Posts

‘Urban Naxals is not just a phrase, it’s a real threat to India’ in The Sunday Guardian

Entrepreneur Lalita Nijhawan exposes the Maoist modus operandi in urban areas to garner ideological support from intellectuals and academicians.

 

Lalita Nijhawan, a multifaceted woman entrepreneur, has been extensively supporting the academic debates on the issue of “Urban Naxalism”. She leads a travel conglomerate and owns Nijhawan Group of Companies which has diverse business modules across the country. Nijhawan tells The Sunday Guardian how “vulture politics” around caste, secessionism and nationalism drove her to form the Group of Intellectuals and Academics (GIA), a women’s forum working towards creating a nationalist intellectual space in the country. Excerpts:

Q: GIA has been organising seminars and debates on the Urban Naxal issue. According to you, how big is this Naxal problem for the country?

A: GIA is a forum of professional and expressive women that took shape in 2015, to question the hypocritical and exclusionary intellectual space claimed by a certain group. It came into being amidst a rhetoric and hysteric atmosphere created by anti-national campaigns in the country. The GIA team includes a Presidential awardee, pro-vice chancellors, noted mountaineers, dancers of international fame, senior advocates, university teachers, journalists and entrepreneurs. We conduct monthly seminars on vital current issues, publications, press conferences, marches and public signature campaigns to draw the attention of the society towards the vulture politics around caste, secessionism and nationalism.

We take these issues to concerned authorities and, on the basis of our fact-finding reports, we try to convince the governments to make changes in their policies. The GIA takes up different issues which ails the country. Urban Naxalism is just one of them but there are other issues too which the GIA has worked on. These issues include Jisha case, Triple Talaq, Kathua case, nationalism, women empowerment, exposing the anti-national hate-monger brigade, etc.

Q: Do you think “Urban Naxalism” is not just a phrase but a real threat to the internal security of the country?

A: Of course it is not just a phrase but a real threat to our internal security. The latest government data shows that 90 districts of the country are currently Naxal affected. All these districts fall within rural areas with extreme levels of poverty and total lack of development. But their modus operandi in urban areas is a part of the Maoist strategy that has extensively been detailed and documented in the “Strategies and Tactics” document of the central committee of Communist Party of India (Maoist). This is the phenomenon of Urban Naxalism which is defined as the Maoist Naxal network of Left-wing intellectuals and students present in the universities, cultural organisations and civil society networks in towns and cities.

Q:  Do you think that Naxalism is still alive due to the ideological support it’s getting from the Urban Naxals sitting in the metropolitan cities?

A: As discussed above, Naxalism is the real threat to our internal security and Urban Naxalism is nothing but the backbone of Naxalism. Without that ideological support, it is not possible for anyone to go against the sovereignty and integrity of a nation to this extent.

Q: What inspired you to set up GIA? What are the works done by the group in the recent past?

A: For past few years, we all are witnessing a hazardous challenge in front of us and that is of creating a fake narrative. Now-a-days, a section of the media first creates a narrative among the target audience and then disseminates information which are spoon-fed to them instead of investigating things on the ground level and presenting facts. Everyone around tend to believe whatever they learn from the media. GIA is an effort to present a different and fact-based narrative to the people.

“नक्सलवादः आग से खेल रहे हैं राहुल गांधी” in Punjab Kesari

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नयर ने अपनी जीवनी ‘बियोंड द लाइंस’ में विस्तार से बताया है कि कैसे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में अकाली दल – जनता दल सरकार को अस्थिर करने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया। वो लिखते हैंः

“राजनीतिक सरजमीं पर भिंडरावाले का उदय 1977 में हुआ जब अकाली दल – जनता पार्टी ने कांग्रेस को हरा कर पंजाब में सरकार बनाई। जैल सिंह, हारने वाले मुख्यमंत्री जो बाद में देश के राष्ट्रपति बने, सबसे ज्यादा नाखुश थे। एक तो उनकी सरकार चली गई थी और दूसरे गुरदयाल सिंह ढिल्लों कमीशन ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर अपने अधिकारों के दुरूपयोग का दोषी पाया था। ये कमीशन मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कामकाज की समीक्षा के लिए बनाया गया था।

संजय गांधी, जो अपने एक्स्ट्रा-काॅंस्टीट्यूशनल तौर-तरीकों के लिए जाने जाते थे, ने सुझाव दिया कि अकाली सरकार को चुनौती देने के लिए किसी ‘संत’ को आगे बढ़ाया जाए। संजय और जैल सिंह, खासतौर से जैल सिंह को अच्छी तरह से पता था कि कैसे पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने अकालियों से लोहा लिया था और कैसे उन्होंने सख्त स्वभाव अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को पटखनी देने के लिए संत फतेह सिंह को खड़ा किया था।”

कांग्रेस के भिंडरावाले को आगे बढ़ाने के फैसले ने आगे चल कर क्या गुल खिलाया, कैसे पंजाब ही नहीं पूरे उत्तरा भारत में खालिस्तानी आतंक का नंगा नाच हुआ, कैसे आॅपरेशन ब्लू स्टार हुआ, कैसे इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद कैसे और किसके द्वारा हजारों सिखों का नरसंहार हुआ, ये एक लंबी और दुखद कहानी है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस के वर्तनाम नेतृत्व ने इस से कोई सबक सिखा है?

अस्सी के दशक में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती श्री लंका में की। दक्षिण में एक के बाद एक चुनाव हार रही इंदिरा गांधी को लगा कि अगर वो श्री लंका में अपनी उपेक्षा के कारण आंदोलित तमिलों की मदद करेंगी तो उन्हें तमिलनाडु में तमिलों के वोट मिलेंगे। कांग्रेस को खोया हुआ जनाधार वापस मिल सकेगा। अगर लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल इलम (एलटीटीई) के पूर्व प्रमुख कुमारन पथमंथन उर्फ केपी की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने एलटीटीई की मदद की। बाद में जब एलटीटीई हाथ से निकलता दिखाई दिया तो कांग्रेस ने इससे हाथ खींच लिए। यही नहीं राजीव गांधी ने तमिल आतंकियों से लड़ने के लिए ‘पीस कीपिंग फोर्स’ भी भेजी। इसका नतीजा क्या रहा? एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।

सवाल ये है कि क्या खालिस्तानियों और तमिल आतंकियों को बढ़ावा देकर कांग्रेस ने कोई सबक सीखा?

अब कश्मीर को लें। वर्ष 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। भारतीय फौज पाकिस्तानियों का मुकाबला कर ही रही थी कि जवाहर लाल नेहरू इस मसले को संयुक्त राष्ट्र ले गए। उन्होंने अपनी हरकतों से भारत को जो नासूर दिया, वो सबके सामने है। बाकी की रही सही कसर राज्य में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने 1987 में पूरी कर दी जब वहां विधान सभा चुनावों को फर्जी ठहरा कर अलगाववादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद पाक समर्थित आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित कर राज्य से भगाया गया और फिर विदेशी ताकतों के इशारे पर हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया। कांग्रेस, अलगाववादियों और आतंकियों के इस पूरे नंगे नाच को खामोश समर्थन देती रही। इसका क्या परिणाम निकला, वो बताने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन सवाल फिर वही – क्या कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व ने इस प्रकरण से भी कोई सबक सीखा?

