“बंद हो एससी-एसटी एक्ट के नाम पर झूठ और हिंसा की राजनीति” in Punjab Kesari

न्यायमूर्ति यूयू ललित और एके गोयल की सुप्रीम कोर्ट बैंच ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 (एससी-एसटी एक्ट) के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत किसी सार्वजनिक कर्मचारी को उसके नियोक्ता प्राधिकारी की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। इसी प्रकार गैर-सार्वजनिक कर्मचारी को सीनियर सुपरिनटेंडेंट पुलिस की अनुमति के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत लोगों को झूठे मामलों से बचाने के लिए जरूरी है कि कोई भी कार्रवाई करने से पहले डिप्टी पुलिस सुपरिनटेंडेंट पुलिस ये जांच करें कि मामला एससी-एसटी एक्ट का बनता है या नहीं।

ध्यान रहे एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए अगर इसके तहत कोई शिकायत होती है तो आरोपित व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का शुरू में तो संज्ञान ही नहीं लिया गया लेकिन आगामी चुनावों के मद्दे नजर कुछ राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने की ठानी। विशुद्ध रूप से न्यायिक इस फैसले को भावात्मक रूप दिया गया और विपक्षी दलों ने इसके लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस पार्टी ने आनन-फानन में भाजपा को दलित विरोधी करार दिया और दावा किया कि इस फैसले में उसका हाथ है। अदालत के फैसले के विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आयोजन किया जिसमें व्यापक हिंसा हुई और जान-माल की हानि हुई।

इन दंगों की इलैक्ट्राॅनिक मीडिया ने व्यापक कवरेज की। अदालत के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी लोगों का गुस्सा समझा जा सकता है, लेकिन दंगों की फुटेज से स्पष्ट था कि ये पूरी तरह प्रायोजित थे। पूना कोरेगांव के बाद एक बाद फिर भड़की इस हिंसा से साफ है कि एससी-एसटी समाज को मुख्यधारा से अलग करने और देश में हिंसा और अराजकता फैलाने के लिए सुविचारित षडयंत्र हो रहा है। इस्लामिक आतंकियों, नक्सलियों और मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दलों के गठबंधन ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के विवादास्पद छात्र रोहित वेमुला को प्रतीक बनाकर जिस राजनीति की शुरूआत की थी, वो अब परवान चढ़ती नजर आ रही है।

हमने देखा कैसे कांग्रेस ने गुजरात में जिग्नेश मेवानी के साथ गठबंधन किया जिसे नक्सलियों और पाॅपुपर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों ने खुलेआम समर्थन दिया। पूना कोरेगांव में इसीे व्यक्ति के भड़काऊ भाषण के बाद महाराष्ट्र में व्यापक दंगे फैले। ये व्यक्ति राजनीतिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाता है और सरेआम लोगों को हिंसा के लिए भड़काता है।

बहरहाल एससी-एसटी वर्ग की भावनाओं का आदर करते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को पुनर्विचार याचिका दायर की। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस पूरे प्रकरण में सरकार का हाथ होने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “सरकार सुप्रीम कोर्ट के तर्क से सहमत नहीं है जिसने एससी-एसटी एक्ट की संरचना को नए सिरे से गढ़ दिया है…हमें लगता है कि इस प्रकार के संवेदनशील मामले पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता थी और आंकड़ों के आधार पर ये तय किया जाना चाहिए था कि इसका दुरूपयोग हो रहा है या नहीं।” प्रसाद ने एससी-एसटी एक्ट के प्रति अपनी सरकार का समर्थन दोहराया और कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे मजबूत किया गया है। 1989 में मात्र 22 अपराध धारा 3, (1) और (2) के तहत दर्शाए गए थे, लेकिन 2015 में मोदी सरकार ने इस सूची में विस्तार किया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पांच दिन के भीतर ही सरकार ने पुनर्विचार याचिका तैयार कर ली थी, लेकिन छह दिन तक अदालत का अवकाश रहने के कारण इसे दायर नहीं किया जा सका।

