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अनुसूचित जाति-जनजाति का जीवनस्तर सुधारने में मोदी की उल्लेखनीय सफलता ‘In Punjab Kesari’

अनुसूचित जाति-जनजाति का जीवनस्तर सुधारने में मोदी की उल्लेखनीय सफलता

जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, उनकी सरकार के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा है कि वो अनुसूचित जाति – जनजाति के लोगों के खिलाफ है। असल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नक्सलियों और ईसाई गैरसरकारी संगठनों की एक मजबूत लाॅबी है जो इस वर्ग पर सवर्णों के ‘कथित अत्याचारों’ के नाम पर भारत को बदनाम करती रही है और उनके उत्थान और धर्मपरिवर्तन के नाम पर विदेशों से मोटी कमाई करती रही है।

मोदी सरकार के आने के बाद इस लाॅबी ने नक्सलियों, इस्लामिक आतंकियों और अनुसूचित जाति – जनजाति वर्ग के लोगों को एक साथ लाने के लिए काफी मेहनत की। इसके लिए इन्होंने सबसे ज्यादा निशाना विश्वविद्यालयों को बनाया। आपको रोहित वेमूला कांड तो याद ही होगा जिसमें इस लाॅबी ने नक्सली रोहित वेमूला की आत्महत्या को दुनिया भर में खूब भुनाया। इस पूरे मामले को ऐसे पेश किया गया जैसे मोदी की कथित ‘ब्राह्मणवादी’ सरकार दलितों पर घोर अत्याचार कर रही है और भारत में उनका जीना दुश्वार हो गया है। इस मामले को इस्लामिक नक्सली कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और उनके सहयोगियों ने सड़क से संसद तक खूब उछाला। रोहित वेमूला देशद्रोही नक्सलियों की अंबेदकर स्टूडेंट्स यूनियन सदस्य था और आश्चर्य नहीं कश्मीरी आतंकियों के समर्थन में प्रदर्शन करता था।

नक्सलियों ने अपने और इस्लामिक आतंकियों के हिंसक गठबंघन में दलितों को शामिल करने के लिए अंबेदकर का नाम तो इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, परंतु वास्तविकता ये है कि अंबेदकर साम्यवाद के खिलाफ थे। संविधान सभा में जब कुछ लोगों ने मांग की कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ जोड़ा जाए तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये किसी राजनीतिक दल की विचारधारा तो हो सकती है, लेकिन देश की नहीं। अंबेदकर ने कभी हिंसा और इस्लामिक संप्रदायिकता का समर्थन नहीं किया। जब कांग्रेस ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया तो अंबेदकर ने उसका जमकर विरोध किया।

इन संगठनों ने दलितों को पोटने के लिए अंबेदकर के नाम का इस्तेमाल तो किया पर असल में इनका अंबेदकर की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है जो दलितों को शिक्षित कर उनका आर्थिक सशक्तीकरण चाहते थे। नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों का नापाक गठजोड़ तो भारत को अस्थिर करने के लिए दलितों को भड़काना और हिंसा की आग में झोंकना चाहता है। इनका असली चेहरा सामने आया भीमा कोरे गांव में। महाराष्ट्र में दलित इसी नाम से अंग्रेजों और मराठों के बीच हुए उस युद्ध की सालगिरह मनाते हैं जिसमें अंग्रेजों की ओर से बड़ी संख्या में दलितों ने हिस्सा लिया था और वो जीत भी गए थे। इस वर्ष इसकी दो सौवीं सालगिरह मनाई जानी थी। नक्सलियों ने ये आयोजन अपने हाथ में ले लिया और इसका इस्तेमाल दलितों को भड़काने के लिए किया। इस आयोजन में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद जैसे अर्बन नक्सलियों ने जमकर भड़काऊ भाषण दिए जिसके बाद हिंसा फैली जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु भी हुई। इस मामले की चार्जशीट सामने आई तो पता लगा कि नक्सली सिर्फ हिंसा फैलाने की साजिश ही नहीं रच रहे थे, अपितु प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की योजना भी बना रहे थे।

नक्सलियों की मोदी के प्रति नफरत समझ में आती है क्योंकि उनका तो लक्ष्य ही भारत की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकना है, लेकिन क्या वास्तव में मोदी ने कोई ऐसा काम किया है जिससे दलितों को उनके विरूद्ध हथियार उठा लेने चाहिए?

इसका स्पष्ट उŸार है – नहीं। मोदी इतने साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और अब वो देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्हांेने आजतक कोई ऐसा काम नहीं किया जिसे दलितों के खिलाफ कहा जा सके। कुछ पार्टियों ने अपने वोट बैंक की खातिर भारतीय जनता पार्टी को सवर्णों की पार्टी के रूप में चिन्हित करना चाहा, लेकिन असलियत तो ये है कि आज भाजपा में सबसे ज्यादा दलित सांसद हैं। खुद को दलितों का मसीहा बताने वाली बहुजन समाज पार्टी ने हासिल करने के लिए ब्राह्मणों से हाथ मिलाया। जब सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़ी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम की सख्त धाराओं के खिलाफ फैसला सुनाया तो मोदी सरकार ने ही इसे संसद में कानून के माध्यम से बदला। उधर मायावती ने तो अपने अधिकारियों को इस कानून को लागू करने में नरमी बरतने के लिखित आदेश दिए थे।

अगर मायावती ने अंबेदकर से अधिक अपनी और कांशीराम की मूर्तियां बनवाईं तो मोदी सरकार ने अंबेदकर से जुड़े पांच प्रमुख स्मारकों का उद्धार करवाया और उनकी स्मृतियों को सजीव किया। ये हैं – महु, मध्य प्रदेश में उनकी जन्मस्थली, लंदन में अध्ययन के दौरान उनका निवास स्थान, नागपुर में दीक्षाभूमि जहां उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, दिल्ली में महापरिनिर्वाण स्थल जहां उनका परिनिर्वाण हुआ और मुंबई में चैत्य भूमि स्थित उनका स्मारक।

मोदी सरकार ने सिर्फ अंबेदकर से जुड़े स्मारक स्थलों का उद्धार ही नहीं करवाया, उसने उनके आदर्शों के अनुरूप अनुसूचित जातियों – जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए भी अभूतपूर्व प्रतिबद्धता दिखाई।

हम दलितों के विषय में मोदी सरकार के योगदान की बात करें इससे पहले दलित इंडियन चैप्टर आॅफ काॅमर्स (डीआईसीसी) के चेररमेन मिलिंद कांबले की बात सुनें कि वो मोदी सरकार के बारे में क्या कहते हैं, ”मोदी सरकार के दौरान दलितों के विकास के लिए सर्वाधिक काम किया गया। दलितों के लिए योजनाएं बनाने से लेकर उनके प्रभावी क्रियान्वयन तक, मोदी सरकार का काम मनमोहन सरकार से बेहतर रहा है।“ वो मुद्रा योजना की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, ”मोदी सरकार की मुद्रा योजना से अनुसूचित जाति-जनजाति के करीब 2.75 करोड़ युवाओं को लाभ पहुंचा।“

आइए एक नजर डालते हैं मोदी सरकार की उन योजनाओं पर जिन्होंने अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाला। मोदी सरकार की उज्जवला योजना के तहत घर-घर रसोई गैस पहंुचाई गई। एलपीजी गैस भारत में 1955 में ही आ गई थी, लेकिन वर्ष 2014 तक इसके सिर्फ 1.3 करोड़ कनेक्शन दिए गए थे। गत चार वर्ष में मोदी सरकार ने 10 करोड़ कनेक्शन दिए हैं। जाहिर है इसमें अधिकतर अनुसूचित जाति-जनजाति के परिवारों को ही मिले। ध्यान रहे हर कनेक्शन के लिए सरकार 1,600 रूपए की सहायता देती है।

मोदी सरकार की स्टैंड-अप योजना के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्यों और महिलाओं को 10 लाख से लेकर एक करोड़ रूपए तक के ऋण दिए गए। सरकार ने अनुसूचित जाति के लिए उद्यम पूंजी निधि द्वारा 81 कंपनियों की सहायता की। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के डीबीटी लाभाथर््िायों की संख्या में छह गुना वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2013-14 इनकी संख्या 50 लाख थी, परंतु चार साल में ही ये बढ़ कर 3.01 करोड़ हो गई है। सरकार ने गरीब तबके के सुरक्षित भविष्य के लिए भी उल्लेखनीय काम किया है। पिछले चार साल में 1.3 करोड़ से अधिक सुकन्या समृद्धि खाते खोले गए हैं और 5.7 करोड़ दलित छात्रों को 15,918 करोड़ रूपए की छात्रवृयां प्रदान की गईं हैं।

ये तो महज एक बानगी है। सरकार ने देश के चहुंमुखी विकास के लिए और अंतर्देशीय संपर्क बढ़ाने के लिए दसियों योजनाओं को लागू किया है जिनमें गरीब तबके के करोड़ों-करोड़ लोगों को रोजगार मिला है। ये सही है कि न तो समाज के पूर्वाग्रह अल्पावधि में समाप्त किए जा सकते हैं और न ही हर व्यक्ति और परिवार के हालात को बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन सरकार ने वर्ष 2022 तक सभी परिवारों को छत देने की जो महत्वाकांक्षी योजना बनाई है उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। इसके तहत लाखों गरीब परिवारोें को घर मिले हैं। ध्यान देने की बात ये है कि ये सिर्फ दीवारें ही नहीं हैं, इनमें बिजली, गैस और पानी कनेक्श शामिल है।

बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस आदि जैसी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल पार्टियां सामाजिक न्याय की बात करती हैं, लेकिन अंततः भला सिर्फ इनके नेताओं का होता है जिनके खजाने दिन दूनी रात चैगुनी रफ्तार से बढ़ते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने सदैव व्यक्तिगत हित से ज्यादा देश और गरीब हित पर ध्यान दिया। यही वजह है कि आज देशद्रोही नक्सली-इस्लामिक गठबंधन भले ही दलितों को कितना भड़काए, वो उनके बहकावे में नहीं आयेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो जब अगले वर्ष वोट देने जाएंगे तो अन्य योजनाओं के साथ ही प्रधानमंत्री अटल पेंशन योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी योजनाओं को भी ध्यान में रखेंगे जिन्होंने भारत में पहली बार गरीब तबके को सही मायने में सामाजिक सुरक्षा प्रदान की। वो आयुष्मान भारत योजना को भी नहीं भूलेंगे जिसके तहत हर गरीब परिवार को हर वर्ष पांच लाख रूपए का मेडिकल बीमा मिलता है।