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“क्या आरएसएस के खिलाफ चर्च का षडयंत्र है तूतीकोरिन कांड?” in Punjab Kesari

कठुआ के बाद तूतीकोरिन मामले की कवरेज में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली का तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कान का कच्चा और आंख का अंधा है। कुछ लोग इसे हांकते हैं और ये अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना भेड़चाल में फंस जाता है।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारी मारे गए, ये सही है। लेकिन कौन लोग थे जिन्होंने पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनपर पत्थरों की बौछार की, महिला पुलिसकर्मियों के कपड़े फाड़े, किनके कारण प्रदर्शन हिंसक हुआ, इसके पीछे कौन सी ताकते थीं, ये प्रायोजित था या वास्तविक, किसने वाहनों, भवनों, एम्बुलेंसों और कलेक्ट्रेट को आग लगाई, किसने तूतीकोरिन को युद्ध का मैदान बना दिया? ये शायद किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की। सबको सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि गोली चली और लोग मरे। इसके लिए विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तमिलनाडु राज्य सरकार से ज्यादा केेंद्र की मोदी सरकार को दोष दिया। सोशल मीडिया पर कुछ विपक्षी तो प्रधानमंत्री मोदी को हत्यारा बताने लगे। शायद यही षडयंत्रकारियों का मकसद था, और उन्होंने इसे हासिल भी किया। स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट बंद करवाना और उसकी पेरेंट कंपनी वेदांता को बदनाम करना और नुकसान पहुंचाना भी एक मकसद था, लगे हाथों वो भी हासिल हो गया। चलो हाल-फिलहाल तो वो भी बंद हो गया है। यानी एक तीर से कई शिकार। किसे फिक्र है कि स्टरलाइट प्लांट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुंचेगा? कितने हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे?

सबसे ज्यादा घृणित और भड़काऊ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान था, जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। वैसे अल्पज्ञ राहुल गांधी को इसके लिए दोष देना भी मूर्खता ही होगी। उनकी तो राजनीति संघ से शुरू होती है और संघ पर ही खत्म हो जाती है। नक्सलियों से संबंध रखने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तो उन्होंने आधे घंटे के भीतर संघ पर उंगली तान दी। येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने एलान कर दिया कि मैं जनता को संघ से बचाउंगा। एक विशेष समुदाय से संबंध रखने के कारण राहुल का हिंदू विरोध समझ में आता है, लेकिन संघ को आतंकवादी साबित करने के लिए साजिश करना, समझ से परे है। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने संघ को हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया है। उसे एक टारगेट बना दिया गया है जिसपर हिंदुओं से नफरत करने वाला हर समुदाय, हर राजनीतिक दल बेखटके उंगली उठा सकता है। संघ का विरोध करना ‘सांप्रदायिकता का विरोध’ मान लिया गया है और इस्लामिक और ईसाई सांप्रदायिकता का समर्थन और ध्रुवीकरण ‘धर्म निरपेक्षता’।

बहरहाल हम लौट कर तूतीकोरिन पर आते हैं। इस मामले में राहुल द्वारा फटाफट संघ पर उंगली उठाना एक व्यापक साजिश का हिस्सा है जिसे तूतीकोरिन का चर्च अंजाम दे रहा है और जिसकी सरपरस्ती दिल्ली में राहुल गांधी और उनका चंपू मीडिया कर रहा है। हम जो कुछ कह रहे हैं वो बहुत जिम्मेदारी से कह रहे हैं। तमिलनाडु के तीन जिलों तिरूनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी में ईसाइयों की तादाद सर्वाधिक है और यहां आम जनता पर चर्च का काफी प्रभाव है। ये संयोग नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन्हीं तीन जिलों में विकास परियोजनाओं का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है।

तिरूनेलवेली में कंुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध आपको याद होगा जिसे रूस के सहयोग से बनाया जा रहा था जो अमेरिका को पसंद नहीं था। तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के लिए अमेरिका समर्थित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने आरोप लगाया था कि तूतीकोरिन के बिशप यवोन एम्ब्रोइस को प्रदर्शनों के लिए 54 करोड़ रूपए मिले थे और वो इन प्रदर्शनों के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इनके अलावा कई और ईसाई संस्थाएं जैसे पीपल्स एजुकेशन फाॅर एक्शन एंड लिबरेशन और गुड विशन भी प्रदर्शन भड़काने के लिए गृह मंत्रालय के रडार पर थीं। गृह सचिव ने घोषणा की थी कि चार ऐसे गैर सरकारी संगठनों के बैंक खाते सील कर दिए गए थे जो विदेशों से मिला पैसा प्रदर्शन भड़काने में लगा रहे थे।

तूनीकोरिन में ईसाई आबादी 30 प्रतिशत के करीब है और आम जनजीवन पर चर्च का गहरा असर है। यहां चल रहा स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट भी विवादों के घेरे में लाया गया। फिलहाल इसमें चार लाख टन तांबा सालाना बनाया जाता है। विस्तार के बाद इसकी क्षमता आठ लाख टन सालाना हो जाती। इससे भारत की तांबे की लगभग सारी जरूरत पूरी हो जाती और इसके आयात की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ध्यान रहे तांबे का इस्तेमाल विद्युतीकरण से लेकर रक्षा उपकरण के निर्माण तक अनेक स्थानों पर होता है। ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी बहुत जरूरी है।

पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक तूतीकोरिन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हाथ भी है। कुछ समय पहले लंदन से आया ‘फाॅइल वेदांता ग्रुप’ (वेदांता ग्रुप को असफल करो) का समरेंद्र दास स्टरलाइट प्रदर्शनकारियों से गुपचुप मिला। उसने इन्हें भरोसा दिलाया था कि वो प्रदर्शन जारी रखने में पूरी मदद करेगा। क्या ये सिर्फ संयोग है कि तूतीकोरिन हिंसा के बाद इंग्लैंड में विपक्षी लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता जाॅन मैकडोनल्ड ने वेदांता को अराजक कंपनी बताया और उसे लंदन स्टाॅक एक्सचेंज से हटाने की मांग की? तूतीकोरिन के चर्चों में लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काया गया। यू ट्यूब पर ब्रदर मोहन सी लाजरस का वीडिया उपलब्ध है जिसमें वो बिना किसी सबूत के स्टरलाइट को जहरीली फैक्ट्री बता रहा है। वो कहता है कि चर्च इसे बंद करने के लिए प्रार्थना कर रहा है। वो कहता है 24 मार्च, 2018 को राजाजी पार्क तूतीकोरिन में प्रदर्शन होगा जिसमें सभी कैथोलिक, पैंटाकोस्ट, सीएसआई चर्चों के लोग भाग लेंगे।

ध्यान रहे नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) जैसी संस्थाओं के वैज्ञानिक स्टरलाइट का दौरा कर चुके हैं और इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि इसका उत्सर्जन सेंट्रल पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और तमिलनाडु पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (टीएनपीसीबी) जैसी संस्थाओं द्वार तय किए गए मानकों के अनुसार है। ऐसे में चर्चों द्वारा झूठ बोल कर आम लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काने का क्या मकसद है? जहां कुंडनकुलम में बिशप यवोन एम्ब्रीओस और एसपी उदयकुमार थे, वहां स्टरलाइट मामले में ब्रदर मोहन लेजारस और क्षेत्र के अन्य चर्च हैं। देश की विकास परियोजनाओं के खिलाफ चर्च का ऐसा रूख क्या देशद्रोह नहीं है? अगर मनमोहन सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं?

क्या से संयोग है कि जिस समय तूतीकोरिन कांड की योजना बनाई जा रही थी ठीक उसी समय दिल्ली में आर्कबिशिप अनिल कूटो ‘ईसाइयों पर हमलों’ पर चिंता जता रहे थे और कह रहे थे कि देश कलहकारी दौर से गुजर रहा है और ईसाइयों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? क्या ये महज संयोग है कि कूटो के पत्र के बाद देश भर के चर्चों से उनके समर्थन में आवाज उठी जिसे कांग्रेस और अन्य ‘संघ विरोधी’ दलों ने भरपूर समर्थन दिया? क्या ये भी महज संयोग है कि घटना के तुरंत बाद सबसे पहले कमल हासन वहां पहुंचे जो इस समय दक्षिण भारत में ईसाई राजनीति के केंद्र में हैं?

तूतीकोरिन में गोली चलाने के लिए पुलिस को खलनायक बनाया गया। क्या दिल्ली के मीडिया ने एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं कि पुलिस को इसके लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? अगर प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू थे और उनके हाथों में लाठी-बल्लम, राॅड, पत्थर, पेट्रोल बम, शीशे की बोतलें सब कुछ थे। तूतीकोरिन के पत्रकार एन राजेश अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस कपिल सरतकर ने प्रदर्शन स्थल पर कड़ा इंतजाम किया था ताकि प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट तक नहीं पहुंच सकें। अभी पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात कर ही रही थी, कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरीकेड तोड़ दिया और उसे पुलिस पर फेंका। इसके बाद ही पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। मुझे लगा कि हालात गंभीर मोड़ ले रहे हैं तो मैं बाइपास रोड पर चला गया। मैं हालात को ठीक से समझने के लिए कलेक्ट्रेट के विपरीत एक होटल की इमारत की छत पर चढ़ गया। करीब साढ़े ग्यारह बजे कलेक्ट्रेट में घुसने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगानी शुरू कर दी। इनमें से कुछ लोगों ने जब देखा कि हम उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं और वीडियो बना रहे हैं तो उन्होंने हम पर पत्थरों की बौछार कर दी। जब हम नीचे उतरे तो उन्होंने हमें लाठियों से पीटा और हमारा कैमरा छीन लिया।

एन राजेश के विवरण का समर्थन कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी करते हैं। एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि करीब 11.10 बजे वो अपने सहयोगियों के साथ कैंटीन में चाय पीने गईं। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस कर्मचारी बदहवास तेजी से दौड़ते हुए आ रहे हैं और उनके पीछे लोग पत्थर फेंकते हुए आ रहे हैं। हम भयभीत थे, हमें नहीं पता था कि हम क्या करें, हम वापस कार्यालय में गए। इसके बार करीब 20,000 प्रदर्शनकारी कार्यालय में घुस गए। उनके पास हथियार थे, लाठियां थीं, लोहे के सरियेथे, कांच की बोतलें थीं, पेट्रोल बम थे। उन्होंने तेजी से कार्यालय का सामान बर्बाद करना शुरू कर दिया, पुलिस, कलेक्ट्रेट की गाड़ियों में आग लगा दी। वहां सुरक्षा के लिए तैनात करीब 100 पुलिसवालों ने उनका सामना किया, उन्हें नियंत्रित कर, बाहर भेजने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी हजारों में थे और पुलिसवाले बहुत कम। उन्होंने बेरहमी से पुलिसवालों पर हमला बोल दिया, वो अपनी जान बचा कर भागे। फिर उन्होंने कलेक्ट्रेट के सभी वाहनों को आग लगा दी, पूरा कार्यालय धुएंे से भर गया, चारों तरफ धुआं ही धुआं था। कार्यालय किसी युद्ध के मैदान की तरह लग रहा था। प्रदर्शनकारियों ने महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। उनकी कमीज फाड़ दी, उनके गुप्तांग में हाथ घुसाए। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट को भी नहीं बख्शा, उसमें भी आग लगा दी।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मौजूद है। सब एक ही चीज बताते हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, वाहनों, भवनों, कार्यालयों को फूंका, और तो और एम्बुलेंस तक को नहीं बख्शा। पुलिस वालों को खलनायक बताने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो उनकी जगह होते तो क्या करते? क्या उन्हें हिंसा और उन्माद का नंगा खेल खेलने की तब तक इजाजत देते जब तो वो तूतीकोरिन और स्टरलाइट प्लांट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देते? विवादास्पद, भड़काऊ और विघटनकारी बयानों के लिए बदनाम कांग्रेसी नेता गुलामनबी आजाद ने तो इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से कर दी। कोई गुलामनबी से पूछे कि क्या जलियांवाला में मारे गए लोग लाठियां, सरिए, पेट्रोल बम, कांच की बोतलें, पत्थर ले कर बैठे थे? क्या उन लोगों ने जनरल डायर और उसके पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था और उनके वाहनोें को आग लगा दी थी? क्या जलियांवाला में मौजूद लोगों ने हिंसा की पहल की थी?

जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर वो मूर्ख नहीं होती। राहुल गांधी ने संघ पर वार करने से पहले और गुलामनबी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग से करने से पहले दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो याद आ गया होता कि स्टरलाइट प्लांट के जिस विस्तार का विरोध हो रहा है, उसकी अनुमति स्वयं मनमोहन सरकार ने 2007 में दी थी। यही नहीं कांग्रेस के स्टार वित मंत्री और गृह मंत्री रहे विवादास्पद पी चिदंबरम 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनने से पहले स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता में निदेशक थे।

संघ के प्रति नफरत में अंधे राहुल गांधी को संघ के खिलाफ बयान देने से पहले ये भी याद नहीं रहा कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है, न कि केंद्र के। वैसे भी तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। राहुल गांधी के सीने में कितना जहर भरा है वो उनके ट्वीट से समझा जा सकता है जो कहता है – तमिलों का नरसंहार हो रहा है क्योंकि वो संघ की विचारधारा का पालन नहीं कर रहे। प्रदर्शनकारियों पर चलने वाली हर गोली का संबंध संघ और भाजपा से है।

इतनी नफरत, इतने भड़काऊ बयान, लाशों पर ऐसी ओछी राजनीति? पहले षडयंत्र करना और फिर उसे भुनाना राहुल गांधी और उनकी पार्टी अच्छी तरह सीख गए हैं। इस घटना से भाजपा, केंद्र सरकार को और खासतौर से गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सीख लेनी चाहिए। राजनाथ जी सिर्फ रिपोर्ट मंगाने से काम नहीं चलेगा। चाहे कठुआ का मामला हो या तूतीकोरिन का, गृह मंत्रालय ऐसे षडयंत्रों की त्वरित जांच कराने और सच्चाई सामने लाने में विफल रहा है। क्या इस मामले में रिपोर्ट तलब करने की जगह केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकार के साथ मिलकर नहीं काम करना चाहिए था? मनमोहन सरकार ने तो फिर भी चर्च के अराजकत तत्वों पर रोक लगाने की कोशिश की, आपने क्या किया? आप पर क्या दबाव है कि आप ऐसे तत्वों पर कार्रवाई नहीं कर रहे? कौन लोग इस षडयंत्र में शामिल थे, उन्हें कहां से पैसा मिल रहा है? क्या ये आपको नहीं मालूम? जनता जवाब चाहती है माननीय गृह मंत्री जी, और वो भी जल्दी।

“कर्नाटकः भाजपा का अतिविश्वास और पिछलग्गू कांग्रेस कीे दोहरी हार” in Punjab Kesari

कर्नाटक में मची उठा-पटक ने नेताओं को कई सबक सिखाए। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबक ये था कि अगर सुप्रीम कोर्ट सक्रिय हो जाए तो जोड़-तोड़ से सरकार बनाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। राज्यपाल वजू भाई वाला ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के बाद बहुमत साबित करने के लिए सिर्फ 24 घंटे का समय दिया। इस सीमित समय में येदियुरप्पा संख्याबल नहीं जुटा पाए और उन्होंने भावुक भाषण के बाद इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी विधायक उनके संपर्क में थे, लेकिन अंततः उन्होंने साथ नहीं दिया।

येदियुरप्पा को आमंत्रित करके वजू भाई वाला ने कोई असंवैधानिक काम नहीं किया। असल में कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति बने विधि विशेषज्ञ शंकरदयाल शर्मा ने ब्रिटिश संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए इसे सही ठहराया था। लेकिन सोचने की बात ये है कि क्या भाजपा दिल्ली के उदाहरण को नहीं दोहरा सकती थी, जब उसने सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने दिया। अगर ऐसा किया जाता तो कम से कम भाजपा विजय का नैतिक दावा तो कर सकती थी। वैसे भी इस पूरे प्रकरण में भाजपा बार-बार कांग्रेस से 19 साबित हुई। जैसी की खबर है, कांग्रेस ने मतदान के बाद ही जनता दल, सेक्युलर (जेडी,एस) से संपर्क साध लिया था। कांग्रेस ने बिना वक्त गंवाए वकीलों की बड़ी फौज के साथ आधी रात को ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। यही नहीं उसने अपने वरिष्ठतम नेताओं, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोईली आदि, की बड़ी टीम बेंगलूरू में तैनात की और पूरी सतर्कता से अपने विधायकों की रखवाली की।

लगता है, इस बार भाजपा कहीं न कहीं अतिविश्वास के कारण शहीद हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैलियों में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडी, एस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा की भरपूर तारीफ की। लेकिन क्या वजह है कि तारीफों के आदान-प्रदान के बावजूद दोनों दलों में बातचीत आगे न बढ़ सकी? भाजपा को पूर्व एनडीए सहयोगी तेलुगु देशम की नाराजगी भी भारी पड़ी। तेलुगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा को हराने की अपील जारी की। ध्यान रहे कर्नाटक में करीब 15 प्रतिशत तेलुगु भाषी हैं। राज्य के 12 जिलों में इनकी अच्छी खासी तादाद है। इस बार के लहरहीन चुनाव में जब एक-एक मत महत्वपूर्ण था, ऐसे में तेलुगु मतों की भी अपनी अहमियत थी। आपको याद दिला दें की 2013 के चुनाव में 49 सीटों पर विजय का अंतर 5,000 मतों से भी कम था। इसी तरह 2008 में 64 सीटों में ये अंतर 5,000 से कम था। इस बार के चुनाव में 11 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा 3,000 से भी कम मतों से हारी। देवरहिप्पारगी सीट पर तो भाजपा के प्रत्याशी सोमनगौड़ा बी पाटिल सिर्फ 90 मतों से हारे। अगर भाजपा को दक्षिण में पैर पसारने हैं तो स्पष्ट है उसे इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक सहयोगियों को संभाल कर रखना होगा।