सरकार ने इस विषय में दायर अपनी पुनर्विचार याचिका में स्पष्ट शब्दों में कहा, ”ये फैसला बड़ी जनसंख्या वाले एससी-एसटी वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ये संसद की उस विधायिका नीति के विपरीत है जो एससी-एसटी एक्ट में परिलक्षित होती है। एससी-एसटी वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए किए गए विभिन्न कार्यों के बावजूद उनकी स्थिति अब भी कमजोर है। उन्हें कई नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते, उनके खिलाफ अनेक अपराध किए जाते हैं, उन्हें अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है…विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके खिलाफ गंभीर अपराध किए जाते हैं।“

स्पष्ट है सरकार ने इस वर्ग की भावनाओं और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को समझा और उसके अनुरूप सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

दो अप्रै्रल को हुई व्यापक हिंसा और सरकार की पुनर्विचार याचिका के बावजूद चार अप्रैल को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा, ”कई बार विरोध करने वाले अदालत के आदेश को ठीक से पढ़ते भी नहीं, इसमें निहित स्वार्थ भी शामिल हो सकते हैं।” अपने आदेश के पीछे की मंशा को साफ करते हुए अदालत ने कहा ”हमें निर्दोष लोगों को जेल भेजे जाने पर चिंता है, क्या किसी व्यक्ति की आजादी बिना किसी उचित प्रक्रिया के छीनी जा सकती है? सत्यापन का कोई तरीका तो होना ही चाहिए। अगर एक सार्वजनिक कर्मचारी के खिलाफ आरोप लगता है तो क्या होता है? अगर आरोप एटाॅर्नी जनरल के खिलाफ लगे तो क्या हो? उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए?”

इस विषय में 12 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अपने लिखित निवेदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। सरकार की ओर से एटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि अदालत की ये सोच गलत है कि वो कानून बना सकती है। अदालत द्वारा एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को क्षीण करने से देश को भारी नुकसान हुआ है। सरकार ने अदालत से आग्रह किया किया कि वो कानून में किए गए परिवर्तनों को तुरंत वापस ले ताकि वही कानून अपनाया जा सके जिसे संसद ने पारित किया है।

केंद्र सरकार इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में तो पक्ष रख ही रही है, लेकिन साथ ही उसने अन्य विकल्प भी खुले रखे हैं। 11 अप्रैल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई वरिष्ठ मंत्रियों की एक बैठक में इस विषय में अध्यादेश लाने पर भी चर्चा की गई। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया तो सरकार इस संबंध में अध्यादेश का रास्ता भी अपना सकती है।

अदालत में लड़ाई से लेकर अध्यादेश तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद तक सबने स्पष्ट कर दिया है कि एससी-एसटी वर्ग को आहत करने वाले इस फैसले को नहीं माना जाएगा। आश्चर्य की बात तो ये है कि सरकार द्वारा पूरा समर्पण दिखाने और हर संभव प्रयास करने के बावजूद विपक्षी दल झूठ का भ्रमजाल फैलाने में लगे हैं।

मायावती को इस अवसर पर एक बार फिर कश्मीरी आतंकियों की जय जयकार करने वाला विवादास्पद नक्सली रोहित वेमूला याद आने लगा है। उन्होंने अनुसूतिच जाति वर्ग पर अपनी इजारेदारी जताते हुए भाजपा को इस वर्ग का विरोधी करार दिया है। मायावती आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उंगली उठा रही हैं, लेकिन इन्हीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए एससी-एसटी एक्ट का दुरूपयोग रोकने के बारे में 20 मई 2007 को एक आदेश निकाला था जिसमें कहा गया था, ”दबंग व्यक्ति आपसी वैमनस्य के कारण प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर एससी-एसटी को मोहरा बनाकर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं, इस बात का ध्यान रखा जाए कि निहित स्वार्थों के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल न होने पाए।” मायावती यहीं नहीं रूकीं, उन्होंने 29 अक्तूबर को इस संबंध में एक और आदेश निकाला जिसमें कहा गया था, ”एससी-एसटी सदस्यों के उत्पीड़न के मामलों में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान नहीं किया जाए।” सोचने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को क्या वही नहीं कहा था जो मायावती ने 2007 में कहा था। लेकिन आज मायावती केंद्र सरकार को चुनौती दे रहीं हैं कि अगर उसे एससी-एसटी से प्यार है तो वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाए।

