”सबका साथ सबका विकास” के लिए जरूरी है समान नागरिक संहिता समान नागरिक संहिताः ये सवाल सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के हक का नहीं, देश की एकता, अखंडता और मजबूती का है

तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खाने के बावजूद आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के तेवर नरम नहीं हुए हैं। हाल ही में भोपाल में हुई बैठक में बोर्ड ने एक बार फिर मोदी सरकार पर निशाना साधा और ‘चेतावनी’ दी कि मुसलमाल अपने पर्सनल लाॅ में किसी भी तरह का सरकारी हस्तक्षेप सहन नहीं करेंगे। इस से पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद भी तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नकार चुकी है। उसका तर्क भी यही है कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ के मामले में बाहरी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और जमीयत जैसी संस्थाओं को भले ही देश और संविधान मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्थाओं के रूप में मान्यता नहीं देते हांे, लेकिन हकीकत तो यही है कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस, समाजवादी पाटी, बहुजन समाज पाटी, तृणमूल कांग्रेस आदि जैसी पार्टियों ने इनका जमकर राजनीतिक इस्तेमाल किया है और इन्हें मुसलमानों के वोटों के ठेकेदार के रूप में मान्यता दी है।
प्रधानमंत्री मोदी के तीन तलाक का विरोध करने तक इस्लाम परस्त राजनीतिक दलों और मौलवियों के इस गठजोड़ में दोनों के लिए फायदा ही फायदा था। मौलवियों को अपने समाज के साथ मनमानी करने और पैसा एंेठने की छूट थी तो दूसरी तरफ राजनीतिक दलों को मुस्लिम वोटों के लिए दर दर नहीं भटकना पड़ता था। मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक का खुल कर विरोध करने के बाद निःसंदेह मुस्लिम महिलाओं ने मौलवियों और उनका अंध समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया।
इस बगावत से मौलवियों और इस्लाम परस्त राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन मंे भूचाल आ गया है। मौलवियों के संगठनों की जो गीदड़ भभकियां अब सामने आ रही हैं वो अपने अस्तित्व को बचाने की नाकाम कवायद से अधिक कुछ नहीं हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इनका अब भी काफी प्रभाव है और ये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद मुस्लिम महिलाओं को हानि पहुंचा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिलाओं और उनके परिवार वालों के साथ इन मौलवियों का व्यवहार इसकी गवाही देता है।
मौलवियों और इस्लाम परस्त राजनीतिक दलों के गठबंधन को तोड़ने का एकमात्र उपाय है यूनीफाॅर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता। समान नागरिक संहिता का सीधा और सरल अर्थ ये है कि देश में हर वर्ग, धर्म, संप्रदाय, जाति से परे हर स्त्री और पुरूष के लिए एक ही प्रकार का कानून हो। चाहे मामला विवाह का हो या तलाक का, या विरासत, या बच्चों की कस्टडी का, सबके लिए एक जैसा कानून हो। स्त्री और पुरूष दोनों को संविधान की नजर में एक समान दृष्टि से देखा जाए। अगर पत्नी को बहुविवाह की अनुमति न हो तो पति को भी इसकी इजाजत न हो। ध्यान रहे समान नागरिक संहिता का मतलब है – देश में सबके लिए एक जैसा कानून चाहे वो मुस्लिम हा या हिंदू या पारसी या यहूदी। एक बार समान नागरिक संहिता लागू होगी तो सबको पर्सनल कानून छोड़ने होंगे।
समान नागरिक संहिता का मामला नया नहीं है। संविधान सभा में जब इस मसले पर बहस हुई तो ड्राॅफ्टिंग समिति के अध्यक्ष डाॅक्टर भीम राव अंबेडकर ने इसका पुरजोर समर्थन किया। वो इसे राजनीतिक आजादी को सामाजिक आजादी में बदलने का माध्यम मानते थे और इसे भारत की एकता और स्थिरता के लिए बहुत जरूरी बताते थे। संविधान सभा के मुस्लिम सदस्यांे ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया था और इसे अत्याचारी तक बता दिया था। ध्यान रहे संविधान सभा में कोई मुस्लिम महिला नहीं थी जो अपने अधिकारों की बात कर सकती और भारतीय मुसलमानों की स्त्री विरोधी प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठा सकती।
बहरहाल अंबेडकर में मुस्लिम सदस्यों के बेसिर पैर के बयानों का तर्क सम्मत जवाब दिया। उन्होंने कहा ”इंसानी संबंधों के लगभग हर आयाम के बारे में देश में पहले से ही समान नागरिक कानून मौजूद है.ं…हमारे पास समान और संपूर्ण अपराध संहिता है…हमारे पास संपत्ति हस्तांतरण के विषय में कानून है…मैं ऐसे अनगिनत कानून बता सकता हूं जो ये साबित कर सकते हैं कि देश में व्यावहारिक रूप से ऐसी नागरिक संहिता है जो अपनी विषय वस्तु के आधार पर समान है और पूरे देश में लागू है।”