चाहे मसला कश्मीर का हो या खालिस्तान का या श्री लंका के तमिल आतंकियों का, स्पष्ट है कि वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और अपने पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है। वैसे सवाल ये है कि इन घातक गलतियों का सबक क्या है? सबक बड़ा सादा है – अगर कोई राजनीतिक दल आतंकियों को बढ़ावा देता है तो कल को वहीं आतंकी उस पर भी हमला कर सकते हैं।

लेकिन हम आखिर ऐसा कह क्यों रहे हैं कि राहुल ने पार्टी और पूर्वजों की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा? इसका कारण है उनका देशद्रोही नक्सलियों को खुले आम और पूर्ण समर्थन। आश्चर्य की बात तो ये है कि यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नक्सलवादी आतंकी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इस्लामिक आतंकियों से भी बड़ा। मनमोहन सरकार ने तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में ये भी कहा था कि अर्बन नक्सल और उनके समर्थक, जंगलों में घुसपैठ किए बैठी उनकी सेना – पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई वैध सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं और लोगों को उसके खिलाफ भड़काते हैं।

आज हम इस बात को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जैसे अर्बन नक्सल और उनके कांग्रेसी और अन्य समर्थक एक स्वर से मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं, वो किसी से छुपा नहीं है। ये दावा करते हैं कि देश में आपातकाल है और मतभिन्नता को दबाया और कुचला जा रहा है। कोई इनसे सिर्फ एक आसान सा सवाल पूछे – अगर तुम्हें दबाया जा रहा होता तो तुम संवादादाता सम्मेलन कैसे कर पाते? तुम जो मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में झूठा प्रचार कर रहे हो, वो कैसे कर पाते? वैसे भी ये जिन अर्बन नक्सलियों को ‘बुद्धिजीवी’, ‘लेखक’, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ आदि बता रहे हैं, उनके खिलाफ पुलिस के पास पूरे सबूत हैं कि कैसे ये देश की सरकार को पलटने और प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रच रहे थे, कैसे इन सबका प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति से सीधा राब्ता था और ये कैसे उसके आदेशों पर न केवल अराजकता फैला रहे थे, बल्कि उसके लिए धन, हथियार आदि की व्यवस्था भी कर रहे थे। सीधी सी बात है अर्बन नक्सलियों को जंगल में बैठे उनके आकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। ये पाप में बराबरी के भागीदार हैं।

लेकिन राहुल गांधी को जैसे ये सब दिख ही नहीं रहा या वो इसे देखना ही नहीं चाहते। जैसा कि इतिहास गवाह है, आतंक और हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले नक्सलियों से सांठगांठ राहुल को उलटी भी पड़ सकती है। राहुल सोच रहे होंगे कि मैं चाणक्य की तरह मोदी के खिलाफ नक्सलियों का इस्तेमाल कर रहा हूं और उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों और नक्सलियों का मोर्चा बना रहा हूं जिसमें जब दूसरे विपक्षी दल भी शामिल होंगे तो मेरी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। नक्सली दलितों को मोदी के खिलाफ भड़काएंगे, देश में व्यापक हिंसा करेंगे और मैं इस अराजकता के बीच कहूंगा कि मोदी देश नहीं संभाल सकते, अब बस मैं ही एक विकल्प हूं। राहुल गांधी के चीन से बढ़ते प्रेम के बीच लोग अब ये भी पूछने लगे हैं कि क्या राहुल, नक्सलियों और चीन के बीच कोई संबंध है? क्या चीन राहुल को भारत में प्रमोट कर रहा है और इसके लिए नक्सलियों का प्रयोग किया जा रहा है?