उधर राहुल गांधी आग में घी डालने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है वो मोदी के राष्ट्रवाद को जातिवाद से काट पाएंगे। तभी तो वो झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आतंकियों का गुणगान करने वाले नक्सली रोेहित वेमूला ने आत्महत्या की थी, लेकिन राहुल, मोदी सरकार पर उसकी हत्या का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस ने 60 साल के शासन में एससी-एसटी वर्ग के लिए क्या किया, वो ये तो नहीं बताते, लेकिन मौजूदा दशा के लिए वो मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, जिसने इस वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए पिछले चार साल में कांग्रेस के 60 साल से ज्यादा काम किया है। हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने सरेआम ये झूठ बोला कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। जातिवादी नफरत और हिंसा भड़काने के लिए इस से बड़ा षडयंत्र और क्या हो सकता है? अब इसे दुष्प्रचार और षडयंत्र नहीं तो और क्या कहेगे कि राहुल गांधी एससी-एसटी वर्ग को पोटने के लिए ‘संविधान बचाओ मुहिम’ का आगाज करने जा रहे हैं, जबकि संविधान या इस कानून पर कहीं कोई संकट है ही नहीं।

राहुल गांधी के जहरबुझे भड़काऊ बयानों के खिलाफ पांच अप्रैल को स्वयं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने एक ट्वीट कर राहुल पर आरोप लगाया कि वो ये झूठ बोल कर समाज में नफरत भड़का रहे हैं कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट रद्द कर दिया है। उन्होंने सबूत के तौर पर राहुल गांधी के भाषण का अंश भी पेश किया जिसमें वो कह रहे थे, ”दलितों और आदिवासियों पर जुल्म बढ़ रहे हैं और एससी-एसटी एक्ट वापस ले लिया गया है। नरेंद्र मोदी जी एक शब्द भी नहीं कह रहे हैं।“

कांग्रेस अध्यक्ष की ऐसी हरकत निश्चित ही निंदनीय है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए वो आजकल बिना किसी सबूत के कुछ भी बोल रहे हैं। सबने देखा कि उन्होंने गुजरात में पटेलों को आरक्षण का झुनझुना थमाया जबकि काननून ये संभव नहीं है। कर्नाटक में तो वो हिंदू समाज को ही बांटने पर उतर आए हैं। भारतीय लोकतंत्र की ये विडंबना हो गई है कि स्वार्थ में अंधे नेता समाज में आग लगाने के लिए बेसिरपैर के भड़काऊ बयान देते हैं और उनके चेले चपाटे इसे ब्रह्य वाक्य मान कर प्रचारित-प्रसारित करते हैं। ये खेल सिर्फ बयानों तक ही रहे तो भी गनीमत है, समाज को तोड़ने तथा हिंसा और आतंक फैलाने के लिए बाकायदा हिंसक गिरोहों को पैसा दिया जाता है और लाशों को ट्राॅफी समझा जाता है।

जाहिर है मोदी सरकार को सतर्क रहना होगा। एससी-एसटी वर्ग में असंतोष के नाम पर देश तोड़ने के लिए विघटनकारी ताकतें सक्रिय हो चुकी हैं। इन ताकतों से सख्ती से निपटना होगा, नहीं तो ये समाज को ही नहीं तोड़ेंगी, देश की छवि को भी भारी नुकसान पहुंचाएंगी। यदि इन पर लगाम नहीं लगाई गई तो सरकार आर्थिक्र विकास के लिए जो प्रयास कर रही है, वो धरे के धरे रह जाएंगे।

0 replies

Leave a Reply

Want to join the discussion?
Feel free to contribute!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *