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“संघ को बदनाम करने की नापाक कोशिश” in Punjab Kesari

गांधी जयंती पर कोलकाता के दमदम नगर बाजार में बम विस्फोट हुआ जिसमें आठ साल का बच्चा मारा गया। अभी पुलिस ने केस दर्ज कर तफ्तीश शुरू भी नहीं की थी कि ममता बनर्जी सरकार के मंत्री पूर्णेंदू बोस ने इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि संघ के स्थानीय नेतृत्व से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक सबने इसकी निंदा की और बोस के बयान को बेसिरपैर का बताया, लेकिन राज्य सरकार के एक ‘जिम्मेदार’ मंत्री द्वारा तुरंत और वो भी बिना किसी सबूत के संघ को दोषी ठहराना चिंताजनक है। चिंताजनक इसलिए कि एक मंत्री द्वारा इस प्रकार बयान देना, कहीं न कहीं पुलिस और जांच एजेंसियों के काम को भी प्रभावित करता है। ये एक प्रकार से उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से निर्देश देता है कि उन्हें जांच किस दिशा में ले जानी है और येन केन प्रकारेण अंततः किसे दोषी साबित करना है।

अब दूसरा मामला इस्लामपुर के दरीभीत स्कूल का देखिए। यहां पिछले महीने जब शिक्षकों की भर्ती के मामले में छात्रों ने विरोध किया तो पुलिस ने उनपर गोली चला दी। इससे दो छात्र मारे गए। इस मामले में तो स्वयं ममता बनर्जी ने संघ को दोषी ठहराया, हालांकि गोली ममता की पुलिस ने चलाई। संघ प्रवक्ता जिशनु बसु ने इस मसले में टीएमसी को कानूनी नोटिस भेज दिया है।

बिना किसी सबूत या जांच के संघ पर मिथ्या आरोप लगाने वाली ममता और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पश्चिम बंगाल को खुद कैसे आतंकियों का अड्डा बना रखा है वो इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले तीन साल में भारत में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सबसे अधिक एजेंट पश्चिम बंगाल से ही पकड़े गए हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलटने की कोशिश में लगे जमात-उल-मुजाहीदीन, बांग्लादेश (जेएमबी) के 30 आतंकी और उनकी बम बनाने की फैक्ट्रियां भी यहीं पकड़ी गईं थीं।

पिछले साल दिसंबर में खुफिया एजेंसियों ने खबर दी थी कि जेएमबी पश्चिम बंगाल और असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों को भड़काकर गुरिल्ला फोर्स बनाने की योजना पर काम कर रहा है और संघ और उसके सहयोगी संगठनों के नेता उसके निशाने पर हैं क्योंकि वही बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ का सबसे मुखर विरोध करते हैं। ध्यान रहे जेएमबी के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से प्रगाढ़ संबंध हैं और टीएमसी के अनेक पदाधिकारियों पर उसके एजेंटों को पालने के आरोप भी लगते रहे हैं। आपको ये भी याद होगा कि कैसे ममता के एक मंत्री फिरहद हाकिम ने पाकिस्तानी अखबार डाॅन की रिपोर्टर मलीहा हामिद सिद्दीकि को कोलकाता के गार्डन रीच इलाके की सैर कराते हुए उसे गर्व से ‘मिनी पाकिस्तान’ बताया था।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बदनाम ममता बनर्जी राज्य में ‘ममता बेगम’ के नाम से जानी जाती हैं। संघ और भारतीय जनता पार्टी से उनका द्वेष पुराना है। उन्होंने राज्य में होने वाले संघ प्रमुख मोहन भागवत के हर कार्यक्रम में रोड़े अटकाए हैं। उन्हें लगता है कि संघ को हिंदुओं का प्रतीक बनाकर और उसे प्रताड़ित और बदनाम कर वो हिंदुओं से नफरत करने वाले लोगों को परपीड़ा सुख दे सकती हैं और उनके वोट हासिल कर सकती हैं। लेकिन उनकी ये मानसिकता नई नहीं है, वो कांग्रेस से आईं हैं और वहां जवाहरलाल नेहरू के जमाने से नफरत फैलाने का ये रोग चला आ रहा है।

