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“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

“मोदी के नेतृत्व में नई उंचाइयों पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध” in Punjab Kesari

कुछ विपक्षी दलों ने बिना जाने-समझे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। मुसलमान वोटों की सांप्रदायिक राजनीति करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झप्पी को लेकर अपमानजनक ट्वीट तक कर डाले। लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी इस पार्टी से ऐसे बचकाने बर्ताव की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन आजकल ये पार्टी जिन हाथों में है और जैसे लोग इसका सोशल मीडिया विभाग संभाल रहे हैं, उनसे किसी परिपक्वता की आशा करना भी बेमानी है।

कांग्रेस भूल गई कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उसने झूठा दुष्प्रचार करके उनकी अमेरिका यात्रा तक पर प्रतिबंध लगवा दिया था। लेकिन इसके बावजूद मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जाॅर्ज बुश और बराक ओबामा के समझौतों का न केवल सम्मान किया बल्कि उन्हें आगे भी बढ़ाया। मोदी ने अपनी अमेरिका नीति में बिना किसी दुराग्रह के सिर्फ एक बात का ध्यान रखा और वो है – भारतीय हित।

पिछले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए उल्लेखनीय सुधार की अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो पता चलेगा कि ये उपलब्धियां एक दिन में हासिल नहीं हुईं। इनके पीछे दोनों देशों में विकसित हुई गहरी समझ है जिसे पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी ने आगे बढ़ाया। दीगर बात ये है कि दोनों देशों में सरकारें बदलीं, लेकिन परस्पर हितों में सहयोग और सामंजस्य की जो समझ विकसित हुई वो अक्षुण्ण रही। बहुमत के साथ सरकार में आए मोदी ने तो इसे नई ऊर्जा और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया। आज हम निसंदेह ये कह सकते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध आज जिस उंचाई पर हैं और जितने मजबूत हैं, वैसे पहले कभी नहीं थे।

जून 7, 2016 को अमेरिका ने भारत के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ (महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी) घोषित किया। इस वक्तव्य का शीर्षक था – द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाः एनड्योरिंग ग्लोबल पार्टनर्स इन द ट्वंटी फस्र्ट सेंचुरी (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारतः 21वीं सदी में स्थायी वैश्विक सहयोगी)। पिछले साल 22 अगस्त को ट्रंप द्वारा घोषित की गई नई दक्षिण एशिया नीति में इसकी प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है। ट्रंप ने इसमें न केवल भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में भारत की महत्वपूण भूमिका को रेखांकित किया बल्कि पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भी उसे अपना सहयोगी घोषित कर दिया। अमेरिका ने मोदी के कार्यकाल में भारत को दुनिया के चार बड़े मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम (बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं) में से तीन में प्रवेश करने की मदद की। ये हैं – मिसाइल टेक्नोलाॅजी कंट्रोल रिजीम (प्रवेश तिथि – जून 27, 2026), वासनर अरेंजमेंट (प्रवेश तिथि – दिसंबर 7, 2017) और आॅस्ट्रेलिया ग्रुप (प्रवेश तिथि – जनवरी 19, 2018)। चैथा महत्वपूर्ण मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम है – न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप। अमेरिका ने इसमें प्रवेश के लिए भी पूरी मदद की लेकिन चीन के अड़ियल रवैये के कारण भारत इसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि इसके लिए भी प्रयास जारी है।

भारत को विश्वस्त सहयोगी मानते हुए अमेरिका ने इसी वर्ष 31 जुलाई को भारत को स्ट्रैटेजिक ट्रेड आॅथोराइजशन -1 (एसटीए – 1) देश का दर्जा दिया। बहुत जल्दी, यानी चार अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इसके पश्चात भारत का दर्जा अमेरिका के नैटो (नाॅर्थ एटलांटिक ट्रीटी आॅर्गनाजेशन) सहयोगियों के समकक्ष हो गया। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले उत्पाद और रक्षा उपकरण बिना कानूनी अड़चनों और भारी-भरकम कागजी कार्यवाही के बेच सकेगा। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर राॅस के अनुसार एसटीए – 1 का दर्जा भारत को रक्षा क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात के लिए बेहतर अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत के दर्जे में यह महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले सात वर्षों में भारत अमेरिका से 9.7 अरब डाॅलर का उच्च तकनीक का सामान खरीद सकता था, लेकिन विभिन्न प्रतिबंधों के कारण यह संभव नहीं हो सका, परंतु अब ये संभव हो सकेगा।

अमेरिका ने जिन 36 देशों को ये दर्जा दिया है उनमें से अधिकतर नैटो सहयोगी हैं। अब तक एशिया में ये दर्जा सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान को ही दिया गया था। जाहिर है भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कदम को स्वागत किया। मंत्रालय ने कहा – “भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किए जाने का ये तार्किक उत्कर्ष है। ये इस बात को एक बार फिर स्थापित करता है कि संबंधित बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के जिम्मेदार सदस्य के रूप में भारत का रिकाॅर्ड बेदाग है। इससे भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस बीच दो अगस्त को अमेरिकी संसद ने नेशनल डिफेंस आॅथोराइजेशन एक्ट – 2019 के तहत भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकास एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काटसा) से छूट देने का विधेयक भी पारित कर दिया। भारत रूस से लगभग 4.5 अरब डाॅलर की लागत से एस-400 ट्राइंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहता है जिसमें रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से बाधा आ रही थी। बराक ओबामा के कार्यकाल में वाइट हाउस में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और सेनेट आम्र्ड सर्विसेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य रहे अनीश गोयल कहते हैं कि काटसा छूट के लिए अमेरिकी संसद की प्रशंसा की जानी चाहिए। ऐसा करके संसद ने दोनों देशों के संबंधों में आने वाले तनाव को दूर कर दिया है। ये इस बात का मजबूत संकेत है कि अमेरिका, भारत से अपने संबंधों को कितना महत्व देता है।

पिछले कुछ ही दिनों में अमेरिका ने जिस सक्रियता से भारत के साथ उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के क्षेत्र में पेश आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है और जैसे भारत की रक्षा जरूरतों को समझते हुए रूस से उच्च तकनीक वाली रक्षा सामग्री खरीदने के लिए छूट दी है, उससे भारत के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता तो प्रकट होती ही है, साथ में यह भी स्पष्ट होता है कि वो भारतीय-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक रीजन) में अपनी रणनीति को लागू करने के विषय में कितना गंभीर है जहां चीन का व्यावसायिक और रणनीतिक दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

चीन अगले 50 वर्षों के दौरान अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहा है। म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों तक ही नहीं चीन ने मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तक में अपने पैर पसारे हैं। वो दुनिया के 76 देशों में परियोजनाएं विकसित कर रहा है और रेल, सड़क, समुद्री मार्गों से ही नहीं दुनिया भर से वायु मार्गों से जुड़ने की योजना भी बना चुका है।

चीन को लगता है कि जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन और 20वीं सदी में अमेरिका की शक्तिशाली नौसेनाओं ने नौसैनिक अड्डों के विश्वव्यापी नेटवर्क के माध्यम से अपने व्यापारिक अधिपत्य को बढ़ाने का काम किया, वैसे ही अगर उसे भी अगली सदी में आगे बढ़ना है तो उसे भी दुनिया भर में, और खासतौर से भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में अपने अड्डे बनाने होंगे जहां विश्व के व्यस्ततम जलमार्ग मौजूद हैं। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वो सिर्फ अड्डे ही नहीं बना रहा, लंबी चैड़ी नौसेना भी तैयार कर रहा है।

चीन की नीयत और योजनाएं अब किसी से छुपी नहीं हैं। जाहिर है अमेरिका ने इसकी काट निकालने के लिए योजना तैयार कर उसे लागू करना भी शुरू कर दिया है। भारत इस योजना का महत्वपूर्ण अंग है। अगर अमेरिका ने इस क्षेत्र में भारत को अपना सहयोगी चुना है तो उसे तकनीकी और सैन्य दृष्टि से मजबूत भी बनाना होगा, उसे आधुनिकतम हथियार भी देने होंगे। अमेरिका ने इसके लिए ईमानदारी से प्रयास भी किए हैं। इस पूरी योजना का रणनीतिक महत्व है तो यह भी सच है कि इससे अमेरिका को हथियारों का नया और बड़ा बाजार भी मिलेगा। भारत को चाहिए कि वो अमेरिका का सहयोगी तो बने पर अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए। चीन जैसे पड़ोसी देश को दुश्मन न बनाया जाए, लेकिन उसके अतीत को देखते हुए तैयारी भी पूरी रखी जाए।

आगामी छह सिंतबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मैटिस की भारतीय विेदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ 2$2 वार्ता है। ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के शिखर सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण अमेरिका में प्रस्तावित यह वार्ता पहले टाल दी गई थी, अब ये भारत में होगी। 2$2 वार्ता में भारत के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री एक साथ अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री से बात करते हैं ताकि दोनों क्षेत्रों के बारे में समग्र और व्यापक बातचीत हो सके और अड़चनें दूर कर राजनयिक और रणनीतिक मसलों को जल्दी से जल्दी सुलझाया जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के संबंधों में आपसी समझ और गहरी होगी और जमीनी स्तर भी कामकाज को और गतिशील बनाया जा सकेगा।

“इमरान! तुम सेना के बूट पाॅलिश करने वाले नहीं तो और क्या हो?” in Punjab Kesari

चुनावी नतीजे आने के बाद अपने पहले विजय संबोधन में इमरान खान ने भारतीय मीडिया से शिकायत की कि उसने उन्हें बाॅलीवुड फिल्मों के विलेन (आतंकी पाकी सेना के एजेंट) के तौर पर पेश किया। अगर इमरान के नजरिए से देखें तो हो सकता है कि उनकी शिकायत जायज हो, लेकिन अगर ठोस तथ्यों के आधार पर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मीडिया का रवैया बहुत हद तक सही है। वैसे भी भारतीय मीडिया इमरान की तरह सेना के इशारों पर नहीं चलता जिन्हें उनकी दूसरी पूर्व पत्नी रेहाम खान सेना का ‘बूट पाॅलिशर’ करार दे चुकी हैं।

भारतीय मीडिया अगर इमरान को सेना का एजेंट मानता है जो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। बात शुरू करते हैं प्री-पोल रिगिंग से यानी चुनाव से पहले की धांधली से। क्या ये अकस्मात था कि पाकिस्तानी अदालतों ने चुनाव से एन पहले ताबड़तोड़ कई फैसले सुनाए और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को जेल भिजवा दिया? क्या ये महज संयोग था कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज (पीएमएलएन) के अनेक मजबूत उम्मीदवारों को धमकाया गया और पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया गया? क्या ये संयोग था कि चुनाव प्रचार के दौरान इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को वरीयता दी गई जबकि पीएमएलएन और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को अनेक स्थान पर रैली करने की इजाजत तक नहीं दी गई? आखिर किसकी शह पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद के गुर्गों को चुनाव लड़ने की मोहलत दी गई? आखिर क्यों एन चुनाव से पहले 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना और घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया? आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने इमरान को जिताने के लिए पूरी बिसात बिछाई….इतनी मेहनत (धांधली) की? आखिर क्यों सेना और इमरान की आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूजचैनलों पर गाज गिराई गई, उनका प्रसारण का रोका गया?

इसका जवाब इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ने दिया। उन्होंने इसके लिए साफ तौर से पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने साफ कहा कि आईएसआई अपने इरादे पूरे करने के लिए अदालतों, मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सबको धमकाती है। जज सिद्दिकी को 30 जुलाई को उनकी इस ‘हिमाकत’ के लिए सजा भी दे दी गई। वो इमरान खान नाअहली (अयोग्यता) केस की सुनवाई करने वाली डिवीजनल बैंच के सदस्य थे। उन्हें बड़ी बेशर्मी से इससे हटा दिया गया और उनकी जगह जज मियां गुल हसन औरंगजेब को शामिल किया गया। इस मामले की सुनवाई एक अगस्त को होनी है, लेकिन फैसला क्या आएगा, लगता है ये भी पहले ही तय हो चुका है।

अब बात करते हैं चुनाव के दौरान होने वाली धांधलियों की। आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि ये सिर्फ भारतीय मीडिया नहीं था जिसने पाकिस्तानी चुनावों को फर्जी करार दिया। पाकिस्तान के अनेक दलों ने चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार किया है। पीएमएलएन और पीपीपी ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे तक मांग लिए। 27 जुलाई को विपक्षी दलों की बैठक में पीएमएलएन और मुŸााहिदा मजलिए-ए-अमल ने चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। नेशनल असेंबलीऔर राज्यों की विधानसभाओं के करीब 300 उम्मीदवारों ने फिर से मतगणना की मांग की है।

इमरान खुद को पाकिस्तान का नया हीरो मानने की गलतफहमी पाल सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें खुद नहीं सोचना चाहिए कि उनकी और आईएसआई की इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद क्यों वो नेशनल असेंबली और पंजाब विधानसभा में सादा बहुमत तक नहीं हासिल कर सके? ऐसा क्या हुआ कि आतंकियों को चुनाव लड़वाने की महत्वकांक्षी योजना क्यों मुंह के बल गिर पड़ी? आईएसआई की पूरी मेहनत के बावजूद वो एक सीट तक नहीं हासिल कर सके?

