसा क्या हुआ कि आतंकियों को चुनाव लड़वाने की महत्वकांक्षी योजना क्यों मुंह के बल गिर पड़ी? आईएसआई की पूरी मेहनत के बावजूद वो एक सीट तक नहीं हासिल कर सके?

इमरान क्या इस बात का जवाब देना चाहेंगे कि जो मतगणना चंद घंटों में पूरी हो जाती है, वो चार दिन तक भी पूरी क्यों नहीं हो सकी? नेशनल असेंबली की करीब 18 सीटें ऐसी हैं जिनमें इमरान की पार्टी की जीत का अंतर 1,000 मतों का भी नहीं है। 23 सीटों में जीत का अंतर 5,000 से भी कम है, जबकि 41 सीटों में 10,000 से भी कम। ध्यान रहे इन सीटों पर रिजेक्टेड वोट हजारों में हैं।

मतगणना में देरी क्यों की गई? अन्य सीटों के मुकाबले चुनींदा सीटों पर ही रिजेक्टेड वोट इतनी बड़ी तादाद में क्यों पड़े? क्या पाकिस्तान के वोटर इतने जाहिल हैं कि वो ठीक से वोट तक नहीं दे सकते? आखिर एन चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग का सर्वर क्यों जवाब दे गया? ऐसे हालात में पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी क्यों आंख मंूद कर मान ले कि पाकिस्तानी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुए?

27 जुलाई को इस्लामाबाद में अपने संवाददाता सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के निगरानी दल ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से अवसर नहीं मिला। इमरान भले ही इस बार के चुनावों को सबसे साफ-सुथरे बता रहे हों, लेकिन यूरोपियन यूनियन इलेक्शन आॅब्सर्वेशन मिशन (ईयूईओएम) के चीफ आॅब्सर्वर माइकल गेहलर ने साफ कहा, “इस बार के चुनाव 2013 के चुनावों जितने अच्छे नहीं थे। हालांकि सभी पार्टियों को निष्पक्ष तरीके से समान अवसर देने के लिए अनेक वैधानिक उपाय मौजूद थे, लेकिन हमारा निष्कर्ष है कि न तो इस मामले में समानता बरती गई और न ही पार्टियों को बराबरी से अवसर मिले। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व सŸाारूढ़ दल को हानि पहुंचाने के लिए व्यवस्थागत तरीके से प्रयास किए गए। राजनीतिक दलों, नेताओं, उम्मीदवारों और चुनाव अधिकारियों पर लगातार हमलों ने चुनाव प्रचार के माहौल को प्रभावित किया।“

यूरोपियन पार्लियामेंट इलेक्शन आॅब्सर्वेशन डेलीगेशन के प्रमुख जीन लैम्बार्ट ने मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में फौजियों की उपस्थिति पर आपŸिा दर्ज करवाई। उन्होंने कहा, “हम मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में सुरक्षाबलों की उपस्थिति से हैरान थे। हम सुरक्षा की आवश्यकता समझते हैं, लेकिन चुनाव सिविल सोसायटी का काम होता है, हम चाहते हैं कि इसमें सेना से ज्यादा सिविल संस्थाओं का सुपरविशन हो, खासतौर से मतदान केंद्रों के भीतर जहां लोग वोट डालते हैं।”

यही नहीं काॅमनवेल्थ पर्यवेक्षकों ने भी अनेक विषयों पर आपŸिा जताई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में कहा, ”शासन-प्रणाली की मजबूत लोकतांत्रिक और सिविल संस्थाओं का विकास पाकिस्तान के दीर्घकालिक स्थायित्व और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में अमेरिका, मतदान पूर्व चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों को लेकर पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की चिंताओं से सहमति जताता है। इनमें अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना भी शामिल है….हम इस विषय में ईयूईओएम के निष्कर्षों से भी सहमत हैं।“

यूरोपियन यूनियन, काॅमनवेल्थ और अमेरिका इशारों ही इशारों में जिन्हें पाकिस्तान के लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे हैं, क्या इमरान उसे नहीं समझ पा रहे हैं? क्या ये ‘लोकतंत्र के दुश्मन’ ही तो इमरान के दोस्त नहीं हैं? ये सिर्फ भारत का मीडिया ही नहीं है जो उन्हें सेना का पिट्टू मानता है, पूरी दुनिया और खुद उनके देश के लोग और चुने गए स्वतंत्र उम्मीदवार भी यही मानते हैं जिन्हें इमरान को समर्थन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इमरान ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’, झूठा और न जाने क्या क्या कहा, वो हो सकता है भारत में मुसलमान वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलोें को बहुत भाया हो, लेकिन उससे करोंड़ों-करोड़ लोगों को इमरान से वितृष्णा भी हुई है। इमरान ने नवाज शरीफ को मोदी का यार बताते हुए नारा लगाया – जो मोदी का यार है, वो देश का गद्दार है। नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए पर इमरान ने उनपर ‘देश बेचने’ का आरोप लगा दिया। न केवल चुनावी भाषणों में, बल्कि अपने विजय संबोधन में भी इमरान ने जैसे कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताया और भारतीय फौज को गाली दी, उससे भारत की आम जनता का उनसे मोहभंग होना स्वाभाविक है।

ये आश्चर्यचकित ही करता है कि जो इमरान पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नवाज शरीफ को भारत से व्यापार के लिए ‘गद्दार’ बताते रहे, वो अपने विजय संबोधन में आतंकवाद को जायज ठहराते हुए भी भारत से दोस्ती के गीत गाने लगे, भारत के साथ ‘व्यापार संबंधों’ की बात करने लगे? डूबती हुई पाकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में 100 दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की है। जाहिर है, भारत के साथ व्यापारिक संबंध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्हें अब थूक कर चाटना भी मंजूर है। इमरान, शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन चले अपने धरने को इतनी जल्दी भूल जाएंगे, ऐसा सोचा भी न था।

इमरान खान! भारतीय मीडिया तुम्हें ‘बाॅलीवुड के विलेन’ की तरह नहीं पेश कर रहा, तुम्हें सिर्फ ‘सच का आइना’ दिखा रहा है। तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें पाकिस्तान के युवाओं की धड़कन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है, हालांकि हम ये भी नहीं मानते। इस बार कुल 51.85 प्रतिशत मत पड़े, इसमें सिर्फ तुम्हारे समर्थक और युवा ही नहीं, दूसरी पार्टियों के समर्थक और सभी आयुवर्ग के लोग थे। ऐसे में हमारे लिए ये बात गले के नीचे उतारना मुश्किल है कि तुम युवाओं के दिल की धड़कन हो, लेकिन जैसे आईएसआई ने तुम्हें जितवाने के लिए जी जान एक कर दिए, उससे ये तो साफ है कि तो सेना के मुखबिर हो।

भारत की सेना को लतिया कर तुम भारत के नेताओं का समर्थन नहीं हासिल कर सकते। पाकिस्तान के आवाम ने हाफिज सईद के उम्मीदवारों को धक्का दे कर ये स्पष्ट कर दिया है कि वो आतंकवाद के समर्थक नहीं है। अगर तुम्हारी सेना खुद ये बात समझ जाए, या तुम उन्हें अपनी नीतियों बदलने के लिए तैयार कर सको तो दोनों देशोें के संबंध बेहतर हो सकते हैं। याद रखना आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। अगर तुम और तुम्हारी सेना कश्मीर सहित पूरे भारत में अपना आतंकी नेटवर्क समेटने के लिए गंभीरता दिखाओगे तो भारत तुम्हारी अवश्य मदद करेगा। पहल तुम्हें और तुम्हारी सेना को ही करनी होगी।

“आतंकियों और आईएसआई के साए में पाकिस्तानी आम चुनाव” in Punjab Kesari

पाकिस्तान में आम चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इस बार वहां की सर्वशक्तिमान सेना ने पूर्व क्रिकेट कप्तान इमरान खान नियाजी पर दांव खेला है और उसे प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए हर संभव जोड़-तोड़ की है। चुनावों में पाकिस्तानी सेना के हस्तक्षेप की तस्दीक इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिदिकी ने भी की है जिन्होंने आरोप लगाया है कि बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई मनवांछित फैसले हासिल करने के लिए न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाती है और वो नहीं चाहती की भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजे गए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को चुनावों से पहले जमानत मिले।

इमरान के साथ ही अबकी बार सारी दुनिया की नजर पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के उम्मीदवारों पर भी लगी है जो भारी तादाद में चुनाव लड़ रहे हैं। कहना न होगा कि सेना ने इन चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग या उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए किया है। लेकिन ‘मुख्यधारा में लाना’ जैसी शब्दावली इस खेल को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। असल में सेना ने आम चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों को राजनीतिक वैधता और कानूनी मान्यता दिलवाने और दुनिया को चिढ़ाने के लिए किया है। इस हरकत से सेना ने दुनिया को जता दिया है – हां हमारे देश में आतंकी हैं, हमने उन्हें पैदा किया है, हम उनकी मदद लेते हैं और हम उन्हें दुनिया के कहने से छोड़ेंगे नहीं और अब हम उन्हें संसद में भी पहुंचाएंगे। जो करना है वो कर लो, हमारे ठेंगे से।

असल में सेना के इरादों की भनक तभी लग गई थी जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को पनामा पेपर लीक मामले में अयोग्य घोषित किए जाने के बाद उनकी लाहौर (एनए-120) सीट पर अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग का उम्मीदवार याकूब शेख निर्दलीय के तौर पर खड़ा किया गया। ये सीट शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज ने जीती। यहां दूसरे स्थान पर इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की उम्मीदवार यास्मीन राशिद रहीं तो तीसरे स्थान पर याकूब शेख रहा जिसे 5,822 वोट मिले।

पाकिस्तानी चुनाव आयोग की मानें तो इस बार चुनावों में आतंकी संगठन जमात-उद-दावा सहित धार्मिक संगठनों के 460 से ज्यादा उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जो कि एक रिकाॅर्ड है। इन संगठनों में तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान और पांच इस्लामी पार्टियों का संगठन मजलिस-ए-अमाल (एमएमए) शामिल हैं। आतंकी सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग को चुनाव आयोग ने मान्यता नहीं दी है इसलिए उसके 265 उम्मीदवार अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के परचम तले चुनाव लड़ रहे हैं। हाफिज का बेटा हाफिज ताल्हा सईद और दामाद खालिद वलीद भी उसके उम्मीदवारों की सूची में शामिल हैं। ध्यान रहे मुंबई हमलों का आरोपी हाफिज सईद संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी है और अमेरिका ने उसके सर पर एक करोड़ों का इनाम रखा है।

बरेलवी विचारधारा की तहरीक-ए-लबैक या रसूल अल्लाह की राजनीतिक इकाई तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान ने 178 उम्मीवार खड़े किए हैं। ये कट्टरवादी पार्टी पिछले साल नवंबर में चर्चा में आई जब इसने खत्म-ए-नबूवत को लेकर इस्लामाबाद में धरना किया जो कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे के साथ समाप्त हुआ। धरना खत्म होने पर सेना के अफसरों ने इसके कार्यकर्ताओं में रूपए बांटे जिसकी काफी आलोचना भी हुई। सेना के लोगों ने जैसे इस तहरीक का धरना हटवाने की जगह इसके कार्यकर्ताओं को रूपए बांटे, उससे दोनों की सांठ-गांठ ही उजागर हुई।

एमएमए ने 192 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इसमें शामिल पांच संगठन हैं – जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ, जमात-ए-इस्लामी, जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान, इस्लामी तहरीक और मरकजी जमीयत अहले हदीथ। जमात-ए-इस्लामी का राजनीति इतिहास पुराना है। उसने 1970 के चुनावों में जुल्फीकार अली भुट्टो की पीपल्स पार्टी और शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग के खिलाफ भी बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे थे। वर्ष 2002 के चुनावों में एमएमए ने पूरे देश में बड़ी तादाद में उम्मीदवार लड़वाए थे, लेकिन इस बार इनकी प्रत्याशियों की संख्या सर्वाधिक है।

इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान में कट्टरवादी धार्मिक पार्टियों का चुनाव लड़ना कोई अजूबा नहीं है। लेकिन इस बार सिर्फ धार्मिक पार्टियों का ही नहीं, आतंकी पार्टियों का चुनाव में बड़ी तादाद में उम्मीदवार उतारने का आखिर मकसद क्या है। जाहिर है इसके पीछे सर्वशक्तिशाली सेना का इरादा ये है कि या तो उसका पिट्ठू इमरान खान जीते या फिर किसी को भी बहुमत न मिले। ऐसी स्थिति में जाहिर है बडे़ दलों को आतंकी संगठनों के पास समर्थन के लिए आना पड़ेगा जो नेपथ्य में और कुछ नहीं बल्कि सेना की ही प्राॅक्सी हैं। यानी येन केन प्रकारेण नियंत्रण सेना का ही रहेगा।

शायद ये सेना का ही इशारा था कि 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। फजलुर को पार्टी में शामिल करवाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता की पीटीआई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष असद उमर ने। असद मेजर जनरल गुलाम उमर का बेटा है जिस पर पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश में हजारों लोगों के कत्ल का आरोप है। वैस आगे बढ़ने से पहले ये भी बताते चलें कि इमरान खान जिनका पूरा नाम इमरान खान नियाजी है, उन्हीं जनरल अमीर अब्दुला खां नियाजी के कुनबे से हैं जिन्होंने ढाका में लेफ्टीनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष 16 अगस्त 1971 में समर्पण किया था। ध्यान रहे फजलुर रहमान अमेरिका द्वारा घोषित वैश्विक आतंकवादी है जिसके सेना से ही नहीं, अल-कायदा से भी करीबी संबंध हैं। 1996 में जब ओसामा बिन लादेन ने विश्व जिहाद की घोषणा की थी तब उसके घोषणापत्र पर ओसामा के साथ खलील ने भी हस्ताक्षर किए थे। अमेरिका ने हरकत-उल-मुजाहीदीन पर 1997 में प्रतिबंध लगा दिया था और उसे वैश्विक आतंकी संगठन घोषित कर दिया था, लेकिन 2013 में ये अंसार-उल-उम्मा के रूप में फिर सामने आया। लेकिन अमेरिका ने 2014 में इसे एचयूएम का ही दूसरा नाम करार दिया। एचयूएम पर भारत और अफगानिस्तान के अलावा खुद पाकिस्तान में भी बड़े आतंकी हमले करवाने का आरोप है।

पाकिस्तानी चुनावों में जिस तरह अतिवादी और आतंकी जमातें बढ़-चढ़ कर भाग ले रही हैं, उससे दुनिया भर में ही नहीं, स्वयं पाकिस्तान में भी चिंता है। पाकिस्तानी मानवधिकार आयोग ने चुनावों में प्रतिबंधित तंजीमों के भाग लेने की कड़े शब्दों में निंदा की है। आयोग कहता है, “हम प्रतिबंधित तंजीमों के चोरी-छुपे दूसरी तंजीमों के नाम से चुनाव लड़ने और राज्य द्वारा उन्हें चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दे कर राजनीतिक वैधता प्रदान किए जाने से शंकित हैं । इन तंजीमों ने लगातार धर्म का इस्तेमाल खतरनाक और विभाजनकारी अभियान के लिए किया है जो गंभीर चिंता का विषय है। हम चुनाव आयोग से प्रार्थना करते हैं कि वो इस बात की दोबारा जांच करे कि प्रतिबंधित संगठनों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में कैसे आ गए।“ आयोग आगे कहता है, “पाकिस्तान के चुनावों की वैधता को लेकर गंभीर शंकाएं हैं, देश में प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने की राह में इससे गंभीर बाधाएं पैदा होंगी। 25 जुलाई को होने वाले चुनाव देश के इतिहास के सबसे गंदे, मनवांछित परिणाम पाने के लिए सबसे ज्यादा बारीकी से मैनेज किए गए और सर्वाधिक भागीदारी वाले चुनाव होंगे।“

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने ही नहीं, अनेक राजनीतिक दलों ने भी चुनावों में प्रतिबंधित संगठनों के प्रतिनिधियों के भाग लेने पर चिंता जताई है। हालांकि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के अलावा लगभग सभी दलों के नेताओं ने इन तंजीमों की चैखट पर माथा टेका है। पीपीपी प्रमुख बिलावल भुट्टो ने तो आतंकवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। इमरान खान ने भी अपने घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है, लेकिन जैसे उनकी पार्टी में आतंकवादी शामिल हुए हैं, उसके बाद तो उनसे कोई उम्मीद करना ही बेकार है। नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ट्रैक रिकाॅर्ड सबसे बदतर है। वो पिछले पांच साल से सत्ता में थे, लेकिन उन्होंने इन तंजीमों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया, उल्टे सरकारी खजाने से उन्हें मदद ही दी।

पाकी सेना चुनावों के जरिए आतंकियों को राजनीतिक वैधता दिलवाने का जो खेल खेल रही है, पूरी दुनिया की नजर उसपर है। विश्व में टैरर फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्ट फोर्स पहले ही उसे ग्रे लिस्ट में डाल चुकी है। टास्क फोर्स ने उसे आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए 126 शर्तों की सूची सौंपी है। मौजूदा हालात में तो नहीं लगता कि नई सरकार, खासतौर से अगर वो इमरान खान की हुई, तो इन्हें पूरा कर पाएगी।

पाकी संसद में आतंकवादियों के आने का असर पहले से ही खराब चल रहे भारत-पाक रिश्तों पर भी पड़ेगा। भारत वैसे भी सीधे पाकी सेना से बात नहीं करता है, संसद में बैठे आतंकी आकाओं से तो क्या ही बात होगी। इमरान ने अपने घोषणापत्र में भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने और ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ शुरू करने की बात कही है। आतंकियों के साये में ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ तो क्या ‘ट्रैक टू डायलाॅग’ भी मुश्किल से हो पाएगा। पाकिस्तान आर्थिक दीवालिएपन की कगार पर तो पहले ही पहुंच चुका है। ‘लाडले इमरान’ के साथ मिलकर सेना जो खेल खेल रही है और जैसे अन्य राजनीतिक दलों को धता बता रही है, उससे तो बड़े पैमाने पर राजनीतिक असंतोष फैलने और देश के एक बार फिर टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत को फिलहाल पाकिस्तान में किसी भी तरह से दखल नहीं देना चाहिए। अगर वहां की नई सरकार अपने हालात को संभालने की गरज से कोई प्रस्ताव रखती है, तो उसे अपनी शर्तों पर ही स्वीकार करना चाहिए।

“नवाज शरीफ की वापसी, इमरान को नहीं, सेना को चुनौती है” in Punjab Kesari

स्तानी संसद के निचले सदन कौमी असेम्बली या नेशनल असेम्बली के ताजा चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को हराने के लिए करोड़ों रूपए बांटे थे। तबके आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी ने स्वयं फरवरी, 2012 में एक मुकदमे के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख मिर्जा असलम बेग ने उन्हें इसका आदेश दिया था। इस योजना के लिए धन जुटाने वाले बैंकर युनुस हबीब ने बताया कि राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान ने इस योजना के लिए 34 करोड़ रूपए मंजूर किए थे। सेना के जनरल जब बेनजीर को राजनीति से बाहर नहीं कर सके तो उन्होंने उनकी हत्या ही करवा दी। 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर एक चुनावी रैली के दौरान मारी गईं। उन्हें इसकी आशंका थी और मरने से पहले उन्होंने अपने करीबियों से अंदेशा जताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ उनकी हत्या करवा सकते हैं।

हम लौट कर ताजा चुनावों पर आते हैं। ये चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं क्योंकि इस बार भी सेना नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज को हराने और इमरान खान को प्रधानमंत्री पद की गद्दी पर बिठाने के लिए पूरी जोड़-तोड़ कर रही है। पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां जब भी कोई राजनेता सेना को चुनौती देता है या चुनौती देने लायक शक्तिशाली बन जाता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं। 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार बरखास्त कर दी। 1954 में जनरल अयूब खान की मदद से उन्होंने संविधान सभा को ही भंग कर दिया ताकि वो उनके अधिकारों में कटौती न कर पाए। 1958 में राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को हटा कर अयूब खान को मुख्य मार्शल लाॅ प्रशासक बना दिया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया और बाद में तो उन्हें फांसी ही दे दी। जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर की भी हत्या करवा दी गई। 1999 में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर मुशर्रफ न कमान संभाली तो 26 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी को एक मामले में फंसा कर चलता कर दिया गया।

नवाज शरीफ ने जब इस बार, यानी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उन्होंने सेना को तुष्ट करने की पूरी कोशिश की। विदेश और रक्षा नीति खुद सेना संभालती है, इसलिए उन्होंने चार साल तक स्वयं विदेश मंत्रालय की कमान संभाली ताकि सामंजस्य में कोई कोताही न हो। लेकिन शरीफ ने दृढ़तापूर्वक ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि लोकतांत्रिक सरकार सम्मानपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और सेना की पिछलग्गू न हो कर रह जाए। संभवतः इसी वजह से सेना को शुरू से ही लगने लगा कि अगर नवाज शरीफ के पर नहीं कतरे गए तो वो आगे चलकर पाकिस्तान में सेना के प्रभुत्व और श्रेष्ठता को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और आखिरकार सेना को सिर्फ दिखावे के लिए ही नहीं, वास्तव में भी चुने हुए प्रतिनिधियों के मातहत काम करना पड़ेगा।

भारत में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों का बुलाया। शरीफ को भी न्यौता भेजा गया। पाकी सेना ने उन्हें भारत न जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी ने गर्मजोशी से इसका जवाब भी दिया और उनके जन्मदिन पर पाकिस्तान भी गए। दोनों प्रधानमंत्री रिश्तों में बेहतरी चाहते थे, लेकिन भारत के विरोध के नाम पर रोजी-रोजी चलाने वाली पाकी सेना को ये मंजूर नहीं हुआ। नवाज शरीफ का कद छांटने के लिए कठपुतली इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को तैयार किया गया। उन्होंने नवाज शरीफ के कथित ‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन तक धरना दिया। इसके बाद नवाज शरीफ जो दबाव में आए तो उभर नहीं सके। कुछ समय बाद इमरान खान ने पनामा पेपर केस में नवाज शरीफ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया और सेना-अदालत की मिलीभगत से नवाज को पहले चुनाव लड़ने और फिर अपनी पार्टी की अध्यक्षता करने के भी अयोग्य करार दे दिया गया।

क्योंकि शरीफ के खिलाफ शिकायत सीधे सुप्रीम कोर्ट में की गई थी, कोर्ट ने सारे मामले नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (नैब) को भेज दिए जिसे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनाया गया है। नैब ने सबसे पहले उन्हें लंदन के पाॅश इलाके में बने एवनफील्ड हाउस में चार लक्जरी फ्लैट खरीदने के मामले में 10 साल कैद और आठ मिलियन पाउंड जुर्माने की सजा दी। इसी मामले में उनकी बेटी मरियम और दामाद रिटायर्ड कैप्टन सफदर को भी सजा सुनाई गई। लंदन में रह रहे शरीफ के दो बेटों हसन और हुसैन को इस मामले में पहले ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।

जब सजा सुनाई गई तब शरीफ लंदन में अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कर रहे थे जो कई दिनों से कोमा में है। सेना ने काफी कोशिश की कि वो वापस नहीं आएं। बकौल शरीफ, उन्हें धमकाया गया, लंदन में उनके घर और परिवार वालों पर हमले भी किए गए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान वापस लौटने का फैसला किया। शरीफ का कहना है कि उन्होंने लौटने का निर्णय लिया क्योंकि वो कानून का पालन करने वाले शहरी हैं जो लोकतंत्र और वोट की ताकत में यकीन रखता है। लौटते समय उन्होंने एक जुमला उछाला – वोट को इज्जत दो। लेकिन कयास लगाने वाले कयास भी लगा रहे हैं। कानून के जानकारों के मुताबिक अगर शरीफ और उनकी बेटी नियत समय सीमा में सपर्पण नहीं करते तो उन्हें जमानत भी नहीं मिलती। कुछ लोग कह रहे हैं कि वो लौटे क्योंकि उन्हें अपने से ज्यादा अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य की चिंता है जो इस दफा पहली बार चुनाव मैदान में उतरीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद बड़े पैमाने पर उनके कार्यकर्ता इमरान खान की पार्टी में शामिल हुए। शरीफ की मानें तो उनकी पार्टी में सेना के इशारे पर तोड़-फोड़ की गई और कार्यकर्ताओं को डरा-धमका कर दल बदलने को मजबूर किया गया। कभी उनके बहुत खास माने जाने वाले और सेना के साथ उनके संपर्कसूत्र रहे चैधरी निसार तक ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शरीफ के अयोग्य करार दिए जाने के बाद पार्टी की कमान उनके छोटे भाई शाबाज शरीफ के हाथ में आई, लेकिन वो हिचकोेले खाती पार्टी को संभाल नहीं सके। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि नवाज शरीफ की वापसी से लोगों में उनके प्रति सहानुभूति की लहर पैदा होगी और उनके समर्थकों में नया जोश। वो अब चुनाव मैदान में खम ठोक कर दावा कर सकते हैं कि उनका नेता जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा भगोड़ा नहीं है जो अनगिनत अदालती आदेशों के बावजूद पाकिस्तान वापस आने के लिए तैयार नहीं है। शरीफ की पार्टी का देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब में वर्चस्व रहा है। उनके आने से समर्थकों में उम्मीद जगी है कि वो सेना की सारी तिकड़मों के बावजूद पंजाब में सम्मानजनक संख्या में सीटें जीत पाएंगे।

शरीफ की वापसी के पीछे लोग चाहे जितने कारण गिनाएं, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है कि शरीफ जानते हैं कि यदि आज वो सेना के वर्चस्व को चुनौती नहीं देंगे तो आने वाले लंबे समय तक देश में कोई और नेता सेना के खिलाफ सीना तान के खड़ा होने लायक नहीं बचेगा। उन्हें पता है कि उनका मुकाबला इमरान खान से नहीं, उसकी आका यानी सेना से है। उनका लौटना इमरान के लिए नहीं, सेना के लिए चुनौती है। वो हारें या जीतें, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वो सेना को चुनौती देते रहेंगे। उनके विरोधी उनके खिलाफ चाहें जो बोलें, सेना के प्रतिबंधों से मजबूर मीडिया भले ही उनका मजाक उड़ाए, लेकिन सब जानते हैं उन्होंने पाकिस्तान लौट कर साहस का परिचय दिया है। उनका अतीत भले ही पाक-साफ न रहा हो, भले ही उन्होंने बार-बार सेना से समझौते किए हों, अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भले ही उन्होंने सेना का विरोध उसे ‘डील’ के लिए मजबूर करने के लिए किया हो, लेकिन अब लंदन से लौटने का अर्थ यही है कि उन्होंने सेना से संघर्ष का रास्ता चुन लिया है।

अभी तो सिर्फ एक मामले में उनके खिलाफ फैसला आया है, अभी कई मामले बकाया हैं जिनमें उनके विरूद्ध और भी सख्त फैसले आ सकते हैं। 68 बसंत देख चुके शरीफ कब तक अपनी टेक पर कायम रहेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन ये लड़ाई उनकी व्यक्तिगत नहीं है, ये देश में लोकतंत्र के जीवन-मरण का प्रश्न है, इसमें उनके परिवार वालों और कार्यकर्ताआंे को ही नहीं, विपक्षी दलों और देश की जनता को भी समझदारी से उनका साथ देना होगा। आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और लंदन में जलावतनी झेल रहे अल्ताफ हुसैन की मुŸााहिदा कौमी मूवमेंट जैस बड़ी पार्टियां ही नहीं, अनेक छोटी पार्टियां भी चुनाव प्रचार में रोक-टोक और मीडिया पर पाबंदी के आरोप लगा रही हैं। सेना की ज्यादतियां झेल रहे शरीफ और सभी विपक्षी दल अगर इमरान खान की पीटीआई के खिलाफ कोई साझा मोर्चा खोल सकें तो ये निश्चित ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।

“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।

“पाकिस्तानी सेना के जुल्मों की दास्तान बयान करता है पश्तून तहाफुज मूवमेंट” in Punjab Kesari

पाकिस्तान आजकल एक सियासी तूफान का सामना कर रहा है जिसका नाम है – पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) यानी पश्तून सुरक्षा आंदोलन। इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं दक्षिण वजीरिस्तान के 26 साल के जोशीले नेता मंजूर पश्तीन। पश्तून मानवाधिकारों की बात करने वाला ये आंदोलन असल में शुरू हुआ 2014 में ‘महसूद तहाफुज मूवमेंट’ के नाम से। महसूद एक पश्तून कबीले का नाम है और मंजूर भी इसी से जुड़े हैं। इस आंदोलन का आधार है फेडरली एडमिनिस्टरड ट्राइबल एरिया (फाटा) और खैबर पख्तूनख्वा।

मंजूर पश्तीन ने ये आंदोलन क्यों शुरू किया इसकी वजह समझना भी जरूरी है। मंजूर गरीब परिवार से संबंध रखते हैं और उनके पिता अब्दुल वद्दूद महसूद उनके पैतृक गांव सरवाकाई में अध्यापक हैं। वर्ष 2009 में तालीबानी आतंकियों के खिलाफ सेना के आॅपरेशन राह-ए-निजात के कारण हजारों अन्य पश्तून परिवारों की तरह उनके परिवार को भी घर छोड़ कर शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार इस वर्ष पश्तून बेल्ट के करीब चार लाख लोगों को घर छोड़ना पड़ा, लेकिन सहायता संस्थाओं की मानें तो असल संख्या कई गुना ज्यादा थी। मंजूर के परिवार को इस उथल-पुथल में चार बार घर बदलना पड़ा। जब ये लोग घर लौटे तो सब लुट चुका था, सब ओर तबाही का मंजर था, कदम कदम पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और सेना का कड़ा पहरा था।