सोनिया सरकार के जमाने में इसने विकराल रूप धारणा कर लिया जब उनके सुशील शिंदे और पी चिदंबरम जैसे गृह मंत्रियों तथा उनके मातहत काम करने वाली पुलिस और जांच एजेंसियों ने इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ या ‘भगवा आतंकवाद’ के काल्पनिक विचार को जमीन पर उतारने के लिए संघ पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सब जानते हैं कि मुंबई हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिश थी, लेकिन कांग्रेस के एक दलाल अजीज बर्नी ने एक किताब लिखी – मुंबई हमलाः आरएसएस की साजिश और इसका विमोचन किया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने। दिग्विजय सिंह वही व्यक्ति हैं जिन्हें हेट प्रीचर जाकिर नायक ‘शांतिदूत’ नजर आता है और जो ओसामा बिन लादेन और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को ‘जी’ कह कर सम्मान देते हैं।

समझौता ट्रेन ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों ने आईएसआई एजेंट अजमत अली को पकड़ लिया था, लेकिन न जाने किस मंत्री के इशारे पर उसे छोड़ दिया गया और सेना के कर्तव्यनिष्ठ अफसर कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा आदि का पकड़ लिया गया और उनके खिलाफ फर्जी केस बनाए गए। यही हाल गोधरा कांड में हुआ। इसकी योजना पाकिस्तान में बनी, लेकिन पाकिस्तानी एजेंट कब कैसे गायब हो गया, पता ही नहीं चला। याद दिला दें कि गोधरा कांड के दो मुख्य अभियुक्त फारूक भाना और इमरान शेरू हैं। वारदात के समय भाना गोधरा में निर्दलीय पार्षद था। उसने वहां बोर्ड का निर्माण कांग्रेस की मदद से किया था। भाना खुद भी फरार हो गया था और 14 साल बाद ही वो पुलिस की पकड़ में आया।

गोधरा कांड के बाद कैसे गुजरात में दंगे भड़के और उसके बाद तबके मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’ बताकर कैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया गया और कैसे भाजपा और संघ के खिलाफ मुसलमानों को लामबंद करने की कोशिश की गई वो किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस और अमेरिका में धर्म परिवर्तन की मुहिम चलाने वाली कुछ ईसाई संस्थाओं ने तो मोदी के अमेरिका प्रवेश तक पर रोक लगवा दी थी।

संघ पर सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस ने ही निशाना साधा ऐसा नहीं है। हमने देखा है कि जब भी किसी राष्ट्रविरोधी विचारधारा या आतंकी पर हमला हुआ है तो उसने पलट कर संघ पर हमला किया है। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और कई अन्य विश्वविद्यालयों में पलने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल और उनकी सरपरस्त कम्युनिस्ट पार्टियां, इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमाक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया, कश्मीर के आतंकी संगठन और सपा और राजद जैसी अनेक इस्लामिक सांप्रदायिक पाटियां आदि सभी शामिल हैं। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियांे और कांग्रेस के शासन में कैसे सैकड़ों संघ कार्यकर्ताओं को सरेआम कत्ल किया गया है, वो किसी से छुपा नहीं है। इसी प्रकार कर्नाटक में भी संघ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न और हत्याएं जारी हैं। हर चुनाव से पहले चर्च और मौलवी कैसे संघ के विरूद्ध भड़ास निकालते हैं और भाजपा के खिलाफ फतवा जारी करते हैं, वो भी मंजरे आम पर है। मतलब साफ है – संघ अखंड भारत का समर्थन करता है तो जो भी भारत को तोड़ना चाहता है वो संघ पर हमला करता है।

हाल ही में रिपब्लिक टीवी ने लंदन आधारित खालिस्तानियों पर एक स्टिंग आॅपरेशन किया। आश्चर्य तो तब हुआ आईएसआई के पैसे पर पलने वाले प्रतिबंधित ‘दल खालसा’ के आतंकी गुरचरण सिंह ने अपने आतंकी रवैये को सही ठहराने के लिए संघ को दोषी ठहराना शुरू कर दिया। इस खूनी दरिंदे से कोई पूछे कि जब तुमने आईएसआई के इशारे पर अस्सी के दशक में पंजाब में खालिस्तान की आग लगाई तो संघ कहां था? संघ जिम्मेदार था तो तुमने इंदिरा गांधी की हत्या क्यों करवा दी? आश्चर्य की बात है कि आज पंजाब में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार है लेकिन लंदन में बैठे ये लोग पंजाब में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या करवा रहे हैं। स्टिंग में ये दावा करते हैं कि पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव में इन्होंने आम आदमी पार्टी को पैसा दिया। आम आदमी पार्टी क्या पंजाब में संघ के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी?