भाजपा की हार-जीत का विश्लेषण तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेता करेंगे ही। लेकिन एक बात तो साफ है कि वो इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और उसने सिद्धारमैया को सत्ता से हटाया। लेकिन बूथ स्तर तक चुनाव प्रबंधन करने वाले अमित शाह को इस ओर ज्यादा ध्यान देना होगा कि कैसे लहरहीन चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित की जाए।

अब बात कांग्रेस की। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अपने संक्षिप्त संवाददाता सम्मेलने में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। हालांकि एक दिन पहले ही वो येदियुरप्पा के शपथग्रहण को लोकतंत्र की हत्या बता रहे थे और भारतीय सुप्रीम कोर्ट की तुलना पाकिस्तानी अदालतों से कर रहे थे। कर्नाटक में जो हुआ, वो भले ही लोकतंत्र की जीत हो, यहां असल में कांग्रेस की दोहरी हार हुई। एक तरफ तो सिद्धारमैया सरकार की विदाई हो गई तो दूसरी तरफ जेडी,एस से लगभग दोगुने विधायक होने के बावजूद कांग्रेस को जेडी, एस का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा। समझा जाता है कि कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला स्वयं राहुल ने किया। क्या अच्छा नहीं होता कि तुरत-फुरत फैसला करने की जगह वो पार्टी हित में कुमारास्वामी और उनके पिता एचडी देवेगौड़ा से स्थानीय नेताओं के साथ बात करते। भाजपा को बाहर रखने की जल्दी में उन्होंने अपने दल के हितों को ही कुर्बान कर दिया। चुनाव परिणाम आने से पहले ही उन्होंने राज्य में पांच साल शासन करने वाले सिद्धारमैया को दरकिनार कर दिया और सारी कमान दिल्ली के नेताओं को सौंप दी। अब सत्ता के बंटवारे में कांग्रेस को क्या मिलता है, ये देखना दिलचस्प होगा, लेकिन सियासी फैसले इतनी जल्दबाजी में नहीं लिए जाते। कुमारास्वामी ने एक बात तो बिल्कुल साफ कर दी है कि मुख्यमंत्री पद पर कोई समझौता नहीं हो सकता, पांच साल वो ही इस पद पर रहेंगे

राहुल के फैसले ने देश भर में कांग्रेस की छवि पिछलग्गू की बना दी। लगता है वो आगामी लोकसभा चुनावों तक जेडी,एस की मिन्नतें और चिरौरी कुछ वैसे ही करेंगे जैसे उत्तर प्रदेश में बबुआ अखिलेश यादव, बुआ मायावती की कर रहे हैं। बहुत से जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का पिछलग्गू बनने का फैसला राजनीतिक कारणों से कम और आर्थिक कारणों से ज्यादा था। एक अनुमान के अनुसार इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 7,000 से 10,000 करोड़ रूपए खर्च हुए, अगर ऐसे ही चला तो लोकसभा चुनावों में तो खर्च एक लाख करोड़ से ऊपर चला जाएगा। ऐसे में कांग्रेस को भी आय के स्थायी स्रोत की आवश्यकता होगी। भाजपा पहले ही आरोप लगाती रही है कि सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार कांग्रेस के बैंक के तौर पर काम कर रहे थे। शिवकुमार के लेनदेन की तो एक डायरी भी सामने आ चुकी है, जिसकी जांच जारी है। इस डायरी में पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं के नाम लिखे हैं।

बहरहाल कुमारास्वामी का पिछलग्गू बनने के राहुल गांधी के फैसले के राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं। इससे उनकी बारगेनिंग पाॅवर निश्चय ही कम हुई है। कर्नाटक में समर्पण के बाद क्षेत्रीय दल उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव तो उन्हें पहले ही कह चुके हैं कि वो विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं। कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने संकेत दिया कि अगर 2019 में कांग्रेस बड़े दल के रूप में उभरती है तो वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। सवाल ये है कि अगर कर्नाटक में बड़ा दल होने के बावजूद वो मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं ले सके तो प्रधानमंत्री पद कैसे लेंगे?

कांग्रेस के कुछ नेता राज्य में पार्टी की दोहरी हार के बावजूद गाल बजाने में जुटे हैं कि इसने 2019 के घटनाक्रम का संकेत दे दिया है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने। उन्हें समझना पड़ेगा कि भले ही भाजपा राज्य में सरकार न बना पाई हो, वो वहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और उसका वोट प्रतिशत भी सुधरा है। भाजपा के लिए असली चुनौती कर्नाटक में नहीं थी जहां उसके पास खोने को कुछ नहीं था, भाजपा की असली अग्नि परीक्षा तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में होगी जहां उसकी सरकारें हैं। अगर भाजपा यहां हारी तो ये कहना उचित होगा कि भाजपा की चुनौतियां बढ़ गईं हैं।

कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और सुविधाभोगी पत्रकारों को राहुल को चने के झाड़ पर चढ़ाना बंद करना चाहिए। ये लोग गुजरात के बाद भी राहुल की ‘नैतिक जीत’ का दावा करने लगे थे, जबकि हकीकत ये है कि नक्सलवाद, जातिवाद, इस्लामिक सपं्रदायवाद के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद वो वहां हारी थी। कांग्रेस ने लगभग यही नीतियां कर्नाटक चुनाव में भी अपनाईं। अलग झंडे के जरिए कन्नड़ स्वाभीमान जगाने की कोशिश की गई तो लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देकर हिंदुओं को विभाजित करने का प्रयास हुआ। यही नहीं आतंकवादी संगठन पापुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपीआई) का भी भरपूर इस्तेमाल हुआ। एसडीपीआई ने मुस्लिम मतों का विभाजन रोकने और कांग्रेस को जिताने के लिए अपने उम्मीदवार वापस लिए। यही नहीं मस्जिदों से फतवे जारी किए गए कि इस्लाम खतरे में है, इसे बचाने के लिए कांग्रेस को वोट दें। कांग्रेस के पक्ष में चर्च की तरफ से अपील जारी की गई।

कर्नाटक चुनाव से स्पष्ट है कि कांग्रेस इस्लामिक सांप्रदायिकता और तुष्टिवाद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। राहुल भाजपा को रोकने के लिए इतने डेस्परेट हो गए हैं कि अपनी पार्टी का भविष्य भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। स्पष्ट है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों के बारे में फिर से विचार करना पड़ेगा नहीं तो इस्लामिक ध्रुवीकरण की नीति उसे अगले लोकसभा चुनावों में फिर भारी पड़ेगी, भले ही वो कितना ‘टेम्पल रन’ खेल लें।

“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।

“कठुआ केसः बच्ची की लाश पर मोदी सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र” in Punjab Kesari

कठुआ मामले में मीडिया के एक बड़े वर्ग की भूमिका संदिग्ध ही नहीं निंदनीय भी रही। इस वर्ग ने इसकी कवरेज में जल्दबाजी ही नहीं, ज्यादती भी की। जिस तरह से मामले के तथ्यों से एक खास मकसद से छेड़छाड़ की गई या उन्हें जानबूझ कर छुपाया गया, वो बेहद आपत्तिजनक और भयावह है। कहना न होगा, इस घटना की कवरेज में मीडिया के इस वर्ग ने सारी सीमाएं लांघ दीं। सरेआम पीड़िता की तस्वीरें दिखाई गईं, उसका धर्म बताया गया, और तो और उसके कुछ फर्जी वीडियो भी सर्कुलेट करवाए गए। सारा मामला ये बनाया गया कि ‘दरिंदे हिंदू’ ‘अबला कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं का शीलहरण करते हैं और उनकी बच्चियों तक को नहीं छोड़ते’।

मीडिया के इस वर्ग ने तथ्यों की जांच पड़ताल की कोशिश ही नहीं की क्योंकि उसकी मंशा इसकी थी ही नहीं। इस वर्ग ने भारत से अमेरिका तक इस मसले को उछाला। एक न्यूज चैनल ने ‘एनफ इस एनफ’ (काफी हो गया) शीर्षक से मोदी सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। राहुल गांधी, उनकी बहन और जीजा आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च पर निकल पड़े। पाकिस्तान के हर न्यूज चैनल ने दिखाया कि देखो कैसे ‘अत्याचारी हिंदू’ ‘कश्मीर में मुसलमानों पर जुल्म’ ढा रहे हैं’। अनेक हवाई अड्डों में लोगों को ऐसी टीशर्ट पहने देखा गया जिन पर लिखा गया था कि अपनी बेटियों को भारत मत भेजो, वहां महिलाएं-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। इंग्लैंड के हाउस आॅफ लाड्र्स में पाकिस्तानी मूल के लाॅर्ड अहमद ने ये मामला उठाया तो अमेरिका में इसे लेकर प्रदर्शन किए गए। दिल्ली में स्वाती मालीवाल तो आमरण अनशन पर बैठ गईं।

इस विषय में मोदी सरकार की जितनी किरकिरी की जा सकती थी, की गई। वल्र्ड बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड तक ने भारत में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता जताते हुए मोदी सरकार को नसीहत दे डाली। बाॅलीवुड और हाॅलीवुड की अभिनेत्रियों ने प्लेकार्ड लेकर मोदी सरकार के खिलाफ ट्वीट जारी किए। मोदी सरकार ने महिलाओं और बच्चियों के लिए चार साल जो काम किए, उन्हें एक झटके में मिट्टी में मिलाने की कोशिश की गई। मोदी सरकार ने जिस ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की थी, उसकी धज्जियां उड़ाईं गईं और सरकार को महिला विरोधी करार दे दिया गया।

चैतरफा हमलों से घबराई केंद्र सरकार ने च्चियोें से बलात्कार करने वालों को मृत्युदंड देने वाला अध्यादेश पारित कर दिया। जबकि होना ये चाहिए था कि इस पूरे षडयंत्र की जल्दी से जल्दी जांच कराई जाती और षडयंत्रकारियों के नाम के साथ सच्चाई देश के सामने लाई जाती। ध्यान रहे जानीमानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों ने ही नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस अध्यादेश के प्रावधानों पर आपत्ति जताई।

अगर केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों या पत्रकारों के षडयंत्रकारी वर्ग ने इस मामले की तफ्तीश में थोड़ा सा भी समय और दिमाग लगाया होता तो, पता लग जाता कि इस विषय में जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा कठुआ के चीफ ज्यूडीशियल मेजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई चार्जशीट में कितने झोल हैं। चार्जशीट में सात लोगों के नाम दिए गए हैं जिनमें संाझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा और पांच पुलिस वाले शामिल हैं।

ध्यान रहे सांझीराम और उनके बेटे विशाल जंगोत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है कि वो बेगुनाह हैं। उन्होंने इस विषय में हलफनामा दायर कर कहा है कि जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच ने उनको फंसाया है। असली अपराधियों को पकड़ने और पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए जरूरी है कि इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा करवाई जाए। उन्होंने कहा कि इस मामले में मिथ्या और भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। खुद को पीड़िता का वकील कहने वाली दीपिका राजावत और उसका साथी तालिब हुसैन असल में ट्रायल कोर्ट में उसके वकील हैं ही नहीं, तब भी वो उसका वकील होने का दावा कर रहे हैं। यही नहीं वो हम पर उन्हें धमकाने का आरोप लगा रहे हैं जबकि धमकाया तो हमें जा रहा है। राज्य सरकार ने इन फर्जी लोगों को सुरक्षा भी उपलब्ध करवाई है, जिसे तुरंत हटाया जाना चाहिए। सांझीराम ने अपने हलफनामे में पुलिस वालों के चरित्र पर भी सवाल उठाए हैं। स्पेशल टास्क फोर्स में शामिल डीएसपी इरफान वानी के खिलाफ तो बलात्कार का मुकदमा चल रहा है। ज्ञात हो कि सांझीराम या उसके परिवार के खिलाफ राज्य के किसी भी थाने में कभी भी कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनका परिवार देशभक्ति से ओतप्रोत है और उनका एक बेटा तो जलसेना में नौकरी भी करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच की सांझीराम की मांग को अस्वीकार कर दिया है, लेकिन कहा है कि इसकी जांच जम्मू-कश्मीर से बाहर पठानकोट के जिला और सत्र न्यायाधीश करेंगे जिसकी निगरानी वो स्वयं करेगा। सुनवाई रोजाना होगी और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई नौ जुलाई को होगी। अदालत के फैसले से कठुआ के लोगों में मायूसी है, लेकिन उन्हें अब भी उम्मीद है कि पठानकोट की अदालत इस मामले की निष्पक्षता से सुनवाई करेगी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच के षडयंत्र को समझेगी और दूध का दूध और पानी का पानी करेगी।

कठुआ के लोगों की उम्मीद के पीछे एक नहीं अनेक कारण हैं। एक बार को हम मान भी लें कि सांझीराम और उनका बेटा विशाल जंगोत्रा झूठ बोल रहे हैं , तब भी इस मामले में और भी बहुत से ऐसे तथ्य हैं जो प्रथम दृष्टया ही ये स्पष्ट कर देते हैं कि ये पूरा मामला और इस बारे में दायर चार्जशीट कितनी फर्जी है। हम आगे बढ़ें इस से पहले बता दें कि घटना के समय विशाल के मेरठ में होने के सारे सबूत सामने आ चुके हैं, जिनमें वहां की वीडियो फुटेज भी शामिल है। यही नहीं विशाल के दोस्तों ने भी पुलिस पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उन्हें धमका कर विशाल के खिलाफ बयान लिए।

मृतक बच्ची के साथ सहानुभूति के साथ हम ये कहना चाहेंगे कि उसे न्याय मिले, लेकिन हम ये भी कहना चाहेंगे कि निर्दोष सांझीराम और उसके परिवार वालों को भी न्याय मिले और षडयंत्रकारियोें को सख्त से सख्त सजा दी जाए। हम इसे षडयंत्र क्यों कह रहे हैं इसके पीछे कई कारण और अनसुलझे सवाल हैं। इन पर आपको भी गौर करना चाहिए। इस मामले में दस दिन में तीन बार जांच टीम बदली गई, आखिर इसका क्या कारण है? एक ही तारीख को दो पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट क्यों दी गईं और दोनों में अलग-अलग तथ्य क्यों थे? कथित अपराधस्थल (देवस्थान) सील क्यों नहीं किया गया? आरोपियों ने पीड़िता को देवस्थान पर क्यों रखा जबकि वहां लगातार लोगों का आनाजाना था और चार्जशीट में जिन दिनों का उल्लेख किया गया है, उन दिनों वहां उत्सव भी मनाया जा रहा था? लाश सांझीराम के घर से महज 100 मीटर की दूरी पर मिली। अगर उन्होंने अपराध किया होता तो वो लाश को किसी गहरे नाले या घने जंगल में भी फेंक सकते थे, उन्होंने अपने घर के पास ही लाश क्यों फेंकी? चार्जशीट के अनुसार बच्ची से छह दिन तक सामूहिक बलात्कार हुआ, लेकिन पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट उसके गुप्तांग पर क्यों किसी चोट का जिक्र नहीं करती? चार्जशीट में बलात्कार के उल्लेख के बावजूद देवस्थान पर कहीं खून के निशान नहीं मिले, वहां मूत्र अथवा विष्ठा के निशान भी नहीं मिले, जबकि पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट कहती है कि मृतका की आंतों में पची हुई सामग्री थी, क्या ऐसा संभव है? किसने मृतका की तस्वीरें हाई रिसोल्यूशन कैमरे से खींचीं जो तमाम राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय एजेंसियों को भेजी गईं? छह दिन के कथित बलात्कार के बावजूद मृतका के पांव में जूते और सिर पर हेयरबैंड कैसे थे? ये कैसे हुआ कि पुलिस ने मृतका के कपड़ों को धोया और थाने में सुखाया? आरोप लगाया गया है कि मृतका को बेहोशी की दवा दी गई। छह दिन तक इस दवा का क्या असर था? चार्जशीट में उंगलियों और पैरों के निशान क्यों नहीं संलग्न किए गए?

