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“बंद हो एससी-एसटी एक्ट के नाम पर झूठ और हिंसा की राजनीति” in Punjab Kesari

न्यायमूर्ति यूयू ललित और एके गोयल की सुप्रीम कोर्ट बैंच ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत किसी सार्वजनिक कर्मचारी को उसके नियोक्ता प्राधिकारी की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। इसी प्रकार गैर-सार्वजनिक कर्मचारी को सीनियर सुपरिनटेंडेंट पुलिस की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत लोगों को झूठे मामलों से बचाने के लिए जरूरी है कि कोई भी कार्रवाई करने से पहले डिप्टी पुलिस सुपरिनटेंडेंट पुलिस ये जांच करें कि मामला एससी-एसटी एक्ट का बनता है या नहीं।

ध्यान रहे एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए अगर इसके तहत कोई शिकायत होती है तो आरोपित व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का शुरू में तो संज्ञान ही नहीं लिया गया लेकिन आगामी चुनावों के मद्दे नजर कुछ राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने की ठानी। विशुद्ध रूप से न्यायिक इस फैसले को भावात्मक रूप दिया गया और विपक्षी दलों ने इसके लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस पार्टी ने आनन-फानन में भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और दावा किया कि इस फैसले में उसका हाथ है। अदालत के फैसले के विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया जिसमें व्यापक हिंसा हुई और जान-माल की हानि हुई।

इन दंगों की इलैक्ट्राॅनिक मीडिया ने व्यापक कवरेज की। अदालत के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी लोगों का गुस्सा समझा जा सकता है, लेकिन दंगों की फुटेज से स्पष्ट था कि ये पूरी तरह प्रायोजित थे। पूना कोरेगांव के बाद एक बाद फिर भड़की इस हिंसा से साफ है कि एससी-एसटी समाज को मुख्यधारा से अलग करने और देश में हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए सुविचारित षडयंत्र हो रहा है। इस्लामिक आतंकियों, नक्सलियों और मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दलों के गठबंधन ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के विवादास्पद छात्र रोहित वेमुला को प्रतीक बनाकर जिस राजनीति की शुरूआत की थी, वो अब परवान चढ़ती नजर आ रही है।

हमने देखा कैसे कांग्रेस ने गुजरात में जिग्नेश मेवानी के साथ गठबंधन किया जिसे नक्सलियों और पाॅपुपर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों ने खुलेआम समर्थन दिया। पूना कोरेगांव में इसीे व्यक्ति के भड़काऊ भाषण के बाद महाराष्ट्र में व्यापक दंगे फैले। ये व्यक्ति राजनीतिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाता है और सरेआम लोगों को हिंसा के लिए भड़काता है।

बहरहाल एससी-एसटी वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को पुनर्विचार याचिका दायर की। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस पूरे प्रकरण में सरकार का हाथ होने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “सरकार सुप्रीम कोर्ट के तर्क से सहमत नहीं है जिसने एससी-एसटी एक्ट की संरचना को नए सिरे से गढ़ दिया है…हमें लगता है कि इस प्रकार के संवेदनशील मामले पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता थी और आंकड़ों के आधार पर ये तय किया जाना चाहिए था कि इसका दुरूपयोग हो रहा है या नहीं।” प्रसाद ने एससी-एसटी एक्ट के प्रति अपनी सरकार का समर्थन दोहराया और कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे मजबूत किया गया है। 1989 में मात्र 22 अपराध धारा 3, (1) और (2) के तहत दर्शाए गए थे, लेकिन 2015 में मोदी सरकार ने इस सूची में विस्तार किया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पांच दिन के भीतर ही सरकार ने पुनर्विचार याचिका तैयार कर ली थी, लेकिन छह दिन तक अदालत का अवकाश रहने के कारण इसे दायर नहीं किया जा सका।

