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‘मी टू’ और रिवर्स तालीबनाइजेशन का खतरा in Punjab Kesari

‘मी टू’ के कारण समाज में जैसे भूचाल आ गया है। ऐसे मौके पर हिंदी फिल्म दाग के गाने का मुखड़ा याद आता है – जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। कब कहां किसका असली चेहरा बेनकाब होगा, किसका मुखौटा नोच फेंका जाएगा, हर ओर भय मिश्रित आशंका है। लोग अपने नजदीकी रिश्तेदारों को भी संदेह की नजर से देखने लगे हैं। अधिसंख्य लोग इसे आधुनिक भारतीय नारी के साहस और संघर्ष का प्रतीक मान रहे हैं। जब अमेरिका में ‘मी टू’ का बवंडर उठा था तो यहां लोगों ने सोचा था कि भारत में ऐसा कुछ होना असंभव है क्योंकि भारतीय नारी भले ही कितनी आधुनिक क्यों न हो वो ऐसे विषय सार्वजनिक रूप से नहीं उठाएगी क्योंकि इससे कहीं न कहीं उसकी खुद की छवि भी धूमिल होगी।

लेकिन अंततः हमने देखा कि भारत भी ‘मी टू’ तूफान से अछूता नहीं रहा। टेलीविजन और फिल्मों से शुरू हुआ ये अभियान आखिरकार विश्वविद्यालयों, मीडिया से होता हुआ राजनीति तक भी पहुंचा और इस चक्कर में विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर और एनएसयूआई अध्यक्ष फिरोज खान को अपनी गद्दी भी गंवानी पड़ी। कांग्रेस ने अगर अकबर का मामला उठाया तो भारतीय जनता पार्टी ने राहुल पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली सुकन्या देवी, सेक्स सीडी कांड में फंसे अभिषेक मनु सिंघवी और संदिग्ध हालात में मारी गई शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का मामला जोर-शोर से उठाया। इस बीच महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सभी राजनीतिक दलों को सुझाव दे डाला कि वो महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों की जांच के लिए प्रकोष्ठ बनाएं ताकि काॅरपोरेट सेक्टर जैसे उनके यहां भी ऐसे मामलों की सुनवाई हो सके और पीड़िताओं को न्याय मिल सके।

आधुनिकता का सारा दर्शन, राजनीति, सुझाव और सुझाव देने वाली समिति का विचार एक तरफ, ये पूरा प्रकरण कई अन्य गंभीर सवाल भी उठाता है। कुछ लोग इसे पुरूषवादी सोच कह सकते हैं लेकिन चाहे एससी-एसटी एक्ट का मामला हो या दहेज कानून के सख्त प्रावधानों का, स्वयं सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि बिना पर्याप्त आधार के, महज शिकायत की बिना पर किसी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहां तो हम देखते हैं कि कथित आरोपियों का पूरा का पूरा मीडिया ट्रायल चल रहा है। कानून का एक नियम है – जब तक व्यक्ति दोषी न साबित हो, वो निर्दोष है। यहां तो पुलिस में एफआईआर भी दर्ज नहीं होती और महज एक सोशल मीडिया पोस्ट के बूते पर व्यक्ति का मानमर्दन आरंभ हो जाता है, सुर्खियां बन जाती हैं, लोग चटखारे ले-ले कर चर्चा शुरू कर देते हैं।

ऐसे में सहज ही ये विचार आता है कि इस पूरी कार्यवाही का उद्देश्य आखिर क्या है – भड़ास निकालना, समाज को सतर्क करना, न्याय पाना, किसी को लांछित करना, बदला लेना या सिर्फ विवाद खड़ा करना? गंभीरता से सोचें तो ‘मी टू’ से किसी को शीघ्रता से न्याय मिलने की अपेक्षा करना तो उचित नहीं होगा, हां इससे बदला अवश्य लिया जा सकता है, किसी को बदनाम अवश्य किया जा सकता है, अगर कोई सोचता है कि विवाद खड़ा करके और सुर्खियां बटोर कर न्याय हासिल किया जा सकता है, तो ये व्यर्थ ही होगा। न्याय तो फिर भी स्थायी संतोष दे सकता है, सुर्खियों का क्या? आज हैं, कल नहीं।

भारतीय इतिहास में ‘नो मी नाॅट’ के असंख्य प्रसंग हैं जब हमारी बहादुर नारियांे ने अत्याचारियों का जमकर प्रतिकार किया और जरूरत पड़ी तो मौत को भी गले लगाया। चाहें रामायण हो या महाभारत, भारत के इन दोनों प्रमुख महाग्रंथों के मूल में नारी ही है। रामायण में रावण के आतंक के बावजूद सीता हार नहीं मानतीं, वहीं महाभारत में दुर्योधन के दंभ और लिप्सा के कारण चीरहरण का शिकार होने वाली द्रौपदी आखिरकार बदला लेकर ही रहती हैं। सवाल ये उठता है और ये निःसंदेह बड़ा सवाल है कि आज ‘मी टू’ के तहत सामने आने वाली महिलाएं तब क्यों नहीं बोलीं जब उनके साथ कथित तौर पर ज्यादती की जा रही थी? अगर वो तब आवाज उठातीं, तो संभव है वो कुछ और महिलाओं को भी कथित खलनायक का शिकार होने से बचा पातीं? जिस समय इनके साथ कथित ज्यादती हुई, तब ज्यादातर महिलाएं व्यस्क थीं, पढ़ी-लिखी थीं, पूरे होशो-हवास में थीं कि ज्यादती का तुरंत विरोध करतीं। अगर इन्हें वास्तव में ‘ज्यादती’ इतनी बुरी लग रही थी तो इन्होंने उसी समय तुरंत उस व्यक्ति का झापड़ क्यों नहीं रसीद किया या थाने जा कर रिपोर्ट नहीं लिखवाई? हम ये नहीं कहते कि ये महिलाएं खुद्दार नहीं हैं, लेकिन क्या किसी खुद्दार महिला को तुरंत प्रतिकार नहीं करना चाहिए? उसे बीस साल तक क्यों इंतजार करना चाहिए?

अगर कोई नासमझ बच्ची अपने साथ हुई ज्यादती का व्यस्क होने पर खुलासा करे तो समझ में आता है कि जब उसके साथ गलत हरकत हुई, तब शायद उसे उसका अर्थ भी नहीं मालूम था, लेकिन पूर्णतः शिक्षित, व्यस्क, खुद के आधुनिक होने का दावा करने वाली महिलाएं बीस साल बाद नींद से जागें तो थोड़ा अजीब लगता है। इन महिलाओं की मंशा पर भी संदेह पैदा होता है।

इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो के फिल्मी किस्सों से लेकर आधुनिक फिल्मी पत्रिकाओं तक, ऐसे बेशुमार किस्से हमारे आपके सामने से गुजरे होंगे। कभी इसे ‘फेवर’ बोला गया तो कभी ‘कास्टिंग काउच’। जब तक निभे तब तक ‘लिव इन’, जब बिगड़े तो ‘बलात्कार’। आधुनिक भारत में स्त्री-पुरूष संबंधों में ‘नई सोच’ और ‘आक्रामक महिला समर्थक’ कानूनों ने नए आयाम जोड़े हैं। सेक्स से जुड़ी नैतिकता की पुरातनपंथी मान्याताएं लगभग हवा हो चुकी हैं। पहले जहां पुरूष बादशाह होता था वो अब ‘रिसीविंग एंड’ पर आ गया है।

समाज आज शायद ये समझ नहीं पा रहा, कि पहले आक्रामक महिला समर्थक कानूनों और अब ‘मी टू’ जैसे अभियानों के कारण आम महिलाओं की मुश्किलें कितनी बढ़ गईं हैं। कभी आपने गौर किया कि अचानक ऐसी संस्थाओं की संख्या कितनी बढ़ गई है जिसमें सिर्फ पुरूषों को काम दिया जाता है और महिलाओं के लिए दरवाजे सदा के लिए बंद कर दिए गए हैं। ये एक किस्म का ‘रिवर्स तालिबनाइजेशन’ हो रहा है। पुरूषों और महिलाओं के बीच सहजता तेजी से खत्म होती जा रही है। महिलाओं के लिए अवश्य ही सुरक्षित माहौल होना चाहिए, लेकिन पुरूषों का क्या? एक शिकायत के बाद उन्हें जेल भेज देना चाहिए या एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनके जीवन भर के यश को मिट्टी में मिला देना चाहिए? सेक्स एक स्वाभाविक-प्राकृतिक भावना है। कभी किसी ने सोचा कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो स्त्री और पुरूष कैसे अपनी भावना की अभिव्यक्ति कर पाएंगे? ऐसे बंद समाज के क्या दीर्घकालिक परिणाम होंगे?

न तो हम महिलाओं पर ज्यादतियों का समर्थन करते हैं और न ही उनकी न्याय की आकांक्षा का, लेकिन हम कानूनों का दुरूपयोग रोकने के पक्ष में अवश्य हैं। भारत के लगभग हर सरकारी विभाग और काॅरपोरेट में ऐसे प्रकोष्ठ बनाए गए हैं जहां महिलाएं ज्यादतियों की शिकायत कर सकती हैं, लेकिन आश्यर्य है कि दुनिया को जागरूक बनाने का दावा करने वाले मीडिया में ऐसे प्रकोष्ठ देखने को नहीं मिलते। यही हाल फिल्म और टीवी जगत का भी है। बेहतर होगा कि वहां भी परिस्थितियों के अनुसार ऐसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं। महिलाओं को सुरक्षा तो मिले ही, लेकिन मिथ्या आरोप लगाने वाली महिलाओं को सजा और पुरूषों को हर्जाना भी मिले।

“प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उत्तर भारतीयों को भड़काने की साजिश” in Punjab Kesari

गुजरात में कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस का वीभत्स दंगाई चेहरा एक बार फिर उजागर हुआ है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सांप्रदायिक दंगे नहीं करवाए, उसने गुजरात में 14 माह की मासूम बच्ची के घृणित बलात्कार का बहाना बना उससे भी घृणित काम किया – वहां दूसरे राज्यों, विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार 1⁄4ध्यान रहे दोनों राज्यों में एनडीए की सरकार है1⁄2 से आए मजदूरों-कामगारों पर हमला बोल दिया और उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया। इस पूरे षडयंत्र के पीछे अगर कोई है तो वो है राहुल गांधी का खास आदमी अल्पेश ठाकोर। बच्ची क्योंकि ठाकोर समुदाय की थी, तो इस वहशी को अपनी दरिंदगी दिखाने का और भी मौका मिल गया और इसकी ‘ठाकोर सेना’ 1⁄4पालतू गुंडों 1⁄2 ने बाहर से आए मजदूरों पर कहर बरपा कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं, कांग्रेस के अनेक विधायकों और कार्यकर्ताओं ने भी इस जघन्य कांड में अल्पेश का साथ दिया।

प्रवासियों को घरों में घुस कर धमकाया गया, ईंट, पत्थर, सरिया, तलवार, जो हाथ आया, उसका इस्तेमाल किया गया। आदमियों को तो छोड़िए, महिलाओं और छोट-छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। मजबूरन हजारों की तादाद में लोगों ने पलायन किया। जब अल्पेश ठाकोर से लोगों ने इस विषय में पूछा तो वो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए घड़ियाली आंसू बहाने लगा और राजनीति छोड़ने के दावे करने लगा। अन्य राज्यों के लोगों को लग सकता है कि बाहरी लोगों के प्रति अल्पेश और उसकी सेना की हिंसा बच्ची के बलात्कार का नतीजा थी, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। अल्पेश के अनेक पुराने वीडियो सामने आए हैं जिनमें वो स्थानीय लोगों को बाहरी मजदूरों के खिलाफ भड़का रहा है और हिंसा की न केवल धमकी दे रहा है, बल्कि लोगोें को उसके लिए उकसा भी रहा है।