ये घटना कठुआ के रसना गांव में हुई। उसके बाशिंदे कहते हैं कि 16 जनवरी 2018 की रात को गांव का मेन ट्रांसफाॅर्मर फंुक गया। इसकी वजह से पूरे गांव में बिजली नहीं थी। इस बीच रात को ढाई बजे कंबल ओढ़े दो आदमी बुलेट मोटरसाइकिल पर आए। वो आंधे घंटे बाद चले गए। ये संदिग्ध लोग कौन थे? पुलिस उनका पता क्यों नहीं लगा रही? आपको बता दें कि सात दिन गायब रहने के बाद पीड़िता की लाश 17 जनवरी को मिली।

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच और चार्जशीट में कितनी खामियां हैं। जाहिर है ये पूरी कहानी मनमाने तरीके से बिना उचित सबूतों के गढ़ी गई है। ये खामियां चीख-चीख कर कहती है कि इस पूरी घटना के पीछे साजिश है। जिस प्रकार पीड़िता की तस्वीर वायरल की गई, उसका नाम उजागर किया गया, देवस्थान को लांछित किया गया, उस से स्पष्ट है कि इस साजिश के पीछे मकसद सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना और हिंदुओं और भारत को लांछित करना था। जिस प्रकार पूरा घटनाक्रम हुआ और उसे भारत से पाकिस्तान और इंग्लैंड, अमेरिका तक उछाला गया, उससे साफ है कि सब कुछ पूर्वनियोजित था।

कहना न होगा इस पूरी साजिश में षडयंत्रकारी पत्रकारों ने सक्रिय भूमिका निभाई। जिन वकीलों और नेताओं ने इस फर्जी मामले के खिलाफ आवाज उठाई, उन्होंने उन्हें भी खलनायक बना दिया। इन वकीलों और नेताओं में कांग्रेस के लोग भी शामिल थे।

आपको बता दें कि इस मामले को आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) और उसकी राजनीतिक शाखा एसडीपीआई जोर-शोर से कर्नाटक चुनाव में उछाल रहे हैं। सनद रहे कि पीएफआई में प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के अनेक सदस्य प्रमुख पदों पर सक्रिय हैं और इसके बदनाम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी संबंध हैं। ये प्लेकार्ड ले कर घूम-घूम कर लोगों को बता रहे हैं कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म आती है। ये वहीं संगठन है जिसने गुजरात विधानसभा चुनावों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नक्सलियों के साथ मिलकर जिग्नेश मेवानी का समर्थन किया था और उसे धन उपलब्ध करवाया था। पीड़िता की फर्जी वकील दीपिका राजावत का भी जेएनयू के नक्सली सर्किट से घनिष्ठ संबंध है। ये पूरा वो टुकड़े-टुकड़े गैंग है जो नक्सलियों, कश्मीरी आतंकियों और अब जिन्ना के समर्थन में जेएनयू से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया तक ‘आजादी’ के नारे लगाता है और जिसके राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और सरकारी-गैरसरकारी संगठनों में एजेंट बैठे हुए हैं। इनका नेटवर्क किसी भी मुद्दे को बहुत कम समय में दुनिया भर में फैला सकता है। जाहिर है इनके अनेक भारत विरोधी खुफिया एजेंसियों से भी घनिष्ठ संबंध हैं।

ये वही गैंग है जिसकी सरपरस्ती में अनुच्छेद 370 के बावजूद जम्मू में रोहिंग्या लोगों को बसाया गया है और जिसके वकील इनके लिए सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ते हैं। अब इनका निशाना है बकरवाल समुदाय जिसकी पीड़िता एक सदस्य थी। ये समुदाय देशभक्त माना जाता है और श्रीनगर के कट्टरवादी वहाबियों से दूर रहता है। ये पूरा षडयंत्र कहीं न कहीं इस समुदाय को हिंदुआंे से दूर करने और रेडिकालाइज करने का भी है ताकि वो घाटी के इस्लामिक दलों को वोट दें।

देश में जब से मोदी सरकार आई है, ये गैंग तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर दलितों और मुसलमानों को उसके खिलाफ भड़काने के लिए सोचे-समझे तरीके से काम कर रहा है। ये पूरी कोशिश कर रहा है कि दलितों को नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों के संगठनों से जोड़ा जाए। आपको रोहित वेमूला, अखलाक, जुनैद, पशु तस्करों, मध्य प्रदेश में पुलिस भर्ती के दौरान उम्मीदवारों की छाती पर जाति लिखने, जेएनयू, जादवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आदि के विवाद अवश्य याद होंगे जिनमें इस गैंग ने भारत की लचर कानून व्यवस्था और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का नाजायज लाभ उठा कर, मोदी सरकार और देश को अंतरराष्ट्री स्तर पर बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडा।

इस गैंग की निशानी ये है कि ये सिर्फ मुसलमानों या दलितों के मामलों में व्यथित होता है। हिंदुओं पर अगर कोई अत्याचार करे तो इसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस मामले में सीबीआई जांच की मांग खारिज कर दी हो, मगर सरकार को इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। ये सिर्फ पीड़िता को न्याय दिलवाने के लिए ही नहीं, भारत का सम्मान बहाल करने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अब सरकार को सिर्फ कठुआ मामले की ही जांच नहीं करनी चाहिए, उन लोगों को भी पकड़ कर हमेशा के लिए जेल में डालना चाहिए जिन्होंने इसे तोड़-मरोड़ के दुनिया के सामने भारत को कलंकित किया। इस पूरे षडयंत्र में अनेक स्वनामधन्य पत्रकार भी शामिल हैं। सरकार को इनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

“पाकिस्तानी सेना के जुल्मों की दास्तान बयान करता है पश्तून तहाफुज मूवमेंट” in Punjab Kesari

पाकिस्तान आजकल एक सियासी तूफान का सामना कर रहा है जिसका नाम है – पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) यानी पश्तून सुरक्षा आंदोलन। इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं दक्षिण वजीरिस्तान के 26 साल के जोशीले नेता मंजूर पश्तीन। पश्तून मानवाधिकारों की बात करने वाला ये आंदोलन असल में शुरू हुआ 2014 में ‘महसूद तहाफुज मूवमेंट’ के नाम से। महसूद एक पश्तून कबीले का नाम है और मंजूर भी इसी से जुड़े हैं। इस आंदोलन का आधार है फेडरली एडमिनिस्टरड ट्राइबल एरिया (फाटा) और खैबर पख्तूनख्वा।

मंजूर पश्तीन ने ये आंदोलन क्यों शुरू किया इसकी वजह समझना भी जरूरी है। मंजूर गरीब परिवार से संबंध रखते हैं और उनके पिता अब्दुल वद्दूद महसूद उनके पैतृक गांव सरवाकाई में अध्यापक हैं। वर्ष 2009 में तालीबानी आतंकियों के खिलाफ सेना के आॅपरेशन राह-ए-निजात के कारण हजारों अन्य पश्तून परिवारों की तरह उनके परिवार को भी घर छोड़ कर शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार इस वर्ष पश्तून बेल्ट के करीब चार लाख लोगों को घर छोड़ना पड़ा, लेकिन सहायता संस्थाओं की मानें तो असल संख्या कई गुना ज्यादा थी। मंजूर के परिवार को इस उथल-पुथल में चार बार घर बदलना पड़ा। जब ये लोग घर लौटे तो सब लुट चुका था, सब ओर तबाही का मंजर था, कदम कदम पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और सेना का कड़ा पहरा था।

इस बीच उन्होंने पशुचिकित्सा में स्नातक की डिग्री भी ली। शिक्षा के बाद उन्होंने समाजसेवा के बारे में सोचा और महसूद तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) की शुरूआत की। चारों और फैली बारूदी सुरंगों के बीच जाहिर है उन्होंने जो पहला काम चुना वो था बारूदी सुरंगें हटाना।

वर्ष 2018 के आरंभ में ये आंदोलन एक नई शक्ल में उभरा जब इसने पश्तून माॅडल नकीबुल्ला मेहसूद की न्यायेतर हत्या के विरोध को अपना लक्ष्य बनाया। मेहसूद को कराची में एक फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया गया था। मेहसूद की हत्या के विरोध में 26 जनवरी को एक मार्च का आगाज डेरा इस्माइल खां से हुआ और ये पश्तून बहुल पेशावर, मरदान, स्वाबी होता हुआ इस्लामाबाद में धरने के रूप में समाप्त हुआ। शुरू में तो इसने सिर्फ मेहसूद की हत्या का मामला उठाया, लेकिन जल्दी ही उन हजारों पश्तून परिवारों ने भी इसमें अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी जिनके घर के सदस्य सेना के अभियानों में या तो मारे गए थे या गायब हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार 8,000 से भी ज्यादा लोग सैन्य अभियानों के दौरान बिना किसी कानूनी कार्रवाई के उठाए गए। जल्दी ही पाक सेना से त्रस्त बलूच लोगों ने भी पीटीएम में शिरकत शुरू कर दी। बहरहाल पीटीएम के इस्लामाबाद धरने को आॅल पश्तून नेशनल जिरगा का नाम दिया गया। जिरगा में मेहसूद की हत्या और पश्तूनों पर होने वाले अत्याचारों की भत्र्सना की गई। जिरगा का अर्थ है प्रतिनिधियों की बैठक।

जिरगा में मांग की गई कि सरकार नकीबुल्ला और पुलिस एनकाउंटर में मारे गए अन्य पश्तूनों की हत्या की न्यायिक जांच करवाए, नस्लीय भेदभाव और दुराग्रह वाले कानून समाप्त हों, गुमशुदा पश्तूनों को अदालतों में पेश किया जाए ताकि निर्दाेष लोगों को पहचान कर रिहा किया जा सके। जिरगा ने सेना से ये गारंटी देने की मांग की कि वो कबाइली इलाकों में खोजी अभियान के दौरान और चेकपोस्टों पर लोगों को परेशान नहीं करेगी, उनका अपहरण नहीं करेगी और गोली नहीं चलाएगी और न ही हिंसा करेगी। यही नहीं वो पूरे के पूरे गांव/ कबीले को सामूहिक सजा भी नहीं देगी और छोटी-मोटी घटनाओं के बावजूद कफ्र्यू नहीं लगाएगी। कबाइली इलाकों से बारूदी सुरंगें हटाने की मांग भी की गई जिनकी वजह से अनेक निर्दोष लोग जान से हाथ धो चुके हैं। कुल मिलाकर मांग ये थी कि लोगोें के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल किए जाएं और उन्हें शांति से जीने दिया जाए।

इस्लामाबाद का धरना 10 फरवरी को तब समाप्त हुआ जब प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार इंजीनियर आमिर मुकाम ने उन्हंे प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की तरफ से एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि सरकार नकीबुल्ला की हत्या करने वाले पुलिस अधिकारी राव अनवार को पकड़ेगी, दक्षिण वजीरिस्तान से बारूदी सुरंगें हटाने का काम तेज किया जाएगा, नकीबुल्ला मेहसूद के नाम से इंटरमीडिएट काॅलेज बनाया जाएगा और जिरगा सदस्यों द्वारा उठाई गई वास्तविक समस्याओं को हल किया जाएगा। मुकाम ने उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तारीफ की और कहा कि वो जब चाहें अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए उनसे मिल सकते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ ही पीटीएम नेता सेना के अधिकारियों से भी मिले और उन्हें भी अपनी समस्याओं से अवगत करवाया।

सरकार ने जिरगा से वादे तो बहुत किए लेकिन निभाया एक भी नहीं। प्रदर्शनकारियों ने भी मुकाम को कह दिया था कि यदि सरकार वादे निभाने में असफल रहेगी तो वो प्रदर्शन जारी रखेंगे। इसके बाद पीटीएम ने कई मार्च निकाले और फिर 22 मार्च को लाहौर और आठ अप्रैल को पेशावर में बड़े प्रदर्शन किए। 22 अप्रैल को पीटीएम ने लाहौर में एक बार फिर रैली की। पीटीएम 12 मई को कराची में एक विशाल रैली की योजना बना रहा है। इसमें अल्ताफ हुसैन के मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के लोग भी शामिल हो सकते हैं। यानी सेना के सताए बलूच ही नहीं, कराची के मुहाजिर भी इसके साथ आ रहे हैं।

पश्तूनों के इस आंदोलन को पाकिस्तान के वाम दलों सहित अनेक राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं। लेकिन सेना इसकी बढ़ती लोकप्रियता से खौफजदा है और उसने मीडिया में इसकी कवरेज पर रोक लगा दी है। अब इनपर आरोप लगाया जा रहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ और अन्य बाहरी ताकते इन्हें पैसा दे रही हैं जो सरासर गलत है। इनके साथ लाखों लोग हैं, आखिर कोई तो वजह होगी जिसके कारण ये लोग इनसे जुड़े हैं।

कहना न होगा, ये वजह है फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में सेना के दमनकारी अभियान। पहले तो सेना ने अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए इस इलाके में बड़ी संख्या में लोगों को इस्लाम के नाम पर रेडिकलाइज किया और उन्हें हथियार थमा दिए। सोवियत रूस तो चला गया और अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार भी बन गई, लेकिन 9/11 के बाद हालात बदले और पाकिस्तानी सेना प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज मुशरर्फ ने आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष का साथ देने का फैसला किया। जाहिर है, पहले जो लोग पाकिस्तान के दोस्त थे, उनमें से अनेक दुश्मन बन गए। हाल ही में पाकिस्तानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो के प्रमुख और पूर्व न्यायाधीश जावेद इकबाल ने नेशनल असंेबली की मानवाधिकारों की स्थायी समिति के सामने सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने परवेज मुशरर्फ पर आरोप लगाया कि उन्होंने कम से कम चार हजार पाकिस्तानी नागरिकों को गुप्त आदान-प्रदान के तहत करोड़ों डाॅलरों की एवज में अमेरिका को बेचा। जावेद इकबाल का बयान ऐसे समय आया है जब पीटीएम गुमशुदा पश्तून लोगों को अदालत में हाजिर करने की मांग जोर-शोर से कर रहा है। ये कहीं न कहीं उनकी आशंकाओं को बल भी देता है।

वर्ष 2007 में एक बड़ा बदलाव तब हुआ जब परवेज मुशरर्फ ने लाल मस्जिद पर हमला किया। इससे नाराज कट्टरवादियों ने तहरीके तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) का गठन किया। इन्होंने पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ युद्ध का एलान किया और सेना का जीना दुश्वार कर दिया।

पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल के हादसे के बाद लोगों को लगा कि अब काफी हो गया और इन्हें खत्म करना ही होगा। पाकिस्तानी सेना ने इसके लिए बड़ा अभियान चलाया। वहां की नेशनल काउंटर टेरररिज्म आॅथोरिटी की 40 पन्ने की रिपोर्ट के मुताबिक टीटीपी के सफाए के दौरान 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। दो लाख से ज्यादा काॅंबिंग आॅपरेशन हुए, चार लाख से ज्यादा लोगों को रोक कर उनकी तफ्तीश की गई। 6,998 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। 2,500 आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया गया। 19,530 लोगों को विभिन्न आधारों पर गिरफ्तार किया जैसे भड़काऊ भाषण या सामग्री बांटना, जनता को बगावत के लिए उकसाना आदि। 18,790 मामले लाउड स्पीकर के गलत इस्तेमाल के दर्ज किए गए। 1.5 अरब रूपए टेरर फंडिंग के रोके गए। 5,089 बैंक खाते फ्रीज किए गए। 65 संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डाला गया। इनमें से चार संस्थाएं अब भी निगरानी में हैं। 2,052 लोगों पर पाबंदी लगाई गई और उनकी विदेश यात्रा पर रोक लगा दी गई। आतंक फैलाने के आरोप में 1,447 यूआरएल ब्लाॅक किए गए।

दर्ज मामलों की संख्या के लिहाज से पंजाब सबसे आगे है जहां 68,957 लोगों का नाम संभावित आतंकियों के रूप में डिजिटल डेटाबेस मे शामिल किया गया। जिन 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया है, उनमें से 400 पंजाब के हैं। लेकिन सनद रहे सबसे ज्यादा दमनकारी सैन्य अभियान फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में चलाए गए।

जैसे-जैसे देश में आतंकवाद बढ़ा, उसका सामना करने के लिए समाज का सैन्यीकरण भी किया गया। हर जगह कंटीले तार लगाए गए, कदम-कदम पर चेकपोस्ट बनाए गए, सशस्त्र सैनिकोें, पुलिसवालों की तैनाती की गई। इससे आतंकवाद कम भी हुआ। 2010 में जहां 2,060 आतंकी हमले हुए, वहीं 2017 में 681 हमले हुए। आतंकी हमलों में कमी आई, लेकिन सैन्यीकरण वैसे का वैसा ही रहा। अब भी उतनी ही तलाशियां, तफ्तीशें और गिरफ्तारियां हो रहीं हैं, उतने ही छापे पड़ रहे हैं। लेकिन लोग इससे ऊब चुके हैं। वो अब चाह रहे हैं कि हालात सामान्य हों। अब और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं है। संविधान में दिए गए हक उन्हें फिर मिलें। वो चाहते हैं कि आतंकवाद में जो कमी आई है, उसका फायदा उन्हें भी मिले, उन्हें सिर्फ कुर्बानी ही क्यों देनी पड़े? राहत भी मिले।

स्पष्ट है पीटीएम सेना द्वारा सताए गए लोगों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। तभी इनकी रैलियों में सेना के खिलाफ नारे भी लगाए जाते हैं। लोग कहते हैं – ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। इन्हें राहत मिलनी ही चाहिए। आतंकी घटनाएं अगर कम हुईं हैं तो चेकपोस्ट भी कम होने ही चाहिए। बारूदी सुरंगें भी हटाई जानी चाहिए। आतंकवादियों से निपटने के लिए जो सैन्य अदालतें या आतंकविरोधी अदालतें बनाई गईं हैं, उन्हें भी खत्म होना ही चाहिए। बाकी बचे मामलों को सामान्य अदालतों में निपटाया जाना चाहिए।

पीटीएम में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके परिवार वालों को महज शक की बिना पर पकड़ा गया। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिन्हें पुलिसवालों ने व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण आतंकविरोधी मामलों में फंसा दिया। इसी प्रकार अनेक मामले पारिवारिक झगड़ों, संपत्ति या ट्रेड यूनियनों के थे, लेकिन उन्हें भी आतंकविरोधी कानूनों के दायरे में डाल दिया गया। स्पष्ट है आतंकविरोधी कानून लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर डाका डाल रहें हैं, इन्हें समाप्त होना ही चाहिए।

लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तानी सेना पश्तूनोें की मांग को लेकर गंभीर है। उसका दमनकारी रवैया अब भी जारी है। इसके पीछे कारण ये है कि उसके दिल में खोट है। उसे पता है कि पश्तूनों के दिलों में जो घाव हैं, वो उसी ने दिए हैं। अब सेना के पास मौका है कि वो पुराना ढर्रा छोड़, आंदोलन को कुचलने की जगह सहानुभूतिपूर्वक लोगों के आक्रोश का कारण समझने की कोशिश करे और देश में बढ़ते अलगाववाद पर लगाम लगाए। उधर पश्तूनों की गहरी नाराजगी के बावजूद मंजूर पश्तूनी कहते हैं कि उनका कोई अलगाववादी लक्ष्य नहीं है। उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है और अहिंसक ही रहेगा। वो चाहते हैं कि फाटा और पख्तूनख्वा को पंजाब जैसे ही लोकतांतित्रक अधिकार और सम्मान मिले और वहां के लोग भी संगीनों के साए से परे सामान्य जीवन जी सकें।

पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार लोगों के दिल पर मलहम लगा सकती थी, लेकिन उसके सामने भी सीमाएं हैं। एक तो वो सेना का विरोध नहीं कर सकती, दूसरे उसका कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है। ऐसे में ये आंदोलन क्या शक्ल अख्तियार करेगा, अभी कहना मुश्किल है। पर एक बात तो तय है कि इसने सेना के जुल्मो सितम के खिलाफ लोगों के दिलों में जो चिंगारी फूंकी है, उसे अब बुझाना मुश्किल होगा।

“मोदी की विश्वदृष्टि की बानगी है उनकी विदेश नीति” in Punjab Kesari

काॅमनवेल्थ हेड्स आॅफ गाॅरमेंट मीटिंग (चोगम) में भाग लेने लंदन गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘भारत की बात सबके साथ’ नामक एक कार्यक्रम में अनेक विषयों पर लोगों के सवालों के जवाब दिए। ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित सेंट्रल हाॅल वेस्टमिंस्टर में आयोजित इस कार्यक्रम उन्होंने अपनी विदेशनीति के बारे में भी विस्तार से बात की।

मोदी ने कहा कि लोग आशंका जताते थे कि एक राज्य का मुख्यमंत्री भारत की विदेशनीति कैसे संभालेगा, लेकिन उन्होंने सभी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान जब लोगों ने उनकी विदेश नीति के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वो किसी देश से न नजर नीची करके बात करने में विश्वास रखते हैं, न उठा कर, हम नजर मिला कर बात करने में यकीन रखते हैं। अब मोदी को सरकार में आए लगभग चार साल बीत गए हैं, और उनकी विदेश नीति में ये स्वाभिमान स्पष्ट तौर पर नजर आता है।

उनके नेतृत्व में भारत ने अपने हितों की बुनियाद पर सभी देशों से बात की, भले वो परस्पर दुश्मन ही क्यों न हों। मोदी एक ओर तो इस्राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने तो दूसरी ओर वो फिलिस्तीन भी गए। इसी प्रकार अगर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मौहम्मद अब्बास भारत आए तो इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू भी आए। मोदी ने दोनों देशों को अलग-अलग करके देखा और दोनो के महत्व और अपेक्षाओं को स्वीकार किया। फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंधों की बानगी तब देखने को मिली जब भारत ने पाकिस्तान में उसके राजदूत वलीद अबू अली के आतंकी हाफिज सईद के साथ मंच साझा करने पर आपत्ति जताई और फिलिस्तीनी राष्ट्रपति ने उन्हें एक झटके में पाकिस्तान से वापस बुला लिया।

मोदी ने ‘भारत की बात, सबके साथ’ कार्यक्रम में अपनी इस्राइल यात्रा का जिक्र करते हुए पूछा कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री पिछले 70 साल में वहां क्यों नहीं गया? तो इसका सीधा उत्तर है पहले की सरकारों द्वारा भारत की विदेशनीति को सांप्रदायिक रंग में रंगना। पूर्ववर्ती सरकारों ने इस्राइल से राजनयिक संबंध तो बनाए पर प्रधानमंत्रियों ने वहां जाने का साहस नहीं किया क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे मुस्लिम नाराज हो सकते हैं। कहना न होगा इस मुस्लिम फैक्टर ने पाकिस्तान को भी शह दी जिसने भारत में आतंकी जाल फैलाया और सीमा पर हमारे हजारों जवान मरवाए।

बहरहाल, अगर मोदी अगर सउदी अरब गए तो ईरान भी गए। मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्थलांे मक्का और मदीना का घर होने के कारण सउदी अरब भारतीय मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ईरान के साथ भी भारत के हजारों साल से सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं और वो भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी आवश्यक है। अमेरिका, सउदी अरब और इस्राइल, ईरान के जानी दुश्मन बने हुए हैं, लेकिन भारत ने वहां रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह का निर्माण किया है और जलअवरूद्ध अफगानिस्तान के लिए नए व्यापारिक और सामरिक रास्ते बनाए हैं। फिलहाल ईरान में भारत से ज्यादा चीन का निवेश है, लेकिन भारत ने भी तय कर लिया है कि वो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस देश से हर हालत में संबंध कायम रखेगा जो मध्य एशिया के अनेक तेल और प्राकृतिक गैस समृद्ध देशों से व्यापार की महत्वपूर्ण धुरी है।

मोदी के आने से पहले सरकारें लगातार शक्तिशाली होते जा रहे चीन के खिलाफ बोलने से कतराती थीं। हालत ये हुई कि चीन ने धीरे धीरे हमारे सभी पड़ोसी देशों में घुसपैठ कर ली। आज ये कहा जाए तो ज्यादती नहीं होगी कि मालदीव, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार पूरी तरह उसके कब्जे में हैं। मालदीव में जब चीन समर्थक ताकतों ने तत्कालीन राष्ट्रपति मौहम्मद नाशिद का तख्ता पलट किया तो भारत मूक दर्शक बना देखता रहा।

यही हाल नेपाल में हुआ, जब चीन समर्थक माओवादी हजारों की तादाद में नेपाली लोगों की हत्या कर रहे थे, भारत अहस्तक्षेप की नीति के तहत चुप रहा जिसका नतीजा ये हुआ कि आज नेपाल में उनकी सरकार है और भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस हाशिए पर है। ये बात अलग है कि मोदी ने इस सरकार के साथ भी कामकाज करने का फैसला किया है। इसके पीछे मुख्यतः तीन कारण हैं – 1) नेपाल भारत का पड़ोसी देश ही नहीं, घनिष्ठ सांस्कृतिक सहयोगी भी है, नेपाल के लाखों लोग भारत में काम करते हैं, भारत और नेपाल का रोटी-बेटी का रिश्ता है, 2) उससे सुरक्षा की दृष्टि से भी बातचीत जरूरी है क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वहां ठिकाने बना रखे हैं जिनका भारत के विरूद्ध इस्तेमाल होता है, कल को अगर चीन, नेपाल का सैन्य उद्देश्य से इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो भारत को भी नेपाल में सहयोगियों के साथ रणनीति बनाने और विरोध जताने की आवश्यता होगी 3) चीन सार्क देशों का इस्तेमाल भारत में अपने माल की डंपिंग के लिए कर रहा है, इसे रोकने के लिए भी भारत को नेपाल के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना होगा।

ध्यान रहे कुछ दिन पहले नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत आए थे और अब मोदी भी नेपाल जाने वाले हैं। इस बीच नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार चीन गए जहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भारत-नेपाल-चीन आर्थिक गलियारे का प्रस्ताव किया। भारत ने हिमालय निकलने वाले इस गलियारे पर अभी कोई सहमति नहीं दी है। भारत, पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करता रहा है क्योंकि वो पाक अधिकृत कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है और इस गलियारे को अपनी संप्रभुता में दखलअंदाजी। जाहिर है ऐसे में इस नए प्रस्ताव के सभी पहलुओं और परिणामों पर सोच विचार करके ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

उधर पाकिस्तान और म्यांमार में चीन किस हद तक घुसपैठ कर चुका है, ये किसी से छुपा नहीं है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के साथ ही म्यांमार में भी संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। चीन बांग्लादेश में भी जगह बनाने की भरपूर कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार वहां भी सामंजस्य कायम करने की पूरी कोशिश कर रही है। बांग्लादेश में तो विपक्षी नेता खालिदा जिया का पुत्र तारिक जिया चीनी हथियारों के साथ पकड़ा गया था जिन्हें पूर्वोत्तर भारत के आतंकियों को सप्लाई किया जाना था।

जहां तक स्वयं चीन की बात है, मोदी सरकार ने उसे भी स्पष्ट कर दिया है कि वो उसके दबाव में नहीं आएगी। डोकलाम विवाद पर भारत की दृढ़ता इसका सबूत है। मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक बातचीत के लिए 27-28 अप्रैल को चीन में होंगे। समझा जाता है कि इससे डोकलाम विवाद के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी को कम करने में मदद मिलेगी और सीमा विवाद सहित अन्य आपसी मुद्दों को हल करने की दिशा में नए कदम उठाए जाएंगे। बातचीत अच्छी बात है, लेकिन भारत को जमीन वास्तविकताओं को भी नजरअंजदाज नहीं करना चाहिए। आज चीन के पास बेशुमार पैसा है। वो विभिन्न देशों में अपनी हित सिद्धी के लिए पैसे के दम पर स्थानीय नेताओं को खरीदता है और सरकारों का तख्ता पलट करवाने की कोशिश करता है और अक्सर कामयाब भी होता है। भारत में भी कुछ नेताओं की चीन से करीबी को संदिग्ध दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हम भले ही चीन के साथ नजर मिला कर बात करें पर ये भी ध्यान रखें – घर का भेदी लंका ढाए। भारत में कम्युनिस्टों-नक्सलियों और विभिन्न आतंकी संगठनों को चीनी मदद को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

मोदी ने न सिर्फ पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाने की कोशिश की है, विश्व पटल पर भी नए शक्ति समीकरण तलाश किए हैं। उन्होंने न केवल अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड आदि के साथ रणनीतिक संबंधों को दृढ़ किया है, बल्कि उनके साथ रणनीतिक साझेदारी भी विकसित की है। उन्होंने आॅस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ मिल कर स्ट्रैटेजिक क्वाड्रिलेटरल (रणनीतिक चतुर्भज) बनाने की नींव रखी है। यही नहीं व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध आसियान देशों के साथ संबंधों को पुनर्जीवित किया है। आपको याद होगा गणतंत्र दिवस समारोह में आसियान के दसों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था। मोदी ने भारतीय विदेश नीति में लंबे अर्से तक उपेक्षित रहे अफ्रीकी देशों पर भी ध्यान केंद्रित किया। चीन वहां लंबे अर्से से चुपचाप काम कर रहा था और जिबूती में तो उसने अपना सैन्य अड्डा भी बना लिया था। मोदी सरकार ने इन देशों के साथ भागीदारी की नए सिरे से नींव रखी और भारत में इनके राष्ट्राध्यक्षों के विशाल सम्मेलन भी किए।

मोदी सरकार ने प्रयास किए कि विदेशनीति को देश की समृद्धि और व्यापार वृद्धि का जरिया भी बनाया जाए। आपको याद होगा कि इस बार जब चेन्ई में डिफेंस एक्सपो हुई तो उससे पहले दुनिया भर में भारतीय दूतावासों के सुरक्षा संबंधी अधिकारियों को बुला कर खास ब्रीफिंग दी गई। उन्हें हथियार बनाने वाली भारतीय कंपनियों और संबंधित अधिकारियों से बातचीत करने के लिए प्रेरित किया गया ताकि वो जिन देशों में तैनात हैं वहां भारतीय हथियारों के लिए बाजार ढूंढ सकें। लेकिन यहां ये कहना आवश्यक है कि अगर व्यापार में चीन से टक्कर लेनी है तो उसके तौर तरीकों को समझना और जरूरत पड़े तो अपनाना भी होगा। व्यापार में कोरे आदर्शवाद और नैतिकता से काम नहीं चलता।

मोदी ने भारत के व्यापारिक, सामरिक और रणनीतिक हितों के संवर्धन के लिए जी-20, ब्रिक्स, एससीओ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भरपूर इस्तेमाल किया। यही नहीं लगभग मृतप्राय पड़े काॅमनवेल्थ में भी जान फूंकने की कोशिश की। इंग्लैंड में हुए ताजा काॅमनवेल्थ शिखर सम्मेलन में उन्होंने सदस्य देशों को प्रेरित किया कि वो इसके परंपरागत ढांचे से बाहर निकल इसे आपसी समृद्धि का औजार बनाएं। उन्होंने ब्रिटेन के साथ भी नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए और पहली बार इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक सहयोग और समुद्री आवाजाही की आजादी पर खुलकर चर्चा की। इसे दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीतियों के विरूद्ध सहयोग के लिए सहमति समझा जा सकता है।

अगर ये कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोदी ने भारत की विदेशनीति का सही मायनों में गुटनिरपेक्ष बनाया। इस गुटनिरपेक्षता का आधार राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि देशहित है। यही वजह है कि आज भले ही अमेरिका और रूस में तनातनी चरम पर हो, भारत के दोनों से बेहतर संबंध हैं, आज भले ही चीन हमें घेरने में लगा हो, हम उसके साथ फिर से सैन्य अभ्यास करने के लिए तैयार हैं, अमेरिका ने जब उत्तर कोरिया को अपना दुश्मन नंबर एक करार दिया तब भी हमने उससे अपने राजनयिक संबंध तोड़े नहीं। अच्छी बात ये है कि आज सभी बड़े देश ये समझ गए हैं कि मोदी सरकार वही करेगी जो उसके देशहित में होगा, इसलिए उसे अपने हिसाब से चलाने की जगह बेहतर है, भारत के उभरते बाजार में अपने पांव जमाओ और समृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ो।

मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में भारत ने दुनिया के लगभग सभी देशों से संबंधों को पुनर्जीवित और प्रगाढ़ किया है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किए गए हैं। हर देश और हर प्रयास की चर्चा तो असंभव है, लेकिन संक्षेप में कहें तो ये मोदी की विश्वदृष्टि है जिसके कारण आज भारत किसी राजनीतिक विचारधारा के कारण नहीं, बल्कि व्यापारिक, सामरिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक कारणों से तीसरी दुनिया की आवाज के तौर पर उभर रहा है। अंत में एक सवाल आपसे – आज दुनिया के कितने देश 21 जून को एक साथ योग दिवस मनाते हैं?

“वहाबी आतंक पर शहजादे सलमान की स्वीकारोक्ति स्वागतयोग्य लेकिन कई सवाल बाकी” in Punjab Kesari

सउदी अरब का वली अहद या क्राउन प्रिंस घोषित होने के बाद वैसे तो शहजादे मौहम्मद बिन सलमान अपने सामाजिक सुधारों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कथित संघर्ष के लिए लगातार सुर्खियों में रहे। लेकिन अपनी पहली अमेरिका यात्रा में उनके बयानों की कुछ ज्यादा ही चर्चा हो रही है और जैसे वो बयान हैं, उन पर बहस होना लाजमी भी है।

अमेरिका में शहजादे के विवादास्पद बयानों पर चर्चा से पहले एक नजर उनके सामाजिक सुधारों पर। सउदी में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत दिए जाने पर तो बहुत सुर्खियां बनीं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वहां महिलाओं को पुरूषों की अनुमति के बिना भी व्यापार शुरू करने की इजाजत दी गई है। वहां इतिहास में पहली बार एक महिला को स्टाॅक एक्सचेंज का प्रमुख नियुक्त किया गया है। अब सउदी महिलाएं तलाक के बाद बिना किसी मुकदमे के तुरंत अपने बच्चों की कस्टडी ले सकती हैं। पिछले साल दिसंबर में वहां पहली बार किसी महिला का संगीत कार्यक्रम हुआ। इस वर्ष जनवरी में जेद्दाह के एक खेल स्टेडियम में पहली बार महिलाओं को प्रवेश दिया गया। 35 वर्ष बाद सउदी में एक फिर सिनेमाहाॅल शुरू होंगे। वहां धार्मिक पुलिस बहुत शक्तिशाली है। शहजादे ने उसके अधिकार कम करने के लिए भी जोरदार लाॅबिंग की।

परंपरागत सोच से बाहर जा कर उन्होंने महिलाओं के प्रति जो उदारता दिखाई, उससे स्पष्ट लगने लगा है कि शहजादे देश के कट्टरवादी समाज को एक नई दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं। उनकी सोच भविष्योन्मुखी और समताकामी है, लेकिन ये भी सच है कि सदियों से कबिलाई सोच में बंद सउदी समाज को अभी इस दिशा में लंबा रास्ता तय करना है।

बहरहाल अब हम उनकी अमेरिका यात्रा पर आते हैं जहां उनके बयानां ने दुनिया को एक बदलते सउदी अरब से परिचित करवाया। जब उनसे सउदी द्वारा वित्तपोषित और प्रचारित वहाबी इस्लाम के बारे में पूछा गया जिसका उनके देश में अनुसरण किया जाता है और जिसे दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के लिए जिम्मेदार माना जाता है, तो उन्होंने कहा, “शीतयुद्ध के दौरान जब सहयोगी देशों ने कहा कि हम अपने संसाधन मुस्लिम देशों में सोवियत रूस का विस्तार रोकने में लगाएं, तब हमने विदेशों में मदरसों और मस्जिदों में निवेश शुरू किया। एक बार ये कार्यक्रम शुरू तो हो गया, लेकिन आने वाली सरकारें इस पर नियंत्रण न रख सकीं। हमें इस पर लगाम लगानी है। आजकल ऐसे कामों के लिए सरकार से ज्यादा पैसा सउदी फाउंडेशनों द्वारा दिया जाता है।

ये शायद पहली बार है जब सउदी अरब के शाही परिवार के किसी व्यक्ति ने इतनी साफगोई से ये माना कि वहाबी इस्लाम और इस्लामिक आतंकवाद के प्रसार में उसका प्रमुख हाथ रहा है। शहजादे सलमान के इस बयान के बाद पूरे इस्लामिक जगत में भूचाल आ गया। इसकी दो खास वजहें थीं। एक तो ये कि इस बयान ने दुनिया भर की इस्लामिक आतंकी तंजीमों को कठघरे में खड़ा कर दिया। अब तक वो अपने आतंकी रवैये को यह कह कर सही ठहराती रहीं हैं कि वो तो मुसलमानों पर पश्चिम के इसाई देशों की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं और उनका तथाकथित जिहाद बिल्कुल जायज है। दूसरा ये कि इस बयान ने आतंकी तंजीमों की फंडिंग पर सवाल खड़ा किया और ये भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस मद में दिए जा रहे धन पर लगाम लगाई जाएगी। ये सउदी धन पर पलने वाले वहाबी मदरसों और मस्जिदों के लिए बिलाशक बुरी खबर है।