सरकार ने इस विषय में दायर अपनी पुनर्विचार याचिका में स्पष्ट शब्दों में कहा, ”ये फैसला बड़ी जनसंख्या वाले एससी-एसटी वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ये संसद की उस विधायिका नीति के विपरीत है जो एससी-एसटी एक्ट में परिलक्षित होती है। एससी-एसटी वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए किए गए विभिन्न कार्यों के बावजूद उनकी स्थिति अब भी कमजोर है। उन्हें कई नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते, उनके खिलाफ अनेक अपराध किए जाते हैं, उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है…विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके खिलाफ गंभीर अपराध किए जाते हैं।“

स्पष्ट है सरकार ने इस वर्ग की भावनाओं और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को समझा और उसके अनुरूप सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

दो अप्रै्रल को हुई व्यापक हिंसा और सरकार की पुनर्विचार याचिका के बावजूद चार अप्रैल को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा, ”कई बार विरोध करने वाले अदालत के आदेश को ठीक से पढ़ते भी नहीं, इसमें निहित स्वार्थ भी शामिल हो सकते हैं।” अपने आदेश के पीछे की मंशा को साफ करते हुए अदालत ने कहा ”हमें निर्दोष लोगों को जेल भेजे जाने पर चिंता है, क्या किसी व्यक्ति की आजादी बिना किसी उचित प्रक्रिया के छीनी जा सकती है? सत्यापन का कोई तरीका तो होना ही चाहिए। अगर एक सार्वजनिक कर्मचारी के खिलाफ आरोप लगता है तो क्या होता है? अगर आरोप एटाॅर्नी जनरल के खिलाफ लगे तो क्या हो? उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए?”

इस विषय में 12 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अपने लिखित निवेदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। सरकार की ओर से एटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत की ये सोच गलत है कि वो कानून बना सकती है। अदालत द्वारा एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को क्षीण करने से देश को भारी नुकसान हुआ है। सरकार ने अदालत से आग्रह किया किया कि वो कानून में किए गए परिवर्तनों को तुरंत वापस ले ताकि वही कानून अपनाया जा सके जिसे संसद ने पारित किया है।

केंद्र सरकार इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में तो पक्ष रख ही रही है, लेकिन साथ ही उसने अन्य विकल्प भी खुले रखे हैं। 11 अप्रैल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई वरिष्ठ मंत्रियों की एक बैठक में इस विषय में अध्यादेश लाने पर भी चर्चा की गई। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया तो सरकार इस संबंध में अध्यादेश का रास्ता भी अपना सकती है।

अदालत में लड़ाई से लेकर अध्यादेश तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तक सबने स्पष्ट कर दिया है कि एससी-एसटी वर्ग को आहत करने वाले इस फैसले को नहीं माना जाएगा। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकार द्वारा पूरा समर्पण दिखाने और हर संभव प्रयास करने के बावजूद विपक्षी दल झूठ का भ्रमजाल फैलाने में लगे हैं।

मायावती को इस अवसर पर एक बार फिर कश्मीरी आतंकियों की जय जयकार करने वाला विवादास्पद नक्सली रोहित वेमूला याद आने लगा है। उन्होंने अनुसूतिच जाति वर्ग पर अपनी इजारेदारी जताते हुए भाजपा को इस वर्ग का विरोधी करार दिया है। मायावती आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उंगली उठा रही हैं, लेकिन इन्हीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए एससी-एसटी एक्ट का दुरूपयोग रोकने के बारे में 20 मई 2007 को एक आदेश निकाला था जिसमें कहा गया था, ”दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर एससी-एसटी को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं, इस बात का ध्यान रखा जाए कि निहित स्वार्थों के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल न होने पाए।” मायावती यहीं नहीं रूकीं, उन्होंने 29 अक्तूबर को इस संबंध में एक और आदेश निकाला जिसमें कहा गया था, ”एससी-एसटी सदस्यों के उत्पीड़न के मामलों में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान नहीं किया जाए।” सोचने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को क्या वही नहीं कहा था जो मायावती ने 2007 में कहा था। लेकिन आज मायावती केंद्र सरकार को चुनौती दे रहीं हैं कि अगर उसे एससी-एसटी से प्यार है तो वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाए।

