“क्या आरएसएस के खिलाफ चर्च का षडयंत्र है तूतीकोरिन कांड?” in Punjab Kesari

कठुआ के बाद तूतीकोरिन मामले की कवरेज में एक बार फिर साबित हुआ कि दिल्ली का तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कान का कच्चा और आंख का अंधा है। कुछ लोग इसे हांकते हैं और ये अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना भेड़चाल में फंस जाता है।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारी मारे गए, ये सही है। लेकिन कौन लोग थे जिन्होंने पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, उनपर पत्थरों की बौछार की, महिला पुलिसकर्मियों के कपड़े फाड़े, किनके कारण प्रदर्शन हिंसक हुआ, इसके पीछे कौन सी ताकते थीं, ये प्रायोजित था या वास्तविक, किसने वाहनों, भवनों, एम्बुलेंसों और कलेक्ट्रेट को आग लगाई, किसने तूतीकोरिन को युद्ध का मैदान बना दिया? ये शायद किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की। सबको सिर्फ एक ही बात समझ में आई कि गोली चली और लोग मरे। इसके लिए विपक्षी दलों, खास कर कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तमिलनाडु राज्य सरकार से ज्यादा केेंद्र की मोदी सरकार को दोष दिया। सोशल मीडिया पर कुछ विपक्षी तो प्रधानमंत्री मोदी को हत्यारा बताने लगे। शायद यही षडयंत्रकारियों का मकसद था, और उन्होंने इसे हासिल भी किया। स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट बंद करवाना और उसकी पेरेंट कंपनी वेदांता को बदनाम करना और नुकसान पहुंचाना भी एक मकसद था, लगे हाथों वो भी हासिल हो गया। चलो हाल-फिलहाल तो वो भी बंद हो गया है। यानी एक तीर से कई शिकार। किसे फिक्र है कि स्टरलाइट प्लांट बंद होने से देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुंचेगा? कितने हजार लोग बेरोजगार हो जाएंगे?

सबसे ज्यादा घृणित और भड़काऊ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान था, जिसमें उन्होंने इस पूरे कांड के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। वैसे अल्पज्ञ राहुल गांधी को इसके लिए दोष देना भी मूर्खता ही होगी। उनकी तो राजनीति संघ से शुरू होती है और संघ पर ही खत्म हो जाती है। नक्सलियों से संबंध रखने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तो उन्होंने आधे घंटे के भीतर संघ पर उंगली तान दी। येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया तो उन्होंने एलान कर दिया कि मैं जनता को संघ से बचाउंगा। एक विशेष समुदाय से संबंध रखने के कारण राहुल का हिंदू विरोध समझ में आता है, लेकिन संघ को आतंकवादी साबित करने के लिए साजिश करना, समझ से परे है। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने संघ को हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया है। उसे एक टारगेट बना दिया गया है जिसपर हिंदुओं से नफरत करने वाला हर समुदाय, हर राजनीतिक दल बेखटके उंगली उठा सकता है। संघ का विरोध करना ‘सांप्रदायिकता का विरोध’ मान लिया गया है और इस्लामिक और ईसाई सांप्रदायिकता का समर्थन और ध्रुवीकरण ‘धर्म निरपेक्षता’।

बहरहाल हम लौट कर तूतीकोरिन पर आते हैं। इस मामले में राहुल द्वारा फटाफट संघ पर उंगली उठाना एक व्यापक साजिश का हिस्सा है जिसे तूतीकोरिन का चर्च अंजाम दे रहा है और जिसकी सरपरस्ती दिल्ली में राहुल गांधी और उनका चंपू मीडिया कर रहा है। हम जो कुछ कह रहे हैं वो बहुत जिम्मेदारी से कह रहे हैं। तमिलनाडु के तीन जिलों तिरूनेलवेली, तूतीकोरिन और कन्याकुमारी में ईसाइयों की तादाद सर्वाधिक है और यहां आम जनता पर चर्च का काफी प्रभाव है। ये संयोग नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन्हीं तीन जिलों में विकास परियोजनाओं का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है।