स्टिंग में किसने क्या कहा और उसके पीछे कौन है, सब जानते हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बताने के नेरेटिव का इस्तेमाल अब पाकिस्तान भी खुल कर कर रहा है। इस बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान पर हमला किया तो पलट कर उसने संघ को ‘हिंदू आतंकी’ बता कर हमला किया। संघ को ‘हिंदू आतंकी’ के रूप में बदनाम करने की साजिश कांग्रेस ने पाकिस्तान के इशारे पर की या पाकिस्तान ने कांग्रेस के दुष्प्रचार का दुरूपयोग किया, इसकी जांच होनी ही चाहिए। जो भी हो, चाहे कांग्रेस हो या पाकिस्तान दोनों में एक बात तो काॅमन है – हिंदुओं के प्रति नफरत। ये भी सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल देश में तो संघ के प्रति नफरत फैलाते हैं, विदेश में भी उसका अपमान करने से बाज नहीं आते जबकि वहां उनके अनर्गल वक्तवयों का जवाब देने संघ का कोई कार्यकर्ता भी मौजूद नहीं होता।

भारत से लेकर पाकिस्तान और इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक दुनिया भर में जिस प्रकार इस्लामिक आतंकी संगठन और ईसाई चर्च संघ पर निशाना साध रहे हैं, उसका गहन अध्ययन होना चाहिए। इसके लिए कौन से देशी-विदेशी संगठन और राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं और उनका आपस में क्या संबंध है, उस पर विचार होना ही चाहिए। बहरहाल इतना तो साफ है कि भारत में कांग्रेस, टीएमसी, सीपीएम, राजद, सपा आदि जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां के कट्टर इस्लामिक दल भी आज संघ को निशाना बना रहे हैं। सब एक ही जुबान बोल रहे हैें और सबका एक ही मकसद है – इस्लामिक आतंकवाद को सही ठहराने या उससे ध्यान हटाने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ का हौवा खड़ा करना। इस मामले में आईएसआई, कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों से दस कदम आगे है। उसके टुकड़ों पर पलने वाले कश्मीरी, खालिस्तानी, बांग्लादेशी, बर्मी आतंकी सभी अब एक स्वर से इसका जाप कर रहे हैं।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में दिल्ली के विज्ञान भवन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष मजबूती और स्पष्टता से रखा था। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अब जरूरी है कि संघ विश्व समुदाय के साथ वैचारिक आदान-प्रदान और प्रगाढ़ करे और अपने उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण सामाजिक सांस्कृतिक योगदान और परियोजनाओं के विषय में उन्हें अधिक जानकारी दे।

“ऐतिहासिक है संघ प्रमुख मोहन भागवत का विज्ञान भवन व्याख्यान” in Punjab Kesari

भ्रष्टाचार के कीचड़ में अच्छी तरह नहाए-धोए, लिपटे, सने, डूबे फर्जी गांधी परिवार के पूत राहुल (सपूत या कपूत ये आप तय करिए) पूछ रहे हैं कि देश को संगठित करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कौन होता है, देश को संगठित होना होगा तो वो खुद हो जाएगा। राहुल जैसा आदमी, जिसकी पूरी चुनाव नीति अंधी इस्लामिक-ईसाई सांप्रदायिकता, नफरत, दुष्प्रचार, देशद्रोहियों से सांठगांठ, अलगाववाद, क्षेत्रीय-जातीय विभाजन पर आधारित हो, अगर ऐसे सवाल न पूछता तो आश्यर्च होता। असल में राहुल और उनके पूर्वजों ने संघ के खिलाफ नफरत फैलाने की दसियों साल से लगातार साजिश की। अब जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में इसका जवाब सकारात्मकता, सम्मान और स्नेह से दिया तो वो तिलमिला गए। संसद में प्रधानमंत्री मोदी को गले लगाकर ‘प्यार का ढोंग’ करने वाले राहुल को समझ नहीं आया कि भागवत को क्या जवाब दें? उन्हें लग रहा है कि समावेशी संस्कृति की बात करके भागवत कहीं उन लोगों को कांग्रेस से दूर न कर दें जिन्हें ‘हिंदुओं का हौवा’ दिखाकर कांग्रेस ने अपने साथ रखने की कोशिश की है।

कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भागवत की व्याख्यान माला ने वास्तव में इतिहास रच दिया। कांग्रेस और सीपीएम जैसी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों ने बड़ी मेहनत से कई दशकों तक संघ की जैसी तस्वीर बनाने की कोशिश की थी, भागवत ने एक झटके में उसके चीथड़े उड़ा दिए। ऐसा नहीं है कि उन्होंने ये या ऐसे विचार पहले नहीं व्यक्त किए, लेकिन ये पहली बार हुआ जब दिल्ली के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विज्ञान भवन से उन्होंने विश्व को संबोधित किया और दुनिया ने न केवल उन्हें ध्यान से सुना, बल्कि उन्होंने जो कहा उसे गहराई से गुना भी।

उनके संबोधन से सबसे ज्यादा निराशा तो कांग्रेस जैसी सीआईसी पार्टियों को हुई जिन्होंने संघ को ‘हिंदू सांप्रदायिक’ ठहरा कर इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उनके मुंह पर जोरदार तमाचा तब लगा जब भागवत ने कहा कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व संभव ही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, ”हिंदू राष्ट्र का अर्थ ये नहीं कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा उस दिन हिंदुत्व ही नहीं रहेगा। हिंदुत्व तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है।“

उन्होंने कहा, ”संघ ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को नहीं मानता। हम तो सबको अपना मानते हैं। यह शब्द ब्रिटिश काल में भारत आया, पहले ये नहीं था। मेरा मानना है कि जिन मुस्लिम बस्तियों के पास संघ की शाखा है, वहां मुस्लिम ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मैं तो कहता हूं सबको संघ में आकर संघ को देखना चाहिए और अगर हमारी बात में कोई कमी मिले तो फिर कहिए“।

वो यहीं नहीं रूके, उन्होंने संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकर की विवादित पुस्तक ‘बंच आॅफ थाॅट्स’ के बारे में भी खुल कर अपने विचार रखे जिसमें मुसलमानों पर कुछ कथित रूप से विवादित टिप्पणियां की गईं हैं। उन्होंने कहा, “‘बंच आॅफ थाॅट्स’ गुरू जी के भाषणों का संग्रह है जो एक विशिष्ट संदर्भ में दिए गए थे और वो शाश्वत नहीं हैं। संघ हठधर्मी नहीं है, जैसे समय बदलता है, वैसे हमारे विचार भी बदलते हैं। डाॅक्टर हेडगेवार ने कहा था हम बदलते समय के अनुसार खुद को ढालने के लिए स्वतंत्र हैं।”

सीआईसी कांग्रेस ने संघ को ‘हिंदू आतंकवादी संगठन’ घोषित करने की भरपूर साजिश की। हेट प्रीचर जाकिर नायक को शांति का मसीहा बताने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने तो मुंबई हमलों पर एक किताब का विमोचन तक किया जिसका नाम था – ‘मुंबई हमले, आरएसएस की साजिश’। लेकिन भागवत ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के योगदान की प्रशंसा की और कहा कि इस पार्टी में भी अनेक ऐसे महानुभाव हुए जिनसे हम अब भी प्रेरणा लेते हैं। ध्यान रहे, उन्होंने सोनिया और राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर तो कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन ये अवश्य कहा, “हम लोग तो सर्वलोक युक्त भारत वाले लोग हैं, मुक्त वाले नहीं हैं”।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे समय तक संघ के बारे में ये छवि बनाने की कोशिश की कि संघ में तानाशाही चलती है और वो भारत के झंडे और संविधान को नहीं मानता। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया, “संविधान में सभी भारतीयों की सहमति है। इसका पालन करना हम सबका कर्तव्य है….मैंने जो कुछ भी कहा है वो संविधान के अनुसार ही कहा है। संघ संविधान की प्रधानता स्वीकार करता है और हम इसका पूरी तरह सम्मान करते हैं”।