इस बीच उन्होंने पशुचिकित्सा में स्नातक की डिग्री भी ली। शिक्षा के बाद उन्होंने समाजसेवा के बारे में सोचा और महसूद तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) की शुरूआत की। चारों और फैली बारूदी सुरंगों के बीच जाहिर है उन्होंने जो पहला काम चुना वो था बारूदी सुरंगें हटाना।

वर्ष 2018 के आरंभ में ये आंदोलन एक नई शक्ल में उभरा जब इसने पश्तून माॅडल नकीबुल्ला मेहसूद की न्यायेतर हत्या के विरोध को अपना लक्ष्य बनाया। मेहसूद को कराची में एक फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया गया था। मेहसूद की हत्या के विरोध में 26 जनवरी को एक मार्च का आगाज डेरा इस्माइल खां से हुआ और ये पश्तून बहुल पेशावर, मरदान, स्वाबी होता हुआ इस्लामाबाद में धरने के रूप में समाप्त हुआ। शुरू में तो इसने सिर्फ मेहसूद की हत्या का मामला उठाया, लेकिन जल्दी ही उन हजारों पश्तून परिवारों ने भी इसमें अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी जिनके घर के सदस्य सेना के अभियानों में या तो मारे गए थे या गायब हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार 8,000 से भी ज्यादा लोग सैन्य अभियानों के दौरान बिना किसी कानूनी कार्रवाई के उठाए गए। जल्दी ही पाक सेना से त्रस्त बलूच लोगों ने भी पीटीएम में शिरकत शुरू कर दी। बहरहाल पीटीएम के इस्लामाबाद धरने को आॅल पश्तून नेशनल जिरगा का नाम दिया गया। जिरगा में मेहसूद की हत्या और पश्तूनों पर होने वाले अत्याचारों की भत्र्सना की गई। जिरगा का अर्थ है प्रतिनिधियों की बैठक।

जिरगा में मांग की गई कि सरकार नकीबुल्ला और पुलिस एनकाउंटर में मारे गए अन्य पश्तूनों की हत्या की न्यायिक जांच करवाए, नस्लीय भेदभाव और दुराग्रह वाले कानून समाप्त हों, गुमशुदा पश्तूनों को अदालतों में पेश किया जाए ताकि निर्दाेष लोगों को पहचान कर रिहा किया जा सके। जिरगा ने सेना से ये गारंटी देने की मांग की कि वो कबाइली इलाकों में खोजी अभियान के दौरान और चेकपोस्टों पर लोगों को परेशान नहीं करेगी, उनका अपहरण नहीं करेगी और गोली नहीं चलाएगी और न ही हिंसा करेगी। यही नहीं वो पूरे के पूरे गांव/ कबीले को सामूहिक सजा भी नहीं देगी और छोटी-मोटी घटनाओं के बावजूद कफ्र्यू नहीं लगाएगी। कबाइली इलाकों से बारूदी सुरंगें हटाने की मांग भी की गई जिनकी वजह से अनेक निर्दोष लोग जान से हाथ धो चुके हैं। कुल मिलाकर मांग ये थी कि लोगोें के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल किए जाएं और उन्हें शांति से जीने दिया जाए।

इस्लामाबाद का धरना 10 फरवरी को तब समाप्त हुआ जब प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार इंजीनियर आमिर मुकाम ने उन्हंे प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की तरफ से एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि सरकार नकीबुल्ला की हत्या करने वाले पुलिस अधिकारी राव अनवार को पकड़ेगी, दक्षिण वजीरिस्तान से बारूदी सुरंगें हटाने का काम तेज किया जाएगा, नकीबुल्ला मेहसूद के नाम से इंटरमीडिएट काॅलेज बनाया जाएगा और जिरगा सदस्यों द्वारा उठाई गई वास्तविक समस्याओं को हल किया जाएगा। मुकाम ने उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तारीफ की और कहा कि वो जब चाहें अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए उनसे मिल सकते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ ही पीटीएम नेता सेना के अधिकारियों से भी मिले और उन्हें भी अपनी समस्याओं से अवगत करवाया।

सरकार ने जिरगा से वादे तो बहुत किए लेकिन निभाया एक भी नहीं। प्रदर्शनकारियों ने भी मुकाम को कह दिया था कि यदि सरकार वादे निभाने में असफल रहेगी तो वो प्रदर्शन जारी रखेंगे। इसके बाद पीटीएम ने कई मार्च निकाले और फिर 22 मार्च को लाहौर और आठ अप्रैल को पेशावर में बड़े प्रदर्शन किए। 22 अप्रैल को पीटीएम ने लाहौर में एक बार फिर रैली की। पीटीएम 12 मई को कराची में एक विशाल रैली की योजना बना रहा है। इसमें अल्ताफ हुसैन के मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के लोग भी शामिल हो सकते हैं। यानी सेना के सताए बलूच ही नहीं, कराची के मुहाजिर भी इसके साथ आ रहे हैं।

पश्तूनों के इस आंदोलन को पाकिस्तान के वाम दलों सहित अनेक राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं। लेकिन सेना इसकी बढ़ती लोकप्रियता से खौफजदा है और उसने मीडिया में इसकी कवरेज पर रोक लगा दी है। अब इनपर आरोप लगाया जा रहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ और अन्य बाहरी ताकते इन्हें पैसा दे रही हैं जो सरासर गलत है। इनके साथ लाखों लोग हैं, आखिर कोई तो वजह होगी जिसके कारण ये लोग इनसे जुड़े हैं।

कहना न होगा, ये वजह है फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में सेना के दमनकारी अभियान। पहले तो सेना ने अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए इस इलाके में बड़ी संख्या में लोगों को इस्लाम के नाम पर रेडिकलाइज किया और उन्हें हथियार थमा दिए। सोवियत रूस तो चला गया और अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार भी बन गई, लेकिन 9/11 के बाद हालात बदले और पाकिस्तानी सेना प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज मुशरर्फ ने आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष का साथ देने का फैसला किया। जाहिर है, पहले जो लोग पाकिस्तान के दोस्त थे, उनमें से अनेक दुश्मन बन गए। हाल ही में पाकिस्तानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो के प्रमुख और पूर्व न्यायाधीश जावेद इकबाल ने नेशनल असंेबली की मानवाधिकारों की स्थायी समिति के सामने सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने परवेज मुशरर्फ पर आरोप लगाया कि उन्होंने कम से कम चार हजार पाकिस्तानी नागरिकों को गुप्त आदान-प्रदान के तहत करोड़ों डाॅलरों की एवज में अमेरिका को बेचा। जावेद इकबाल का बयान ऐसे समय आया है जब पीटीएम गुमशुदा पश्तून लोगों को अदालत में हाजिर करने की मांग जोर-शोर से कर रहा है। ये कहीं न कहीं उनकी आशंकाओं को बल भी देता है।

वर्ष 2007 में एक बड़ा बदलाव तब हुआ जब परवेज मुशरर्फ ने लाल मस्जिद पर हमला किया। इससे नाराज कट्टरवादियों ने तहरीके तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) का गठन किया। इन्होंने पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ युद्ध का एलान किया और सेना का जीना दुश्वार कर दिया।

पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल के हादसे के बाद लोगों को लगा कि अब काफी हो गया और इन्हें खत्म करना ही होगा। पाकिस्तानी सेना ने इसके लिए बड़ा अभियान चलाया। वहां की नेशनल काउंटर टेरररिज्म आॅथोरिटी की 40 पन्ने की रिपोर्ट के मुताबिक टीटीपी के सफाए के दौरान 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। दो लाख से ज्यादा काॅंबिंग आॅपरेशन हुए, चार लाख से ज्यादा लोगों को रोक कर उनकी तफ्तीश की गई। 6,998 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। 2,500 आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया गया। 19,530 लोगों को विभिन्न आधारों पर गिरफ्तार किया जैसे भड़काऊ भाषण या सामग्री बांटना, जनता को बगावत के लिए उकसाना आदि। 18,790 मामले लाउड स्पीकर के गलत इस्तेमाल के दर्ज किए गए। 1.5 अरब रूपए टेरर फंडिंग के रोके गए। 5,089 बैंक खाते फ्रीज किए गए। 65 संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डाला गया। इनमें से चार संस्थाएं अब भी निगरानी में हैं। 2,052 लोगों पर पाबंदी लगाई गई और उनकी विदेश यात्रा पर रोक लगा दी गई। आतंक फैलाने के आरोप में 1,447 यूआरएल ब्लाॅक किए गए।

दर्ज मामलों की संख्या के लिहाज से पंजाब सबसे आगे है जहां 68,957 लोगों का नाम संभावित आतंकियों के रूप में डिजिटल डेटाबेस मे शामिल किया गया। जिन 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया है, उनमें से 400 पंजाब के हैं। लेकिन सनद रहे सबसे ज्यादा दमनकारी सैन्य अभियान फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में चलाए गए।

जैसे-जैसे देश में आतंकवाद बढ़ा, उसका सामना करने के लिए समाज का सैन्यीकरण भी किया गया। हर जगह कंटीले तार लगाए गए, कदम-कदम पर चेकपोस्ट बनाए गए, सशस्त्र सैनिकोें, पुलिसवालों की तैनाती की गई। इससे आतंकवाद कम भी हुआ। 2010 में जहां 2,060 आतंकी हमले हुए, वहीं 2017 में 681 हमले हुए। आतंकी हमलों में कमी आई, लेकिन सैन्यीकरण वैसे का वैसा ही रहा। अब भी उतनी ही तलाशियां, तफ्तीशें और गिरफ्तारियां हो रहीं हैं, उतने ही छापे पड़ रहे हैं। लेकिन लोग इससे ऊब चुके हैं। वो अब चाह रहे हैं कि हालात सामान्य हों। अब और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं है। संविधान में दिए गए हक उन्हें फिर मिलें। वो चाहते हैं कि आतंकवाद में जो कमी आई है, उसका फायदा उन्हें भी मिले, उन्हें सिर्फ कुर्बानी ही क्यों देनी पड़े? राहत भी मिले।

स्पष्ट है पीटीएम सेना द्वारा सताए गए लोगों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। तभी इनकी रैलियों में सेना के खिलाफ नारे भी लगाए जाते हैं। लोग कहते हैं – ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। इन्हें राहत मिलनी ही चाहिए। आतंकी घटनाएं अगर कम हुईं हैं तो चेकपोस्ट भी कम होने ही चाहिए। बारूदी सुरंगें भी हटाई जानी चाहिए। आतंकवादियों से निपटने के लिए जो सैन्य अदालतें या आतंकविरोधी अदालतें बनाई गईं हैं, उन्हें भी खत्म होना ही चाहिए। बाकी बचे मामलों को सामान्य अदालतों में निपटाया जाना चाहिए।

पीटीएम में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके परिवार वालों को महज शक की बिना पर पकड़ा गया। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिन्हें पुलिसवालों ने व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण आतंकविरोधी मामलों में फंसा दिया। इसी प्रकार अनेक मामले पारिवारिक झगड़ों, संपत्ति या ट्रेड यूनियनों के थे, लेकिन उन्हें भी आतंकविरोधी कानूनों के दायरे में डाल दिया गया। स्पष्ट है आतंकविरोधी कानून लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर डाका डाल रहें हैं, इन्हें समाप्त होना ही चाहिए।

लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तानी सेना पश्तूनोें की मांग को लेकर गंभीर है। उसका दमनकारी रवैया अब भी जारी है। इसके पीछे कारण ये है कि उसके दिल में खोट है। उसे पता है कि पश्तूनों के दिलों में जो घाव हैं, वो उसी ने दिए हैं। अब सेना के पास मौका है कि वो पुराना ढर्रा छोड़, आंदोलन को कुचलने की जगह सहानुभूतिपूर्वक लोगों के आक्रोश का कारण समझने की कोशिश करे और देश में बढ़ते अलगाववाद पर लगाम लगाए। उधर पश्तूनों की गहरी नाराजगी के बावजूद मंजूर पश्तूनी कहते हैं कि उनका कोई अलगाववादी लक्ष्य नहीं है। उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है और अहिंसक ही रहेगा। वो चाहते हैं कि फाटा और पख्तूनख्वा को पंजाब जैसे ही लोकतांतित्रक अधिकार और सम्मान मिले और वहां के लोग भी संगीनों के साए से परे सामान्य जीवन जी सकें।

पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार लोगों के दिल पर मलहम लगा सकती थी, लेकिन उसके सामने भी सीमाएं हैं। एक तो वो सेना का विरोध नहीं कर सकती, दूसरे उसका कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है। ऐसे में ये आंदोलन क्या शक्ल अख्तियार करेगा, अभी कहना मुश्किल है। पर एक बात तो तय है कि इसने सेना के जुल्मो सितम के खिलाफ लोगों के दिलों में जो चिंगारी फूंकी है, उसे अब बुझाना मुश्किल होगा।

“मोदी नीतिः अस्त-व्यस्त, पस्त पाकिस्तान” in Punjab Kesari

मुस्लिम वोटों का सौदा करने वाले भारतीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय रहा है – पाकिस्तान। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक, सबने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध कायम करने के प्रयास किए। 10 साल शासन करने वाले मनमोहन सिंह भी इस कोशिश में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन सबके साथ समस्या ये रही कि इन्होंने पाकिस्तान में प्रत्यक्षतः सत्तासीन नेताओं से बात करने की कोशिश की और पर्दे के पीछे काम करने वाली असल सत्ता यानी सेना को नजरअंदाज किया।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो उन्होंने भी इसी लीक पर चलने की कोशिश की। तबके पाकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को शपथग्रहण समारोह में बुलाया। अचानक उनके घर भी पहुंचे, तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जब भी भारत ने सद्भावना प्रदर्शित करने के लिए बड़ा कदम उठाया, पाकिस्तानी सेना ने उसका जवाब खून खराबे से दिया।

जल्द ही मोदी सरकार को समझ आ गया कि जिस नवाज शरीफ से वो बात करने की कोशिश कर रहे हैं, वो सेना की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं। वो सेना की अनुमति के बिना भारत से संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकते।

25 दिसंबर 2015 को मोदी शरीफ के निमंत्रण पर अचानक लाहौर पहुंचे। मकसद था नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देना और उनके परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेना। मोदी के स्वागत के लिए शरीफ स्वयं अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पहुंचे। इससे भारत और पाकिस्तान में सद्भावना की नई उम्मीद जगी, लेकिन पाकी सेना को ये रास नहीं आया। सेना समर्थक मीडिया ने शरीफ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को मोदी के हाथों बेच दिया। 10 दिन के अंदर ही यानी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर हमला हो गया। भारत ने इसके लिए जैश-ए-मौहम्मद को जिम्मेदार ठहराया और शरीफ ने इस हमले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी जांच के लिए पठानकोट भी आए, लेकिन मामला किसी सिरे तक नहीं पहुंचा।

पठानकोट मामले की जांच चल ही रही थी कि 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ जिसमें 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। भारत ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक सरकार से जांच की अपेक्षा करने की जगह, पाकिस्तान पर चहुंमुखी हमला करने की योजना बनाई। इसमें सैन्य, राजनयिक, रणनीतिक से लेकर सिंधु जल समझौते तक, हर क्षेत्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने की नीति बनाई गई। मोदी सरकार ने एक झटके में पुरानी सरकारों के इस तर्क को कूड़ेदान में डाल दिया कि स्थिर पाकिस्तान, भारत के लिए जरूरी है। ये समझ लिया गया कि जब तक पाकिस्तान को उसकी हिमाकत की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, वो बाज नहीं आएगा।

उड़ी हमले की अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, कनाडा, भूटान और यहां तक कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी निंदा की। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने घोषणा की कि वो अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेगी, लेकिन इसका समय और स्थान वो खुद तय करेगी। जाहिर है, मोदी सरकार ने अब भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से अपनी तरह से निपटने की छूट दे दी थी।

उड़ी हमले के करीब 10 दिन बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें वहां मौजूद आतंकियों के अनेक ठिकानों पर हमला किया गया। सर्जिकल स्ट्राइक भारत की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब तक भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को देश की सीमा में ही मारती थी, यह पहली बार थी जब सेना ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) पार कर हमला किया। ये भारत की तरफ से स्पष्ट संकेत था कि अब वो रक्षात्मक नीति छोड़, आक्रामक नीति अपनाएगा और जरूरत पड़ने पर एलओसी पार करने में परहेज नहीं करेगा। अब तक पाकिस्तान अपने परमाणु बम की धमकी देता था, सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही भारत सरकार ने उसकी परमाणु धमकियों की भी धज्जियां उड़ा दीं।

सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद जब पाकिस्तानी सेना नहीं मानी तो भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसके तहत लंबी दूरी के हथियारों से एलओसी के परे आतंकी ठिकानों को ही नहीं, पाकी सेना को भी निशाना बनाया जाने लगा। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि पाकी सेना पर इसका असर नहीं पड़ा है और वो बदस्तूर घुसपैठिए भेज रही है। यदि गहराई में देखा जाए तो समझ आएगा कि इस दौर में भारतीय सेना ने एलओसी और अंतरराष्ट्ररीय सीमा पर जितने घुसपैठिए और पाकी सैनिक मार गिराए, उतने पहले कभी नहीं हलाक किए गए। यही नहीं भारतीय सेना ने देश की सीमा के भीतर भी जितने आतंकी अब मारे हैं, उतने पहले कभी नहीं मारे।

अगर आप पाक अधिकृत कश्मीर के न्यूज चैनलों को देखें तो आपको पता चलेगा कि भारतीय सेना की नई नीतियों का किस हद तक असर हुआ है। वहां लोग कहते हैं कि वो लगातार युद्ध जैसे हालात में जी रहे हैं और न तो पाकिस्तानी सेना और न ही सरकार उनके जान-माल के नुकसान की भरपाई कर रही है। वो चाहते हैं कि इससे पहले भारतीय सेना और कोई बड़ा कदम उठाए, पाकी सेना अपने आतंकी शिविर वहां से हटा ले। वो कहते हैं कि पाकी सेना की मूर्खता और हठधर्मी की वजह से उनका व्यापार और रोजगार चैपट हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है। जाहिर है इस समय पीओके निवासियों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वो पाकी सेना की आतंकी नीति से मुक्ति पाना चाहते हैं।

इस बीच 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला भी उठा दिया। संकेत साफ था कि अगर पाकिस्तान बाज नहीं आएगा तो भारत, जम्मू-कश्मीर से परे भी संघर्ष के नए क्षेत्र खोलने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान ने जहां-जहां कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत ने वहां-वहां बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला उठाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब और अलग-थलग करने का भूतो न भविष्यिति प्रयास शुरू कर दिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इन प्रयासों को बहुत बल मिला।

अमेरिका ने मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात से पहले ही, न सिर्फ भारत को रणनीतिक सहयोगी बनाने की बराक ओबामा की नीति का पुरजोर समर्थन किया, बल्कि सय्यद सलाहुद्दीन के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन को अंतरराष्ट्रीय संगठन भी घोषित कर दिया जिसे पाकिस्तान ‘कश्मीरियों की आजादी की आवाज’ बताता रहा है। संदेश साफ था कि अमेरिका को कश्मीरियों की पाक समर्थित आजादी की मुहिम में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद तो ट्रंप ने एक के बाद एक अनेक ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान को गहरा आघात लगा। 21 अगस्त 2017 को ट्रंप ने नई दक्षिण एशिया नीति का एलान किया जिसमें पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भारत को महत्वपूर्ण स्थान देने की घोषणा की गई। दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के समय ट्रंप ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी कि अगर उसने अपनी धरती से आतंकी शिविर समाप्त नहीं किए तो उसे नतीजा भुगतना पड़ेगा।

पाकिस्तान ने आदतन अमेरिका की धमकी को हलके में लिया। वो भूल गया कि अब वाइट हाउस में बराक ओबामा नहीं डोनाल्ड ट्रंप बैठे हैं। ट्रंप ने पहले तो पाकिस्तान की करीब दो अरब डाॅलर की रक्षा सहायता बंद करने का एलान किया फिर ये सुनिश्चित किया कि उसे दुनिया में टेरर फंडिंग और हवाला कारोबार की निगरानी करने वाली ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया जाए। पाकिस्तान इस सदमे उभरा भी नहीं था कि अमेरिका ने परमाणु प्रसार का आरोप लगा कर पाकिस्तान की उन सात कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए जो उसके परमाणु हथियारोें के लिए सामान उपलब्ध करवाती हैं।

अमेरिका के नए विदेश मंत्री और सीआईए के पूर्व प्रमुख माइक पोमपेओ ने खुली धमकी दे दी है कि अगर पाकिस्तान नहीं चेता तो अमेरिका उससे मेजर नाॅन-नेटो अलाय (महत्वपूर्ण गैर-नैटो सहयोगी) का दर्जा वापसस ले लेगा, उसे आतंकी देश घोषित करेगा और उसके अधिकारियों के अमेरिका आने पर रोक भी लगाएगा। जाहिर है अमेरिका जो कदम उठाएगा, उसके सहयोगी भी उसका अनुसरण करेंगे।

पाकिस्तानी आतंकी फक्ट्रियों के लिए अमेरिका से एक और बुरी खबर हाल ही में तब आई, जब वहां के दौरे पर गए सउदी अरब के शहजादे मौहम्मद बिन सलमान ने घोषणा की कि वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की नीति समाप्त करेंगे जिसके तहत सउदी वित्तीय सहायता से दुनिया भर में वहाबी मदरसे खोले गए और आतंकी बनाए गए। इस नीति का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान ने उठाया जहां 32,000 से ज्यादा ऐसे मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों में तैयार आतंकियों को पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करता है। जाहिर है शहजादे सलमान की घोषणा पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्रियों पर सीधे असर करेंगी। अमेरिका और सउदी अरब के फैसले उसकी विदेश नीति के दो प्रमुख स्तंभों – परमाणु बम और आतंकी नेटवर्क, दोनों को प्रभावित करेंगे।

अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारत ने सैन्य और राजनयिक दोनों स्तर पर पाकिस्तान को घेरा है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के अंतरराष्ट्रीय अभियान का पश्चिमी देशों में ही नहीं, खाड़ी के मुस्लिम देशों में भी व्यापक असर हुआ है, जो पहले कभी पाकिस्तान के करीबी माने जाते थे। आज चाहे अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देश भी उसके खिलाफ हैं। उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी न केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसके विरूद्ध आवाज उठाई, बल्कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ में भी उसके खिलाफ मत दिया। पाकी सेना अपनी जनता को भरमाती है कि चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पाकिस्तान की माली हालत बहुत बेहतर कर देगा, लेकिन चीन ने इसकी लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं से हाथ खींच लिए हैं। ध्यान रहे पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले इस काॅरीडोर का भारत विरोध करता रहा है क्योंकि भारत इसे अपना अटूट अंग मानता है।

भारत अब तक अपने बयानों और कामों से पाकिस्तान को ये स्पष्ट संदेश दे चुका है कि अगर उसने भारत में आतंक का निर्यात नहीं बंद किया तो वो सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार करने से नहीं हिचकेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान से इससे सबसे बड़ी खलबली मची है। वहां आम आवाम को बिजली, पेयजल, रोजगार, इंधन, शिक्षा कुछ भी हासिल नहीं है। ऐसे में अगर भारत ने पानी रोक लिया तो उसके खेत खलिहान सूख जाएंगे और भारत बिना कोई यु़द्ध किए ही युद्ध जीत जाएगा।

हाल ही में पाकी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने चुनींदा पत्रकारों के सामने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे जिसे उनके चमचे ‘बाजवा डाॅक्टरीन’ के नाम से प्रचारित कर रहे हैं। इसमें बाजवा कहते हैं कि भारत को आर्थिक कारणों से बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा। वो डींगे मारते हुए कहते हैं कि उन्होंने कठोर अमेरिकी दबाव के बावजूद, परवेज मुशरर्फ की तरह घुटने नहीं टेके। हो सकता है वो पाकिस्तानियों को बहलाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हों, लेकिन इन्हीं पाकिस्तानियों ने हाल ही में देखा कि कैसे एक अमेरिकी एयरपोर्ट पर उनके प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की खाना तलाशी ली गई और कैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने उन्हें आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह देकर बैरंग वापस कर दिया।

भारत में विपक्षी दल बिना सोचे समझे मोदी सरकार पर आरोप लगा देते हैं कि उसकी कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। अब तक ये स्पष्ट हो गया होगा कि मोदी सरकार ने अपने अनुभवों और पाकिस्तान की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी नीति न केवल तैयार की है, बल्कि उसे हर मोर्चे पर लागू भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात – इसका आधार किसी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, राष्ट्रहित है। संभवतः यही कारण है कि मोदी सरकार ने हुर्रियत के पाकिस्तानी दलालों पर भी हाथ डाल दिया है, जिन्हें पिछली सरकारें पवित्र गाय समझती थीं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पाकिस्तान के चुने हुए नेताओं से बातचीत का नाटक करने की जगह, सीधे उसकी सेना पर वार किया है। इसका दंश वो महसूस भी कर रही है। धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कस रहा है। उसे स्पष्ट कर दिया गया है कि उसे अपनी हरकतों की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब ये उसे तय करना है कि वो अभी सुधरने का संकल्प लेती है या नुकसान उठाने के बाद। ध्यान रहे इस बार सुधार का नाटक नहीं चलेगा।

“घनी के शांति प्रस्ताव और पाकिस्तान-तालीबान का दोगला रवैया” in Punjab Kesari

गत 28 फरवरी को अफगानिस्तान में दूसरी काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपनी ओर से शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस 23 देशों, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और नैटो का एक समूह है जो अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।

काॅफ्रेंस के पहले दिन ही बड़ी घोषणा करते हुए घनी ने कहा कि वो तालीबान को वैध राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने तालीबानी आतंकियों को कहा कि वो हिंसा छोड़ें और शांति स्वीकार करने के लिए सामने आएं ताकि देश को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि युद्धविराम और शांति प्रक्रिया पर सहमति बननी चाहिए। उन्होंने तालीबान को खुश करने के लिए अनेक प्रस्ताव भी किए। इनमें शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले तालीबानियों को सुरक्षा देना, बंदियों को छोडना, तालीबानी नेताओं के खिलाफ प्रतिबंध हटाना, तालीबान सदस्यों और उनके परिवारों को पासपोर्ट और वीसा देना, उनके लिए काबुल में कार्यालय खोलना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति घनी ने कहा कि उनका देश शांति को खतरे में डालने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है और दीर्घकालीन शांति के लिए वो हर तरह के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो शांति कायम करने के लिए बातचीत करे और ये बातचीत काबुल में हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो अतीत को भुला कर नए सिरे से बातचीत के लिए तैयार हैं।

पाकिस्तान ने घनी का तालीबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि वो शांति प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। असल में पाकिस्तान दिखावटी तौर पर ही सही, लंबे अर्से से बातचीत के लिए जोर डालता रहा है। घनी के प्रस्ताव के चंद घंटों के भीतर ही पाकिस्तान में अफगान राजदूत डाॅक्टर ओमर जखीवल ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासेर खान जंजुआ से बात की। जखीवाल ने जंजुआ को काबुल में हुए शांति सम्मेलन और राष्ट्रपति घनी के प्रस्तावों के बारे में बताया।

जंजुआ ने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में खून खराबे का जल्द अंत चाहता है। उन्होंने कहा “पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति अनिवार्य है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोगों के साथ सर्वनिष्ठ और सहभागी भविष्य के विचार में विश्वास रखता है, इसलिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शांति पहलों के तहत राजनीतिक सुलह-सफाई के प्रयासों का हमेशा स्वागत किया है। पाकिस्तान, राष्ट्रपति घनी के वार्ता और आपसी समझदारी के जरिए शांति लाने के प्रयास का स्वागत करता है और इसे सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।”

अब सवाल ये उठता है कि काबुल पीस प्रोसेस के तहत जैसे घनी ने शांति प्रस्ताव किया और चंद ही घंटों के भीतर जैसे उसे पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया, ये आखिर हुआ कैसे और इसके क्या निहितार्थ हैं? क्या पाकिस्तान वास्तव में उतना ईमानदार है जितना वो दिखा रहा है? और इस प्रस्ताव पर तालीबान का रूख क्या है और क्यों है? इसे कई तरह से समझा जा सकता है।

पहले देखते हैं कि पाकिस्तानी समीक्षक इसके बारे में क्या कहते हैं। वो इसके लिए अपने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को श्रेय देते हैं। उनके अनुसार इसके लिए जमीन जनरल बाजवा की पिछले साल अक्तूबर में हुई काबुल यात्रा के दौरान तैयार की गई। इस यात्रा के कुछ समय के भीतर ही पाकिस्तान ने खामोशी से अफगान तालीबान और हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकियों को काबुल को सौंप दिया। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने ये अभूतपूर्व कदम ये जताने के लिए उठाया कि इस्लामाबाद किस हद तक अफगानिस्तान के साथ सहयोग करना चाहता है। जनरल बाजवा की यात्रा के बाद दोनों देश लगातार संपर्क में रहे और पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लगातार ये आग्रह करता रहा कि वो तालीबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हो। पाकिस्तान, अमेरिका और अफगानिस्तान को बार-बार ये कहता रहा है कि अफगानिस्तान में लंबे अर्से से चले आ रहे संघर्ष का हल सिर्फ संवाद से ही हो सकता है और इसके लिए अफगानिस्तान को तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कुछ प्रोत्साहन देने होंगे।पाकिस्तानी समीक्षकों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान, तालीबान पर भी वार्ता का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डालता रहा है।

दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी उप सहायक सचिव एलिस वेल्स ने कुछ समय पूर्व कहा था कि अमेरिका ने तालीबान के लिए भी बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। इस पर तालीबान ने बातचीत के लिए सहमति तो दिखाई लेकिन शर्तें ऐसी रखीं जिन्हें मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन है। तालीबान ने अमेरिका को एक पत्र में कहा कि “अफगान मसला हल करने में सहायता मिल सकती है अगर अमेरिका अफगानिस्तान पर अपना कब्जा छोड़े और लोगों की वैध मांगों को स्वीकार करे जिसमें सरकार बनाने का तालीबान का हक भी शामिल है और चर्चा के बारे में अपनी चिंताएं और अनुरोध इस्लामिक अमीरात (तालीबान सरकार) को एक शांतिपूर्ण माध्यम से पहुंचाए।” तालीबान ने अमेरिका को अपने खत में हिंसा का रास्ता छोड़ने और इस समस्या को बातचीत से सुलझाने की सलाह भी दी। तालीबान ने अमेरिका से बातचीत के लिए सहमति जताई क्योंकि वो अफगान सरकार को वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। वो खुद को अफगानिस्तान की जायज सरकार मानता है जिसे अमेरिका ने गिराया था।

तालीबान के पत्र पर एलिस वेल्स ने कहा है कि अब ये दिखाने की जिम्मेदारी तालीबान पर है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं। ये बातचीत मुझसे या अमेरिका से नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की वैध और संप्रभु सरकार से होनी चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तानी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान ने पहले भी अफगान तालीबान और काबुल में वार्ता शुरू करवाई थी, लेकिन इसके नेता मुल्ला उमर और फिर उसके उत्तराधिकारी की ड्रोन हमले में हत्या के बाद वो ठप हो गई। पाकिस्तान इसके लिए अफगान सरकार में कुछ तत्वों को जिम्मेदार ठहराता है।

अब इस मसले को अफगानिस्तान के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान में शांति और अखंडता के लिए काम करने वाली अफगान हाई पीस काउंसिल के मुताबिक तालीबान ने अब तक ये प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। ज्ञात हो कि अपने मकसद में सफलता हासिल करने के लिए ये तालीबान से भी संपर्क रखती है। इसका गठन सितंबर 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया था।

काउंसिल के मीडिया विभाग के प्रमुख सय्यद एहसानुद्दीन ताहेरी कहते हैं कि ये तालीबान के लिए स्वर्णिम अवसर है। उन्हें अमेरिका को बातचीत के लिए पत्र लिखने की जगह अफगान सरकार से बात करनी चाहिए। अब गंेद उनके पाले में है, देखना होगा कि वो शरिया के खिलाफ कत्लोगारत जारी रखते हैं और अपनी मर्जी चलाते हैं या लोगों की आवाज सुनते हैं। ध्यान रहे कि अगर अफगान सरकार तालीबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं तो उनसे भी ये अपेक्षा की जाती है कि उन्हें भी अफगान सरकार को मान्यता देनी होगी और कानून के शासन का सम्मान करना होगा जिसमें महिलाओं के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है जिसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बहुत महत्व देते हैं।

जनवरी में हाई पीस काउंसिल के सदस्यों ने अफगान सरकार और तालीबान के बीच अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था। इसके बाद काउंसिल ने आरोप लगाया था कि कुछ देश (पाकिस्तान) अफगानिस्तान में शांति कायम करने में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि वो वहां शांति के पक्षधर नहीं हैं। काउंसिल के प्रमुख मौहम्मद करीम खलीली ने हालांकि कहा कि तालीबान के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी है और तालीबान को बातचीत की मेज तक लाने के तौर-तरीके तलाशे जा रहे हैं। उन्होंने देश के 26 प्रांतों में 280 बैठकें की हैं और उन्हें उम्मीद है कि इनके कारण तालीबान को औपचारिक बातचीत के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी। जाहिर है पीस काउंसिल के प्रयासों से घनी के शांति प्रयासों को भी बल मिला होगा।

अब देखते हैं कि इसके विषय में अमेरिका क्या सोचता है। अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए घनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि वो आतंकवादियों पर तब तक दबाव जारी रखेगा जब तक वो हार नहीं मान लेते। अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत जाॅन आर बास ने कहा कि हम एक बार फिर तालीबान का आहवान करते हैं कि वो बिना शर्त अफगान सरकार से वार्ता शुरू करे। वो कहते हैं ”तालीबान युद्ध के मैदान में ही नहीं, मादक पदार्थों से आमदनी और आय के स्रोतों पर भी काफी दबाव महसूस कर रहे हैं, क्षेत्रीय देशों सहित इतने सारे देशों की अपील के बाद उनपर दबाव और बढ़ गया है, जब तक हमें फर्क नजर नहीं आता, हम अफगान बलों की सहायता जारी रखेंगे।“ अमेरिकी सेना ने नवंबर से ही तालीबानी ठिकानों, उनके प्रशिक्षण शिविरों, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं पर हमले बढ़ा दिए हैं। उधर पेंटागन प्रवक्ता दाना वाइट ने कहा है कि तालीबान को आतंक छोड़ना होगा और उसे अफगान संविधान का सम्मान करना ही होगा और फिर उन्हें वार्ता की मेज पर आना होगा।

आखिर में पूर्व अमेरिकी राजनयिक और अफगान मामलों के जानकार बरनेट रूबिन की राय। वो कहते हैं कि “अफगान सरकार का प्रस्ताव अच्छा है और तालीबान बातचीत के लिए तैयार भी होता दिख रहा है, लेकिन वो सीधे अमेरिका से बात करना चाहता है क्योंकि उसकी सरकार अमेरिका ने ही गिराई थी। इस्लामाबाद प्रत्यक्ष रूप से भले ही ताजा शांति प्रस्ताव का स्वागत करे पर बहुत कम संभावना है कि वो इसके लिए तालीबान पर दबाव नहीं डालेगा क्योंकि वो उसकी दोस्ती को नहीं खोना चाहता। मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कोई ठोस प्रयास करेगा। ये सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत इस विषय में कोई ठोस पहल करेगा। हकीकत ये है कि पाकिस्तान पर अमेरिका से ज्यादा प्रभाव चीन का है।”

जाहिर है अफगानिस्तान में शांति की राह में काफी पेंच हैं। खून खराबे के बावजूद अफगान सरकार शांति के लिए भी प्रयास करना चाहती है, वहीं अमेरिका की नीति है तालीबान और उसके आका पाकिस्तान को उनके घुटनों पर लाना। उधर पाकिस्तान तालीबान के साथ मिलकर दोहरा खेल खेल रहा है। जाहिर तौर पर तो वो शांति प्रस्ताव स्वीकार करता है पर तालीबान के जरिए उसपर शर्तें लगवाता है। वो अप्रत्क्ष रूप से अमेरिका को बाध्य करना चाहता है कि वो तालीबान को असली अफगान सरकार के रूप में स्वीकार करे। यही तालीबान का प्रस्ताव भी है।

असल में अफगानिस्तान में शांति तभी आ सकती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना बगल बच्चा बनाने की नीति छोड़े। इस नीति में तालीबान उसका महत्वपूर्ण हथियार है, इसीलिए वो उसे संरक्षण, प्रशिक्षण और हथियार भी देता है। तालीबान के खात्मे का मतलब है, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का खात्मा। यही वजह है कि जाहिर तौर पर काबुल प्रोसेस के प्रस्तावों का समर्थन करने के बावजूद वो इन्हें अमली जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। तालीबान ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। अपने एक ट्वीट में इसके प्रवक्ता ने कहा है कि घनी का प्रस्ताव “सामूहिक समर्पण का षडयंत्र है।”

घनी ने तालीबान की व्यापक हिंसा के बावजूद उदारता दिखाई, लेकिन पाकिस्तान और तालीबान ने इसमें सेंध लगा दी है। लगता है जैसे मामला जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। लेकिन ऐसा नहीं है, कई सतहों पर बातचीत जारी है। वैसे भी अब हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकना पहले जितना आसान नहीं है। घनी के प्रस्ताव में पलीता लगा कर पाकिस्तान और तालीबान अपना ही अहित करेंगे। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची में शामिल करवा चुका है, अगर ऐसी ही चला तो उसे ब्लैक लिस्ट में भी शामिल किया जा सकता है। ताजा खबरों के मुताबिक अब यूरोपियन यूनियन भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।

दीवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज और आतंकवाद से जूझ रहा है। वो विनाश के रास्ते पर और आगे बढ़ेगा या संभलेगा…उसे अफगानिस्तान का सपना प्यारा है या देश की जनता का कल्याण? ये पाकी सेना को तय करना है।

“फैटएफ की ग्रे लिस्ट और पाकिस्तान के समक्ष विकल्प” in Punjab Kesari

पाकिस्तान ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (फैटएफ) की ग्रे लिस्ट से बचने के लिए पूरा दम लगा दिया, लेकिन बच नहीं पाया। 37 देशों के इस संगठन में जब निर्णायक मतदान हुआ तो सिर्फ तुर्की ने ही उसका साथ दिया। रूस, सउदी अरब, और ‘गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल’, जीसीसी (इसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतार, सउदी अरब और युनाइटेड अरब अमीरात शामिल हैं) ही नहीं, उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। खाड़ी के देशों को जहां अमेरिका ने संभाला, वहीं रूस को भारत ने समझा लिया। वर्तमान अध्यक्ष इटली के बाद चीन इस संगठन की कमान संभालना चाहता है। इस लिए ‘महज एक पाकिस्तान’ के लिए उसने अन्य सदस्यों से टकराव मोल न लेने और अपने हितों को लफड़े में न डालने का फैसला किया। वैसे भी चीन को लगता है कि अगर फैटएफ के फैसले के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी तो उसे वहां पांव और पसारने का मौका मिलेगा।

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि फैटएफ एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है जो दुनिया भर में टेरर फंडिंग और मनी लाॅंड्रिंग करने वाले देशों पर नजर रखती है। इसमें 37 सदस्य होते हैं। 35 राष्ट्र और दो क्षेत्रीय संगठन (गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल, जीसीसी और यूरोपियन कमीशन, ईसी)। ग्रे लिस्ट में आने के बाद पाकिस्तान का दूसरे देशों के साथ वित्तीय लेन-देन और मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ग्रेडिंग एजेंसियां पाकिस्तान की ग्रेडिंग और गिरा सकती हैं। इससे उसे बाजार से कर्ज लेने में भी मुश्किल आएगी। इससे पहले से ही मुश्किल में पड़ी अर्थव्यवस्था और जर्जर हो सकती है। ग्रे लिस्ट संबधी प्रावधान आगामी जून में लागू होंगे। तब तक आतंकवाद से लड़ने के बारे में पाकिस्तान के दावों की समीक्षा की जाएगी। अगर वो फैटएफ को संतुष्ट नहीं कर पाया तो उसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया जाएगा। ध्यान रहे वर्ष 2012-15 के बीच भी पाकिस्तान इस लिस्ट में शामिल था

कर्ज और आतंकवाद में आकंठ डूबा परजीवी पाकिस्तान, अमेरिका से तलाक के बाद विश्व राजनय में नए विकल्प या कहें कि दोस्त तलाश रहा था। ऐसे में फैटएफ ने उसे तगड़ा झटका दिया है। पाकिस्तानी सेना चीन को अपने सदाबहार दोस्त के रूप में आवाम के सामने पेश करती थी, लेकिन चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वो पाकिस्तान के साथ दोस्ती को अपने हितों के आड़े नहीं आने देगा। वैसे भी चीन पाकिस्तानी सेना को बार बार संकेत देता रहा है कि वो उसके द्वारा चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को अधिक समय तक समर्थन नहीं दे पाएगा।

वर्ष 2015 में जब पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से बाहर आया तो उसके दो कारण थे। एक – अमेरिका का समर्थन और दो – उसने आतंकवाद से लड़ने के लिए लिए एक नेशनल एक्शन प्लान तैयार किया और दुनिया को भरोसा दिलाया कि वो इसके जरिए आतंकवाद के गढ़ों को नेस्तनाबूद कर देगा। लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने जिस बारीकी से पाकिस्तान की हरकतों पर नजर रखनी शुरू की, उससे पाकिस्तान का बचना नामुमकिन हो गया। पता लगा कि नेशनल एक्शन प्लान के तहत सिर्फ उन कथित ‘आतंकवादियों’ का सफाया करने की कोशिश की गई जो सेना की मंशा के खिलाफ देश के भीतर मुहिम चला रहे थे। इसमें बलूची तथा पख्तून स्वतंत्रता सेनानियों और मुहाजिरों का कत्लेआम किया गया, लेकिन भारत और अफगानिस्तान में आतंक फैलाने वाले संगठनों (स्ट्रैटेजिक असेट्स) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अपने ही लोगों का कत्लेआम करने के बाद पाकी सेना ने दुनिया में दावा किया कि उसने आतंकियों का सफाया करने के लिए ठोस कार्रवाई की है और अब दुनिया को उससे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने का तकाजा बंद कर देना चाहिए। सेना के इशारे पर पाकी मीडिया ने इसका खूब प्रचार किया और जनता भी बहुत हद तक इसे सही समझ बैठी। पाकिस्तान ने दुनिया के गले ये बात उतारने की कोशिश की कि अब उसके यहां कोई आतंकवादी नहीं बचा, सभी आतंकवादी अफगानिस्तान में हैं। ये बात अलग है कि बहुत से सयानों ने इसे मानने से इनकार कर दिया और सेना को बार-बार सलाह दी कि वो पुरानी नीतियों से बाज आए।

ट्रंप प्रशासन ने भी आतंकवाद से लड़ने के पाकिस्तानी दावों को मानने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने अपने एक ट्वीट पर पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि अमेरिका ने उसे अरबों डाॅलर दिए, लेकिन इसके बदले में उसने सिर्फ धोखा दिया। पेरिस में जब फैटएफ की बैठक चल रही थी, तब भी वाइट हाउस प्रवक्ता राज शाह ने कहा कि अमेरिका, आतंकवाद के सफाए के पाकिस्तानी दावों से संतुष्ट नहीं है। शाह की बात में दम भी था क्योंकि बैठक के दौरान ही पाकिस्तानी आतंकी भारत में घुसने की कोशिश कर रहे थे और युद्धविराम को ताक पर रख पाकी सेना उनकी सुरक्षा के लिए ताबड़तोड़ फायरिंग कर रही थी। अफगानिस्तान में भी हालात बेहतर नहीं थे।

जाहिर है दुनिया भर में रूसवा होने और खुद पाकिस्तान के तबाह होने के बावजूद, सेना अपने हितों के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल करने की नीति से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है। इसकी बजाए वो आतंकी संगठनों को नया जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। अफगान तालीबान को आईएसआईएस के रूप में पेश किया जा रहा है और दावा किया जा रहा है कि इनपर पाकी सेना का कोई नियंत्रण नहीं है। उधर लश्कर ए तैयबा को मिल्ली मुस्लिम लीग का नया नाम देकर राजनीति में उतारा जा रहा है। कहने को तो पाकिस्तान सरकार ने ठीक फैटएफ की बैठक से पहले अध्यादेश भी जारी किया जिसके तहत देश में हर वो आतंकी संस्था स्वतः प्रतिबंधित हो जाएगी जिसे संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंधित घोषित किया है। लेकिन इसमें भी अनेक किंतु-परंतु हैं। आगामी आम चुनावों को देखते हुए सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का एक बड़ा तबका इसे अमल में लाने के लाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि भारत विरोधी सभी संगठनों का अड्डा पंजाब में है जो उसका सबसे मजबूत गढ़ है। पंजाब में फिलहाल अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शाबाज शरीफ मुख्यमंत्री हैं।

शक्तिशाली पाकी सेना का एक बड़ा तबका भी इसके विरोध में है। इसका मानना है कि पाकिस्तान परंपरागत युद्ध में भारत और अमेरिका से नहीं जीत सकता, इसलिए उनके खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल और प्राॅक्सी वाॅर जायज है। ये जनता को समझा रहे हैं कि आतंकियों के सफाए से पाकिस्तान कमजोर हो जाएगा और फिर अमेरिका और भारत उसके साथ मनमानी करेंगे।

फैटएफ ने भले ही पाकिस्तान को बहुत तगड़ा झटका दिया है। लेकिन इसकी बिना पर ये मानना भी गलती होगी कि चीन ने उसका साथ छोड़ दिया है। ध्यान रहे ये चीन ही था जिसने पिछले वर्ष जून में उसे शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइसेशन (एससीओ) में प्रवेश करनें मदद की। एससीओ मूलतः छह देशों का संगठन है जिसमें चीन और रूस के अलावा मध्य एशियाई देश उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं। बता दें कि पाकिस्तान के साथ ही भारत को भी इसमें शामिल किया गया।

एसीओ में शामिल होने के बाद पाकिस्तान ने अपनी जनता को ये दिखाने की कोशिश की कि भारत-अमेरिका गठबंधन के बरक्स अब पाकिस्तान-चीन-रूस का गठबंधन उभर रहा है। जनता को ये भी बताने की कोशिश की गई भले ही अमेरिका मदद न दे, भले ही भारत उसे अलग-थलग करने की कोशिश करे, पर पाकिस्तान दुनिया में अकेला नहीं है। ंरूस और चीन के अलावा, सउदी अरब, तुर्की और ‘गल्फ काॅआॅपरेशन काउंसिल’ भी पाकिस्तान के साथ हैं।

फैटएफ में भले ही रूस ने पाकिस्तान का साथ न दिया हो, पर इसपर लाॅबिंग के लिए जब पाकी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ रूस गए तो उन्होंने वहां न केवल रूसी विदेश मंत्री सेरगेई लेवारोव के साथ मुलाकात की बल्कि संयुक्त घोषणापत्र भी जारी किया। भारतीय विदेश विभाग और विदेशनीति विशेषज्ञों को यह घोषणापत्र अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि ये पाकिस्तानी आतंकवाद के प्रति भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका के नेरेटिव के बरक्स एक वैकल्पिक नैरेटिव पेश करता है जो असल में पाकिस्तान का नैरेटिव ही है। यह कहता हैः

”हमारी बैठक में अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों पर विशेष ध्यान दिया गया। हम दोनों अफगानिस्तान में सुरक्षा की बिगड़ति स्थिति, बढ़ती आतंकी कार्रवाइयों, नारकोटिक्स के खतरों और मजबूत होते आईएआईएस से चिंतित हैं। दुर्भाग्य से हमें यह कहना पड़ रहा है कि यहां बरसों से मौजूद अमेरिका और नैटो की सैन्य मौजूदगी अफगान लोगों को स्थायित्व और शांति प्रदान करने में असफल रही है। यही नहीं, हाल ही में अमेरिका द्वारा पेश की गई अफगान रणनीति सशस्त्र शत्रु के खिलाफ अधिक सेना और सैन्य दबाव बनाने की आवश्यकता पर बल देती है। माॅस्को और इस्लामाबाद इस नीति को दिशाहीन मानते है। हमारा मानना है कि अफगानिस्तान में अफगान लोगों के नेतृत्व और क्षेत्रीय राज्यों के हितों के सम्मान पर आधारित राष्ट्रीय सुलह-सफाई की प्रक्रिया जल्दी से जल्दी शुरू होनी चाहिए। “

जाहिर है रूस ने अफगानिस्तान में आतंकवाद पर पाािकस्तान की भूमिका और डबलक्राॅस को नकार कर आईएसआईएस और अमेरिका को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया और अमेरिका की नयी दक्षिण एशिया नीति के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया। यही नहीं ‘क्षेत्रीय राज्यों के हितों’ के नाम पर अफगानिस्तान मसले में पाकिस्तान को प्रमुख भूमिका देने की संस्तुति भी कर दी। इस घोषणापत्र में पाकिस्तान ने फिलिस्तीन और सीरिया पर रूस की भूमिका का समर्थन किया। जाहिर है रूस और पाकिस्तान का संयुक्त घोषणपत्र नए समीकरणों की ओर इशारा करता है। ये कहीं न कहीं ये भी बताता है कि दुनिया में एक बार फिर सुपर पावर बनने को लालायित रूस ये भूलने के लिए भी तैयार है कि कभी पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ मिलकर सोवियत संघ को तोड़ने में मदद की थी।

अमेरिका के दबाव में फैटएफ में भले ही पाकिस्तान पर फंदा कस गया हो पर ध्यान रहे, रूस और चीन समेत कुछ देश हैं जो अब भी पाकिस्तान से सहानुभूति रखते हैं। भारत को ऐसे देशों पर निगाह बनाए रखनी होगी। रूस तो भारत का पुराना और विश्वस्त सहयोगी है। जब भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी तो रूस ने पूरा समर्थन दिया था। भारत को रूस को लगातार वस्तुस्थिति से अवगत कराते रहना चाहिए। रूस को समझाना पड़ेगा कि पाकिस्तानी आतंकवाद भारत और अफगानिस्तान के लिए ही नहीं अततः उसके लिए भी खतरा साबित होगा। बजाए पाकिस्तान का नैतिक समर्थन करने के वो उसे अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार करे।

बहरहाल जून तक की समीक्षा अवधि के बावजूद पाकिस्तान का ग्रे लिस्ट से बचना असंभव लग रहा है। इसका सबसे बड़ी वजह पाकिस्तानी सेना है जो अपने रंग-ढंग बदलने के लिए तैयार नहीं है। पहले उसके झूठे आश्वासनों के आधार पर अमेरिका उसे उबार लेता था, लेकिन अब भले ही चीन फैटएफ का अध्यक्ष बन जाए, वो उसकी मदद नहीं कर पाएगा। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका मानता है कि अब वक्त आ गया है जब सेना सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों को पूरी तरह निर्वाचित सरकार के हाथों मंे सौंप दे और कश्मीर और अफगानिस्तान को छोड़ सारा ध्यान और संसाधन देश के आम नागरिकों के भले में लगाए।

कुछ पाकिस्तानी बातवीर सलाह दे रहे हैं कि सरकार फैटएफ के अस्तित्व को ही नकार दे। कोई उनसे पूछे कि क्या फैटएफ के सदस्य और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके बावजूद उन्हें छोड़ दंेगे?

पाकिस्तान पर आर्थिक शिंकजा धीरे-धीरे कस रहा है…अभी ग्रे लिस्ट, फिर ब्लैक लिस्ट। इनके प्रावधानों की वजह से वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल माॅनिटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से सस्ता कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा। वैस भी इनमें अमेरिका का दबदबा है जो स्वयं पाकिस्तानी वित्तीय सहायत पर लगाम लगा चुका है। अगर पाकिस्तान अब भी बाज नहीं आया तो अगला कदम सैन्य बल के इस्तेमाल का ही होगा जो पाकिस्तान की रही सही कमर भी तोड़ देगा।

जाहिर है पाकिस्तान आज दोराहे पर है। एक तरफ शांति और विकास की राह है तो दूसरी तरफ कश्मीर और अफगानिस्तान पर कब्जे का सपना जो सिर्फ विनाश की ओर ही ले जाता है। असली फैसला, जैसा कि हम जानते हैं, पाकी सेना को करना होगा। अगर पाकी सेना को याद न हो तो याद दिला दें – कश्मीर में कबाइलियों के भेष में सैनिक भेजने से लेकर कारगिल तक, हर बार हमला खुद पाकिस्तान ने किया है, भारत ने नहीं। भारत तो परमाणु हथियार तक पहले न प्रयोग करने की घोषण कर चुका है। पाकिस्तान का दुश्मन भारत नहीं खुद सेना है। अगर वो अपनी नीतियां बदल ले तो पाकिस्तान बदल सकता है।

“कब तक बहेगा निर्दोष अफगानियों का खून? कब होगी पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई?” in Punjab Kesari

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान को केंद्र में रखते हुए ने पिछले वर्ष 21 अगस्त को नई दक्षिण एशिया नीति की घोषणा की थी। उसके बाद छह महीने होने को आए, लेकिन अफगानिस्तान में हालात जस के तस बने हुए हैं, या कहें बदतर हो गए हैं तो गलत नहीं होगा। ट्रंप की घोषणा से पहले वहां जितने लोग मारे गए, उनकी घोषण की बाद उस से ज्यादा लोग वहां मारे गए हैं। 22 जनवरी को काबुल के होटल इंटर काॅंटिनेनटल पर लगभग वैसा ही हमला हुए जैसा मुंबई में हुआ था। इसमें करीब 50 लोग मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए।

होटल इंटरकाॅंटिनेनटल की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी कि 27 जनवरी को भीड़ भरे मध्य काबुल के चिकन स्ट्रीट बाजार में बारूद से भरी एक एंबुलेंस में धमाका हुआ जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए। विस्फोट स्थल के पास ही यूरोपियन यूनियन का दफ्तर और एक अस्पताल भी था। ये तो सिर्फ राजधानी काबुल की घटनाएं थीं, इनके अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी लगातार बम धमाके और अकारण गोलीबारी की बहुत सी घटनाएं दर्ज की गईं जिनमें अनेक लोगों ने जान गंवाई।

ट्रंप की नई नीति की घोषणा के बाद तालीबान के कब्जे वाले इलाके में भी बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी मीडिया हाउस सीएनएन के अनुसार 2017 के आखिरी छह महीनों में तालीबान ने अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत की। अक्तूबर 2017 में 14 प्रतिशत अफगान जिले तालीबान या अन्य आतंकवादियों के प्रभाव में थे, ये पिछली छमाही से एक प्रतिशत अधिक है। ताजा जानकारी के मुताबिक 56 प्रतिशत जिले अफगान सरकार के नियंत्रण या प्रभाव में थे, जबकि 30 प्रतिशत आतंक से प्रभावित थे। आतंकवादियों के प्रभावक्षेत्र का विस्तार हालांकि इनक्रीमेंटल है, फिर भी ये दुर्दांत तालीबान आतंक के सामने अफगान सेना की ढीली होती पकड़ को दर्शाता है। ध्यान रहे, वर्ष 2015 में करीब 72 फीसदी इलाके पर अफगान सरकार का कब्जा था और 7 प्रतिशत इलाका आतंकवादियों के प्रभाव में था।

उधर ब्रिटिश मीडिया हाउस बीबीसी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक तालीबान का अफगानिस्तान के चार प्रतिशत भौगोलिक हिस्से पर पूरा कब्जा है, परंतु देश का 70 फीसदी इलाका उसके प्रभाव में है। यहां वो जब चाहे हमला कर सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 15 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहां सप्ताह में दो या उससे अधिक आतंकी हमले होते हैं। 20 प्रतिशत हिस्से में महीने में कम से कम तीन आतंकी हमले होते हैं जबकि 31 प्रतिशत इलाके में हर तीन महीनों में एक न एक हमला तो होता ही है।

जिस प्रकार पिछले महीने तालीबान ने राजधानी काबुल में ताबड़तोड़ हमले किए, उससे स्पष्ट है कि अब देश का कोई इलाका ऐसा नहीं बचा, जहां तालीबान हमला नहीं कर सकते। तालीबान के बढ़ते हमले असल में ट्रंप को सीधी चुनौती हैं। जब भी ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान के खिलाफ कोई सख्त बयान जारी करता है, तालीबान उसका जवाब एक नए हमले से देता है। पिछले महीने काबुल में हुए भीषण हमलों को भी पाकिस्तान में हुए दो ड्रोन हमलों का जवाब माना जा रहा है।

हर हमले के बाद ट्रंप पाकिस्तान को धमकाते हुए एक ट्वीट कर देते हैं। चिकन स्ट्रीट पर हमले के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान को धमकाया कि वो ऐसा कदम उठाएंगे जैसा पहले कभी नहीं उठाया गया होगा। लेकिन आश्चर्य नहीं जब वो पाकिस्तान को धमका रहे थे, अमेरिकी विदेश विभाग के डिप्टी सेक्रेट्री (उपसचिव) जाॅन सुलीवान लगभग उसी समय (30 जनवरी) काबूल में संवाददाताओं से कुछ ओर ही कह रहे थे।

जब वाशिंग्टन पोस्ट के संवाददाता पैन कांस्टेबल ने उनसे ट्रंप के उस बयान के बारे में पूछा जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका तालीबान से बात नहीं करेगा और उसके खिलाफ ऐसा कदम उठाया जाएगा जैसा पहले कभी नहीं उठाया गया, तो सुलीवान ने कहा – “इसमें शक नहीं कि कुछ बहुत अधिक नकारात्मक घटनाएं हुई हैं, आप राष्ट्रपति के कल के और पिछले जिन बयानों का हवाला दे रहे हैं वो यही बताते हैं कि हमारी दक्षिण एशिया नीति परिस्थितियों पर आधारित है। हम समझते हैं कि इसे लागू करने में काफी समय लग सकता है। हम यहां से जाने और शांति वार्ता के लिए कोई समयसीमा नहीं तय कर रहे हंै। आप राष्ट्रपति के जिस बयान का जिक्र कर रहे हैं वो ये इंगित करता है कि हमने हाल ही में हुए भयावह हादसों का संज्ञान लिया है और इसका अर्थ ये है कि तालीबान के कुछ धड़े अफगान समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के इच्छुक नहीं हैं। इससे हमारी नीति की दीर्घकालिक रणनीति नहीं बदलती जो कहती है कि सैन्य दृष्टि से दृढ़ता से काम लिया जाए और तालीबान और उसके महत्वपूर्ण धड़ों को आश्वस्त किया जाए कि इस समस्या का कोई सैन्य समाधान नहीं है और अफगानिस्तान में शांति और सुरक्षा अततः शांतिवार्ता से ही सुनिश्चित होंगी। हम इसके लिए तालीबान पर दबाव बनाने और उसे इसके लिए आश्वस्त करने के लिए अफगान सरकार की साझेदारी में लंबे समय तक काम करने के लिए भी तैयार हैं। हमने समयसीमा तय नहीं की है। सब हालात पर निर्भर करेगा। पिछले दो सप्ताह की हिंसक आतंकी घटनाएं हमें थोड़ा रोकती हैं, पर ये हमें हमें हमारे अफगान साझीदारों का साथ देने से नहीं रोक सकतीं।”