इमरान क्या इस बात का जवाब देना चाहेंगे कि जो मतगणना चंद घंटों में पूरी हो जाती है, वो चार दिन तक भी पूरी क्यों नहीं हो सकी? नेशनल असेंबली की करीब 18 सीटें ऐसी हैं जिनमें इमरान की पार्टी की जीत का अंतर 1,000 मतों का भी नहीं है। 23 सीटों में जीत का अंतर 5,000 से भी कम है, जबकि 41 सीटों में 10,000 से भी कम। ध्यान रहे इन सीटों पर रिजेक्टेड वोट हजारों में हैं।

मतगणना में देरी क्यों की गई? अन्य सीटों के मुकाबले चुनींदा सीटों पर ही रिजेक्टेड वोट इतनी बड़ी तादाद में क्यों पड़े? क्या पाकिस्तान के वोटर इतने जाहिल हैं कि वो ठीक से वोट तक नहीं दे सकते? आखिर एन चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग का सर्वर क्यों जवाब दे गया? ऐसे हालात में पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी क्यों आंख मंूद कर मान ले कि पाकिस्तानी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुए?

27 जुलाई को इस्लामाबाद में अपने संवाददाता सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के निगरानी दल ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से अवसर नहीं मिला। इमरान भले ही इस बार के चुनावों को सबसे साफ-सुथरे बता रहे हों, लेकिन यूरोपियन यूनियन इलेक्शन आॅब्सर्वेशन मिशन (ईयूईओएम) के चीफ आॅब्सर्वर माइकल गेहलर ने साफ कहा, “इस बार के चुनाव 2013 के चुनावों जितने अच्छे नहीं थे। हालांकि सभी पार्टियों को निष्पक्ष तरीके से समान अवसर देने के लिए अनेक वैधानिक उपाय मौजूद थे, लेकिन हमारा निष्कर्ष है कि न तो इस मामले में समानता बरती गई और न ही पार्टियों को बराबरी से अवसर मिले। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व सŸाारूढ़ दल को हानि पहुंचाने के लिए व्यवस्थागत तरीके से प्रयास किए गए। राजनीतिक दलों, नेताओं, उम्मीदवारों और चुनाव अधिकारियों पर लगातार हमलों ने चुनाव प्रचार के माहौल को प्रभावित किया।“

यूरोपियन पार्लियामेंट इलेक्शन आॅब्सर्वेशन डेलीगेशन के प्रमुख जीन लैम्बार्ट ने मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में फौजियों की उपस्थिति पर आपŸिा दर्ज करवाई। उन्होंने कहा, “हम मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में सुरक्षाबलों की उपस्थिति से हैरान थे। हम सुरक्षा की आवश्यकता समझते हैं, लेकिन चुनाव सिविल सोसायटी का काम होता है, हम चाहते हैं कि इसमें सेना से ज्यादा सिविल संस्थाओं का सुपरविशन हो, खासतौर से मतदान केंद्रों के भीतर जहां लोग वोट डालते हैं।”

यही नहीं काॅमनवेल्थ पर्यवेक्षकों ने भी अनेक विषयों पर आपŸिा जताई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में कहा, ”शासन-प्रणाली की मजबूत लोकतांत्रिक और सिविल संस्थाओं का विकास पाकिस्तान के दीर्घकालिक स्थायित्व और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में अमेरिका, मतदान पूर्व चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों को लेकर पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की चिंताओं से सहमति जताता है। इनमें अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना भी शामिल है….हम इस विषय में ईयूईओएम के निष्कर्षों से भी सहमत हैं।“

यूरोपियन यूनियन, काॅमनवेल्थ और अमेरिका इशारों ही इशारों में जिन्हें पाकिस्तान के लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे हैं, क्या इमरान उसे नहीं समझ पा रहे हैं? क्या ये ‘लोकतंत्र के दुश्मन’ ही तो इमरान के दोस्त नहीं हैं? ये सिर्फ भारत का मीडिया ही नहीं है जो उन्हें सेना का पिट्टू मानता है, पूरी दुनिया और खुद उनके देश के लोग और चुने गए स्वतंत्र उम्मीदवार भी यही मानते हैं जिन्हें इमरान को समर्थन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इमरान ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’, झूठा और न जाने क्या क्या कहा, वो हो सकता है भारत में मुसलमान वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलोें को बहुत भाया हो, लेकिन उससे करोंड़ों-करोड़ लोगों को इमरान से वितृष्णा भी हुई है। इमरान ने नवाज शरीफ को मोदी का यार बताते हुए नारा लगाया – जो मोदी का यार है, वो देश का गद्दार है। नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए पर इमरान ने उनपर ‘देश बेचने’ का आरोप लगा दिया। न केवल चुनावी भाषणों में, बल्कि अपने विजय संबोधन में भी इमरान ने जैसे कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताया और भारतीय फौज को गाली दी, उससे भारत की आम जनता का उनसे मोहभंग होना स्वाभाविक है।

ये आश्चर्यचकित ही करता है कि जो इमरान पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नवाज शरीफ को भारत से व्यापार के लिए ‘गद्दार’ बताते रहे, वो अपने विजय संबोधन में आतंकवाद को जायज ठहराते हुए भी भारत से दोस्ती के गीत गाने लगे, भारत के साथ ‘व्यापार संबंधों’ की बात करने लगे? डूबती हुई पाकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में 100 दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की है। जाहिर है, भारत के साथ व्यापारिक संबंध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्हें अब थूक कर चाटना भी मंजूर है। इमरान, शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन चले अपने धरने को इतनी जल्दी भूल जाएंगे, ऐसा सोचा भी न था।

इमरान खान! भारतीय मीडिया तुम्हें ‘बाॅलीवुड के विलेन’ की तरह नहीं पेश कर रहा, तुम्हें सिर्फ ‘सच का आइना’ दिखा रहा है। तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें पाकिस्तान के युवाओं की धड़कन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है, हालांकि हम ये भी नहीं मानते। इस बार कुल 51.85 प्रतिशत मत पड़े, इसमें सिर्फ तुम्हारे समर्थक और युवा ही नहीं, दूसरी पार्टियों के समर्थक और सभी आयुवर्ग के लोग थे। ऐसे में हमारे लिए ये बात गले के नीचे उतारना मुश्किल है कि तुम युवाओं के दिल की धड़कन हो, लेकिन जैसे आईएसआई ने तुम्हें जितवाने के लिए जी जान एक कर दिए, उससे ये तो साफ है कि तो सेना के मुखबिर हो।

भारत की सेना को लतिया कर तुम भारत के नेताओं का समर्थन नहीं हासिल कर सकते। पाकिस्तान के आवाम ने हाफिज सईद के उम्मीदवारों को धक्का दे कर ये स्पष्ट कर दिया है कि वो आतंकवाद के समर्थक नहीं है। अगर तुम्हारी सेना खुद ये बात समझ जाए, या तुम उन्हें अपनी नीतियों बदलने के लिए तैयार कर सको तो दोनों देशोें के संबंध बेहतर हो सकते हैं। याद रखना आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। अगर तुम और तुम्हारी सेना कश्मीर सहित पूरे भारत में अपना आतंकी नेटवर्क समेटने के लिए गंभीरता दिखाओगे तो भारत तुम्हारी अवश्य मदद करेगा। पहल तुम्हें और तुम्हारी सेना को ही करनी होगी।

“आतंकियों और आईएसआई के साए में पाकिस्तानी आम चुनाव” in Punjab Kesari

पाकिस्तान में आम चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इस बार वहां की सर्वशक्तिमान सेना ने पूर्व क्रिकेट कप्तान इमरान खान नियाजी पर दांव खेला है और उसे प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए हर संभव जोड़-तोड़ की है। चुनावों में पाकिस्तानी सेना के हस्तक्षेप की तस्दीक इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिदिकी ने भी की है जिन्होंने आरोप लगाया है कि बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई मनवांछित फैसले हासिल करने के लिए न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाती है और वो नहीं चाहती की भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजे गए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को चुनावों से पहले जमानत मिले।

इमरान के साथ ही अबकी बार सारी दुनिया की नजर पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के उम्मीदवारों पर भी लगी है जो भारी तादाद में चुनाव लड़ रहे हैं। कहना न होगा कि सेना ने इन चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग या उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए किया है। लेकिन ‘मुख्यधारा में लाना’ जैसी शब्दावली इस खेल को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। असल में सेना ने आम चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों को राजनीतिक वैधता और कानूनी मान्यता दिलवाने और दुनिया को चिढ़ाने के लिए किया है। इस हरकत से सेना ने दुनिया को जता दिया है – हां हमारे देश में आतंकी हैं, हमने उन्हें पैदा किया है, हम उनकी मदद लेते हैं और हम उन्हें दुनिया के कहने से छोड़ेंगे नहीं और अब हम उन्हें संसद में भी पहुंचाएंगे। जो करना है वो कर लो, हमारे ठेंगे से।

असल में सेना के इरादों की भनक तभी लग गई थी जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को पनामा पेपर लीक मामले में अयोग्य घोषित किए जाने के बाद उनकी लाहौर (एनए-120) सीट पर अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग का उम्मीदवार याकूब शेख निर्दलीय के तौर पर खड़ा किया गया। ये सीट शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज ने जीती। यहां दूसरे स्थान पर इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की उम्मीदवार यास्मीन राशिद रहीं तो तीसरे स्थान पर याकूब शेख रहा जिसे 5,822 वोट मिले।

पाकिस्तानी चुनाव आयोग की मानें तो इस बार चुनावों में आतंकी संगठन जमात-उद-दावा सहित धार्मिक संगठनों के 460 से ज्यादा उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जो कि एक रिकाॅर्ड है। इन संगठनों में तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान और पांच इस्लामी पार्टियों का संगठन मजलिस-ए-अमाल (एमएमए) शामिल हैं। आतंकी सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग को चुनाव आयोग ने मान्यता नहीं दी है इसलिए उसके 265 उम्मीदवार अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के परचम तले चुनाव लड़ रहे हैं। हाफिज का बेटा हाफिज ताल्हा सईद और दामाद खालिद वलीद भी उसके उम्मीदवारों की सूची में शामिल हैं। ध्यान रहे मुंबई हमलों का आरोपी हाफिज सईद संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी है और अमेरिका ने उसके सर पर एक करोड़ों का इनाम रखा है।

बरेलवी विचारधारा की तहरीक-ए-लबैक या रसूल अल्लाह की राजनीतिक इकाई तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान ने 178 उम्मीवार खड़े किए हैं। ये कट्टरवादी पार्टी पिछले साल नवंबर में चर्चा में आई जब इसने खत्म-ए-नबूवत को लेकर इस्लामाबाद में धरना किया जो कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे के साथ समाप्त हुआ। धरना खत्म होने पर सेना के अफसरों ने इसके कार्यकर्ताओं में रूपए बांटे जिसकी काफी आलोचना भी हुई। सेना के लोगों ने जैसे इस तहरीक का धरना हटवाने की जगह इसके कार्यकर्ताओं को रूपए बांटे, उससे दोनों की सांठ-गांठ ही उजागर हुई।