उधर राहुल गांधी आग में घी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है वो मोदी के राष्ट्रवाद को जातिवाद से काट पाएंगे। तभी तो वो झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आतंकियों का गुणगान करने वाले नक्सली रोेहित वेमूला ने आत्महत्या की थी, लेकिन राहुल, मोदी सरकार पर उसकी हत्या का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस ने 60 साल के शासन में एससी-एसटी वर्ग के लिए क्या किया, वो ये तो नहीं बताते, लेकिन मौजूदा दशा के लिए वो मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, जिसने इस वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए पिछले चार साल में कांग्रेस के 60 साल से ज्यादा काम किया है। हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने सरेआम ये झूठ बोला कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। जातिवादी नफरत और हिंसा भड़काने के लिए इस से बड़ा षडयंत्र और क्या हो सकता है? अब इसे दुष्प्रचार और षडयंत्र नहीं तो और क्या कहेगे कि राहुल गांधी एससी-एसटी वर्ग को पोटने के लिए ‘संविधान बचाओ मुहिम’ का आगाज करने जा रहे हैं, जबकि संविधान या इस कानून पर कहीं कोई संकट है ही नहीं।

राहुल गांधी के जहरबुझे भड़काऊ बयानों के खिलाफ पांच अप्रैल को स्वयं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने एक ट्वीट कर राहुल पर आरोप लगाया कि वो ये झूठ बोल कर समाज में नफरत भड़का रहे हैं कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। उन्होंने सबूत के तौर पर राहुल गांधी के भाषण का अंश भी पेश किया जिसमें वो कह रहे थे, ”दलितों और आदिवासियों पर जुल्म बढ़ रहे हैं और एससी-एसटी एक्ट वापस ले लिया गया है। नरेंद्र मोदी जी एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं।“

कांग्रेस अध्यक्ष की ऐसी हरकत निश्चित ही निंदनीय है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए वो आजकल बिना किसी सबूत के कुछ भी बोल रहे हैं। सबने देखा कि उन्होंने गुजरात में पटेलों को आरक्षण का झुनझुना थमाया जबकि काननून ये संभव नहीं है। कर्नाटक में तो वो हिंदू समाज को ही बांटने पर उतर आए हैं। भारतीय लोकतंत्र की ये विडंबना हो गई है कि स्वार्थ में अंधे नेता समाज में आग लगाने के लिए बेसिरपैर के भड़काऊ बयान देते हैं और उनके चेले चपाटे इसे ब्रह्य वाक्य मान कर प्रचारित-प्रसारित करते हैं। ये खेल सिर्फ बयानों तक ही रहे तो भी गनीमत है, समाज को तोड़ने तथा हिंसा और आतंक फैलाने के लिए बाकायदा हिंसक गिरोहों को पैसा दिया जाता है और लाशों को ट्राॅफी समझा जाता है।

जाहिर है मोदी सरकार को सतर्क रहना होगा। एससी-एसटी वर्ग में असंतोष के नाम पर देश तोड़ने के लिए विघटनकारी ताकतें सक्रिय हो चुकी हैं। इन ताकतों से सख्ती से निपटना होगा, नहीं तो ये समाज को ही नहीं तोड़ेंगी, देश की छवि को भी भारी नुकसान पहुंचाएंगी। यदि इन पर लगाम नहीं लगाई गई तो सरकार आर्थिक्र विकास के लिए जो प्रयास कर रही है, वो धरे के धरे रह जाएंगे।

“इस्लामिक उम्माह की मरीचिका” in Punjab Kesari

 

भारत में इस्लामिक कट्टरवादियों का मानना रहा है कि उनके लिए देश बाद में और इस्लाम पहले है। इसलिए किसी भी गैरइस्लामिक व्यक्ति से पहले उनका फर्ज इस्लामिक बिरादरी या इस्लामिक उम्माह के प्रति है। ये सोच कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान (1919 – 1922) भी देश में इस्लामी उम्माह के नाम पर खिलाफत आंदोलन चलाया गया। शौकत अली, मुहम्मद अली और अबुल कलाम अजाद द्वारा चलाए गए इस आंदोलन का मकसद था ब्रिटिश साम्राज्य पर तुर्की में खिलाफत (खलीफा का शासन) न खत्म करने के लिए दबाव डालना। दुर्भाग्य की बात ये है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया क्योंकि इसकी एवज में उन्हें असहयोग आंदोलन में मुस्लिम नेताओं का साथ मिला।

बहरहाल तुर्की में खलीफा के पतन और आधुनिक सरकार के गठन के साथ भारत का खिलाफत आंदोलन तो अपनी मौत मर गया, लेकिन इस्लामिक बिरादरी को अलग मानने का ये विचार किसी न किसी रूप में लगातार जारी रहा। आगे चलकर भारत के विभाजन में भी इसका अहम हाथ रहा। आश्चर्य नहीं कि आजकल पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है उसमें पाकिस्तानी अपनी पहचान अपनी धरती में ढूंढने की जगह सउदी अरब में ढूंढ रहे हैं। उधर आजाद भारत में भी जब संविधान बनाया जाने लगा तो उसमें भी मुसलमानों को उनकी ‘अलग पहचान’ के नाम पर आधुनिक मूल्यों और कानूनों के तहत लाने की कोशिश नहीं की गई।

अस्सी के दशक में भारत में इस्लामिक उम्माह के जिन्न ने एक बार फिर सिर उठाया जब विदेश सेवा के अफसर से नेता बने सय्यद शहाबुद्दीन ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को ‘इंडियन मुस्लिम’ कहना गलत है, उन्हें तो ‘मुस्लिम इंडियन’ कहना चाहिए क्योंकि उनके लिए अपनी धार्मिक पहचान और इस्लामिक बिरादरी भारत से पहले है। शहाबुद्दीन ने बढ़-चढ़ कर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय अदालतें इस्लामिक कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकतीं।

आपको ध्यान होगा कि तीन तलाक मामले में गैरसरकारी संगठन आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने भी सबसे पहले यही कहा था कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकता। तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा में विधेयक पारित होने के बावजूद इस्लामिक कट्टरवादी अपने रूख पर कायम हैं। इनके लिए उन अधिकारों का कोई मतलब नहीं है जो भारतीय संविधान ने भारतीय नागरिक होने के नाते मुस्लिम महिलाओं को दिए हैं।

‘भारत के अस्तित्व’ को मान्यता न देने और इस्लामिक उम्माह की सर्वोच्चता का ये विकृत विचार अब भी जारी है। इंटरनेट जैसे विकसित संचार माध्यमों के साथ ही यह और बढ़ गया है। अगर आजादी से पहले खिलाफत आंदोलन चलाया गया तो आज हम देखते हैं कि अनेक कट्टरवादी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया में इस्लामिक खिलाफत का झंडाबरदार है। आश्चर्य नहीं कि ये संगठन भोले भाले भारतीयों को फुसला कर उन्हें इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में ‘जिहाद’ के लिए भेज रहे हैं।

भारत की प्रमुख आतंकवाद विरोधी संस्था नेशनल इनवेस्टीगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने हाल ही में भारत से आईएसआईएस में शामिल होने गए लोगों की सूची जारी की है। आश्चर्य नहीं कि इसमें सबसे ज्यादा लोग केरल से हैं जहां यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकारों ने ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर लंबे अर्से तक पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे अतिवादी संगठनों को प्रश्रय दिया।