खेल चाहे जो हो। इसमें नक्सलियों का ज्यादा फायदा है। वो सोच रहे होंगे कि हम महत्वाकांक्षी राहुल गांधी के कंधों पर सवार होकर देश के कोने-कोने में फैल जाएंगे और जब हमारा काम निकल जाएगा तो उसका सफाया कर देंगे। नक्सलियों की प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) को देश की सबसे पुरानी पार्टी खुलेआम समर्थन दे, उससे बेहतर उसके लिए क्या हो सकता है? फिर कांग्रेस तो उन्हें सिर्फ ‘नैतिक समर्थन’ ही नहीं, पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। ये बात हमने भीमा कोरेगांव मामले में छह जून को दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सल रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिले पत्रों में भी देखी थी जिसमें एक काॅमरेड दूसरे काॅमरेड को कह रहा है कि अगर हम दलितों को आंदोलित करें तो कांग्रेस हमें पैसा और कानूनी सहायता देगी। जब 28 अगस्त को गिरफ्तार किए गए अर्बन नक्सलियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो सबने देखा कि कांग्रेस के वकीलों की पूरी फौज उनकी पैरवी में उतर पड़ी। इनमें अभिषेक मनु सिंघवी, राजीव धवन, दुष्यंत दवे आदि शामिल हैं। ध्यान रहे कांग्रेस के अनेक वकील जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों तक में नक्सलियों के मुकदमें लड़ रहे हैं।

लेकिन क्या सिर्फ राहुल गांधी की ही नक्सलियों से सांठगांठ है? 28 अगस्त को अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी के बाद हमने देखा सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में सदस्य रहे हर्ष मंदार और अरूणा राॅय जैसे लोग खुल कर अर्बन नक्सलियों के समर्थन में सामने आ गए। अर्बन नक्सलियों ने 30 अगस्त को दिल्ली में जो प्रेस काॅफ्रेंस की उसमें अरूणा राय शामिल हुई और इसमें बाकायदा कांग्रेसी वकीलों को धन्यवाद भी दिया गया। यूपीए के जमाने में हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करने वाली अरूंधति राॅय भी इसमें शामिल हुईं। दिलचस्प बात तो ये है कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल में उसकी तस्वीर भी इस्तेमाल की जैसे वो उसकी अलगाववादी घटिया सोच को मान्यता दे रही हो। इसमें राहुल गांधी के करीबी अर्बन नक्सल जिग्नेश मेवानी भी शामिल हुए। कुल मिलाकर अर्बन नक्सलियों के इस संवाददाता सम्मेलन में परोक्ष में कांग्रेस ही छायी रही।

नक्सलियों को कांग्रेस का समर्थन किस हद तक है, इसे समझने के लिए सोशल मीडिया की जांच करनी चाहिए। यहां सारे कांग्रेसी पत्रकार, वकील, तीस्ता सीतलवाड़ और जाॅन दयाल जैसे फर्जी मानवाधिकार कार्यकर्ता पूरा दम लगाकर प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के अर्बन नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं।

जिन अर्बन नक्सलियों के लिए राहुल गांधी, उनकी पार्टी और चेले इतने व्यथित हो रहे हैं, असल में यूपीए के कार्यकाल में खुद उनकी पार्टी ने उन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था जिनके ये सदस्य हैं। असल में दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। भीमा कोरेगांव केस में छह जून और 28 अगस्त को जो दस अर्बन नक्सल पकड़े गए हैं, उनमें से सात तो इन्हीं संस्थाओं में काम करते हैं। ये हैं – वरवर राव, सुधा भारद्वाज, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, अरूण फरेरा, वर्नन गोेंजालविस और महेश राउत। इनमें से ज्यादातर पर पहले ही मुकदमे दर्ज हैं और कई तो सजा भी काट चुके हैं। इनके देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगावादी षडयंत्रों, दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय हथियार सप्लायरस से संपर्क हैं। भारतीय सेना के प्रति इनकी नफरत जगजाहिर है।

Urban Naxals: The Enemy within

Murders
Demolition of school buildings
Tribal women raped
Civilians kidnapped
Central Reserve Police Force (CRPF) persons killed
Ransoms demanded
and yet Naxals are called revolutionaries and not terrorists.

The complexity of their existence lies in the dual roles they play, one covert as tribal sympathisers and revolutionaries and another overt as extortionists, terrorists, blood hungry rebels.

Since 1972, Naxalite insurgence has shed all capes it donned for relieving the rural people from the Zamindar’s oppression.
The Zamindars have disappeared from the modern day discourse.
Yet the spite of the tribals has remained the same across decades.