राज्य पुलिस ने कथित बलात्कारी को जल्द ही पकड़ लिया, लेकिन अल्पेश और उसके गुंडों ने फिर भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच शुरू कर दिया। स्पष्ट है कि इसके पीछे कोई ‘आक्रोश’ काम नहीं कर रहा था। यह सोची-समझी साजिश थी जिसका असल मकसद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पशोपेश में डालना था जो स्वयं गुजराती हैं, लेकिन काशी से चुनाव लड़ कर लोकसभा पहुंचे हैं। इसका दूसरा और खास मकसद था उत्तर भारत के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काना। जाहिर है, इस कांड के शुरू होते ही काशी में प्रधानमंत्री को धमकी देने वाले पोस्टर लगने शुरू हो गए जिसमें उन्हें चेताया गया था कि आखिर तो उन्हें चुनाव लड़ने यहीं आना पड़ेगा।

अल्पेश के आका राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री को उलाहना देना शुरू कर दिया कि पहले तो वो खुद लोगों को रोजगार नहीं दे पा रहे, और जब युवा अपना घर-बार छोड़ कर दूसरे राज्यों में रोजीरोटी ढूंढने जा रहे हैं तो उनकी रक्षा भी नहीं कर पा रहे। कहना न होगा, आलाकमान का आदेश मिलते ही, कांग्रेसी गिद्धों की पूरी टोली ने इस मसले पर डिजीटल मीडिया में मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। ये तो उसी कहावत को चरितार्थ करने जैसा है – उलटा चोर कोतवाल को डांटे। स्पष्ट है कांग्रेसियों ने इस साजिश को पूरी मेहनत और तैयारी से लागू किया। गुजरात में अल्पेश और उसके गुंडों से लेकर दिल्ली में आलाकमान और मीडिया में कांग्रेसी पिट्ठुओं तक सबने अपना फर्ज बखूबी निभाया और पूरे देश में विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश की गई। महाराष्टं में मोदी के खिलाफ नफरत फैलाने की कमान संभाली मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम ने जो खुद मूलतः बिहार से हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार की समाजवादी पार्टी 1⁄4सपा1⁄2, बहुजन समाज पार्टी 1⁄4बसपा1⁄2, राष्ट्रीय जनता दल 1⁄4राजद1⁄2 जैसी सीआईसी पार्टियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने शुरू कर दिए। आग लगाने वाले अल्पेश ठाकोर के खिलाफ तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटा, वो सीधे मोदी पर गोले दागने लगे – मोदी और उनकी पार्टी की राज्य सरकार बाहरी लोगों की रक्षा में असफल रही है…मोदी अब उत्तर प्रदेश और बिहार में किस मुंह से जाएंगे जहां के लोगों को सबसे ज्यादा शिकार बनाया गया है। इस पूरे खेल में

सीआईसी मीडिया की जितनी निंदा की जाए वो कम है। अल्पेश ठाकोर और उसके गुंडों की हरकतें वीडियो में कैद हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन ये लोग बजाए कांग्रेस की ओछी हरकतें दिखाने के, बड़ी फरमाबरदारी से राहुल गांधी के अजीबो-गरीब बयान दिखाने में लगे रहे। इनमें से एक ने भी राहुल से अल्पेश के बारे में सवाल नहीं पूछा उलटे राज्य में हिंसा के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया।

इस कांड से एक बात साफ हो गई है कि राहुल गांधी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले गुजरात विधानसभा में चुनाव में हमने देखा कि कैसे उन्होंने अल्पेश ठाकोर के साथ ही हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे लोगों से हाथ मिलाया। अल्पेश के साथ ही हार्दिक और जिग्नेश का इतिहास भी संदिग्ध और विवादास्पद है। हार्दिक ने 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में पटेल आरक्षण की मांग पर रैली की। रैली के बाद जब वो उपवास पर बैठने लगे तो पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश। इस पर उनके समर्थकांे ने हिंसा और तोडफोड़ शुरू कर दी। हिंसा इतनी अधिक बढ़ गई की सरकार को कफ्र्यु लगा कर सेना बुलानी पड़ी। जिग्नेश मेवानी की नक्सल पृष्ठभूमि भी जगजाहिर है। गुजरात चुनाव और बाद में भीमा कोरेगांव आदि में उसके भड़काऊ भाषण किसी से छुपे नहीं हैं। अर्बन नक्सल रोना विल्सन के लैपटाॅप से महाराष्टं पुलिस को जो दस्तावेज मिले उनसे स्पष्ट है कि उसने कांग्रेस नेतृत्व और नक्सलियों के बीच संपर्कसूत्र की भूमिका भी निभाई। इन्हीं दस्तावेजों से ये भी पता चला था कि कांग्रेस दंगा फैलाने और समाज को तोड़ने के लिए नक्सलियों को आर्थिक और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। इसका सबूत हमें तब मिला जब वरवर राव, गौतम नवलखा, वरनन गोंजालविस, अरूण फरेरा और सुधा भारद्वाज जैसे दुर्दांत नक्सलियों की पैरवी करने कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी स्वयं सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और उनके समर्थन में लेख लिखते पाए गए। यहां चलते-चलते एक बात और बता दें, गुजरात चुनाव में इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया 1⁄4एसडीपीआई1⁄2 ने कांग्रेस और जिग्नेश की पूरी मदद की। यही नहीं कर्नाटक चुनाव में भी एसडीपीआई ने कांग्रेस का पूरा साथ दिया।

गुजरात सरकार को अल्पेश ठाकोर द्वारा प्रायोजित दंगों को चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। भले ही कांग्रेसियों को गुजरात में सिर्फ वर्ष 2002 के दंगे याद रहते हों जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे, लेकिन राज्य में कांग्रेसी हिंसा का बहुत लंबा और क्रूर इतिहास रहा है। आपको जानकर आश्यर्च होगा कि 2002 के दंगों में अनेक कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेसी शासन में साठ के दशक से नब्बे के दशक तक सैकड़ों दंगे हुए। वर्ष 1969 1⁄4हितेंद्रभाई देसाई, कांग्रेस1⁄2, 1985 1⁄4माधवसिंह सोलंकी, कांग्रेस1⁄2, 1987 1⁄4अमरसिंह चैधरी, कांग्रेस1⁄2, 1990 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 और 1992 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 में राज्य में बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। हफ्ता दर हफ्ता चलने वाले ये दंगे इतने बड़े और विकराल थे कि 2002 के दंगे तो इनके सामने कुछ भी नहीं थे। भले ही मोदी ने लंबे अर्से तक राज्य में दंगों पर लगाम लगाई, लेकिन ताजा हिंसा बताती है कि राज्य में कांग्रेस की दंगा मशीनरी पूरी तरह चाक-चैबंद है। अगर सरकार सचेत नहीं रही, तो लोक सभा चुनावों से पहले ऐसी घटनाएं फिर हो सकती हैं।

राहुल गांधी आज बेशर्मी से प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा मांग रहे हैं, लेकिन वो अपनी गिरेबान में झांक कर देखने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर उन्हें थोड़ी सी भी शर्म होती तो क्या वो अल्पेश ठाकोर को पार्टी से बाहर नहीं करते? लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि कांग्रेस की नीति ही अब देश को जाति और धर्म के नाम पर तोड़ने तथा हिंसा और अराजकता फैलाने की है। मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के जवाब में उनका एक ही नारा है – ‘सबका विनाश, सबका सत्यानाश’।

“संघ को बदनाम करने की नापाक कोशिश” in Punjab Kesari

गांधी जयंती पर कोलकाता के दमदम नगर बाजार में बम विस्फोट हुआ जिसमें आठ साल का बच्चा मारा गया। अभी पुलिस ने केस दर्ज कर तफ्तीश शुरू भी नहीं की थी कि ममता बनर्जी सरकार के मंत्री पूर्णेंदू बोस ने इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि संघ के स्थानीय नेतृत्व से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक सबने इसकी निंदा की और बोस के बयान को बेसिरपैर का बताया, लेकिन राज्य सरकार के एक ‘जिम्मेदार’ मंत्री द्वारा तुरंत और वो भी बिना किसी सबूत के संघ को दोषी ठहराना चिंताजनक है। चिंताजनक इसलिए कि एक मंत्री द्वारा इस प्रकार बयान देना, कहीं न कहीं पुलिस और जांच एजेंसियों के काम को भी प्रभावित करता है। ये एक प्रकार से उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निर्देश देता है कि उन्हें जांच किस दिशा में ले जानी है और येन केन प्रकारेण अंततः किसे दोषी साबित करना है।

अब दूसरा मामला इस्लामपुर के दरीभीत स्कूल का देखिए। यहां पिछले महीने जब शिक्षकों की भर्ती के मामले में छात्रों ने विरोध किया तो पुलिस ने उनपर गोली चला दी। इससे दो छात्र मारे गए। इस मामले में तो स्वयं ममता बनर्जी ने संघ को दोषी ठहराया, हालांकि गोली ममता की पुलिस ने चलाई। संघ प्रवक्ता जिशनु बसु ने इस मसले में टीएमसी को कानूनी नोटिस भेज दिया है।

बिना किसी सबूत या जांच के संघ पर मिथ्या आरोप लगाने वाली ममता और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पश्चिम बंगाल को खुद कैसे आतंकियों का अड्डा बना रखा है वो इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले तीन साल में भारत में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सबसे अधिक एजेंट पश्चिम बंगाल से ही पकड़े गए हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलटने की कोशिश में लगे जमात-उल-मुजाहीदीन, बांग्लादेश (जेएमबी) के 30 आतंकी और उनकी बम बनाने की फैक्ट्रियां भी यहीं पकड़ी गईं थीं।

पिछले साल दिसंबर में खुफिया एजेंसियों ने खबर दी थी कि जेएमबी पश्चिम बंगाल और असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों को भड़काकर गुरिल्ला फोर्स बनाने की योजना पर काम कर रहा है और संघ और उसके सहयोगी संगठनों के नेता उसके निशाने पर हैं क्योंकि वही बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ का सबसे मुखर विरोध करते हैं। ध्यान रहे जेएमबी के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से प्रगाढ़ संबंध हैं और टीएमसी के अनेक पदाधिकारियों पर उसके एजेंटों को पालने के आरोप भी लगते रहे हैं। आपको ये भी याद होगा कि कैसे ममता के एक मंत्री फिरहद हाकिम ने पाकिस्तानी अखबार डाॅन की रिपोर्टर मलीहा हामिद सिद्दीकि को कोलकाता के गार्डन रीच इलाके की सैर कराते हुए उसे गर्व से ‘मिनी पाकिस्तान’ बताया था।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बदनाम ममता बनर्जी राज्य में ‘ममता बेगम’ के नाम से जानी जाती हैं। संघ और भारतीय जनता पार्टी से उनका द्वेष पुराना है। उन्होंने राज्य में होने वाले संघ प्रमुख मोहन भागवत के हर कार्यक्रम में रोड़े अटकाए हैं। उन्हें लगता है कि संघ को हिंदुओं का प्रतीक बनाकर और उसे प्रताड़ित और बदनाम कर वो हिंदुओं से नफरत करने वाले लोगों को परपीड़ा सुख दे सकती हैं और उनके वोट हासिल कर सकती हैं। लेकिन उनकी ये मानसिकता नई नहीं है, वो कांग्रेस से आईं हैं और वहां जवाहरलाल नेहरू के जमाने से नफरत फैलाने का ये रोग चला आ रहा है।

सोनिया सरकार के जमाने में इसने विकराल रूप धारणा कर लिया जब उनके सुशील शिंदे और पी चिदंबरम जैसे गृह मंत्रियों तथा उनके मातहत काम करने वाली पुलिस और जांच एजेंसियों ने इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ या ‘भगवा आतंकवाद’ के काल्पनिक विचार को जमीन पर उतारने के लिए संघ पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सब जानते हैं कि मुंबई हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिश थी, लेकिन कांग्रेस के एक दलाल अजीज बर्नी ने एक किताब लिखी – मुंबई हमलाः आरएसएस की साजिश और इसका विमोचन किया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने। दिग्विजय सिंह वही व्यक्ति हैं जिन्हें हेट प्रीचर जाकिर नायक ‘शांतिदूत’ नजर आता है और जो ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को ‘जी’ कह कर सम्मान देते हैं।

