Sabarimala: Lord Ayyappa’s vows v/s the selected ladies’ woes in “TOI Blog”

Sabarimala: Lord Ayyappa’s vows v/s the selected ladies’ woes


Although known for traditions existing from the most primordial times to relentlessly being carried forward, our country is also one of the unfortunate few that are embroiled in never ending legal battles. The infamous Supreme Court (SC) verdicts have a way to seep into our psyche while they remain in the society for ages, as if an antidote to tradition itself.


It was the decade of 1990s that the Sabarimala row became part of the social consciousness. In 1991, the Kerala High Court upheld the ban on entry of women and directed Devasom Board to implement it. Fast forward to 2019, the SC verdict only seems to make the waters murkier. Some news channels play the devotees’ pleas, requesting women to adhere to the age-old traditions, on loop. While many others run debates with the ball being bounced to and fro, and never finding a resting place in either’s court.


If one delves deeper into meanings accorded to meticulously followed rituals one would realize that the temple structures across South India follow a certain repertoire based on a set of beliefs. The location of a temple is chosen along the magnetic lines of the earth and it is done so to contain the energy field that the idol emits and further resonates. It goes beyond debate then that the geographical location plays a significant role in the establishment of a temple. The Garba Griha or Sanctum Sanctorum is placed with utmost precaution, keeping in mind intricate details in the course of spirituality. In particular the Sabarimala temple has a long tradition, part of which resembles the aforementioned rituals. Women in the age bracket of 15-50 years are prone to experience energy disruptions should they enter the temple premises during their menstrual period.


More importantly, it has come to surface that the Sabarimala temple is built in reverence to Lord Ayyappa who is believed to have taken Naishtika Brahmacharya, which translates to lifelong celibacy. For worshippers and even atheists living in India, it is no rocket science to understand that every god in the Hindu pantheon is worshipped for particular characteristics they come to portray. To call lord Ayyappa prejudiced for avowing to brahmacharya is rather polemic. As if to pacify the female devotees, Lord Ayyappa has a dozen more temples in Kerala itself.


The larger question here is whether the vision towards the traditions is narrow or the tradition itself? It is appalling to see women entering the temple on whims and not in adherence to a belief system in whose name they enter. Justice Indu Malhotra’s opinion needs to be specially highlighted here. As a devoted lawyer should do, she upheld the constitutional value that states ‘Secularism’ as the binding fabric of our country. She categorically mentions that if the rule of gender equality is to be applied to a certain temple, then it must have to be extended to all places of worship across every other religion and that amounts to intrusion of State in the matters of religion.


Hinduism encapsulates both the sacred and profane elements of religion and it is reflective in the practices that are followed by devotees religiously. It not only reveres menstrual blood which is otherwise considered profane, it also encourages worship of Goddesses such as the Kamakhya Devi temple in Assam. It is needless to argue then that the religion respects women, and menstrual blood is indeed considered sacred. The neo-feminazi debates surrounding empowerment of women are as hollow as a rotten bitter gourd. It seems a new trend has gone viral such that it leaves people bereft of common sense, prodding them to never use their mental faculties. The subtle line between fighting for equal rights and fighting against every tradition in the name of equal rights is what most transgress in ignorance. The latter is an extremist fad which contains within itself the perils of a sad demise. When one collates Sati to Sabarimala what they are essentially collating is a widespread conscience collective to a narrow traditional practice pertaining to an individual temple. While both should be open to scrutiny in an evolving society, the quest to understand the meaning should not be a biased one.


Lucius Annaeus Seneca quotes, “Religion is regarded by the common people as true, by the wise as false, and by rulers as useful”. While the debate on common versus wise people is for another day, I believe the political subterfuge is surely relevant in this case. In matters of religion and faith, India has been constitutionally established as a secular country where politics and religion are not to be combined. However truth is stranger than fiction and what happens in India is undecipherable not just for the common populace but the wise as well. The Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan’s intrusion in the matters of Devasom board and the SC not only look ill placed but raise concerns of political mileage that the rulers earn through religious route in our country.