एमएमए ने 192 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इसमें शामिल पांच संगठन हैं – जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ, जमात-ए-इस्लामी, जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान, इस्लामी तहरीक और मरकजी जमीयत अहले हदीथ। जमात-ए-इस्लामी का राजनीति इतिहास पुराना है। उसने 1970 के चुनावों में जुल्फीकार अली भुट्टो की पीपल्स पार्टी और शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग के खिलाफ भी बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे थे। वर्ष 2002 के चुनावों में एमएमए ने पूरे देश में बड़ी तादाद में उम्मीदवार लड़वाए थे, लेकिन इस बार इनकी प्रत्याशियों की संख्या सर्वाधिक है।

इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान में कट्टरवादी धार्मिक पार्टियों का चुनाव लड़ना कोई अजूबा नहीं है। लेकिन इस बार सिर्फ धार्मिक पार्टियों का ही नहीं, आतंकी पार्टियों का चुनाव में बड़ी तादाद में उम्मीदवार उतारने का आखिर मकसद क्या है। जाहिर है इसके पीछे सर्वशक्तिशाली सेना का इरादा ये है कि या तो उसका पिट्ठू इमरान खान जीते या फिर किसी को भी बहुमत न मिले। ऐसी स्थिति में जाहिर है बडे़ दलों को आतंकी संगठनों के पास समर्थन के लिए आना पड़ेगा जो नेपथ्य में और कुछ नहीं बल्कि सेना की ही प्राॅक्सी हैं। यानी येन केन प्रकारेण नियंत्रण सेना का ही रहेगा।

शायद ये सेना का ही इशारा था कि 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। फजलुर को पार्टी में शामिल करवाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता की पीटीआई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष असद उमर ने। असद मेजर जनरल गुलाम उमर का बेटा है जिस पर पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश में हजारों लोगों के कत्ल का आरोप है। वैस आगे बढ़ने से पहले ये भी बताते चलें कि इमरान खान जिनका पूरा नाम इमरान खान नियाजी है, उन्हीं जनरल अमीर अब्दुला खां नियाजी के कुनबे से हैं जिन्होंने ढाका में लेफ्टीनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष 16 अगस्त 1971 में समर्पण किया था। ध्यान रहे फजलुर रहमान अमेरिका द्वारा घोषित वैश्विक आतंकवादी है जिसके सेना से ही नहीं, अल-कायदा से भी करीबी संबंध हैं। 1996 में जब ओसामा बिन लादेन ने विश्व जिहाद की घोषणा की थी तब उसके घोषणापत्र पर ओसामा के साथ खलील ने भी हस्ताक्षर किए थे। अमेरिका ने हरकत-उल-मुजाहीदीन पर 1997 में प्रतिबंध लगा दिया था और उसे वैश्विक आतंकी संगठन घोषित कर दिया था, लेकिन 2013 में ये अंसार-उल-उम्मा के रूप में फिर सामने आया। लेकिन अमेरिका ने 2014 में इसे एचयूएम का ही दूसरा नाम करार दिया। एचयूएम पर भारत और अफगानिस्तान के अलावा खुद पाकिस्तान में भी बड़े आतंकी हमले करवाने का आरोप है।

पाकिस्तानी चुनावों में जिस तरह अतिवादी और आतंकी जमातें बढ़-चढ़ कर भाग ले रही हैं, उससे दुनिया भर में ही नहीं, स्वयं पाकिस्तान में भी चिंता है। पाकिस्तानी मानवधिकार आयोग ने चुनावों में प्रतिबंधित तंजीमों के भाग लेने की कड़े शब्दों में निंदा की है। आयोग कहता है, “हम प्रतिबंधित तंजीमों के चोरी-छुपे दूसरी तंजीमों के नाम से चुनाव लड़ने और राज्य द्वारा उन्हें चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दे कर राजनीतिक वैधता प्रदान किए जाने से शंकित हैं । इन तंजीमों ने लगातार धर्म का इस्तेमाल खतरनाक और विभाजनकारी अभियान के लिए किया है जो गंभीर चिंता का विषय है। हम चुनाव आयोग से प्रार्थना करते हैं कि वो इस बात की दोबारा जांच करे कि प्रतिबंधित संगठनों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में कैसे आ गए।“ आयोग आगे कहता है, “पाकिस्तान के चुनावों की वैधता को लेकर गंभीर शंकाएं हैं, देश में प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने की राह में इससे गंभीर बाधाएं पैदा होंगी। 25 जुलाई को होने वाले चुनाव देश के इतिहास के सबसे गंदे, मनवांछित परिणाम पाने के लिए सबसे ज्यादा बारीकी से मैनेज किए गए और सर्वाधिक भागीदारी वाले चुनाव होंगे।“

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने ही नहीं, अनेक राजनीतिक दलों ने भी चुनावों में प्रतिबंधित संगठनों के प्रतिनिधियों के भाग लेने पर चिंता जताई है। हालांकि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के अलावा लगभग सभी दलों के नेताओं ने इन तंजीमों की चैखट पर माथा टेका है। पीपीपी प्रमुख बिलावल भुट्टो ने तो आतंकवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। इमरान खान ने भी अपने घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है, लेकिन जैसे उनकी पार्टी में आतंकवादी शामिल हुए हैं, उसके बाद तो उनसे कोई उम्मीद करना ही बेकार है। नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ट्रैक रिकाॅर्ड सबसे बदतर है। वो पिछले पांच साल से सत्ता में थे, लेकिन उन्होंने इन तंजीमों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया, उल्टे सरकारी खजाने से उन्हें मदद ही दी।

पाकी सेना चुनावों के जरिए आतंकियों को राजनीतिक वैधता दिलवाने का जो खेल खेल रही है, पूरी दुनिया की नजर उसपर है। विश्व में टैरर फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्ट फोर्स पहले ही उसे ग्रे लिस्ट में डाल चुकी है। टास्क फोर्स ने उसे आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए 126 शर्तों की सूची सौंपी है। मौजूदा हालात में तो नहीं लगता कि नई सरकार, खासतौर से अगर वो इमरान खान की हुई, तो इन्हें पूरा कर पाएगी।

पाकी संसद में आतंकवादियों के आने का असर पहले से ही खराब चल रहे भारत-पाक रिश्तों पर भी पड़ेगा। भारत वैसे भी सीधे पाकी सेना से बात नहीं करता है, संसद में बैठे आतंकी आकाओं से तो क्या ही बात होगी। इमरान ने अपने घोषणापत्र में भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने और ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ शुरू करने की बात कही है। आतंकियों के साये में ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ तो क्या ‘ट्रैक टू डायलाॅग’ भी मुश्किल से हो पाएगा। पाकिस्तान आर्थिक दीवालिएपन की कगार पर तो पहले ही पहुंच चुका है। ‘लाडले इमरान’ के साथ मिलकर सेना जो खेल खेल रही है और जैसे अन्य राजनीतिक दलों को धता बता रही है, उससे तो बड़े पैमाने पर राजनीतिक असंतोष फैलने और देश के एक बार फिर टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत को फिलहाल पाकिस्तान में किसी भी तरह से दखल नहीं देना चाहिए। अगर वहां की नई सरकार अपने हालात को संभालने की गरज से कोई प्रस्ताव रखती है, तो उसे अपनी शर्तों पर ही स्वीकार करना चाहिए।

“नवाज शरीफ की वापसी, इमरान को नहीं, सेना को चुनौती है” in Punjab Kesari

स्तानी संसद के निचले सदन कौमी असेम्बली या नेशनल असेम्बली के ताजा चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को हराने के लिए करोड़ों रूपए बांटे थे। तबके आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी ने स्वयं फरवरी, 2012 में एक मुकदमे के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख मिर्जा असलम बेग ने उन्हें इसका आदेश दिया था। इस योजना के लिए धन जुटाने वाले बैंकर युनुस हबीब ने बताया कि राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान ने इस योजना के लिए 34 करोड़ रूपए मंजूर किए थे। सेना के जनरल जब बेनजीर को राजनीति से बाहर नहीं कर सके तो उन्होंने उनकी हत्या ही करवा दी। 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर एक चुनावी रैली के दौरान मारी गईं। उन्हें इसकी आशंका थी और मरने से पहले उन्होंने अपने करीबियों से अंदेशा जताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ उनकी हत्या करवा सकते हैं।

हम लौट कर ताजा चुनावों पर आते हैं। ये चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं क्योंकि इस बार भी सेना नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज को हराने और इमरान खान को प्रधानमंत्री पद की गद्दी पर बिठाने के लिए पूरी जोड़-तोड़ कर रही है। पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां जब भी कोई राजनेता सेना को चुनौती देता है या चुनौती देने लायक शक्तिशाली बन जाता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं। 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार बरखास्त कर दी। 1954 में जनरल अयूब खान की मदद से उन्होंने संविधान सभा को ही भंग कर दिया ताकि वो उनके अधिकारों में कटौती न कर पाए। 1958 में राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को हटा कर अयूब खान को मुख्य मार्शल लाॅ प्रशासक बना दिया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया और बाद में तो उन्हें फांसी ही दे दी। जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर की भी हत्या करवा दी गई। 1999 में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर मुशर्रफ न कमान संभाली तो 26 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी को एक मामले में फंसा कर चलता कर दिया गया।

नवाज शरीफ ने जब इस बार, यानी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उन्होंने सेना को तुष्ट करने की पूरी कोशिश की। विदेश और रक्षा नीति खुद सेना संभालती है, इसलिए उन्होंने चार साल तक स्वयं विदेश मंत्रालय की कमान संभाली ताकि सामंजस्य में कोई कोताही न हो। लेकिन शरीफ ने दृढ़तापूर्वक ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि लोकतांत्रिक सरकार सम्मानपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और सेना की पिछलग्गू न हो कर रह जाए। संभवतः इसी वजह से सेना को शुरू से ही लगने लगा कि अगर नवाज शरीफ के पर नहीं कतरे गए तो वो आगे चलकर पाकिस्तान में सेना के प्रभुत्व और श्रेष्ठता को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और आखिरकार सेना को सिर्फ दिखावे के लिए ही नहीं, वास्तव में भी चुने हुए प्रतिनिधियों के मातहत काम करना पड़ेगा।

भारत में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों का बुलाया। शरीफ को भी न्यौता भेजा गया। पाकी सेना ने उन्हें भारत न जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी ने गर्मजोशी से इसका जवाब भी दिया और उनके जन्मदिन पर पाकिस्तान भी गए। दोनों प्रधानमंत्री रिश्तों में बेहतरी चाहते थे, लेकिन भारत के विरोध के नाम पर रोजी-रोजी चलाने वाली पाकी सेना को ये मंजूर नहीं हुआ। नवाज शरीफ का कद छांटने के लिए कठपुतली इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को तैयार किया गया। उन्होंने नवाज शरीफ के कथित ‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन तक धरना दिया। इसके बाद नवाज शरीफ जो दबाव में आए तो उभर नहीं सके। कुछ समय बाद इमरान खान ने पनामा पेपर केस में नवाज शरीफ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया और सेना-अदालत की मिलीभगत से नवाज को पहले चुनाव लड़ने और फिर अपनी पार्टी की अध्यक्षता करने के भी अयोग्य करार दे दिया गया।

क्योंकि शरीफ के खिलाफ शिकायत सीधे सुप्रीम कोर्ट में की गई थी, कोर्ट ने सारे मामले नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (नैब) को भेज दिए जिसे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनाया गया है। नैब ने सबसे पहले उन्हें लंदन के पाॅश इलाके में बने एवनफील्ड हाउस में चार लक्जरी फ्लैट खरीदने के मामले में 10 साल कैद और आठ मिलियन पाउंड जुर्माने की सजा दी। इसी मामले में उनकी बेटी मरियम और दामाद रिटायर्ड कैप्टन सफदर को भी सजा सुनाई गई। लंदन में रह रहे शरीफ के दो बेटों हसन और हुसैन को इस मामले में पहले ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।

जब सजा सुनाई गई तब शरीफ लंदन में अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कर रहे थे जो कई दिनों से कोमा में है। सेना ने काफी कोशिश की कि वो वापस नहीं आएं। बकौल शरीफ, उन्हें धमकाया गया, लंदन में उनके घर और परिवार वालों पर हमले भी किए गए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान वापस लौटने का फैसला किया। शरीफ का कहना है कि उन्होंने लौटने का निर्णय लिया क्योंकि वो कानून का पालन करने वाले शहरी हैं जो लोकतंत्र और वोट की ताकत में यकीन रखता है। लौटते समय उन्होंने एक जुमला उछाला – वोट को इज्जत दो। लेकिन कयास लगाने वाले कयास भी लगा रहे हैं। कानून के जानकारों के मुताबिक अगर शरीफ और उनकी बेटी नियत समय सीमा में सपर्पण नहीं करते तो उन्हें जमानत भी नहीं मिलती। कुछ लोग कह रहे हैं कि वो लौटे क्योंकि उन्हें अपने से ज्यादा अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य की चिंता है जो इस दफा पहली बार चुनाव मैदान में उतरीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद बड़े पैमाने पर उनके कार्यकर्ता इमरान खान की पार्टी में शामिल हुए। शरीफ की मानें तो उनकी पार्टी में सेना के इशारे पर तोड़-फोड़ की गई और कार्यकर्ताओं को डरा-धमका कर दल बदलने को मजबूर किया गया। कभी उनके बहुत खास माने जाने वाले और सेना के साथ उनके संपर्कसूत्र रहे चैधरी निसार तक ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शरीफ के अयोग्य करार दिए जाने के बाद पार्टी की कमान उनके छोटे भाई शाबाज शरीफ के हाथ में आई, लेकिन वो हिचकोेले खाती पार्टी को संभाल नहीं सके। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि नवाज शरीफ की वापसी से लोगों में उनके प्रति सहानुभूति की लहर पैदा होगी और उनके समर्थकों में नया जोश। वो अब चुनाव मैदान में खम ठोक कर दावा कर सकते हैं कि उनका नेता जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा भगोड़ा नहीं है जो अनगिनत अदालती आदेशों के बावजूद पाकिस्तान वापस आने के लिए तैयार नहीं है। शरीफ की पार्टी का देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब में वर्चस्व रहा है। उनके आने से समर्थकों में उम्मीद जगी है कि वो सेना की सारी तिकड़मों के बावजूद पंजाब में सम्मानजनक संख्या में सीटें जीत पाएंगे।

शरीफ की वापसी के पीछे लोग चाहे जितने कारण गिनाएं, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है कि शरीफ जानते हैं कि यदि आज वो सेना के वर्चस्व को चुनौती नहीं देंगे तो आने वाले लंबे समय तक देश में कोई और नेता सेना के खिलाफ सीना तान के खड़ा होने लायक नहीं बचेगा। उन्हें पता है कि उनका मुकाबला इमरान खान से नहीं, उसकी आका यानी सेना से है। उनका लौटना इमरान के लिए नहीं, सेना के लिए चुनौती है। वो हारें या जीतें, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वो सेना को चुनौती देते रहेंगे। उनके विरोधी उनके खिलाफ चाहें जो बोलें, सेना के प्रतिबंधों से मजबूर मीडिया भले ही उनका मजाक उड़ाए, लेकिन सब जानते हैं उन्होंने पाकिस्तान लौट कर साहस का परिचय दिया है। उनका अतीत भले ही पाक-साफ न रहा हो, भले ही उन्होंने बार-बार सेना से समझौते किए हों, अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भले ही उन्होंने सेना का विरोध उसे ‘डील’ के लिए मजबूर करने के लिए किया हो, लेकिन अब लंदन से लौटने का अर्थ यही है कि उन्होंने सेना से संघर्ष का रास्ता चुन लिया है।

अभी तो सिर्फ एक मामले में उनके खिलाफ फैसला आया है, अभी कई मामले बकाया हैं जिनमें उनके विरूद्ध और भी सख्त फैसले आ सकते हैं। 68 बसंत देख चुके शरीफ कब तक अपनी टेक पर कायम रहेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन ये लड़ाई उनकी व्यक्तिगत नहीं है, ये देश में लोकतंत्र के जीवन-मरण का प्रश्न है, इसमें उनके परिवार वालों और कार्यकर्ताआंे को ही नहीं, विपक्षी दलों और देश की जनता को भी समझदारी से उनका साथ देना होगा। आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और लंदन में जलावतनी झेल रहे अल्ताफ हुसैन की मुŸााहिदा कौमी मूवमेंट जैस बड़ी पार्टियां ही नहीं, अनेक छोटी पार्टियां भी चुनाव प्रचार में रोक-टोक और मीडिया पर पाबंदी के आरोप लगा रही हैं। सेना की ज्यादतियां झेल रहे शरीफ और सभी विपक्षी दल अगर इमरान खान की पीटीआई के खिलाफ कोई साझा मोर्चा खोल सकें तो ये निश्चित ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।

“चिंताजनक है शहरी नक्सलियों और मुख्यधारा के दलों की सांठगांठ” in Punjab Kesari

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 640 जिलों में से 90 जिले अब भी माओवादी या नक्सली आतंक से पीड़ित हैं। यानी देश के करीब 15 प्रतिशत भूभाग पर उनका कब्जा है। मोदी सरकार का दावा है कि उसके अब तक के कार्यकाल में 44 जिलों को माओवादी आतंकियों के कब्जे से छुड़वाया गया। भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,000 वर्ग किलोमीटर है। इसके 15 प्रतिशत यानी 4,93,050 वर्ग किलोमीटर पर माओवादी आतंकियों का कब्जा है। ये क्षेत्रफल इंग्लैंड के कुल क्षेत्रफल 2,42,495 वर्ग किलोमीटर से लगभग दुगना है अर्थात किसी छोटे-मोटे देश से भी बडे़ भूभाग पर नक्सलियों का कब्जा है।

जाहिर है, ये समस्या छोटी नहीं है। ये अकारण नहीं था कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सली आतंकवाद को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ जंगलों में या सुरक्षित पनाहगाहों में ही रहते हैं? जवाब है नहीं। नक्सली सिर्फ उस इलाके पर कब्जा करके ही संतुष्ट नहीं हैं। उनका असली लक्ष्य तो है – भारत में अराजकताा फैलाना, उसे अस्थिर करना, उसके टुकड़े करना और फिर उसपर कब्जा करना। सिर्फ जंगलों में रह कर वो अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए जरूरी है वो देश के अन्य हिस्सों में भी अपने पैर पसारें, जंगलों के बाहर भी लोगों के बीच अपनी पैठ बनाएं। सरकारी कार्यालयों, मीडिया, पुलिस, प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, विधानसभाओं और लोकसभा में भी घुसपैठ करें। जंगलों से बाहर जो नक्सली चुपचाप अपने काम को अंजाम देते हैं, उन्हें हम अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली कहते हैं।

कभी आपने सोचा कि अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ आधी रात को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने वाले कौन लोग थे? वो कौन हैं जो आतंकियों को फांसी दिए जाने को ‘न्यायिक हत्या’ करार देते हैं और नक्सलियों के हाथों पुलिस वालों के मारे जाने पर जश्न मनाते हैं? वो कौन हैं जो कश्मीरी अलगाववादियों को महिमामंडित करते हैं, हिंदुओं को ‘फासीवादी’ करार देते हैं? ये और कोई नहीं शहरी नक्सली ही हैं। ये अपना नेरेटिव स्थापित करने के लिए फर्जी प्रचार करते हैं और लोगों को बहकाते हैं। हाल ही में जब नक्सलियों की प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की एक कुख्यात शहरी नक्सली शहला राशिद ने ट्वीट किया कि मोदी को नक्सली नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नितिन गडकरी खत्म करना चाहते हैं।

शहला राशिद की बात चली है तो बता दें कि जेएनयू में नक्सली गतिविधियों से परेशान अनेक शिक्षकों ने हाल ही में मीडिया को विश्वविद्यालय परिसर में इनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सबूत दिए। उन्होंने इसके लिए नक्सली विचारधारा वाले शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराया जो छात्रों का ब्रेनवाश करते हैं। वैसे भी वहां अफजल गुरू की बरसी पर हुए हंगामे को कौन भूल सकता है, जब सरेआम भारत विरोधी नारे लगाए गए। उसके बाद कैसे राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, डी राजा आदि वहां नक्सलियों को समर्थन देने पहंुचे, ये भी आप भूले नहीं होंगे। सिर्फ जेएनयू ही क्यों, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, नागपुर विश्विद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि भी इनके अड्डे बने हुए हैं। आपको नक्सली रोहित वेमूला का आत्महत्या प्रकरण तो याद ही होगा जिसे इन्होंने दुनिया भर में बहुत उछाला। रोहित नक्सलियों द्वारा चलाए जा रहे अंबेदकर विचार मंच का सदस्य था जबकि असलियत में अंबेदकर का नक्सलियों से तो क्या, कम्युनिस्टों तक से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। वो तो साम्यवाद के धुर विरोधी थे।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं, मीडिया, अदालतों, गैरसरकारी संगठनों यहां तक कि सरकारी महकमों तक में इनकी गहरी घुसपैठ है। इनका नेटवर्क सिर्फ भारत में ही नहीं, विकसित देशों में भी है। ये बहुत सोची समझी साजिश के तहत राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को उछालते हैं और सरकार पर दबाव बनाते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में इनकी पहुंच और पैठ कितनी गहरी है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 2014 में गिरफ्तार किए गए शहरी नक्सली और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साइंबाबा की रिहाई की अपील की। ध्यान रहे ये वही आयोग है जिसने कुछ ही दिन पहले कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में फर्जी रिपोर्ट जारी की थी।

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि नक्सलियों को पैसा कहां से मिलता है? ये अपने प्रभाव वाले इलाकों में लोगों पर मनमाने कर लगाते हैं और वहां काम करने वाली कंपनियों, ठेकेदारों आदि से वसूली करते हैं। ये मादक पदार्थों, हथियारों और जाली नोटों का कारोबार भी करते हैं। इनके लिए धन एकत्र करने के लिए शहरी नक्सली अलग-अलग नामों से गैरसरकारी संगठन बनाते हैं जो चीन और पाकिस्तान से ही नहीं, अमेरिका और इंग्लैंड आदि से इनके लिए ‘सहायता राशी’ इकट्ठा करते हैं। दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ काम करने वाली ईसाई और इस्लामिक संस्थाएं भी इन्हें काफी पैसा देती हैं। कभी आपने सोचा कि नक्सली इलाकों में ईसाई मिशनरियों पर कोई हमला क्यों नहीं होता? सिर्फ पुलिस, सुरक्षा बल या उनके कथित मुखबिर ही क्यों इनका शिकार बनते हैं?

शहरी नक्सलियों के काम करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। लेकिन ये लोग आमतौर से पहले पिछड़ी बस्तियों में जनकल्याण के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोलते हैं। धीरे-धीरे ये लोगों में आक्रोश भड़काते हैं या अगर कोई मसला पहले से ही गर्म हो तो उसमें आग में घी डालने का काम करते हैं। देसी-विदेशी मीडिया, विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार संगठनों आदि में बैठे इनके साथी तत्परता से इनका साथ देते हैं और जनता के मन में चुनी हुई सरकार की छवि बिगाड़ने का सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रचते हैं। पूरी कोशिश की जाती है कि लोगों का स्थापित व्यवस्था से मोहभंग हो और उसके प्रति आक्रोश बढ़े। आजकल शहरी नक्सली देश-दुनिया में मोदी सरकार की छवि बिगाड़ने और उसे मुस्लिम-दलित विरोधी करार देने की मुहिम छेड़े हुए हैं। इसके पीछे कारण ये है कि ये अपने अलगाववादियों, इस्लामिक आतंकियों और चर्च के नेटवर्क में दलितों को भी शामिल करना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने बहुत सोचे-समझे तरीके से दलित संगठनों में पैठ भी बना ली है। तथाकथित दलित रोहित वेमूला प्रकरण दलितों को भड़काने और उन्हें अपने साथ लाने की साजिश ही तो थी। दुख की बात है कि मुख्यधारा के दलों ने भी इस साजिश में इनका साथ दिया।

नक्सली, दलितों में पहुंच बनाने और उन्हें भड़काने को कोई मौका नहीं छोड़ते। भीमा कोरेगांव में इसी नाम से 200 साल पहले लड़े गए युद्ध की वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, सुधीर धवले आदि के भड़काऊ भाषणों के बाद फैली सुनियोजित हिंसा इसका जीता-जागता सबूत है। इस मामले में पुलिस की चार्जशीट आंखें खोलने वाली है। इसके मुताबिक नक्सली कई महीनों से इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर को खास तौर पर चुना क्योेंकि दलित भीमा कोरेगांव युद्ध को इसलिए याद करते हैं कि इसमें मूलतः दलित सैनिकों वाली ब्रिटिश सेना ने सवर्ण पेशवाओं की सेना को हराया था। अबकी बार इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी, और नक्सली इस अवसर का इस्तेमाल दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काने और अपने साथ लाने के लिए करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए भड़काऊ पोस्टर लगाए, पर्चे बांटे और आखिर में उग्र भाषण करवाए और उसके बाद सुनियोजित हिंसा की गई, अफवाहें फैलाई गईं और जितना हो सकता था, दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काया गया और उनसे दूर किया गया।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विलसन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

इस मामले में में दायर चार्जशीट में संलग्न दस्तावेज शहरी नक्सलियों के काम-काज, उनके सहयोगियों और उनके इरादों पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। एक पत्र में एक कामरेड दूसरे को बता रहा है कि ‘वरिष्ठ कामरेड’ ने ‘कांग्रेस में अपने मित्रों’ से बात कर ली है और वो सवर्ण विरोधी षडयंत्र के लिए पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। एक पत्र में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की हत्या के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि उनके लिए भी वैसा ही षडयंत्र हो जैसा राजीव गांधी की हत्या के लिए किया गया था। यानी उन्हें किसी सार्वजनिक समारोह में मौका मिलते ही खत्म कर दिया जाए।

भीमा कोरेगांव प्रकरण में शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी और उनके षडयंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद, देश-विदेश में इनके समर्थक इनके बचाव में उतर पड़े। इन्हें दलित अधिकार कार्यकर्ता बताया गया और दावा किया गया कि ‘दलित विरोधी, सवर्णवादी’ मोदी सरकार इनकी आवाज दबाने और इन्हें फंसाने की कोशिश कर रही है। इन्हें मानवाधिकारों का मसीहा बताया जा रहा है, जबकि असलियत ये है कि सिर्फ ये पांच ही नहीं, नक्सलियों को पूरा गैंग, संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग देश तोड़ने और बदनाम करने में करता है। ये ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘मानवाधिकारों’ के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं, जबकि हकीकत में ये सबसे पहले इनका गला घोंटते हैं। ये अपने अधिकार वाले इलाके में विकास के हर काम में बाधा डालते हैं, पुलिस थानांे, रेलवे स्टेशनों, बिजली कें खंभों, स्कूलों, सड़कों को डायनामाइट से उड़ा देते हैं। इनकी अपनी अदालतें चलती हैं जिनमें दोषियों और सरकार के मुखबिरों को सबक सिखाने के लिए दिल दहलाने वाली क्रूर सजाएं दी जाती हैं।

नक्सली और शहरों में उनके प्रतिनिधि तो देश के लिए घातक हैं हीं, उससे भी ज्यादा खतरनाक ये है कि कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, आम आदमी पार्टी जैसी मुख्यधारा की पार्टियां, अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए इनसे समझौता कर चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर इनका बचाव भी करती हैं। नक्सली जिग्नेश मेवानी और राहुल गांधी का रिश्ता किसी से छुपा नहीं है। दूर जाने की आवश्यकता नहीं, कुछ समय पहले हुए गुजरात और कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस ने नक्सलियोें, पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों और चर्च का जैसा इस्तमेमाल, उसे सबने देखा। कुछ वर्ष पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलियों को सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, क्या ये चिंता की बात नहीं कि आज उसी पार्टी के अध्यक्ष नक्सलियों की ढाल बन कर खड़े हो गए है?

“उत्तर कोरिया के बाद, अमेरिका से पाकिस्तानीे परमाणु निरस्त्रीकरण की बात करे भारत” in Punjab Kesari

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात से ‘उत्साहित’ पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई और पाकिस्तानी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री शाबाज शरीफ ने बयान दिया कि अगर ये दोनों देश आपसी दुश्मनी छोड़ कर बातचीत कर सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं। ध्यान रहे पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होने हैं और भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद, शाबाज शरीफ ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

शाबाज शरीफ का बयान निसंदेह स्वागत योग्य है। दोनों देशों को आपसी रंजिश भुला कर साथ आना ही चाहिए। भारत-पाकिस्तान में शांति होने का असर दोनों देशों पर ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा जो दुनिया के सबसे गरीब इलाकों में से एक है। शाबाज के बड़े भाई नवाज ने भी पिछले चुनाव में इस मुद्दे को उछाला था और सत्ता में आने के बाद इसके लिए दिखावटी ही सही, कुछ कोशिशें अवश्य की थीं। हम नवाज की कोशिशों को दिखावटी कह रहे हैं क्योंकि भारत में घुसपैठ करने वाले सभी आतंकी समूहों के मुख्यालय पाकिस्तानी पंजाब में हैं जहां शाबाज शरीफ मुख्यमंत्री थे। न नवाज और न ही शाबाज ने इन पर लगाम लगाने की कोई ईमानदार कोशिश की, उलटे सरकारी खजाने से उनकी मदद ही की। नवाज शरीफ ने तो चार साल तक कोई विदेश मंत्री ही नहीं नियुक्त किया और ये मंत्रालय अपने पास रखा क्योंकि विदेश और रक्षा नीति सेना देखती है और वो नहीं चाहते थे कि इन दोनों मामलों में सेना से कोई टकराव हो। शरीफ बंधुओं का इतिहास देखते हुए तो यही समझ में आता है कि शाबाज का औचक ‘शांति प्रस्ताव’ चुनावी शिगुफे से अधिक कुछ नहीं है। याद रहे ये वही शाबाज हैं जो पर्दे के पीछे सेना से अपने बड़े भाई नवाज शरीफ और पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज के लिए ‘डील’ मांगने गए थे।

पाकिस्तानी सेना के मौजूदा प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी पिछले छह महीनों में दो बार भारत के साथ शांति की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन इसका जमीन पर कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं ने तय किया था कि वो जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम करेंगी, लेकिन पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को भेजा जाना और और हमारे जवानों को निशाना बनाया जाना बदस्तूर जारी है। भारत ने तो सीमा पर ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में भी एकतरफा युद्धविराम घोषित कर शांति बहाली की कोशिश की, लेकिन आईएसआई के गुर्गे अब भी वहां आग लगाए हुए हैं। नतीजतन भारत को वहां युद्धविराम समाप्त करना पड़ा। कश्मीर में भारत की तरफ से एकतरफा युद्धविराम स्थानीय आतंकियों और अलगाववादियों को ही नहीं, पाकिस्तान को भी इशारा था कि भारत शांति चाहता है। लेकिन जैसे हुर्रियत के आतंकियों ने युद्धविराम को नकारा, हिंसा को बढ़ावा दिया और शांति के पक्षधर राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या की, उससे भारत को स्पष्ट जवाब मिल गया है कि पाकिस्तान की शांति और सदभाव की कोई इच्छा नहीं है।

वैसे भी पाकिस्तान सिर्फ कश्मीर में ही आतंक नहीं फैला रहा, वो खालिस्तान के मुद्दे को भी भरपूर हवा दे रहा है। वो पाकिस्तानी गुरूद्वारों में जाने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों को बरगलाने के साथ ही इंग्लैंड, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यू जीलैंड आदि में बसे सिखों को भी भड़का रहा है। इसके अलावा नक्सलियों और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों में भी आईएसआई की घुसपैठ के पक्के सबूत मिले हैं।

भारत बार-बार कहता रहा है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। लेकिन पाकिस्तान एक तरफ तो शांति की बात करता है, तो दूसरी तरफ वो भारत पर हमला करने वाले आतंकियों को ठिकाने लगाने की जगह, मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है। मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड हाफिज सईद, अपनी पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग को अनुमति न मिलने के बाद, अल्लाह-उ-अकबर तहरीक के बैनर तले 265 उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने की तैयारी कर चुका है। इनमें उसका बेटा हाफिज ताल्हा और दामाद खालिद वलीद भी शामिल हैं। भारत में समय-समय पर पकड़े गए पाकी आतंकी बताते हैं कि यहां हमें भले ही लश्कर-ए-तौएबा, जैश-ए-मौहम्मद, हिजुबल मुजाहिदीन वगैरह अलग-अलग नजर आते हों, लेकिन पाकिस्तान में सब आईएसआई की सरपरस्ती में आपसी सामंजस्य से काम करते हैं। कहने का मतलब ये कि अगर एक जमात बंद भी हो जाए तो दूसरी तैयार रहे, विकल्प हमेशा खुले रहें।

भारत सरकार ने बार-बार पाकिस्तान के प्रति नेकनीयती दिखाई, लेकिन पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए यहां ये सवाल भी उठ रहा है कि आखिर भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत की जरूरत ही क्या है? भारत आज पाकिस्तान के मुकाबले हर दृष्टि से बेहतर स्थिति में है। चाहे अर्थव्यवस्था हो, या दुनिया की सबसे बड़ी और मजबूत ताकतों से संबंध का मसला, भारत हर लिहाज से पाकिस्तान से कोसों आगे है। पाकिस्तान का कथित रूप से सबसे घनिष्ठ मित्र चीन भी आज पूरी तरह उसके साथ नहीं है। अगर ऐसा होता तो चीन आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगरानी रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स में पाकिस्तान के खिलाफ वोट कर उसे ग्रे लिस्ट में नहीं जाने देता।

उधर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका भी उससे नाराज है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसे सुधरने की चेतावनी ही नहीं, ‘ठीक करने की धमकी’ भी दे चुके हैं। आज पाकिस्तान दीवालिया होने की कगार पर है, वहां एक डाॅलर 123 पाकी रूपए का हो गया है, महंगाई से लोगों का बुरा हाल है, न बिजली है, न पानी, भ्रष्टाचार का बोलबाला है, सब बड़े नेताओं और नौकरशाहों के पास दोहरी नागरिकता है, वो कभी भी पाकिस्तान छोड़ सकते हैं।

ऐसे में भारत का एक बड़ा वर्ग अब ये मानता है कि पाकिस्तान एक फेल्ड स्टेट (मरता हुआ देश) है और उसके संदेहास्पद इतिहास को देखते हुए भारत को उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आना चाहिए। इस समय भारत के साथ रिश्ते बेहतर करना पाकिस्तान के अपने अस्तित्व के बहुत लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा हालात की नजाकत को देखते हुए अगर पाकिस्तान थोड़ा झुकता है और भारत दरियादिली दिखाते हुए उससे कोई समझौता कर लेता है, तो भी क्या गारंटी है कि कल आने वाली चुनी हुई सरकार या अगला जनरल उसे मानेंगे और सम्मान देंगें?

शाबाज शरीफ, अमेरिका और उत्तर कोरिया की वार्ता से ‘प्रभावित’ हुए, ये समझ में आता है। भारत में भी लोगों के मन में ये बात आई। लेकिन शाबाज शरीफ को समझना होगा कि शांति हासिल करने के लिए उत्तर कोरिया ने बड़े समझौते भी किए हैं। किम जोंग उन अपना जान से भी ज्यादा प्यारा परमाणु कार्यक्रम और अपने दादा के जमाने से चली आ रही नीतियों को छोड़ने के लिए तैयार हुए हैं। यही नहीं, उन्होंने दोनों देशों में बातचीत का माहौल बनाने के लिए वार्ता से ठीक पहले अपने देश के कट्टरवादी जनरलों तक को बाहर की राह दिखा दी। क्या पाकिस्तानी सरकार या सेना भारत से शांति के लिए अपनी नीतियां छोड़ने के लिए तैयार हैं? क्या पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए तैयार होगा? क्या वो कश्मीर और खालिस्तान राग भूल सकता है? ऐसा लगता तो नहीं।

भारत को अब पाकिस्तान से बातचीत और शांति के प्रयास बंद कर उसके परमाणु निरस्त्रीकरण पर काम शुरू करना चाहिए। भारत को अमेरिका से पूछना चाहिए कि अगर वो परमाणु कार्यक्रम चलाने के लिए ईरान और उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगा सकता है, तो पाकिस्तान पर क्यों नहीं? राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो खुद पाकिस्तान को आतंक का गढ़ बताते हैं। लगभग सभी अमेरिकी थिंक टैंक मानते हैं कि पाकिस्तानी परमाणु हथियारों का आतंकियों के हाथ में पड़ना बहुत संभव है। जिस देश में सेना खुद आतंकियों को चुनाव लड़वाती हो और उन्हें पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल करती हो, वहां परमाणु हथियारों का आतंकियों तक पहुंचना क्या मुश्किल है? ऐसे में पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध क्यों नहीं?