तिरूनेलवेली में कंुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध आपको याद होगा जिसे रूस के सहयोग से बनाया जा रहा था जो अमेरिका को पसंद नहीं था। तबके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के लिए अमेरिका समर्थित संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने आरोप लगाया था कि तूतीकोरिन के बिशप यवोन एम्ब्रोइस को प्रदर्शनों के लिए 54 करोड़ रूपए मिले थे और वो इन प्रदर्शनों के मुख्य कर्ताधर्ता थे। इनके अलावा कई और ईसाई संस्थाएं जैसे पीपल्स एजुकेशन फाॅर एक्शन एंड लिबरेशन और गुड विशन भी प्रदर्शन भड़काने के लिए गृह मंत्रालय के रडार पर थीं। गृह सचिव ने घोषणा की थी कि चार ऐसे गैर सरकारी संगठनों के बैंक खाते सील कर दिए गए थे जो विदेशों से मिला पैसा प्रदर्शन भड़काने में लगा रहे थे।

तूनीकोरिन में ईसाई आबादी 30 प्रतिशत के करीब है और आम जनजीवन पर चर्च का गहरा असर है। यहां चल रहा स्टरलाइट काॅपर स्मेलटिंग प्लांट भी विवादों के घेरे में लाया गया। फिलहाल इसमें चार लाख टन तांबा सालाना बनाया जाता है। विस्तार के बाद इसकी क्षमता आठ लाख टन सालाना हो जाती। इससे भारत की तांबे की लगभग सारी जरूरत पूरी हो जाती और इसके आयात की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ध्यान रहे तांबे का इस्तेमाल विद्युतीकरण से लेकर रक्षा उपकरण के निर्माण तक अनेक स्थानों पर होता है। ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी बहुत जरूरी है।

पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक तूतीकोरिन विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी हाथ भी है। कुछ समय पहले लंदन से आया ‘फाॅइल वेदांता ग्रुप’ (वेदांता ग्रुप को असफल करो) का समरेंद्र दास स्टरलाइट प्रदर्शनकारियों से गुपचुप मिला। उसने इन्हें भरोसा दिलाया था कि वो प्रदर्शन जारी रखने में पूरी मदद करेगा। क्या ये सिर्फ संयोग है कि तूतीकोरिन हिंसा के बाद इंग्लैंड में विपक्षी लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता जाॅन मैकडोनल्ड ने वेदांता को अराजक कंपनी बताया और उसे लंदन स्टाॅक एक्सचेंज से हटाने की मांग की? तूतीकोरिन के चर्चों में लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काया गया। यू ट्यूब पर ब्रदर मोहन सी लाजरस का वीडिया उपलब्ध है जिसमें वो बिना किसी सबूत के स्टरलाइट को जहरीली फैक्ट्री बता रहा है। वो कहता है कि चर्च इसे बंद करने के लिए प्रार्थना कर रहा है। वो कहता है 24 मार्च, 2018 को राजाजी पार्क तूतीकोरिन में प्रदर्शन होगा जिसमें सभी कैथोलिक, पैंटाकोस्ट, सीएसआई चर्चों के लोग भाग लेंगे।

ध्यान रहे नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) जैसी संस्थाओं के वैज्ञानिक स्टरलाइट का दौरा कर चुके हैं और इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि इसका उत्सर्जन सेंट्रल पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) और तमिलनाडु पाॅल्युशन कंट्रोल बोर्ड (टीएनपीसीबी) जैसी संस्थाओं द्वार तय किए गए मानकों के अनुसार है। ऐसे में चर्चों द्वारा झूठ बोल कर आम लोगों को स्टरलाइट के खिलाफ भड़काने का क्या मकसद है? जहां कुंडनकुलम में बिशप यवोन एम्ब्रीओस और एसपी उदयकुमार थे, वहां स्टरलाइट मामले में ब्रदर मोहन लेजारस और क्षेत्र के अन्य चर्च हैं। देश की विकास परियोजनाओं के खिलाफ चर्च का ऐसा रूख क्या देशद्रोह नहीं है? अगर मनमोहन सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं?