In 1972, following the death of Charu Majumdar, the Naxalite movement emerged in a fresh light; a light that blinds the eyes.
In the years that came, the red corridor had painted the town anything but red.
It gave leeway to new appendages, the ‘intellectual terrorists’

 

Somewhere between 4 G (4thgeneration Spectrum) and 4 GW (4thGeneration warfare) India has moved ahead and paradoxically retrogressed.
Some of the mealy mouthed intellectuals have discretely doubled as ‘Urban naxals’.

Urban naxals are the present day liaisons to the Naxalite movement.
They are the new extortionists, the new oppressors, the new roadblocks to development in whose name they thrive.

They have done a meticulous job in remaining hidden for decades.
A harmful nexus of university professors, media men, intelligentsia, IT professionals and medical practitioners has emerged.
Sitting in their comfortable air conditioned rooms, often living off the government’s subsidies, the tax payer’s money; these naxals have been engaging in causing irreversible harm to our nation.

They target the students, who are as naïve as a goat that is about to be butchered and turned into minced meat, after being well fed and well taken care of.
Universities have become the safe havens of these urban intellectual terrorists who deliver instructions, hiding behind their innocent lecturer costumes.
Just like their compatriots, the Naxals who hide in the thickets and undergrowths of the tribal hinterland.
Look around, maybe you’ll find a terrorist, right next to you.

The venomous speech of the intellectual propaganda cannot be denied, the words ‘bharat tere tukde honge’ will echo from the walls of Jawarharlal Nehru University to the entire country.
Pillars of education where debate and discussion have been taken for granted, are hotbeds of left terrorists, discretely introducing students to sinister propaganda.
It is a slow poison and it acts like Cancer, it spreads before you know you have reached Stage 4 GW.

Where students sat under trees and engaged in revered debates with their professors in gurukuls, today the guru has robbed them of knowledge, of intellectual development; he slow poisons them to believe in anti-establishment, destruction, disintegration.
With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

 

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth, our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see.
Macaulay wanted to destruct India’s culture and use it to their advantage by the divide and rule principle.
It appears that the Britishers passed on the beacon of destruction of India to the Congress party. And congress party has made the seat warm for the Naxals.

 

All congress has done in its decade long rule is to masquerade its incapacity by giving out doles to appease what it calls the minority section.
To make sure that they remain a faithful minority vote base, Congress has never truly dug them out of impoverishment.
It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism.

Congress has coordinated well with the Naxalite movement, the urban naxals strive to keep the issue of oppression alive.
While the challenges to this country lay in a plethora of issues such as child labour, sex trafficking, terrorism, substance abuse, the focus has been shifted to secularism, intolerance.
Problems are created, issues are staged and the youth brainwashed.

 

They are like the synapse, whose structure is not definitely visible.
Whose existence is inevitable to pass information from one neuron to another.
The Naxals have spread like the neurons and they use these synapses in the urban area as their linkages, their informants, their underground workers.
These transition points must be exposed, dealt with a blow.
The door to intellectual terrorism must be shut, before it makes the system collapse under its own weight.
Look around before it’s too late!

Urban Naxals: The blood thirsty chameleons

Is Naxalism just an ideology?
Is it followed by the tribals?
Does it have followers in the cities?

The poor have no ideology.
They follow an ideologist, one who paints them a rosier picture.
This ideology was efficiently transcribed by Charu Majumder, who wanted to alleviate poor tribals from the affliction of poverty.
What started in a small town called Naxabari in West Bengal soon spread like wild fire and subsumed the neighbouring states.
It carved a path in the woods, a road not hitherto taken.

While the Zamindari oppression was soon and successfully brought to a excruciating demise. The ideology of the Naxalites didn’t remain incorruptible for long, following the death of Charu Majumdar, the movement lost its purpose and sheen.

The road not taken became the road that should not have been taken.
In order to keep their funds flowing, the Naxals kidnap innocent civilians, through whom they demand a ransom.
They are known to take bribes from trucks that pass through the red corridor.
Reports of looting civilians that pass through the forests are also afloat.