कुछ कट्टरवादी इसे डोनाल्ड टंªप के सामने समर्पण मानते हैं क्योंकि ट्रंप ने न केवल इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को चुनावी मुद्दा बनाया, अपितु सत्ता में आने के बाद इसके खिलाफ ठोस कदम भी उठाए। लेकिन सच ये भी है कि शहजादे सलमान खुद अब इस प्रतिकामी सोच से अपने देश को बाहर लाना चाहते हैं और इस ओर कदम भी उठा चुके हैं। उन्हें लगता है कि यदि सउदी को तेल आश्रित अर्थव्यवस्था से परे जाना है तो उन्हें पश्चिमी देशों से बेहतर तालमेल करना पड़ेगा। यदि उन्हें अमीर पश्चिमी पर्यटकों को अपने देश की ओर आकर्षित करना है तो कबीलाई ढर्रा बदलना होगा।

शहजादे के बयान के बाद भारत में भी मंथन आरंभ हो गया है क्योंकि यहां भी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए बड़ी मात्रा में सउदी अरब से धन आया। देश भर में और खासतौर से केरल और कश्मीर में सउदी से अंधा पैसा आया और जल्दी ही इस धंधे में मुसलमान वोटों की राजनीति करने वाले दल भी शामिल हो गए। इन्होंने तेजी से बढ़ते इस्लामिक कट्टरवाद से जानबूझ कर निगाहें फेर लीं। जिन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई उसे ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया। हद तो तब हुई जब देश में हिंदुओं को ही आतंकवादी साबित करने की साजिश होने लगी। क्या हम जाकिर नायक को भूल सकते हैं जिसने हिंदुओं के खिलाफ विषवमन करने और उनका धर्म परिवर्तन करने के लिए पूरा दम लगा दिया। जिस तरह केरल और कश्मीर में धरती से जुड़े उदारवादी इस्लाम की जगह वहाबी इस्लाम ने पैर पसारे, क्या उसे झुठलाया जा सकता है।

बहरहाल शहजादे सलमान के बयान का सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान में देखने को मिला। रूस के अफगानिस्तान में घुसने के बाद फ्रंटलाइन स्टेट होने के नाते पाकिस्तान को सउदी से सबसे ज्यादा पैसा मिला। जहां अस्सी के दशक से अब तक 32,000 से भी ज्यादा मदरसे खोले जा चुके हैं। इन्हीं मदरसों से निकले तालीबानियों की मदद से अमेरिका ने अफगानिस्तान से रूस को खदेड़ा और पाकिस्तान ने वहां अपने बगल बच्चों की सरकार बनाने का सपना साकार किया। सउदी ने पाकिस्तान को परमाणु बम विकसित करने के लिए भी भरपूर धन दिया और शायद यही वजह है जब उसने पहली बार बम तैयार किया तो उसे ‘इस्लामिक बम’ का नाम दिया गया। आश्चर्य नहीं कि कुछ समय पूर्व जब सउदी ने 39 देशों वाला आतंकवाद विरोधी सैन्य गठबंधन बनाया तो उसका मुखिया पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ को बनाया।

सउदी ने न सिर्फ पाकिस्तान को वहाबी इस्लाम के प्रसार के लिए भरपूर धन दिया बल्कि उसे दुनिया भर की कट्टर इस्लामिक ताकतों को एकजुट करने, आतंकियों का नेटवर्क तैयार करने और उनमें पैसा बांटने का काम भी सौंपा। इस काम में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई और उसके उच्चायोगांे और दूतावासों ने सक्रिय भूमिका निभाई। ओसामा बिन लादेन से लेकर मुल्ला उमर तक अगर दुनिया के सबसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी अगर पाकिस्तान में ही पाए गए हैं तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

शहजादे सलमान के बयान से पाकिस्तान बहुत चिंतित है क्योंकि उसने इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं, दुश्मन देशों भारत और बांग्लादेश में भी आतंकी नेटवर्क खड़ा करने के लिए किया। अगर सउदी से आने वाले धन में कटौती होती है तो इसका असर सीधे पाकी मदरसों और आतंकी तंजीमों पर पड़ेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए ये बेशक बहुत बुरी खबर है।

शहजादे सलमान के इस्राइल से जुड़े बयान ने भी दुनिया में तहलका मचाया। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों की तरह ही इस्राइल को भी अपने लिए जमीन का हक है। ये असल में इस बात की ओर इशारा था कि शहजादे सलमान और अमेरिका में इस विषय में अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। उनके दौरे में इसकी पुष्टि भी हो गई। पता लगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने इस्राइल और फिलिस्तीन के लिए शांति योजना तैयार करने के वास्ते अपने दामाद जेरेड कुशनर को नियुक्त किया है। उन्होंने इस संबंध में शहजादे से भी बात भी की है। कुशनर चाहते हैं कि शांति योजना तैयार होने के बाद सउदी अरब और दूसरे अरब देश फिलिस्तीन को समझौता मानने के लिए समझाएं।

ध्यान रहे सउदी अरब का इस विवाद पर आधिकारिक मत ये है कि जो भी शांति समझौता हो उसमें फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी जाए और पूर्वी येरूशलम को उसकी राजधानी माना जाए। कुछ समय पूर्व जब ट्रंप ने येरूशलम को इस्राइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी थी तो अरब देशों ने इसे पीड़ादायक बताया था। सउदी अरब की विदेशनीति का आंख मूंद कर अनुसरण करने वाले पाकिस्तान को इससे भी समस्या है। दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तान की स्कूली किताबों में दुनिया का जो नक्शा छापा जाता है उसमें इस्राइल का वजूद ही नहीं होता। यही नहीं पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा होता है कि ये इस्राइल को छोड़ सभी देशों के लिए मान्य है।

वहाबी आतंकवाद और इस्राइल जैस विषयों पर शहजादे सलमान की बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इनकी असली परीक्षा तो इनके क्रियान्वयन के समय ही होगी। अब जब उन्होंने इस्राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, तो क्या वो अपने जानी दुश्मन ईरान की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे तथा कतर, यमन और सीरिया में भी शांति की नई राहें तलाशेंगे या इस्राइल के साथ संबंधों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे क्योंकि सउदी की तरह इस्राइल भी ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। अमेरिका के तुरंत बाद उनके फ्रांस दौरे में ईरान के मसले पर हुई तनातनी से तो नहीं लगता कि वो फिलहाल ईरान के प्रति नरमी बरतने के मूड में हैं। ध्यान रहे फ्रांस, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ हुए समझौते का समर्थक है और जब ट्रंप ने इसे रद्द करने की धमकी दी थी तो फ्रांस ने उन्हें इसके खिलाफ चेताया भी था।

इस पूरे परिदृश्य में भारत को भी अपने पत्ते सही तरीके से खेलने चाहिए। दक्षिण एशिया में आतंकवाद के खिलाफ भारत और अमेरिका सहयोग कर रहे हैं। अपनी दक्षिण एशिया नीति में ट्रंप ने भारत को करीबी सहयोगी माना है। ये सही समय है जब भारत भी अपनी खुफिया जानकारियों के साथ सउदी अरब से संपर्क करे और वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए देश में आ रहे पैसे पर रोक लगाए। यही नहीं भारत को सउदी फाउंडेशनों, आईएसआई और इनके सहयोग से भारत में पनपीं आतंकी तंजीमों पर रोक के लिए भी सउदी से सहयोग मांगना चाहिए।

“मोदी नीतिः अस्त-व्यस्त, पस्त पाकिस्तान” in Punjab Kesari

मुस्लिम वोटों का सौदा करने वाले भारतीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय रहा है – पाकिस्तान। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक, सबने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध कायम करने के प्रयास किए। 10 साल शासन करने वाले मनमोहन सिंह भी इस कोशिश में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन सबके साथ समस्या ये रही कि इन्होंने पाकिस्तान में प्रत्यक्षतः सत्तासीन नेताओं से बात करने की कोशिश की और पर्दे के पीछे काम करने वाली असल सत्ता यानी सेना को नजरअंदाज किया।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो उन्होंने भी इसी लीक पर चलने की कोशिश की। तबके पाकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को शपथग्रहण समारोह में बुलाया। अचानक उनके घर भी पहुंचे, तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जब भी भारत ने सद्भावना प्रदर्शित करने के लिए बड़ा कदम उठाया, पाकिस्तानी सेना ने उसका जवाब खून खराबे से दिया।

जल्द ही मोदी सरकार को समझ आ गया कि जिस नवाज शरीफ से वो बात करने की कोशिश कर रहे हैं, वो सेना की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं। वो सेना की अनुमति के बिना भारत से संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकते।

25 दिसंबर 2015 को मोदी शरीफ के निमंत्रण पर अचानक लाहौर पहुंचे। मकसद था नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देना और उनके परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेना। मोदी के स्वागत के लिए शरीफ स्वयं अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पहुंचे। इससे भारत और पाकिस्तान में सद्भावना की नई उम्मीद जगी, लेकिन पाकी सेना को ये रास नहीं आया। सेना समर्थक मीडिया ने शरीफ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को मोदी के हाथों बेच दिया। 10 दिन के अंदर ही यानी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर हमला हो गया। भारत ने इसके लिए जैश-ए-मौहम्मद को जिम्मेदार ठहराया और शरीफ ने इस हमले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी जांच के लिए पठानकोट भी आए, लेकिन मामला किसी सिरे तक नहीं पहुंचा।

पठानकोट मामले की जांच चल ही रही थी कि 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ जिसमें 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। भारत ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक सरकार से जांच की अपेक्षा करने की जगह, पाकिस्तान पर चहुंमुखी हमला करने की योजना बनाई। इसमें सैन्य, राजनयिक, रणनीतिक से लेकर सिंधु जल समझौते तक, हर क्षेत्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने की नीति बनाई गई। मोदी सरकार ने एक झटके में पुरानी सरकारों के इस तर्क को कूड़ेदान में डाल दिया कि स्थिर पाकिस्तान, भारत के लिए जरूरी है। ये समझ लिया गया कि जब तक पाकिस्तान को उसकी हिमाकत की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, वो बाज नहीं आएगा।

उड़ी हमले की अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, कनाडा, भूटान और यहां तक कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी निंदा की। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने घोषणा की कि वो अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेगी, लेकिन इसका समय और स्थान वो खुद तय करेगी। जाहिर है, मोदी सरकार ने अब भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से अपनी तरह से निपटने की छूट दे दी थी।

उड़ी हमले के करीब 10 दिन बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें वहां मौजूद आतंकियों के अनेक ठिकानों पर हमला किया गया। सर्जिकल स्ट्राइक भारत की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब तक भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को देश की सीमा में ही मारती थी, यह पहली बार थी जब सेना ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) पार कर हमला किया। ये भारत की तरफ से स्पष्ट संकेत था कि अब वो रक्षात्मक नीति छोड़, आक्रामक नीति अपनाएगा और जरूरत पड़ने पर एलओसी पार करने में परहेज नहीं करेगा। अब तक पाकिस्तान अपने परमाणु बम की धमकी देता था, सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही भारत सरकार ने उसकी परमाणु धमकियों की भी धज्जियां उड़ा दीं।

सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद जब पाकिस्तानी सेना नहीं मानी तो भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसके तहत लंबी दूरी के हथियारों से एलओसी के परे आतंकी ठिकानों को ही नहीं, पाकी सेना को भी निशाना बनाया जाने लगा। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि पाकी सेना पर इसका असर नहीं पड़ा है और वो बदस्तूर घुसपैठिए भेज रही है। यदि गहराई में देखा जाए तो समझ आएगा कि इस दौर में भारतीय सेना ने एलओसी और अंतरराष्ट्ररीय सीमा पर जितने घुसपैठिए और पाकी सैनिक मार गिराए, उतने पहले कभी नहीं हलाक किए गए। यही नहीं भारतीय सेना ने देश की सीमा के भीतर भी जितने आतंकी अब मारे हैं, उतने पहले कभी नहीं मारे।

अगर आप पाक अधिकृत कश्मीर के न्यूज चैनलों को देखें तो आपको पता चलेगा कि भारतीय सेना की नई नीतियों का किस हद तक असर हुआ है। वहां लोग कहते हैं कि वो लगातार युद्ध जैसे हालात में जी रहे हैं और न तो पाकिस्तानी सेना और न ही सरकार उनके जान-माल के नुकसान की भरपाई कर रही है। वो चाहते हैं कि इससे पहले भारतीय सेना और कोई बड़ा कदम उठाए, पाकी सेना अपने आतंकी शिविर वहां से हटा ले। वो कहते हैं कि पाकी सेना की मूर्खता और हठधर्मी की वजह से उनका व्यापार और रोजगार चैपट हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है। जाहिर है इस समय पीओके निवासियों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वो पाकी सेना की आतंकी नीति से मुक्ति पाना चाहते हैं।

इस बीच 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला भी उठा दिया। संकेत साफ था कि अगर पाकिस्तान बाज नहीं आएगा तो भारत, जम्मू-कश्मीर से परे भी संघर्ष के नए क्षेत्र खोलने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान ने जहां-जहां कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत ने वहां-वहां बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला उठाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब और अलग-थलग करने का भूतो न भविष्यिति प्रयास शुरू कर दिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इन प्रयासों को बहुत बल मिला।

अमेरिका ने मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात से पहले ही, न सिर्फ भारत को रणनीतिक सहयोगी बनाने की बराक ओबामा की नीति का पुरजोर समर्थन किया, बल्कि सय्यद सलाहुद्दीन के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन को अंतरराष्ट्रीय संगठन भी घोषित कर दिया जिसे पाकिस्तान ‘कश्मीरियों की आजादी की आवाज’ बताता रहा है। संदेश साफ था कि अमेरिका को कश्मीरियों की पाक समर्थित आजादी की मुहिम में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद तो ट्रंप ने एक के बाद एक अनेक ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान को गहरा आघात लगा। 21 अगस्त 2017 को ट्रंप ने नई दक्षिण एशिया नीति का एलान किया जिसमें पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भारत को महत्वपूर्ण स्थान देने की घोषणा की गई। दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के समय ट्रंप ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी कि अगर उसने अपनी धरती से आतंकी शिविर समाप्त नहीं किए तो उसे नतीजा भुगतना पड़ेगा।

पाकिस्तान ने आदतन अमेरिका की धमकी को हलके में लिया। वो भूल गया कि अब वाइट हाउस में बराक ओबामा नहीं डोनाल्ड ट्रंप बैठे हैं। ट्रंप ने पहले तो पाकिस्तान की करीब दो अरब डाॅलर की रक्षा सहायता बंद करने का एलान किया फिर ये सुनिश्चित किया कि उसे दुनिया में टेरर फंडिंग और हवाला कारोबार की निगरानी करने वाली ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया जाए। पाकिस्तान इस सदमे उभरा भी नहीं था कि अमेरिका ने परमाणु प्रसार का आरोप लगा कर पाकिस्तान की उन सात कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए जो उसके परमाणु हथियारोें के लिए सामान उपलब्ध करवाती हैं।

अमेरिका के नए विदेश मंत्री और सीआईए के पूर्व प्रमुख माइक पोमपेओ ने खुली धमकी दे दी है कि अगर पाकिस्तान नहीं चेता तो अमेरिका उससे मेजर नाॅन-नेटो अलाय (महत्वपूर्ण गैर-नैटो सहयोगी) का दर्जा वापसस ले लेगा, उसे आतंकी देश घोषित करेगा और उसके अधिकारियों के अमेरिका आने पर रोक भी लगाएगा। जाहिर है अमेरिका जो कदम उठाएगा, उसके सहयोगी भी उसका अनुसरण करेंगे।

पाकिस्तानी आतंकी फक्ट्रियों के लिए अमेरिका से एक और बुरी खबर हाल ही में तब आई, जब वहां के दौरे पर गए सउदी अरब के शहजादे मौहम्मद बिन सलमान ने घोषणा की कि वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की नीति समाप्त करेंगे जिसके तहत सउदी वित्तीय सहायता से दुनिया भर में वहाबी मदरसे खोले गए और आतंकी बनाए गए। इस नीति का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान ने उठाया जहां 32,000 से ज्यादा ऐसे मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों में तैयार आतंकियों को पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करता है। जाहिर है शहजादे सलमान की घोषणा पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्रियों पर सीधे असर करेंगी। अमेरिका और सउदी अरब के फैसले उसकी विदेश नीति के दो प्रमुख स्तंभों – परमाणु बम और आतंकी नेटवर्क, दोनों को प्रभावित करेंगे।

अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारत ने सैन्य और राजनयिक दोनों स्तर पर पाकिस्तान को घेरा है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के अंतरराष्ट्रीय अभियान का पश्चिमी देशों में ही नहीं, खाड़ी के मुस्लिम देशों में भी व्यापक असर हुआ है, जो पहले कभी पाकिस्तान के करीबी माने जाते थे। आज चाहे अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देश भी उसके खिलाफ हैं। उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी न केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसके विरूद्ध आवाज उठाई, बल्कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ में भी उसके खिलाफ मत दिया। पाकी सेना अपनी जनता को भरमाती है कि चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पाकिस्तान की माली हालत बहुत बेहतर कर देगा, लेकिन चीन ने इसकी लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं से हाथ खींच लिए हैं। ध्यान रहे पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले इस काॅरीडोर का भारत विरोध करता रहा है क्योंकि भारत इसे अपना अटूट अंग मानता है।

भारत अब तक अपने बयानों और कामों से पाकिस्तान को ये स्पष्ट संदेश दे चुका है कि अगर उसने भारत में आतंक का निर्यात नहीं बंद किया तो वो सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार करने से नहीं हिचकेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान से इससे सबसे बड़ी खलबली मची है। वहां आम आवाम को बिजली, पेयजल, रोजगार, इंधन, शिक्षा कुछ भी हासिल नहीं है। ऐसे में अगर भारत ने पानी रोक लिया तो उसके खेत खलिहान सूख जाएंगे और भारत बिना कोई यु़द्ध किए ही युद्ध जीत जाएगा।

