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“अपने गुनाहों की माफी मांगेगी कांग्रेस?” in Punjab Kesari

अप्रैल 13 को देश ने जलियांवाला बाग कांड की सौवीं बरसी मनाई। इस अवसर पर काफी चर्चा रही कि ब्रिटिश सरकार को भारत से माफी मांगनी चाहिए। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री तेरेसा मे ने इस घटना पर अफसोस जाहिर किया। भारत में उनके उच्चायुक्त डोमिनिक एसक्विथ इस अवसर पर जलियांवाला बाग गए और उन्हांेने इस नरसंहार को ब्रिटिश इतिहास की शर्मनाक घटना बताया।

हम भारत पर ब्रिटिश अत्याचारों पर तो काफी मुखर रहते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं कि वो हमसे माफी मांगे। लेकिन क्या आजादी के बाद भारत पर सबसे लंबे अर्से तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी से हमें ऐसी कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए? क्या लोकतंत्र के नाम पर उसके सब कुकृत्यों पर पर्दा डाल देना चाहिए और उसे माफ कर देना चाहिए। अब आप कहेंगे कि कांग्रेस ने आखिर ऐसा क्या कर दिया जिसकी वजह से उससे ऐसी मांग की जाए। कांग्रेस की जनता, देश विरोधी नापाक करतूतों और घोटालों की सूची बहुत लंबी है। हम यहां कुुछ का ही उल्लेख करेंगे। उसके बाद आप स्वयं तय करें कि कांग्रेस को आप से माफी मांगनी चाहिए या नहीं।

कांग्रेस ने आजादी की कथित लड़ाई के दौरान मुसलमानों का साथ लेने के लिए इस्लामिक सांप्रदायिकता को खतरनाक तरीके से बढ़ावा दिया। इसका सबसे बड़ा सबूत है खिलाफत आंदोलन को समर्थन। ये कुछ ऐसा ही जैसे आज आईएसआईएस को समर्थन देना। कांग्रेस लगातार अखंड भारत की आजादी की बात करती रही और गांधी ने तो ये तक कहा कि बंटवारा मेरी लाश पर होगा। लेकिन अंत में कांग्रेस ने सांप्रदायिक आधार पर बंटवारा स्वीकार कर लिया। गांधी तो पाकिस्तान को उसका बकाया चुकाने के लिए अनशन पर बैठ गए जबकि सरदार पटेल ने उन्हें आगाह भी किया कि पाकिस्तान यही पैसा भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए इस्तेमाल करेगा। आजादी के बाद देश का संविधान बना पर मुसलमानों के पर्सनल लाॅ को हाथ तक नहीं लगाया गया। एक लोकतांत्रिक देश में उन्हें अलग कानून चलाने की अनुमति दे दी गई। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उनकी हिंदू विरोधी भावनाओं और कट्टरवाद को भड़काया गया, ध्रुवीकरण किया गया और मुसलमानों को अलग तंग, बदहाल काॅल्नियों में रहने के लिए मजबूर किया गया। इससे न देश का भला हुआ न मुसलमानों का।

इतना भी होता तो गनीमत होती। जवाहर लाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के मसले को हमेशा-हमेशा के लिए उलझा दिया। वो बिना मंत्रिमंडल की अनुमति के ही इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। वहां इस विषय में जो करार हुए उन पर भी उन्होंने मंत्रिमंडल और संसद से स्वीकृति नहीं ली। धूर्त तरीके से जम्मू-कश्मीर मंे अनुच्छेद 370 लागू कर दिया गया और उसे विशेष राज्य का दर्जा दे दिया गया जबकि इस रियासत की विलय की शर्तें भी वहीं थीं जो दूसरे राज्यों की थीं। यही नहीं, बिना संसद की सहमति के अनुच्छेद 35ए संविधान में घुसेड़ दिया दिया जिसके तहत वहां के नागरिकों को विशेषाधिकार दिए गए। वहां कांग्रेसियों और उनके सहयोगियों ने हालात को कैसे बद से बदतर किया इसका इतिहास लंबा है। हम सीधे आज के हालात पर ही आते हैं। कांग्रेस के सहयोगी फारूक अब्दुल्ला और उनके साहेबजादे उमर अब्दुल्ला भारत के खिलाफ जो जहर उगल रहे हैं क्या उसके लिए उन्हें देशद्रोह के आरोप में फांसी पर नहीं लटकाना चाहिए? क्या उनके बयानांे पर कांग्रेस को शर्म नहीं आती? क्या ऐसे लोगों को बचाने के लिए ही कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देशद्रोह संबंधी कानून को समाप्त करने का वादा किया है?

नेहरू खुद को काला अंग्रेज समझते थे। सरदार पटेल को दरकिनार कर गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री ही इसलिए बनवाया था कि वो उन्हें कांग्रेस में सबसे बड़ा अंग्रेज मानते थे। इतिहास गवाह है कि नेहरू ने इस अंग्रेजियत को पूरा निभाया भी। अंग्रेजों ने भारत पर लाख जुल्म किए पर मजाल है कि नेहरू ने कभी उनके साथ अपने संबंधों पर शर्मिंदगी महसूस की हो। इसके विपरीत नेहरू देश को माक्र्सवाद पढ़ाते रहे और उनके चेले-चपाटे अंग्रेजों की जगह हिटलर को गालियां देते रहे जिसने सपने में भी भारत को नहीं लूटा। असली अंग्रेज की तरह ने नेहरू ने मैकाले की शिक्षापद्धति ही नहीं, अंग्रेजों की नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था को भी जारी रखा। हिंदी और भारतीय भाषाओं को बर्फ में लगा दिया गया। नेहरू ने पहले तो हिंदी को राजभाषा बनाने का पूरा विरोध किया, लेकिन उनके विरोध के बावजूद जब हिंदी राजभाषा बन गई तो नेहरू ने उसे ये कहते हुए 15 साल तक लागू करने से इनकार कर दिया कि वो अविकसित भाषा है। इस पर मशहूर लेखिका महादेवी वर्मा ने उनसे कहा था कि आप हिंदी को 15 साल के लिए फांसी पर लटका रहे हैं। 15 साल बाद जब इसे फांसी से उतारेंगे तो कहेंगे कि ये तो खत्म हो गई। इतिहास गवाह है कि जब 15 साल बाद हिंदी को लागू करने की बात आई तो दक्षिण भारत में इसके विरोध में दंगे भड़काए गए।

नेहरू दुनिया भर में घूम-घूम कर अंग्रेजी में तकरीरें झाड़ कर नोबेल शांति पुरस्कार पाना चाहते थे। इस चक्कर में उन्होंने हमेशा सेना को हिकारत की निगाह से देखा। अपनी मूर्खता का अहसास उन्हें 1962 में चीनी आक्रमण के बाद हुआ, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। आज हमारे देश का बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में है। कांग्रेस ने इसे वापस लेने के लिए क्या उपाय किए ये रहस्य ही हंै। नेहरू ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव ठुकरा दिया और उसे चीन को देने की सिफारिश कर दी। आज चीन इसी के बल पर इतरा रहा है और आतंकी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव को बार-बार वीटो कर रहा है। सरदार पटेल ने तिब्बत के मसले पर नेहरू को आगाह किया था। लेकिन नेहरू चीन के प्रेम में ऐसे अंधे हो गए कि उन्होंने तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे को भी मान्यता दे दी।

आजादी के बाद गांधी कांग्रेस को समाप्त करना चाहते थे। लेकिन ऐसा न हो सका। नेहरू ने तो अपने जीवित रहते ही तब वंशवाद की नींव रख दी जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। इंदिरा के बाद कैसे देश ने वंशवाद का दंश झेला और कैसे इस परिवार की अंधी लूट-खसोट सही, ये किसी से छुपा नहीं है। इनके घोटालों की सूची इतनी लंबी है कि पूरा अखबार भी कम पड़ जाएगा। लेकिन समस्या सिर्फ वंशवाद, भ्रष्टाचार और अंधी लूट-खसोट की ही नहीं है। इस परिवार ने जैसे अपना शासन कायम रखने के लिए देशविरोधी तत्वों को समर्थन और बढ़ावा दिया है, वो खौफनाक है।

कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान तो ये खतरनाक स्तर तक बढ़ गया। कांग्रेस ने इस्लामिक आतंक को सही ठहराने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का नया षडयंत्र रच दिया और निर्दोष लोगों को पकड़ कर इसे साबित करने की कोशिश भी की। मुंबई हमले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साजिश करार दिया गया। समझौता ब्लास्ट मामले में पाकिस्तानियों को छोड़ कर निर्दोष हिंदुओं को गिरफ्तार किया गया। गोधरा में निर्दोष रामभक्तों की रेल बोगी का आग लगाने वाले मुस्लिम आरोपी का फरार करवा दिया गया और गुजरात में दंगे भड़काए गए। अगर आप 2002 के गुजरात दंगों का गहराई से अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि उनमें बड़ी तादाद में कांग्रेसी भी शामिल थे। गुजरात का दंगा तो सिर्फ एक नजीर भर है कांगे्रसी राज में हुए दंगों की सूची इतनी लंबी है कि ये पूरा पृष्ठ भी कम पड़ जाएगा।

ये आज अजीब लगे लेकिन सच है कि यूपीए राज में दुर्दांत नक्सली और कश्मीरी आतंकी नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन करते थे और जब राष्ट्रवादी उनका विरोध करते थे तो उनकी लाठियों से पिटाई की जाती थी। कांग्रेसी राज में नेताओं और परिवार शिरोमणि की तिजोरी तो लगातार भरती रही, लेकिन देश की जनता गरीब से और गरीब होती गई। न तो कांग्रेस का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा काम आया और न ही ‘समाजवादी निजाम’, देश लगातार रसातल में जाता रहा। राजीव गांधी का मशहूर बयान तो आपको याद ही होगा कि हम केंद्र से एक रूपया भेजते हैं, लेकिन गांव में सिर्फ 15 पैसे पहुंचते हैं।

कांग्रेस और इसके परिवार शिरोमणि की असफलताओं की सूची बहुत लंबी है। चाहे बात देश के स्वाभिमान या सुरक्षा की हो, आर्थिक विकास की या सामाजिक समरसता और लैंगिक समानता की, कांग्रेस हर जगह असफल रही है। क्या इसके लिए नेहरू-गांधी परिवार को जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए जिन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्क्ष रूप से देश पर लगभग 60 साल शासन किया है। क्या इस परिवार को अपने षडयंत्रों और करतूतों के लिए देश से माफी नहीं मांगनी चाहिए। अगर हम जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए अंग्रेजों से माफी की अपेक्षा करते हैं तो कांग्रेसी राज में हुए असंख्य दंगों के लिए गांधी परिवार से माफी की उम्मीद क्यों न की जाए? क्यांे न इस परिवार की करतूतों की जांच के लिए कमीशन बनाया जाए और इसे राजनीति से बाहर किया जाए?

“चुनाव घोषणापत्रः कांग्रेस का ‘हाथ’ देशद्रोहियों के साथ” in Punjab Kesari

कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र – 2019 को लेकर काफी हंगामा बरपा है। कांग्रेस का कहना है कि विपक्षी दलों का काम है मीनमेख निकालना सो वो अपना काम कर रहे हैं। असल में घोषणापत्र में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर आपत्ति की जाए। लेकिन क्या कांग्रेस की राय को आंख मूंद कर मान लेना चाहिए? हमारा मानना है कि इसका बारीकी से विश्लेषण होना चाहिए क्योंकि सारे अधोपतन के बावजूद वो अब भी देश की दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है। कांग्रेस ने पिछले पांच साल के दौरान जैसी राजनीति की है, उसके कारण भी उसके घोषणापत्र के विश्लेषण की जरूरत बनती है। तो आइए एक पैनी निगाह डालते हैं कांग्रेस के घोषणापत्र के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर।

चाहे जवाहरलाल नेहरू और अन्य कई विश्वविद्यालयों में देशविरोधी नारे लगाने का मामला हो या भीमाकोरेगांव हिंसा का। पिछले पांच साल में कांग्रेस ने बेझिझक देशविरोधी तत्वों का साथ दिया है। विभिन्न कांग्रेसी नेताओं के नक्सलियों के साथ संबंधों के खुलासे हुए हैं। जिग्नेश मेवानी अब भी कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहा है। यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में अर्बन नक्सलियों का मुकदमा भी लड़ रहे हैं। इसके बावजूद ‘आंतरिक सुरक्षा’ के शीर्षक के तहत घोषणापत्र कहता है – “आंतरिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा 1. आतंकवाद, 2. आतंकवादियों की घुसपैठ, 3. माओवादी नक्सलवाद, 4. जातीय, साम्प्रदायिक संघर्ष से है। कांग्रेस इन सभी खतरों से अलग-अलग तरीके सेनिपटेगी। हम आतंकवाद और आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ कठोरतम उपाय करेंगे। माओवादीनक्सलवाद: माओवाद और नक्सलवाद से निपटने के लिए कांग्रेस दोहरी रणनीति अपनाएगी। हिसंक गतिविधियों को रोकने के लिए जहां एक तरफ कठोर कार्यवाही की जायेगी, वहीं दूसरी तरफ नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य किये जायेंगे, जिससे कि प्रभावित क्षेत्र की जनता के साथ-साथ माओवादी कार्यकर्ताओं का दिल जीत कर उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके।“

ध्यान दीजिए, पार्टी माओवादी आतंकियों को ‘कार्यकर्ता’ बता रही है और उनका दिल जीतने की बात कर रही है। सवाल ये है कि क्या पार्टी का नक्सली आतंकियों के खिलाफ वही रवैया होगा जो उसकी छत्तीसगढ़ सरकार का है या यूपीए सरकार का था? अगर ऐसा हुआ तो देश में नक्सलवाद के विस्तार का खतरा फिर से पैदा हो जाएगा। हम कैसे भूल सकते हैं कि एक तरफ तो मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते थे तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की भरमार थी। हम कैसे भूल सकते हैं कि यूपीए के जमाने में कैसे कुख्यात अरूंधती राॅय और कश्मीरी आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी खुलेआम संवाददाता सम्मेलन करते थे। आज भी नक्सलियों के अनेक संदिग्ध सहयोगीछत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के बड़े पदों पर पहुंच चुके हैं। भीमाकोरेगांव मामले की चार्जशीट में कांग्रेस और नक्सलियों के संबंधों का विस्तार से विवरण दिया गया है। जाहिर है नक्सलियों के प्रति कांग्रेस का ढुलमुल रवैया अनेक चिंताओं को जन्म देता है।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक के अंतर्गत घोषणापत्र कुछ विस्फोटक बातंे करता है। ये कहता है कि भारतीय आपराधिक संहिता की धारा 499 को हटा कर मानहानि को एक दिवानी अपराध बनाया जाएगा। क्या इसका अर्थ ये नहीं कि कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार बिना सबूत प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाए हैं, वो उससे बचने के लिए सुरक्षा कवच तैयार कर रहे हंै। ध्यान रहे उद्योगपति अनिल अंबानी पहले ही राहुल गांधी पर बेसिरपैर के आरोप लगाने के लिए 5,000 करोड़ रूपए का मानहानि का मुकदमा ठोक चुके हैं। यही नहीं संघ को महात्मा गांधी का हत्यारा बताने पर भी उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा चल रहा है। क्या राहुल चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पूरी अराजकता फैल जाए और जिसके मुंह में जो आए वो बके और उसे सजा भी न मिले?

इसी शीर्षक के तहत कांग्रेस आगे कहती है – “भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (जो की देशद्रोह के अपराध को परिभाषित करती है) जिसका कि दुरूपयोग हुआ, और बाद में नए कानून बन जाने से उसकी महत्ता भी समाप्त हो गई है, उसे खत्म किया जाएगा।“ देशद्रोह कानून समाप्त करना क्या देशविरोधियों को खुलीछूट देना नहीं है। हम देख चुके हैं कि कैसे यूपीए सरकार कश्मीरी आतंकियों और नक्सलियों को खुली छूट देती थी। सवाल ये है कि इसे देश तोड़ने की दिशा में पहला कदम क्यों न माना जाए? मजे की बात तो ये है कि जो कांग्रेस पार्टी देशद्रोह कानून समाप्त करने की बात करती है, उसी ने इसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग किया लेकिन वास्तविक देशद्रोहियों के नहीं, बल्कि अपने विरोधियों के खिलाफ। तमिलनाडु में जब नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने जब कुंडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट का विरोध किया तो यूपीए सरकार ने 55,795 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, 23,000 को गिरफ्तार किया और करीब 9,000 के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया। उनपर आरोप था कि वो देश की सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ रहे थे। अन्ना आंदोलन के दौरान कार्टुनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला भी अभी यादों में ताजा है। यूपीए सरकार ने उनके एक कार्टून से चिढ़कर उनपर देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया था।

यूपीए सरकार ने वास्तव में देशद्रोह करने वाले नक्सलियों या कश्मीरी आतंकियों के खिलाफ देशद्रोह का कोई मुकदमा नहीं ठोका। उन्हें तो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया। अपनी पुरानी नीति को कायम रखते हुए कांग्रेस के कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम जैसे बड़े नेता जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाने वालों को बचा रहे हैं और देशद्रोह कानून को ही समाप्त करने की बात कर रहे हैं। जाहिर है भारत में जैसे हालात हैं उनमें जरूरी ये है कि इस कानून का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जाए जो वास्तव में देश तोड़ने की बात करते हैं, न कि सरकार से किसी विषय पर अपनी असहमति जताते हैं।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक में ही पार्टी मानवाधिकारों की बात करती है – “उन कानूनों को संशोधित करेंगे जो बिना सुनवाई के व्यक्ति को गिरफ्तार करते हैं और जेल में डालकर संविधान की आत्मा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों का भी उल्लघंन करते है।“ पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून – 1989 के ऐसे ही प्रावधानों को गलत ठहरा दिया था। यह कानून कांग्रेस के ही एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी लाए थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके प्रावधानों पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर तो कांग्रेस ने काफी हल्ला मचाया। लेकिन आज पार्टी कह रही है कि वो ऐसे कानूनों को समाप्त करेगी जो बिना सुनवाई के लोगों को गिरफ्तार करने की अनुमति देते हैं। क्या कांग्रेस अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून के ऐसे प्रावधानों को समाप्त करेगी? हिंदुओं का मुंह बंद करने के लिए यूपीए सरकार ‘कम्युनल वाॅयलेंस बिल’ लाई थी। इसमें हिंदुओं को भी बिना सुनवाई के गिरफ्तार करने का प्रावधान था। क्या कांग्रेस पार्टी ये वादा कर सकती है कि यदि वो सŸाा में आई तो हिंदुओं के खिलाफ कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगी?

पार्टी घोषणापत्र आगे कहता है – “हिरासत और पूछताछ के दौरान थर्ड-डिग्री तरीकों का उपयोग करने और अत्याचार, क्रूरता या आम पुलिस ज्यादतियों के मामलों को

रोकने के लिए अत्याचार निरोधक कानून बनायेंगे। आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट 1958 को संशोधित किया जाएगा ताकि सुरक्षा बलों के अधिकारों और नागरिकों के मानवाधिकारों में संतुलन बनाया जा सके और जबरदस्ती लोगों को गायब करने, यौन हिंसा और प्रताड़ना के मामलों में सुरक्षा बलों की इम्युनिटी (प्रतिरक्षा) समाप्त की जा सके।“

आफस्पा मामले में कांग्रेसी घोषणाओं का विŸा मंत्री अरूण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कड़ा विरोध किया है। निर्मला सीतारमण कहती हैं कि ये सेना और सुरक्षा बलों के मनोबल को कम करने का षडयंत्र है। अगर कांग्रेसी घोषणाएं लागू कर दी जाएं तो कोई भी आतंकी यौन हिंसा, प्रताड़ना आदि मामलों में सुरक्षा बलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा सकेगा और वो आतंकियों से लड़ने की जगह अदालतों के चक्कर काटते फिरेंगे। वो आगे कहती हैं कि केंद्र और राज्य दोनों आपसी सहमति से ही ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टब्र्ड एरिया’ घोषित कर सकते हैं। अकेले केंद्र सरकार इस विषय में निर्णय नहीं ले सकती।

उधर विŸा मंत्री अरूण जेटली कहते हैं कि ऐसा लगता है कि कांग्रेस का घोषणापत्र किसी नक्सली ने बनाया है। ये कहता है कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और संबंधित कानूनों को संशोधित किया जाए ताकि ये सिद्धांत सुनिश्चित किया जा सके कि ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’। जेटली कहते हैं कि इसके चलते तो किसी भी देशद्रोही से निपटना, उसकी जांच-पड़ताल करना मुश्किल हो जाएगा।

मानवाधिकारों के प्रति कांग्रेस का दुराग्रह कई आशंकाएं पैदा करता है। ये ठीक है कि सुरक्षा बलों या पुलिस को किसी पर अत्याचार करने की छूट नहीं दी सकती, लेकिन क्या ये उनके विवेक पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए कि वो किसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं? क्या तथाकथित ‘अत्याचार विरोधी’ कानून लाना सुरक्षा बलों के हाथ बांधने जैसा नहीं है? क्या इससे दुर्दांत नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों को ही सुरक्षा नहीं मिलेगी? अगर पुलिस के हाथ बंधे होंगे तो वो ऐसे देशद्रोही तत्वों से सच कैसे उगलवाएगी?

वैसे कांग्रेस के घोषणापत्र की ऐसी सोच आश्चर्यचकित नहीं करतीं। पंजाब में आतंक की पृष्ठभूमि में राजीव गांधी ने देश का पहला आतंकविरोधी कानून ‘टैररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट’ (टाडा) बनाया था जिसे कांग्रेस के ही एक अन्य प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 1995 में समाप्त कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने देश में हो रहे आतंकी हमलों को देखते हुए 2001 में एक अन्य आतंकविरोधी कानून प्रिवंेशन आॅफ टैररिज्म एक्ट (पोटा) बनाया, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे निरस्त कर दिया। टाडा और पोटा को निरस्त करते समय कांग्रेस ने बहाना तो मानवाधिकारों का बनाया लेकिन असल मकसद था इस्लामिक और नक्सली आतंकियों का संरक्षण। कथित पुलिस अत्याचारों को रोकने के बहाने क्या अब कांग्रेस पुलिस के रहे-सहे अधिकारों को भी खत्म करने का षडयंत्र तो नहीं कर रही। हम देख चुके हैं कि कैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने अफजल गुरू को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष किया और कैसे राहुल गांधी जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ जा कर खड़े हो गए। वायनाड में पर्चा भरने के दौरान राहुल गांधी ने जैस खुलेआम देश तोड़ने वाली मुस्लिम लीग का समर्थन लिया, क्या वो स्पष्ट नहीं करता कि आखिर कांग्रेस को मानवाधिकारों की इतनी चिंता क्यंू है?

आपातकाल के दौरान प्रेस संेसरशिप लागू करने वाली कांग्रेस ने घोषणापत्र में मीडिया के प्रति भी आपत्तिजनक टिप्पणी की है। यह कहता है – “हाल के दिनों में मीडिया के कुछ हिस्से ने या तो अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया है या आत्मसमपर्ण। आत्मनियंत्रण/ स्वनियंत्रण मीडिया की स्वतंत्रता के दुरूपयोग को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है, कांग्रेस प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया एक्ट-1978 में उल्लेखित स्वनियमन की प्रणाली को मजबूत करने, पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा करने, संपादकीय स्वतंत्रता को बनाये रखने और सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ रक्षा करने का वायदा करती है।“ सवाल ये है कि कांग्रेस को सिर्फ वहीं मीडिया क्यों पसंद है जो सिर्फ उसके गुणगान करे या उसके प्राॅपागैंडा को आगे बढ़ाए? मीडिया पर कांग्रेस की टिप्पणी खतरे की घंटी है। इससे पत्रकारों को सावधान रहना होगा।

कांग्रेस घोषणापत्र महिलाओं के सशक्तीकरण के लंबे-चैड़े वादे करता है और कहता है कि कांग्रेस विवाह के पंजीकरण को आवश्यक बनाने के लिए कानून बनाएगी और बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी। लेकिन ये बड़ी सफाई से मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण तथा तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला जैसे मुद्दों को दरकिनार कर जाता है। क्या कांग्रेस मुस्लिम जोड़ों के लिए भी विवाह पंजीकरण अनिवार्य करेगी। मुसलमानों में पर्सनल लाॅ की आड़ लेकिर छोटी बच्चियों की शादी की जाती है। क्या कांग्रेस उनपर भी बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी?

कांग्रेस ने घोषणापत्र में अपनी महत्वाकांक्षी ‘न्यूनतम आय योजना,’ (न्याय) को काफी जगह दी है। इसका प्रचार भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। पर पार्टी ने ये कहीं नहीं बताया कि इसे लागू करने के लिए तीन लाख करोड़ रूपए कहां से आएंगे? हाल ही में राहुल के सलाहकार सैम पित्रोदा ने कहा कि गरीबों को ‘न्याय’ दिलवाने के लिए मध्य आय वर्ग को बलिदान के लिए तथा अधिक कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। अमेरिका निवासी पित्रोदा के बयान से सोशल मीडिया पर तूफान आ गया है। क्या कांग्रेस अब न्याय के लिए मध्य आय वर्ग की जेब काटेगी जो पहले ही करों के बोझ से दबा हुआ है?

स्थान का आभाव है, वर्ना घोषणापत्र में और भी कई ऐसे विषय हैं जिनपर विस्तार से गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन चलते-चलते एक अहम बात – घोषणापत्र का हिंदी संस्करण बहुत खराब है। उसमें अक्सर समझ ही नहीं आता कि पार्टी कहना क्या चाहती है। लगता है अपने अंग्रेजी संस्कारों के चलते कांग्रेस ने पहले अंग्रेजी का घोषणापत्र बनवाया होगा और फिर उसका हिंदी में अनुवाद करवाया होगा। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सरकार चलाने वाली कांग्रेस को हिंदी के प्रति और सजग तथा संवेदनशील होना पड़ेगा।

“न्याय योजना“ से नहीं पार लगेगी राहुल की नैया in Punjab Kesari

राहुल गांधी द्वारा न्याय योजना (न्यूनतम आय योजना) की घोषणा के बाद कांग्रेसी पालतू मीडिया ओवरड्राइव पर है। वो चारों तरफ ऐसा हाइप बना रहे हैं जैसे अब तो कांग्रेस जीती ही जीती और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने।

न्याय योजना के विषय में जनता के विचार जानने से पहले एक नजर डालते हैं अर्थशास्त्रियों की राय पर। जहां कांग्रेस के पालतू अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि इसे लागू करना संभव है और इसकी लागत देश के सकल घरेलू उत्पाद की करीब दो प्रतिशत होगी। वहीं नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना में झोल ही झोल हैं। ये भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है, ये जनता को आलसी और अनुत्पादक बनने के रास्ते पर ले जाने वाली है। इसे लागू करने के लिए नियम बनाना और इसे निष्पक्ष तरीके से लागू करना लगभग असंभव है।

पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना के मुताबिक देश के पांच करोड़ परिवारों को हर माह छह हजार रूपए दिए जाएंगे और हर परिवार को प्रतिमाह 12,000 रूपए की आमदनी की गारंटी दी जाएगी। वो कहते हैं कि अगर एक परिवार 4,000 कमाता है और दूसरा 8,000 तो क्या सरकार पहले परिवार को 8,000 और दूसरे को 4,000 रूपए देगी? अगर सब परिवारों को 12,000 रूपए प्रतिमाह की आमदनी घर बैठे मिलेगी तो कोई काम ही क्यों करेगा? पनगढ़िया आगे कहते हैं कि ये योजना संबंधित परिवार को हर माह 6,000 रूपए देने की बात करती है, ऐसे में हर माह 6,000 से कम कमाने वाले को 12,000 रूपए प्रतिमाह कैसे दिए जाएंगे?

जाने-माने आर्थिक पत्रकार स्वामीनाथन एस अंकलेश्वर अय्यर इस योजना को ‘घातकरूप से दोषपूर्ण’ बताते हैं। वो कहते हैं भारत में आय आधारित सर्वेक्षण नहीं होते ऐसे में वास्तविक लाभार्थी तय करना लगभग असंभव है। जैसे कांग्रेस की ‘गरीबी हटाओ’ योजना असफल हो गई वैसे ही ये इस योजना का फुस्स होना निश्चित है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस पर करीब 3,60,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे। इतनी महंगी योजना के नाकाम रहने से जो भ्रष्टाचार और नुकसान होगा, वो बेहद खतरनाक होगा।

जाहिर है योजना में किंत- परंतु बहुत हैं। पर एक बड़ा सवाल ये भी है कि राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए करदाताओं के खरबों रूपए क्यंू कर अनुत्पादक योजनाओं में बहाए जाएं? यहां सवाल ये भी उठता है कि आखिर एन चुनावों से पहले ही राहुल ने ये शिगुफा क्यों छेड़ा? इसका जवाब ये है कि कांग्रेस पहले भी ऐसे लोकलुभावन नारों के दम पर चुनाव जीतती रही है। कभी उसने ‘समाजवाद’ का नारा दिया तो कभी ‘गरीबी हटाओ’ का, कभी बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनावी मुद्दा बनाया तो कभी किसानों की कर्ज माफी को।

अर्थशास्त्री अगर आंकड़ों के अनुसार बात करते हैं तो आम जनता अपने अनुभव के आधार पर। जनता से बात करो तो वो कहती है कि अन्य जुमलों की तरह ये भी राहुल गांधी का एक चुनावी जुमला है। वो चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके वादों से सरकार को कितना आर्थिक नुकसान होगा। उन्हें तो सिर्फ सŸाा से मतलब है। कुछ समय पूर्व हुए विधान सभा चुनावों में उन्होंने किसानों की कर्ज माफी का वादा कर दिया। लेकिन ये वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। कर्ज माफी के लिए राज्य सरकारों ने इतनी शर्तें लगा दी हैं कि 99 प्रतिशत किसान तो उन्हें पूरा ही नहीं कर पा रहे। विधानसभा चुनावों के बाद तो राहुल ने पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ करने का ही एलान कर दिया था।

लोग कहते हैं कि कांग्रेस अगर गरीबी हटाने के बारे में वास्तव में इतनी गंभीर है तो उसने अपने 60 साल के प्रत्यक्ष-अप्रत्क्ष शासन में गरीबी क्यों नहीं हटा दी। गरीबों को दान देकर उनकी गरीबी नहीं हटाई जा सकती। आवश्यक है उन्हें सक्षम बनाना, न कि सरकारी दान पर आश्रित बनाना। लोग राहुल को यूपीए के दस साल का शासन याद दिलाते हैं जब देश ने सबसे बड़े घोटाले देखे जिनमें स्वयं वो और उनका समस्त परिवार भी आकंठ डूबा है।

अर्थशास्त्रियों और जनता की राय निःसंदेह महत्पवूर्ण है, लेकिन उतना ही मायने रखता है चुनावी गणित। अब तक जो हालात बन रहे हैं वो राहुल गांधी और कांग्रेस के पूरी तरह खिलाफ हैं। दिल्ली में बैठे पालतू कांग्रेसी पत्रकार भले ही कितनी हवाबाजी कर लें, लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक चुकी है। हालात ये हैं कि राहुल को अमेठी में ही अपनी हार नजर आ रही है और वो अब केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं। अमेठी में राजीव गांधी और सोनिया गांधी के प्रस्तावक रहे हाजी सुल्तान खान के बेटे हाजी हारून रशीद ने ही उनके खिलाफ बगावत कर दी है। रशीद कहते हैं कि राहुल ने अमेठी में लगातार मुसलमानों और उनके विकास की उपेक्षा की है। यहां 6.5 लाख मुसलमान हैं और अबकी बार सब राहुल के खिलाफ वोट देंगे। स्मृति ईरानी तो राहुल को हराने के लिए जी जान से कोशिश कर ही रहीं हैं।

आखिर राहुल को वायनाड सीट ही क्यों भा रही है? वहां ईसाई और मुस्लिम जनसंख्या बहुमत में है। राहुल को लगता है कि यदि अमेठी की जनता उन्हेें नकार देती है तो वायनाड के ईसाई और मुस्लिम उनकी इज्जत अवश्य बचा लेंगे। दसियों मंदिरों के लगातार दर्शन करने के बावजूद राहुल गांधी का हिंदुओं के प्रति ये अविश्वास बड़े सवाल खड़े करता है। ये कांग्रेस के सांप्रदायिक राजनीतिक दर्शन को भी रेखांकित करता है। यहां आपको बताते चलें कि वायनाड सीट पर राहुल इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) से भी समर्थन लेने के लिए तैयार हैं जिसे कई राज्यों में प्रतिबंधित किया जा चुका है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार पीएफआई और कुछ नहीं, आतंकी संगठन सिमी का ही नया नाम है जिसे स्वयं यूपीए सरकार ने प्रतिबंधित किया था। वायनाड के चर्चों ने भी राहुल की ईसाई पृष्ठभूमि के कारण उन्हें पूरा समर्थन देने का एलान किया है।

पिछले पांच साल के दौरान राहुल ने दलितों, मुस्लिमों, ईसाईयों, जनजातियों का संयुक्त वोट बैंक बनाने की हरसू कोशिश की और इस चक्कर में देशद्रोही नक्सलियों और टुकड़े-टुकड़े गैंग तक को समर्थन दिया। लेकिन आज न तो मुस्लिम उनके साथ हैं और न ही दलित। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन मुस्लिम-दलित वोटों पर दावा ठोक रहा है तो बिहार में राष्ट्रीय जनता दल। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी खुद को मुसलमानों को खैरख्वाह मानती हैं और किसी भी कीमत पर कांग्रेस से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने तो 50 साल के राहुल को ‘बच्चा’ तक बता दिया है। यही हाल अन्य राज्यों में भी है। दलित वोटों के आस में राहुल ने बाबा साहब भीम राव अंबेदकर के पौत्र प्रकाश अंबेदकर से भी पींगें बढ़ाईं थीं, लेकिन वहां भी उनकी दाल नहीं गली। सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों में मनमुटाव हो गया। राहुल को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा के साथ गठबंधन हो जाएगा जिसका लाभ उन्हें दूसरे राज्यों में भी मिलेगा। बसपा के वोटर उन्हें वोट देंगे। लेकिन मायावती ने उनका पत्ता ही काट दिया। वो तो अब अमेठी और रायबरेली में भी अपना उम्मीदवार उतारने की धमकी दे रहीं हैं। जाहिर है चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने से पहले विपक्षी एकता के बड़े-बड़े दावे हवा हो गए हैं। पहले जहां राहुल प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे, वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अब उन्हें उनकी औकात बता दी है। हार थक कर राहुल ने तुरूप के पŸो के तौर पर अपनी बहन प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारा है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका भी कोई असर नजर नहीं आ रहा। अब तक कांग्रेसियों को लगता था कि प्रियंका के आने से उनके सब दुख दूर हो जाएंगे, इस बार उनका ये मुगालता भी दूर हो जाएगा।