समझौता ट्रेन ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों ने आईएसआई एजेंट अजमत अली को पकड़ लिया था, लेकिन न जाने किस मंत्री के इशारे पर उसे छोड़ दिया गया और सेना के कर्तव्यनिष्ठ अफसर कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा आदि का पकड़ लिया गया और उनके खिलाफ फर्जी केस बनाए गए। यही हाल गोधरा कांड में हुआ। इसकी योजना पाकिस्तान में बनी, लेकिन पाकिस्तानी एजेंट कब कैसे गायब हो गया, पता ही नहीं चला। याद दिला दें कि गोधरा कांड के दो मुख्य अभियुक्त फारूक भाना और इमरान शेरू हैं। वारदात के समय भाना गोधरा में निर्दलीय पार्षद था। उसने वहां बोर्ड का निर्माण कांग्रेस की मदद से किया था। भाना खुद भी फरार हो गया था और 14 साल बाद ही वो पुलिस की पकड़ में आया।

गोधरा कांड के बाद कैसे गुजरात में दंगे भड़के और उसके बाद तबके मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताकर कैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया गया और कैसे भाजपा और संघ के खिलाफ मुसलमानों को लामबंद करने की कोशिश की गई वो किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस और अमेरिका में धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाने वाली कुछ ईसाई संस्थाओं ने तो मोदी के अमेरिका प्रवेश तक पर रोक लगवा दी थी।

संघ पर सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस ने ही निशाना साधा ऐसा नहीं है। हमने देखा है कि जब भी किसी राष्ट्रविरोधी विचारधारा या आतंकी पर हमला हुआ है तो उसने पलट कर संघ पर हमला किया है। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और कई अन्य विश्वविद्यालयों में पलने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल और उनकी सरपरस्त कम्युनिस्ट पार्टियां, इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमाक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया, कश्मीर के आतंकी संगठन और सपा और राजद जैसी अनेक इस्लामिक सांप्रदायिक पाटियां आदि सभी शामिल हैं। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियांे और कांग्रेस के शासन में कैसे सैकड़ों संघ कार्यकर्ताओं को सरेआम कत्ल किया गया है, वो किसी से छुपा नहीं है। इसी प्रकार कर्नाटक में भी संघ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न और हत्याएं जारी हैं। हर चुनाव से पहले चर्च और मौलवी कैसे संघ के विरूद्ध भड़ास निकालते हैं और भाजपा के खिलाफ फतवा जारी करते हैं, वो भी मंजरे आम पर है। मतलब साफ है – संघ अखंड भारत का समर्थन करता है तो जो भी भारत को तोड़ना चाहता है वो संघ पर हमला करता है।

हाल ही में रिपब्लिक टीवी ने लंदन आधारित खालिस्तानियों पर एक स्टिंग आॅपरेशन किया। आश्चर्य तो तब हुआ आईएसआई के पैसे पर पलने वाले प्रतिबंधित ‘दल खालसा’ के आतंकी गुरचरण सिंह ने अपने आतंकी रवैये को सही ठहराने के लिए संघ को दोषी ठहराना शुरू कर दिया। इस खूनी दरिंदे से कोई पूछे कि जब तुमने आईएसआई के इशारे पर अस्सी के दशक में पंजाब में खालिस्तान की आग लगाई तो संघ कहां था? संघ जिम्मेदार था तो तुमने इंदिरा गांधी की हत्या क्यों करवा दी? आश्चर्य की बात है कि आज पंजाब में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार है लेकिन लंदन में बैठे ये लोग पंजाब में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या करवा रहे हैं। स्टिंग में ये दावा करते हैं कि पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव में इन्होंने आम आदमी पार्टी को पैसा दिया। आम आदमी पार्टी क्या पंजाब में संघ के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी?

स्टिंग में किसने क्या कहा और उसके पीछे कौन है, सब जानते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बताने के नेरेटिव का इस्तेमाल अब पाकिस्तान भी खुल कर कर रहा है। इस बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान पर हमला किया तो पलट कर उसने संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बता कर हमला किया। संघ को ‘हिंदू आतंकी’ के रूप में बदनाम करने की साजिश कांग्रेस ने पाकिस्तान के इशारे पर की या पाकिस्तान ने कांग्रेस के दुष्प्रचार का दुरूपयोग किया, इसकी जांच होनी ही चाहिए। जो भी हो, चाहे कांग्रेस हो या पाकिस्तान दोनों में एक बात तो काॅमन है – हिंदुओं के प्रति नफरत। ये भी सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल देश में तो संघ के प्रति नफरत फैलाते हैं, विदेश में भी उसका अपमान करने से बाज नहीं आते जबकि वहां उनके अनर्गल वक्तवयों का जवाब देने संघ का कोई कार्यकर्ता भी मौजूद नहीं होता।

भारत से लेकर पाकिस्तान और इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक दुनिया भर में जिस प्रकार इस्लामिक आतंकी संगठन और ईसाई चर्च संघ पर निशाना साध रहे हैं, उसका गहन अध्ययन होना चाहिए। इसके लिए कौन से देशी-विदेशी संगठन और राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और उनका आपस में क्या संबंध है, उस पर विचार होना ही चाहिए। बहरहाल इतना तो साफ है कि भारत में कांग्रेस, टीएमसी, सीपीएम, राजद, सपा आदि जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां के कट्टर इस्लामिक दल भी आज संघ को निशाना बना रहे हैं। सब एक ही जुबान बोल रहे हैें और सबका एक ही मकसद है – इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने या उससे ध्यान हटाने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का हौवा खड़ा करना। इस मामले में आईएसआई, कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों से दस कदम आगे है। उसके टुकड़ों पर पलने वाले कश्मीरी, खालिस्तानी, बांग्लादेशी, बर्मी आतंकी सभी अब एक स्वर से इसका जाप कर रहे हैं।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में दिल्ली के विज्ञान भवन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष मजबूती और स्पष्टता से रखा था। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अब जरूरी है कि संघ विश्व समुदाय के साथ वैचारिक आदान-प्रदान और प्रगाढ़ करे और अपने उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण सामाजिक सांस्कृतिक योगदान और परियोजनाओं के विषय में उन्हें अधिक जानकारी दे।

“राफेलः झूठी है कांग्रेस” in Punjab Kesari

राफेल लड़ाकू जेट विमानों को लेकर कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस लगातार जैसे झूठ पर झूठ बोल रही है, वो शर्मनाक है। उससे भी ज्यादा लज्जाजनक तो उन बिकाऊ पत्रकारों का गिरोह है जो सच्चाई जानते हुए भी सिर्फ अपने निहित स्वार्थों के कारण इस सीआईसी पार्टी के दुष्प्रचार का हिस्सा बन रहे हैं। हम इन्हें बिकाऊ कह रहे हैं क्योंकि जब भी ये कांग्रेस के संवाददाता सम्मेलन में जाते हैं या राहुल गांधी से टकराते हैं तो उनसे ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत ही नहीं करते जिनसे राहुल गांधी या उनकी पार्टी अपने ही बुने जाल में फंस सकते हैं।

जब राहुल के पिता राजीव गांधी के बोफोर्स घोटाले का मामला उनके ही एक मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उजागर किया था तो एक नारा उछला था – गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है। आजकल राहुल ये नारा राफेल के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। बोफोर्स में राहुल के मामा माने जाने वाले इटली के ओतावियो क्वात्रोकी मुख्य दलाल थे जिनके फ्रीज खातों को मनमोहन सरकार के जमाने में संभवतः सोनिया गांधी के इशारे पर डीफ्रीज करवाया गया था। इस मामले में और भी बहुत से सबूत हैं और ये अब भी अदालत में है। अगर सोनिया गांधी के इशारे पर इसे दबाया नहीं गया होता तो अब तक ये हल हो चुका होता।

इसके विपरीत राफेल दो सरकारों यानी भारत और फ्रांस के बीच का समझौता है जिसे इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (आईजीए) कहा जाता है। ऐसे समझौतों में बिचैलिए नहीं होते जैसे बोफोर्स की खरीद में थे। कांग्रेस सफेद झूठ क्यों बोल रही है, आखिर इसका मकसद क्या है? इस पर विचार करने से पहले आइए जान लेते हैं कि राफेल सौदे की सच्चाई क्या है। इसे समझने के लिए हम किसी नेता या सैन्य विश्लेषक की राय पर यकीन करने की जगह डिप्टी चीफ एयरमार्शल रघुनाथ नांबियार के एक साक्षात्कार के कुछ अंश लेना चाहेगे जो उन्होंने रिपब्लिक टीवी को दिया था।

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि नांबियार खुद फुली लोडेड (हथियारों से सुसज्जित) राफेल विमान उड़ा चुके हैं। वो कहते हैं, “ऐसे आधुनिक विमान को उड़ाना बहुत बढ़िया अनुभव था। इसमें वो सभी उपकरण लगे थे जिन्हें भारतीय वायुसेना किसी भी आधुनिक विमान के लिए आवश्यक मानती है। ये उन राफेल विमानों सेे अलग है जो फ्रांस की सेना के पास हैं। मुझे ये विमान उड़ाने का अवसर मिला और ये समझने का अवसर मिला कि इस नए विमान की क्या क्षमताएं हैं, इसमें जो सुधार किए गए हैं उनकी क्या संभावनाएं हैं और इसमें किस सीमा तक सुधार किए गए हैं।“

वो बताते हैं, “इसमें भारत की आवश्यकताओं के हिसाब से 13 संशोधन किए गए हैं। भारतीय वायुसेना ने इन संशोधनों की मांग 2007 की रिक्वेस्ट फाॅर प्रपोसल (आरएफपी) में ही की थी। इनके आधार पर ही राफेल ने प्रस्ताव दिया…जब हमने 2016 में राफेल के लिए समझौता किया तब उसमें भी ये शामिल थे। यानी इनमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया। लेकिन नए विमानों में कुछ अतिरिक्त हथियार भी लगाए गए हैं, जो इन्हें अधिक प्रभावी बनाते हैं।“

नांबियार आगे बताते हैं, “भारतीय वायुसेना ने मीडियम मल्टीरोल काम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए प्रस्ताव 2000 में किया था। 2007 में आरएफपी जारी की गई, 2012 में दासो एविएशन (राफेल बनाने वाली फ्रैंच कंपनी) को शाॅर्टलिस्ट किया गया। लेकिन सौदा नहीं हो सका। एनडीए सरकार ने इमरजैंसी क्लाॅस के तहत 36 फुली लोडेड विमान खरीदने का फैसला किया जिसमे वेपन पैकेज और परफाॅरमेंस बेस्ड लाॅजिस्टिक्स शामिल हैं। लंबे अर्से में ये पहली बार थी जब वायुसेना ने स्वयं काॅस्ट नेगोशिएशन कमेटी का नेतृत्व किया, न कि रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों ने। राफेल के मामले में तत्कालीन दो डिप्टी चीफ आॅफ एयर स्टाफ कमर्शियल नेगोशिएशन कमेटी (व्यावसायिक वार्ता समिति) में शामिल थे। उन्हें बहुत स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि तुम्हें पहले प्रस्तावों के मुकाबले बेहतर विमान, कीमत, उपलब्धता और शर्तें तय करनी हैं। इसी आधार पर कमर्शियल नेगोशिएशन कमेटी की स्थापना की गई। पहले का प्रस्ताव मतलब 2008 का प्रस्ताव क्योंकि आएफपी 2007 में आई थी।“

नांबियार बताते हैं, “दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों में वार्ता के 18 दौर हुए जो करीब 14 महीने चले। फ्रैंच टीम का नेतृत्व जरनल रिब कर रहे थे और भारतीय टीम के नेता थे वायुसेना के डिप्टी चीफ। इसमें कड़ी सौदेबाजी हुई। भारतीय पक्ष ने जबरदस्त तरीके से कोशिश की कि हमें बेहतर कीमत, बेहतर मेनटेनेंस केपेबिलिटी, बेहतर परफाॅरमेंस बेस्ड लाॅजिस्टिक्स, लोंग आवर टर्म प्राॅडक्ट सपोर्ट हासिल हों। असल में हम जो कुछ भी चाह रहे थे वो सब हमने हासिल किया।“

नांबियार के बयान से स्पष्ट है कि भारत को 2016 में काॅट्रक्ट साइन करते समय जो हासिल हुआ वो यूपीए शासन के दौरान एमएमआरसी और आरएफपी दोनों से कहीं बेहतर है। वो आगे महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, “मैं आपको कुछ आंकड़े देता हूं। बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत में अंतर करीब 9 प्रतिशत है। यानी 2008 में जो दाम लगाया गया था, ये उससे 9 प्रतिशत कम है। जहां तक पैकेज की कुल कीमत का सवाल है, तो कीमत में अंतर करीब 20 प्रतिशत है। अगर आपको खरीद की पूरी कीमत हासिल तकनीक और हथियारों के संदर्भ में देखनी हो यानी वो कीमत जो सरकार को अंततः देनी होगी तो हम कहेंगे कि हमने पहले के मुकाबले में 40 प्रतिशत बेहतर क्षमता हासिल की।“

वो इस 40 प्रतिशत का अर्थ भी स्पष्ट करते हैं, “कुल कीमत के दो हिस्से होते हैं। एक – वो कीमत जिस पर आप वार्ता के बाद पहुंचते हैं और दूसरी है भुगतान की शर्तें। इस बार भुगतान की शर्तें 2008 से कहीं बेहतर हैं। हमने इस बात पर जोर दिया और इसे हासिल भी किया कि एस्कलेशन (कीमत वृद्धि) का निर्धारण एक्चुअल टम्र्स (वास्तविक वृद्धि) पर हो बजाए 3.9 प्रतिशत के फिक्सड एमाउंट के जो 2008 में तय किया गया था। इस बार एस्कलेशन क्लाॅस कहता है कि या तो ये एक्चुअल (वास्तविक वृद्धि) के आधार पर होगा, वर्ना 3.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। कल को मान लीजिए यूरोप में मुद्रास्फीति की दर 10 प्रतिशत रहती है, तब भी हमारा एस्कलेशन 3.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। यानी दशमलव चार प्रतिशत की इस कटौती से ही हमारी करीब 23 प्रतिशत काॅस्ट सेविंग हुई है। आज मुद्रास्फीति की दर 1.2 प्रतिशत है, अगर हम इसके संदर्भ में बात करें तो हमारी काॅस्ट एडवांटेज करीब 40 प्रतिशत है।“

नांबियार आॅफसेट्स को लेकर उठे विवाद पर भी बात करते हैं और इस विषय में वायुसेना का पक्ष स्पष्ट करते हैं। वो बताते हैं, “जब व्यावसायिक वार्ता हो रही थी तो वो दो सरकारों के बीच यानी भारत और फ्रैंच सरकार के बीच हो रही थी। उनकी तरफ से एक जनरल था और हमारी ओर से उप वायुसेना प्रमुख थे। इस इंटर गवर्नमेंटल वार्ता की समाप्ति पर और इससे पहले कि कैबिनेट कमेटी आॅन सिक्योरिटी (सीसीएस) इसका अनुमोदन करती, हमने दासो और हथियार निर्माता एमबीडीए के साथ आॅफसेट समझौते को भी मंजूरी दी…।“

सीआईसी कांग्रेस रिलायंस को लेकर बहुत दुष्प्रचार कर रही है। नांबियार इसके बारे में भी खुलकर बात करते हैं, “मौजूदा आॅफसेट नीति और दिशानिर्देश कहते हैं कि इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते समय भारतीय साझीदार कंपनियों के बारे में बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसमें विभिन्न पार्टियों के बीच व्यावसायिक वार्ता और कड़ी सौदेबाजी होती है। जहां तक भारत का सवाल है हमने विमान के आॅफसेट समझौते के लिए दासो से वार्ता की और हथियारों के आॅफसेट के लिए एमबीडीए से बात की। दासो से 3.5 अरब यूरो और एमबीडीए से 350 मिलियन यूरो पर बात हुई यानी कुल पैकेज करीब 3.8 अरब यूरो का रहा। जहां तक रिलायंस का सवाल है तो जब 2016 में वार्ता हो रही थी तब हमने रिलायंस से कोई बात नहीं की। उस समय किसी भारतीय आॅफसेट पार्टनर को चिन्हित नहीं किया गया। ये दासो को देखना था कि वो किस के साथ समझौता करते हैं…।“

वो इन खबरों को सही बताते हैं कि आजकल भी अनेक सरकारी और निजी भारतीय कंपनियां आॅफसेट को लेकर दासो के साथ वार्ता कर रही हैं। लेकिन वो स्पष्ट करते हैं कि, “अभी तक कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है। मैं आपको बताऊं कि हमने जब 2016 में समझौता किया था तब दासो के करीब 22 फ्रैंच पार्टनर थे जो सभी सूचीबद्ध थे। अगर आप उन सबके हिस्से जोड़ लें तो कुल राशी करीब 3.5 अरब डाॅलर तक पहुंचती थी। दासो का अपना हिस्सा इस पूरी राशी का करीब 22 प्रतिशत था जो करीब 6,500 करोड़ रूपए बनता है।“

वो आॅफसेट नीति की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, “आॅफसेट का उद्देश्य है देश में संपत्ति का निर्माण। इससे भारत में आंतरिक ढांचे का निर्माण होगा, तकनीक का तबादला होगा, लोगों को प्रशिक्षण मिलेगा। कुल मिलाकर इससे भारत को हर हाल में फायदा ही होगा।“

नांबियार का साक्षात्कार कांग्रेस के दुष्प्रचार की कलई खोल कर रख देता है। विमानों की कीमत, उनमें लगे आधुनिकतम हथियारों, समझौते के तरीके और शर्तों, आॅफसेट पार्टनर आदि लगभग हर विषय पर वो बहुत साफगोई से बात करते हैं जिससे समझौते में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती।

लेकिन वायुसेना के समर्पित अधिकारी की तरह वो विवादास्पद मुद्दों पर बात नहीं करते। वो नहीं बताते की मनमोहन सरकार के दौरान ये समझौता क्यों नहीं हो सका? इसका जवाब भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा देते हैं। वो बिना लागलपेट और लिहाज के कहते हैं कि कांग्रेस के जमाने में समझौता नहीं हुआ क्योंकि दासो ने सोनिया गांधी के दामाद राॅबर्ट वाड्रा के मित्र संजय भंडारी को “पत्ती“ देने से इनकार कर दिया। पात्रा कांग्रेस पर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हैं जो नांबियार के साक्षात्कार से भी स्पष्ट होता है। वायुसेना ने मीडियम मल्टीरोल काम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए प्रस्ताव 2000 में किया। 2007 में आरएफपी जारी की गई, 2012 में दासो एविएशन (राफेल बनाने वाली फ्रैंच कंपनी) को शाॅर्टलिस्ट किया गया। यानी करीब 12 साल प्रक्रिया चली, लेकिन वायुसेना को विमान हासिल नहीं हो सके।“

मनमोहन सरकार का ढुलमुल रवैया भारत के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि वायुसेना को कम से कम 42 बेड़ों की आवश्यकता है जबकि उसकी मौजूदा ताकत 31 बेड़ों तक सीमित हो गई है। अगले दो साल में तीन और बेड़े समाप्त हो जाएंगे। जाहिर है वायुसेना के लिए ये संकट की घड़ी है। अगर ऐसे में मोदी सरकार इमरजैंसी क्लाॅस के तहत 36 राफेल विमानों की व्यवस्था नहीं करती तो वायुसेना की हालत और भी पतली हो जाती। ऐसे में अगर कोई दुश्मन भारत पर हमला कर देता तो हश्र क्या होता, इसकी कल्पना की जा सकती है। जाहिर है सोनिया सरकार ने देशहित और सुरक्षा तैयारी की जगह दलाली को तरजीह दी। अब राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस दासो से खुंदक निकालने की कोशिश कर रही है कि अगर तुमने हमें दलाली नहीं दी तो हम अब भी ये सौदा नहीं होने देंगे, भले ही हम सरकार में न हों।

देश की सुरक्षा को संकट में डालने के लिए शर्मसार होने की जगह कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी पर ही लगातार कीचड़ उछाल रही है जो अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का आरोप सही लगता है कि कांग्रेस देश की दुश्मन ताकतों के साथ ‘महागठबंधन’ बना रही है। आश्चर्यजनक नहीं कि इस पूरे मामले में पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक, वर्तमान सूचना एवं प्रसारण मंत्री फवाद चैधरी जैसे अनेक पाकिस्तानी नेता ही नहीं, आईएसआई का साइबर सेल भी कूद पड़ा है और सब बेशर्मी से राहुल का समर्थन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस विवाद से मोदी की छवि खराब होगी और वो अगला लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाएंगे। यही नहीं, विवाद बढ़ा तो राफेल विमानों की खरीद भी खटाई में पड़ जाएगी जो पाकिस्तानी सेना असल में चाहती भी है।

बहरहाल मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वो इस सौदे को किसी भी हालत में रद्द नहीं करेगी। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि ये प्राॅपागैंडा वाॅर है और हम इसका माकूल जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने जगह-जगह मनमाने तरीके से अलग-अलग आंकड़े पेश करने वाले राहुल गांधी को चुनौती दी है कि अगर वो अपना होमवर्क ठीक से करके आएं तो वो उनके हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं।

डिप्टी चीफ एयरमार्शल रघुनाथ नांबियार का साक्षात्कार निम्न लिंक पर उपलब्ध हैः

“ऐतिहासिक है संघ प्रमुख मोहन भागवत का विज्ञान भवन व्याख्यान” in Punjab Kesari

भ्रष्टाचार के कीचड़ में अच्छी तरह नहाए-धोए, लिपटे, सने, डूबे फर्जी गांधी परिवार के पूत राहुल (सपूत या कपूत ये आप तय करिए) पूछ रहे हैं कि देश को संगठित करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कौन होता है, देश को संगठित होना होगा तो वो खुद हो जाएगा। राहुल जैसा आदमी, जिसकी पूरी चुनाव नीति अंधी इस्लामिक-ईसाई सांप्रदायिकता, नफरत, दुष्प्रचार, देशद्रोहियों से सांठगांठ, अलगाववाद, क्षेत्रीय-जातीय विभाजन पर आधारित हो, अगर ऐसे सवाल न पूछता तो आश्यर्च होता। असल में राहुल और उनके पूर्वजों ने संघ के खिलाफ नफरत फैलाने की दसियों साल से लगातार साजिश की। अब जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में इसका जवाब सकारात्मकता, सम्मान और स्नेह से दिया तो वो तिलमिला गए। संसद में प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाकर ‘प्यार का ढोंग’ करने वाले राहुल को समझ नहीं आया कि भागवत को क्या जवाब दें? उन्हें लग रहा है कि समावेशी संस्कृति की बात करके भागवत कहीं उन लोगों को कांग्रेस से दूर न कर दें जिन्हें ‘हिंदुओं का हौवा’ दिखाकर कांग्रेस ने अपने साथ रखने की कोशिश की है।

कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भागवत की व्याख्यान माला ने वास्तव में इतिहास रच दिया। कांग्रेस और सीपीएम जैसी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों ने बड़ी मेहनत से कई दशकों तक संघ की जैसी तस्वीर बनाने की कोशिश की थी, भागवत ने एक झटके में उसके चीथड़े उड़ा दिए। ऐसा नहीं है कि उन्होंने ये या ऐसे विचार पहले नहीं व्यक्त किए, लेकिन ये पहली बार हुआ जब दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विज्ञान भवन से उन्होंने विश्व को संबोधित किया और दुनिया ने न केवल उन्हें ध्यान से सुना, बल्कि उन्होंने जो कहा उसे गहराई से गुना भी।

उनके संबोधन से सबसे ज्यादा निराशा तो कांग्रेस जैसी सीआईसी पार्टियों को हुई जिन्होंने संघ को ‘हिंदू सांप्रदायिक’ ठहरा कर इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उनके मुंह पर जोरदार तमाचा तब लगा जब भागवत ने कहा कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व संभव ही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, ”हिंदू राष्ट्र का अर्थ ये नहीं कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा उस दिन हिंदुत्व ही नहीं रहेगा। हिंदुत्व तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है।“

उन्होंने कहा, ”संघ ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को नहीं मानता। हम तो सबको अपना मानते हैं। यह शब्द ब्रिटिश काल में भारत आया, पहले ये नहीं था। मेरा मानना है कि जिन मुस्लिम बस्तियों के पास संघ की शाखा है, वहां मुस्लिम ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मैं तो कहता हूं सबको संघ में आकर संघ को देखना चाहिए और अगर हमारी बात में कोई कमी मिले तो फिर कहिए“।

वो यहीं नहीं रूके, उन्होंने संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकर की विवादित पुस्तक ‘बंच आॅफ थाॅट्स’ के बारे में भी खुल कर अपने विचार रखे जिसमें मुसलमानों पर कुछ कथित रूप से विवादित टिप्पणियां की गईं हैं। उन्होंने कहा, “‘बंच आॅफ थाॅट्स’ गुरू जी के भाषणों का संग्रह है जो एक विशिष्ट संदर्भ में दिए गए थे और वो शाश्वत नहीं हैं। संघ हठधर्मी नहीं है, जैसे समय बदलता है, वैसे हमारे विचार भी बदलते हैं। डाॅक्टर हेडगेवार ने कहा था हम बदलते समय के अनुसार खुद को ढालने के लिए स्वतंत्र हैं।”

सीआईसी कांग्रेस ने संघ को ‘हिंदू आतंकवादी संगठन’ घोषित करने की भरपूर साजिश की। हेट प्रीचर जाकिर नायक को शांति का मसीहा बताने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने तो मुंबई हमलों पर एक किताब का विमोचन तक किया जिसका नाम था – ‘मुंबई हमले, आरएसएस की साजिश’। लेकिन भागवत ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के योगदान की प्रशंसा की और कहा कि इस पार्टी में भी अनेक ऐसे महानुभाव हुए जिनसे हम अब भी प्रेरणा लेते हैं। ध्यान रहे, उन्होंने सोनिया और राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर तो कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन ये अवश्य कहा, “हम लोग तो सर्वलोक युक्त भारत वाले लोग हैं, मुक्त वाले नहीं हैं”।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे समय तक संघ के बारे में ये छवि बनाने की कोशिश की कि संघ में तानाशाही चलती है और वो भारत के झंडे और संविधान को नहीं मानता। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया, “संविधान में सभी भारतीयों की सहमति है। इसका पालन करना हम सबका कर्तव्य है….मैंने जो कुछ भी कहा है वो संविधान के अनुसार ही कहा है। संघ संविधान की प्रधानता स्वीकार करता है और हम इसका पूरी तरह सम्मान करते हैं”।

यूपीए के जमाने में कहने को तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन असली राज तो 10 जनपथ से चलता था। सब मनमोहन सरकार को ‘रिमोट कंट्रोल’ सरकार कहते थे। इसके जवाब में सीआईसी कांग्रेस ने भ्रम फैलाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार का रिमोट कंट्रोल नागपुर स्थित संघ के कार्यालय में है। भागवत ने इसे सरासर गलत बताया, ”अक्सर लोग कयास लगाते हैं कि मोदी सरकार के किसी निर्णय के लिए संघ मुख्यालय से फोन आया होगा, ये निराधार है। सरकार में जो लोग काम कर रहे हैं, वो वरिष्ठ हैं और राजनीति में उनका अनुभव हमसे भी कहीं अधिक है। भाजपा न तो किसी सलाह के लिए हम पर निर्भर रहती है और न ही हम सलाह देते हैं। अगर उन्हें कोई सुझाव चाहिए होता है और हमारे पास देने के लिए कुछ होता है तो हम देते हैं“।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे अर्से तक संघ को ‘ब्राह्मणवादी’, ‘मनुवादी’ कह कर एक खास वर्ग से बांधने की कोशिश की और ये प्रचार किया कि संघ आरक्षण विरोधी है। संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि, “हम किसी की जाति नहीं पूछते। हम विषमता में विश्वास नहीं रखते। हम चाहते हैं कि जाति विभेद पूरी तरह समाप्त हो, लेकिन ये लंबी यात्रा है। हम अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं हैं। अगर देश में सर्वे करवाया जाए तो संघ के स्वयंसेवकों में अंतरजातीय विवाह के उदाहरण सबसे ज्यादा मिलेंगे”। उन्होंने बिना लागलपेट के कहा, “संघ सामाजिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। संविधान सम्मत सभी तरह के आरक्षण का संघ समर्थन करता है। हमारे संविधान में सामाजिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ये जारी रहना चाहिए, ऐसा संघ का विचार है। समस्या आरक्षण से नहीं, इसपर होने वाली राजनीति से है। सवाल ये है कि समाज में बराबरी कैसे आएगी? तो जो ऊपर हैं, वो थोड़ा नीचे झुकेंगे और जो नीचे हैं वे एड़ियां ऊंची करेंगे तब ही बराबरी आएगी। समाज के कुछ वर्गों को निर्बल हमने बनाया है। निर्बल रहे समाज के वर्गों को ऊपर लाने के लिए हमें सौ-डेढ़ सौ साल परेशानी आती है तो भी उसे हमें स्वीकार करना होगा”।

गाय के नाम पर देश के कुछ हिस्सों में हिंसक घटनाएं हुईं। सीआईसी पार्टियों ने आंख मूंद कर इसके लिए संघ और उसके सहयोगी संगठनों को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि वो अब तक एक भी घटना में संघ का हाथ नहीं साबित कर पाए। इस विषय पर उन्होंने कहा, “गाय के नाम पर हत्या करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। गाय या किसी भी विषय पर हिंसा करना अनुचित है। कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चहिए”।

सीआईसी पार्टियां अक्सर संघ को दकियानूस बताकर उसे महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करती रहीं हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल तो इस विषय में बिना जाने-समझे कुछ भी बोलते रहे हैं। भागवत ने महिलाओं के लिए बराबरी के दर्जे की वकालत की। उन्होंने कहा कि हम महिलाओं को जगदंबा स्वरूप मान कर पूजा तो करते हैं परंतु वास्तव में उनकी हालत बहुत खराब है। हमें उनकी स्वतंत्रता और सशक्तीकरण के लिए काम करने की आवश्यकता है और इसकी शुरूआत घर से ही करनी होगी।

स्पष्ट है संघ प्रमुख ने देश-समाज से जुड़े हर महत्वपूर्ण विषय पर विचार रखे। लेकिन उनके विचारों के मूल में एक ही सूत्र था – देश प्रथम, वस्तुस्थित का ईमानादारी से संज्ञान लेना और देश के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करना। संभवतः यही कारण था कि उन्होंने कश्मीर में अलगाववाद और इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाले अनुच्छेद 35 ए और 370 का निःसंकोच विरोध किया। कुल मिलाकर भागवत ने स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि संघ का उद्देश्य भारतीय नागरिकों का नैतिक और चारित्रिक विकास है ताकि व्यवस्थागत कमियों के बावजूद वो अपने कंधों पर देश को नई ऊंचाई तक ले जा सकें। संघ समाज में एकता, नैतिकता और शुचिता का पक्षधर है, इसलिए वो संगठन में भी इसका पूरा ध्यान रखता है।

आज चार करोड़ से भी अधिक लोग दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े हैं। रोज इसकी 60,000 से अधिक शाखाएं लगती हैं। संघ से प्रेरित तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं देश भर में 1,70,000 से ज्यादा समाजकल्याण की परियोजनाएं चला रही हैं जिनका सबसे अधिक लाभ दलित-आदिवासी वर्ग को होता है। संघ के अमूल्य और अतुलनीय सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान के बावजूद सीआईसी पार्टियों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण इसे सिर्फ कट्टरवादी हिंदू संगठन के रूप में पेश किया। लेकिन भागवत ने इसकी परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्मांधता के खिलाफ सचेत किया, “विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले डेढ़ से दो हजार साल में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम पर बहुत अधर्म हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। सबसे पहले हिंदू को सच्चा और अच्छा हिंदू बनना पड़ेगा“।

कहना न होगा भागवत ने ये साबित कर दिया कि अगर भारत में सच्चे अर्थों में कोई प्रगतिशील, उदारवादी, सुधारवादी, समावेशी, आधुनिक, राष्ट्रवादी संगठन है तो वो है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

“हिंदू विरोधी वोट बैंक और संघ का अंधा विरोध” in Punjab Kesari

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘भविष्य का भारत’ विषय पर तीन दिवसीय चर्चा का आयोजन कर रहा है। इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वयं इस बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। संघ ने इसमें हर क्षेत्र और वर्ग के लोगों को न्यौता दिया। बुलावे पर अनेक कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों का रवैया खेदजनक रहा। चर्चा में आना या न आना उनका विशेषाधिकार था, लेकिन उन्होंने संघ के प्रति जो अपमानजनक टिप्पणियां कीं वो लोकतंत्र और सहिष्णुता की भारतीय परंपराओं के सर्वदा विरूद्ध थीं।

इन टिप्पणियों से कुछ बातें तो स्पष्ट हुईं। एक तो ये कि अपमानजनक टिप्पणी करने वाले लोगोें को संघ की वास्तविकता और दर्शन का कोई ज्ञान नहीं है। दूसरी ये कि इन्होंने संघ को हिंदुओं का एक प्रतीक बना दिया है। जो भी हिंदुओं से नफरत करता हो या उनसे नफरत करने वालों का समर्थन चाहता हो, वो संघ का अपमान करे और अपनी भड़ास निकाल दे। संघ को गाली देना, उसके खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ का सर्वदा उचित विरोध है।

संघ के न्यौते पर किसने क्या कहा, ये दोहराना उचित नहीं होगा, लेकिन संघ की विचारधारा के कुछ मूल तत्वों पर चर्चा की जाए, उससे पहले ये स्पष्ट करना जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र में संघ को अपने विचार रखने और उन्हें प्रचारित, प्रसारित करने का उतना ही हक है जितना सीआईसी पार्टियों को है। अगर सीआईसी पार्टियां राष्ट्रविरोधी, सुरक्षा बलों के हत्यारे नक्सलियों, कश्मीरी और पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकवादियों का समर्थन ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ मान सकती हैं तो संघ को भी अपनी अखंड भारत की परिकल्पना मानने और उसे साकार करने के लिए प्रयास करने का पूरा हक है। ध्यान रहे, इसके लिए संघ न तो किसी हिंसक गतिविधि को बढ़ावा दे रहा है और न ही समाज के विघटन की बात कर रहा है।

सीआईसी पार्टियां आंख मूंद कर संघ पर आरोप लगाती रही हैं कि संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है और अल्पसंख्यकों (हास्यास्पद है लेकिन 20 करोड़ मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहा जाता है) के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सीआईसी पार्टियां ये नहीं बतातीं कि ‘हिंदू’ से संघ का क्या अभिप्राय है? जो बात इन विघटनकारी इस्लामिक सांप्रदायिक दलों को नहीं पता, उसे हम स्पष्ट कर देते हैं। संघ के लिए ‘हिंदू’ एक व्यापक और समावेशी शब्द है। संघ के लिए हर वो व्यक्ति ‘हिंदू’ है जो भारत को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है।

सीआईसी पार्टियां मुसलमानों को डराती हैं कि संघ हिंदुओं को संगठित कर रहा है और जब ये मजबूत हो जाएगा तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ये सही है कि संघ हिंदुओं को संगठित करना चाहता है, लेकिन इसका उद्देश्य किसी धर्म, जाति, समुदाय के लोगों को आक्रांत करना या उनके अधिकार छीनना नहीं है। संगठन क्या है इसे स्पष्ट करते हुए संघ संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार कहते हैं – “किसी भी राष्ट्र की सामथ्र्य उसके संगठन के आधार पर निर्मित होती है। बिखरा हुआ समाज तो एक जमघट मात्र है। ‘जमघट’ और ‘संगठन’ दोनों शब्द समूहवाचक हैं, फिर भी दोनों का अर्थ भिन्न है। जमावड़े में अलग-अलग वृŸिा के और परस्पर कुछ भी संबंध न रखने वाले लोग होते हैं, किंतु संगठन में अनुशासन, अपनत्व और समाज-हित के संबंध सूत्र होते हैं जिनमें अत्यधिक स्नेहाकर्षण होता है। यह सीधा-सरल तत्व ध्यान में रखकर समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए संघ ने जन्म लिया है….संघ का ध्येय अपने धर्म, अपने समाज और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हिंदुओं का सक्षम संगठन करना है। इससे हमारा खोया आत्मविश्वास पुनः जाग्रत होगा और उसकी सामथ्र्य के सामने आक्रामकों की उद्दंड प्रकृति ढीली पड़ेगी तथा वे हमारे ऊपर आक्रमण करने की फिर सोच भी नहीं पाएंगे।”

विघटित समाज का क्या हश्र होता है वो हम 1947 में देख चुके हैं, जब माउंटबेटन ने कांग्रेस (जवाहरलाल नेहरू) और मुस्लिम लीग (मौहम्मद अली जिन्ना) के साथ मिलकर भारत का बंटवारा करवा दिया जिसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे खूनी दौर देखा जिसमें बीस लाख से ज्यादा लोग मारे गए और करोड़ों बेघर हुए। वैसे भी जब भारत का विघटन चाहने वाली शक्तियां खुद को संगठित कर और भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग कर अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए षडयंत्र कर सकती हैं तो भारत की अखंडता और एकता के पक्षधर हिंदुओं को एक करने में क्या बुराई है?

सीआईसी पार्टियांे बार-बार संघ के खिलाफ ये दुष्प्रचार करती हैं कि उसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया। आजादी के बाद बेशर्मी से भारतीयों की लाशों को रौंद कर सŸाा पर काबिज होने वाली कांग्रेस ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को कम्युनिस्टों के साथ मिलकर इस तरह लिखवाया जैसे उसके अलावा किसी और ने आजादी की लड़ाई मंे हिस्सा ही नहीं लिया। महात्मा गांधी ने निःसंदेह भारतीयों का जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन नेहरू तो अंग्रेजों के पिट्ठू ही रहे। वो जेल भी गए तो उन्हें वहां भरपूर सुविधाएं दी गईं। आपको बता दें कि संघ के संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वो कांग्रेस में भी रहे और उन्होंने क्रांतिकारियों का साथ भी दिया। वो कांग्रेस से अलग हो गए क्योंकि कांग्रेस का लक्ष्य भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता था वहीं उनका उद्देश्य ‘अखंड भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता’ था। 1925 में संघ की स्थापना के बाद भी हेडगेवार कांग्रेस नेतृत्व द्वारा संचालित आंदोलनों और सत्याग्रहों में भाग लेते रहे।

संघ की शाखाओं में तैयार होने वाले देशभक्त युवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। उनके सहयोगी नेताओं के लेखों एवं सरकारी दस्तावेजों से ये साबित होता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में लाखों स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर अग्रणी भूमिका निभाई थी। यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि इन स्वयंसेवकों ने अपने आदर्श ध्येय वाक्य ‘नहीं चाहिए पद, यश, गरिमा, सभी चढ़े मां के चरणों में’ के अनुसार अपनी संस्थागत पहचान से ऊपर उठकर सत्याग्रहों में भाग लिया और जेलों में अनेक प्रकार की यातनाएं एवं कष्ट सहन करते हुए अपनी राष्ट्रभक्ति का अतुलनीय परिचय दिया। पूर्व राष्ट्रपति और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को हेडगेवार के योगदान की पूरी जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने संघ के मुख्यालय में उन्हें ‘भारत मां का महान सपूत’ बताया था। सीआईसी पार्टियों के जो लोग आज संघ को अपशब्द कह रहे हैं उन्हें याद दिला दें कि महात्मा गांधी, डाॅक्टर भीमराव अंबेदकर, जमनालाल बजाज, डाॅक्टर जाकिर हुसैन, जयप्रकाश नारायण, जनरल करियप्पा आदि संघ के कार्यक्रमों में आ चुके हैं। 1963 में स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी के अवसर पर कन्याकुमारी में ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ निर्माण के समय भी संघ को सभी राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिला। इसके निर्माण के समर्थन में विभिन्न राजनीतिक दलों के 300 सांसदों के हस्ताक्षर एकनाथ रानाडे ने प्राप्त किए थे।

पूर्व संघ प्रचारक एवं ‘युगप्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डाॅक्टर हेडगेवार का अंतिम लक्ष्य – भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक के लेखक नरेंद्र सहगल अपनी पुस्तक में लिखते हैं – ”आज भी संघ के विरोधी संघ पर कई प्रकार के आरोप लगाते हैं। संघ एक सांप्रदायिक सैनिक संगठन है। संघी संकीर्ण विचार के लोग हैं। मुस्लिम विरोधी हैं। दंगे करवाते हैं……संघ के विरोधी यदि संघ की वैचारिक चट्टान के साथ टकराकर अपना सिर फोड़ने की जगह संघ में आकर इसे समझने का थोड़ा भी प्रयास करें, तो वोे भी इस चट्टान का हिस्सा बन सकते हैं। अन्यथा संघ तो एक निश्चित गति से अपना काम कर ही रहा है। लोग ये भी कहते हैं कि संघ ने अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। सच्चाई यह है कि संघ के दरवाजे हैं ही नहीं, बंद क्या करें। उन्होंने ही अपने दरवाजे हमारे लिए बंद कर दिए हैं।“

नरेंद्र सहगल का विश्लेषण कितना सही है, ये मोहन भागवत के विज्ञान भवन के कार्यक्रम को लेकर खड़े किए गए मिथ्या विवाद से स्पष्ट हो जाता है। शास्त्रार्थ और विचार-विमर्श की महान भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए संघ ने विरोधी मतावलंबियों को भी निमंत्रण दिया, लेकिन उन्होंने न केवल अपने दरवाजे बंद किए, बल्कि असभ्य और असंसदीय व्यवहार भी किया। बहरहाल दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सिद्धांतों पर कायम है और लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा अनवरत जारी है। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, विद्या भारती, स्वदेशी जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय किसान संघ, आरोग्य भारती, भारत विकास परिषद, संस्कार भारती आदि जैसे अनेकानेक संगठनों के साथ वो मां भारती के सेवा में दिन-रात जुटा है। संघ से प्रेरित संगठनांे द्वारा इस समय देश में एक लाख साठ हजार से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं जिनसे लाभान्वित होने वाले अधिकांश लोग दलित वर्ग से संबंध रखते हैं।

“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

“नक्सलवादः आग से खेल रहे हैं राहुल गांधी” in Punjab Kesari

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नयर ने अपनी जीवनी ‘बियोंड द लाइंस’ में विस्तार से बताया है कि कैसे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में अकाली दल – जनता दल सरकार को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया। वो लिखते हैंः

“राजनीतिक सरजमीं पर भिंडरावाले का उदय 1977 में हुआ जब अकाली दल – जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा कर पंजाब में सरकार बनाई। जैल सिंह, हारने वाले मुख्यमंत्री जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने, सबसे ज्यादा नाखुश थे। एक तो उनकी सरकार चली गई थी और दूसरे गुरदयाल सिंह ढिल्लों कमीशन ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अधिकारों के दुरूपयोग का दोषी पाया था। ये कमीशन मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कामकाज की समीक्षा के लिए बनाया गया था।

संजय गांधी, जो अपने एक्स्ट्रा-काॅंस्टीट्यूशनल तौर-तरीकों के लिए जाने जाते थे, ने सुझाव दिया कि अकाली सरकार को चुनौती देने के लिए किसी ‘संत’ को आगे बढ़ाया जाए। संजय और जैल सिंह, खासतौर से जैल सिंह को अच्छी तरह से पता था कि कैसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने अकालियों से लोहा लिया था और कैसे उन्होंने सख्त स्वभाव अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को पटखनी देने के लिए संत फतेह सिंह को खड़ा किया था।”

कांग्रेस के भिंडरावाले को आगे बढ़ाने के फैसले ने आगे चल कर क्या गुल खिलाया, कैसे पंजाब ही नहीं पूरे उत्तरा भारत में खालिस्तानी आतंक का नंगा नाच हुआ, कैसे आॅपरेशन ब्लू स्टार हुआ, कैसे इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद कैसे और किसके द्वारा हजारों सिखों का नरसंहार हुआ, ये एक लंबी और दुखद कहानी है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस के वर्तनाम नेतृत्व ने इस से कोई सबक सिखा है?

अस्सी के दशक में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती श्री लंका में की। दक्षिण में एक के बाद एक चुनाव हार रही इंदिरा गांधी को लगा कि अगर वो श्री लंका में अपनी उपेक्षा के कारण आंदोलित तमिलों की मदद करेंगी तो उन्हें तमिलनाडु में तमिलों के वोट मिलेंगे। कांग्रेस को खोया हुआ जनाधार वापस मिल सकेगा। अगर लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल इलम (एलटीटीई) के पूर्व प्रमुख कुमारन पथमंथन उर्फ केपी की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने एलटीटीई की मदद की। बाद में जब एलटीटीई हाथ से निकलता दिखाई दिया तो कांग्रेस ने इससे हाथ खींच लिए। यही नहीं राजीव गांधी ने तमिल आतंकियों से लड़ने के लिए ‘पीस कीपिंग फोर्स’ भी भेजी। इसका नतीजा क्या रहा? एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।

सवाल ये है कि क्या खालिस्तानियों और तमिल आतंकियों को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने कोई सबक सीखा?

अब कश्मीर को लें। वर्ष 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। भारतीय फौज पाकिस्तानियों का मुकाबला कर ही रही थी कि जवाहर लाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। उन्होंने अपनी हरकतों से भारत को जो नासूर दिया, वो सबके सामने है। बाकी की रही सही कसर राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने 1987 में पूरी कर दी जब वहां विधान सभा चुनावों को फर्जी ठहरा कर अलगाववादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद पाक समर्थित आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर राज्य से भगाया गया और फिर विदेशी ताकतों के इशारे पर हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया। कांग्रेस, अलगाववादियों और आतंकियों के इस पूरे नंगे नाच को खामोश समर्थन देती रही। इसका क्या परिणाम निकला, वो बताने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सवाल फिर वही – क्या कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने इस प्रकरण से भी कोई सबक सीखा?

चाहे मसला कश्मीर का हो या खालिस्तान का या श्री लंका के तमिल आतंकियों का, स्पष्ट है कि वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और अपने पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। वैसे सवाल ये है कि इन घातक गलतियों का सबक क्या है? सबक बड़ा सादा है – अगर कोई राजनीतिक दल आतंकियों को बढ़ावा देता है तो कल को वहीं आतंकी उस पर भी हमला कर सकते हैं।

लेकिन हम आखिर ऐसा कह क्यों रहे हैं कि राहुल ने पार्टी और पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा? इसका कारण है उनका देशद्रोही नक्सलियों को खुले आम और पूर्ण समर्थन। आश्चर्य की बात तो ये है कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नक्सलवादी आतंकी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इस्लामिक आतंकियों से भी बड़ा। मनमोहन सरकार ने तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में ये भी कहा था कि अर्बन नक्सल और उनके समर्थक, जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना – पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई वैध सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं और लोगों को उसके खिलाफ भड़काते हैं।

आज हम इस बात को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जैसे अर्बन नक्सल और उनके कांग्रेसी और अन्य समर्थक एक स्वर से मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं, वो किसी से छुपा नहीं है। ये दावा करते हैं कि देश में आपातकाल है और मतभिन्नता को दबाया और कुचला जा रहा है। कोई इनसे सिर्फ एक आसान सा सवाल पूछे – अगर तुम्हें दबाया जा रहा होता तो तुम संवादादाता सम्मेलन कैसे कर पाते? तुम जो मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में झूठा प्रचार कर रहे हो, वो कैसे कर पाते? वैसे भी ये जिन अर्बन नक्सलियों को ‘बुद्धिजीवी’, ‘लेखक’, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ आदि बता रहे हैं, उनके खिलाफ पुलिस के पास पूरे सबूत हैं कि कैसे ये देश की सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रच रहे थे, कैसे इन सबका प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति से सीधा राब्ता था और ये कैसे उसके आदेशों पर न केवल अराजकता फैला रहे थे, बल्कि उसके लिए धन, हथियार आदि की व्यवस्था भी कर रहे थे। सीधी सी बात है अर्बन नक्सलियों को जंगल में बैठे उनके आकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। ये पाप में बराबरी के भागीदार हैं।

लेकिन राहुल गांधी को जैसे ये सब दिख ही नहीं रहा या वो इसे देखना ही नहीं चाहते। जैसा कि इतिहास गवाह है, आतंक और हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले नक्सलियों से सांठगांठ राहुल को उलटी भी पड़ सकती है। राहुल सोच रहे होंगे कि मैं चाणक्य की तरह मोदी के खिलाफ नक्सलियों का इस्तेमाल कर रहा हूं और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों और नक्सलियों का मोर्चा बना रहा हूं जिसमें जब दूसरे विपक्षी दल भी शामिल होंगे तो मेरी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। नक्सली दलितों को मोदी के खिलाफ भड़काएंगे, देश में व्यापक हिंसा करेंगे और मैं इस अराजकता के बीच कहूंगा कि मोदी देश नहीं संभाल सकते, अब बस मैं ही एक विकल्प हूं। राहुल गांधी के चीन से बढ़ते प्रेम के बीच लोग अब ये भी पूछने लगे हैं कि क्या राहुल, नक्सलियों और चीन के बीच कोई संबंध है? क्या चीन राहुल को भारत में प्रमोट कर रहा है और इसके लिए नक्सलियों का प्रयोग किया जा रहा है?

खेल चाहे जो हो। इसमें नक्सलियों का ज्यादा फायदा है। वो सोच रहे होंगे कि हम महत्वाकांक्षी राहुल गांधी के कंधों पर सवार होकर देश के कोने-कोने में फैल जाएंगे और जब हमारा काम निकल जाएगा तो उसका सफाया कर देंगे। नक्सलियों की प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) को देश की सबसे पुरानी पार्टी खुलेआम समर्थन दे, उससे बेहतर उसके लिए क्या हो सकता है? फिर कांग्रेस तो उन्हें सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ ही नहीं, पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। ये बात हमने भीमा कोरेगांव मामले में छह जून को दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सल रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिले पत्रों में भी देखी थी जिसमें एक काॅमरेड दूसरे काॅमरेड को कह रहा है कि अगर हम दलितों को आंदोलित करें तो कांग्रेस हमें पैसा और कानूनी सहायता देगी। जब 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सलियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सबने देखा कि कांग्रेस के वकीलों की पूरी फौज उनकी पैरवी में उतर पड़ी। इनमें अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, दुष्यंत दवे आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कांग्रेस के अनेक वकील जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में नक्सलियों के मुकदमें लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही नक्सलियों से सांठगांठ है? 28 अगस्त को अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद हमने देखा सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सदस्य रहे हर्ष मंदार और अरूणा राॅय जैसे लोग खुल कर अर्बन नक्सलियों के समर्थन में सामने आ गए। अर्बन नक्सलियों ने 30 अगस्त को दिल्ली में जो प्रेस काॅफ्रेंस की उसमें अरूणा राय शामिल हुई और इसमें बाकायदा कांग्रेसी वकीलों को धन्यवाद भी दिया गया। यूपीए के जमाने में हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करने वाली अरूंधति राॅय भी इसमें शामिल हुईं। दिलचस्प बात तो ये है कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल में उसकी तस्वीर भी इस्तेमाल की जैसे वो उसकी अलगाववादी घटिया सोच को मान्यता दे रही हो। इसमें राहुल गांधी के करीबी अर्बन नक्सल जिग्नेश मेवानी भी शामिल हुए। कुल मिलाकर अर्बन नक्सलियों के इस संवाददाता सम्मेलन में परोक्ष में कांग्रेस ही छायी रही।

नक्सलियों को कांग्रेस का समर्थन किस हद तक है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया की जांच करनी चाहिए। यहां सारे कांग्रेसी पत्रकार, वकील, तीस्ता सीतलवाड़ और जाॅन दयाल जैसे फर्जी मानवाधिकार कार्यकर्ता पूरा दम लगाकर प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के अर्बन नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं।

जिन अर्बन नक्सलियों के लिए राहुल गांधी, उनकी पार्टी और चेले इतने व्यथित हो रहे हैं, असल में यूपीए के कार्यकाल में खुद उनकी पार्टी ने उन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था जिनके ये सदस्य हैं। असल में दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। भीमा कोरेगांव केस में छह जून और 28 अगस्त को जो दस अर्बन नक्सल पकड़े गए हैं, उनमें से सात तो इन्हीं संस्थाओं में काम करते हैं। ये हैं – वरवर राव, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, अरूण फरेरा, वर्नन गोेंजालविस और महेश राउत। इनमें से ज्यादातर पर पहले ही मुकदमे दर्ज हैं और कई तो सजा भी काट चुके हैं। इनके देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी षडयंत्रों, दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय हथियार सप्लायरस से संपर्क हैं। भारतीय सेना के प्रति इनकी नफरत जगजाहिर है।

“भारत से रिश्तों की कीमत चुकानी होगी इमरान को” in Punjab Kesari

इमरान खान ने अभी प्रधानमंत्री पद की शपथ भी नहीं ली थी कि भारत में उनकी विदेश नीति के बारे में कयास लगने शुरू हो गए थे। चुनावी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी का यार और गद्दार तथा मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताने वाले इमरान ने चुनाव जीतने के बाद अपने पहले ही संबोधन में भारत के साथ व्यापार की इच्छा जता दी। ऐसा उन्होंने शायद इसलिए किया कि दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को अपना वजूद बनाए रखने के लिए भारत से व्यापार करना बेहद जरूरी है।

इसपर पाकिस्तान में बवाल मच गया है। नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज ने सवाल उठाया है कि जब नवाज भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों की बात की तो उन्हें कौम का गद्दार करार दे दिया गया, आज अगर वही बात इमरान कह रहे हैं तो वो देशभक्त कैसे हो गए? आपको याद दिला दें कि नवाज पाकिस्तानी सेना की राय के खिलाफ मोदी के शपथग्रहण समारोह में आए थे। ये सेना को बहुत नागवार गुजरा था। इसके बाद मोदी जब उनके जन्मदिन पर अचानक उनके घर पहुंच गए तो उसके बाद तो उनके खिलाफ सेना के मीडिया नेटवर्क ने धुंआधार दुष्प्रचार ही शुरू कर दिया। उन्हें मोदी का यार और देश का गद्दार साबित करने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि बहुत से पूर्व जनरल टीवी बहसों में अब खुलेआम ये मानने लगे हैं कि ये निहित स्वार्थों द्वारा चलाया गया प्रायोजित दुष्प्रचार था जिसमें कोई तथ्य नहीं था।

बहरहाल ये बात ध्यान में रखनी होगी कि पाकिस्तान की भारत नीति का निर्धारण इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय में नहीं, रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय में होता है। भारत में हम भले ही इमरान खान को लेकर कितनी ही चर्चा करें, लेकिन असलियत यही है कि जब तक पाकिस्तानी सेना नहीं चाहेगी, पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ इस संबंध में भारत की भी शर्तें होंगी ही। देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देगा या अफगानिस्तान तक सड़क मार्ग उपलब्ध करवाएगा?

वैसे तो पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कई बार भारत के साथ बेहतर संबंधों की इच्छा जता चुके हैं और जब वो इमरान खान के शपथग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू से मिले तो उन्होंने एक बार फिर रिश्तों में बेहतरी की इच्छा जताई। लेकिन मोदी सरकार के लिए बाजवा की ‘इच्छा’ का कोई मतलब नहीं है। सरकार तो यह जानना चाहती है कि बाजवा की सेना ने भारत के खिलाफ जो मोर्चे खोले हुए हैं, उनमें जमीनी स्तर पर कितनों को बंद किया गया है, या कटौती की गई है।

सिद्धू, बाजवा की बातों से इतने भावविभोर हो गए कि उनके गले लग गए। लेकिन क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि वो उसी पंजाब में खालिस्तान और आतंकवाद की आग क्यों भड़का रहे हैं, जिसमें वो मंत्री हैं? क्या सिद्धू को बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने पाकी सेना को कश्मीर में रिहायशी ठिकानों पर हमला करने और निर्दोष नागरिकोें को मारने का आदेश क्यों दिया? जब बाजवा चिकनी चुपड़ी-बाते कर रहे थे तब क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि उनकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने पूरे भारत में जो जाल बिछा रखा है और वो जिस तरह यहां अलगाववाद की आग भड़का रही है, उसे कब बंद किया जाएगा?

सिद्धू को लगा कि करतारपुर लंगा खोलने की बात कह कर बाजवा ने सिखों पर बड़ा उपकार कर दिया। क्या उन्हें पलट कर बाजवा से ये नहीं पूछना चाहिए था कि पाकिस्तानी गुरूद्वारों के दर्शन के लिए जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को आईएसआई के गुर्गे कब खालिस्तान के लिए भड़काना बंद करेंगे? कब बाजवा ‘रेफरेंडम 2020’ का राग बंद करेंगे और कब कनाडा, इंग्लैंड आदि में सिखों के गुरूद्वारों में दुष्प्रचार बंद करेंगे? हम एक बार को मान भी लें कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए बड़ा मुद्दा है, लेकिन खालिस्तान का क्या? नक्सलियों, इस्लामिक अलगाववादी संस्थाओं को दी जा रही सहायता का क्या?

इमरान के प्रति सिद्धू का लगाव और भारत में सिद्धू का विरोध होने पर इमरान का उनके बचाव में सामने आना समझा जा सकता है, लेकिन सवाल सिर्फ उनकी सदाशयता और नेकनीयति का नहीं है। इमरान को समझना होगा कि सिद्धू का विरोध करने वाले पाकिस्तान से दोस्ती के विरोधी नहीं हैं। वो दोस्ती के नाम पर भावविभोर हो अंधे हो जाने के खिलाफ हैं, क्योंकि असली सवाल तो पाकिस्तानी सेना के रवैये में बदलाव का है जो भारत को अपना दुश्मन नंबर एक समझती है और जिसका लक्ष्य है – ‘गजवा ए हिंद’ यानी हिंदुस्तान पर जीत। बेनजीर भुट्टो ने एक बार हिम्मत करके कहा था कि वो कश्मीर को भारत-पाक रिश्तों के बीच नहीं आने देंगी, लेकिन उनका क्या हश्र हुआ? उन्हें मरवा दिया गया। जब उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार थी, तब भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने पर फैसला भी हो गया था, लेकिन वो कौन लोग थे जिन्होंने अंतिम क्षण में इसे रूकवा दिया? नवाज शरीफ ने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर समझौता किया ताकि आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सके, उसका भी क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। नवाज ने तो पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत में आतंकी भेजने पर भी सवाल उठाया, लेकिन सब जानते हैं, उन्हें गद्दार करार दिया गया।

इमरान ने अभी तक सेना की किसी भी नीति के खिलाफ चूं तक नहीं की है। उन्होंने तोे कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को सरेआम ‘आजादी की लड़ाई’ करार दिया है। मतलब साफ है, पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी भेजता रहेगा। इमरान खान की दूसरी बड़ी परेशानी ये है कि सेना के पूरे समर्थन के बावजूद उन्हें अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। उन्हें दूसरी छोटी पार्टियों की मदद लेनी पड़ी है। ऐसे में वो चाहंे भी तो भारत-पाक संबंधों पर नवाज शरीफ जैसे खुल कर कोई राय नहीं जाहिर कर सकते। वैसे भी उनसे ये उम्मीद करना बेमानी है कि वो सेना की कभी मुखालफत करेंगे क्योंकि उनकी पूरी पृष्ठभूमि ही सेना की है। उनका संबंध उस जनरल नियाजी से है जिसने बांग्लादेश में समर्पण किया था। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, सूचना मंत्री फवाद चैधरी, पेट्रोलियम मंत्री गुलाम सरवर खान जनरल परवेज मुशरर्फ के जमाने में मंत्री रह चुके हैं। उनके वित्त मंत्री असद उमर के पिता सेना के सेवानिवृत्त अफसर हैं। इमरान की कैबिनेट में मुशरर्फ के जमाने के इतने मंत्री हैं कि लोग पूछने लगे हैं कि जब ये लोग मुशरर्फ को कामयाब नहीं कर सके तो उन्हें क्या करेंगे।