हाल ही में पाकी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने चुनींदा पत्रकारों के सामने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे जिसे उनके चमचे ‘बाजवा डाॅक्टरीन’ के नाम से प्रचारित कर रहे हैं। इसमें बाजवा कहते हैं कि भारत को आर्थिक कारणों से बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा। वो डींगे मारते हुए कहते हैं कि उन्होंने कठोर अमेरिकी दबाव के बावजूद, परवेज मुशरर्फ की तरह घुटने नहीं टेके। हो सकता है वो पाकिस्तानियों को बहलाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हों, लेकिन इन्हीं पाकिस्तानियों ने हाल ही में देखा कि कैसे एक अमेरिकी एयरपोर्ट पर उनके प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की खाना तलाशी ली गई और कैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने उन्हें आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह देकर बैरंग वापस कर दिया।

भारत में विपक्षी दल बिना सोचे समझे मोदी सरकार पर आरोप लगा देते हैं कि उसकी कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। अब तक ये स्पष्ट हो गया होगा कि मोदी सरकार ने अपने अनुभवों और पाकिस्तान की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी नीति न केवल तैयार की है, बल्कि उसे हर मोर्चे पर लागू भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात – इसका आधार किसी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, राष्ट्रहित है। संभवतः यही कारण है कि मोदी सरकार ने हुर्रियत के पाकिस्तानी दलालों पर भी हाथ डाल दिया है, जिन्हें पिछली सरकारें पवित्र गाय समझती थीं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पाकिस्तान के चुने हुए नेताओं से बातचीत का नाटक करने की जगह, सीधे उसकी सेना पर वार किया है। इसका दंश वो महसूस भी कर रही है। धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कस रहा है। उसे स्पष्ट कर दिया गया है कि उसे अपनी हरकतों की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब ये उसे तय करना है कि वो अभी सुधरने का संकल्प लेती है या नुकसान उठाने के बाद। ध्यान रहे इस बार सुधार का नाटक नहीं चलेगा।

”तानाशाह शी” और ”लोकतांत्रिक भारत” के समक्ष विकल्प in Punjab Kesari

चीनी संसद ने 17 मार्च को एकमत से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने के प्रस्ताव को पारित कर दिया। शी के साथ ही उनके निकटतम सहयोगी और कट्टर राष्ट्रवादी वांग कीशान को उपराष्ट्रपति बनाने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया गया। जाहिर है इसकी तैयारी लंबे अर्से से चल रही थी। इन खबरों के मद्दे नजर भारत में चीन के प्रति रवैये में निश्चित ही बदलाव नजर आया। भारत सरकार ने दलाई लामा के प्रति अपने अति उदारवादी रवैये को थोड़ा नियंत्रित किया और साथ ही दोनो देशों के संबंधों का दूरगामी विश्लेषण भी आरंभ किया। चीन की वैश्विक भूमिका को लेकर शी की महत्वाकांक्षी योजनाओं और अमेरिका के साथ ट्रेड वाॅर के बढ़ते खतरे के आलोक में समयानुसार भारत के लिए नीतिगत समायोजन (एडजस्टमेंट) आवश्यक भी है।
शी को आजीवन राष्ट्रपति पद सौंपने का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मकसद क्या है? इसका भारत के लिए क्या अर्थ है और उसके समक्ष क्या विकल्प हैं? इसे समझना आवश्यक है। भारत में कम्युनिस्ट, राष्ट्रवाद और देशप्रेम को गाली मानते हैं, लेकिन चीन में शी इन्हीं विशेषताओं के कारण आजीवन राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमा कर बैठ गए हैं। उन्होंने चीन के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य विकास के लिए नया समाजवादी विचार प्रस्तुत किया है जो कट्टरवादी साम्यवाद से बहुत अलग है और राजनीतिक विचारधारा में चीन के इतिहास तथा वर्तमान विशेषताओं और आवश्यकताओं के समायोजन में विश्वास रखता है। संक्षेप में कहें तो इसका मकसद साम्यवाद का विकास नहीं, चीन का विकास है। पिछले साल 18 से 24 अक्तूबर के बीच हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं नेशनल कांग्रेस में पार्टी के संविधान में शी की इस नई मार्गदर्शक विचारधारा को शामिल किया गया। इसे ”नए युग के लिए समाजवाद का चीनी अभिलक्षणों वाला शी जिनपिंग विचार“ कहा गया। माओ के बाद यह पहली बार था जब किसी जीवित नेता के विचारों को उसके नाम के साथ पार्टी के संविधान में शामिल किया गया।
कांग्रेस के पहले दिन यानी 18 अक्तूबर को अपने उद्घाटन भाषण में शी ने चीन को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का खाका पेश किया। चीनी सेना को विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बनाने के बारे में उन्होंने कहा, ”हम अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि 2020 तक सेना का मेकेनाइजेशन पूरा हो जाए…हम हर तरह से अपनी सेना को आधुनिक बनाएंगे, चाहें वो सैद्धांतिक स्तर पर हो, सांगठनिक ढांचा हो, सैनिक हों या हथियार। हम एक मिशन के तौर पर ये सुनिश्चित करेंगे कि 2035 तक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना का आधुनिकीकरण पूर्ण हो जाए और 21वीं सदी के मध्य तक हमारी सेना विश्व स्तरीय सेना में बदल जाए।“
शी ने अपने भाषण में साफ तौर से तो नहीं कहा मगर उनका इरादा साफ था कि वो चीन को अमेरिका की टक्कर की आर्थिक और सैन्य शक्ति या कहें सुपर पावर बनाना चाहते हैं। शी की अब तक की उपलब्धियों को देखते हुए पार्टी को लगता है कि वो इसे हासिल भी कर सकते हैं। संभवतः यही कारण है कि पार्टी ने उन्हें आजीवन राष्ट्रपति पद पर बिठाने का निर्णय लिया ताकि देश निर्विघ्न चहुंमुखी विकास की दिशा में आगे बढे़ और हर दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली होने का लक्ष्य हासिल करे। पश्चिमी देश भले ही चीन की वैश्विक आकांक्षाओं को मान्यता देने में आनाकानी करें, लेकिन चीन ने महाशक्ति के तौर पर खुद को जताना अवश्य आरंभ कर दिया है। चाहे दुनिया भर में अपना व्यावसायिक और सामरिक वर्चस्व कायम करने की वन बेल्ट वन रोड परियोजना हो या साउथ चाइना सी में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की धज्जियां उड़ाना या दुनिया के अनेक गरीब देशों को अपनी दौलत के बल पर गुलाम बनाना, चीन ने बहुत व्यवस्थित और सोचे समझे तरीके से अपनी दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है।
ऐसे में अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का ही नहीं, भारत में सुरक्षा और विदेशनीति के कर्णधारों और विशेषज्ञों का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। हाल ही में विदेश सचिव विजय गोखले ने संसद की विदेशी मामलों की स्थायी समिति के सामने चीन के बारे मे अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन विदेशों में अपने हितों की रक्षा के लिए अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है। ये जिबूती समेत कई देशों में सैन्य अड्डे बनाने और एशिया के लगभग हर देश में परियोजनाएं स्थापित करने से स्पष्ट है। ऐसे में भारत के लिए भी आवश्यक है कि वो भी अपने डिलीवरी मैकेनिज्म की गति बढ़ाए।
गोखले आगे कहते हैं, “चीन का उदय हमारे सामने अवसर और चुनौतियां दोनो पेश करता है, खासतौर से तब जब चीन का अंतरराष्ट्रीय पाॅस्चर अधिक आत्मविश्वासी और हठी हो गया है। ज्यादातर प्रमुख विश्व शक्तियां कनेक्टीविटी से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। जहां हम एशिया-अफ्रीका ग्रोथ काॅरीडोर और चाबहार पोर्ट के विकास पर काम कर रहे हैं, वहीं चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना और चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर पर काम की गति बढ़ा दी है। यहां चीन गंभीर खिलाड़ी है। वह पूंजी, तकनीक और आंतरिक ढांचे का बड़ा निर्यातक है।”
एक ओर जहां विदेश सचिव चीन की नीतियों को गंभीरता से लेते हैं और उनका तोड़ तलाशने की बात करते हैं, वहीं सेना के उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद चीन के बरक्स भारत की सैन्य तैयारियों पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं। संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए वो कहते हैं, “दो मोर्चों पर युद्ध की आशंका वास्तविक है। चीन और पाकिस्तान अपनी सेना का तेज गति से आधुनिकीकरण कर रहे हैं। भारत को भी अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए। लेकिन मौजूदा बजट इस आवश्यकता को पूरी करने के लिए अपर्याप्त है। सेना के बजट में की गई मामूली बढ़ोतरी मुद्रास्फीति की ही भरपाई बामुश्किल कर पाएगी, इससे तो कर चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद आगे कहते हैं, ”सेना को 10 दिन के सघन युद्ध के लिए हथियारों का जखीरा निर्मित करने के वास्ते जितना धन चाहिए उसमें 6,380 करोड़ रूपयों की कमी है। सरकार ने हथियारों की कमी पूरी करने के लिए जून 2018 का लक्ष्य रखा है, ये कमी पूरी करना सेना की लंबे युद्ध की तैयारी के लिए आवश्यक है। यह जरूरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने और आधुनिकीकरण की ओर ध्यान लगाएं। आज, इस बात की पहले से कहीं अधिक आवश्यता है कि हमारा देश अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करे और दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में जाना जाए।“ रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्टों के अनुसार सेना के आधुनिकीकरण के लिए 21,338 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह मौजूदा 125 परियोजनाओं के 29,033 करोड़ के बजट से भी काफी कम है।
रक्षा मामलों की स्थायी समिति के प्रमुख मेजर जनरल बीसी खंडूरी, सेवानिवृत्त अपनी रिपोर्ट में कहते हैं, ”हम इस निराशाजनक स्थिति से दुखी हैं। सेना के प्रतिनिधि स्वयं सेना की तैयारियों के लिए अपर्याप्त धन आवंटन के नकारात्मक प्रभाव के बारे में खुल कर बता रहे हैं, ऐसे में इस समस्या का जल्द से जल्द निराकरण होना आवश्यक है।”
जाहिर है मोदी सरकार, चीन को लेकर सजग ही नहीं चिंतित भी है। पिछले 70 वर्षोंं में चीन के संबंध में सुरक्षा के जो उपास किए जाने चाहिए थे, वो नहीं किए गए। आजादी के शुरूआती दौर में नेहरू सरकार ने कुछ भयंकर कूटनीतिक गलतियां भी कीं जिनका परिणाम देश अब तक भुगत रहा है। बहरहाल, मौजूदा सरकार नौसेना की बेहतरी से लेकर सीमा पर आंतरिक ढांचा विकसित करने तक अनेक प्रयास कर रही है। लेकिन कमजोरियों के बावजूद भारत घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं है। ये हम डोकलाम विवाद में देख चुके हैं। कूटनीति के क्षेत्र में भी भारत, अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस आदि के साथ रणनीतिक संबंध बना रहा है। भारत ने आसियान देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ किए हैं और मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक अपने पांव पसारे हैं। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक महाशक्ति बनने की इच्छा रखता है और अमेरिका, जापान, फ्रांस, रूस जैसे देश इसके लिए पूरा सहयोग करने के लिए तैयार भी हैं, लेकिन भारत को अपनी आकांक्षाओं और संसाधनों में संतुलन बिठाना होगा। बहुत से देश अपने हितों के लिए भारत को आगे तो बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं देना चाहते। पर्याप्त संसाधनों के आभाव में ये कैसे संभव होगा? इस पर विचार करना होगा।
भारत को अगर चीन के बरक्स खड़ा होना है तो उसे अपनी आंतरिक स्थिति भी सुधारनी होगी। चीन से सबक लेते हुुए देश को जोंक की तरह चूस रहे आंतरिक दुश्मनों से भी सख्ती से निपटना होगा। एक तरफ चीन ‘तानाशाही व्यवस्था’ के तहत दुनिया में महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा है तो वहीं भारत में उसके पिट्ठु हमारी सेना पर ही निशाना साध रहे हैं और विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं। एक ओर चीन जहां अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए हर खतरे को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करके बैठा है, वहीं हमारे यहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में भारत आक्रामक शी जिनपिंग का मुकाबला कैसे करेगा? क्या हम फिर से चीन से पंगा न लेने और देश में उसके पिट्ठुओं को खुली छूट देने की मनमोहन सरकार की नीति की ओर लौट जाएंगे या सख्ती से ऐसे तत्वों का समूल नाश करेंगे? हमें सुनिश्चित करना होगा कि चीन हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली का दुरूपयोग हमारे ही खिलाफ न कर पाए। चीन पर भारत में अलगाववादियों और नक्सलियों की मदद करने और उन्हें हथियार देने का भी आरोप है। चीन से इस विषय में भी दो टूक बात करनी होगी।

“नेपालः सदभावना के साथ सतर्कता भी आवश्यक” in Punjab Kesari

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी ने हाल ही में नेपाल का दौरा किया। अब्बासी भले ही कठपुतली प्रधानमंत्री हों, पर उनका दौरा और उनके वक्तव्य कई सवाल खड़े करते हैं। ये दौरा असल में नेपाल के नए प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल, यूएमएल के नेता केपी ओली की भारत से खंुदक, चीन से नजदीकी और भविष्य में उनकी नीतियों की एक बानगी है।

आमतौर से नेपाल के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद सबसे पहले भारत का दौरा करते हैं, लेकिन ओली ने सबसे पहले नेपाल-चीन सीमा का दौरा किया और वहां चीन का गुणगान किया। उनके यहां जो पहला राष्ट्राध्यक्ष आया है, वो पाकिस्तानी है। अब्बासी नेपाल के दौरे पर तो गए ही, वहां उन्होंने ओली के साथ मिलकर भारत को चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कश्मीर में तथाकथित मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाया और जल्द से जल्द सार्क सम्मेलन करवाने की बात की। अब्बासी के दौरे का संकेत ये था कि भारत भले ही सार्क में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश करे और इस्लामाबाद में प्रस्तावित शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करे, लेकिन नेपाल, पाकिस्तान को अपना रहा है और चीन की सरपरस्ती में दक्षिण एशिया में नए समीकरण उभर रहे हैं। अब्बासी ने चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना की जम कर तारीफ की जिसके तहत पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान काॅरीडोर (सीपेक) बनाया जा रहा है जो पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है। ज्ञात हो नेपाल भी चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में हिस्सेदारी के लिए सहमति दे चुका है।

जाहिर है चीन के करीबी ओली, उसकी शह पर उसके एक अन्य पिट्ठू पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को मुंह चिढ़ा रहे थे। अब्बासी ने वहां जा कर कहा, “पाकिस्तान, नेपाल की एकता, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता को प्रमुखता से महत्व देते हुए इसका समर्थन देता है।” ये और कुछ नहीं ओली के विचारों की ही प्रतिध्वनि है जो किसी भी कीमत पर भारत को नेपाल से दूर करने पर तुले हैं और इसके लिए उन्होंने नेपाली स्वाभीमान और राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। कहने की आवश्यकता नहीं उन्होंने चुनावों में जी भर कर भारत के खिलाफ विषवमन किया और उस पर नेपाल की संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता से खेलने का आरोप लगाया। भारत पर नेपाल के मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाने वाले ओली अब खुद अपने देश को चीन को बेचने के लिए तैयार बैठे हैं, लेकिन अब उन्हें देश की अखंडता और संप्रभुता का ध्यान क्यों नहीं आ रहा? सीपेक के नाम पर चीन जैसे पाकिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है और जिसका पाकिस्तान के सभी बुद्धिजीवी आजकल एक स्वर से विरोध कर रहे हैं, क्या वो ओली को नहीं दिखता? क्या ओली ये बताने का कष्ट करेंगे कि नेपाल में अभूतपूर्व रक्तपात करने वाले उनके माओवादी सहयोगी किसकी मदद से उनके देशवासियों का खून बहा रहे थे? उन्हें हथियार और पैसा कहां से मिल रहा था?