न्याय योजना के तौर पर राहुल ने अपना ब्रह्मास्त्र चल दिया है। लेकिन हालात बता रहे हैं कि इसका फुस्स होना तय है। आज चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों और डिजीटल मीडिया का जमाना है। पब्लिक नेताओं की एक-एक हरकत पर निगाह रखती है। वो सिर्फ जुमलों से संतुष्ट नहीं होती। उसे जमीनी स्तर पर विकास चाहिए। सड़कें, बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार चाहिए। उसे एक ऐसा नेता चाहिए जो देश की छवि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमका सके और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे न कि उनके साथ अंडरहैंड डीलिंग करे। जाहिर है मोदी ने अपनी उपलब्धियों से चुनावों का रूपरंग बदल दिया है, लोगों की अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं। राहुल के लिए उनका मुकाबला करना नामुमकिन है।

चीन के साथ संयम ही नहीं, दृढ़ता और स्पष्टता भी आवश्यक in Punjab Kesari

चीन के साथ संयम ही नहीं, दृढ़ता और स्पष्टता भी आवश्यक

ललिता निझावन, समाजसेवी, शिक्षाविद्, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित

फरवरी 14 को पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के बाद एक ओर तो केंद्र सरकार पाकी सेना के बगल बच्चे जैश-ए-मौहम्मद को सबक सिखाने की योजना बना रही थी, तो लगभग उसी समय उŸार पूर्वी सीमा पर भारत के अनुरोध पर म्यांमार की सेना आतंकी अराकान आर्मी के लगभग 12 बड़े शिविरों को तबाह कर रही थी। ये अभियान मिजोरम से सटे म्यांमार के चिन प्रांत में चलाया गया। अराकान आर्मी के कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी से घनिष्ठ संबंध है जो चीन के काफी करीब समझी जाती है। इससे पहले जनवरी में म्यांमार सेना ने सागैंग डिवीजन के टैगा क्षेत्र में सफाई अभियान चलाया जहां भारत विरोधी आतंकी संगठनों जैसे एनएससीएन (खापलांग) का मुख्यालय और उल्फा (आई), एनडीएफबी (एफ) तथा अनेक मणिपुरी विद्रोही गुटों के शिविर थे।

भारत के अनुरोध पर म्यांमार सेना ने अराकान आर्मी के शिविरों को ध्वस्त किया क्यांेकि ये कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के सितवे बंदरगाह और आगे जल तथा थल मार्ग से मिजोरम को जोड़ने वाली कलादान परियोजना में रोड़े अटका रही थी और अवैध उगाही कर रही थी। ध्यान रहे अराकान आर्मी वही आतंकी संगठन है जिसने वर्ष 2016 में म्यांमार के राखाइन प्रांत में सेना और और पुलिस के शिविरों पर हमला किया था जिसके बाद सेना की जवाबी कार्रवाई में बड़ी तादाद में मुस्लिम रोहिंग्याओं को अपना घरबार छोड़ना पड़ा था। अराकान आतंकी म्यांमार सेना के साथ ही बांग्लादेश की सेना से उलझते रहते हैं। समझा जाता है कि चीन के साथ ही, पाकिस्तानी आतंकी खुफिया संगठन आईएसआई भी इन्हें प्रशिक्षण और हथियार देती है। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तानी शहर कराची में चार लाख से अधिक रोहिंग्या रहते हैं जहां आईएसआई इन्हें आतंकी प्रशिक्षण देती है।

उत्तर भारतीय मीडिया पाकिस्तान से जुड़ी घटनाओं को तो खासी तवज्जो देता है लेकि उत्तरपूर्व भारत में चल रही अलगाववादी और आतंकी घटनाओं से मुंह फेरे रखता है। अरकान आर्मी के खिलाफ म्यांमार सेना का अभियान और उसे भारतीय सेना का समर्थन पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक से कम महत्पूर्ण नहीं थे, लेकिन मीडिया में इसे वो महत्व नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। मीडिया ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में चीन द्वारा द्वारा लगाई गई रूकावटों पर तो बहुत चर्चा की लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया की उत्तरपूर्व मंे चीन क्या कर रहा है। असल में अराकान आर्मी के शिविरों पर हमला सीधे चीन को चेतावनी है जो इसे सक्रिय समर्थन देता है। चीन की शह पर ही अराकान आर्मी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भारतीय विकास परियोजनाओं में बाधा डाल रही थी या कहें कि उन्हें नष्ट करने का षडयंत्र रच रही थी।

आखिर चीन अराकान आर्मी को समर्थन क्यों दे रहा है। इसका जवाब सीधा सा है – चीन नहीं चाहता कि म्यांमार मंे भारत का प्रभाव बढ़े। चीन वहां अपनी महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड योजना के तहत अनेक परियोजनाएं स्थापित कर रहा है। वह नहीं चाहता कि भारतीय परियोजनाएं उनसे प्रतिस्पर्धा करें। चीन म्यांमार में कुछ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी विकसित कर रहा है जिनमें से एक है बंगाल की खाड़ी में क्याउकप्यू बंदरगाह परियोजना। भारत मानता है कि चीन इसके और चिटगांव बंदरगाह (बांग्लादेश), हंबनटोटा बंदरगाह (श्रीलंका), ग्वादर बंदरगाह (पाकिस्तान) परियोजनाओं आदि के जरिए भारत को घेरना चाहता है और सामरिक, रणनीतिक और व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र मंे अपना वर्चस्व बढ़ाना चाहता है। स्पष्ट है कि चीन, भारत द्वारा म्यांमार में बनाए जा रहे सितवे बंदरगाह को अपने क्याउकप्यू बंदरगाह के लिए खतरा मानता है। चीन सीधे-सीधे तो भारत को मना नहीं कर सकता क्यांेकि भारत म्यांमार की सहमति से ही परियोजनाएं विकसित कर रहा है। इसलिए चीन अपने प्राॅक्सियों द्वारा भारत को धमकाना चाहता है।

स्पष्ट है कि अगर भारत ने बालाकोट में सीधे पाकिस्तान को चुनौती दी है तो उŸार पूर्व भारत में चीन को। मजे की बात ये है कि दोनों ही भारत के खिलाफ प्राॅक्सियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। यही वजह है कि जब भारतीय वायु सेना ने बालाकोट में और म्यांमार सेना ने भारतीय सेना के सहायोग से चिन प्रांत में कार्रवाई की तो चीन भारत पर कोई आरोप नहीं लगा पाया। जब फ्रांस ने पुलवामा हमले के आरोपी जैश-ए-मौहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा तो उसके अतिरिक्त अन्य स्थायी और अस्थायी सदस्यों द्वारा इसका समर्थन करने के बावजूद उसने इसमें रोड़ा अटकाया।

इस कदम से चीन भले ही अपने सदाबहार दोस्त को कुछ सांत्वना दे पाया हो, लेकिन दुनिया में इसका कड़ा विरोध हुआ और पाकिस्तान के साथ ही चीन भी विश्व मंच पर अकेला पड़ गया। भारत ने कहा कि उसे चीन के रवैये से निराशा हुई तो फ्रांस, अमेरिका और इंग्लैंड ने कहा कि वो इस संबंध में अन्य विकल्प तलाशेंगे। फ्रांस ने तो अपने देश में मसूद अजहर की संपत्ति जब्त करने और बैंक खाते जब्त करने की घोषणा तक कर दी। विश्व मंच पर हुई फजीहत से घबराए चीन ने सफाई दी है कि अभी उसने इस प्रस्ताव को ‘टैक्निकल होल्ड’ पर डाला है और वो इसके सभी पहलुओं पर विचार कर रहा है। भारत में चीन के राजदूत लो झांगउई ने कहा, “मुझ पर विश्वास करें ये मसला (मसूद अजहर) हल कर लिया जाएगा। इसे सिर्फ टैक्निकल होल्ड पर रखा गया है जिसका अर्थ है कि अभी सलाह-मश्विरे के लिए समय बाकी है“।

चीन इस मामले में आखिरकार वीटो का इस्तेमाल करेगा या मसूद अजहर पर फ्रांस के प्रस्ताव को मान्यता देगा ये तो चीन ही बता पाएगा, लेकिन भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वो इस मामले में संयम से काम लेगी।

मसूद अजहर मामले को ‘टैक्निकल होल्ड’ पर डालने पर भारत में स्वाभाविक तौर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई। लोगों ने खुलकर चीन के प्रति अपने गुस्से का इजहार किया और अनेक संस्थाओं ने तो चीनी समान के बहिष्कार की धमकी तक दे डाली। डोकलाम विवाद और मानसरोवर यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों से गुपचुप बैठकें करने वाले राहुल गांधी और उनकी पार्टी अनावश्यक रूप से हमलावार हो उठी और प्रधानमंत्री मोदी पर चीनी राष्ट्रपति के सामने घुटने टेकने और कमजोर होने के बचकाने आरोप लगाने लगी। वो ये भूल गई कि चीन ने ये हरकत पहली नहीं, चैथी बार की है। जब 2009 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव लाई थी तब भी चीन ने उस पर वीटो किया था और दुनिया के किसी देश ने भारत का साथ नहीं दिया था। आज चीन को छोड़ कर पूरी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भारत के साथ खड़ी है। ये मोदी सरकार की विफलता नहीं, बड़ी सफलता है जिसने जिद्दी चीन को भी विश्व पटल पर अलग-थलग कर दिया है।

चीन जहां भारत को उलझाए रखने के लिए की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उसके आतंकियों को बढ़ावा देता है, वहीं उत्तरपूर्व में विभिन्न अलगाववादी आतंकी संगठनों और म्यांमार स्थित आतंकी गुटों का इस्तेमाल करता है। इसके चलते भारत को तीन मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है – पाकिस्तान, चीन और भारत में चीनी-पाकी लाॅबी जिसमें नक्सली, तरह-तरह के कम्युनिस्ट, अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, गैरसरकारी संगठन, मीडियाकर्मी आदि शामिल हैं।

सवाल ये है कि इनसे कैसे निपटा जाए? जवाब तो इसके कई हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि भारत संयम से काम ले और हड़बड़ी में कोई ऐसा कदम ने उठा ले जो अंततः चीनी-पाकी लाॅबी की ही मदद करे जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इन देशों को भारत की चुनावी राजनीति और लोकतंत्र में दखलअंदाजी करने का मौका देती है। भारत और चीन में करीब 82 अरब डाॅलर का व्यापार होता है जिसमें व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है। इसके बरक्स पाकिस्तान चीन में मुश्किल से 20 अरब डाॅलर का व्यापार होता है। अगर भारतीय चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करते हैं तो इससे निःसंदेह चीन का नुकासान पहुंचेगा। लेकिन ध्यान रहे चीन के लिए आर्थिक हितों से अधिक दीर्घकालिक सामरिक हित अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। बहरहाल चीन भारत पर सीधे हमला नहीं कर रहा, इसलिए भारत को भी नहीं चाहिए कि वो उससे सीधे पंगा ले। अलबत्ता भारत भी चीन की तरह उसके खिलाफ प्राॅक्सी का इस्तेमाल कर सकता है।

चीन, पाक अधिकृत कश्मीर में चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर योजना के तहत कई परियोजनाएं विकसित कर रहा है। भारत इनका विरोध कर रहा है क्योंकी वो इसे अपना हिस्सा मानता है। चीनी धमकियों और प्राॅक्सी वाॅर के पीछे संभवतः एक प्रमुख कारण ये भी है कि वो भारत से अनेक मोर्चों पर सौदेबाजी करना चाहता है। लेकिन भारत को उसे स्पष्ट कर देना चाहिए कि वो भौगोलिक संप्रभुता और अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा। भारत चीन-पाकिस्तान की प्राॅक्सी वाॅर से भी नहीं झुकेगा और जरूरत पड़ने पर इसका माकूल जवाब देगा। मोदी सरकार अनेक अवसरों पर इसका स्पष्ट संकेत भी दे चुकी है।

असल में चीन 2050 तक सामरिक-आर्थिक दृष्टि से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनना चाहता है और इसके लिए उसके पास रोडमैप भी तैयार है। भारत, चीन को उसकी सीमा के भीतर ताकत बढ़ाने से नहीं रोक सकता और न ही वो उसके और दूसरे देशों के समझौतों पर सवाल उठा सकता है। लेकिन भारत को चीन को ये स्पष्ट करना होगा कि भारत उसके व्यापारिक विस्तार का हामी है और इसमें भागीदार भी बनना चाहेगा लेकिन वो उसकी सामरिक-रणनीतिक दादागिरी को नहीं सहेगा और जरूरत पड़ी तो इसके लिए अन्य महाशक्तियों के साथ मिलकर विकल्प भी विकसित करेगा जिसके लिए योजनाएं पहले ही तैयार की जा चुकी हैं।

बड़ी उपलब्धिः भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी का अभूतपूर्व अभियान in ‘Punjab Kesari’

बड़ी उपलब्धिः भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी का अभूतपूर्व अभियान

पिछले लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने विकास को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया। लेकिन कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के महाघोटालों से त्रस्त जनता के लिए भष्टाचार भी बड़ा मसला था। 2जी, सीडब्लूजी, कोयला, सुरक्षा उपकरण खरीद, वीआईपी हैलीकाॅप्टर खरीद आदि घोटालों से परेशान लोगों को आशंका होने लगी थी कि क्या कभी घोटालों के इस दुष्चक्र का अंत होगा भी या नहीं। कितने ही घोटाले ऐसे सामने आए जिनमें गांधी परिवार और उसके दामाद का सीधे-सीधे नाम आया। कितने ही घोटालों में मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा और बड़े बेमन से उनपर मुकदमे भी दर्ज किए गए। ऐसे में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने गुड गवर्नेंस और दलाल व्यवस्था समाप्त करने का भरोसा दिया। उन्होंने घोषणा की – न खाउंगा न खाने दूंगा।

मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही भ्रष्टाचार समाप्त करने की मुहिम की शुरूआत कर दी। सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से कह रहा था कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए सरकार विशेष जांच दल (स्पेशल इनवेस्टीगेटिव टीम, एसआईटी) बनाए। घोटालों से कलंकित यूपीए सरकार इसे नजरअंदाज कर रही थी। मोदी ने सत्तता संभालते ही सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्ति जज एमबी शाह के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया। इसमें सीबीआई, आईबी के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा वित्तीय और आर्थिक विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

आज विपक्षी दल बार-बार ये कटाक्ष करते हैं कि मोदी ने कहा था कि वो सत्तसमें आने के बाद विदेश से कालाधन लाएंगे और हर व्यक्ति को 15 लाख रूपए मिलेंगे, वो कहां हैं। तो उनकी जानकारी के लिए बता दें कि मोदी ने सत्तता में आते ही जिस एसआईटी का गठन किया था वो अब तब सुप्रीम कोर्ट को छह अंतरिम रिपोर्ट सौंप चुकी है। कालेधन पर लगाम लगाने के संबंध में इसकी अधिकांश सिफारिशें सरकार ने स्वीकार भी कर लीं हैं। इनके मुताबिक तीन लाख रूपए से अधिक का नकद लेन-देन गैरकानूनी करार दिया गया है। 15 लाख रूपए से अधिक नकद रखने को गैरकानूनी करार देने पर भी विचार चल रहा है। एसआईटी के गठन के बाद 70,000 करोड़ रूपए से अधिक के काले धन का पता लगाया जा चुका है जिसमें 16,000 करोड़ का विदेश में जमा कालाधन शामिल है। अगर 2जी और नेशनल हेरल्ड घोटाले का पर्दाफाश करने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता डाॅक्टर सुब्रमण्यम स्वामी पर यकीन करें तो गांधी परिवार ही नहीं, वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम सहित यूपीए के अनेक नेता कमीशन एजेंट के रूप में काम करते थे। ये तरह-तरह के हवाला रूटों के जरिए विदेशों में पैसा जमा करवाते थे और संकट पड़ने पर इस धन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में भी माहिर थे। इनके विदेशी खातों में लाखों करोड़ों रूपए का काला धन जमा है। जाहिर है मोदी के आने के बाद इन्होंने अपना कालाधन कहीं न कहीं तो ठिकाने लगाया होगा। मोदी सरकार ने काले धन के स्वर्ग माने जाने वाले स्विटजरलैंड और माॅरीशस सहित अनेक देशों से भी काले धन की जानकारी हासिल करने के लिए समझौते किए हैं। जाहिर है, जांच जारी है और बहुत सी जानकारियां हासिल भी हुईं हैं। अगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सहयोग करें और ईमानदारी से अपना कालाधन घोषित कर दें तो मोदी सरकार हर भारतीय के खाते में 15 लाख तो क्या 20 लाख रूपए भी जमा करवा सकती है।