जाहिर है ट्रंप भले ही जहर बुझे ट्वीट से पाकिस्तान को गालियां देते रहें पर न तो उनकी सेना और न ही विदेश विभाग अभी पाकिस्तान को सही तरीके से सबक सिखाने के मूड में हैं। जाॅन सुलीवान हों या अमेरिका की प्रिंसिपल डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेट्री आॅफ स्टेट एम्बेस्डर एलिस वेल्स जो 15-16 जनवरी को इस्लाबाद गईं थीं, सब एक ही राग अलाप रहे हैं। एलिस वेल्स की इस्लामाबाद यात्रा के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने जो बयान जारी किया उस पर भी एक नजर डालिए – ”पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ अपनी बैठक में एम्बेस्डर वेल्स ने ये रेखांकित किया कि अमेरिका, पाकिस्तान के साथ एक नए रिश्ते की ओर बढ़ना चाहता है जो इस क्षेत्र को स्थायित्व और समृद्धि देने के हमारे साझा हित पर आधारित हो। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के बलिदानों को स्वीकार करते हुए एम्बेस्डर वेल्स ने इस बात पर बल दिया कि अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति एक शांतिपूर्ण और स्थिर अफगानिस्तान बनाने, दक्षिण एशिया में आईएसआईएस को हराने और ऐसे सभी आतंकी समूहों के उन्मूलन के लिए संयुक्त रूप से काम करने का अवसर देती है जो पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के लिए खतरा हैं। एम्बेस्डर वेल्स ने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो अपनी धरती पर सक्रिय हक्कानी नेटवर्क और अन्य आतंकी समूहों की ओर ध्यान दे।“

स्पष्ट है अमेरिका अफगान समस्या के हल के लिए मूलतः दोतरफा नीति पर काम कर रहा है – 1) अफगान धरती पर मौजूद तालिबानियों को अफगान सेना की सहायता से हरा कर वार्ता की मेज पर लाया जाए और 2) पाकिस्तान से अफगानिस्तान में तबाही मचाने वाले आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पाकिस्तान को मजबूर किया जाए। अफसोस! अमेरिका अब तक दोनों मोर्चों पर नाकाम रहा है। अमेरिका को पता है कि इस क्षेत्र में समस्या आतंकवादी नहीं, पाकिस्तानी सेना है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद कारजाई बार-बार इस ओर ध्यान दिलाते रहते हैं। चिकन स्ट्रीट पर भयानक हमले के बाद जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खक्कान अब्बासी ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी से फोन पर बात करने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने इनकार कर दिया। जबानी जमा खर्च की जगह घनी ने घटना के तुरंत बाद अपनी खुफिया एजेंसी के प्रमुख मासूम स्टानेजई और गृह मंत्री वैस बरमक को पाकिस्तान भेजा जिन्होंने काबुल की आतंकी घटनाओं में पाकिस्तानी हाथ होने के पुख्ता सबूत सौंपे।

भारत में हुए आतंकी हमलों के बाद ऐसे न जाने कितने सबूत और डोसियर भारत पाकिस्तान को सौंप चुका है, जिनपर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वहां हाफिज सईद और सय्यद सलाहुद्दीन जैसे दुर्दांत आतंकवादी अब भी छुट्टे घूम रहे हैं। सवाल ये है कि अमेरिका कब लल्लो-चप्पो बंद कर पाकी सेना के खिलाफ सख्त और निर्णायक कार्रवाई करेगा?

काबुल हमलों में जब पाकिस्तान की थू थू हुई तो पाकिस्तान ने दावा किया कि वो आतंकवाद से लड़ने के लिए ईमानदारी से काम कर रहा है और पिछले वर्ष जब नवंबर में पाकी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा अफगानिस्तान गए थे तब उसने हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकी अफगानिस्तान को सौंपे थे। इसकी पुष्टि अफगानिस्तान या अमेरिका ने अब तक नहीं की है। लेकिन ताजा हमलों से स्पष्ट है कि आतंकियों की जड़े कितनी गहरी हैं, सिर्फ 27 आतंकियों के सफाए से काम नहीं चलेगा।

ये सही है कि अफगानिस्तान में अमेरिका के हित सिर्फ अफगान स्थिरता और विकास से ही नहीं जुड़े हैं। वहां बैठ कर वो पूरे मध्य एशिया और चीन पर भी करीब निगाह रख सकता है। लेकिन सोचने के बात ये है कि ऐसे विनाश के बीच क्या अमेरिका के हित सध पाएंगे? क्या नवगठित और अनुभवहीन अफगान सेना शातिर पाक सेना और उसके दुर्दांत आतंकियों को हरा पाएगी? अब वक्त आ गया है कि अमेरिका अफगानिस्तान को अधर में छोड़ कर इराक जाने की अपनी गलती का प्रायश्चित करे और आतंकियों और उनके आकाओं पर निर्णायक प्रहार करे। निर्दोष अफगान कब तक मारे जाते रहेंगे? अमेरिका को समझना होगा कि लगातार हो रही आतंकी घटनाओं से धीरे-धीरे अफगान लोगों का विश्वास काबुल सरकार और अमेरिका से खत्म हो जाएगा। ये पाकी सेना और उसके आतंकियों की बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत होगी और वियतनाम के बाद अमेरिका के लिए एक और कूटनीतिक और रणनीतिक हार की शुरूआत।

“परमाणु बम की व्यर्थता और सीमा का भान हो रहा है पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया को” in Punjab Kesari

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के बाद जिन दो देशों – पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया, के खिलाफ सबसे बड़ा मोर्चा खोला, वो दोनों ही चीन के बगल बच्चे या कहें लोकल गुंडे हैं और दोनों ही परमाणु ताकत भी हैं। एक तरफ पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन के इशारों पर भारत को ‘बांधने और परेशान’ करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ उत्तरी कोरिया, अमेरिका और पूर्व एशिया में उसके सहयोगियों को ‘औकात’ बताता रहता है। दोनों देशों के परमाणु बमों के पीछे कैसे चीन का हाथ है, ये गोरखधंधा कब से चल रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आंखें तरेरने वाला अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु बम बनाते समय क्यों चुप रहा, इसका विश्लेषण फिर कभी। लेकिन अभी जो सवाल हमारे सामने है वो ये कि क्या परमाणु बम की आड़ में पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया जैसे कपटी देश दादागिरी कर सकते हैं? क्या परमाणु बम ने उन्हें अजेय बना दिया है?

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की शुरूआत यूं तो 1974 से मानी जाती है जब तबके प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि हम घास खाएंगे पर एटम बम बनाएंगे, लेकिन वो असल में परमाणु ताकत बना 28 मई 1998 को प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के कार्यकाल में। अक्तूबर 2017 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान के पास 140 और भारत के पास 130 न्यूक्लिर वाॅरहेड थे। उधर उत्तरी कोरिया अब तक 11 न्यूक्लियर धमाके कर चुका है। उसका दावा है कि हर धमाका पहले से कहीं अधिक ताकतवर था। वर्ष 2016 में तो उसने दावा किया कि उसने धमाके में हाइड्रोजन बम का इस्तेमाल किया। हालांकि दुनिया भर में विशेषज्ञों ने इस दावे को खारिज कर दिया। माना जाता है कि उसके पास फिलहाल 17-20 बम हैं जो 2020 तक 100 तक पहुंच जाएंगे।
चाहे उत्तरी कोरिया हो या पाकिस्तान, दोनों ने अपनी परमाणु ताकत का भरपूर या यों कहें बचकाना और बड़बोला प्रदर्शन किया और इसके जरिए अंतरराष्ट्रीय राजनय में मोल-तोल की कोशिश की। दोनों ने उम्मीद की कि इसके जरिए वो अपने घातक मंसूबों को पूरा कर लेंगे और दुश्मन को ठिकाने लगा देंगे। लेकिन अफसोस, ऐसा हुआ नहीं और ऐसा हो भी नहीं सकता।

पहले बात पाकिस्तान की। पाकिस्तान के परमाणु ताकत बनने के बाद वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारतीय प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने 21 फरवरी 1999 को लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए और दोनों देशों के विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रण लिया। लेकिन सेना प्रमुख परेवज मुशरर्फ को ये भा नहीं रहा था, वो तो गुपचुप कारगिल में घुसपैठ करवा रहा था। जब घुसपैठ की खबर सामने आई तो भारत ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए कारगिल से पाकी सैनिकों को बाहर करने में देर नहीं लगाई। मुशरर्फ को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के खिलाफ भारत कोई कार्रवाई करने की जुर्रत भी करेगा। लेकिन भारत ने सिर्फ अपनी सीमा के भीतर कार्रवाई कर ये जता दिया कि पाकिस्तान की न्यूक्लियर ताकत भी उसे अपनी जमीन खाली करवाने से नहीं रोक सकती और उसके परमाणु बम के बावजूद भारत सीमित कार्रवाई कर सकता है। ध्यान रहे कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा परमाणु बम सीमा की ओर ले जाने की खबर भी आई इसपर अमेरिकी ने सख्त एतराज किया और राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नवाज शरीफ को अमेरिका बुलाकर क्लास भी लगाई।

कारगिल में मुंह की खाने के बावजूद सीमा पर पाकिस्तान की गुस्ताखियां जारी रहीं। लेकिन लंबे अर्से बाद बाद सितंबर 2016 में मोदी सरकार ने पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक की और ये स्पष्ट संकेत दिया कि वो सीमापार से निर्यातित आतंकवाद पर मौन नहीं रहेगी। अगर पाकिस्तान की बेजा हरकतें जारी रहीं, तो भारत भी जवाब देगा।

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसका सीधा सा सिद्धांत है – जैसे को तैसा। इसके तहत भारतीय सेना ने अपेक्षाकृत अधिक दूरी से मार करने वाले हथियारों से पाकिस्तान की उन चैकियों पर हमले शुरू किए जहां से आतंकियों की कश्मीर में घुसपैठ कराई जाती है। इससे पाकी चैकियों और सैनिकों को भारी क्षति पहुंची। पिछले साल जितने सैनिक हमारे मारे गए हैं, उससे चार गुना नुकसान पाक को हुआ। आॅपरेशन अर्जुन के अच्छे नतीजे सामने आए। लेकिन पाकिस्तान अभी अपनी पुरानी हरकतें छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। पाकिस्तानी सेना संभवतः अब भी अपने परमाणु कार्यक्रम पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर रही है।

पाकिस्तान भारत की कोल्ड स्टार्ट स्ट्रेटेजी (दुश्मन के इलाके में परंपरागत हथियारों से त्वरित और प्रबल आक्रमण) के खिलाफ अपनी छोटी दूरी की नस्र (हत्फ-प्ग्) न्यूक्लियर मिसाइलों की धमकी देता रहता है। इसके जवाब में भारतीय सेना प्रमुख विपिन रावत ने 12 जनवरी को सालाना संवाददाता सम्मेलन में साफ चेतावनी दी कि अगर उसने युद्ध किया तो हम उसकी परमाणु धमकी की हवा निकाल देंगे। अगर हमें आदेश मिला तो हम ये नहीं कहेंगे कि पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है इसलिए हम सीमा नहीं पार कर सकते। जाहिर है भारत का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व अब पाकिस्तान के परमाणु बमों से डरने और इसके साये में अपनी सुरक्षा नीति ढालने की मानसिकता से बाहर आ चुका है। ये बात पाकिस्तान को जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उसके लिए उतना ही अच्छा होगा। लेकिन जनरल रावत पर जैसे पाकिस्तानी सेना और विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया दी उससे तो यही लगता है कि उनके मुगालते कायम हैं।
जनरल रावत ने पाकिस्तान को कोई धमकी नहीं दी थी। लेकिन पाकिस्तानी मीडिया ने इसे धमकी के तौर पर पेश किया। पाक सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा कि पाकिस्तान के पास भारतीय धमकी के खिलाफ विश्वसनीय न्यूक्लियर डेटेरेंस है। पाकिस्तान के पास व्यावसायिक सेना है और वो जिम्मेदार और लचीला परमाणु राष्ट्र है और भारत को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। पाकिस्तान के पूर्व रक्षा और वर्तमान विदेश मंत्री और बात-बात पर न्यूक्लियर बम की धमकी देने वाले ख्वाजा आसिफ ने जनरल रावत के बयान को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि वो तो परमाणु युद्ध के लिए निमंत्रण दे रहे हैं। अगर उनकी यही इच्छा है तो वो हमारे संकल्प की परीक्षा ले सकते हैं। उनकी शंकाएं आसानी से दूर हो जाएंगी।

स्पष्ट है कि नए भूराजनीतिक समीकरणों के चलते चारों ओर से घिरा पाकिस्तान अब भी गीदड़भभकियां देने से बाज नहीं आ रहा है। पूर्वी सीमा पर भारत ने उसके आतंकी रवैये के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है, तो पश्चिमी सीमा पर उसकी दोगली नीतियों के कारण पिछले 16 साल से अफगानिस्तान में फंसे अमेरिका ने भी उसे सबक सिखाने की ठान ली है। पिछले राष्ट्रपतियों से अलग टंªप ने बिना लागलपेट साफ कर दिया है कि वो उसका दोगलापन और नहीं सहेंगे। ये बात अलग है कि अंदरखाने में पाकी सेना और अमेरिकी प्रशासन में अब भी बातचीत जारी है और पाकी सेना अफगानिस्तान में ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ की नीति से धीरे-धीरे पीछे हटती नजर आ रही है जिसके तहत उसने अफगानिस्तान को आतंकी अड्डा बना दिया था। पाकी रक्षा विशेषज्ञों को अब ये समझ आता जा रहा है कि एक तो अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलने की कोई जल्दी नहीं है और दूसरे उसने इस इलाके में भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी चुन लिया है। चीन भले ही उसके साथ दोस्ती की दुहाई दे, पर जरूरत पड़ने पर वो काम नहीं आएगा। वैसे भी उसके यहां आतंकी पनाहगाहों के खिलाफ सिर्फ अमेरिकी और भारत ही नहीं, स्वयं चीन भी आपत्ति जता चुका है। अब तो उसकी माली हालत भी इतनी खराब हो चुकी है कि अगर समय रहते उसे नहीं संभाला गया तो देश के टूटने का खतरा पैदा हो जाएगा। यं भी बलूचिस्तान, सिंध आदि में अलगाववादी आंदोलन चल ही रहे हैं और गाहे बगाहे पाक अधिकृत कश्मीर से भी विरोध की आवाज उठती रहती है।