क्या से संयोग है कि जिस समय तूतीकोरिन कांड की योजना बनाई जा रही थी ठीक उसी समय दिल्ली में आर्कबिशिप अनिल कूटो ‘ईसाइयों पर हमलों’ पर चिंता जता रहे थे और कह रहे थे कि देश कलहकारी दौर से गुजर रहा है और ईसाइयों को लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? क्या ये महज संयोग है कि कूटो के पत्र के बाद देश भर के चर्चों से उनके समर्थन में आवाज उठी जिसे कांग्रेस और अन्य ‘संघ विरोधी’ दलों ने भरपूर समर्थन दिया? क्या ये भी महज संयोग है कि घटना के तुरंत बाद सबसे पहले कमल हासन वहां पहुंचे जो इस समय दक्षिण भारत में ईसाई राजनीति के केंद्र में हैं?

तूतीकोरिन में गोली चलाने के लिए पुलिस को खलनायक बनाया गया। क्या दिल्ली के मीडिया ने एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं कि पुलिस को इसके लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? अगर प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू थे और उनके हाथों में लाठी-बल्लम, राॅड, पत्थर, पेट्रोल बम, शीशे की बोतलें सब कुछ थे। तूतीकोरिन के पत्रकार एन राजेश अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस कपिल सरतकर ने प्रदर्शन स्थल पर कड़ा इंतजाम किया था ताकि प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट तक नहीं पहुंच सकें। अभी पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात कर ही रही थी, कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरीकेड तोड़ दिया और उसे पुलिस पर फेंका। इसके बाद ही पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू किया। मुझे लगा कि हालात गंभीर मोड़ ले रहे हैं तो मैं बाइपास रोड पर चला गया। मैं हालात को ठीक से समझने के लिए कलेक्ट्रेट के विपरीत एक होटल की इमारत की छत पर चढ़ गया। करीब साढ़े ग्यारह बजे कलेक्ट्रेट में घुसने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहनों को आग लगानी शुरू कर दी। इनमें से कुछ लोगों ने जब देखा कि हम उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं और वीडियो बना रहे हैं तो उन्होंने हम पर पत्थरों की बौछार कर दी। जब हम नीचे उतरे तो उन्होंने हमें लाठियों से पीटा और हमारा कैमरा छीन लिया।

एन राजेश के विवरण का समर्थन कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी करते हैं। एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि करीब 11.10 बजे वो अपने सहयोगियों के साथ कैंटीन में चाय पीने गईं। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि कुछ पुलिस कर्मचारी बदहवास तेजी से दौड़ते हुए आ रहे हैं और उनके पीछे लोग पत्थर फेंकते हुए आ रहे हैं। हम भयभीत थे, हमें नहीं पता था कि हम क्या करें, हम वापस कार्यालय में गए। इसके बार करीब 20,000 प्रदर्शनकारी कार्यालय में घुस गए। उनके पास हथियार थे, लाठियां थीं, लोहे के सरियेथे, कांच की बोतलें थीं, पेट्रोल बम थे। उन्होंने तेजी से कार्यालय का सामान बर्बाद करना शुरू कर दिया, पुलिस, कलेक्ट्रेट की गाड़ियों में आग लगा दी। वहां सुरक्षा के लिए तैनात करीब 100 पुलिसवालों ने उनका सामना किया, उन्हें नियंत्रित कर, बाहर भेजने की कोशिश की। प्रदर्शनकारी हजारों में थे और पुलिसवाले बहुत कम। उन्होंने बेरहमी से पुलिसवालों पर हमला बोल दिया, वो अपनी जान बचा कर भागे। फिर उन्होंने कलेक्ट्रेट के सभी वाहनों को आग लगा दी, पूरा कार्यालय धुएंे से भर गया, चारों तरफ धुआं ही धुआं था। कार्यालय किसी युद्ध के मैदान की तरह लग रहा था। प्रदर्शनकारियों ने महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। उनकी कमीज फाड़ दी, उनके गुप्तांग में हाथ घुसाए। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट को भी नहीं बख्शा, उसमें भी आग लगा दी।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मौजूद है। सब एक ही चीज बताते हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, वाहनों, भवनों, कार्यालयों को फूंका, और तो और एम्बुलेंस तक को नहीं बख्शा। पुलिस वालों को खलनायक बताने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो उनकी जगह होते तो क्या करते? क्या उन्हें हिंसा और उन्माद का नंगा खेल खेलने की तब तक इजाजत देते जब तो वो तूतीकोरिन और स्टरलाइट प्लांट को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देते? विवादास्पद, भड़काऊ और विघटनकारी बयानों के लिए बदनाम कांग्रेसी नेता गुलामनबी आजाद ने तो इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग से कर दी। कोई गुलामनबी से पूछे कि क्या जलियांवाला में मारे गए लोग लाठियां, सरिए, पेट्रोल बम, कांच की बोतलें, पत्थर ले कर बैठे थे? क्या उन लोगों ने जनरल डायर और उसके पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था और उनके वाहनोें को आग लगा दी थी? क्या जलियांवाला में मौजूद लोगों ने हिंसा की पहल की थी?

जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर वो मूर्ख नहीं होती। राहुल गांधी ने संघ पर वार करने से पहले और गुलामनबी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग से करने से पहले दिमाग पर थोड़ा जोर डाला तो याद आ गया होता कि स्टरलाइट प्लांट के जिस विस्तार का विरोध हो रहा है, उसकी अनुमति स्वयं मनमोहन सरकार ने 2007 में दी थी। यही नहीं कांग्रेस के स्टार वित मंत्री और गृह मंत्री रहे विवादास्पद पी चिदंबरम 2004 में यूपीए सरकार में मंत्री बनने से पहले स्टरलाइट की पेरेंट कंपनी वेदांता में निदेशक थे।

संघ के प्रति नफरत में अंधे राहुल गांधी को संघ के खिलाफ बयान देने से पहले ये भी याद नहीं रहा कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है, न कि केंद्र के। वैसे भी तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। राहुल गांधी के सीने में कितना जहर भरा है वो उनके ट्वीट से समझा जा सकता है जो कहता है – तमिलों का नरसंहार हो रहा है क्योंकि वो संघ की विचारधारा का पालन नहीं कर रहे। प्रदर्शनकारियों पर चलने वाली हर गोली का संबंध संघ और भाजपा से है।

इतनी नफरत, इतने भड़काऊ बयान, लाशों पर ऐसी ओछी राजनीति? पहले षडयंत्र करना और फिर उसे भुनाना राहुल गांधी और उनकी पार्टी अच्छी तरह सीख गए हैं। इस घटना से भाजपा, केंद्र सरकार को और खासतौर से गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सीख लेनी चाहिए। राजनाथ जी सिर्फ रिपोर्ट मंगाने से काम नहीं चलेगा। चाहे कठुआ का मामला हो या तूतीकोरिन का, गृह मंत्रालय ऐसे षडयंत्रों की त्वरित जांच कराने और सच्चाई सामने लाने में विफल रहा है। क्या इस मामले में रिपोर्ट तलब करने की जगह केंद्रीय गृह मंत्रालय को राज्य सरकार के साथ मिलकर नहीं काम करना चाहिए था? मनमोहन सरकार ने तो फिर भी चर्च के अराजकत तत्वों पर रोक लगाने की कोशिश की, आपने क्या किया? आप पर क्या दबाव है कि आप ऐसे तत्वों पर कार्रवाई नहीं कर रहे? कौन लोग इस षडयंत्र में शामिल थे, उन्हें कहां से पैसा मिल रहा है? क्या ये आपको नहीं मालूम? जनता जवाब चाहती है माननीय गृह मंत्री जी, और वो भी जल्दी।

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