कुछ भारतीय कम्युनिस्ट पत्रकार ओली के भारत विरोधी रवैये के लिए मोदी सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। ये आधा सच है, जबकि पूरा सच ये है कि ओली चीन के पिट्ठू हैं। भारत उनकी कितनी ही लल्लो-चप्पो करले वो भारत के साथ नहीं आएंगे। इसके सबूत के तौर पर हम कुछ तथ्य रखना चाहेंगे।

ओली जब अक्तूबर 2015 से अगस्त 2016 के बीच पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने चीन के साथ अनेक समझौते किए जिनका साफ मकसद था नेपाल से भारत को बाहर करने के लिए चीन को कमान सौंपना और व्यापार के लिए भारत पर निर्भरता समाप्त करना। इसमें ओली सफल भी हुए। आज नेपाल में चीन सबसे बड़ा निवेशक है। ओली ने चीन से नजदीकी बढ़ाने के लिए ट्रांसिट ट्रीटी (पारगमन संधि) पर हस्ताक्षर किए ताकि नेपाल और चीन को सड़क और रेल मार्ग से जोड़ा जा सके।

ओली को उम्मीद है कि जब चीन तिब्बत में शिगास्ते और क्यीरोंग तक रेल नेटवर्क ले आएगा तो उसे नेपाल तक लाना मुश्किल नहीं होगा। ध्यान रहे चीन अपने क्निघाई-तिब्बत रेेलवे को 2020 तक नेपाल सीमा तक ले जाना चाहता है और उसने इसे काठमांडू तक ले जाने की भी इच्छा जताई है। तिब्बत स्थित क्यीरोंग नेपाल के रासुवगाधी बाॅर्डर ट्रांसिट पाॅइंट से 25 किलोमीटर दूर है और यहां से काठमांडू मुश्किल से 50 किलोमीटर। इसके अलावा चीन और नेपाल को जोड़ने के लिए तीन सड़कों का निर्माण भी चल रहा है। ये दो वर्षों में पूरा हो जाएगा। यानी नेपाल के रेल, सड़क नेटवर्क और अर्थव्यवस्था पर पर चीन का पूरा कब्जा और भारत के जरिए होने वाले व्यापार को भी वाया चीन करने का जुगाड़।

जाहिर है ओली के रहते चीन के लिए राजधानी काठमांडू तक सीधी पहुंच बनाना और आसान हो जाएगा। चीन का ओली पर कितना प्रभाव है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पिछली सरकारों ने चीन से जुड़ी जिन परियोजनाओं को नकारा था, वो उन्हें भी फिर से जीवित करने के लिए तैयार हैं। पिछली शेरबहादुर देउबा सरकार ने 2.5 अरब डाॅलर की बूढ़ी गंडक परियोजना को अनियमितताओं के चलते रद्द कर दिया था, लेकिन ओली ने उसे फिर से शुरू करने का ऐलान किया है। रेल, सड़क और इस बांध परियोजना के अलावा भी चीन नेपाल में अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाएं चला रहा है। इनमें पोखरा इंटरनेशनल रीजनल एयरपोर्ट, काठमांडु रिंग रोड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट, अपर त्रिशूल जल विद्युत परियोजना आदि भी शामिल हैं। यही नहीं नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा बनने के लिए हस्ताक्षर भी किए हैं।

ओली की भारत के प्रति क्या नीति रहने वाली है? ये उनके चीन के प्रति बेहद उदार रवैये और अब्बासी के दौरे से काफी कुछ स्पष्ट हो चुका है। हाल ही में हाँगकाँग के अखबार ‘साउथ चाइना माॅर्निंग पोस्ट’ में उनका विस्तृत साक्षात्कार छपा है। चीन परस्त इस अखबार में वो भारत के बारे में बेलौस अपनी राय रखते हैं। भारत के साथ काम करने के सवाल पर वो कहते हंै, ”हमारे भारत के साथ सदैव बेहतरीन संबंध रहेे हैं, भारत में ‘कुछ लोगों’ ने गलतफहमी पैदा की, लेकिन भारतीय नेताओं ने मुझे आश्वासन दिया है कि भविष्य में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और हम एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करेंगे।”

आगे वो अपनी असली मंशा प्रकट करते हैं, ”हम बदलते समय के अनुसार भारत के साथ अपने रिश्ते ‘अपडेट’ करना चाहते हैं। दोनों देशों के रिश्तों के ‘हर विशेष प्रावधान’ की समीक्षा करना चाहते हैं जिसमें भारतीय फौज में नेपाली नागरिकों का काम करना भी शामिल है।” वो आगे कहते हैं, ”भारत के साथ हमारी अच्छी कनेक्टीविटी है, वो सब ठीक है, हम इसे और भी बढ़ाऐंगे, लेकिन हम नहीं भूल सकते कि हमारे दो पड़ोसी हैं। हम सिर्फ एक देश पर ही निर्भर रहना या सिर्फ एक ही विकल्प नहीं चाहते।”

ओली का संकेत साफ है – समय बदल गया है यानी नेपाल में चीन युग आरंभ हो चुका है, नेपाल अपनी मर्जी के मुताबिक (या चीनी निर्देशानुसार) भारत से संबंध रखेगा, अब भारत को उस से कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। ऐसे में भारत के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। भारत के लिए चिंता की बात इसलिए भी है कि भारत-नेपाल की मुक्त सीमा का लाभ उठाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने नेपाल में अनेक अड्डे बना रखे हैं। वहां आतंकवादियों का कितना बोलबाला है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि अनेक दुर्दांत आतंकवादी बिहार में भारत-नेपाल सीमा से पकड़े गए हैं। ओली की भारत विरोधी नीतियों को देखते हुए ये आशंका होना स्वाभाविक है कि ओली ऐसी गतिविधियों को रोकने में मदद करेंगे भी कि नहीं। भारत के लिए इस से भी बड़ी चिंता है नेपाल की राजनीति पर खूनी माओवादियों हिस्सेदारी। ध्यान दिला दें कि नेपाल में ओली के बाद दूसरे प्रमुख कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के भारतीय नक्सलियों से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। प्रचंड के नेतृत्व में नेपाली माओवादियों ने खून की वीभत्स होली खेली है जिसका इतिहास भारतीय माओवादियों से भी अधिक भयावह है। भारत, नेपाल को व्यापार में अनेक सुविधाएं और छूट देता है। भारत में अपना सामान डंप करने के लिए चीन पहले ही इनका फायदा उठा रहा है। ओली के नेतृत्व में चीन की ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा नहीं मिलेगा, क्या वो इसकी गारंटी देंगे?

ऐसी स्थिति में भारत क्या नीति अपनाए? भारत के सामने क्या विकल्प हैं? जाहिर है इस विषय में कोई कदम उठाने से पहले भारत को राजनीति से इतर दोनों देशों के सैकड़ों साल पुराने रिश्तों का भी ध्यान रखना होगा। नेपाल के तराई इलाके में रहने वाले लोगों से भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। दोनों देशों के बीच धार्मिक पर्यटन और शैक्षिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी पुरानी परंपरा है, नेपाल के लाखों लोग भारतीय सेना और अन्य स्थानों में काम करते हैं, उन्हें भारतीयों जैसे यहां संपत्ति खरीदने की अनुमति भी है, उनकी मुद्रा भी हमारी मुद्रा पर आधारित है।

ऐसे में नेपाल के संबंध में भारत के विकल्प असीमित नहीं हैं। भारत के लिए सबसे पहला विकल्प तो है प्रतीक्षा और अहस्तक्षेप। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘पड़ोसी पहले’ की नीति अपनाई है। इसे ध्यान में रखते हुए ओली के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडु का दौरा कर चुकी हैं और नेपाल की नई सरकर को पूरा समर्थन जता चुकी हैं। अब खबर आई है कि ओली भी किसी अन्य देश में जाने से पहले भारत का दौरा करेंगे और आगामी महीनों में प्रधानमंत्री मोदी भी नेपाल जाएंगे। जाहिर है अपनी तरफ से सकारात्मक रहते हुए भारत को शांति से ये देखना चाहिए कि समय बीतने के साथ नेपाल में हालात क्या करवट लेते हैं और ओली का भारत विरोध और चीन प्रेम किस सीमा तक जाता है और इसे लेकर वहां अंदरूनी कशमकश किस हद तक बढ़ती है।

भारत के समक्ष दूसरा विकल्प है जैसे को तैसा। ओली अगर भारतीय सेना में नेपालियों की भर्ती, सीमा प्रबंधन आदि पर विवाद करते हैं तो भारत भी उचित कदम उठाने चाहिए, खास कर सीमा प्रबंधन के विषय में। भारत को अब वैसे भी सीमा पर बेहतर प्रबंधन और हर आने-जाने वाले व्यक्ति की कड़ी निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

पिछले वर्ष विवादों के बावजूद भारत-चीन व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और ये 80 अरब डाॅलर के ऊपर जा पहुंचा। हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि भारत और चीन की दोस्ती को हिमालय भी नहीं रोक सकता। ऐसे में भारत को चीन को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि उसे वास्तव में दोस्ती निभानी है तो पाकिस्तान, नेपाल और मालदीव में इसका सबूत भी देना होगा। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और मालदीव के बाद नेपाल तीसरा ऐसा देश है जो इस समय सीधे चीन के असर में है। अगर चीन टकराव की नीति अपनाते हुए अपने बगलबच्चों के जरिए भारत को परेशान करने की कोशिश करेगा तो भारत निश्चय ही उचित कदम उठाएगा।

आखिर में भारत को भले इंसान और बड़े भाई के चरित्र से बाहर आना पड़ेगा। नेपाल सरकार के साथ ही नेपाली नागरिकों को भी अपनी सीमाओं और पसंद, नापसंद से अवगत करवाते रहना होगा ताकि वो भी अपनी सरकार पर दबाव बनाए रखें। 11 मार्च को ओली ने संसद में दो तिहाई सांसदों के साथ बहुमत साबित किया। नेपाल के नए संविधान के तहत उन्हें अब तानाशाहों जैसे अनेक विशेषाधिकार मिल गए हैं। वो इनका दुरूपयोग न करें, इसके लिए सबसे पहले जनता को ही अंकुश लगाना होगा।

“घनी के शांति प्रस्ताव और पाकिस्तान-तालीबान का दोगला रवैया” in Punjab Kesari

गत 28 फरवरी को अफगानिस्तान में दूसरी काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपनी ओर से शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस 23 देशों, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और नैटो का एक समूह है जो अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।

काॅफ्रेंस के पहले दिन ही बड़ी घोषणा करते हुए घनी ने कहा कि वो तालीबान को वैध राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने तालीबानी आतंकियों को कहा कि वो हिंसा छोड़ें और शांति स्वीकार करने के लिए सामने आएं ताकि देश को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि युद्धविराम और शांति प्रक्रिया पर सहमति बननी चाहिए। उन्होंने तालीबान को खुश करने के लिए अनेक प्रस्ताव भी किए। इनमें शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले तालीबानियों को सुरक्षा देना, बंदियों को छोडना, तालीबानी नेताओं के खिलाफ प्रतिबंध हटाना, तालीबान सदस्यों और उनके परिवारों को पासपोर्ट और वीसा देना, उनके लिए काबुल में कार्यालय खोलना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति घनी ने कहा कि उनका देश शांति को खतरे में डालने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है और दीर्घकालीन शांति के लिए वो हर तरह के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो शांति कायम करने के लिए बातचीत करे और ये बातचीत काबुल में हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो अतीत को भुला कर नए सिरे से बातचीत के लिए तैयार हैं।

पाकिस्तान ने घनी का तालीबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि वो शांति प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। असल में पाकिस्तान दिखावटी तौर पर ही सही, लंबे अर्से से बातचीत के लिए जोर डालता रहा है। घनी के प्रस्ताव के चंद घंटों के भीतर ही पाकिस्तान में अफगान राजदूत डाॅक्टर ओमर जखीवल ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासेर खान जंजुआ से बात की। जखीवाल ने जंजुआ को काबुल में हुए शांति सम्मेलन और राष्ट्रपति घनी के प्रस्तावों के बारे में बताया।

जंजुआ ने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में खून खराबे का जल्द अंत चाहता है। उन्होंने कहा “पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति अनिवार्य है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोगों के साथ सर्वनिष्ठ और सहभागी भविष्य के विचार में विश्वास रखता है, इसलिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शांति पहलों के तहत राजनीतिक सुलह-सफाई के प्रयासों का हमेशा स्वागत किया है। पाकिस्तान, राष्ट्रपति घनी के वार्ता और आपसी समझदारी के जरिए शांति लाने के प्रयास का स्वागत करता है और इसे सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।”

अब सवाल ये उठता है कि काबुल पीस प्रोसेस के तहत जैसे घनी ने शांति प्रस्ताव किया और चंद ही घंटों के भीतर जैसे उसे पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया, ये आखिर हुआ कैसे और इसके क्या निहितार्थ हैं? क्या पाकिस्तान वास्तव में उतना ईमानदार है जितना वो दिखा रहा है? और इस प्रस्ताव पर तालीबान का रूख क्या है और क्यों है? इसे कई तरह से समझा जा सकता है।

पहले देखते हैं कि पाकिस्तानी समीक्षक इसके बारे में क्या कहते हैं। वो इसके लिए अपने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को श्रेय देते हैं। उनके अनुसार इसके लिए जमीन जनरल बाजवा की पिछले साल अक्तूबर में हुई काबुल यात्रा के दौरान तैयार की गई। इस यात्रा के कुछ समय के भीतर ही पाकिस्तान ने खामोशी से अफगान तालीबान और हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकियों को काबुल को सौंप दिया। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने ये अभूतपूर्व कदम ये जताने के लिए उठाया कि इस्लामाबाद किस हद तक अफगानिस्तान के साथ सहयोग करना चाहता है। जनरल बाजवा की यात्रा के बाद दोनों देश लगातार संपर्क में रहे और पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लगातार ये आग्रह करता रहा कि वो तालीबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हो। पाकिस्तान, अमेरिका और अफगानिस्तान को बार-बार ये कहता रहा है कि अफगानिस्तान में लंबे अर्से से चले आ रहे संघर्ष का हल सिर्फ संवाद से ही हो सकता है और इसके लिए अफगानिस्तान को तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कुछ प्रोत्साहन देने होंगे।पाकिस्तानी समीक्षकों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान, तालीबान पर भी वार्ता का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डालता रहा है।

दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी उप सहायक सचिव एलिस वेल्स ने कुछ समय पूर्व कहा था कि अमेरिका ने तालीबान के लिए भी बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। इस पर तालीबान ने बातचीत के लिए सहमति तो दिखाई लेकिन शर्तें ऐसी रखीं जिन्हें मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन है। तालीबान ने अमेरिका को एक पत्र में कहा कि “अफगान मसला हल करने में सहायता मिल सकती है अगर अमेरिका अफगानिस्तान पर अपना कब्जा छोड़े और लोगों की वैध मांगों को स्वीकार करे जिसमें सरकार बनाने का तालीबान का हक भी शामिल है और चर्चा के बारे में अपनी चिंताएं और अनुरोध इस्लामिक अमीरात (तालीबान सरकार) को एक शांतिपूर्ण माध्यम से पहुंचाए।” तालीबान ने अमेरिका को अपने खत में हिंसा का रास्ता छोड़ने और इस समस्या को बातचीत से सुलझाने की सलाह भी दी। तालीबान ने अमेरिका से बातचीत के लिए सहमति जताई क्योंकि वो अफगान सरकार को वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। वो खुद को अफगानिस्तान की जायज सरकार मानता है जिसे अमेरिका ने गिराया था।

तालीबान के पत्र पर एलिस वेल्स ने कहा है कि अब ये दिखाने की जिम्मेदारी तालीबान पर है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं। ये बातचीत मुझसे या अमेरिका से नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की वैध और संप्रभु सरकार से होनी चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तानी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान ने पहले भी अफगान तालीबान और काबुल में वार्ता शुरू करवाई थी, लेकिन इसके नेता मुल्ला उमर और फिर उसके उत्तराधिकारी की ड्रोन हमले में हत्या के बाद वो ठप हो गई। पाकिस्तान इसके लिए अफगान सरकार में कुछ तत्वों को जिम्मेदार ठहराता है।

अब इस मसले को अफगानिस्तान के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान में शांति और अखंडता के लिए काम करने वाली अफगान हाई पीस काउंसिल के मुताबिक तालीबान ने अब तक ये प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। ज्ञात हो कि अपने मकसद में सफलता हासिल करने के लिए ये तालीबान से भी संपर्क रखती है। इसका गठन सितंबर 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया था।

काउंसिल के मीडिया विभाग के प्रमुख सय्यद एहसानुद्दीन ताहेरी कहते हैं कि ये तालीबान के लिए स्वर्णिम अवसर है। उन्हें अमेरिका को बातचीत के लिए पत्र लिखने की जगह अफगान सरकार से बात करनी चाहिए। अब गंेद उनके पाले में है, देखना होगा कि वो शरिया के खिलाफ कत्लोगारत जारी रखते हैं और अपनी मर्जी चलाते हैं या लोगों की आवाज सुनते हैं। ध्यान रहे कि अगर अफगान सरकार तालीबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं तो उनसे भी ये अपेक्षा की जाती है कि उन्हें भी अफगान सरकार को मान्यता देनी होगी और कानून के शासन का सम्मान करना होगा जिसमें महिलाओं के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है जिसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बहुत महत्व देते हैं।

जनवरी में हाई पीस काउंसिल के सदस्यों ने अफगान सरकार और तालीबान के बीच अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था। इसके बाद काउंसिल ने आरोप लगाया था कि कुछ देश (पाकिस्तान) अफगानिस्तान में शांति कायम करने में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि वो वहां शांति के पक्षधर नहीं हैं। काउंसिल के प्रमुख मौहम्मद करीम खलीली ने हालांकि कहा कि तालीबान के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी है और तालीबान को बातचीत की मेज तक लाने के तौर-तरीके तलाशे जा रहे हैं। उन्होंने देश के 26 प्रांतों में 280 बैठकें की हैं और उन्हें उम्मीद है कि इनके कारण तालीबान को औपचारिक बातचीत के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी। जाहिर है पीस काउंसिल के प्रयासों से घनी के शांति प्रयासों को भी बल मिला होगा।

अब देखते हैं कि इसके विषय में अमेरिका क्या सोचता है। अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए घनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि वो आतंकवादियों पर तब तक दबाव जारी रखेगा जब तक वो हार नहीं मान लेते। अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत जाॅन आर बास ने कहा कि हम एक बार फिर तालीबान का आहवान करते हैं कि वो बिना शर्त अफगान सरकार से वार्ता शुरू करे। वो कहते हैं ”तालीबान युद्ध के मैदान में ही नहीं, मादक पदार्थों से आमदनी और आय के स्रोतों पर भी काफी दबाव महसूस कर रहे हैं, क्षेत्रीय देशों सहित इतने सारे देशों की अपील के बाद उनपर दबाव और बढ़ गया है, जब तक हमें फर्क नजर नहीं आता, हम अफगान बलों की सहायता जारी रखेंगे।“ अमेरिकी सेना ने नवंबर से ही तालीबानी ठिकानों, उनके प्रशिक्षण शिविरों, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं पर हमले बढ़ा दिए हैं। उधर पेंटागन प्रवक्ता दाना वाइट ने कहा है कि तालीबान को आतंक छोड़ना होगा और उसे अफगान संविधान का सम्मान करना ही होगा और फिर उन्हें वार्ता की मेज पर आना होगा।

आखिर में पूर्व अमेरिकी राजनयिक और अफगान मामलों के जानकार बरनेट रूबिन की राय। वो कहते हैं कि “अफगान सरकार का प्रस्ताव अच्छा है और तालीबान बातचीत के लिए तैयार भी होता दिख रहा है, लेकिन वो सीधे अमेरिका से बात करना चाहता है क्योंकि उसकी सरकार अमेरिका ने ही गिराई थी। इस्लामाबाद प्रत्यक्ष रूप से भले ही ताजा शांति प्रस्ताव का स्वागत करे पर बहुत कम संभावना है कि वो इसके लिए तालीबान पर दबाव नहीं डालेगा क्योंकि वो उसकी दोस्ती को नहीं खोना चाहता। मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कोई ठोस प्रयास करेगा। ये सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत इस विषय में कोई ठोस पहल करेगा। हकीकत ये है कि पाकिस्तान पर अमेरिका से ज्यादा प्रभाव चीन का है।”