लेकिन एसआईटी का गठन तो सिर्फ शुरूआती कदम था। काले धन और दलालों को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था को समाप्त करना, नई पारदर्शी व्यवस्था का निर्माण करना अभी बाकी था। मोदी सरकार ने इसके लिए युद्धस्तर पर काम किया और एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जो न केवल सत्तता के गलियारों में दलालों का दखल रोकती थी, बल्कि ये भी सुनिश्चित करती थी कि पारदर्शी तरीके से सिर्फ ऐसे लोगों को काम मिले जो इसके काबिल हों। इसके लिए सरकार ने एक रणनीति अपनाई जिसके प्रमुख अंग थे – जनजागरण, तकनीक आधारित इ-गवर्नेंस, व्यवस्था आधारित नीति के अनुसार चलने वाली सरकार, कर प्रणाली का सरलीकरण, हर स्तर पर प्रक्रियाओं को सरल, व्यावहारिक और ग्राह्य बनाना, मौजूदा कानूनोें को संशोधित करना और आवश्यकता पड़ने पर नए कानून बनाना।

पिछले साढ़े चार साल में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना काम किया है अगर हम उसका विस्तार से वर्णन करने लगें तो कई ग्रंथ लिखने पड़ेंगे, लेकिन हम यहां बहुत संक्षेप में बताना चाहेंगे कि इस क्षेत्र में सरकार का क्या योगदान रहा। सरकार ने काले धन और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक विधायी, प्रशासनिक और तकनीकी कदम उठाए हैं। विधायी उपायों में शामिल हैं – ब्लैक मनी (अनडिस्क्लोस्ड फाॅरेन इनकम एंड असेट्स) इंपोसिशन एक्ट, बेनामी ट्रांसेक्शन (प्रोहीबिशन) अमेंडमेंट एकट, 2016, सिक्योरिटीज लाॅज़ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014, स्पेसीफाइड बैंक नोट्स (सीसेशनन आॅफ लाएबिलिटीज एक्ट), 2017, भगोड़े आर्थिक अपराधियों के खिलाफ फ्यूजिटिव इकोनाॅमिक आॅफेंडर्स एक्ट, 2018, चैकों के जरिए धोखाधड़ी रोकने के लिए नेगोशियेबल इंस्ट्रूमेंट (अमेंडमेंट) एक्ट, 2018 आदि।

संसद के शीतकालीन सत्र में 18 दिसंबर को सरकार ने एक सवाल के जवाब में बताया कि इकोनाॅमिक आॅफेंडर एक्ट के तहत सरकार ने सात आर्थिक भगोड़े अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की है। ये मामले कुल 27,969 करोड़ रूपए के हैं। ध्यान रहे भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के खिलाफ भी इस कानून के तहत मुकदमे दायर कर दिए गए हैं और विजय माल्या को देश का पहला भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित भी किया जा चुका है।

यहां माल्या और मोदी की बात उठी है तो ये भी बताते चलें कि सीबीआई विवाद में जो नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे स्पष्ट हो रहा है कि सीबीआई के बर्खास्त प्रमुख ने कहीं न कहीं माल्या और मोदी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश से भागने में मदद की जिन्हें मनमोहन सरकार की सिफारिश पर करोड़ों रूपए का कर्ज दिया गया। ध्यान रहे जब चयन समिति उन्हें हटाने पर विचार कर रही थी, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने न केवल उनकी बर्खास्तगी का विरोध किया बल्कि ये सिफारिश भी की कि केंद्र सरकार के कहने पर उन्हें जितने दिन अवकाश पर रहना पड़ा, उतने दिन भी उनके सेवाकाल में शामिल किए जाएं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या माल्या और नीरव जैसे आर्थिक अपराधियों को भगाया जाना और फिर इस विषय में मोदी सरकार को घेरना किसी बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं था?

यहां एक बात और बताना जरूरी है – स्वतंत्र भारत में 2008 तक 18 लाख करोड़ रूपए के बैंक ऋण दिए गए, लेकिन 2008 से 2014 के बीच 52 लाख करोड़ रूपए के कर्जे बांटे गए। अगर प्रधानमंत्री मोदी की मानें तो इसमें से अधिकांश वो ऋण थे जो कांग्रेसी नेताओें की सिफारिश पर दिए गए जिनका डूबना लगभग तय था। लेकिन इसे मोदी सरकार की उपलब्धि ही माना जाएगा कि हर कठिनाई के बावजूद वो तीन लाख रूपए उगाहने में सफल रही है।

मोदी सरकार का एक मास्टर स्ट्रोक नोटबंदी का रहा। जिसने भष्ट लोगों को अपना कालाधन बाहर लाने के लिए मजबूर किया। नोटबंदी के बाद न सिर्फ आयकर दाताओं की संख्या कई गुना बढ़ी, बल्कि सरकार को लाखों की तादाद में ऐसे लोगों की जानकारी भी मिली जो वर्षों से कालेधन का कारोबार कर रहे थे। नोटबंदी से मिली जानकारी के बाद सरकार ने कालेधन के कारोबार में लगी 1.63 लाख फर्जी कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया। नोटबंदी के बाद देश में डिजीटल लेन-देन अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ा है जिससे निसंदेह पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़ी जोर-शोर से लड़ाकू विमान रफेल की खरीद में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। उन्हें लगा कि बोफोर्स और अन्य घोटालों में घिरी कांग्रेस के दाग इससे धुल जाएंगे। उनके वकील इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए पर वहां भी मोदी सरकार को क्लीन चिट मिली। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अब वो इस मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करवाने की मांग को लेकर व्यर्थ में हंगामा कर रहे हैं। मोदी सरकार ने उचित ही इस मांग को ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि जब सुप्रीम कोर्ट इसके हर पक्ष की जांच कर चुका है तो फिर संयुक्त समिति में इसे ले जाने का कोई तुक नहीं बनता।

लंबे अर्से तक कांग्रेस का अनर्गल प्रलाप झेलने के बाद मोदी ने भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस पर रफेल सहित अनेक मुद्दों पर पलट वार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस रफेल की आपूर्ति करने वाली दासो कंपनी की प्रतिद्वंद्वी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए विवाद पैदा कर रही है। अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में भारत लाए गए दलाल क्रिश्चियन मिशेल से हो रही जांच का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वो दासो की प्रतिद्वंद्वी कंपनी के लिए लाॅंबिंग कर रहा था। याद रहे मिशेल, गांधी परिवार का करीबी माना जाता है। वैसे ये भी याद दिलाते चलें कि ये मोदी सरकार ही है जो आजाद भारत के इतिहास में हथियारों के किसी दलाल को भारत लाई है।

कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल भले ही मोदी को घेरने की कितनी ही कोशिश करें, लेकिन भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध में उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि इस क्षेत्र में उनकी सरकार ने जितना काम किया है, वो पिछले 70 साल में नहीं हुआ। उन्होंने स्वच्छ और निष्पक्ष प्रशासन की नींव रख दी है। अब ये जनता को तय करना है कि वो इन प्रयासों को आगे ले जाना चाहेगी या फिर जाति और धर्म के दलदल में फंस कर भ्रष्ट लोगों को चुनेगी।

अनुसूचित जाति-जनजाति का जीवनस्तर सुधारने में मोदी की उल्लेखनीय सफलता ‘In Punjab Kesari’

अनुसूचित जाति-जनजाति का जीवनस्तर सुधारने में मोदी की उल्लेखनीय सफलता

जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, उनकी सरकार के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा है कि वो अनुसूचित जाति – जनजाति के लोगों के खिलाफ है। असल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नक्सलियों और ईसाई गैरसरकारी संगठनों की एक मजबूत लाॅबी है जो इस वर्ग पर सवर्णों के ‘कथित अत्याचारों’ के नाम पर भारत को बदनाम करती रही है और उनके उत्थान और धर्मपरिवर्तन के नाम पर विदेशों से मोटी कमाई करती रही है।

मोदी सरकार के आने के बाद इस लाॅबी ने नक्सलियों, इस्लामिक आतंकियों और अनुसूचित जाति – जनजाति वर्ग के लोगों को एक साथ लाने के लिए काफी मेहनत की। इसके लिए इन्होंने सबसे ज्यादा निशाना विश्वविद्यालयों को बनाया। आपको रोहित वेमूला कांड तो याद ही होगा जिसमें इस लाॅबी ने नक्सली रोहित वेमूला की आत्महत्या को दुनिया भर में खूब भुनाया। इस पूरे मामले को ऐसे पेश किया गया जैसे मोदी की कथित ‘ब्राह्मणवादी’ सरकार दलितों पर घोर अत्याचार कर रही है और भारत में उनका जीना दुश्वार हो गया है। इस मामले को इस्लामिक नक्सली कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और उनके सहयोगियों ने सड़क से संसद तक खूब उछाला। रोहित वेमूला देशद्रोही नक्सलियों की अंबेदकर स्टूडेंट्स यूनियन सदस्य था और आश्चर्य नहीं कश्मीरी आतंकियों के समर्थन में प्रदर्शन करता था।

नक्सलियों ने अपने और इस्लामिक आतंकियों के हिंसक गठबंघन में दलितों को शामिल करने के लिए अंबेदकर का नाम तो इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, परंतु वास्तविकता ये है कि अंबेदकर साम्यवाद के खिलाफ थे। संविधान सभा में जब कुछ लोगों ने मांग की कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ जोड़ा जाए तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये किसी राजनीतिक दल की विचारधारा तो हो सकती है, लेकिन देश की नहीं। अंबेदकर ने कभी हिंसा और इस्लामिक संप्रदायिकता का समर्थन नहीं किया। जब कांग्रेस ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया तो अंबेदकर ने उसका जमकर विरोध किया।

इन संगठनों ने दलितों को पोटने के लिए अंबेदकर के नाम का इस्तेमाल तो किया पर असल में इनका अंबेदकर की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है जो दलितों को शिक्षित कर उनका आर्थिक सशक्तीकरण चाहते थे। नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों का नापाक गठजोड़ तो भारत को अस्थिर करने के लिए दलितों को भड़काना और हिंसा की आग में झोंकना चाहता है। इनका असली चेहरा सामने आया भीमा कोरे गांव में। महाराष्ट्र में दलित इसी नाम से अंग्रेजों और मराठों के बीच हुए उस युद्ध की सालगिरह मनाते हैं जिसमें अंग्रेजों की ओर से बड़ी संख्या में दलितों ने हिस्सा लिया था और वो जीत भी गए थे। इस वर्ष इसकी दो सौवीं सालगिरह मनाई जानी थी। नक्सलियों ने ये आयोजन अपने हाथ में ले लिया और इसका इस्तेमाल दलितों को भड़काने के लिए किया। इस आयोजन में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद जैसे अर्बन नक्सलियों ने जमकर भड़काऊ भाषण दिए जिसके बाद हिंसा फैली जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु भी हुई। इस मामले की चार्जशीट सामने आई तो पता लगा कि नक्सली सिर्फ हिंसा फैलाने की साजिश ही नहीं रच रहे थे, अपितु प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की योजना भी बना रहे थे।

नक्सलियों की मोदी के प्रति नफरत समझ में आती है क्योंकि उनका तो लक्ष्य ही भारत की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकना है, लेकिन क्या वास्तव में मोदी ने कोई ऐसा काम किया है जिससे दलितों को उनके विरूद्ध हथियार उठा लेने चाहिए?

इसका स्पष्ट उŸार है – नहीं। मोदी इतने साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और अब वो देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्हांेने आजतक कोई ऐसा काम नहीं किया जिसे दलितों के खिलाफ कहा जा सके। कुछ पार्टियों ने अपने वोट बैंक की खातिर भारतीय जनता पार्टी को सवर्णों की पार्टी के रूप में चिन्हित करना चाहा, लेकिन असलियत तो ये है कि आज भाजपा में सबसे ज्यादा दलित सांसद हैं। खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली बहुजन समाज पार्टी ने हासिल करने के लिए ब्राह्मणों से हाथ मिलाया। जब सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़ी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम की सख्त धाराओं के खिलाफ फैसला सुनाया तो मोदी सरकार ने ही इसे संसद में कानून के माध्यम से बदला। उधर मायावती ने तो अपने अधिकारियों को इस कानून को लागू करने में नरमी बरतने के लिखित आदेश दिए थे।

अगर मायावती ने अंबेदकर से अधिक अपनी और कांशीराम की मूर्तियां बनवाईं तो मोदी सरकार ने अंबेदकर से जुड़े पांच प्रमुख स्मारकों का उद्धार करवाया और उनकी स्मृतियों को सजीव किया। ये हैं – महु, मध्य प्रदेश में उनकी जन्मस्थली, लंदन में अध्ययन के दौरान उनका निवास स्थान, नागपुर में दीक्षाभूमि जहां उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, दिल्ली में महापरिनिर्वाण स्थल जहां उनका परिनिर्वाण हुआ और मुंबई में चैत्य भूमि स्थित उनका स्मारक।

मोदी सरकार ने सिर्फ अंबेदकर से जुड़े स्मारक स्थलों का उद्धार ही नहीं करवाया, उसने उनके आदर्शों के अनुरूप अनुसूचित जातियों – जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए भी अभूतपूर्व प्रतिबद्धता दिखाई।

हम दलितों के विषय में मोदी सरकार के योगदान की बात करें इससे पहले दलित इंडियन चैप्टर आॅफ काॅमर्स (डीआईसीसी) के चेररमेन मिलिंद कांबले की बात सुनें कि वो मोदी सरकार के बारे में क्या कहते हैं, ”मोदी सरकार के दौरान दलितों के विकास के लिए सर्वाधिक काम किया गया। दलितों के लिए योजनाएं बनाने से लेकर उनके प्रभावी क्रियान्वयन तक, मोदी सरकार का काम मनमोहन सरकार से बेहतर रहा है।“ वो मुद्रा योजना की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, ”मोदी सरकार की मुद्रा योजना से अनुसूचित जाति-जनजाति के करीब 2.75 करोड़ युवाओं को लाभ पहुंचा।“

आइए एक नजर डालते हैं मोदी सरकार की उन योजनाओं पर जिन्होंने अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाला। मोदी सरकार की उज्जवला योजना के तहत घर-घर रसोई गैस पहंुचाई गई। एलपीजी गैस भारत में 1955 में ही आ गई थी, लेकिन वर्ष 2014 तक इसके सिर्फ 1.3 करोड़ कनेक्शन दिए गए थे। गत चार वर्ष में मोदी सरकार ने 10 करोड़ कनेक्शन दिए हैं। जाहिर है इसमें अधिकतर अनुसूचित जाति-जनजाति के परिवारों को ही मिले। ध्यान रहे हर कनेक्शन के लिए सरकार 1,600 रूपए की सहायता देती है।

मोदी सरकार की स्टैंड-अप योजना के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्यों और महिलाओं को 10 लाख से लेकर एक करोड़ रूपए तक के ऋण दिए गए। सरकार ने अनुसूचित जाति के लिए उद्यम पूंजी निधि द्वारा 81 कंपनियों की सहायता की। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के डीबीटी लाभाथर््िायों की संख्या में छह गुना वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2013-14 इनकी संख्या 50 लाख थी, परंतु चार साल में ही ये बढ़ कर 3.01 करोड़ हो गई है। सरकार ने गरीब तबके के सुरक्षित भविष्य के लिए भी उल्लेखनीय काम किया है। पिछले चार साल में 1.3 करोड़ से अधिक सुकन्या समृद्धि खाते खोले गए हैं और 5.7 करोड़ दलित छात्रों को 15,918 करोड़ रूपए की छात्रवृयां प्रदान की गईं हैं।

ये तो महज एक बानगी है। सरकार ने देश के चहुंमुखी विकास के लिए और अंतर्देशीय संपर्क बढ़ाने के लिए दसियों योजनाओं को लागू किया है जिनमें गरीब तबके के करोड़ों-करोड़ लोगों को रोजगार मिला है। ये सही है कि न तो समाज के पूर्वाग्रह अल्पावधि में समाप्त किए जा सकते हैं और न ही हर व्यक्ति और परिवार के हालात को बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन सरकार ने वर्ष 2022 तक सभी परिवारों को छत देने की जो महत्वाकांक्षी योजना बनाई है उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। इसके तहत लाखों गरीब परिवारोें को घर मिले हैं। ध्यान देने की बात ये है कि ये सिर्फ दीवारें ही नहीं हैं, इनमें बिजली, गैस और पानी कनेक्श शामिल है।

बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस आदि जैसी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल पार्टियां सामाजिक न्याय की बात करती हैं, लेकिन अंततः भला सिर्फ इनके नेताओं का होता है जिनके खजाने दिन दूनी रात चैगुनी रफ्तार से बढ़ते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने सदैव व्यक्तिगत हित से ज्यादा देश और गरीब हित पर ध्यान दिया। यही वजह है कि आज देशद्रोही नक्सली-इस्लामिक गठबंधन भले ही दलितों को कितना भड़काए, वो उनके बहकावे में नहीं आयेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो जब अगले वर्ष वोट देने जाएंगे तो अन्य योजनाओं के साथ ही प्रधानमंत्री अटल पेंशन योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी योजनाओं को भी ध्यान में रखेंगे जिन्होंने भारत में पहली बार गरीब तबके को सही मायने में सामाजिक सुरक्षा प्रदान की। वो आयुष्मान भारत योजना को भी नहीं भूलेंगे जिसके तहत हर गरीब परिवार को हर वर्ष पांच लाख रूपए का मेडिकल बीमा मिलता है।

सही नीयत और नीति से मोदी ने रखी कृषि विकास की नींव in ‘Punjab Kesari’

सही नीयत और नीति से मोदी ने रखी कृषि विकास की नींव

विपक्षी दलों ने कृषि मोर्चे पर मोदी सरकार को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नक्सली और साम्यवादी पार्टियों ने किसानों की परेशानियां दिखाने के लिए दिल्ली में फर्जी किसानों की परेड भी करवाई। आश्चर्य नहीं पार्टी लाइन से परे सभी विपक्षी नेता इस जमावड़े पर टोपी रखने के लिए हाजिर हो गए। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी सभी गिले-शिकवे छोड़ कर एक मंच पर आ गए। कहना न होगा, इन दलों से जुड़े मीडिया चाटुकारों ने इसे लंबे अर्से तक भुनाया।

ये बात सही है कि पिछले चार साल में किसानों की हालत में चमत्कारी परिवर्तन नहीं आया है, लेकिन ये बात भी सही है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमत्री पद संभालने के बाद किसानों की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है और कांग्रेस सरकारों ने जो अपने साठ साल के कार्यकाल में नहीं किया, वो मोदी सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में कर दिखाया है। किसानों के लिए घड़ियाली आंसू बहाने वाली कांग्रेस उनकी दुर्दशा के लिए कैसे जिम्मेदार है और उसने वो क्या कुछ नहीं किया जो उसे करना चाहिए था, हम इसके विवरण में नहीं जाएंगे।

लेकिन हम विपक्षी दलों के झूठ का पर्दाफाश अवश्य करेंगे और बताएंगे कि मोदी सरकार ने किसानों की दशा और दिशा सुधारने के लिए क्या ठोस उपाय किए। कांग्रेसी सरकारों ने किसानों की हालत में सुधार के लिए कर्ज माफी जैसे काॅस्मेटिक उपाय अपनाए जिनसे किसानों से ज्यादा उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को लाभ हुआ, पर किसानों की परेशानियों और आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आई। देश भर में किसानों की आत्महत्याओं को देखते हुए मनमोहन सरकार ने 18 नवंबर 2014 को प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन आॅन फारमर्स का गठन किया। इसका मकसद था किसानों के समग्र विकास के लिए मध्यावधि के सुधार सुझाना। कमीशन से अपेक्षा की गई कि वो खेती को लाभदायक, स्थायित्वपूर्ण, टिकाऊ बनाने के साथ-साथ किसानों की खाद्य और पोषण सुरक्षा आदि सुनिश्चित करने के बारे में सुझाव देगा। उसेे न सिर्फ किसानों की ऋण समस्या, शिक्षा, तकनीकी विकास, जीवनस्तर में सुधार के बारे में सिफारिशें करनी थीं, कृषि उपज की खरीद के लिए लाभदायक फार्मूला भी सुझाना था। अगस्त, 2005 से अक्तूबर 2006 के बीच इस आयोग ने किसानों के त्वरित और समावेशी विकास के लिए चार रिपोर्ट प्रस्तुत की। अफसोस मनमोहन सरकार ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की।

मोदी सरकार ने इस आयोग की सिफारिशों पर अमल करने का फैसला किया ताकि किसानों का जीवन स्तर सुधारा जा सके। सरकार ने इसके लिए 2.11 लाख करोड़ रूपए का प्रावधान किया। किसानों को उनकी लागत से 50 प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य देने का फैसला किया गया। माॅडल एग्रीकल्चरल लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 प्रस्तुत किया गया जिसे कृषि सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया। फिलहाल देश में 585 कृषि मंडियां और 22,000 ग्रामीण बाजार हैं जिनमें छोटे किसान अपनी उपज बेच सकते हैं। सरकार ने कृषि बाजारों में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही ई-नेशनल एग्रीकल्चरल मार्केट (ई-नाम) भी आरंभ किया जिसके माध्यम से कृषि बाजारों को जोड़ा गया।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने फसलों की 795 ऐसी किस्में विकसित की हैं जो न केवल उपज बढ़ाएंगी बल्कि किसानों में कुपोषण की समस्या पर भी किसी सीमा तक लगाम लगाएंगी। इनमें से 495 किस्में ऐसी हैं जिनपर मौसमी उतार-चढ़ाव का असर नहीं होता। ये सभी किस्में किसानों को सौंप दी गईं हैं ताकि वो उनका अधिक से अधिक लाभ उठा सकें।

इसके अलावा सरकार ने देश भर में साॅइल हेल्थ कार्ड स्कीम भी चलाई है ताकि किसानों का अपनी जमीन की सेहत की जानकारी रहे और वो उसके अनुसार ही फसल का चुनाव करें तथा खाद, बीज, पानी आदि का प्रयोग करें। अब तक 15 करोड़ किसानों को ये कार्ड दिया जा चुका है और उन्हें खेती के आधुनिक तौर तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया गया है। बरसों से करीब 100 सिंचाई परियोजनाएं अधूरी पड़ीं थीं, सरकार ने 80,000 करोड़ रूपए की लागत से इन्हें पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है और इनमें से अनेक योजनाएं तो पूरी भी हो चुकी हैं।

सरकार ने पशुपालन, मछली पालन, सहकारी संस्थाओं, कृषि मार्केट और लघु सिंचाई क्षेत्र की बेहतरी के लिए अलग से कोष भी बनाया है। कुल मिलाकर सरकार ने किसानों के लिए आय केंद्रित सोच अपनाई है ताकि फसलों का बेहतर और निर्विघ्न उत्पादन हो तथा कृषि, किसानों और उपभोक्ता सभी का कल्याण हो। कुल मिलाकर लक्ष्य ये है कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी की जाए।

ये मोदी सरकार की नीतियों का ही नतीजा है कि पिछले चार साल में देश मछली पालन के क्षेत्र में नीली क्रांति की ओर बढ़ा है। इस क्षेत्र में 26 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई है। पशुपालन क्षेत्र में 24 प्रतिशत विकास हुआ है। पहले यूरिया मुश्किल से मिलता था, लेकिन अब नीम कोटेड यूरिया हर जगह आसानी से उपलब्ध है, इसके लिए कोई मारामारी नहीं है।

मोदी सरकार ने 18 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आरंभ की। इससे अब तक 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश लाभ उठा चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसके तहत एक करोड़ 70 लाख किसान बीमा करवा चुके हैं। दो वर्ष के भीतर ही करीब 30 प्रतिशत किसान इस योजना के साथ जुड़े हैं। जैसे-जैसे लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी, इससे जुड़ने वाले किसानों की संख्या भी बढ़ेगी।

मोदी सरकार ने सामान्य किसानों को ही लाभ नहीं पहुंचाया, जंगल उत्पादों पर बसर करने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भी कदम उठाए। यूपीए सरकार ने आदिवासियों द्वारा जंगलों से एकत्र की जानी वाली और स्थानीय हाटों में बेची जाने वाली 24 किस्म की माइनर फाॅरेस्ट प्राॅड्यूस का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया था। मोदी सरकार ने इस सूची में 17 और उत्पाद जोड़े हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य में 200 प्रतिशत तक की वृद्धि की है। इस योजना के लिए 1,172 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। जमीनी स्तर पर आदिवासियों में संगठन और आंतरिक ढांचे के आभाव के कारण ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। उम्मीद की जानी चाहिए कि समर्थन मूल्य में समुचित बढ़ोतरी के बाद लोगों का रूझान इस ओर बढ़ेगा।

लोकसभा की 542 सीटों में से सिर्फ 55 ऐसी हैं जहां सारे मतदाता शहरी हैं, बाकी की 487 सीटों पर ग्रामीण मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार आगामी लोक सभा चुनावों से पहले किसानों के लिए कुछ और महत्वपूर्ण और उपयोगी योजनाओं की घोषणा भी कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक आगामी बजट किसानों के लिए शुभ समाचार लेकर आएगा। सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में संशोधन कर सकती है ताकि अधिक से अधिक किसान इससे जुड़ें और दावों का निपटारा भी जल्दी से जल्दी हो सके। बजट में किसान क्रेडिट कार्ड योजना में कोलेटरल फ्री कर्ज की सीमा दोगुनी कर दो लाख रूपए तक की जा सकती है। समझा जाता है कि नीति आयोग कृषि और वित्त मंत्रालय के साथ कृषि क्षेत्र  में ढांचागत सुधारों के साथ ही कर्ज माफी की व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) पर भी विचार कर रहा है। हालांकि इसके बारे में फैसला तो राजनीतिक स्तर पर ही किया जाएगा।

सरकार छोटे, मझोले और बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को राहत देने के लिए भी तैयारी कर रही है ताकि बंटाई किसानों को भी बैंकों से कर्ज मिल सके। ऐसे किसानों को राहत देने के लिए उनके मंडी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और बैंक ट्रांजेक्श्न हिस्ट्री को आधार बनाया जा सकता है।

सूत्रों की मानें तो सरकार कर्ज माफी से भी एक कदम आगे जा सकती है। वो न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार दर के अंतर की भरपाई करने पर भी विचार कर रही है। ये राशी सीधे उनके बैंक खाते में जमा करवाई जा सकती है। ये योजना मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की भावांतर योजना पर आधारित है। सरकार झारखंड सरकार की उस योजना को भी राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर विचार कर रही है जिसमें तय सबसिडी सीधे किसानों के खाते में जमा करवा दी जाती है।

कृषि क्षेत्र के विस्तृत क्षेत्रफल, करोड़ों-करोड़ किसानों, मौसमी अनिश्चितताओं और इस क्षेत्र की विविधिताओं और जटिलताओं को देखते हुए ये स्पष्ट है कि इसमें तुरंत सुधार संभव नहीं है। लेकिन मोदी सरकार ने खेत-खलिहान से लेकर भंडारण और फिर खाद्य प्रसंस्करण से लेकर बाजार तक एक नई व्यवस्था की नींव तो रख दी है जिसके परिणाम आने भी शुरू हो गए हैं।

कहना न होगा कि भाजपा की राज्य सरकारों ने भी किसानों की सहायता के लिए अनेक व्यावहारिक और प्रभावी योजनाएं लागू की हैं जिनकी सूची काफी लंबी है। उनकी उपलब्ध्यिों के बारे में विस्तार से चर्चा के लिए यहां स्थान कम है, लेकिन इतना तो याद दिलाना होगा कि किसानों को सिर्फ मोदी सरकार की कृषि संबंधी योजनाओं का लाभ ही नहीं मिला, अन्य योजनाओं का फायदा भी मिला है। सरकार ने हर गरीब को घर देने और हर घर में  बिजली और गैस पहुंचाने की जो योजनाएं बनाईं हैं, उनसे भी किसानों को लाभ पहुंचा है। यही नहीं हर गांव को सड़क से जोड़ने और नए स्वास्थ्य केंद्र खोलने की योजना से भी गरीब किसानों को लाभ हुआ है। यह पहली बार है जब गरीबी रेखा से नीचे हर परिवार को आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रूपए सालाना का बीमा दिया गया है।

किसान कर्ज माफी या अर्थव्यव्स्था चौपट करने की सुपारी in “Punjab kesari”

किसान कर्ज माफी या अर्थव्यव्स्था चौपट करने की सुपारी

जब से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ये ऐलान किया है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब तक चैन से नहीं सोने देंगे जब तक देश के सभी किसानों का ऋण माफ नहीं हो जाता, पहले ही कम सोने वाले कर्मठ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नींद तो पता नहीं उड़ी या नहीं, लेकिन देश और दुनिया के अर्थशास्त्री और बैंक अवश्य उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। उन्हें शक हो गया है कि कहीं राहुल ने ‘किसी’ से देश की अर्थव्यवस्था तबाह करने की सुपारी तो नहीं ले ली? इसकी ठोस वजह भी है। लेकिन आगे बढ़ने से पहले बता दें कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कर्ज माफी की घोषणा की है जिस पर करीब 60,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे। देश के 12 राज्यों में किसान कर्ज माफी की मद में 2,30,000 करोड़ रूपए बकाया हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने राज्यों की वित्तीय स्थिति के बारे में जुलाई में अपनी रिपोर्ट में किसान कर्ज माफी के खिलाफ चेतावनी दी थी। आरबीआई ने कहा कि इससे राज्यों पर दोतरफा मार पड़ रही है। एक ओर तो गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स (जीएसटी) की वजह से उनके राजस्व में कमी आई है तो दूसरी ओर ऐसे कदमों से उनका राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। असल में पिछले वित्त वर्ष में उनका राजकोषीय घाटा 0.27 प्रतिशत से बढ़ कर 0.32 प्रतिशत हो गया है। आरबीआई ने इससे पहले वर्ष 2017 में भी इसी प्रकार की चेतावनी दी थी। अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हैं। अगर किसान ऋर्ण माफी का जूनून ऐसे ही सवार रहा तो ये डर है कि राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के दो प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।

जब राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो इसकी भरपाई के लिए राज्यों को केंद्र या दूसरे माध्यमों से कर्ज लेना होता है जिसपर ब्याज भी देना होता है। कुल मिलाकर अनावश्यक व्यय बढ़ता है और विकास कार्यों की मद में कटौती करनी पड़ती है। संभवतः इसी लिए नीति आयोग ने भी इसका विरोध किया है। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) ने राज्यों को चेतावनी दी है कि वो कर्ज माफी की नई घोषणाओं से पहले पुराना ऋण चुकाएं क्योंकि बकाया राशी बढ़ने से बैंकों के लोन सायकल पर प्रभाव पड़ता है और उनकी नए कर्ज देने की क्षमता कम हो जाती है।

यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार प्रधान कहते हैं, ”ये जानलेवा जहर है, समस्या को हल करने का गलत तरीका है।“ सिंडीकेट बैंक के प्रबंध निदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं, ”निःसंदेह कर्ज माफी को लेकर किसानों की उम्मीदें बढ़ रही हैं, ये देश की ऋण संस्कृति के लिए अच्छा नहीं है। इससे बैंकों को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनकी भरपाई तो सरकारी खजाने से हो जाती है, लेकिन इससे वो सतर्क हो जाते हैं और किसानों और कृषि संस्थाओं को कम कर्ज देते हैं।“ वैसे भी अगर कर्ज माफी से किसानों की हालत सुधरनी होती तो कब की सुधर जाती क्योंकि ये प्रथा काफी पहले से चली आ रही है। गौरतलब ये है कि इसका ज्यादातर फायदा तो बड़े किसानों को ही होता है। छोटे किसान अब भी स्थानीय साहुकारोें पर निर्भर हैं जिनका कर्ज सरकारें माफ नहीं करतीं।

आपको याद दिला दें कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आशंका जताई थी कि इससे जीडीपी की वृद्धि दर में दो प्रतिशत तक कटौती हो सकती है। उनकी बात तो गलत साबित हुई, लेकिन राहुल गांधी पर अगर ऐसे ही कर्ज माफी का दौरा जारी रहा तो बहुत संभव है कि अब मनमोहन सिंह की भविष्यवाणी सही साबित हो जाए। क्या अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह, राहुल बाबा को समझाएंगे कि वो कोई ऐसी जिद न पालें जिस से अर्थव्यवस्था चौपट हो जाए? गांधी परिवार के प्रति मनमोहन सिंह का जो ‘मौन समर्पण’ है उसे देखते हुए तो लगता नहीं कि वो राहुल को सद्बुद्धि देने का प्रयास करेंगे।

वर्ष 2008 में भी कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों से पहले किसानों के 60,000 करोड़ रूपए के कर्जों की माफी का ऐलान किया था। संघीय बजट 2008-09 प्रस्तुत करते हुए तबके वित्त  मंत्री पी चिदंबरम ने इसकी घोषणा की थी। कहा गया था कि कर्ज माफी से तीन करोड़ छोटे और हाशिए पर पड़े किसानों को लाभ होगा। इसके अलावा एक करोड़ किसानों को एक मुश्त निपटारे की योजना का लाभ मिलेगा। इससे उन्हें नए सिरे से कर्ज लेने में भी सुविधा होगी।

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस के चुनावी पंडितों ने दावा किया कि उनकी जीत में किसान कर्ज माफी बड़ा कारण रही। जहां जितने ज्यादा किसानों का कर्ज माफ हुआ, पार्टी को वहां उतनी ही अधिक सीटें मिलीं। जाहिर है राहुल गांधी को लग रहा है कि इस दांव को एक बार फिर खेला जाए। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत के बाद उनके हौसले बुलंद हैं। अब उन्होंने ये दांव पूरे देश में खेला है। पहले गांधी परिवार ने मनमोहन सिंह के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई थी और इस बार वो मोदी का इस्तेमाल करना चाहते हैं। क्या मोदी राहुल को ‘किसानों का मसीह’ बनाने के लिए अपने कंधों का इस्तेमाल होने देना चाहेंगे?

मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को इस विषय में पहले से ही सावधान हो जाना चाहिए था। क्योंकि राहुल काफी अर्से से इसके लिए जमीन तैयार कर रहे थे। मोदी सरकार को ‘सूटेट-बूटेड सरकार’ बताना, उसपर सिफ उद्योगपतियों का भला करने के बेसिरपैर के आरोप लगाना, उद्योगपतियों के खिलाफ किसानों और मजदूरों को बरगलाना…ये सब इसी ओर तो इशारा करते थे।

वित्त मंत्री अरूण जेटली राहुल के तरकशों के जवाब में जनता को ‘गुइ इकॉनॉमिक्स’ समझाते रहे, लेकिन राहुल का निशाना सता पर रहा। जाहिर है उनका मकसद किसान-मजदूर की भलाई नहीं, प्रधानमंत्री पद की कुर्सी है। किसान-मजूदूर तो सिर्फ मोहरे हैं।

ट्वीटर पर एक सज्जन ने बहुत खूब लिखा है – ”मोदी ने अपनी राजनीतिक पूंजी जीएसटी और नोटबंदी जैसे सुधारों में गंवा दी जिससे सरकार के राजस्व में चार लाख करोड़ रूपए की वृद्धि हुई। अब राहुल इसका इस्तेमाल किसानों के कर्ज माफ करने और 2019 में सता हासिल करने में करेंगे।” ऐसे में मोदी के सामने दो ही विकल्प हैं – 1. आदर्शवादी रवैया अपनाते हुए ‘गुड इकॉनॉमिक्स’ की बात की जाए और जनता को अपनी उपलब्धियों से अवगत करवाया जाए या 2. ‘गुड इकॉनॉमिक्स’ को ताक पर रखते हुए, आगामी बजट में किसानों के लिए राहुल से बेहतर योजना पेश की जाए और 2019 के चुनाव जीतने के बाद हालात को संभाला जाए।

मनमोहन सिंह ने अर्थशास्त्री होत हुए भी ‘निहित स्वार्थों’ के लिए प्रधानमंत्री पद का कैसे दुरूपयोग किया और कैसे अर्थव्यवस्था की नैया डुबो दी, इसके बारे में अरूण जेटली सौ वाजिब और वैध तर्क दे सकते हैं। ये भी सही है कि उत्तर प्रदेश में किसान कर्ज माफी और गन्ना किसानों को अच्छा खासा भुगतान करने के बावजूद भाजपा गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की लोकसभा सीटें हारी। लेकिन इसका ये मतलब तो कतई नहीं कि किसान कर्ज माफी मुद्दा नहीं है।

भारत में लोग अक्सर भावात्मक मुद्दोें पर चुनाव लड़ते हैं। एक बड़ा मुद्दा चुनावों का रूख बदल सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार ने किसानों और ग्रामीण विकास के लिए जितने काम किए है, उतने तो आजादी के बाद किसी सरकार ने नहीं किए। लेकिन सिर्फ काम करने से काम नहीं चलेगा, लोगों को, विशेषकर लाभार्थियों को इसका अहसास भी करवाना पड़ेगा।

विपक्षी दलों ने धीरे-धीरे अपनी रणनीति तय कर ली है। वो भले ही महागठबंधन न बनाएं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि वो चुनावों के बाद भाजपा को बाहर करने के लिए हाथ मिलाने से नहीं चुकेंगे। अगर सीधे-सादे शब्दों में कहें तो तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के फॉर्मूले पर काम हो रहा है जो कहता है – जो राजनीतिक दल जहां मजबूत है, वहां सभी अन्य विपक्षी दल उसे भाजपा को हराने में मदद दें। प्रधानमंत्री कौन बनेगा, ये फैसला चुनाव के बाद मिल-बैठ कर कर लिया जाएगा। इसी फॉमूले के तहत उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती और अजित सिंह गठबंधन बनाने पर विचार कर रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित ने संकेत दिया था कि दिल्ली में उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है। ध्यान रहे इस समय इस्लामिक सांप्रदायिक और देशद्रोही नक्सली ताकतें भी राहुल के पीछे खड़ी हैं, जिनका मानना है कि ‘हिंदू’ मोदी के नेतृत्व में मजबूत हिंदुस्तान की जगह, कमजोर और लाचार भारत उनके हित में है।

जाहिर है विपक्षी दलों की सांठगांठ (महागठबंधन नहीं) और भावात्मक मुद्दे भाजपा की चिंता बढ़ा सकते हैं। आने वाले दिनों में भाजपा क्या रणनीति बनाएगी, ये तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ही बता सकते हैं, लेकिन चलते-चलते हम ये भी बताते चलें कि कांग्रेसी कर्ज माफी किसानों के साथ कितना बड़ा धोखा है। इसके लिए सिर्फ मध्य प्रदेश का उदाहरण ही काफी होगा।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसान कर्ज की फाइल पर सबसे पहले हस्ताक्षर कर वाहवाही तो बहुत लूटी, मगर जब किसानों को इसकी हकीकत पता लगी तो उन्होंने माथा पीट लिया। कमलनाथ ने फाइल पर हस्ताक्षर तो कर दिए पर ये नहीं बताया कि कर्ज माफी के तौर-तरीके क्या होगे। अब तक जो अपुष्ट सूचनाएं मिली हैं उनके मुताबिक जून 2009 के बाद लिए गए कर्ज ही माफ किए जाएंगे। लेकिन इसमें अभी कई पेच सामने आने वाले हैं। किसका कर्ज माफ होगा, इसकी पात्रता और मापदंड कर्ज माफी के लिए बनाई गए कमेटियां ही तय करेंगी। ये कमेटियां राज्य से लेकर जिला स्तर तक गठित की जाएंगी। इसमें कई शर्तें हैं, जैसे यदि किसान ने ट्रैक्टर या कृषि उपकरण खरीदने या कुंआ बनवाने के लिए कर्ज लिया है, तो वो माफ नहीं होगा। सिर्फ खेती के लिए उठाए गए कर्ज पर ही माफी मिलेगी। अगर किसान ने दो या उससे अधिक बैंकों से कर्ज लिया है तो सिर्फ सहकारी बैंक का कर्ज माफ होगा। कर्ज माफी भी कुल दो लाख रूपए तक ही होगी। किसानों को 2009 से पहले की बकाया राशी बैंकों को लौटानी होगी हालांकि इसके बारे में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री के साथ बैठक के बाद ही लिया जाएगा।

कांग्रेस शासित राज्यों में विपक्षी दल कर्ज माफी के लिए बनने वाली समितियों पर भी उंगली उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि इसमें सतारूढ़ दल के लोग ही भरे जाएंगे और जमकर भ्रष्टाचार होगा। कुल मिलाकर किसानों की भलाई के लिए किए जा रहे इस ड्रामे का इस्तेमाल पार्टी के लिए चंदा जुटाने के लिए होगा।

कांग्रेस एक ओर तो दावा कर रही है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़  में खजाना खाली है। लेकिन फिर भी यहां कर्ज माफी का नाटक किया जा रहा है क्योंकि असली मकसद लोकसभा चुनाव हैं। अभी घोषणा कर दी गई है, और जैसा कि हमने ऊपर बताया तौर-तरीके तय करते समय तो लगेगा ही और तब तक आम चुनाव आ जाएंगे और आचार संहिता लागू हो जाएगी। ऐसे में नई सरकार आने तक कितने किसानों को लाभ मिलेगा, कितनों का भला होगा, ये तो वक्त ही बताएगा। अलबता राहुल ने कुछ न करके भी किसानों का मसीहा होने का दावा तो ठोक ही दिया है। इसे ही कहते हैं – हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आए। लेकिन मोदी भी कम नहीं हैं। उन्होंने तो वास्तव में काम किए हैं। वो जनता को अपनी उपलब्धियां गिनवा सकते हैं और दावा कर सकते हैं – सौ सुनार की, एक लोहार की।

‘चुनाव परिणाम और राहुल के ‘बाहुबलित्व’ का सच’ In Punjab Kesari

जब से बाहुबली फिल्म हिट हुई है, लोग हर जगह बिना सोचे समझे बाहुबली शब्द का प्रयोग करने लगे हैं। यू ट्यूब पर एक न्यूज चैनल खुद को ‘खबरों का बाहुबली’ बताने लगा है तो कोई तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘राजनीति का बाहुबली’ बताने लगा है। पहले बाहुबली शब्द का इस्तेमाल उन नेताओं के लिए किया जाता था जो बाहुबल और धनबल के बूते जनता को धमका कर चुनाव जीतने का माद्दा रखते थे। वैसे राहुल गांधी ने ये तो दिखा दिया है कि वो नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों जैसी देशद्रोही ताकतों से सांठगांठ कर तथा जातिवाद और संप्रदायवाद को हवा देकर येन केन प्रकारेण चुनाव जीतने में तो ‘बाहुबली’ हो ही गए हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों और राफेल के बारे में जैसे मिथ्या प्रचार किया, उससे ये भी साबित हो गया कि वो झूठ बोलने में भी ‘बाहुबली’ हो गए हैं।

ये भारतीय राजनीति का अभिशाप है कि यहां नेताओं को कुछ भी बोलने की आजादी है। आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं पर जरूर मानहानि के मुकदमे दर्ज किए गए जिसके फलस्वरूप उन्होंने माफी भी मांगी, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता के झूठ बोलने पर किसी भारतीय जनता पार्टी के नेता ने मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया हो, ऐसा याद नहीं आता। हां! कुछ समय पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक नेता ने अवश्य राहुल गांधी को अदालत में ये चुनौती दी थी कि वो या तो संघ को महात्मा गांधी का हत्यारा साबित करें या ऐसे बेसिरपैर के झूठे बयानों के लिए माफी मांगे। इस मामले में सुनवाई जारी है।

बहरहाल ‘बाहुबली की इस बहस’ के बीच ये समझना जरूरी हो जाता है कि क्या राहुल गांधी तीन राज्यों में जीत हासिल करने के बाद अचानक ‘बाहुबली’ हो गए या नई दिल्ली में बैठे उनके चमचे उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं। दिसंबर में पांच राज्यों में चुनाव हुए – तेलंगाना, मिजोरम, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़। तेलंगाना की 119 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 19 सीटें जीत पाई। मिजोरम में कांग्रेस का शासन था, लेकिन वहां वो 40 में से महज 5 सीटें ही जीत पाई। इसके साथ ही समूचे पूर्वोŸार में कांग्रेस का सफाया हो गया।

अब देखते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तथाकथित जीत कितनी विश्वसनीय है। यहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की बीच कांटे की टक्कर रही। असल में भाजपा को कांग्रेस से दशमलव एक प्रतिशत मत अधिक मिले। यानी कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत तो भाजपा को 41 प्रतिशत मत मिले। लेकिन अधिक मत पा कर भी भाजपा आखिर क्यों हारी? इसकी वजह है नोटा वोट। राज्य की 22 सीटों में नोटा मतों की संख्या जीत के अंतर से भी अधिक थी। इस वजह से भाजपा के चार दिग्गज मंत्री बहुत कम अंतर से हार गए। ग्वालियर दक्षिण में गृह राज्य मंत्री नारायण सिंह कुशवाहा सिर्फ 121 मतों से हारे जबकि यहां नोटा वोटों की संख्या 1,550 थी। दमोह में विŸा मंत्री जयंत मालवीय केवल 799 मतों से हारे जबकि यहां नोटा मतों की तादाद 1,299 थी। जबलपुर उŸार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री शरद जैन 578 मतों से पीछे रहे। यहां नोटा मतों की संख्या 1,209 रही। इस प्रकार भाजपा को 22 में से 12 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा नोटा वोट बुंदेलखंड (9 सीट) और मालवा (8 सीट) क्षेत्र में पड़े। नोटा वोटों की दो बड़ी वजह सामने आईं – 1. अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव से कुछ सवर्ण नाराज थे। इसलिए उन्होंने भाजपा या किसी अन्य दल को मत देने की जगह नोटा का बटन दबाया, 2. आदिवासी क्षेत्रों में लोगों ने अज्ञानवश या नक्सलियों के बहकावे में आकर नोटा को चुना। जो भी हो इस से भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।

अब आते हैं राजस्थान में। यहां कांग्रेस को 39.3 प्रतिशत तो भाजपा को 38.8 प्रतिशत मत मिले। यानी भाजपा सिफ दशमलव 5 प्रतिशत से पिछड़ी। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां नोटा मतों की संख्या 1.5 प्रतिशत रही। ये बात सही है कि इस बार भाजपा का मत प्रतिशत गिरा है, लेकिन उतना भी नहीं जितना एक्जिट पोल बता रहे थे। कुछ एक्जिट पोल तो भाजपा को 20-22 सीटें दे रहे थे, लेकिन भाजपा ने यहां फिर भी 230 में से 109 सीटें हासिल कीं।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपने मायाजाल और झूठ के दम पर जीती। कांग्रेस के सरकार बनाने से पहले ही छत्तीसगढ़ को-ओपरेटिव डिपार्टमेंट का एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसमें राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों, भारतीय स्टेट बैंक और अन्य क्षेत्रीय बैंकों से ये कहा गया था कि वो किसानों के कर्जों का ब्यौरा 30 नवंबर तक जमा करा दें। पत्र कहता है कि क्योंकि कांग्रेस ने वादा किया है कि वो सत्ता में आने के 10 दिन के भीतर ही किसानों के कर्ज माफ कर देगी, इसलिए पहले से तैयारी जरूरी है। राज्य के मुख्य सचिव अजय सिंह कहते हैं कि उन्होंने कर्ज माफी समेत विभिन्न मुद्दों की वित्तीय जटिलताओं के मद्दे नजर डेटा मांगा था। लेकिन सवाल ये है कि ये पत्र सोशल मीडिया तक कैसे पहुंच गया? मुख्य सचिव को कैसे इलहाम हो गया कि कांग्रेस आने वाली है? बहरहाल इसका असर ये हुआ कि किसानों ने पहले से ही किस्तें भरनी बंद कर दीं और कांग्रेस ने तो इसका जो इस्तेमाल करना था वो किया ही। कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने न सिर्फ रमन सिंह सरकार के एक मंत्री की फर्जी सीडी बनाई बल्कि उनके विकास कार्यों के बारे में भी झूठा प्रचार किया और भ्रामक फिल्में बनाईं।

आंकड़ों के आलोक में देखें तो भाजपा की हालत वास्तव में इतनी दयनीय नहीं है जितनी कांग्रेसी चाटूकार दिखा रहे हैं। लेकिन अतंतः ये भी सच है कि जीतता तो वही है जो अधिक सीटें हासिल करता है। इन चुनावों के बाद बारी लोक सभा चुनावों की है जिसमें चंद राज्यों की नहीं पूरे देश की किस्मत का फैसला होगा। इसे ध्यान में रखते हुए भाजपा में पहले ही अपनी हार पर मंथन आरंभ हो गया है। मोदी समर्थक कुछ लोग ये सोच कर खुश हो सकते हैं कि शिवराज सिंह चैहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह जैसे भारी-भरकम क्षत्रपों के हारने के बाद भाजपा में मोदी का कद और उनपर निर्भरता बढ़ गई है, लेकिन ऐसे लोगों को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं क्षत्रपों ने 2014 में मोदी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसलिए भाजपा को सबसे पहले अपने घर में एकजुटता कायम करनी होगी। कहीं ऐसा न हो जाए कि बंदरबांट के फेर में बिल्ली रोटी ले जाए।

मोदी सरकार ने किसानों की बेहतरी के लिए निःसंदेह बड़े काम किए हैं, लेकिन या तो ये जमीनी स्तर पर नहीं पहुंचे या अपेक्षानुसार असरकारक नहीं रहे, इसकी समीक्षा करनी होगी। लोक सभा चुनावों को अभी चार महीने बाकी हैं। इस दौरान भाजपा को किसानों के बीच अपनी पैठ और बढ़ानी होगी। मोदी सरकार ने कुछ बड़े वित्तीय फैसले ये सोच कर किए कि उनसे व्यापारियों और उद्योगपतियों का एक बड़ा वर्ग प्रभावित अवश्य होगा, लेकिन जमीनी स्तर पर इससे सुधार होगा और ये देश में आर्थिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त करेगा। इस संबंध भी सरकार की अपेक्षाएं कितनी पूरी हुईं, इसकी समीक्षा करनी होगी। सरकार को चाहिए कि व्यापार और उद्योगजगत की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान दे, क्योंकि यही लोग आम जनता को रोजगार उपलब्ध करवाते हैं।

वर्ष 2014 में राहुल के युवा होने के बावजूद लोगों ने मोदी को वोट दिया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वो परिवर्तन लाएंगे। इसमें संदेह नहीं कि मोदी सरकार ने हर क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं, लेकिन उन्हें जनता के संज्ञान में लाना और लोगों को उनके फायदों की जानकारी देना भी जरूरी है। योजनाओं के विज्ञापन से लोगों को ये तो पता लग जाता है कि हां कोई योजना है, लेकिन उसका लाभ कौन, कैसे, कहां, कब ले सकता है, ये स्पष्ट नहीं होता। अगले चार महीनों में भाजपा के सांसदों, विधायकों, पार्षदों, कार्यकर्ताओं आदि को घर-घर जा कर लोगों की इनकी जानकारी देनी होगी। संक्षेप में कहें तो समाजसेवी की भूमिका निभानी होगी।

भाजपा को अपनी मीडिया रणनीति में भी सुधार करना होगा। मुसलमानों, दलितों, रक्षा सौदों के बारे में जैसे कांग्रेस ने झूठ फैलाया, उसका समुचित जवाब भाजपा नहीं दे सकी। राजनीति में सोशल मीडिया के प्रभावी इस्तेमाल की नीति मोदी ने ही शुरू की थी, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा सोशल मीडिया में मनवांछित परिणाम नहीं हासिल कर सकी। हमने ऊपर छत्तीसगढ़ का उदाहरण दिया। नोटा वोटों के लिए विपक्षी दलों ने कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, ये भी भाजपा को समझना होगा और उसकी काट निकालनी होगी।

पिछले साढ़े चार साल में भाजपा के अनेक सहयोगी दल उसे छोड़ कर चले गए। भाजपा को सहयोगियों की समस्याओं और अपेक्षाओं को गहराई से समझना होगा और बिछुड़े लोगों को मनाना भी होगा। भाजपा नेतृत्व को अपनी शैली में भी बदलाव करना होगा। पिछले पांच साल में पार्टी का बहुत विकास हुआ है। समय की मांग है कि अब विकेंद्रीकरण के बारे में सोचा जाए। शिवराज सिंह चैहान, रमन सिंह आदि जैसे अनेक कद्दावर नेता सरकार से बाहर हैं, इन्हें उचित जिम्मेदारियां देनी होंगी ताकि नाराज और बिछड़े नेताओं को मनाया जा सके।

भाजपा नेतृत्व को लगता है कि अंत समय में धुंआधार प्रचार कर लोगों का मन बदला जा सकता है, उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। ये किसी हद तक सही भी है। लेकिन अंत समय के प्रचार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है छवि या लोगों की अवधारणा। ये चंद दिन में नहीं बदल सकती। इसके लिए सतत कार्य करना होगा। विपक्षी दलों के मिथ्या प्रचार का समुचित जवाब देना होगा और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाना होगा।

अंत में एक महत्वपूर्ण बात लोगों ने भाजपा को इसलिए भी वोट दिया क्योंकि वो कांग्रेस द्वारा हिंदुओं को आतंकी साबित करने के षडयंत्र से नाराज थे। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे राष्ट्रीय अस्मिता के सवालों पर निर्णायक कदम उठाएगी। खेद है कि पार्टी ने इन्हें अदालत के भरोसे छोड़ दिया। इस बीच राहुल गांधी भी खुद को हिंदू साबित करने में लग गए। अब भी समय है, भाजपा को चाहिए कि इस विषय में ठोस कदम उठाए।

राम जन्मभूमिः मीर बकी से मोदी तक और……?

मुजफ्फर इस्लाम रजमी का शेर है – ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हां ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई। ये शेर राम जन्मभूमि विवाद पर पूरी तरह सटीक बैठता है। वर्ष 1527 में जब बाबर के सेनापति मीर बकी ने अपने सुल्तान के आदेश पर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर गिरा कर बाबरी मस्जिद बनाई तो उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि हिंदुओं के मानमर्दन का ये कदम वो सदियों तक नहीं भूलेंगे। बाबर ने सोचा होगा कि वो देर-सबेर अपनी ताकत के दम पर भारत के अधिसंख्य हिंदुओं को मुसलमान बना लेगा और ये बात आई-गई हो जाएगी। लेकिन हिंदू अपने अराध्य देव राम का ये अपमान न भूलने वाले थे, और न भूले।

बाबर ने हिंदुओं को जख्म तो दिए पर उन्हें अपनी आस्था से डिगा न सका। इकबाल का एक शेर है – कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। मुस्लिम और ईसाई शासकों ने अपनी दौलत और ताकत के बल पर दुनिया के अनेक देशों का धर्मांतरण कराया, पुरानी से पुरानी सभ्याताएं मिटा डालीं, लेकिन वो भारत में सफल नहीं हो सके। वो बात जिसने हिंदुओं और हिंदुस्तान की हस्ती मिटने नहीं दी, वो ये है कि हमने हालात से समझौता तो किया लेकिन अपने अपमान की आग को अपने सीने में जलाए भी रखा। बाबर के अत्याचार के बावजूद हिंदुओं ने कभी बाबरी मस्जिद के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। जनश्रुतियों में, हमारी लोक कथाओं में हमने राम जन्मभूमि को जीवित रखा। देश की इस्लाम परस्त ताकतें भले ही ये भूल गईं या भूलने का नाटक करती रहीं कि जुल्म की प्रतीक बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर था, लेकिन हिंदू ये नहीं भूले।

आधुनिक समय में 1853 में पहली बार निर्मोही संप्रदाय ने इस ढांचे पर दावा पेश करते हुए कहा कि जहां ये ढांचा खड़ा है, पहले वहां मंदिर था। उस समय वहां नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत थी। फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार 1855 तक हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में पूजा या इबादत करते रहे। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद मस्जिद के सामने एक बाहरी दीवार डाल दी गई और हिंदुओं को अंदरूनी प्रांगण में जाने और उस चबूतरे पर चढ़ावा चढ़ाने से रोक दिया गया जिसे उन्होंने बाहरी दीवार पर खड़ा किया था। जाहिर है अंग्रेजों ने इस मसले को दोनों समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया।

उसके बाद वर्ष 1992 में विवादित ढांचा गिरने तक अनेक नाटकीय घटनाएं और संघर्ष हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने हिंदुओं से ये वादा किया कि अगर इस ढांचे के नीचे मंदिर के अवशेष निकले तो वो ये स्थान उन्हें सौंप देंगे। ढांचे के गिरने और उसके पहले दो बार विस्तृत वैज्ञानिक जांच हुई और दोनों बार ये पाया गया कि इसके नीचे मंदिर था। लेकिन नरसिम्हा राव ने अपना वादा नहीं निभाया। आजादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने समीकरण बदले और इस्लाम परस्त कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इसे भारत की ‘धर्मनिरपेक्षता’ और मुसलमानों की ‘प्रतिष्ठा’ का प्रतीक बना दिया। जब ढांचा टूटा तो जबरदस्त दंगे भड़काए गए जिनमें दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए। ये ढांचा न तो मुसलमानों का मक्का है और न ही मदीना, न ही इस्लाम में नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद को अनिवार्य माना गया है, फिर भी इसे मुसलमानों के गौरव का प्रतीक बना दिया गया। आज बड़ी संख्या में मुसलमान ये स्वीकार करते हैं कि ये जगह हिंदुओं के लिए पाक और मुकद्दस है और यहां राम का मंदिर ही बनना चाहिए, लेकिन कांग्रेसी मौलानाओं का एक बड़ा तबका अब भी इसे हिंदुओं का अपमान करने और उन्हें चिढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक माना। यही वजह है कि इसके सहयोगी संगठन विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के निर्माण का बीड़ा उठाया। भारतीय जनता पार्टी ने सदा इसे अपने चुनाव घोषणापत्र में स्थान दिया। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी स्पष्ट बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने, उससे आजाद भारत के इतिहास में कोटि-कोटि हिंदुओं के मन में पहली बार ये आशा जगी कि वो अवश्य इस मसले को हल कर देंगे। लेकिन इसके लिए कानून लाने की जगह उन्होंने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे के फैसले का इंतजार करने का निर्णय लिया। एक बारगी लगा भी कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय में जल्द फैसला सुना देगा, लेकिन उसने इसे जनवरी तक टाल दिया।

देशद्रोही नक्सलियों और कश्मीरी आतंकवादियों के लिए रात-रात भर जगने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस टरकाऊ रवैये से हिंदू समाज क्षुब्ध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद अब इस विषय में व्यापक जनजागरण अभियान चला रहे हैं। इसी संदर्भ में नौ दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे लाखों रामभक्तों ने एक बार फिर मोदी सरकार को आगाह किया कि वो इस महत्वपूर्ण मसले को नजरअंदाज न करे और इस विषय में जल्द से जल्द कानून बनाए। संघ के सरकार्यवाह भय्या जी जोशी ने सही कहा है कि इस विषय में कानून की मांग कर कोई भीख नहीं मांगी जा रही। राम मंदिर भले ही अब भाजपा नेताओं को चुनावी मुद्दा न लगता हो परंतु विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन और फिर लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा ने लोगों को बड़ी संख्या में जागरूक किया और अपनी अस्मिता का अहसास करवाया जिसका भाजपा को लाभ भी मिला।

संघ और संत समाज के स्पष्ट मत के बाद अपेक्षा की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय अस्मिता के इस महत्वपूर्ण विषय पर संसद के शीतकालीम सत्र में कानून बनवाएंगे। भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा इस विषय में निजी विधेयक की बात भी कर रहे हैं, लेकिन मोदी को अब इसे हलके में नहीं लेना चाहिए। उनकी सरकार के पास सीमित समय बचा है। उन्हें चाहिए कि वो अपने इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक दायित्व को अविलंब पूरा करें।

निःसंदेह भारतीय लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है। जब सरकार अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बदल सकती है तो राम जन्म भूमि मामले में उसके निर्णय के प्रतीक्षा करने का बहाना क्यों? वैसे भी ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में जमीन के स्वामित्व को लेकर मुकदमा चल रहा है, लेकिन हिंदुओं के लिए ये आस्था का प्रश्न है। उन्हें रामलला की उसी जगह पूजा करने और मंदिर बनाने का हक है जिसे वो राम जन्म भूमि मानते हैं।

हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं ने बार-बार ये कहा कि उनके लिए ये चुनावी मुद्दा नहीं, आस्था का विषय है। सवाल ये है कि अगर ये चुनावी मुद्दा नहीं है तो इसे चुनाव घोषणापत्र में क्यों शामिल किया जाता है? जाहिर है, अब मोदी सरकार के पास सीमित समय बचा है। अगर वो इसे अभी नहीं हल करेगी तो कब करेगी? अगर भाजपा पूर्ण बहुमत के बावजूद इस मसले को हल नहीं करेगी तो आगामी चुनावों में वो किस मुंह से लोगों के बीच ये मुद्दा उठाएगी?

‘सबरीमला की शुचिता भंग करने की साम्यवादी साजिश’ in Punjab Kesari

सबरीमला में केरल सरकार अयप्पा भक्तों और विशेषकर महिला भक्तों के साथ जो व्यवहार कर रही है वो निंदनीय है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का रवैया मुलायम सिंह यादव के 1990 के उस आदेश की याद ताजा करता है जिसमें उन्होंने पुलिस को अयोध्या में निहत्थे रामभक्तों पर गोली चलाने का आदेश दिया। मुस्लिम वोटों की खातिर लिए गए इस फैसले में कितने भक्त मारे गए, कितनों की लाशें बिना अंतिम संस्कार सरयु में बहा दी गईं और कितने लापता हुए, किसी ने ढंग से इसकी जांच करवाने की जहमत तक नहीं उठाई।

केरल सरकार की तानाशाही सात नवंबर, 1966 की याद भी बरबस दिला देती है जब इंदिरा गांधी सरकार ने गौहत्या पर प्रतिबंध की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाने का आदेश दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें 375 लोग मारे गए, परंतु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जलियांवाला बाग से भी बदतर इस कांड में 10,000 से अधिक हिंदू शहीद हुए। ध्यान रहे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 48 में सरकार से गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने की अपेक्षा की गई है।

हम लौट कर केरल की घटना पर आते हैं। 18 नवंबर को अयप्पा के सैकड़ों भक्त सत्संग के लिए एकत्र हुए। पुलिस ने इन पर धारा 144 का उल्लंघन करने के नाम पर बेरहमी से लाठियां और पत्थर बरसाए और इनका सामान लूट लिया। सैकड़ों महिला और पुरूष भक्तों को आतंकियों की तरह थाने में रखा गया फिर उन्हें 10 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस दौरान उन्हें मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रखा गया।

विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन कहते हैं, “पुलिस जिस निर्दयता से भक्तों पर प्रहार कर रही थी, उससे लग रहा था कि जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम) के गुंडों ने ही पुलिस की वर्दी पहन ली है। ये न तो आदिल शाही निजाम है न सोवियत संघ में स्टालिन का शासन, नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा।”

वो आगे कहते हैं, ”सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बहाने, मुख्यमंत्री विजयन, अयप्पा के गरीब भक्तों को आतंकित कर रहे हैं, तानाशाह जैसा व्यवहार कर रहे हैं। उनकी पुलिस तो महिलाओं तक को नहीं बख्श रही, उनपर हमले कर रही है और भोजन-पानी भी नहीं दे रही। विजयन ने सारी सीमाएं लांघ दी हैं। हम केंद्र सरकार से मांग करते हैं कि वो तुरंत केरल सरकार को बर्खास्त करे, अन्यथा हम केरल में ही नहीं, पूरे देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे।”

वहीं केद्रीय जहाजरानी एवं वित्त राज्य मंत्री पोन राधाकृष्णन आरोप लगाते हैं कि केरल सरकार ने सबरीमला को युद्ध का मैदान बना दिया है। चारों ओर किलेबंदी कर दी गई है। वो कहते हैं, ”मंदिर का दृश्य देख का कलेजा फट जाता है, वो वीरान पड़ा है। पहले वहां हर समय भजन कीर्तन चलता रहता था, लेकिन अब उसकी स्थिति शोक भवन जैसी हो गई है। उसका रखरखाव भी ठीक से नहीं किया जा रहा। पुलिस अधिकारी भक्तों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं। पहले वहां कोई जूते पहन कर नहीं जाता था, लेकिन अब लोग वहां जूते पहन कर भी जा रहे हैं।” 21 नवंबर को जब राधाकृष्णन मंदिर जा रहे थे तो पांबा (मंदिर का प्रवेश स्थल) तक निजी वाहन ले जाने देने की अनुमति न देने पर उनकी पुलिस अधीक्षक यतीश चंद्र से भी झड़प हुई। इसके बाद वो विरोध स्वरूप सार्वजनिक बस से ही मंदिर गए। वो कहते हैं, ”केरल सरकार नहीं चाहती कि भक्त मंदिर जाएं इसलिए उसने सुविधाएं कम दी हैं और दर्शन का समय भी सीमित कर दिया है।“

जैसी की आशंका थी, सबरीमला में राज्य सरकार के बर्बरतपूर्ण रवैये के बाद केरल में ही नहीं, अन्य राज्यों में भी विरोध शुरू हो गया है। राधाकृष्णन कन्याकुमारी से सांसद हैं, उनके अपमान के विरोध में भारतीय जनता पार्टी ने 23 तारीख को बंद का आयोजन किया। इससे पहले 21 नवंबर को चिकमंगलूर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पार्टी सदस्यों और अयप्पा भक्तों पर निर्दय हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। अयप्पा भक्तों पर अत्याचार तथा दर्शन और भक्ति पर तरह-तरह की रूकावटें लगाने के विरूद्ध विश्व हिंदू परिषद भी देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दे चुकी है।

सबरीमला मसले पर मुख्यमंत्री विजयन आखिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतनी शिद्दत से  समर्थन क्यों कर रहे हैं? क्यों उन्होंने इसके विरूद्ध पुनर्विचार याचिक न दायर करने का निर्णय लिया? इसके पीछे भी कुछ कारण हैं। असल में इस पूरे प्रकरण में उनकी दिलचस्पी ‘महिलाओं को अधिकार दिलाने’ में कम और प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के हिंदू वोट बैंक में संेध लगाना अधिक है। उनके लिए राजनीति इतनी महत्वपूर्ण है कि वो इसके लिए सबरीमला की शुचिता और परंपराओं की बलि चढ़ाने के लिए भी तैयार हैं। हाल ही में उन्होंने केरल हाई कोर्ट को सुझाव दिया कि अगर भक्त अपना रवैया नहीं बदलते तो राजस्वला महिलाओं के अयप्पा दर्शन के लिए दो दिन नियत कर देने चाहिए। यानी वो किसी भी कीमत पर अयप्पा भक्तों के विश्वास को कुचलने पर आमादा हैं।

उन्हें लगता है कि इस विवाद से भले ही भारतीय जनता पार्टी को कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन इससे कांग्रेस को दीर्घकालिक और स्थायी नुकसान पहुंचाया जा सकता है। शायद यही वजह है कि वो आजकल अपनी सभाओं में भाजपा और कांग्रेस पर सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने सबरीमला मुद्दे पर हिंदुओं को तोड़ने की कोशिश भी की है। उन्होंने हिंदुओं के सबसे बड़े जातीय समूह एजावास के नेता और श्री नारायण धर्म परिपालना योगम (एसएनडीपी) के महासचिव वेल्लापल्ली नटेशन को अपने पक्ष में बयान देने के लिए उकसाया। लेकिन उनके पुत्र और भारतीय धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के प्रमुख तुषार वेल्लापल्ली सरकार का जमकर विरोध कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं, अधिकांश बीडीजेएस कार्यकर्ता तुषार का समर्थन कर रहे हैं। उधर हिंदुओं का एक अन्य प्रमुख संगठन नायर सर्विस सोसायटी (एनएसएस) भी सरकार से लोहा लेने के लिए तैयार है।

परस्पर विरोधी रूख के बावजूद मुख्यमंत्री विजयन ने घोषणा की है कि वो सबरीमला में शांति बहाली के लिए एसएनडीपी, एनएसएस आदि हिंदू जातीय समूहों की बैठक बुलाएंगे। उन्होंने अपने साप्ताहिक टेलीविजन प्रसारण में कहा कि राज्य को ‘आदियुग’ में ले जाने की कोशिश की जा रही है, इसके खिलाफ उन सभी ताकतों को एकजुट हो जाना चाहिए जिन्होंने ‘पुनर्जागरण’ के लिए संघर्ष किया। सवाल ये है कि क्या सबरीमला मंदिर में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपराओं का पालन राज्य को ‘आदियुग’ में ले जाना है? सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले तक जो परंपरा ‘आदियुगीन’ नहीं थी वो अचानक कैसे ‘आदियुगीन’ हो गई? सोचने की बात है कि क्या सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को हजारों अयप्पा भक्तों ने वोट नहीं दिया होगा? क्या उसे वोट देने वाले सभी भक्त ‘आदियुगीन’ थे?