संविधान सभा के एक अन्य सदस्य और प्रखर शिक्षाविद् के एम मुंशी ने कहा कि अनुच्छेद 19 नागरिकों को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने का अधिकार देता है, परंतु ये राज्य को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने का हक भी देता है। इसलिए समान नागरिक संहिता को अत्याचारी या मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों के खिलाफ कहना गलत है…तुर्की और मिस्र जैसे विकसित इस्लामिक देश अल्पसंख्यकों को अपने अलग कानून मानने का हक नहीं देते और यूरोप में सभी समूहों को सेक्युलर कानून मानने पड़ते हैं…धर्म को उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित रहना चाहिए जो वैध तरीके से धर्म से संबंधित हैं और बाकी का जीवन इस प्रकार से नियमित, एकीकृत और परिष्कृत होना चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके, देश एक मजबूत और संगठित इकाई के रूप में उभर सके।” संक्षेप में मुंशी ये कहना चाह रहे थे कि देश के एकीकरण के लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत काननू और धर्म अलग-अलग रहें।
समान नागरिक संहिता के पक्ष में अंबेडकर, मुंशी, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर जैसी महान विभूतियों के मजबूत तर्कों के बावजूद जवाहरलाल नेहरू के कारण समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो पाई। लेकिन इसके पक्ष में अधिसंख्य सदस्यों की भावना को देखते हुए इसे संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में डाल दिया गया। इसका अर्थ ये है कि ये काम आने वाली सरकारों पर छोड़ दिया गया….उनसे अपेक्षा की गई कि वो देश में समान नागरिक संहिता लागू करवाएं।
आजादी के 70 साल बाद हम देखते हैं समान नागरिक संहिता का मसला अब भी वैसे ही दलदल में पड़ा है जैसा संविधान के निर्माण के समय था। अब अंतर ये है कि तब बहुत से कांग्रेसी इसके पक्ष में थे लेकिन अब मुस्लिम वोटों की राजनीति के कारण कांग्रेस ने इसे त्याग दिया है। यही नहीं अंबेडकर को अपना मसीहा मानने वाली बहुजन समाज पार्टी जैसी दलित पार्टी भी इसके विरोध में खड़ी हो गई है। जिस समान नागरिक संहिता को अंबेडकर और मुंशी जैसे विद्वानों ने देश की एकता, अखंडता, मजबूती और विकास के लिए आवश्यक बताया था, उसे आज एक ‘सांप्रदायिक’ मुद्दा बना दिया गया है। मुस्लिम तुष्टिकरण की जिस नीति के कारण इसे संविधान में दरकिनार किया गया, उसके कारण अब भी इसकी उपेक्षा जारी है।
अगर हम गौर से देखें तो पता चलता है कि मुस्लिम वोटों के लालच में भले ही कांग्रेस और उसके जैसे अन्य इस्लाम परस्त दल कोई भी पैंतरेबाजी कर रहे हांे, अंबेडकर और मुंशी जैसे महान नेताओं की सोच बिल्कुल उचित और दूरंदेश थी। आज भारत भले ही एक देश हो, लेकिन धर्म के नाम पर जैसे इसे बांटने का काम किया गया उसने इसके दिल में कितने घाव किए हैं, वो कोई छुपा नहीं है। पिछले 70 साल में मुसलमानों में लगातार असुरक्षा की भावना भरी गई और इस्लाम को खतरे में बता कर उनके वोटों की फसल काटी गई। इस्लाम परस्त पार्टियों की कभी ये हिम्मत नहीं हुई कि वो उनसे कह सकें कि वो भारतीय पहले हैं और मुसलमान बाद में। आज तो हालत ये है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अलगाववाद और आतंकवाद तक को सही ठहराया जा रहा है।
आज समान नागरिक संहिता का सवाल मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के परिप्रेक्ष्य में उठाया जा रहा है। सोचिए कि यदि संविधान सभा में कुछ जागरूक पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाएं होतीं तो वो क्या वो इस्लाम के नाम पर अंधे तरीके से समान नागरिक संहिता का विरोध करतीं? बिल्कुल नहीं…हरगिज नहीं। लेकिन इस मसले को सिर्फ एक धर्म या संप्रदाय के संकीर्ण नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। इसे अंबेडकर और मुंशी के नजरिए से ही देखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट में भी जब कभी धर्म और संविधान में टकराव हुआ है, तो अदालत ने हमेशा समान नागरिक संहिता का पक्ष लिया है और शाहबानो गुजारा भत्ता मामले से लेकर तीन तलाक मामले तक इसकी आवश्यकता जताई है। आजादी के इस 70वें वर्ष में अगर हमें देश की एकता, अखंडता, मजबूती और समानता का संकल्प लेना है तो समान नागरिक संहिता लागू करने का संकल्प भी लेना होगा। ‘आधुनिकता’ और ‘21वीं सदी’ की बात करने वाले राजीव गांधी ने मौलवियोें के चक्कर में शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उलटने में देर नहीं लगाई। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दे रहे हैं। उन्होंने तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं का साथ देकर इसे निभाया भी है। पर प्रधानमंत्री जी ये लड़ाई बहुत लंबी है। सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को ही उनका हक नहीं दिलवाना, मौलवियों के चक्कर में फंसे करोड़ों मुसलमान मर्दों को भी देश की मुख्यधारा में लाना है और धार्मिक, जातीय अलगाववाद समाप्त करना है। इसके लिए एक ही उपाय है – समान नागरिक संहिता। शुभस्य शीघ्रम।

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