भारत में कट्टरवादी संगठन ‘इस्लामिक उम्माह’ के नाम पर अर्से से आम मुसलमान को ठग रहे हैं। लेकिन एक बार तो इसकी जांच परख होनी ही चाहिए कि क्या दुनिया में वास्तव में कोई इस्लामिक उम्माह या बिरादरी जैसी कोई चीज है? शुरूआत करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान से जिसे इस्लाम और ‘टू नेशन थ्योरी’ के नाम पर बनाया गया और जिसे आज दुनिया में आतंकवाद का सबसे घिनौना और क्रूर गढ़ माना जाता है। वहां अंदरूनी हालात आज विस्फोटक हैं, एक मत के मुसलमान दूसरे मत के मुसलमानों को मार रहे हैं। याद रहे पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली भी मुसलमान थे जिनपर पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबी फौजियों ने अकथनीय जुल्म ढाए। इसका नतीजा अलग बांग्लादेश के रूप में सामने आया। सोचने की बात है कि अगर सारे मुसलमान एक बिरादरी होते तो बांग्लादेश अलग क्यों होता? पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों का नरसंहार करने वाली पाकी सेना अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। एक तरफ तो ये अपने आतंकियों के जरिए कश्मीर में हिंसा फैला रही है तो दूसरी तरफ इस्लामी उम्माह का वास्ता देकर फिलिस्तीन के नाम पर उन्माद भड़का रही है। हाल ही में आतंकी हाफिज सईद की रैली में फिलिस्तीनी राजदूत वलीद अबू अली के शामिल होने पर भारत ने सही एतराज जताया था। इस्लामी उम्माह की आड़ में आतंकियों को समर्थन कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?

पाकिस्तान इस्लामिक देश है। लेकिन पड़ोसी मुस्लिम देशों अफगानिस्तान और ईरान से इसका छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। अफगानिस्तान में आए दिन पाकिस्तानी आतंकवादी विस्फोट करते हैं जिनमें निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। इस्लामिक देश आपस में क्या सिर फुटव्वल कर रहे हैं इसपर बात करने से पहले ये बता दें कि दुनिया में इनका एक संगठन भी है – आॅर्गनाइजेशन आॅफ इस्लामिक काॅओपरेशन (ओआईसी) जिसके 57 सदस्य हैं। म्यांमार में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं के बाद जब लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को घर छोड़ना पड़ा, तब ओआईसी ने गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं किया। क्या रोहिंग्या मुसलमान कम मुसलमान थे जो दूसरे मुस्लिम देशों ने उनकी मदद नहीं की? वैसे भी अगर वास्तव में मुस्लिम उम्माह होती तो दुनिया में मुसलमानों के इतने देश ही क्यों होते?

अब नजर डालते हैं अन्य इस्लामिक देशों में चल रही उठा-पटक पर। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज दुनिया में अगर सबसे विस्फोटक स्थिति किसी की है तो वो इस्लामिक देशों की ही है। सबसे पहले बात मुसलमानों के सबसे प्रिय देश सउदी अरब की जहां उनके सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मौजूद हैं। सुन्नी बहुल सउदी अरब, शिया बहुल ईरान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। सउदी अरब को जहां शियाओं की भनक लगती है, वो वहां बदला लेने पहुंच जाता है। पड़ोसी देश यमन में भी उसने इसी वजह से 2015 में हस्तक्षेप किया। सउदी अरब ने कथित रूप से ईरान समर्थित शिया होउती विद्रोहियों को कुचलने और सुन्नी शासकों का समर्थन करने के लिए यमन में दखल दिया, लेकिन मामला हल नहीं हुआ, वहां लड़ाई अब भी जारी है। जून, 2017 में सउदी अरब के नेतृत्व में छह देशों ने कतर के बहिष्कार की घोषणा की क्योंकि कतर मिस्र के संगठन इस्लामिक ब्रदरहुड का समर्थन कर रहा था जिसे मिस्र आतंकवादी संगठन मानता है। यही नहीं सउदी अरब को इस बात से भी सख्त एतराज है कि कतर ईरान से व्यापार क्यों कर रहा है।

ध्यान रहे कुछ समय पूर्व सउदी अरब ने ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिजम कोआलिशन’ बनाया जिसका प्रमुख पाकिस्तान का पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ है। इस संगठन में 41 देश हैं और इसका मकसद दुनिया से आतंकवाद को उखाड़ फेंकना है। ये कहीं न कहीं हास्यास्पद लगता है क्योंकि दुनिया भर में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम फैलाने में सबसे बड़ा हाथ सउदी अरब का रहा है और आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की क्या भूमिका है, ये बताने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। सउदी अरब ने कागजी स्तर पर ये संगठन बना तो लिया है लेकिन इसे जमीन पर उतारना अभी बाकी है। बहरहाल राहिल शरीफ को इसका प्रमुख बनाए जाने से ईरान, पाकिस्तान से और कुपित हो गया है। ईरान का मानना है कि ‘आतंकवाद’ तो सिर्फ बहाना है, ये संगठन तो असल में उसे नीचा दिखाने के लिए बनाया गया है।