यूपीए के जमाने में कहने को तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन असली राज तो 10 जनपथ से चलता था। सब मनमोहन सरकार को ‘रिमोट कंट्रोल’ सरकार कहते थे। इसके जवाब में सीआईसी कांग्रेस ने भ्रम फैलाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार का रिमोट कंट्रोल नागपुर स्थित संघ के कार्यालय में है। भागवत ने इसे सरासर गलत बताया, ”अक्सर लोग कयास लगाते हैं कि मोदी सरकार के किसी निर्णय के लिए संघ मुख्यालय से फोन आया होगा, ये निराधार है। सरकार में जो लोग काम कर रहे हैं, वो वरिष्ठ हैं और राजनीति में उनका अनुभव हमसे भी कहीं अधिक है। भाजपा न तो किसी सलाह के लिए हम पर निर्भर रहती है और न ही हम सलाह देते हैं। अगर उन्हें कोई सुझाव चाहिए होता है और हमारे पास देने के लिए कुछ होता है तो हम देते हैं“।

सीआईसी पार्टियों ने लंबे अर्से तक संघ को ‘ब्राह्मणवादी’, ‘मनुवादी’ कह कर एक खास वर्ग से बांधने की कोशिश की और ये प्रचार किया कि संघ आरक्षण विरोधी है। संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि, “हम किसी की जाति नहीं पूछते। हम विषमता में विश्वास नहीं रखते। हम चाहते हैं कि जाति विभेद पूरी तरह समाप्त हो, लेकिन ये लंबी यात्रा है। हम अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं हैं। अगर देश में सर्वे करवाया जाए तो संघ के स्वयंसेवकों में अंतरजातीय विवाह के उदाहरण सबसे ज्यादा मिलेंगे”। उन्होंने बिना लागलपेट के कहा, “संघ सामाजिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करता है। संविधान सम्मत सभी तरह के आरक्षण का संघ समर्थन करता है। हमारे संविधान में सामाजिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। ये जारी रहना चाहिए, ऐसा संघ का विचार है। समस्या आरक्षण से नहीं, इसपर होने वाली राजनीति से है। सवाल ये है कि समाज में बराबरी कैसे आएगी? तो जो ऊपर हैं, वो थोड़ा नीचे झुकेंगे और जो नीचे हैं वे एड़ियां ऊंची करेंगे तब ही बराबरी आएगी। समाज के कुछ वर्गों को निर्बल हमने बनाया है। निर्बल रहे समाज के वर्गों को ऊपर लाने के लिए हमें सौ-डेढ़ सौ साल परेशानी आती है तो भी उसे हमें स्वीकार करना होगा”।

गाय के नाम पर देश के कुछ हिस्सों में हिंसक घटनाएं हुईं। सीआईसी पार्टियों ने आंख मूंद कर इसके लिए संघ और उसके सहयोगी संगठनों को जिम्मेदार ठहरा दिया। हालांकि वो अब तक एक भी घटना में संघ का हाथ नहीं साबित कर पाए। इस विषय पर उन्होंने कहा, “गाय के नाम पर हत्या करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। गाय या किसी भी विषय पर हिंसा करना अनुचित है। कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चहिए”।

सीआईसी पार्टियां अक्सर संघ को दकियानूस बताकर उसे महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करती रहीं हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल तो इस विषय में बिना जाने-समझे कुछ भी बोलते रहे हैं। भागवत ने महिलाओं के लिए बराबरी के दर्जे की वकालत की। उन्होंने कहा कि हम महिलाओं को जगदंबा स्वरूप मान कर पूजा तो करते हैं परंतु वास्तव में उनकी हालत बहुत खराब है। हमें उनकी स्वतंत्रता और सशक्तीकरण के लिए काम करने की आवश्यकता है और इसकी शुरूआत घर से ही करनी होगी।

स्पष्ट है संघ प्रमुख ने देश-समाज से जुड़े हर महत्वपूर्ण विषय पर विचार रखे। लेकिन उनके विचारों के मूल में एक ही सूत्र था – देश प्रथम, वस्तुस्थित का ईमानादारी से संज्ञान लेना और देश के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करना। संभवतः यही कारण था कि उन्होंने कश्मीर में अलगाववाद और इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाले अनुच्छेद 35 ए और 370 का निःसंकोच विरोध किया। कुल मिलाकर भागवत ने स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि संघ का उद्देश्य भारतीय नागरिकों का नैतिक और चारित्रिक विकास है ताकि व्यवस्थागत कमियों के बावजूद वो अपने कंधों पर देश को नई ऊंचाई तक ले जा सकें। संघ समाज में एकता, नैतिकता और शुचिता का पक्षधर है, इसलिए वो संगठन में भी इसका पूरा ध्यान रखता है।

आज चार करोड़ से भी अधिक लोग दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े हैं। रोज इसकी 60,000 से अधिक शाखाएं लगती हैं। संघ से प्रेरित तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं देश भर में 1,70,000 से ज्यादा समाजकल्याण की परियोजनाएं चला रही हैं जिनका सबसे अधिक लाभ दलित-आदिवासी वर्ग को होता है। संघ के अमूल्य और अतुलनीय सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान के बावजूद सीआईसी पार्टियों ने वोट बैंक की राजनीति के कारण इसे सिर्फ कट्टरवादी हिंदू संगठन के रूप में पेश किया। लेकिन भागवत ने इसकी परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्मांधता के खिलाफ सचेत किया, “विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले डेढ़ से दो हजार साल में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम पर बहुत अधर्म हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। सबसे पहले हिंदू को सच्चा और अच्छा हिंदू बनना पड़ेगा“।

कहना न होगा भागवत ने ये साबित कर दिया कि अगर भारत में सच्चे अर्थों में कोई प्रगतिशील, उदारवादी, सुधारवादी, समावेशी, आधुनिक, राष्ट्रवादी संगठन है तो वो है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

“हिंदू विरोधी वोट बैंक और संघ का अंधा विरोध” in Punjab Kesari

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘भविष्य का भारत’ विषय पर तीन दिवसीय चर्चा का आयोजन कर रहा है। इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वयं इस बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। संघ ने इसमें हर क्षेत्र और वर्ग के लोगों को न्यौता दिया। बुलावे पर अनेक कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियों का रवैया खेदजनक रहा। चर्चा में आना या न आना उनका विशेषाधिकार था, लेकिन उन्होंने संघ के प्रति जो अपमानजनक टिप्पणियां कीं वो लोकतंत्र और सहिष्णुता की भारतीय परंपराओं के सर्वदा विरूद्ध थीं।

इन टिप्पणियों से कुछ बातें तो स्पष्ट हुईं। एक तो ये कि अपमानजनक टिप्पणी करने वाले लोगोें को संघ की वास्तविकता और दर्शन का कोई ज्ञान नहीं है। दूसरी ये कि इन्होंने संघ को हिंदुओं का एक प्रतीक बना दिया है। जो भी हिंदुओं से नफरत करता हो या उनसे नफरत करने वालों का समर्थन चाहता हो, वो संघ का अपमान करे और अपनी भड़ास निकाल दे। संघ को गाली देना, उसके खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ का सर्वदा उचित विरोध है।

संघ के न्यौते पर किसने क्या कहा, ये दोहराना उचित नहीं होगा, लेकिन संघ की विचारधारा के कुछ मूल तत्वों पर चर्चा की जाए, उससे पहले ये स्पष्ट करना जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र में संघ को अपने विचार रखने और उन्हें प्रचारित, प्रसारित करने का उतना ही हक है जितना सीआईसी पार्टियों को है। अगर सीआईसी पार्टियां राष्ट्रविरोधी, सुरक्षा बलों के हत्यारे नक्सलियों, कश्मीरी और पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकवादियों का समर्थन ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ मान सकती हैं तो संघ को भी अपनी अखंड भारत की परिकल्पना मानने और उसे साकार करने के लिए प्रयास करने का पूरा हक है। ध्यान रहे, इसके लिए संघ न तो किसी हिंसक गतिविधि को बढ़ावा दे रहा है और न ही समाज के विघटन की बात कर रहा है।