मुंबई में हमलों के समय इमरान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी मुंबई में ही थे। उन्हें पाकिस्तानी सेना की हरकतें, देश की आर्थिक स्थिति, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंध, अमेरिकी दबाव, भारत के अलावा दूसरे पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और ईरान के साथ तल्ख संबंध, चीन की पैंतरेबाजी, सबका अहसास है। उन्हें पता है कि भले ही इमरान, मोदी जैसे विदेशी ताकतों से बराबरी के आधार पर संबंधों की बात करें, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के हालात ऐसे नहीं हैं कि दुनिया की ताकते उन्हें वो इज्जत बख्शें जिसकी वो ख्वाहिश कर रहे हैं। वो इमरान को प्रधानमंत्री मोदी के पत्र का हवाला देते हुए भारत के साथ ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ की बात करते हैं। वो कहते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सामने बातचीत के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बार तो उन्होंने ‘कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट’ का गलत अर्थ निकाल लिया था और एलान कर दिया था कि भारत ने बातचीत का न्यौता भेजा है। लेकिन जल्द ही भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इसका मतलब ‘काॅम्प्रिहेंसिव डायलाॅग’ नहीं। वो नई सरकार की नीतियों और जमीन पर हालात का गंभीरता से जायजा ले रहा है और उसके बाद ही इस संबंध में कोई फैसला हो सकता है। हां, भारत, पाकिस्तान से संबंध पूरी तरह तोड़ेगा नहीं, दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री सर्विसेस, सुरक्षा सलाहकार आदि बातचीत करते रहेंगे, लेकिन भारत पाकिस्तानी घुसपैठ का जवाब पहले जैसे देता रहेगा।

कुरैशी से जब ये पूछा गया कि क्या वो सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भेंट करेंगे तो वो इसका उत्तर टाल गए। जाहिर है, अभी ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है, बाद में होगा, तो देखा जाएगा। छह सितंबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मेटिस भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रियों के साथ 2+2 वार्ता करेंगे। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्लामाबाद जाने का भी कार्यक्रम है। देखना दिलचस्प होगा कि वो इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा से क्या बात करते हैं। कुरैशी अमेरिका के साथ ‘गलतफहमियों’ को बराबरी की सतह पर बात कर दूर करना चाहते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख रह चुके पाॅम्पिओ को इमरान और बाजवा कितना आश्वस्त कर पाते हैं, इस पर सबकी निगाह रहेगी। पर पाॅम्पिओ और इमरान की टेलीफोन पर हुई बातचीत में आतंकवाद पर चर्चा को लेकर जो झड़प हुई है और जैसे अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से अफगानिस्तान में आतंकवाद को लेकर तकाजे कर रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अमेरिका इमरान को मनमांगी मुराद नहीं देगा।

कुल मिलाकर अभी जो हालात हैं, उनमें कहा जा सकता है कि जब तक पाकी सेना भारत के खिलाफ चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती, भारत को इमरान से बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, भले ही वो इसके लिए कितना ही जोर दे। इमरान को समझना होगा कि अब भारत में मोदी सरकार है, मनमोहन सरकार नहीं जिसके राज में आतंक और झप्पियां एक साथ चला करते थे। उन्हें अगर भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने हैं तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी।

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

“मोदी के नेतृत्व में नई उंचाइयों पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध” in Punjab Kesari

कुछ विपक्षी दलों ने बिना जाने-समझे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। मुसलमान वोटों की सांप्रदायिक राजनीति करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झप्पी को लेकर अपमानजनक ट्वीट तक कर डाले। लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी इस पार्टी से ऐसे बचकाने बर्ताव की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन आजकल ये पार्टी जिन हाथों में है और जैसे लोग इसका सोशल मीडिया विभाग संभाल रहे हैं, उनसे किसी परिपक्वता की आशा करना भी बेमानी है।

कांग्रेस भूल गई कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उसने झूठा दुष्प्रचार करके उनकी अमेरिका यात्रा तक पर प्रतिबंध लगवा दिया था। लेकिन इसके बावजूद मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जाॅर्ज बुश और बराक ओबामा के समझौतों का न केवल सम्मान किया बल्कि उन्हें आगे भी बढ़ाया। मोदी ने अपनी अमेरिका नीति में बिना किसी दुराग्रह के सिर्फ एक बात का ध्यान रखा और वो है – भारतीय हित।

पिछले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए उल्लेखनीय सुधार की अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो पता चलेगा कि ये उपलब्धियां एक दिन में हासिल नहीं हुईं। इनके पीछे दोनों देशों में विकसित हुई गहरी समझ है जिसे पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी ने आगे बढ़ाया। दीगर बात ये है कि दोनों देशों में सरकारें बदलीं, लेकिन परस्पर हितों में सहयोग और सामंजस्य की जो समझ विकसित हुई वो अक्षुण्ण रही। बहुमत के साथ सरकार में आए मोदी ने तो इसे नई ऊर्जा और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया। आज हम निसंदेह ये कह सकते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध आज जिस उंचाई पर हैं और जितने मजबूत हैं, वैसे पहले कभी नहीं थे।

जून 7, 2016 को अमेरिका ने भारत के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ (महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी) घोषित किया। इस वक्तव्य का शीर्षक था – द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाः एनड्योरिंग ग्लोबल पार्टनर्स इन द ट्वंटी फस्र्ट सेंचुरी (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारतः 21वीं सदी में स्थायी वैश्विक सहयोगी)। पिछले साल 22 अगस्त को ट्रंप द्वारा घोषित की गई नई दक्षिण एशिया नीति में इसकी प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है। ट्रंप ने इसमें न केवल भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में भारत की महत्वपूण भूमिका को रेखांकित किया बल्कि पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भी उसे अपना सहयोगी घोषित कर दिया। अमेरिका ने मोदी के कार्यकाल में भारत को दुनिया के चार बड़े मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम (बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं) में से तीन में प्रवेश करने की मदद की। ये हैं – मिसाइल टेक्नोलाॅजी कंट्रोल रिजीम (प्रवेश तिथि – जून 27, 2026), वासनर अरेंजमेंट (प्रवेश तिथि – दिसंबर 7, 2017) और आॅस्ट्रेलिया ग्रुप (प्रवेश तिथि – जनवरी 19, 2018)। चैथा महत्वपूर्ण मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम है – न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप। अमेरिका ने इसमें प्रवेश के लिए भी पूरी मदद की लेकिन चीन के अड़ियल रवैये के कारण भारत इसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि इसके लिए भी प्रयास जारी है।

भारत को विश्वस्त सहयोगी मानते हुए अमेरिका ने इसी वर्ष 31 जुलाई को भारत को स्ट्रैटेजिक ट्रेड आॅथोराइजशन -1 (एसटीए – 1) देश का दर्जा दिया। बहुत जल्दी, यानी चार अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इसके पश्चात भारत का दर्जा अमेरिका के नैटो (नाॅर्थ एटलांटिक ट्रीटी आॅर्गनाजेशन) सहयोगियों के समकक्ष हो गया। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले उत्पाद और रक्षा उपकरण बिना कानूनी अड़चनों और भारी-भरकम कागजी कार्यवाही के बेच सकेगा। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर राॅस के अनुसार एसटीए – 1 का दर्जा भारत को रक्षा क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात के लिए बेहतर अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत के दर्जे में यह महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले सात वर्षों में भारत अमेरिका से 9.7 अरब डाॅलर का उच्च तकनीक का सामान खरीद सकता था, लेकिन विभिन्न प्रतिबंधों के कारण यह संभव नहीं हो सका, परंतु अब ये संभव हो सकेगा।

अमेरिका ने जिन 36 देशों को ये दर्जा दिया है उनमें से अधिकतर नैटो सहयोगी हैं। अब तक एशिया में ये दर्जा सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान को ही दिया गया था। जाहिर है भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कदम को स्वागत किया। मंत्रालय ने कहा – “भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किए जाने का ये तार्किक उत्कर्ष है। ये इस बात को एक बार फिर स्थापित करता है कि संबंधित बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के जिम्मेदार सदस्य के रूप में भारत का रिकाॅर्ड बेदाग है। इससे भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस बीच दो अगस्त को अमेरिकी संसद ने नेशनल डिफेंस आॅथोराइजेशन एक्ट – 2019 के तहत भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकास एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काटसा) से छूट देने का विधेयक भी पारित कर दिया। भारत रूस से लगभग 4.5 अरब डाॅलर की लागत से एस-400 ट्राइंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहता है जिसमें रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से बाधा आ रही थी। बराक ओबामा के कार्यकाल में वाइट हाउस में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और सेनेट आम्र्ड सर्विसेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य रहे अनीश गोयल कहते हैं कि काटसा छूट के लिए अमेरिकी संसद की प्रशंसा की जानी चाहिए। ऐसा करके संसद ने दोनों देशों के संबंधों में आने वाले तनाव को दूर कर दिया है। ये इस बात का मजबूत संकेत है कि अमेरिका, भारत से अपने संबंधों को कितना महत्व देता है।

पिछले कुछ ही दिनों में अमेरिका ने जिस सक्रियता से भारत के साथ उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के क्षेत्र में पेश आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है और जैसे भारत की रक्षा जरूरतों को समझते हुए रूस से उच्च तकनीक वाली रक्षा सामग्री खरीदने के लिए छूट दी है, उससे भारत के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता तो प्रकट होती ही है, साथ में यह भी स्पष्ट होता है कि वो भारतीय-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक रीजन) में अपनी रणनीति को लागू करने के विषय में कितना गंभीर है जहां चीन का व्यावसायिक और रणनीतिक दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

चीन अगले 50 वर्षों के दौरान अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहा है। म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों तक ही नहीं चीन ने मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तक में अपने पैर पसारे हैं। वो दुनिया के 76 देशों में परियोजनाएं विकसित कर रहा है और रेल, सड़क, समुद्री मार्गों से ही नहीं दुनिया भर से वायु मार्गों से जुड़ने की योजना भी बना चुका है।

चीन को लगता है कि जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन और 20वीं सदी में अमेरिका की शक्तिशाली नौसेनाओं ने नौसैनिक अड्डों के विश्वव्यापी नेटवर्क के माध्यम से अपने व्यापारिक अधिपत्य को बढ़ाने का काम किया, वैसे ही अगर उसे भी अगली सदी में आगे बढ़ना है तो उसे भी दुनिया भर में, और खासतौर से भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में अपने अड्डे बनाने होंगे जहां विश्व के व्यस्ततम जलमार्ग मौजूद हैं। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वो सिर्फ अड्डे ही नहीं बना रहा, लंबी चैड़ी नौसेना भी तैयार कर रहा है।

चीन की नीयत और योजनाएं अब किसी से छुपी नहीं हैं। जाहिर है अमेरिका ने इसकी काट निकालने के लिए योजना तैयार कर उसे लागू करना भी शुरू कर दिया है। भारत इस योजना का महत्वपूर्ण अंग है। अगर अमेरिका ने इस क्षेत्र में भारत को अपना सहयोगी चुना है तो उसे तकनीकी और सैन्य दृष्टि से मजबूत भी बनाना होगा, उसे आधुनिकतम हथियार भी देने होंगे। अमेरिका ने इसके लिए ईमानदारी से प्रयास भी किए हैं। इस पूरी योजना का रणनीतिक महत्व है तो यह भी सच है कि इससे अमेरिका को हथियारों का नया और बड़ा बाजार भी मिलेगा। भारत को चाहिए कि वो अमेरिका का सहयोगी तो बने पर अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए। चीन जैसे पड़ोसी देश को दुश्मन न बनाया जाए, लेकिन उसके अतीत को देखते हुए तैयारी भी पूरी रखी जाए।

आगामी छह सिंतबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मैटिस की भारतीय विेदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ 2$2 वार्ता है। ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के शिखर सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण अमेरिका में प्रस्तावित यह वार्ता पहले टाल दी गई थी, अब ये भारत में होगी। 2$2 वार्ता में भारत के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री एक साथ अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री से बात करते हैं ताकि दोनों क्षेत्रों के बारे में समग्र और व्यापक बातचीत हो सके और अड़चनें दूर कर राजनयिक और रणनीतिक मसलों को जल्दी से जल्दी सुलझाया जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के संबंधों में आपसी समझ और गहरी होगी और जमीनी स्तर भी कामकाज को और गतिशील बनाया जा सकेगा।