“एनआईए जांच के घेरे में पाक समर्थित लाॅबी और गद्दार नेता क्यों नहीं?” in Punjab kesari

जम्मू-कश्मीर टेरर फंडिंग केस में नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) की चार्जशीट आतंकवाद के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई की ओर पहला कदम है। ये कदम निःसंदेह महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है, लेकिन, देश को अगर कश्मीर और अंततः देश में आतंकवाद के खिलाफ जंग जीतनी है तो और भी बहुत कुछ करना होगा।

कश्मीर में लंबे अर्से तक चली पत्थरबाजी और हिंसा की घटनाओं के बाद सरकार ने इनकी तह तक पहुंचने और इसके लिए असल में जिम्मेदार पर्दे के पीछे छिपे आतंकियों तक पहुंचने के लिए एनआईए को जांच का काम सौंपा।

जांच में जो बातें सामने आईं, वो जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकारों के लिए नई नहीं हैं। सभी जानते हैं कि दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग और कश्मीर में हुर्रियत राज्य में आतंकवाद फैलाने के दो प्रमुख स्तंभ हैं और इन्हें सक्रिय सहयोग मिलता है पाकिस्तानी सेना और उसके लश्कर ए तौएबा और हिजबुल मुजाहीदीन जैसे आतंकवादी बगल-बच्चों सें। एनआईए की चार्जशीट में इस पूरे नेटवर्क की संभवतः पहली बार गहराई से छानबीन की गई और उसे सिलसिलेवार तरीके से दर्ज किया गया।

12,794 पृष्ठां में फैली इस चार्जशीट में 12 लोगों के नाम लिए गए। इनमें लश्कर ए तौएबा और हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख क्रमशः हाफिज सईद और सय्यद सलाहुद्दीन तथा हुर्रियत के मुखिया सय्यद अली शाह गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह (फंटूश), उसके निजी सचिव बशीर अहमद भट, व्यापारी जहूर अहमद शाह वटाली और पाकिस्तानी उच्चायोग के अनेक अधिकारियों के नाम शामिल हैं। आश्चर्यजनक रूप से इसमें सय्यद अली शाह गिलानी, मीरवायज उमर फारूक, यासीन मलिक आदि जैसे बड़े हुर्रियत आतंकियों के नाम शामिल नहीं हैं। एनआईए का कहना है कि उनके खिलाफ भी जांच जारी है। लेकिन सवाल ये है कि ये कैसी जांच है जिसमें राज्य के असली आतंकी सरगनाओं को न तो अभी तक कोई समन भेजा गया है और न ही उनसे बात ही की गइ्र है?

बहरहाल हकीकत ये है कि इनके चारों ओर भी शिंकजा कसा जा चुका है। गिलानी के दामाद और निजी सचिव तो घेरे में आ ही चुके हैं, गिलानी भी कब तक खैर मनाएगा, ये देखना बाकी है। एनआईए ने अपनी जांच के दौरान 60 जगहों पर छापे मारे और 950 महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए और इस मामले में उसे 300 गवाह मिले। उम्मीद की जा सकती है कि अपनी जांच में एनआईए को सय्यद अली शाह गिलानी, मीर वायज उमर फारूक, यासीन मलिक आदि जैसे बड़े आतंकियों के खिलाफ भी सबूत मिले ही होंगे।

पिछली सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में जारी आतंकवाद को लेकर काफी ढिलाई बरती। कश्मीरी आतंकवाद को कहीं न कहीं इस्लामिक तुष्टिकरण से भी जोड़ा गया। नई दिल्ली में पत्रकारों, नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों की पूरी ऐसी जमात पैदा हो गई जो कश्मीरी अलगाववाद और इसके समर्थन में फैलाए जा रहे आतंकवाद को जायज मानती थी। इस जमात ने ‘उदारवाद’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर न केवल इसका समर्थन किया, बल्कि इनका देश विदेश में प्रचार भी किया। इस जमात के अनेक सदस्य ‘काॅफिडेंस बिल्डिंग मेशर्स’ के नाम पर इस्लामाबाद-कराची से लेकर वाशिंगटन, न्यू याॅर्क और लंदन के चक्कर मारते रह और पांच सितारा होटलों में सेमीनार करते रहे।

इस जमात के अनेक सदस्य तो वाशिंगटन में आईएसआई एजेंट गुलाम मोहम्मद फई के एनजीओ कश्मीर अमेरिकन काउंसिल के मेहमान भी रहे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक जो टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय है, उसके हमें आए दिन दर्शन होते ही रहते हैं। इनके अलावा कम्युनिस्ट सीताराम येचुरी, कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर, जनता दल से निष्कासित शरद यादव और कविता कृष्णन जैसे ओवरग्राउंड नक्सली जिस तरह खुलेआम विघटनकारी तत्वों को समर्थन देते रहे हैं, वो भी किसी से छुपा नहीं है।

देश में नक्सलियों के नेतृत्व में मुसलमानों और दलितों का एक गठबंधन तैयार हो चुका है जिसे कांग्रेस और कम्युनिस्टों का समर्थन भी हासिल है। ये न सिर्फ खुलेआम गृहयुद्ध को उकसाते हैं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद का खुला समर्थन करते हैं। यहां बताते चलें की कश्मीरी आतंकवादियों और नक्सलियों का गठबंधन पुराना है। यूपीए शासन में तो सय्यद अली शाह गिलानी और अरूंधती राय दिल्ली में खुलेआम संवाददाता सम्मेलन करते थे। पुलिस इन्हें संरक्षण देती थी और इनका विरोध करने वाले देशभक्तों की पिटाई।

जाहिर है एनआईए ने दिल्ली में पाकी उच्चायोग, पाकी आतंकवादियों और हुर्रियत जैसे कश्मीरी आतंकी पिट्ठुओं की जांच तो की है पर इस जमात के खिलाफ न तो कोई जांच की है और न ही अब तक किसी कार्रवाई का इरादा ही जताया है। कश्मीर में चल रहे आतंकवाद के पीछे असली खिलाड़ी तो पाकी सेना है। लेकिन अफसोस एनआईए ने एक बार भी उसका नाम नहीं लिया। जब तक पाकी सेना की भूमिका की गहराई से जांच नहीं होगी, कश्मीर में आतंकवाद का मसला कैसे सुलझेगा?