सीआईसी पार्टियां आंख मूंद कर संघ पर आरोप लगाती रही हैं कि संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है और अल्पसंख्यकों (हास्यास्पद है लेकिन 20 करोड़ मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहा जाता है) के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सीआईसी पार्टियां ये नहीं बतातीं कि ‘हिंदू’ से संघ का क्या अभिप्राय है? जो बात इन विघटनकारी इस्लामिक सांप्रदायिक दलों को नहीं पता, उसे हम स्पष्ट कर देते हैं। संघ के लिए ‘हिंदू’ एक व्यापक और समावेशी शब्द है। संघ के लिए हर वो व्यक्ति ‘हिंदू’ है जो भारत को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है।

सीआईसी पार्टियां मुसलमानों को डराती हैं कि संघ हिंदुओं को संगठित कर रहा है और जब ये मजबूत हो जाएगा तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ये सही है कि संघ हिंदुओं को संगठित करना चाहता है, लेकिन इसका उद्देश्य किसी धर्म, जाति, समुदाय के लोगों को आक्रांत करना या उनके अधिकार छीनना नहीं है। संगठन क्या है इसे स्पष्ट करते हुए संघ संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार कहते हैं – “किसी भी राष्ट्र की सामथ्र्य उसके संगठन के आधार पर निर्मित होती है। बिखरा हुआ समाज तो एक जमघट मात्र है। ‘जमघट’ और ‘संगठन’ दोनों शब्द समूहवाचक हैं, फिर भी दोनों का अर्थ भिन्न है। जमावड़े में अलग-अलग वृŸिा के और परस्पर कुछ भी संबंध न रखने वाले लोग होते हैं, किंतु संगठन में अनुशासन, अपनत्व और समाज-हित के संबंध सूत्र होते हैं जिनमें अत्यधिक स्नेहाकर्षण होता है। यह सीधा-सरल तत्व ध्यान में रखकर समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए संघ ने जन्म लिया है….संघ का ध्येय अपने धर्म, अपने समाज और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हिंदुओं का सक्षम संगठन करना है। इससे हमारा खोया आत्मविश्वास पुनः जाग्रत होगा और उसकी सामथ्र्य के सामने आक्रामकों की उद्दंड प्रकृति ढीली पड़ेगी तथा वे हमारे ऊपर आक्रमण करने की फिर सोच भी नहीं पाएंगे।”

विघटित समाज का क्या हश्र होता है वो हम 1947 में देख चुके हैं, जब माउंटबेटन ने कांग्रेस (जवाहरलाल नेहरू) और मुस्लिम लीग (मौहम्मद अली जिन्ना) के साथ मिलकर भारत का बंटवारा करवा दिया जिसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे खूनी दौर देखा जिसमें बीस लाख से ज्यादा लोग मारे गए और करोड़ों बेघर हुए। वैसे भी जब भारत का विघटन चाहने वाली शक्तियां खुद को संगठित कर और भारतीय संविधान में दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग कर अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए षडयंत्र कर सकती हैं तो भारत की अखंडता और एकता के पक्षधर हिंदुओं को एक करने में क्या बुराई है?

सीआईसी पार्टियांे बार-बार संघ के खिलाफ ये दुष्प्रचार करती हैं कि उसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया। आजादी के बाद बेशर्मी से भारतीयों की लाशों को रौंद कर सŸाा पर काबिज होने वाली कांग्रेस ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को कम्युनिस्टों के साथ मिलकर इस तरह लिखवाया जैसे उसके अलावा किसी और ने आजादी की लड़ाई मंे हिस्सा ही नहीं लिया। महात्मा गांधी ने निःसंदेह भारतीयों का जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन नेहरू तो अंग्रेजों के पिट्ठू ही रहे। वो जेल भी गए तो उन्हें वहां भरपूर सुविधाएं दी गईं। आपको बता दें कि संघ के संस्थापक केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वो कांग्रेस में भी रहे और उन्होंने क्रांतिकारियों का साथ भी दिया। वो कांग्रेस से अलग हो गए क्योंकि कांग्रेस का लक्ष्य भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता था वहीं उनका उद्देश्य ‘अखंड भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता’ था। 1925 में संघ की स्थापना के बाद भी हेडगेवार कांग्रेस नेतृत्व द्वारा संचालित आंदोलनों और सत्याग्रहों में भाग लेते रहे।