The ideologists turned into mass murderers, they ironically became the enemy they were fighting against.

The spread is out of context if one looks at ‘Zamindari oppression’ as the seat of the movement.
In order to understand how these states came to be roped in, we need to look at the larger ideologues that the Naxals operate on.

The Red corridor developed along Odisha, Chattisgarh, Jharkhand, Andhra Pradesh.
However today, in roads are reaching Delhi, Haryana, Karnataka, Kerala.
The blue print for the future of the red corridor is bereft of buildings, roads, infrastructure, technology and development.
From the undergrowths of the mineral rich states, the chameleons have emerged into the city. The well educated and well aware, entitled, empowered citizens have been roped in their false narratives of growth and development.

The Urban Naxals
Sitting camouflaged behind the bushes and thickets of the jungle, the Naxalites could well orchestrate their guerrilla warfare tactics. However in order to seep into the urban landscape they figured it needed more than physical strength and so began the steady infestation of the mind.
They targeted scapegoats; intellectually pretentious people of the society that occupied the urban hinterlands.

The reach has cast a murky spider web of university lecturers, IT professionals, doctors, engineers, media and the most innocuous of all, students.
Professors have misused their seat of power and tool of empowerment to brainwash the youth of the nation, to drag them into their sorry network of destructive politics.

Universities are making to headlines not for their excellence in education but rather for the political turmoil, the ideological unrest, the intellectual debilitation.

Students are yelling about deconstruction, demolition, unrest. They are being injected the serum of soft terrorism into their brains.
The credit goes to the Maoists who have successfully created the Urban Naxals.

With youthful entrants such as Kanhaiya Kumar, Swara Bhaskar and Jignesh Mewani, Umar Khalid, the rhetorics of debate, discussion and dissent have changed.
They are now channels of mass propaganda, hate speech, calling upon nothing short of destruction and demolition.

In his book titled ‘Urban Naxals’, Vivek Agnihotri exposes the intricate and sublime network of urban naxals, where they indoctrinate youth with extreme left anti-India ideology through a hierarchal structure.
He gives a chilling firsthand account where he faced violence and resistance from students across Universities such as Jadavpur university, JNU, Indian Institute of Technology IIT Bombay, IIT Madras, IIT Gandhinagar, National Law School (NLU), National Academy of Legal Studies and Research (NALSAR)
A network of universities in a posh urban India, where dissent is not worded, it is acted through violence.
Is this what we want our students, our youth and our nation to become?
A harmless filmmaker was at the edge of being lynched for showing a movie that most denied to see

But surely such a destructive ideological movement couldn’t have survived without support.
Over its dynastic decade long rule, Congress has warmed the seat for the Naxals, it has handed support to their existence and spread.
Making all odds meet, the politics of destruction has united.

They have ensured that the vicious cycle of poor getting poorer and rich getting richer would remain a cliché for as long as they exist.
Like the age old adage says, “Give a man a fish, and you feed him for a day. Teach a man to fish, and you feed him for a lifetime.”
Congress chose to give fishes and so the mandate remained to give out doles to the poor and continue their cycle of oppression.
This although ensures a faithful vote bank, it never truly gets them out of the quick sand.

It continues to play the messiah by tearing apart the binding Hindu fabric.
It continues to pit Hindus against Muslims, Brahmins against Dalits in 2018.
Where the narrative of the common populace is far from such caste division, it uses intellectual terrorism

Let us not allow these political narratives to shape our minds and encourage us to become appendages of destruction.
Students of India! Behold! You are above this mediocre fight.
You are the new light that the country is aspiring to become, do not let the camouflaged terrorists dictate your path to development.

Sit back, look around, contemplate and introspect.
Watch your words, scrutinise your actions.
You are wiser than falling prey to the Urban Naxalism.
You are the new leaders!

“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।