The SC verdict is eagerly awaited and the well educated folks of Kerala know how to voice dissent however it is my earnest plea to women across India to understand the subtleties that revolve our tradition and the path to empowerment. It would be quite a despondent situation if the real battle towards empowerment of women gets entangled in the quagmire of feminist fad that is far from the resemblance of fair war.

‘सबरीमला की शुचिता भंग करने की साम्यवादी साजिश’ in Punjab Kesari

सबरीमला में केरल सरकार अयप्पा भक्तों और विशेषकर महिला भक्तों के साथ जो व्यवहार कर रही है वो निंदनीय है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का रवैया मुलायम सिंह यादव के 1990 के उस आदेश की याद ताजा करता है जिसमें उन्होंने पुलिस को अयोध्या में निहत्थे रामभक्तों पर गोली चलाने का आदेश दिया। मुस्लिम वोटों की खातिर लिए गए इस फैसले में कितने भक्त मारे गए, कितनों की लाशें बिना अंतिम संस्कार सरयु में बहा दी गईं और कितने लापता हुए, किसी ने ढंग से इसकी जांच करवाने की जहमत तक नहीं उठाई।

केरल सरकार की तानाशाही सात नवंबर, 1966 की याद भी बरबस दिला देती है जब इंदिरा गांधी सरकार ने गौहत्या पर प्रतिबंध की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाने का आदेश दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें 375 लोग मारे गए, परंतु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जलियांवाला बाग से भी बदतर इस कांड में 10,000 से अधिक हिंदू शहीद हुए। ध्यान रहे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 48 में सरकार से गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने की अपेक्षा की गई है।

हम लौट कर केरल की घटना पर आते हैं। 18 नवंबर को अयप्पा के सैकड़ों भक्त सत्संग के लिए एकत्र हुए। पुलिस ने इन पर धारा 144 का उल्लंघन करने के नाम पर बेरहमी से लाठियां और पत्थर बरसाए और इनका सामान लूट लिया। सैकड़ों महिला और पुरूष भक्तों को आतंकियों की तरह थाने में रखा गया फिर उन्हें 10 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस दौरान उन्हें मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रखा गया।

विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन कहते हैं, “पुलिस जिस निर्दयता से भक्तों पर प्रहार कर रही थी, उससे लग रहा था कि जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम) के गुंडों ने ही पुलिस की वर्दी पहन ली है। ये न तो आदिल शाही निजाम है न सोवियत संघ में स्टालिन का शासन, नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा।”

वो आगे कहते हैं, ”सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बहाने, मुख्यमंत्री विजयन, अयप्पा के गरीब भक्तों को आतंकित कर रहे हैं, तानाशाह जैसा व्यवहार कर रहे हैं। उनकी पुलिस तो महिलाओं तक को नहीं बख्श रही, उनपर हमले कर रही है और भोजन-पानी भी नहीं दे रही। विजयन ने सारी सीमाएं लांघ दी हैं। हम केंद्र सरकार से मांग करते हैं कि वो तुरंत केरल सरकार को बर्खास्त करे, अन्यथा हम केरल में ही नहीं, पूरे देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे।”

वहीं केद्रीय जहाजरानी एवं वित्त राज्य मंत्री पोन राधाकृष्णन आरोप लगाते हैं कि केरल सरकार ने सबरीमला को युद्ध का मैदान बना दिया है। चारों ओर किलेबंदी कर दी गई है। वो कहते हैं, ”मंदिर का दृश्य देख का कलेजा फट जाता है, वो वीरान पड़ा है। पहले वहां हर समय भजन कीर्तन चलता रहता था, लेकिन अब उसकी स्थिति शोक भवन जैसी हो गई है। उसका रखरखाव भी ठीक से नहीं किया जा रहा। पुलिस अधिकारी भक्तों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं। पहले वहां कोई जूते पहन कर नहीं जाता था, लेकिन अब लोग वहां जूते पहन कर भी जा रहे हैं।” 21 नवंबर को जब राधाकृष्णन मंदिर जा रहे थे तो पांबा (मंदिर का प्रवेश स्थल) तक निजी वाहन ले जाने देने की अनुमति न देने पर उनकी पुलिस अधीक्षक यतीश चंद्र से भी झड़प हुई। इसके बाद वो विरोध स्वरूप सार्वजनिक बस से ही मंदिर गए। वो कहते हैं, ”केरल सरकार नहीं चाहती कि भक्त मंदिर जाएं इसलिए उसने सुविधाएं कम दी हैं और दर्शन का समय भी सीमित कर दिया है।“