अमेरिका विरोध में पागल हुए कुछ पाकी बातवीर अमेरिकी पर परमाणु बम फेंकने की बात करते हैं, लेकिन ये सोच कर मन मसोस कर रह जाते हैं कि उनके पास इतनी दूर तक मार करने वाली मिसाइल नहीं है। फिर वो उत्तरी कोरिया की मिसाल देते हैं कि कैसे वहां किम जोंग उन अमेरिका का डट कर मुकाबला कर रहा है। आगे बढ़ने से पहले याद दिलाते चले की केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी किम जोंग उन के मुरीदों में हैं। वो कई बार उसकी तारीफ कर चुके हैं। यही नहीं केरल के कई हिस्सों में कम्युनिस्ट उसके पोस्टर और होर्डिंग भी लगा रहे हैं।

क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा? धीरे धीरे किम जोंग उन भी लाइन पर आता दिखाई दे रहा है। उसे समझ आ गया है कि ट्रंप का न्यूक्लिर बटन न केवल उसके बटन से बड़ा है, बल्कि ज्यादा शक्तिशाली भी है और काम भी करता है। सनकी और बददिमाग किम को समझ आ गया है कि गरीबी, बदहाली और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे उसके देश को न्यूक्लियर बम की शेखी बघारने से कुछ हासिल नहीं होगा। परमाणु युद्ध हुआ तो अमेरिकी से पहले उसका और उसके देश का वजूद मिट जाएगा। चीन और रूस के बीच-बचाव और दक्षिण कोरिया के सकारात्मक और सहयोगात्मक रूख के बाद हाल ही में उत्तरी और दक्षिणी कोरिया के बीच लंबी बातचीत हुई जिसके बाद तनाव काफी कम हुआ और उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया में होने वाले विंटर ओलंपिक्स में भाग लेने और चीयर लीडर्स भेजने के लिए तैयार हो गया है।

चाहे पाकिस्तान हो या उत्तरी कोरिया, धीरे धीरे ही सही, चीन के दोनों गरीब और बदहाल बगल बच्चों को परमाणु ताकत की सीमा और व्यर्थता का बोध हो रहा है। रस्सी जल गई, पर बल नहीं गए। दोनों के पूरी तरह बदलने में अभी समय अवश्य लगेगा। अब चीन को भी ये सोचना चाहिए कि गुंडे पालने और दादागिरी करने से दुनिया उसे महाशक्ति नहीं मान लेगी। अगर उसे वास्तव में अंतरराष्ट्रीय ताकत बनना है तो उसे व्यापार और राजनय की दुनिया में ईमानदारी से आगे बढ़ना होगा। सम्मान कमाना पड़ता है, किसी को डरा कर आप इसे हासिल नहीं कर सकते।

“पाकिस्तान पर कार्रवाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे अमेरिका, सभी पाकिस्तानियों को वापस भेजे” in Punjab Kesari

पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिकी राष्टंपति डोनाल्ड टंप द्वारा दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के बाद समय का पहिया तेजी से घूमा। शुरू में तो पाकिस्तानी विश्लेषक टंप को सिरफिरा और बिगड़ैल बता कर उसकी नई नीति का मजाक उडा़ते रह।े हाल ही में अमेिरका से लाटै े पाक सने टे की सरु क्षा समिति के प्रमुख मुशाहिद हुसैन स ̧यद ने तो ये तक कहा कि जब कोई अमेरिका में ही टंप को गंभीरता से नहीं लेता, तो पाकिस्तान को भी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। लेकिन अमेरिका द्वारा पहले 255 मिलियन डाॅलर आरै फिर कलु 1.1 बिलियन डाॅलर की सरु क्षा सहायता बदं करने के एलान के बाद पाकिस्तान को अहसास हो गया कि मामला बेहद गंभीर हो चुका है। अभी तो सुरक्षा सहायता बंद हुई है, अगर ऐसे ही चलता रहा तो संभव है मानवीय और विकास की मद में दी जा रही सहायता राशी भी रोक दी जाए।
अमेरिकी संसद मंे बलूचिस्तान को लेकर पहले ही कुछ बिल लंबित हैं, अब रिपब्लिकन सेनेटर रंैड पाॅल ने कहा है कि वो पाकिस्तान को हर तरह की सहायता बंद करने के संबंध में जल्दी ही विधेयक लाएंगे। राष्टंपति टंप ने इसे ‘गुड आइडिया’ कह कर इसका स्वागत भी किया है। इस बीच वाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के सामने सभी विकल्प खुले हैं। लेकिन बड़ा सवाल अब ये है कि क्या टंप प्रशासन ‘आॅक्टोपस’ 1⁄4सेना और हथियार उद्योग की लाॅबी1⁄2 के भीतराघातों को निरस्त कर पाएंगे जिसका पाकिस्तानी सेना और संभ्रांत वर्ग से गहरा और पुराना रिश्ता ह?ै
इस रिश्ते की एक बानगी हैं पाकिस्तानी विेदश मंत्री ख्वाजा आसिफ जिन्होंने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ है। इन्होंने अमेरिका को ‘यार मार’ तक बता दिया है। ये अमेरिका को सरेआम ललकार रहे हैं और उसकी ईंट से ईंट बजाने की धमकी तक दे रहे हैं। लेकिन विश्लेषक उनकी धमकियों पर ही सवाल उठा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके बच्चों का उसी अमेरिका में बसे होना जिसकी वो ईंट से ईंट बजाना चाहते हैं। ख्वाजा आसिफ की तीन लड़कियां और एक लड़का है। उनकी सबसे बड़ी बेटी अतिका सफदर ख्वाजा स्वतंत्र लेखक हैं और न्यूयाॅर्क में रहती हैं। उनकी दूसरी लड़की अमीरा सफदर ख्वाजा ने विदेश से पत्रकारिता की पढ़ाई की है जबकि उनकी सबसे छोटी बेटी फातिमा की शादी हाल ही मंे अमेि रकी पाकिस्तानी व्यापारी सल्ु तान खान के बटे  समीर से र्हइु हैं। फातिमा की शादी हालांकि लाहौर में हुई, लेकिन सगाई अमेरिका में ही हुई थी। उनका लड़का ख्वाजा मुहम्मद असद भी अमेरिका में बसा हुआ है।
जाहिर है पाकिस्तानी नते ा आरै जनरल इस्लाम आरै दश्े ाभक्ति के नाम पर आम नागरिक के साथ दोगला खेल खेलते हैं। एक तरफ तो वो लोगांे को उकसाते हैं कि वो अपने देश की खातिर सूली पर चढ़ने के लिए तैयार रहें, वहीं दूसरी ओर उनके खुद के बच्चे विदेशों में पढ़ाई करते हैं और वहां नौकरियां और व्यापार करते हैं। वो पाकिस्तान मंे खुला भ्रष्टाचार करते हैं और अपनी काली कमाई का विदेशों में निवेश करते हैं। अगर पाकिस्तान युद्ध मंे तबाह होता है तो फर्क आम पाकिस्तानी को ही पड़ेगा, ये तो विदेश भाग जाएंगे। इसलिए अगर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई करनी है तो तीन काम पहले करने होंगे – 1. अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तान की सेना और नेताआंे के साथ उसके रिश्तांे की रीढ़ तोड़नी होगी, 2. अमेरिका और उसके सहयोगी नैटो देशों में बसे जनरलों और नेताओं के बच्चों और अन्य रिश्तेदारांे को वापस भेजना होगा और 3. विदेशों में निवेशित इनकी काली कमाई को जब्त करना होगा। वाइट हाउस के अधिकारी पाकिस्तान के खिलाफ हर विकल्प ‘खुला’ होने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अगर पाकिस्तानी सेना और उसके मोहरे नेताआंे को घुटने पर लाना है, तो सबसे पहले इन विकल्पांे पर विचार करना
चाहिए।
अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तानी सेना और राजनीति के संबंध कितने गहरे हैं उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के लगभग हर बड़े जनरल और नेता के बच्चे/रिश्तेदार अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशांे में बसे हैं। जनता को देशभक्ति के नाम पर बेवकूफ बनाने वालांे में सबसे ऊपर नाम है पूर्व राष्टंपति और तानाशाह जनरल परवजे मश्ु ारर्फ का जो भारत विराध्े ाी आरै आतकं वाद समर्थक बयानों के लिए हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। ये खुद को देश का सबसे बड़ा देशभक्त मानते हैं और हाल ही में इन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि सरकार को विदेशों में बसे देश के दुश्मनों को मरवा देना चाहिए। इनपर बेनजीर भुट्टो के कत्ल का आरोप भी है। इनकी मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण हजारों पाकिस्तानियों ने जान गंवाई, लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि ये पाकी जनरल अरबपति भी है। जुलाई 2016 में पाकिस्तानी गृह मंत्रालय ने एक अदालती मामले के सिलसिले में बताया कि मुशरर्फ के पास देश में आठ संपत्तियां और नौ बंैक खाते हैं जिनकी कीमत अरबांे में हैं। ये तो सिर्फ पाकिस्तानी संपत्तियां हैं, इसके अलावा इनके पास इंग्लंैड, अमेरिका, दुबई, रियाद आदि मंे भी अनेक संपत्तियां हैं। इनकी पत्नी और बच्चों के पास भी बेशुमार दौलत है। इन्होंने देशभक्ति भले ही जसै ी भी की हो पर दश्े ा को भी भरपरू लटू ा। ध्यान रहे इनका बटे ा बिलाल मश्ु ारर्फ अमेि रकी नागरिक है। इनका बड़ा भाई डाॅक्टर जावेद मुशरर्फ अर्थशास्त्री है जो रोम में बसा है। इनका छोटा भाई नावेद मुशरर्फ एनिस्थोलाॅजिस्ट है जो अमेरिका में बसा है।
पाकिस्तान में सेना के जनरलों के पास लंबी चैड़ी जमीनें होना कोई अपवाद नहीं है। असल में वहां सेना के जनरलों को सेवानिवृत्ति पर 10 एकड़ जमीन दी जाती है और सेना प्रमुख को इसके अलावा 40 एकड़ अतिरिक्त जमीन मिलती है। वर्तमान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से पहले सेना प्रमुख रहे राहिल शरीफ को को भी 50 एकड़ जमीन दी गई जिसपर काफी विवाद भी हुआ। ये मामला तब शांत हुआ जब सेना ने इस विषय में अपने नीति-नियमों का सार्वजनिक तौर पर खुलासा किया।
लेकिन पाकिस्तान में सिर्फ जनरलों के पास ही लंबी-चैड़ी जायदादें नहीं हैं। वहां के राजनेता भी अपनी दौलत और विलासिता पूर्ण जीवन के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उनकी अनेक स्टील, चीनी और पेपर मिलंे हैं। उनके बेटे हसन और हुसैन इंग्लंैड में बसे हैं और वहीं से पारिवारिक व्यापार संभालते हैं। पनामा लिस्ट में नाम आने के बाद, पिछले वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अब वो और उनके परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार, हवाला, अघोषित संपत्तियों आदि के कई मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। नवाज शरीफ के समधि इसहाक डार दश्े ा के वित्त मत्रं ी हैं आरै उनपर भी भष््र टाचार के अनेक आरोप हैं। इसहाक डार के बड़े लड़के की शादी नवाज शरीफ की बड़ी बेटी अस्मा नवाज से वर्ष 2004 में जद्दे ाह, सउदी अरब में हइु र्। कहा जाता है कि मकु दमांे से बचने के लिए इसहाक डार आजकल लंदन के एक अस्पताल में भर्ती हैं और वहीं से वित्त मंत्रालय चला रहे हैं।
भष््र टाचार पर सिर्फ पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ही एकाधिकार नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल पाकिस्तान पीपल्स पार्टी भी कुछ कम नहीं है। बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद इसके प्रमुख बने उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट कहा जाता था। यानी वो हर सरकारी ठेके में दस प्रतिशत कमीशन लेते थ।े पाकिस्तानी के जानमे ाने जमीदं ार जरदारी की इग्ं लडंै , अमेि रका मंे ही नहीं खाड़ी के देशों में भी अकूत संपत्ति हैं।
जाहिर है अमेि रका को पाकिस्तान के खिलाफ र्काइे भी बडा़ कदम उठाने से पहले ये सुि नश्चत कर लेना चाहिए कि उसका उसका निशान कौन बनेगा और उसका अपेक्षित परिणाम मिलेगा कि नहीं। अगर अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवादियांे की तलाश में अंधे डंोन हमले करता है तो इससे आम पाकिस्तानी को जान-माल की भारी तबाही हागे ी, लेि कन असली दाष्े ाी यानी पाकिस्तानी जनरल आरै उनके इशारे पर सरकार चलाने वाले अमीर नेता फिर भी बचे रहेंगे। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को राह पर लाना है तो इन दोनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। वैसे भी आतंकवादी तो सिर्फ सेना के माहे रे हैं, उन्हें समाप्त करके कछु हासिल नहीं हागे ा। कछु दिन बाद सैि नक जनरल कछु आरै माहे रे खड़े कर देंगे।
अमेरिका को अगर अफगानिस्तान में सफलता हासिल करनी है तो पाकिस्तानी सेना की अफगान नीति को बदलवाना हागे। लेि कन पाकी सने  अपनी नीति बदलने की जगह अमेरिका से दो सौदे करना चाहती है – 1. अमेरिका अफगानिस्तान में भारत को बढ़ावा देना बंद करे और वहां उसके ‘स्टंेटेजिक इंटंेस्ट्स’ को मान्यता दे और 2. उसे भारत में खुला खेल खेलने का खुला मौका दे। अगर अमेरिका, पाकिस्तानी सेना की ये बातंे मानता है तो ठीक है, वरना पाकिस्तान न तो अफगानिस्तान में अपने आतंकियांे पर लगाम लगाएगा और न ही उसे अफगानिस्तान तक सैनिक सहायता पहंुचाने के लिए रास्ता देगा। पाकिस्तान ने अब अमेरिका को ये धमकी देना भी शुरू कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके साथ ऐसे ही सख्ती करता रहा तो वो चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर का न सिर्फ चीनी सहायता से सैन्यीकरण कर देगा, बल्कि ग्वादर पोर्ट पर भी चीन का सैनिक अड्डा बनवा देगा।
स्पष्ट है पाकिस्तानी उन्हीं आतंकवादियों को सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अमेरिका खत्म करना चाहता हैं। ये एक आरे तो अमेि रका में अपने बच्चांे को पढा़ ना आरै बसाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उसी पर आंख तरेर रहे हैं। ऐसे में अब अमेरिका को चाहिए कि वो पाकिस्तान की सफाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे और अपने यहां बसे हर पाकिस्तानी को वापस भजे  आरै अपने नटै  सहयाेि गयांे पर भी इसके लिए दबाव डाल।े जब तक पाकी जनरलांे आरै सभ्ं ाा्र तं वर्ग के आर्थिक और व्यक्तिगत हितों पर चोट नहीं होगी, आतंकवाद के प्रति उनका रवैया नहीं बदलेगा।