चाहे सउदी अरब हो या यमन, मिस्र, सीरिया, लीबिया, इराक या ईरान, पूरे इस्लामिक जगत में मारकाट मची हुई है। उधर सउदी अरब में युवा मोहम्मद बिन सलमान को युवराज (क्राउन प्रिंस) घोषित करने के बाद देश के अंदर भी कोहराम मचा हुआ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर उन्होंने अनेक राजकुमारों और बड़े व्यापारियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है। सलमान ने हाल ही में जैसे लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को बंदूक की नोक पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उससे भी सिर्फ खाड़ी देशों में ही नहीं, पश्चिम देशों में भी चिंता की लहर दौड़ गई। हरीरी ने अपने कथित इस्तीफे में कहा था कि वो लेबनान में ईरान समर्थित हिजबोल्ला के बढ़ते प्रभाव के कारण इस्तीफा दे रहे हैं। ध्यान रहे उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी 2005 में कार धमाके में मारे गए थे जिसके लिए हिजबोल्ला पर शक किया गया था।

वर्तमान में इस्लामिक दुनिया में मोटे तौर पर दो गुट नजर आते हैं। एक तो सउदी अरब के नेतृत्व वाला सुन्नी गुट जिसे अमेरिका समर्थन दे रहा है तो दूसरी तरफ शिया गुट है जिसे रूस का समर्थन हासिल है। इस्लामिक देशों के बढ़ते आपसी मतभेदों के बीच आईएसआईएस का उल्लेख करना आवश्यक है जिसने इराक और सीरिया के बड़े भूभाग पर कब्जा कर खिलाफत स्थापित करने की घोषण कर दी। पहले तो अपने-अपने स्वाथों के हिसाब से इस्लामिक देश इसका इस्तेमाल करते रहे और अंदर ही अंदर इसे मदद देते रहे पर जब इसके अत्याचारों और क्रूरताओं के वीभत्स किस्से सामने आने लगे तो महाशक्तियों को होश आया और इसकी सत्ता को उखाड़ फेंका गया। इसकी सत्ता भले ही समाप्त हो गई हो, पर इसके हजारों आतंकवादी अब भी जिंदा हैं और कुछ तो अफगानिस्तान में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान में आईएसआईएस नेटवर्क वास्तव में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का खेल है। अफगानिस्तान का जिक्र आया है तो वहां तालिबान और मुल्ला उमर की सरकार भी आपको याद होगी जिसे अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड संेटर पर अल कायदा के हमले के बाद उखाड़ फेंका।

दुनिया में इस्लामिक देशों में जो भीषण युद्ध और सिर फुटव्वल है, उसे देख कर सहज ही सवाल उठता है कि भारत में इस्लामिक कट्टरवादी किस ‘उम्माह’ की बात कर रहे हैं? जब दुनिया में ऐसी कोई चीज है ही नहीं तो ये भारतीय मुसलमानों को क्यों भरमा रहे हैं? आखिर इनका मकसद क्या है? ये क्यों नहीं चाहते कि भारतीय मुसलमान अपनी मिट्टी से जुड़ें, देश का संविधान मानें और दकियानूसी सोच छोड़ आधुनिकता और विकास की राह पर आगे बढ़ें? जाहिर है, इसके पीछे सिर्फ राजनीति ही नहीं, अनेक अंतरराष्ट्री षडयंत्र भी हैं।

“Reservation of Women should be above party politics” in TOI Blog

Google Doodle honouring India’s first female scientist Asima Chatterjee, Sushma Swaraj the roaring lioness speaking on behest of India and on India’s foreign policy in UNGA, and Sonia Gandhi urging Prime Minister Narendra Modi to ensure that the Women’s Reservation Bill meets a logical conclusion.

After decades of delay in the domain of women empowerment, 2017 has been a fast paced roller coaster ride, and the current government is keeping us on our toes in the hopes of seeing more rapid progress and development.

If anybody delves into the history of India they would know that such slow progress was unwarranted and would find its roots deeply entrenched during the colonial period of British India. The British Empire didn’t want the citizens of our nation rising to a respectable level. So our legal system barely budged as a matter of fact it retrograded, and our manner of living was purely medieval. Yet out of the prevalent evils of casteism, and female subjugation some women of our nation became leading pioneers and are globally acclaimed. Here, we name a few:

1. Asima Chatterjee, a renowned Indian chemist’s 100th birthday was marked by Google with a Doodle on the 23rd of September. An organic chemist, Asima Chatterjee paved the way for Indian women in science and improved the odds of survival for patients with cancer, epilepsy, and malaria.

2. A pioneering botanist and cytogeneticist, Janaki Ammal, born 1897, is credited with putting sweetness in India’s sugarcane varieties. There is even a flower named after her, a delicate bloom in pure white called Magnolia Kobus Janaki Ammal, only a few nurseries in Europe cultivate the variety.

3. Born in 1865 in an extremely orthodox Brahmin family in Maharashtra, a 9 year old girl got married to a widower who was almost thrice her age. The girl later on became the first Indian woman to qualify as a doctor. Her name was Anandibai and her husband’s name was Gopalrao Joshi. Gopalrao, was determined to educate his wife when she expressed her wish to study medicine at the age of 14. Unfortunately, before she couldn’t practice medicine as she left her heavenly abode at the age of 22.

4. Dr Rukhmabai has the honour of being the first practicing lady doctor of India. Her journey was not an easy one, she was married at the age of 11, child bride Rukhmabai Bhikaji contested her husband’s claim to conjugal rights in an iconic court case that led to the passage of the Age of Consent Act in 1891. In 1888 despite the out-of-court settlement, this case became a landmark in colonial India for raising issues of age, consent and choice for women in marriage. Rukhmabai was ostracized by society, but she didn’t let this affect her ambition of being a doctor. She finished her studies and obtained a position as Chief Medical Officer in Surat. She never married again and remained active in social reform till her death in 1955 at the age of 91.

Though Dr. Rukhmabai’s case might have played a pivotal role in the Age of Consent Act, the age limit was only increased from 10 years to 12 years. India is still fighting the confusing interloped situation of child marriage and the Age of Consent, where logic dictates justice albeit practice otherwise. In the fight for proper judicial and legislative rights of women, Sonia Gandhi wrote an open letter to Prime Minister Narendra Modi on 20 September, 2017, urging him to take advantage of the majority BJP members in Lok Sabha to pass the Women’s Reservation Bill. The women’s Reservation Bill plans for 33% reservation of women in the Lok Sabha and all state legislative assemblies, yet Panchayati Raj and Civil Bodies already have this reservation for women. If passed, India can be acknowledged as a leading global figure in political and participation equality of women. It can help surpass the few number of women that we hold dear as ‘leading figures’ or ‘pioneers’ who work so hard to break the glass ceiling, and provide the nation with many more women defying the patriarchal assigned roles.

Currently the global average for Women in Parliament is 22.4%, India stands at a meager 12%. On a global scale we rank 103rd from a list of 140 countries, and in Asia we rank 13th out of 18 countries. It’s about time that we quit hiding behind the curtain that India is one of the youngest nations in the world. After 70 years of Independence, a rapidly growing nation, and the vision of our founding fathers it’s time to take action and not hide behind a veil of excuses.

As shown by the stories of the pioneering scientist women of India reservation is not a necessity, but it is a good set up. The women scientist pioneers of India were fortunate to have husbands, or fathers support them at a time when women were prone to child marriage and pushed to bear children. The manner in which they broke the chains of society was with the help of the chain makers of society, the men in their lives. It’s time for us all to stand up and give our women a helping hand, in the form of a mother, father, sister, and brother.