संघ की शाखाओं में तैयार होने वाले देशभक्त युवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। उनके सहयोगी नेताओं के लेखों एवं सरकारी दस्तावेजों से ये साबित होता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में लाखों स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर अग्रणी भूमिका निभाई थी। यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि इन स्वयंसेवकों ने अपने आदर्श ध्येय वाक्य ‘नहीं चाहिए पद, यश, गरिमा, सभी चढ़े मां के चरणों में’ के अनुसार अपनी संस्थागत पहचान से ऊपर उठकर सत्याग्रहों में भाग लिया और जेलों में अनेक प्रकार की यातनाएं एवं कष्ट सहन करते हुए अपनी राष्ट्रभक्ति का अतुलनीय परिचय दिया। पूर्व राष्ट्रपति और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को हेडगेवार के योगदान की पूरी जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने संघ के मुख्यालय में उन्हें ‘भारत मां का महान सपूत’ बताया था। सीआईसी पार्टियों के जो लोग आज संघ को अपशब्द कह रहे हैं उन्हें याद दिला दें कि महात्मा गांधी, डाॅक्टर भीमराव अंबेदकर, जमनालाल बजाज, डाॅक्टर जाकिर हुसैन, जयप्रकाश नारायण, जनरल करियप्पा आदि संघ के कार्यक्रमों में आ चुके हैं। 1963 में स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी के अवसर पर कन्याकुमारी में ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ निर्माण के समय भी संघ को सभी राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिला। इसके निर्माण के समर्थन में विभिन्न राजनीतिक दलों के 300 सांसदों के हस्ताक्षर एकनाथ रानाडे ने प्राप्त किए थे।

पूर्व संघ प्रचारक एवं ‘युगप्रवर्तक स्वतंत्रता सेनानी डाॅक्टर हेडगेवार का अंतिम लक्ष्य – भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक के लेखक नरेंद्र सहगल अपनी पुस्तक में लिखते हैं – ”आज भी संघ के विरोधी संघ पर कई प्रकार के आरोप लगाते हैं। संघ एक सांप्रदायिक सैनिक संगठन है। संघी संकीर्ण विचार के लोग हैं। मुस्लिम विरोधी हैं। दंगे करवाते हैं……संघ के विरोधी यदि संघ की वैचारिक चट्टान के साथ टकराकर अपना सिर फोड़ने की जगह संघ में आकर इसे समझने का थोड़ा भी प्रयास करें, तो वोे भी इस चट्टान का हिस्सा बन सकते हैं। अन्यथा संघ तो एक निश्चित गति से अपना काम कर ही रहा है। लोग ये भी कहते हैं कि संघ ने अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। सच्चाई यह है कि संघ के दरवाजे हैं ही नहीं, बंद क्या करें। उन्होंने ही अपने दरवाजे हमारे लिए बंद कर दिए हैं।“

नरेंद्र सहगल का विश्लेषण कितना सही है, ये मोहन भागवत के विज्ञान भवन के कार्यक्रम को लेकर खड़े किए गए मिथ्या विवाद से स्पष्ट हो जाता है। शास्त्रार्थ और विचार-विमर्श की महान भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए संघ ने विरोधी मतावलंबियों को भी निमंत्रण दिया, लेकिन उन्होंने न केवल अपने दरवाजे बंद किए, बल्कि असभ्य और असंसदीय व्यवहार भी किया। बहरहाल दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सिद्धांतों पर कायम है और लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा अनवरत जारी है। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, विद्या भारती, स्वदेशी जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय किसान संघ, आरोग्य भारती, भारत विकास परिषद, संस्कार भारती आदि जैसे अनेकानेक संगठनों के साथ वो मां भारती के सेवा में दिन-रात जुटा है। संघ से प्रेरित संगठनांे द्वारा इस समय देश में एक लाख साठ हजार से अधिक सेवा कार्य चल रहे हैं जिनसे लाभान्वित होने वाले अधिकांश लोग दलित वर्ग से संबंध रखते हैं।

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