एनआईए जांच के बहाने सरकार ने कश्मीर में सक्रिय आतंकियों पर तो लगाम लगाने की कोशिश की है पर वहां जमीनी स्तर पर जो समस्या है, उसका हल अभी तक नहीं सोचा गया है। हाल ही में थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने दो बातों की ओर इशारा किया – 1) विघटनकारी, कट्टरवादी पाठ्यक्रम और 2) मस्जिदों द्वारा फैलाया जा रहा इस्लामिक कट्टरवाद। कहना न होगा राज्य के शिक्षा मंत्री अल्ताफ बुखारी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और जनरल रावत को उनके अधिकारक्षेत्र से बाहर न आने की सलाह दी। कश्मीर में सेना जैसे आतंकवादियां को ठिकाने लगा रही है, उसे देखते हुए अल्ताफ बुखारी की तल्ख टिप्पणी अनापेक्षित नहीं थी। लेकिन जनरल रावत ने जो समस्याएं सामने रखी हैं उनका हल जरूरी है। अगर राज्य के बच्चों को विकृत, विघटनकारी और कट्टरवादी शिक्षा दी जाएगी तो वो बड़े होकर अलगाववादी नहीं बनेंगे तो और क्या बनेंगे?

सउदी अरब और पाकिस्तान की मदद से कश्मीर में सूफी इस्लाम को दफनाया जा रहा है और कट्टरवादी, वहाबी, हिंसक इस्लाम को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहां हर दूसरे दिन अल कायदा और आईएस के झंडे फहराए जा रहे हैं और कश्मीर को इस्लामी खिलाफत का हिस्सा बनाने की मांग की जा रही है। राज्य में अचानक सैकड़ों नई मस्जिदें उग आई हैं जो इसे भरपूर बढ़ावा दे रहीं हैं। हिंदू और हिंदुस्तान को दुश्मन बताने वाले इस इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर लगाम लगाना जरूरी है।
केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने पत्थरबाजों पर नरमी बरतते हुए उन्हें आम माफी देने की बात कही है। जिन आतंकवादियों ने किसी आतंकवादी घटना में भाग न लिया हो, उन्हें भी माफ करने की बात है, लेकिन सवाल ये है कि कब तक ऐसे लोग पैदा होते रहेंगे और कब तक उन्हें माफी दी जाती रहेगी। राज्य में अलगावाद को बढ़ावा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35 (ए) को सरकार कब समाप्त करेगी? भारतीय जनता पार्टी ने इन दोनों को समाप्त करने का वादा अपने चुनाव घोषणापत्र में भी किया है। सरकार कब अपना वादा पूरा करेगी?

आतंकवाद समाप्त करने के मसले पर भारत लंबे अर्से से विदेशी ताकतों का मुंह जोहता रहा है। लेकिन भारत सरकार को समझना होगा कि इस समस्या से उसे खुद ही निपटना होगा। अमेरिका समेत दुनिया के प्रमुख देशों के दबाव के बावजूद पाकिस्तान जिस बेशर्मी से हाफिज सईद की पैरवी कर रहा है और वहां सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बावजा से लेकर प्रधानमंत्री शाहिद खक्कान अब्बासी तक जैसे उसका बचाव कर रहे हैं, उससे साफ है कि पाकिस्तान कश्मीर पर अपनी नीति कम से कम फिलहाल तो बदलने के लिए तैयार नहीं है। इसका सबूत हमें जम्मू-कश्मीर में लाइन आॅफ कंट्रोल और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी दिखाई दे रहा है जहां भारत में आतंकियों को ठेलने के लिए पाकिस्तानी सेना की बमबारी जारी है।

अब इस्लामिक आतंकवाद की समस्या सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं है। ये कश्मीर से केरल और गुजरात से बंगाल तक फैल चुकी है। अब वक्त आ गया है कि सरकार देश में इसकी जड़े उखाड़ने के लिए ठोस उपाय करे। इसके लिए अगर कुछ सरकारों और उदारवादियों के भेष में छुपे आईएसआई एजेंटों की बलि भी लेनी पड़े, तो लेनी चाहिए।

एनआईए जांच निःसंदेह सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन कानून के हाथ सिर्फ हुर्रियत आतंकियों तक ही नहीं, फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और पीडीपी के उन नेताओं के गले तक भी पहुंचने चाहिए जो राज्य में सरेआम अलगाववाद और आतंकवाद का समर्थन करते हैं और आतंकियों को अपना भाई बताते हैं। ये नेता आतंकियों को ‘नैतिक समर्थन’ देते हैं और जनता को भारत के खिलाफ भड़काते हैं। देश के करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा कब तक इन गद्दारों पर बहाया जाता रहेगा? भारत के साथ दोगला खेल खेलने वाले ऐसे लोगों को भी सलाखां के पीछे भेजा जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये समझना होगा कि देश की जनता ने उन्हें इसलिए वोट दिया था कि वो देशहित में सख्त फैसले करने की क्षमता रखते हैं। अब वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री अपने दृढ़ निश्चय का परिचय दें। अनुच्छेद 370, 35 (ए) को तुरंत समाप्त करें और पाकिस्तान का आतंकी देश घोषित करें।

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