अमेरिका पिछले 17 साल से अफगानिस्तान में पाक समर्थित आतंकियों से लड़ रहा है। आए दिन वहां खून-खराबा हो रहा है। अफगानिस्तान में शांति तब तक नहीं आ सकती, जब तक पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने पर न आए। इसके लिए उसके परमाणु निरस्त्रीकरण से बड़ा उपाय और क्या हो सकता है? पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगभग चैपट हो चुकी है, उसकी मौजूदा निगरान सरकार अमेरिकी वर्चस्व वाले इंटरनेशनल माॅनीटरी फंड के पास सहायता के लिए जाना चाहती थी, लेकिन उसने ये फैसला आगामी निर्वाचित सरकार के लिए छोड़ दिया है। क्या अमेरिका और अन्य विकसित देशों को पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने से पहले परमाणु कार्यक्रम बंद करने की शर्त नहीं लगानी चाहिए? भारत को अब ये बात सभी विकसित देशों को जल्द से जल्द समझानी चाहिए।

“उत्तर प्रदेशः संयुक्त विपक्ष के सामने भाजपा की चुनौतियां और संभावनाएं” in Punjab Kesari

उत्तर प्रदेश में लगातार तीन लोक सभा सीटें हारने के बाद केंद्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी में निःसंदेह विचार विमर्श आरंभ हो गया होगा। वर्ष 2014 में 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भाजपा आज 272 सीटों पर सिमट गई है, जो लोकसभा की कुल सीटों का करीब 50 फीसदी है। अब भी तीन लोक सभा सीटें– शिमोगा 1⁄4बी एस येदियुरप्पा, भाजपा1⁄2, बेल्लारी 1⁄4बी श्रीरामुलु, भाजपा1⁄2, अनंतनाग 1⁄4मेहबूबा मुफ्ती, पीडीपी1⁄2 खाली है। अगर भाजपा ये तीनो  सीटें जीत लेती है तो वो पुनः 50 प्रतिशत के निशान के ऊपर जा सकती है। वैसे ध्यान रहे, चुनाव आयोग आमतौर से उपचुनाव तब नहीं करवाता जब लोकसभा या विधानसभा का कार्यकाल एक वर्ष से भी कम बचा हो।

हम फिर अपने विषय उत्तर प्रदेश पर आते हैं। 2014 के चुनावों में भाजपा को देश के इस सबसे अधिक जनसख्ं या वाले पद्र श्े ा में अपत््र याशित रूप से 80 में से 71 सीटें मिली। तब राज्य में मसु लमानांे आरै यादवों को अपना वोट बैंक मानने वाली समाजवादी पार्टी की बहुमत वाली सरकार थी। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी की चुनौती भी थी जिसकी प्रमुख मायावती खुद को दलितों का मसीहा बताती हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा को 29.15 आरै बसपा को 25.91 और भाजपा को 15 प्रतिशत मत मिले थे। ऐसे में 71 सीटें हासिल करना चमत्कार से कम नहीं था। इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने काफी दिमाग लगाया और लगातार दो साल तक मेहनत की। उन्हांेने यादवांे को छोड़ कर सभी पिछडे़ वर्गांे आरै जाटवांे को छाडे ़ कर सभी अन्य दलित वर्गांे को अपने साथ लाने का पय्र ास किया। इसके लिए सपा और बसपा के अनेक जातीय नेताओं को भाजपा में शामिल किया गया।

वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में मात खाने के बाद सपा नेता अखिलेश यादव को समझ आ गया कि सिर्फ अपने बूते पर वो भाजपा का सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्हांेने राहुल गांधी से हाथ मिलाने का मन बनाया। एक के बाद एक चुनाव हार रही कागं े्रस को भी ये पस््र ताव भाया। 2017 के विधानसभा चुनावों में ‘उत्तर प्रदेश के लड़कों’ ने एक साथ सघन प्रचार किया, लेकिन नतीजा आया तो पता लगा कागंसे्र , सपा को ले डूबी। गठबंधन में उसे सौ सीटें दी गईं थीं, लेकिन वो सिर्फ सात सीटें ही जीत पाई। इसके बाद बबुआ अखिलेश ने राहुल गांधी को छोड़ बुआ मायावती का दामन थामने का मन बनाया जिनके पास अपना समर्पित वोट बैंक है।
फलू परु आरै गारे खपरु चुनावों में अखिलेश की रणनीति काम कर गई। इन दोनों  चुनावों में सपा ने
अपने प्रत्याशी खड़े किए और मायावती ने अपने समर्थको को सीधे सपा को वोट करने के लिए तो नहीं कहा, बस उस पत््र याशी के लिए वाटे डालने के लिए कहा जो भाजपा को हरा सक।े कछु सपा-बसपा के सहयोग और कुछ भाजपा के अतिविश्वासी रवैये के कारण भाजपा ये उपचुनाव बुरी तरह हारी। बेहद कम मतदान के बावजदू वो फलू परु में वो 54,960 आरै गारे खपरु में 21,881 मतांे से हार गइर्। फलू परु लोक सभा सीट तो 2014 में पहली बार भाजपा को मिली थी, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद, भाजपा इसे संभाल नहीं सकी। उधर गोरखपुर की हार के लिए तो कोई स्पष्टीकरण देना भी मुश्किल हो गया क्यांेकि स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सीट को पांच बार जीत चुके थे और उनसे पहले तीन बार उनके गुरू स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ इसका प्रतिनिधित्व कर चुके थे।
जहां गारे खपरु आरै फलू परु सीटें यागे ी आरै मौर्य के मुख्यमंत्री आरै उपमख्ु यमंत्री पद सभ्ं ाालने के कारण खाली र्हइु ं, वहीं करै ाना सीट भाजपा सांसद हकु ुम सिंह के निधन के कारण खाली हइु र्। यहां भाजपा ने उनकी बेटी मृगांका सिंह को चुनाव में उतारा। मृगांका ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत 2017

में कैराना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के साथ की जो वो सपा के नाहिद हसन से हारीं। इस बार उन्हें तब्बसुम हसन ने हराया जो नाहिद की मां हैं। कैराना से पहले सांसद रही चुकीं तब्बसुम भी पूर्व
में सपा में थीं। अजित सिंह और अखिलेश की रणनीति के तहत उन्हें 2018 के संसदीय चुनावों के लिए खासतारै से राष्टंीय लोकदल में शामिल करवाया गया ताकि जाटों आरै मसु लमानों का समीकरण तयै ार

किया जा सके। इसका परिणाम भी आशानुरूप निकला और तब्बसुम हसन 44,600 मतांे से जीतीं। हालांकि जाटों और मुसलमानों के समीकरण के बूते जिस भव्य जीत का दावा किया जा रहा था, वो हासिल न हो सकी। तब्बसुम हसन को 51.26 प्िर तशत मत मिले तो मगृ ाकं ा सिहं को 46.51 प्िर तशत यानी कुल अंतर 4.75 प्िर तशत का रहा। ध्यान रहे तब्बसुम विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार थीं जिन्हें सपा और रालोद का ही नहीं, कांगे्रस और बसपा का समर्थन भी हासिल था। संयुक्त विपक्ष के बरक्स अकेली मृगांका को 46.51 प्िर तशत मिलना भाजपा से अधिक विपक्ष के लिए चितं ा का विषय हाने ा चाहिए।
करै ाना लाके सभा सीट में पाचं विधानसभा सीटें हैं – कैराना, शामली, थानाभवन, नकुड़ और गंगोह। इनमें से दो सीटों – कैराना और शामली में भाजपा क्रमशः 14,203 और 414 मतों से जीती। यानी जिस विधानसभा सीट से मृगांका पहले हारीं, वहां उन्हें इस बार जीत हासिल हुई। ये सीट मुस्लिम बहुल है, फिर भी यहां भाजपा को अधिक मत मिलना, विपक्षियों को हैरान कर रहा है। थानाभवन और नकुड़ विधानसभा सीटों पर इस बार भाजपा पिछड़ गई जबकि इन दोनों सीटों के मौजूदा विधायक क्रमशः सुरेश राणा और धरम सिंह मंत्री हैं। सुरेश राणा तो स्वतंत्र प्रभार वाले गन्ना मंत्री हैं, जिनपर इस क्षेत्र के गन्ना किसानांे की समस्या हल करने का दारामे दार भी था।
अभी कैराना और पहले फूलपुर और गोरखपुर से भाजपा को कई सबक मिल सकते है। पहला सबक तो ये है कि अगर विपक्षी साथ आ जाएं तो भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकते है। इसके अलावा स्थानीय आंदोलनों और संस्थाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वयं भाजपा के विश्लेषण पर विश्वास करें तो कैराना में भाजपा, जाट-मुसलमान गठबंधन की वजह से नहीं, बल्कि भीम सेना की वजह से हारी जिसने नकुड़ और गंगोह में दलितों के साथ मुस्लिम युवकों को भाजपा के खिलाफ लामबंद किया। इन दोनों क्षेत्रों में अन्य क्षेत्रों से अधिक मतदान दर्ज किया गया था।
2014 के चुनावों से पहले अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण साधने में लंबा समय लगाया था। 2019 के चुनावों में मुि श्कल से एक वर्ष का समय रह गया है| एसे े में विपक्षी एकता के मद्दे नजर भाजपा को हर सीट के लिए बहतु साचे विचार कर अलग-अलग रणनीति बनानी होगी। इसके लिए तेज दिमाग वाले एक नहीं अनेक अमित शाह चाहिए होंगे। 2014 की तरह, भाजपा नेता 2019 में भी मोदी लहर की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अबकी बार मोदी लहर होगी या नहीं, ये अभी से कहना मुश्किल है, लेकिन ये बिना झिझक कहा जा सकता है कि वहां सिर्फ विकास का नारा काम नहीं आएगा। राज्य के अधिकाश्ं ा लागे अब भी धामिर्क आरै जातीय समदु ायांे में बटं े है आरै बार-बार ये स्पष्ट हो रहा है कि वो इससे ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2014 के लाके सभा आरै 2017 के विधानसभा चुनावों में जो वाद किए थे उन्हें पूरा करना। ऐसा नहीं है कि योगी सरकार ने काम नहीं किए, लेकिन जो काम किए हैं, उन्हें जनता तक पहंुचाना भी होगा और इसके लिए बेहतर मीडिया प्रबंधन करना होगा। योगी आदित्यनाथ जनता से सीधे संपर्क के लिए जाने जाते हैं, लेि कन अब जनसंपर्क के काम में जैसी नौकरशाही फैल गई है, उसका इलाज तो करना ही।
विपक्षी अगर एकजुट हो रहे हैं तो भाजपा को भी अपने वर्तमान सहयोगियों की व्यथा को समझना होगा और उसे दूर करना होगा। राज्य के वक्फ मंत्री मोहसिन रजा ने बसपा नेता मायावती को भाजपा के साथ आने का सुझाव दिया था। मायावती के पास समर्पित वोट बैंक है, भाजपा नेतृत्व उचित समझे तो इस दिशा में संभावनाएं टटोल सकता है। हालांकि मायावती ने राजनीतिक हलकों में ये खबर फैला दी है कि बसपा उसके साथ गठबंधन करेगी जो उसे 40 सीटें देगा। संकेत साफ है कि मायावती से कोई बातचीत आसान नहीं होगी।
ये सही है कि विपक्ष के पास प्रधानमंत्री नरेंदर  मोदी जैसा कोई बड़ा नेता नहीं है, न ही अमित शाह
जैसा चाणक्य, लेि कन भाजपा सिर्फ उनके भरासे े हाथ पर हाथ रख कर नहीं बठै सकती। भाजपा के स्थानीय नेताओं को जमीनी स्तर पर परू ी तयै ारी खदु करनी होगी। अब भाजपा 2014 वाली भाजपा नहीं रही, देश के अधिकांश राज्यों में उसकी सरकार है। मोदी और शाह को अब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं,
पूरे देश की कमान संभालनी है, वो हमेशा उन्हें उंगली पकड़ कर नहीं चला सकते। ऐसे में स्थानीय नेताआंे को अपने झगड़ांे और गुटबाजी से ऊपर उठ कर अपना स्तर उठाने और छवि सुधारने के लिए खदु काम करना होगा।

“क्या आरएसएस के खिलाफ चर्च का षडयंत्र है तूतीकोरिन कांड?” in Punjab Kesari

कठुआ के बाद तूतीकोरिन मामले की कवरेज में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली का तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कान का कच्चा और आंख का अंधा है। कुछ लोग इसे हांकते हैं और ये अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना भेड़चाल में फंस जाता है।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारी मारे गए, ये सही है। लेकिन कौन लोग थे जिन्होंने पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनपर पत्थरों की बौछार की, महिला पुलिसकर्मियों के कपड़े फाड़े, किनके कारण प्रदर्शन हिंसक हुआ, इसके पीछे कौन सी ताकते थीं, ये प्रायोजित था या वास्तविक, किसने वाहनों, भवनों, एम्बुलेंसों और कलेक्ट्रेट को आग लगाई, किसने तूतीकोरिन को युद्ध का मैदान बना दिया? ये शायद किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की। सबको सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि गोली चली और लोग मरे। इसके लिए विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तमिलनाडु राज्य सरकार से ज्यादा केेंद्र की मोदी सरकार को दोष दिया। सोशल मीडिया पर कुछ विपक्षी तो प्रधानमंत्री मोदी को हत्यारा बताने लगे। शायद यही षडयंत्रकारियों का मकसद था, और उन्होंने इसे हासिल भी किया। स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट बंद करवाना और उसकी पेरेंट कंपनी वेदांता को बदनाम करना और नुकसान पहुंचाना भी एक मकसद था, लगे हाथों वो भी हासिल हो गया। चलो हाल-फिलहाल तो वो भी बंद हो गया है। यानी एक तीर से कई शिकार। किसे फिक्र है कि स्टरलाइट प्लांट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुंचेगा? कितने हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे?