सीपीएम का ये कैसा पुनर्जागरण है जो सिर्फ हिंदुओं पर ही लागू होता है, जबकि पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों को समर्थन देता है और राज्य के मल्लपुरम जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में मनमाने हिंदू विरोधी नियमों को खामोशी से स्वीकृति देता है? क्या ये सीपीएम के पुनर्जागरण का नतीजा है कि आईएस में सबसे अधिक भारतीय मुसलमान केरल से ही गए हैं और सबसे ज्यादा लव जिहाद के मामले भी वहां हुए हैं? आपको याद दिला दें कि पुनर्जागरण की गुहार लगाने वाले विजयन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2009 के आम चुनावों में मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए आतंकी मामले में जेल काट चुके पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के कट्टरवादी नेता अब्दुल नासेर मदनी से हाथ मिलाया था। क्या ये इसी पुनर्जागरण का नतीजा है कि सबसे अधिक हिंदू केरल में ही ईसाई बनाए गए? केरल में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याएं क्या इसी ‘पुनर्जागरण’ का परिणाम हैं? अचरज नहीं कि स्वयं विजयन पर संघ के कार्यकर्ता और मुख्य शिक्षक रामकृष्णन की हत्या का आरोप लग चुका है।

हिंदुओं को पुनर्जागरण सिखाने से पहले ये महत्वपूर्ण तथ्य भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि केरल के अधिसंख्य हिंदू मातृसत्तत्मक परिवार व्यवस्था का पालन करते हैं जहां पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को हर क्षेत्र में प्रधानता दी जाती है। केरल के पुरूष सैकड़ोें वर्षों से इस व्यवस्था को सम्मान के साथ मानते चले आ रहे हैं। पश्चिम में इजाद किए गए ‘फैमिनिज्म’ से बहुत पहले से ही केरल में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का ही नहीं, पुरूषों से भी ऊंचा दर्जा हासिल रहा है। ऐसे में सीपीएम का आयातित ‘पुनर्जागरण’ राज्य की महिलाओं का क्या भला करेगा? वैसे भी विजयन को याद दिलाना बेहतर होगा कि केरल में ही अत्तुकल मंदिर और चक्कूलातुकवू मंदिर भी है जिनमें सिर्फ महिलाओं को ही पूजा करने की अनुमति है। अत्तुकल मंदिर में वर्ष में एक बार अत्तुकल पोंगल समारोह होता है जिसमें दस लाख से भी अधिक महिलाएं भाग लेती हैं। महिलाओं के सबसे बड़े जमावड़े के लिए इसका नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है।

अब थोड़ा विचार सबरीमला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी किया जाए। राजस्वला महिलाओं के मंदिर प्रवेश निषेध को अदालत ने महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ माना है। लेकिन सबरीमला के नियम संविधान के विरूद्ध नहीं हैं। वहां महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है। वहां राजस्वला महिलाओं के प्रवेश निषेध के पीछे जो कारण है उनका तर्क और परिप्रेक्ष्य समझना होगा। भारत में समस्या ये है कि हमने आंख मूंद कर पश्चिमी शिक्षा और न्याय पद्धति अपना ली है। यही नहीं, हमने राजनीतिक विचारधाराएं भी पश्चिम से किराए पर ली हैं। हम ये नहीं कहते कि हर पश्चिमी चीज बुरी है, मगर इतना तो कहना ही होगा कि उनकी सीमा भी है।

अगर सुप्रीम कोर्ट सबरीमला मामले में सिर्फ ‘महिलाओं के अधिकारों’ के तर्क से ऊपर उठ कर ये जानने की जहमत उठाता कि जो नियम बनाया गया है उसका वैज्ञानिक और तार्किक आधार क्या है तो संभव है कि वो वह फैसला नहीं देता जो उसने दिया। लेकिन मंदिरांे के वास्तु, ऊर्जा संचार, प्राणप्रतिष्ठा और उनके महिलाओं पर प्रभाव आदि विषय ऐसे हैं जिनके लिए उसे भारतीय शास्त्रों को भी पढ़ना पढ़ता जो उसने नहीं पढ़े। उसने तीन तलाक मामले में जैसे इस्लामिक धर्मगुरूओं से घंटों तक चर्चा की अगर वैसे ही हिंदू विद्वानों से भी थोड़ी देर बात कर ली होती तो उसे पता लग जाता कि राजस्वला महिलाओं को लेकर जो नियम बनाया गया है, उसका तर्क और वैज्ञानिक आधार क्या है। बात सीधी सी है – ऐसा तो नहीं है न कि जो बात आपको पता नहीं, उसका अस्तित्व ही न हो, वह सही भी न हो।

सबरीमला में राजस्वला महिलाओं के प्रवेश निषेध के लिए जो मिथकीय कारण बताया जाता है वो ये है कि अयप्पा बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए वो राजस्वला महिलाओं से दूर रहते हैं। ध्यान रहे हिंदू धर्म में ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी यौन ऊर्जा को ऐसी ऊर्जा में परिवर्तित करना जो आध्यात्मिक ज्ञानोदय में प्रयुक्त हो सके। यहां ब्रह्मचर्य की अवधारणा पश्चिम से अलग है जहां इसका एक ही मतलब है – यौन संबंधों से दूर रहना।

प्रवेश निषेध के पीछे कुछ अन्य कारण भी बताए जाते हैं जैसे सबरीमला क्षेत्र में गुरूत्वाकर्षण सामान्य से अधिक है जिससे गर्भवती महिलाओं का गर्भ गिर सकता है। एक अन्य कारण ये भी बताया जाता है कि राजस्वला महिलाओं की उपस्थिति मंदिर परिसर की ऊर्जा पर नकारात्मक असर डालती है। भारतीय शास्त्रों के अनुसार मंदिर अपने वास्तु और प्रयुक्त सामग्रियों के आधार पर ऊर्जा प्रवाह निर्मित करते हैं जो भक्तों के ऊर्जा प्रवाह और सकारात्मकता को बढ़ाता और सुदृढ़ करते हैं। मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा भी एक माध्यम है उनमें ऊर्जा का संचार करने का। मंदिर महिलाओं के मासिक चक्र में कैसे असर डालते हैं इसका एक उदाहरण केरल का ही भगवती मंदिर है। चेंगन्नूर स्थित इस मंदिर में महिलाएं बांझपन अथवा मासिक धर्म की गड़बड़ियों से मुक्ति के लिए जाती हैं और अपनी समस्यों से छुटकारा भी पाती हैं।

आतंकी अफजल गुरू, अर्बन नक्सलियों आदि के मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट ने जैसी तत्परता दिखाई, वैसी न तो सबरीमला मामले में दिखाई दी और न ही अयोध्या मामले में। ऐसे में हिंदू समाज में बेचैनी स्वाभाविक है, सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर संदेह करना लाजमी है। उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सबरीमला मामले में दायर की गई पुनर्विचार याचिकाओं पर जल्द फैसला लेगा और ऐसा करते समय हिंदू ज्ञान-विज्ञान और उसका पालन करवाने के लिए बनाए गए नियमों का भी सम्मान करेगा।

‘राम मंदिरः हिंदुओं के साथ दोहरा खेल बंद करे कांग्रेस’ in Punjab Kesari

अक्तूबर 29 को जब तीन सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने राम मंदिर मामले की जल्द सुनवाई की अपील को महज पांच मिनिट में अगले वर्ष जनवरी तक टाल दिया, तो समूचे हिंदू समाज में आक्रोश की लहर दौड़ गई। लोगों को ये लगने लगा कि कहीं मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कांग्रेस का ऐजेंडा तो नहीं चला रहे जो अगले लोकसभा चुनाव तक इस मसले का हल नहीं चाहती। याद दिला दें कि कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मांग की थी कि इस मसले की सुनवाई अगले आम चुनावों के बाद ही की जाए।

रामजन्म भूमि पर अदालती रवैये से निराश और नाराज राम भक्तों को अब एक ही रास्ता नजर आ रहा है – संसद राम मंदिर के लिए वैसे ही कानून बनाए जैसे सोमनाथ मंदिर के लिए बनाया था। इस विषय में नरेंद्र मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार कर ली है। इसमें सांसदों से लेकर प्रधानमंत्री तक को ज्ञापन देना और जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जनजागरण अभियान शामिल है।

कुछ दिन बाद 11 दिसंबर से संसद का शीतकालीन सत्र आरंभ हो रहा है। इससे पहले परिषद ने 15 नवंबर से सांसदों को ज्ञापन सौंपने का अभियान आरंभ कर दिया है। परिषद इस संबंध में 25 नवंबर को अयोध्या में एक विशाल आयोजन करेगी जिसमें प्रमुख साधु संतों सहित रामजन्म भूमि आंदोलन से जुड़े करीब एक लाख लोग भाग लेंगे। ऐसे ही आयोजन इस दिन नागपुर और बेंगलूरू में भी होंगे। नौ दिसंबर को दिल्ली में संतों की बैठक होगी। 18 दिसंबर के बाद पूरे देश में 5,000 से भी अधिक आयोजन होंगे ताकि लोग इस विषय में अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अगले वर्ष प्रयागराज में होने वाले कुंभ में भी इस मुद्दे पर धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ही नहीं अनेक भारतीय जनता पार्टी नेता और मुस्लिम संगठन भी राम मंदिर के लिए कानून बनाए जाने की मांग का समर्थन कर चुके हैं। उधर कट्टरवादी इस्लामिक-नक्सल कांग्रेस एक बार फिर राम मंदिर के नाम पर मुसलमानों को डराने और भड़काने में लग गई है। वो इसके लिए भय्याजी जोशी के उस बयान का इस्तेमाल कर रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो राम जन्म भूमि के लिए एक बार फिर 1992 जैसे आंदोलन किया जाएगा। याद दिला दें कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था और उसके बाद भड़के दंगों में अनेक लोग मारे गए थे।

असल में हुआ यूं था कि मुंबई में तीन दिन चली संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद भय्याजी जोशी संघ के विस्तार के बारे में संवाददाताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि गत छह वर्ष में संघ का डेढ़ गुना विस्तार हुआ है। करीब 35,500 गांवों में संघ की परियोजनाएं चल रही हैं। इस समय संघ की 55,825 शाखाएं हैं। संघ की साप्ताहिक और मासिक मिलन बैठकें क्रमशः 17,000 और 9,000 गांवों में होती हैं। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष अलग-अलग कार्यक्रमों में एक लाख स्वयंसेवकों की वृद्धि हुई है…। इस बीच एक संवाददाता ने पूछा कि क्या संघ राम मंदिर के लिए 1992 जैसे आंदोलन भी करेगा? इसपर उन्होंने ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो अवश्य ऐसा किया जाएगा। इसके बाद संघ के विस्तार और सामाजिक उपलब्धियों को तो मीडिया ने दरकिनार कर दिया और हर ओर सिर्फ एक ही बात की चर्चा हुई कि संघ ‘1992 जैसा’ माहौल पैदा करना चाहता है।

इस खबर को कांग्रेस जैसी कट्टरवादी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, इस विवाद के मूल प्रतिवादी हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी, कांग्रेसी मौलानाओं के जमावड़े आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड आदि ने भी तूल देना शुरू कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ये मसला अदालत में है तो 25 नवंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना के लोग अयोध्या क्यों आ रहे हैं, इससे वहां के मुसममानों में ही नहीं, हिंदुओं में भी भय पैदा हो गया है कि कहीं ‘बाहरी लोग’ ‘1992 जैसे’ दंगे न करें। इन लोगों को ये तो याद है कि 1992 में कुछ मुसलमान मारे गए थे, लेकिन उन्हें ये नहीं याद रहा कि इस विवाद में कितने हिंदू भी मारे गए। 1990 में तो उत्तरप्रदेश के तबके मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोटों की खातिर हिंदू कारसेवकों को गोलियों से भून दिया था। 1992 में जब विवादास्पद ढांचा ढहाए जाने के बाद दंगे भड़के तो उसमें मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी मारे गए। अयोध्या में ही एक मुस्लिम समाजवादी नेता ने हिंदुओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं थीं।

संघ और परिषद के ताजा आंदोलन को कठघरे में खड़ा करने वाली पार्टियां ये भूल जाती हैं कि 1992 में और 2018 में जमीन आसमान का अंतर है। आज आंदोलन का लक्ष्य मोदी सरकार को जनता की भावना से अवगत करवाना और उस पर कानून बनाने के लिए दबाव डालना है। रामभक्तों का अयोध्या जाना प्रतीक है राम मंदिर के प्रति अपनी आस्था दोहराने का न कि किसी को आक्रांत करने का।

वर्ष 1984 में जब से विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि आंदोलन चलाया है, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी आदि जैसी इस्लामिक पार्टियां परिषद और बजरंग दल को अतिवादी, हिंसक संगठनों के रूप में बदनाम करने में लगी हैं। जबकि स्वयं ये पार्टियां राष्ट्रविरोधी, खूनी नक्सलियों तथा पहले सिमी और अब पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे इस्लामिक आतंकी संगठनों को समर्थन देती रहीं हैं। हाल ही में भीमा कोरेगांव मामले में पूना पुलिस ने जो चार्जशीट दाखिल की है वो आंखें खोलने वाली है। ये लोग न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने का षडयंत्र भी कर रहे थे। इस चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों में वो पत्र भी है जिसमें एक नक्सली आतंकी दूसरे को कह रहा है कि यदि हम दलितों को भड़काते हैं और दंगे करवाते हैं तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हमें विŸाीय और कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस ने देश में कितने कैसे और कब कब दंगे भड़काए हैं, वो हम अपने स्तंभ में बताते रहते हैं।

सोचने की बात है कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नाम पर मुसलमानों को डराने वाली ये पार्टियां खुद कितने दंगे भड़का चुकी हैं और देश में कितने लोगों की हत्या करवा चुकी हैं। अयोध्या में विवादित ढांचा मुसलमानों का मक्का-मदीना जैसा कोई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल नहीं था, फिर भी इन पार्टियों ने इसे हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ का प्रतीक बना दिया और इसका इस्तेमाल मुस्लिम वोट बटोरने के लिए किया।

विवादित ढांचा गिरने के बाद जब दंगे भड़के तो इस्लामिक पार्टियों ने इसके लिए सीधे-सीधे संघ और उसकी सहयोगी संस्थाओं को जिम्मेदार ठहरा दिया। वैसे अब तक इस विषय में कोई गहन जांच नहीं हुई है कि ये दंगे किसने भड़काए? कभी किसी ने ये सोचा कि जब देश भर के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के सदस्य या तो अयोध्या में थे या जेल में तो दंगे किसने भड़काए? ऐसा तो नहीं कि दंगे किसी और ने करवाए और ठीकरा किसी और के सर पर फोड़ा गया? क्या ये मुसलमानों के ध्रुवीकरण की कुत्सित चाल नहीं थी? क्या आज भी वो ताकतें मुसलमानों को राम मंदिर के नाम पर डरा नहीं रहीें? ध्यान रहे आज की तरह तब ज्यादातर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें नहीं थी, तब केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं।

ये सही है कि जब विवादित ढांचा गिरा तब उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। ये भी सही है कि कल्याण सिंह ने ढांचा गिराए जाने की नैतिक जिम्मेदारी ली थी और चंद घंटों के भीतर ही इस्तीफा भी दे दिया था। लेकिन क्या ये सही नहीं है कि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और विद्वान नेता नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे। ढांचा गिरने और उसके बाद हुई हिंसा की क्या कोई जिम्मेदारी नरसिम्हा राव और उनकी सरकार की नहीं थी?

जब ये घटना हुई तब माधव गोडबोले केंद्र में गृह सचिव थे। उन्होंने ‘अनफिनिश्ड इनिंग्स’ नाम से एक पुस्तक लिखी है। इसमें वो विस्तार से बताते हैं कि कैसे तबके गृह मंत्री एस बी चव्हाण ने विवादित स्थल को कब्जे में लेने के लिए छह दिसंबर से बहुत पहले जुलाई में ही योजना बना ली थी। लेकिन नरसिम्हा राव ने काफी विलंब से 24 नवंबर को केंद्रीय बलों को उत्तर प्रदेश भेजने की मंजूरी दी और बल वहां पहुंच भी गए, लेकिन उन्होंने उनकी तैनाती का आदेश कभी नहीं दिया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो नरसिम्हा राव ने वादा किया था कि अगर विवादित स्थल के नीचे मंदिर निकलता है तो वो ये परिसर हिंदुओं को दे देंगे। लेकिन खुदाई में मंदिर होने की पुष्टि के बावजूद राव वादे से मुकर गए। पहले परोक्ष रूप में ढांचा ढहाने में मदद करके और फिर अपने वादे से मुकर कर वो आखिर क्या खेल खेल रहे थे, वो क्या चाहते थे, ये अब तक अस्पष्ट है। लेकिन इतनी बात तो साफ है कि वो और उनकी पार्टी ढांचा गिराए जाने के बाद भड़के दंगों की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं और अनेक मुस्लिम संगठन भी इसका जोरदार समर्थन कर रहे हैं, तब कांग्रेस और उसके जैसी अन्य इस्लामिक-नक्सल पार्टियां एक बार फिर मुसलमानों को डराने में लग गईं हैं। हिंदू वोटों के लिए मंदिरों के दौरे करने वाले जनेऊधारी राहुल गांधी राम मंदिर के नाम पर खामोश हैं।

सुप्रीम कोर्ट के टरकाऊ और विपक्षी दलों के दोगले रवैये से हिंदुओं में निराशा और नाराजगी है और वो इस संबंध में सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन भी कर रहे हैं, लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं कि अयोध्या में एक बार फिर दंगे भड़केंगे। कांग्रेस, इकबाल अंसारी, आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और उनके राजनीतिक आका राम मंदिर के नाम पर लोगों को डराना बंद करें। अपनी राजनीति के लिए राम को बदनाम न करें। इन लोगों के भड़काऊ बयानों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अयोध्या ही नहीं, पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था चाक चैबंद रहेगी और किसी को डरने की आवश्यकता नहीं।