जैसी की आशंका थी, सबरीमला में राज्य सरकार के बर्बरतपूर्ण रवैये के बाद केरल में ही नहीं, अन्य राज्यों में भी विरोध शुरू हो गया है। राधाकृष्णन कन्याकुमारी से सांसद हैं, उनके अपमान के विरोध में भारतीय जनता पार्टी ने 23 तारीख को बंद का आयोजन किया। इससे पहले 21 नवंबर को चिकमंगलूर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पार्टी सदस्यों और अयप्पा भक्तों पर निर्दय हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। अयप्पा भक्तों पर अत्याचार तथा दर्शन और भक्ति पर तरह-तरह की रूकावटें लगाने के विरूद्ध विश्व हिंदू परिषद भी देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दे चुकी है।

सबरीमला मसले पर मुख्यमंत्री विजयन आखिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतनी शिद्दत से  समर्थन क्यों कर रहे हैं? क्यों उन्होंने इसके विरूद्ध पुनर्विचार याचिक न दायर करने का निर्णय लिया? इसके पीछे भी कुछ कारण हैं। असल में इस पूरे प्रकरण में उनकी दिलचस्पी ‘महिलाओं को अधिकार दिलाने’ में कम और प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के हिंदू वोट बैंक में संेध लगाना अधिक है। उनके लिए राजनीति इतनी महत्वपूर्ण है कि वो इसके लिए सबरीमला की शुचिता और परंपराओं की बलि चढ़ाने के लिए भी तैयार हैं। हाल ही में उन्होंने केरल हाई कोर्ट को सुझाव दिया कि अगर भक्त अपना रवैया नहीं बदलते तो राजस्वला महिलाओं के अयप्पा दर्शन के लिए दो दिन नियत कर देने चाहिए। यानी वो किसी भी कीमत पर अयप्पा भक्तों के विश्वास को कुचलने पर आमादा हैं।

उन्हें लगता है कि इस विवाद से भले ही भारतीय जनता पार्टी को कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन इससे कांग्रेस को दीर्घकालिक और स्थायी नुकसान पहुंचाया जा सकता है। शायद यही वजह है कि वो आजकल अपनी सभाओं में भाजपा और कांग्रेस पर सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने सबरीमला मुद्दे पर हिंदुओं को तोड़ने की कोशिश भी की है। उन्होंने हिंदुओं के सबसे बड़े जातीय समूह एजावास के नेता और श्री नारायण धर्म परिपालना योगम (एसएनडीपी) के महासचिव वेल्लापल्ली नटेशन को अपने पक्ष में बयान देने के लिए उकसाया। लेकिन उनके पुत्र और भारतीय धर्म जन सेना (बीडीजेएस) के प्रमुख तुषार वेल्लापल्ली सरकार का जमकर विरोध कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं, अधिकांश बीडीजेएस कार्यकर्ता तुषार का समर्थन कर रहे हैं। उधर हिंदुओं का एक अन्य प्रमुख संगठन नायर सर्विस सोसायटी (एनएसएस) भी सरकार से लोहा लेने के लिए तैयार है।

परस्पर विरोधी रूख के बावजूद मुख्यमंत्री विजयन ने घोषणा की है कि वो सबरीमला में शांति बहाली के लिए एसएनडीपी, एनएसएस आदि हिंदू जातीय समूहों की बैठक बुलाएंगे। उन्होंने अपने साप्ताहिक टेलीविजन प्रसारण में कहा कि राज्य को ‘आदियुग’ में ले जाने की कोशिश की जा रही है, इसके खिलाफ उन सभी ताकतों को एकजुट हो जाना चाहिए जिन्होंने ‘पुनर्जागरण’ के लिए संघर्ष किया। सवाल ये है कि क्या सबरीमला मंदिर में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपराओं का पालन राज्य को ‘आदियुग’ में ले जाना है? सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले तक जो परंपरा ‘आदियुगीन’ नहीं थी वो अचानक कैसे ‘आदियुगीन’ हो गई? सोचने की बात है कि क्या सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को हजारों अयप्पा भक्तों ने वोट नहीं दिया होगा? क्या उसे वोट देने वाले सभी भक्त ‘आदियुगीन’ थे?

सीपीएम का ये कैसा पुनर्जागरण है जो सिर्फ हिंदुओं पर ही लागू होता है, जबकि पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों को समर्थन देता है और राज्य के मल्लपुरम जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में मनमाने हिंदू विरोधी नियमों को खामोशी से स्वीकृति देता है? क्या ये सीपीएम के पुनर्जागरण का नतीजा है कि आईएस में सबसे अधिक भारतीय मुसलमान केरल से ही गए हैं और सबसे ज्यादा लव जिहाद के मामले भी वहां हुए हैं? आपको याद दिला दें कि पुनर्जागरण की गुहार लगाने वाले विजयन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2009 के आम चुनावों में मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए आतंकी मामले में जेल काट चुके पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के कट्टरवादी नेता अब्दुल नासेर मदनी से हाथ मिलाया था। क्या ये इसी पुनर्जागरण का नतीजा है कि सबसे अधिक हिंदू केरल में ही ईसाई बनाए गए? केरल में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याएं क्या इसी ‘पुनर्जागरण’ का परिणाम हैं? अचरज नहीं कि स्वयं विजयन पर संघ के कार्यकर्ता और मुख्य शिक्षक रामकृष्णन की हत्या का आरोप लग चुका है।

हिंदुओं को पुनर्जागरण सिखाने से पहले ये महत्वपूर्ण तथ्य भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि केरल के अधिसंख्य हिंदू मातृसत्तत्मक परिवार व्यवस्था का पालन करते हैं जहां पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं को हर क्षेत्र में प्रधानता दी जाती है। केरल के पुरूष सैकड़ोें वर्षों से इस व्यवस्था को सम्मान के साथ मानते चले आ रहे हैं। पश्चिम में इजाद किए गए ‘फैमिनिज्म’ से बहुत पहले से ही केरल में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का ही नहीं, पुरूषों से भी ऊंचा दर्जा हासिल रहा है। ऐसे में सीपीएम का आयातित ‘पुनर्जागरण’ राज्य की महिलाओं का क्या भला करेगा? वैसे भी विजयन को याद दिलाना बेहतर होगा कि केरल में ही अत्तुकल मंदिर और चक्कूलातुकवू मंदिर भी है जिनमें सिर्फ महिलाओं को ही पूजा करने की अनुमति है। अत्तुकल मंदिर में वर्ष में एक बार अत्तुकल पोंगल समारोह होता है जिसमें दस लाख से भी अधिक महिलाएं भाग लेती हैं। महिलाओं के सबसे बड़े जमावड़े के लिए इसका नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है।

अब थोड़ा विचार सबरीमला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी किया जाए। राजस्वला महिलाओं के मंदिर प्रवेश निषेध को अदालत ने महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ माना है। लेकिन सबरीमला के नियम संविधान के विरूद्ध नहीं हैं। वहां महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है। वहां राजस्वला महिलाओं के प्रवेश निषेध के पीछे जो कारण है उनका तर्क और परिप्रेक्ष्य समझना होगा। भारत में समस्या ये है कि हमने आंख मूंद कर पश्चिमी शिक्षा और न्याय पद्धति अपना ली है। यही नहीं, हमने राजनीतिक विचारधाराएं भी पश्चिम से किराए पर ली हैं। हम ये नहीं कहते कि हर पश्चिमी चीज बुरी है, मगर इतना तो कहना ही होगा कि उनकी सीमा भी है।

अगर सुप्रीम कोर्ट सबरीमला मामले में सिर्फ ‘महिलाओं के अधिकारों’ के तर्क से ऊपर उठ कर ये जानने की जहमत उठाता कि जो नियम बनाया गया है उसका वैज्ञानिक और तार्किक आधार क्या है तो संभव है कि वो वह फैसला नहीं देता जो उसने दिया। लेकिन मंदिरांे के वास्तु, ऊर्जा संचार, प्राणप्रतिष्ठा और उनके महिलाओं पर प्रभाव आदि विषय ऐसे हैं जिनके लिए उसे भारतीय शास्त्रों को भी पढ़ना पढ़ता जो उसने नहीं पढ़े। उसने तीन तलाक मामले में जैसे इस्लामिक धर्मगुरूओं से घंटों तक चर्चा की अगर वैसे ही हिंदू विद्वानों से भी थोड़ी देर बात कर ली होती तो उसे पता लग जाता कि राजस्वला महिलाओं को लेकर जो नियम बनाया गया है, उसका तर्क और वैज्ञानिक आधार क्या है। बात सीधी सी है – ऐसा तो नहीं है न कि जो बात आपको पता नहीं, उसका अस्तित्व ही न हो, वह सही भी न हो।

सबरीमला में राजस्वला महिलाओं के प्रवेश निषेध के लिए जो मिथकीय कारण बताया जाता है वो ये है कि अयप्पा बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए वो राजस्वला महिलाओं से दूर रहते हैं। ध्यान रहे हिंदू धर्म में ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी यौन ऊर्जा को ऐसी ऊर्जा में परिवर्तित करना जो आध्यात्मिक ज्ञानोदय में प्रयुक्त हो सके। यहां ब्रह्मचर्य की अवधारणा पश्चिम से अलग है जहां इसका एक ही मतलब है – यौन संबंधों से दूर रहना।

प्रवेश निषेध के पीछे कुछ अन्य कारण भी बताए जाते हैं जैसे सबरीमला क्षेत्र में गुरूत्वाकर्षण सामान्य से अधिक है जिससे गर्भवती महिलाओं का गर्भ गिर सकता है। एक अन्य कारण ये भी बताया जाता है कि राजस्वला महिलाओं की उपस्थिति मंदिर परिसर की ऊर्जा पर नकारात्मक असर डालती है। भारतीय शास्त्रों के अनुसार मंदिर अपने वास्तु और प्रयुक्त सामग्रियों के आधार पर ऊर्जा प्रवाह निर्मित करते हैं जो भक्तों के ऊर्जा प्रवाह और सकारात्मकता को बढ़ाता और सुदृढ़ करते हैं। मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा भी एक माध्यम है उनमें ऊर्जा का संचार करने का। मंदिर महिलाओं के मासिक चक्र में कैसे असर डालते हैं इसका एक उदाहरण केरल का ही भगवती मंदिर है। चेंगन्नूर स्थित इस मंदिर में महिलाएं बांझपन अथवा मासिक धर्म की गड़बड़ियों से मुक्ति के लिए जाती हैं और अपनी समस्यों से छुटकारा भी पाती हैं।

आतंकी अफजल गुरू, अर्बन नक्सलियों आदि के मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट ने जैसी तत्परता दिखाई, वैसी न तो सबरीमला मामले में दिखाई दी और न ही अयोध्या मामले में। ऐसे में हिंदू समाज में बेचैनी स्वाभाविक है, सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर संदेह करना लाजमी है। उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सबरीमला मामले में दायर की गई पुनर्विचार याचिकाओं पर जल्द फैसला लेगा और ऐसा करते समय हिंदू ज्ञान-विज्ञान और उसका पालन करवाने के लिए बनाए गए नियमों का भी सम्मान करेगा।