जाहिर है अफगानिस्तान में शांति की राह में काफी पेंच हैं। खून खराबे के बावजूद अफगान सरकार शांति के लिए भी प्रयास करना चाहती है, वहीं अमेरिका की नीति है तालीबान और उसके आका पाकिस्तान को उनके घुटनों पर लाना। उधर पाकिस्तान तालीबान के साथ मिलकर दोहरा खेल खेल रहा है। जाहिर तौर पर तो वो शांति प्रस्ताव स्वीकार करता है पर तालीबान के जरिए उसपर शर्तें लगवाता है। वो अप्रत्क्ष रूप से अमेरिका को बाध्य करना चाहता है कि वो तालीबान को असली अफगान सरकार के रूप में स्वीकार करे। यही तालीबान का प्रस्ताव भी है।

असल में अफगानिस्तान में शांति तभी आ सकती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना बगल बच्चा बनाने की नीति छोड़े। इस नीति में तालीबान उसका महत्वपूर्ण हथियार है, इसीलिए वो उसे संरक्षण, प्रशिक्षण और हथियार भी देता है। तालीबान के खात्मे का मतलब है, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का खात्मा। यही वजह है कि जाहिर तौर पर काबुल प्रोसेस के प्रस्तावों का समर्थन करने के बावजूद वो इन्हें अमली जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। तालीबान ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। अपने एक ट्वीट में इसके प्रवक्ता ने कहा है कि घनी का प्रस्ताव “सामूहिक समर्पण का षडयंत्र है।”

घनी ने तालीबान की व्यापक हिंसा के बावजूद उदारता दिखाई, लेकिन पाकिस्तान और तालीबान ने इसमें सेंध लगा दी है। लगता है जैसे मामला जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। लेकिन ऐसा नहीं है, कई सतहों पर बातचीत जारी है। वैसे भी अब हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकना पहले जितना आसान नहीं है। घनी के प्रस्ताव में पलीता लगा कर पाकिस्तान और तालीबान अपना ही अहित करेंगे। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची में शामिल करवा चुका है, अगर ऐसी ही चला तो उसे ब्लैक लिस्ट में भी शामिल किया जा सकता है। ताजा खबरों के मुताबिक अब यूरोपियन यूनियन भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।

दीवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज और आतंकवाद से जूझ रहा है। वो विनाश के रास्ते पर और आगे बढ़ेगा या संभलेगा…उसे अफगानिस्तान का सपना प्यारा है या देश की जनता का कल्याण? ये पाकी सेना को तय करना है।

“फैटएफ की ग्रे लिस्ट और पाकिस्तान के समक्ष विकल्प” in Punjab Kesari

पाकिस्तान ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (फैटएफ) की ग्रे लिस्ट से बचने के लिए पूरा दम लगा दिया, लेकिन बच नहीं पाया। 37 देशों के इस संगठन में जब निर्णायक मतदान हुआ तो सिर्फ तुर्की ने ही उसका साथ दिया। रूस, सउदी अरब, और ‘गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल’, जीसीसी (इसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतार, सउदी अरब और युनाइटेड अरब अमीरात शामिल हैं) ही नहीं, उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। खाड़ी के देशों को जहां अमेरिका ने संभाला, वहीं रूस को भारत ने समझा लिया। वर्तमान अध्यक्ष इटली के बाद चीन इस संगठन की कमान संभालना चाहता है। इस लिए ‘महज एक पाकिस्तान’ के लिए उसने अन्य सदस्यों से टकराव मोल न लेने और अपने हितों को लफड़े में न डालने का फैसला किया। वैसे भी चीन को लगता है कि अगर फैटएफ के फैसले के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी तो उसे वहां पांव और पसारने का मौका मिलेगा।

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि फैटएफ एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है जो दुनिया भर में टेरर फंडिंग और मनी लाॅंड्रिंग करने वाले देशों पर नजर रखती है। इसमें 37 सदस्य होते हैं। 35 राष्ट्र और दो क्षेत्रीय संगठन (गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल, जीसीसी और यूरोपियन कमीशन, ईसी)। ग्रे लिस्ट में आने के बाद पाकिस्तान का दूसरे देशों के साथ वित्तीय लेन-देन और मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ग्रेडिंग एजेंसियां पाकिस्तान की ग्रेडिंग और गिरा सकती हैं। इससे उसे बाजार से कर्ज लेने में भी मुश्किल आएगी। इससे पहले से ही मुश्किल में पड़ी अर्थव्यवस्था और जर्जर हो सकती है। ग्रे लिस्ट संबधी प्रावधान आगामी जून में लागू होंगे। तब तक आतंकवाद से लड़ने के बारे में पाकिस्तान के दावों की समीक्षा की जाएगी। अगर वो फैटएफ को संतुष्ट नहीं कर पाया तो उसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया जाएगा। ध्यान रहे वर्ष 2012-15 के बीच भी पाकिस्तान इस लिस्ट में शामिल था

कर्ज और आतंकवाद में आकंठ डूबा परजीवी पाकिस्तान, अमेरिका से तलाक के बाद विश्व राजनय में नए विकल्प या कहें कि दोस्त तलाश रहा था। ऐसे में फैटएफ ने उसे तगड़ा झटका दिया है। पाकिस्तानी सेना चीन को अपने सदाबहार दोस्त के रूप में आवाम के सामने पेश करती थी, लेकिन चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वो पाकिस्तान के साथ दोस्ती को अपने हितों के आड़े नहीं आने देगा। वैसे भी चीन पाकिस्तानी सेना को बार बार संकेत देता रहा है कि वो उसके द्वारा चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को अधिक समय तक समर्थन नहीं दे पाएगा।

वर्ष 2015 में जब पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से बाहर आया तो उसके दो कारण थे। एक – अमेरिका का समर्थन और दो – उसने आतंकवाद से लड़ने के लिए लिए एक नेशनल एक्शन प्लान तैयार किया और दुनिया को भरोसा दिलाया कि वो इसके जरिए आतंकवाद के गढ़ों को नेस्तनाबूद कर देगा। लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने जिस बारीकी से पाकिस्तान की हरकतों पर नजर रखनी शुरू की, उससे पाकिस्तान का बचना नामुमकिन हो गया। पता लगा कि नेशनल एक्शन प्लान के तहत सिर्फ उन कथित ‘आतंकवादियों’ का सफाया करने की कोशिश की गई जो सेना की मंशा के खिलाफ देश के भीतर मुहिम चला रहे थे। इसमें बलूची तथा पख्तून स्वतंत्रता सेनानियों और मुहाजिरों का कत्लेआम किया गया, लेकिन भारत और अफगानिस्तान में आतंक फैलाने वाले संगठनों (स्ट्रैटेजिक असेट्स) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अपने ही लोगों का कत्लेआम करने के बाद पाकी सेना ने दुनिया में दावा किया कि उसने आतंकियों का सफाया करने के लिए ठोस कार्रवाई की है और अब दुनिया को उससे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने का तकाजा बंद कर देना चाहिए। सेना के इशारे पर पाकी मीडिया ने इसका खूब प्रचार किया और जनता भी बहुत हद तक इसे सही समझ बैठी। पाकिस्तान ने दुनिया के गले ये बात उतारने की कोशिश की कि अब उसके यहां कोई आतंकवादी नहीं बचा, सभी आतंकवादी अफगानिस्तान में हैं। ये बात अलग है कि बहुत से सयानों ने इसे मानने से इनकार कर दिया और सेना को बार-बार सलाह दी कि वो पुरानी नीतियों से बाज आए।

ट्रंप प्रशासन ने भी आतंकवाद से लड़ने के पाकिस्तानी दावों को मानने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने अपने एक ट्वीट पर पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि अमेरिका ने उसे अरबों डाॅलर दिए, लेकिन इसके बदले में उसने सिर्फ धोखा दिया। पेरिस में जब फैटएफ की बैठक चल रही थी, तब भी वाइट हाउस प्रवक्ता राज शाह ने कहा कि अमेरिका, आतंकवाद के सफाए के पाकिस्तानी दावों से संतुष्ट नहीं है। शाह की बात में दम भी था क्योंकि बैठक के दौरान ही पाकिस्तानी आतंकी भारत में घुसने की कोशिश कर रहे थे और युद्धविराम को ताक पर रख पाकी सेना उनकी सुरक्षा के लिए ताबड़तोड़ फायरिंग कर रही थी। अफगानिस्तान में भी हालात बेहतर नहीं थे।

जाहिर है दुनिया भर में रूसवा होने और खुद पाकिस्तान के तबाह होने के बावजूद, सेना अपने हितों के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल करने की नीति से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है। इसकी बजाए वो आतंकी संगठनों को नया जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। अफगान तालीबान को आईएसआईएस के रूप में पेश किया जा रहा है और दावा किया जा रहा है कि इनपर पाकी सेना का कोई नियंत्रण नहीं है। उधर लश्कर ए तैयबा को मिल्ली मुस्लिम लीग का नया नाम देकर राजनीति में उतारा जा रहा है। कहने को तो पाकिस्तान सरकार ने ठीक फैटएफ की बैठक से पहले अध्यादेश भी जारी किया जिसके तहत देश में हर वो आतंकी संस्था स्वतः प्रतिबंधित हो जाएगी जिसे संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंधित घोषित किया है। लेकिन इसमें भी अनेक किंतु-परंतु हैं। आगामी आम चुनावों को देखते हुए सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का एक बड़ा तबका इसे अमल में लाने के लाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि भारत विरोधी सभी संगठनों का अड्डा पंजाब में है जो उसका सबसे मजबूत गढ़ है। पंजाब में फिलहाल अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शाबाज शरीफ मुख्यमंत्री हैं।

शक्तिशाली पाकी सेना का एक बड़ा तबका भी इसके विरोध में है। इसका मानना है कि पाकिस्तान परंपरागत युद्ध में भारत और अमेरिका से नहीं जीत सकता, इसलिए उनके खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल और प्राॅक्सी वाॅर जायज है। ये जनता को समझा रहे हैं कि आतंकियों के सफाए से पाकिस्तान कमजोर हो जाएगा और फिर अमेरिका और भारत उसके साथ मनमानी करेंगे।

फैटएफ ने भले ही पाकिस्तान को बहुत तगड़ा झटका दिया है। लेकिन इसकी बिना पर ये मानना भी गलती होगी कि चीन ने उसका साथ छोड़ दिया है। ध्यान रहे ये चीन ही था जिसने पिछले वर्ष जून में उसे शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइसेशन (एससीओ) में प्रवेश करनें मदद की। एससीओ मूलतः छह देशों का संगठन है जिसमें चीन और रूस के अलावा मध्य एशियाई देश उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं। बता दें कि पाकिस्तान के साथ ही भारत को भी इसमें शामिल किया गया।

एसीओ में शामिल होने के बाद पाकिस्तान ने अपनी जनता को ये दिखाने की कोशिश की कि भारत-अमेरिका गठबंधन के बरक्स अब पाकिस्तान-चीन-रूस का गठबंधन उभर रहा है। जनता को ये भी बताने की कोशिश की गई भले ही अमेरिका मदद न दे, भले ही भारत उसे अलग-थलग करने की कोशिश करे, पर पाकिस्तान दुनिया में अकेला नहीं है। ंरूस और चीन के अलावा, सउदी अरब, तुर्की और ‘गल्फ काॅआॅपरेशन काउंसिल’ भी पाकिस्तान के साथ हैं।

फैटएफ में भले ही रूस ने पाकिस्तान का साथ न दिया हो, पर इसपर लाॅबिंग के लिए जब पाकी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ रूस गए तो उन्होंने वहां न केवल रूसी विदेश मंत्री सेरगेई लेवारोव के साथ मुलाकात की बल्कि संयुक्त घोषणापत्र भी जारी किया। भारतीय विदेश विभाग और विदेशनीति विशेषज्ञों को यह घोषणापत्र अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि ये पाकिस्तानी आतंकवाद के प्रति भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका के नेरेटिव के बरक्स एक वैकल्पिक नैरेटिव पेश करता है जो असल में पाकिस्तान का नैरेटिव ही है। यह कहता हैः

”हमारी बैठक में अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों पर विशेष ध्यान दिया गया। हम दोनों अफगानिस्तान में सुरक्षा की बिगड़ति स्थिति, बढ़ती आतंकी कार्रवाइयों, नारकोटिक्स के खतरों और मजबूत होते आईएआईएस से चिंतित हैं। दुर्भाग्य से हमें यह कहना पड़ रहा है कि यहां बरसों से मौजूद अमेरिका और नैटो की सैन्य मौजूदगी अफगान लोगों को स्थायित्व और शांति प्रदान करने में असफल रही है। यही नहीं, हाल ही में अमेरिका द्वारा पेश की गई अफगान रणनीति सशस्त्र शत्रु के खिलाफ अधिक सेना और सैन्य दबाव बनाने की आवश्यकता पर बल देती है। माॅस्को और इस्लामाबाद इस नीति को दिशाहीन मानते है। हमारा मानना है कि अफगानिस्तान में अफगान लोगों के नेतृत्व और क्षेत्रीय राज्यों के हितों के सम्मान पर आधारित राष्ट्रीय सुलह-सफाई की प्रक्रिया जल्दी से जल्दी शुरू होनी चाहिए। “

जाहिर है रूस ने अफगानिस्तान में आतंकवाद पर पाािकस्तान की भूमिका और डबलक्राॅस को नकार कर आईएसआईएस और अमेरिका को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया और अमेरिका की नयी दक्षिण एशिया नीति के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया। यही नहीं ‘क्षेत्रीय राज्यों के हितों’ के नाम पर अफगानिस्तान मसले में पाकिस्तान को प्रमुख भूमिका देने की संस्तुति भी कर दी। इस घोषणापत्र में पाकिस्तान ने फिलिस्तीन और सीरिया पर रूस की भूमिका का समर्थन किया। जाहिर है रूस और पाकिस्तान का संयुक्त घोषणपत्र नए समीकरणों की ओर इशारा करता है। ये कहीं न कहीं ये भी बताता है कि दुनिया में एक बार फिर सुपर पावर बनने को लालायित रूस ये भूलने के लिए भी तैयार है कि कभी पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ मिलकर सोवियत संघ को तोड़ने में मदद की थी।

अमेरिका के दबाव में फैटएफ में भले ही पाकिस्तान पर फंदा कस गया हो पर ध्यान रहे, रूस और चीन समेत कुछ देश हैं जो अब भी पाकिस्तान से सहानुभूति रखते हैं। भारत को ऐसे देशों पर निगाह बनाए रखनी होगी। रूस तो भारत का पुराना और विश्वस्त सहयोगी है। जब भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी तो रूस ने पूरा समर्थन दिया था। भारत को रूस को लगातार वस्तुस्थिति से अवगत कराते रहना चाहिए। रूस को समझाना पड़ेगा कि पाकिस्तानी आतंकवाद भारत और अफगानिस्तान के लिए ही नहीं अततः उसके लिए भी खतरा साबित होगा। बजाए पाकिस्तान का नैतिक समर्थन करने के वो उसे अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार करे।

बहरहाल जून तक की समीक्षा अवधि के बावजूद पाकिस्तान का ग्रे लिस्ट से बचना असंभव लग रहा है। इसका सबसे बड़ी वजह पाकिस्तानी सेना है जो अपने रंग-ढंग बदलने के लिए तैयार नहीं है। पहले उसके झूठे आश्वासनों के आधार पर अमेरिका उसे उबार लेता था, लेकिन अब भले ही चीन फैटएफ का अध्यक्ष बन जाए, वो उसकी मदद नहीं कर पाएगा। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका मानता है कि अब वक्त आ गया है जब सेना सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों को पूरी तरह निर्वाचित सरकार के हाथों मंे सौंप दे और कश्मीर और अफगानिस्तान को छोड़ सारा ध्यान और संसाधन देश के आम नागरिकों के भले में लगाए।

कुछ पाकिस्तानी बातवीर सलाह दे रहे हैं कि सरकार फैटएफ के अस्तित्व को ही नकार दे। कोई उनसे पूछे कि क्या फैटएफ के सदस्य और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके बावजूद उन्हें छोड़ दंेगे?

पाकिस्तान पर आर्थिक शिंकजा धीरे-धीरे कस रहा है…अभी ग्रे लिस्ट, फिर ब्लैक लिस्ट। इनके प्रावधानों की वजह से वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल माॅनिटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से सस्ता कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा। वैस भी इनमें अमेरिका का दबदबा है जो स्वयं पाकिस्तानी वित्तीय सहायत पर लगाम लगा चुका है। अगर पाकिस्तान अब भी बाज नहीं आया तो अगला कदम सैन्य बल के इस्तेमाल का ही होगा जो पाकिस्तान की रही सही कमर भी तोड़ देगा।

जाहिर है पाकिस्तान आज दोराहे पर है। एक तरफ शांति और विकास की राह है तो दूसरी तरफ कश्मीर और अफगानिस्तान पर कब्जे का सपना जो सिर्फ विनाश की ओर ही ले जाता है। असली फैसला, जैसा कि हम जानते हैं, पाकी सेना को करना होगा। अगर पाकी सेना को याद न हो तो याद दिला दें – कश्मीर में कबाइलियों के भेष में सैनिक भेजने से लेकर कारगिल तक, हर बार हमला खुद पाकिस्तान ने किया है, भारत ने नहीं। भारत तो परमाणु हथियार तक पहले न प्रयोग करने की घोषण कर चुका है। पाकिस्तान का दुश्मन भारत नहीं खुद सेना है। अगर वो अपनी नीतियां बदल ले तो पाकिस्तान बदल सकता है।