सबसे ज्यादा घृणित और भड़काऊ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान था, जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। वैसे अल्पज्ञ राहुल गांधी को इसके लिए दोष देना भी मूर्खता ही होगी। उनकी तो राजनीति संघ से शुरू होती है और संघ पर ही खत्म हो जाती है। नक्सलियों से संबंध रखने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तो उन्होंने आधे घंटे के भीतर संघ पर उंगली तान दी। येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने एलान कर दिया कि मैं जनता को संघ से बचाउंगा। एक विशेष समुदाय से संबंध रखने के कारण राहुल का हिंदू विरोध समझ में आता है, लेकिन संघ को आतंकवादी साबित करने के लिए साजिश करना, समझ से परे है। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने संघ को हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया है। उसे एक टारगेट बना दिया गया है जिसपर हिंदुओं से नफरत करने वाला हर समुदाय, हर राजनीतिक दल बेखटके उंगली उठा सकता है। संघ का विरोध करना ‘सांप्रदायिकता का विरोध’ मान लिया गया है और इस्लामिक और ईसाई सांप्रदायिकता का समर्थन और ध्रुवीकरण ‘धर्म निरपेक्षता’।

बहरहाल हम लौट कर तूतीकोरिन पर आते हैं। इस मामले में राहुल द्वारा फटाफट संघ पर उंगली उठाना एक व्यापक साजिश का हिस्सा है जिसे तूतीकोरिन का चर्च अंजाम दे रहा है और जिसकी सरपरस्ती दिल्ली में राहुल गांधी और उनका चंपू मीडिया कर रहा है। हम जो कुछ कह रहे हैं वो बहुत जिम्मेदारी से कह रहे हैं। तमिलनाडु के तीन जिलों तिरूनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी में ईसाइयों की तादाद सर्वाधिक है और यहां आम जनता पर चर्च का काफी प्रभाव है। ये संयोग नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन्हीं तीन जिलों में विकास परियोजनाओं का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है।

तिरूनेलवेली में कंुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध आपको याद होगा जिसे रूस के सहयोग से बनाया जा रहा था जो अमेरिका को पसंद नहीं था। तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के लिए अमेरिका समर्थित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने आरोप लगाया था कि तूतीकोरिन के बिशप यवोन एम्ब्रोइस को प्रदर्शनों के लिए 54 करोड़ रूपए मिले थे और वो इन प्रदर्शनों के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इनके अलावा कई और ईसाई संस्थाएं जैसे पीपल्स एजुकेशन फाॅर एक्शन एंड लिबरेशन और गुड विशन भी प्रदर्शन भड़काने के लिए गृह मंत्रालय के रडार पर थीं। गृह सचिव ने घोषणा की थी कि चार ऐसे गैर सरकारी संगठनों के बैंक खाते सील कर दिए गए थे जो विदेशों से मिला पैसा प्रदर्शन भड़काने में लगा रहे थे।

तूनीकोरिन में ईसाई आबादी 30 प्रतिशत के करीब है और आम जनजीवन पर चर्च का गहरा असर है। यहां चल रहा स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट भी विवादों के घेरे में लाया गया। फिलहाल इसमें चार लाख टन तांबा सालाना बनाया जाता है। विस्तार के बाद इसकी क्षमता आठ लाख टन सालाना हो जाती। इससे भारत की तांबे की लगभग सारी जरूरत पूरी हो जाती और इसके आयात की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ध्यान रहे तांबे का इस्तेमाल विद्युतीकरण से लेकर रक्षा उपकरण के निर्माण तक अनेक स्थानों पर होता है। ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी बहुत जरूरी है।

पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक तूतीकोरिन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हाथ भी है। कुछ समय पहले लंदन से आया ‘फाॅइल वेदांता ग्रुप’ (वेदांता ग्रुप को असफल करो) का समरेंद्र दास स्टरलाइट प्रदर्शनकारियों से गुपचुप मिला। उसने इन्हें भरोसा दिलाया था कि वो प्रदर्शन जारी रखने में पूरी मदद करेगा। क्या ये सिर्फ संयोग है कि तूतीकोरिन हिंसा के बाद इंग्लैंड में विपक्षी लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता जाॅन मैकडोनल्ड ने वेदांता को अराजक कंपनी बताया और उसे लंदन स्टाॅक एक्सचेंज से हटाने की मांग की? तूतीकोरिन के चर्चों में लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काया गया। यू ट्यूब पर ब्रदर मोहन सी लाजरस का वीडिया उपलब्ध है जिसमें वो बिना किसी सबूत के स्टरलाइट को जहरीली फैक्ट्री बता रहा है। वो कहता है कि चर्च इसे बंद करने के लिए प्रार्थना कर रहा है। वो कहता है 24 मार्च, 2018 को राजाजी पार्क तूतीकोरिन में प्रदर्शन होगा जिसमें सभी कैथोलिक, पैंटाकोस्ट, सीएसआई चर्चों के लोग भाग लेंगे।

ध्यान रहे नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) जैसी संस्थाओं के वैज्ञानिक स्टरलाइट का दौरा कर चुके हैं और इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि इसका उत्सर्जन सेंट्रल पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और तमिलनाडु पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (टीएनपीसीबी) जैसी संस्थाओं द्वार तय किए गए मानकों के अनुसार है। ऐसे में चर्चों द्वारा झूठ बोल कर आम लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काने का क्या मकसद है? जहां कुंडनकुलम में बिशप यवोन एम्ब्रीओस और एसपी उदयकुमार थे, वहां स्टरलाइट मामले में ब्रदर मोहन लेजारस और क्षेत्र के अन्य चर्च हैं। देश की विकास परियोजनाओं के खिलाफ चर्च का ऐसा रूख क्या देशद्रोह नहीं है? अगर मनमोहन सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं?

क्या से संयोग है कि जिस समय तूतीकोरिन कांड की योजना बनाई जा रही थी ठीक उसी समय दिल्ली में आर्कबिशिप अनिल कूटो ‘ईसाइयों पर हमलों’ पर चिंता जता रहे थे और कह रहे थे कि देश कलहकारी दौर से गुजर रहा है और ईसाइयों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? क्या ये महज संयोग है कि कूटो के पत्र के बाद देश भर के चर्चों से उनके समर्थन में आवाज उठी जिसे कांग्रेस और अन्य ‘संघ विरोधी’ दलों ने भरपूर समर्थन दिया? क्या ये भी महज संयोग है कि घटना के तुरंत बाद सबसे पहले कमल हासन वहां पहुंचे जो इस समय दक्षिण भारत में ईसाई राजनीति के केंद्र में हैं?

तूतीकोरिन में गोली चलाने के लिए पुलिस को खलनायक बनाया गया। क्या दिल्ली के मीडिया ने एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं कि पुलिस को इसके लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? अगर प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू थे और उनके हाथों में लाठी-बल्लम, राॅड, पत्थर, पेट्रोल बम, शीशे की बोतलें सब कुछ थे। तूतीकोरिन के पत्रकार एन राजेश अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस कपिल सरतकर ने प्रदर्शन स्थल पर कड़ा इंतजाम किया था ताकि प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट तक नहीं पहुंच सकें। अभी पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात कर ही रही थी, कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरीकेड तोड़ दिया और उसे पुलिस पर फेंका। इसके बाद ही पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। मुझे लगा कि हालात गंभीर मोड़ ले रहे हैं तो मैं बाइपास रोड पर चला गया। मैं हालात को ठीक से समझने के लिए कलेक्ट्रेट के विपरीत एक होटल की इमारत की छत पर चढ़ गया। करीब साढ़े ग्यारह बजे कलेक्ट्रेट में घुसने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगानी शुरू कर दी। इनमें से कुछ लोगों ने जब देखा कि हम उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं और वीडियो बना रहे हैं तो उन्होंने हम पर पत्थरों की बौछार कर दी। जब हम नीचे उतरे तो उन्होंने हमें लाठियों से पीटा और हमारा कैमरा छीन लिया।

एन राजेश के विवरण का समर्थन कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी करते हैं। एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि करीब 11.10 बजे वो अपने सहयोगियों के साथ कैंटीन में चाय पीने गईं। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस कर्मचारी बदहवास तेजी से दौड़ते हुए आ रहे हैं और उनके पीछे लोग पत्थर फेंकते हुए आ रहे हैं। हम भयभीत थे, हमें नहीं पता था कि हम क्या करें, हम वापस कार्यालय में गए। इसके बार करीब 20,000 प्रदर्शनकारी कार्यालय में घुस गए। उनके पास हथियार थे, लाठियां थीं, लोहे के सरियेथे, कांच की बोतलें थीं, पेट्रोल बम थे। उन्होंने तेजी से कार्यालय का सामान बर्बाद करना शुरू कर दिया, पुलिस, कलेक्ट्रेट की गाड़ियों में आग लगा दी। वहां सुरक्षा के लिए तैनात करीब 100 पुलिसवालों ने उनका सामना किया, उन्हें नियंत्रित कर, बाहर भेजने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी हजारों में थे और पुलिसवाले बहुत कम। उन्होंने बेरहमी से पुलिसवालों पर हमला बोल दिया, वो अपनी जान बचा कर भागे। फिर उन्होंने कलेक्ट्रेट के सभी वाहनों को आग लगा दी, पूरा कार्यालय धुएंे से भर गया, चारों तरफ धुआं ही धुआं था। कार्यालय किसी युद्ध के मैदान की तरह लग रहा था। प्रदर्शनकारियों ने महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। उनकी कमीज फाड़ दी, उनके गुप्तांग में हाथ घुसाए। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट को भी नहीं बख्शा, उसमें भी आग लगा दी।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मौजूद है। सब एक ही चीज बताते हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, वाहनों, भवनों, कार्यालयों को फूंका, और तो और एम्बुलेंस तक को नहीं बख्शा। पुलिस वालों को खलनायक बताने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो उनकी जगह होते तो क्या करते? क्या उन्हें हिंसा और उन्माद का नंगा खेल खेलने की तब तक इजाजत देते जब तो वो तूतीकोरिन और स्टरलाइट प्लांट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देते? विवादास्पद, भड़काऊ और विघटनकारी बयानों के लिए बदनाम कांग्रेसी नेता गुलामनबी आजाद ने तो इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से कर दी। कोई गुलामनबी से पूछे कि क्या जलियांवाला में मारे गए लोग लाठियां, सरिए, पेट्रोल बम, कांच की बोतलें, पत्थर ले कर बैठे थे? क्या उन लोगों ने जनरल डायर और उसके पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था और उनके वाहनोें को आग लगा दी थी? क्या जलियांवाला में मौजूद लोगों ने हिंसा की पहल की थी?

जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर वो मूर्ख नहीं होती। राहुल गांधी ने संघ पर वार करने से पहले और गुलामनबी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग से करने से पहले दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो याद आ गया होता कि स्टरलाइट प्लांट के जिस विस्तार का विरोध हो रहा है, उसकी अनुमति स्वयं मनमोहन सरकार ने 2007 में दी थी। यही नहीं कांग्रेस के स्टार वित मंत्री और गृह मंत्री रहे विवादास्पद पी चिदंबरम 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनने से पहले स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता में निदेशक थे।

संघ के प्रति नफरत में अंधे राहुल गांधी को संघ के खिलाफ बयान देने से पहले ये भी याद नहीं रहा कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है, न कि केंद्र के। वैसे भी तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। राहुल गांधी के सीने में कितना जहर भरा है वो उनके ट्वीट से समझा जा सकता है जो कहता है – तमिलों का नरसंहार हो रहा है क्योंकि वो संघ की विचारधारा का पालन नहीं कर रहे। प्रदर्शनकारियों पर चलने वाली हर गोली का संबंध संघ और भाजपा से है।

इतनी नफरत, इतने भड़काऊ बयान, लाशों पर ऐसी ओछी राजनीति? पहले षडयंत्र करना और फिर उसे भुनाना राहुल गांधी और उनकी पार्टी अच्छी तरह सीख गए हैं। इस घटना से भाजपा, केंद्र सरकार को और खासतौर से गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सीख लेनी चाहिए। राजनाथ जी सिर्फ रिपोर्ट मंगाने से काम नहीं चलेगा। चाहे कठुआ का मामला हो या तूतीकोरिन का, गृह मंत्रालय ऐसे षडयंत्रों की त्वरित जांच कराने और सच्चाई सामने लाने में विफल रहा है। क्या इस मामले में रिपोर्ट तलब करने की जगह केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकार के साथ मिलकर नहीं काम करना चाहिए था? मनमोहन सरकार ने तो फिर भी चर्च के अराजकत तत्वों पर रोक लगाने की कोशिश की, आपने क्या किया? आप पर क्या दबाव है कि आप ऐसे तत्वों पर कार्रवाई नहीं कर रहे? कौन लोग इस षडयंत्र में शामिल थे, उन्हें कहां से पैसा मिल रहा है? क्या ये आपको नहीं मालूम? जनता जवाब चाहती है माननीय गृह मंत्री जी, और वो भी जल्दी।

“कर्नाटकः भाजपा का अतिविश्वास और पिछलग्गू कांग्रेस कीे दोहरी हार” in Punjab Kesari

कर्नाटक में मची उठा-पटक ने नेताओं को कई सबक सिखाए। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबक ये था कि अगर सुप्रीम कोर्ट सक्रिय हो जाए तो जोड़-तोड़ से सरकार बनाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। राज्यपाल वजू भाई वाला ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के बाद बहुमत साबित करने के लिए सिर्फ 24 घंटे का समय दिया। इस सीमित समय में येदियुरप्पा संख्याबल नहीं जुटा पाए और उन्होंने भावुक भाषण के बाद इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी विधायक उनके संपर्क में थे, लेकिन अंततः उन्होंने साथ नहीं दिया।

येदियुरप्पा को आमंत्रित करके वजू भाई वाला ने कोई असंवैधानिक काम नहीं किया। असल में कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति बने विधि विशेषज्ञ शंकरदयाल शर्मा ने ब्रिटिश संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए इसे सही ठहराया था। लेकिन सोचने की बात ये है कि क्या भाजपा दिल्ली के उदाहरण को नहीं दोहरा सकती थी, जब उसने सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने दिया। अगर ऐसा किया जाता तो कम से कम भाजपा विजय का नैतिक दावा तो कर सकती थी। वैसे भी इस पूरे प्रकरण में भाजपा बार-बार कांग्रेस से 19 साबित हुई। जैसी की खबर है, कांग्रेस ने मतदान के बाद ही जनता दल, सेक्युलर (जेडी,एस) से संपर्क साध लिया था। कांग्रेस ने बिना वक्त गंवाए वकीलों की बड़ी फौज के साथ आधी रात को ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। यही नहीं उसने अपने वरिष्ठतम नेताओं, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोईली आदि, की बड़ी टीम बेंगलूरू में तैनात की और पूरी सतर्कता से अपने विधायकों की रखवाली की।

लगता है, इस बार भाजपा कहीं न कहीं अतिविश्वास के कारण शहीद हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैलियों में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडी, एस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा की भरपूर तारीफ की। लेकिन क्या वजह है कि तारीफों के आदान-प्रदान के बावजूद दोनों दलों में बातचीत आगे न बढ़ सकी? भाजपा को पूर्व एनडीए सहयोगी तेलुगु देशम की नाराजगी भी भारी पड़ी। तेलुगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा को हराने की अपील जारी की। ध्यान रहे कर्नाटक में करीब 15 प्रतिशत तेलुगु भाषी हैं। राज्य के 12 जिलों में इनकी अच्छी खासी तादाद है। इस बार के लहरहीन चुनाव में जब एक-एक मत महत्वपूर्ण था, ऐसे में तेलुगु मतों की भी अपनी अहमियत थी। आपको याद दिला दें की 2013 के चुनाव में 49 सीटों पर विजय का अंतर 5,000 मतों से भी कम था। इसी तरह 2008 में 64 सीटों में ये अंतर 5,000 से कम था। इस बार के चुनाव में 11 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा 3,000 से भी कम मतों से हारी। देवरहिप्पारगी सीट पर तो भाजपा के प्रत्याशी सोमनगौड़ा बी पाटिल सिर्फ 90 मतों से हारे। अगर भाजपा को दक्षिण में पैर पसारने हैं तो स्पष्ट है उसे इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक सहयोगियों को संभाल कर रखना होगा।

भाजपा की हार-जीत का विश्लेषण तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेता करेंगे ही। लेकिन एक बात तो साफ है कि वो इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और उसने सिद्धारमैया को सत्ता से हटाया। लेकिन बूथ स्तर तक चुनाव प्रबंधन करने वाले अमित शाह को इस ओर ज्यादा ध्यान देना होगा कि कैसे लहरहीन चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित की जाए।

अब बात कांग्रेस की। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अपने संक्षिप्त संवाददाता सम्मेलने में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। हालांकि एक दिन पहले ही वो येदियुरप्पा के शपथग्रहण को लोकतंत्र की हत्या बता रहे थे और भारतीय सुप्रीम कोर्ट की तुलना पाकिस्तानी अदालतों से कर रहे थे। कर्नाटक में जो हुआ, वो भले ही लोकतंत्र की जीत हो, यहां असल में कांग्रेस की दोहरी हार हुई। एक तरफ तो सिद्धारमैया सरकार की विदाई हो गई तो दूसरी तरफ जेडी,एस से लगभग दोगुने विधायक होने के बावजूद कांग्रेस को जेडी, एस का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा। समझा जाता है कि कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला स्वयं राहुल ने किया। क्या अच्छा नहीं होता कि तुरत-फुरत फैसला करने की जगह वो पार्टी हित में कुमारास्वामी और उनके पिता एचडी देवेगौड़ा से स्थानीय नेताओं के साथ बात करते। भाजपा को बाहर रखने की जल्दी में उन्होंने अपने दल के हितों को ही कुर्बान कर दिया। चुनाव परिणाम आने से पहले ही उन्होंने राज्य में पांच साल शासन करने वाले सिद्धारमैया को दरकिनार कर दिया और सारी कमान दिल्ली के नेताओं को सौंप दी। अब सत्ता के बंटवारे में कांग्रेस को क्या मिलता है, ये देखना दिलचस्प होगा, लेकिन सियासी फैसले इतनी जल्दबाजी में नहीं लिए जाते। कुमारास्वामी ने एक बात तो बिल्कुल साफ कर दी है कि मुख्यमंत्री पद पर कोई समझौता नहीं हो सकता, पांच साल वो ही इस पद पर रहेंगे

राहुल के फैसले ने देश भर में कांग्रेस की छवि पिछलग्गू की बना दी। लगता है वो आगामी लोकसभा चुनावों तक जेडी,एस की मिन्नतें और चिरौरी कुछ वैसे ही करेंगे जैसे उत्तर प्रदेश में बबुआ अखिलेश यादव, बुआ मायावती की कर रहे हैं। बहुत से जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का पिछलग्गू बनने का फैसला राजनीतिक कारणों से कम और आर्थिक कारणों से ज्यादा था। एक अनुमान के अनुसार इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 7,000 से 10,000 करोड़ रूपए खर्च हुए, अगर ऐसे ही चला तो लोकसभा चुनावों में तो खर्च एक लाख करोड़ से ऊपर चला जाएगा। ऐसे में कांग्रेस को भी आय के स्थायी स्रोत की आवश्यकता होगी। भाजपा पहले ही आरोप लगाती रही है कि सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार कांग्रेस के बैंक के तौर पर काम कर रहे थे। शिवकुमार के लेनदेन की तो एक डायरी भी सामने आ चुकी है, जिसकी जांच जारी है। इस डायरी में पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं के नाम लिखे हैं।

बहरहाल कुमारास्वामी का पिछलग्गू बनने के राहुल गांधी के फैसले के राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं। इससे उनकी बारगेनिंग पाॅवर निश्चय ही कम हुई है। कर्नाटक में समर्पण के बाद क्षेत्रीय दल उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव तो उन्हें पहले ही कह चुके हैं कि वो विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं। कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने संकेत दिया कि अगर 2019 में कांग्रेस बड़े दल के रूप में उभरती है तो वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। सवाल ये है कि अगर कर्नाटक में बड़ा दल होने के बावजूद वो मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं ले सके तो प्रधानमंत्री पद कैसे लेंगे?

कांग्रेस के कुछ नेता राज्य में पार्टी की दोहरी हार के बावजूद गाल बजाने में जुटे हैं कि इसने 2019 के घटनाक्रम का संकेत दे दिया है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने। उन्हें समझना पड़ेगा कि भले ही भाजपा राज्य में सरकार न बना पाई हो, वो वहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और उसका वोट प्रतिशत भी सुधरा है। भाजपा के लिए असली चुनौती कर्नाटक में नहीं थी जहां उसके पास खोने को कुछ नहीं था, भाजपा की असली अग्नि परीक्षा तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में होगी जहां उसकी सरकारें हैं। अगर भाजपा यहां हारी तो ये कहना उचित होगा कि भाजपा की चुनौतियां बढ़ गईं हैं।

कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और सुविधाभोगी पत्रकारों को राहुल को चने के झाड़ पर चढ़ाना बंद करना चाहिए। ये लोग गुजरात के बाद भी राहुल की ‘नैतिक जीत’ का दावा करने लगे थे, जबकि हकीकत ये है कि नक्सलवाद, जातिवाद, इस्लामिक सपं्रदायवाद के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद वो वहां हारी थी। कांग्रेस ने लगभग यही नीतियां कर्नाटक चुनाव में भी अपनाईं। अलग झंडे के जरिए कन्नड़ स्वाभीमान जगाने की कोशिश की गई तो लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देकर हिंदुओं को विभाजित करने का प्रयास हुआ। यही नहीं आतंकवादी संगठन पापुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपीआई) का भी भरपूर इस्तेमाल हुआ। एसडीपीआई ने मुस्लिम मतों का विभाजन रोकने और कांग्रेस को जिताने के लिए अपने उम्मीदवार वापस लिए। यही नहीं मस्जिदों से फतवे जारी किए गए कि इस्लाम खतरे में है, इसे बचाने के लिए कांग्रेस को वोट दें। कांग्रेस के पक्ष में चर्च की तरफ से अपील जारी की गई।

कर्नाटक चुनाव से स्पष्ट है कि कांग्रेस इस्लामिक सांप्रदायिकता और तुष्टिवाद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। राहुल भाजपा को रोकने के लिए इतने डेस्परेट हो गए हैं कि अपनी पार्टी का भविष्य भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। स्पष्ट है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों के बारे में फिर से विचार करना पड़ेगा नहीं तो इस्लामिक ध्रुवीकरण की नीति उसे अगले लोकसभा चुनावों में फिर भारी पड़ेगी, भले ही वो कितना ‘टेम्पल रन’ खेल लें।

“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।